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Friday, 3 April 2015

रेडलाइट वाली औरतें


उस बस्ती की औरतें हैं या
ये निशाचरों की है दुनिया ,
वे निकलती हैं रात को
दिन का उजाला लेकर
पाप क्या और पुण्य क्या
वहां कोई तोल नहीं सकता
ज़हर पीने वाली बना दी गईं पापी
और हाथ झाड़ खड़ा होता है पुण्यात्मा
बीवी बच्चों के सामने देता है
ईश्वर की दुहाई
...... हकीकत इतनी सी है कि
फि‍र कितने धर्माचार्य हो जायेंगे-
 बेरोजगार ....
यदि बता दे उनके भक्तों को कोई
कि रहती हैं अब भी
धरती पर नीलकंठ की भौतिक देहें
जो पुण्यात्माओं की दैहिक तृप्ति के लिए
पी जाती हैं गरल हंसते हंसते
उस बस्ती की औरतें भी तो नीलकंठ ही हैं ?
उन गरलगर्भाओं के तप को
बस्ती के नाम ने डस लिया
तभी तो रात को सजती हैं संवरती हैं ...
जागती हैं पुण्यात्माओं का गरल पीने को ।

- अलकनंदा सिंह 

Thursday, 3 July 2014

मुक्‍ति का पथ

मुझे जीतना है अपना मन
जीतनी है तुम्‍हारी ईर्ष्‍या और जलन
मैं हूं अहसास की वो नदी जिस पर
मुझे बहकर उकेरने हैं वो शब्‍द
जिनमें खुद बहती जाऊं मैं

वो शब्‍द, जो पिंजरों से मुक्‍त हों
वो शब्‍द, जो बोल सकें अपनी बात
वो शब्‍द, जो खोल सकें अपनी सांसें
वो शब्‍द, जो बता सकें कि...
क्‍यों होती है तुम्‍हें ईर्ष्‍या मुझसे
क्‍यों बांधते हो तुम मुझ पै बंधन
क्‍यों करते रहते हो चारदीवारियों का निर्माण
मन की, तन की, धन की और...और...,

चलो छोड़ो जाने भी दो...
सदियां बीत गईं बहस वहीं है खड़ी ये
मेरी मुक्‍ति का पथ
मेरे शब्‍दों की मुक्‍ति का पथ
मेरे अस्‍तित्‍व की मुक्‍ति का पथ ढूढ़ते हुये,
कुछ पाया कुछ खोया भी मैंने
पाया अपनी दृढ़ता को
अपने शब्‍दों की भाषा को

खोया है तुम्‍हारा प्रेम-निश्‍छल
जो आलिंगन को होता था लालायित
अब इसी आलिंगन के बीच आ जाते हैं शब्‍द
चुपके से और तुम हो जाते हो
निष्‍क्रिय आक्रामक भावुक अस्‍पष्‍ट

अब समझे कि स्‍वयं को स्‍वयं से ही
दूर जाते हुए देखना कैसा लगता है
जैसे आत्‍मा से कोई तुम्‍हें कर रहा हो अलग
मैंने तो सदियों से झेली है ये कटन
ये ताड़ना ये चुभन ये गलन

मुझमें बहते हैं शब्‍द मगर जकड़े हुए
वे सहलाकर कहते हैं मुझे कि -
सखी, समय की बदली चाल को तुम 
अच्‍छी तरह समझ लेना
कहीं तुम अस्‍थिर ना होना
कहीं तुम विचलित ना होना
कहीं तुम हारो नहीं कहीं तुम टूटो नहीं
कि कहीं तुम ना बन जाओ अप्रेम
कि कहीं ना बिखर जाए अस्‍तित्‍व तुम्‍हारा

तुम बहती रहो यूं ही प्रेम का भंवर बनाकर
डूब जाये जिसमें वो जलन, ईर्ष्‍या और घृणा
भंवर तोड़ दे वो चारदीवारी भी,और
तैर कर किनारे बैठा प्रेम
फिर करे कोई नई रचना
फिर प्रेम से प्रेम को पैदा करे ,
फिर शब्‍दों में बहे प्रेम, मन में उगे प्रेम

- अलकनंदा सिंह



Monday, 16 June 2014

हे स्‍त्री ...!

 [1]
अपनी छाती को वे कूट रहे हैं और
अनर्गल चीख रहे हैं, करते कोलाहल वे...
अपने भीतर नहीं झांकते कभी जो,
वे भी अब दे  रहे हैं सीख कि-सुनो स्‍त्री !
भीतर बैठो, कुछ मत बोलो, मुंह सींकर तुम
इज्‍़जत के दोनों पलड़ों में तुम ही तुम हो
इधर झुके या उधर उठे, तुम ही दोषी हो
आंखें-कपड़े-चाल-ढाल और तुम्‍हारे मीठे बोल
सब पर कब्‍ज़ा है हमारा कि-
तुम कैसे हंसती हो, क्‍यों हंसती हो ,
कब तक नहीं मानोगी तुम ,
अब घर से नहीं झांकोगी तुम,
तुमने अपने लिए सोच कर
बड़ा अपराध किया है...स्‍त्री ! 
बताओ हमें तुम हो क्‍या, मांसपिंड और मज्‍जा की-
कुछ आकृतियां बस...कुछ इतना ही ना,
अधिकारों की बातों को तुम, सरकारों तक ही रहने दो
जो स्‍वतंत्र हैं वो ढीठ हैं, स्‍त्री नहीं हैं वो कदापि,
पाशों की भाषा कैसे भूल गईं तुम
चालक नहीं चालित बनी रहो तुम
कुछ बोलोगी तो निर्लज्‍ज तुम्‍हीं कहलाओगी
हर रोज खेत और चौराहों पर
निर्वस्‍त्र घुमाई जाओगी...सो,
दुष्‍कर्मों की वेदी पर जीवित ही चढ़ाई जाओगी
                         
 [2]

पर ये क्‍या...जिसको देते रहे अबतक सीख्‍ा,
वही आज ललकार आ रही हैं ...कानों में लावा डाल रही हैं...
पुरुष और स्‍त्री के बीच अस्‍तित्‍वों के युद्ध
इन चलते युद्धों के बीच
सजी वेदियों में अग्‍नि ने,स्‍त्री के संग बैठ
अपना भी ताप वाष्‍पित कर उड़ा दिया है

और...और...और....अब देखो वो लपटें जो
छोड़ीं थीं तुमने विकराल , उनमें झुलस झुलसकर ही
स्‍त्री की अग्‍नि ने, अपने उर की ज्‍वाला को
बना लिया है तुम पर हंसने का...
अपने स्‍व को जगा, तुम्‍हें पछाड़ने का...
एक अमोघ अस्‍त्र ताकि...ताकि...

तुम जलते रहो अपने अहं की आग में निरंतर
दूषित करते हो पौरुष को तुम,
आधी सृष्‍टि को फिर तुम कैसे पहचानोगे
तुम्‍हारे दूषित मन की--अहंकार की शुद्धि में
अभी और समय लगने वाला है...

देखें तबतक कितनी बार चढ़ेगी स्‍त्री
अपनी ही वेदी पर अपनों के ही हाथों...
फिर भी वे होकर निर्लज्‍ज कहेंगे तुमको कि-
हे स्‍त्री ! तुम ही हो कल्‍याणी...इस जीवन की
-अलकनंदा सिंह

Thursday, 23 January 2014

एक सा नाता ...मेरा और उसका ?

रुई के फाहों से हैं.. फिर भी चुभते हैं ,
संस्‍कारों के वे सारे दांव जो बचपन में
मां ने अपने दूध से छानकर--
छांटकर खून में पिरो दिये थे
बेटे और बेटी दोनों में ही तो बराबर
फिर...फिर आज ये क्‍या हो गया..

कि.....
बालपन में गूंथी गई सारी
संवेदना ही ढहा दी गईं आज, जिन्‍होंने
बदल दीं वो संभावनायें भी
उसकी एक लंबी..अंतहीन चीख में..देखो !

कि.....
थरथराई और जड़ होकर हुईं विलीन सभी
भावनायें..आकांक्षायें वो उठते ज्‍वार सी
मां के दूध पर आज कोयले से लिख रही हैं
कि आदम के दिये इस नये पाठ में
हव्‍वा को हासिल हुआ बस..और..बस..
बलत्‍कृत हो खुद के मिटते जाने का दर्द

कि....
अब सड़क पर चलते हुये हर क्षण
उड़ी रहती है नींद उसकी
और बिस्‍तर ....पर...भी ?
बिस्‍तर पर सांप की तरह रेंग कर
बन जाती है फिर वही सड़क मन पर
कि जहां..
टपकती लारों से लथपथाया था शरीर
पीछा करती आंखें.. टटोलते हाथ..हब्‍शी मन..
उफ ...वो सब...मंजर !

कि.....
देखो..आज उनसे बचता हुआ
उस बलत्‍कृत के तन से गुजर कर
मेरे मन तक पहुंचा वो..
फिर पारे सा रिसता हुआ दर्द
कि स्‍वाभिमानी सांसों की वो अकड़न..
वो पीड़ा...वो लड़ाई...वो जगहंसाई...
दुत्‍कारने में पारंगत वो रहनुमाई

कि.....
अपने बूते जीने का.. हंसने का..
सफल होने का.. हौसला पाले वो
गिरती.. फिर उठती, रिसते अनुभवों से
भरा, उसका चेहरा-उसके आंसू-
क्‍यों मेरे भी पोर पोर में उतर रहे हैं
उसकी चीख और मेरी आवाज अबतक
अरे ! एक सी क्‍यों हुये जा रही है

कि .....
वेदना उसकी मैं क्‍यों झेल रही हूं
वह दृश्‍य होकर.. अदृश्‍य रूह सी
क्‍यों मुझमें ही गलती जा रही है,
हर चौथी चार-दीवारी से निकलकर
उसकी वेदना का निकास..आखिर..
क्‍यों मुझ तक ही आता है
घुटनों में दबे उसके और मेरे अस्‍तित्‍व का
ये एक सा कैसा नाता है।
- अलकनंदा सिंह

Monday, 14 October 2013

दंगों पर..

पत्‍थर सी बेजान पड़ी लाशें
कहीं धड़ है तो कहीं सिर
खून से लबालब हैं सारे शहर की नालियां
बहते हूये खून में भी, अब तो कीड़े पड़ गये

बचाओ बचाओ की आवाजें और उनका खौफ
न रोटी बेटी का मसला है ना मान सम्‍मान का
फिर क्‍यों श्‍मसान में तब्‍दील कीं बस्‍तियां
ए सियासत के मरीजो ! ज़रा बताओ तो
क्‍या बेचारगी से मर रही ज़िंदगी के,
नाटक तुम्‍हारे लिए कम पड़ गये

कौन रोया है हक़ीकत दंगों की देखने के बाद,
तुम तो अब मुर्दों के बनाये मंच पर
ज़़िंदा लाशों की तरह नाचते हो
शमसीर को रख लो मयान में अभी,
बचे हुये बच्‍चों के सीने छोटे हैं अभी

अरे..सियासत के मरीजो !
जाओ, कुछ साल रुक कर आना
तब तक बस्‍तियां जवान हो लेंगीं
तुम्‍हारी शमसीर भी कुछ सांस ले लेगी
तुम फिर रचोगे एक नदी
बहते हुये खून की..क्‍योंकि-
हमनिवालों का शिकार तुम्‍हें भाता है
नया जवान खून जो मुंह को है लगा
तो छूटने को हर बार शमसीर ही मांगता है
खून से सने हाथों को खून से ही धोने की
ये अजब शर्त है इस ज़मीं पर जिंदगी की
खून में नहाया भी सफेदपोश ही कहलाता है

सालों से इस माज़रे के गवाह रहे
एक गिद्ध ने दूसरे से कहा-
छोड़ो, अब ये खून.. शमसीर और
आम आदमी के रोने की बातें
अमां हमें तो कबके खाने के लाले पड़ गये
जब से मंचों पर सजे हैं ये सफेदपोश
तभी से हमें अपने बच्‍चे भी गंवाने पड़ गये...
- अलकनंदा सिंह

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