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Wednesday, 1 January 2025

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर- नव वर्ष 2025 पर कव‍िवर नागार्जुन की कव‍िता


 आप सभी को नव वर्ष 2025 की हार्द‍िक शुभकामनायें इसीके साथ आज मैं कव‍िवर नागार्जुन की कव‍िता शेयर कर रही हूं- ''चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर'' 


चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा


चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू

चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू


चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो


चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर


चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो

चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो


चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा


चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो

चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो


चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम


चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर।

प्रस्तुत‍ि : अलकनंदा स‍िंंह 


Friday, 20 August 2021

नागार्जुन की क़ड़ी के अंतिम कवि - त्रिलोचन शास्त्री


कविता सामाजिक समस्याओं का अविकल अनुवाद नहीं हुआ करती, न ही हो सकती है। नागार्जुन की क़ड़ी के अंतिम कवि थे त्रिलोचन जी। उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कठधरा चिरानीपट्टी में 20 अगस्त 1917 को कवि श्री त्रिलोचन शास्त्री का जन्म हुआ था। वे नागार्जुन-केदारनाथ अग्रवाल के बाद हिन्दी की प्रगतिशील कविता की अंतिम क़ड़ी थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में एमए अँगरेजी के छात्र रहे श्री शास्त्री का मूल नाम वासुदेव सिंह था।

उन्होंने लाहौर से शास्त्री की डिग्री प्राप्त की थी जिसकी वजह से 'शास्त्री' उनके नाम के साथ जु़ड़ गया। श्री त्रिलोचन आज, जनवार्ता और समाज जैसे अखबारों से एक पत्रकार के रूप में जु़ड़े रहे। इसके अलावा वाराणसी के ज्ञानमंडल प्रकाशन संस्था में भी उन्होंने काम किया।

पढ़‍िए उनकी कुछ ये कव‍ितायें------

"धरती" में त्रिलोचन शास्त्री लिखते हैं-  

मेरी दुर्बलता को हर कर

नयी शक्ति नव साहस भर कर

तुमने फिर उत्साह दिलाया 

कार्यक्षेत्र में बढ़ूँ संभल कर

तब से मैं अविरत बढ़ता हूँ

बल देता है प्यार तुम्हारा।

त्रिलोचन प्रेम के कवि हैं, लेकिन उनका प्रेम गृहस्थ की नैतिक एवं स्वस्थ भावभूमि पर खड़ा है। वे प्रकृति के कवि हैं, प्राकृतिक अनुभूतियों के कवि हैं-

कुछ सुनती हो

कुछ गुनती हो

यह पवन आज यों बार-बार

खींचता तुम्हारा आँचल है

जैसे जब-तब छोटा देवर

तुमसे हठ करता है जैसे।

त्रिलोचन जीवन संघर्ष पर लिखते हैं- 

तुम्हें सौंपता हूँ 

चलना ही था मुझे- 

सडक, पगडंडी, दर्रे कौन खोजता, 

पाँव उठाया और चल दिया। 

खाना मिला न मिला, 

बड़ी या छोटी हर्रें नहीं गाँठ में बाँधी, 

श्रम पर अधिक बल दिया। 

मुझे कहाँ जाना है यह जानता था, 

मगर कैसे और किधर जाना है

यह व्यौरा अनजाना था।

त्रिलोचन जी को एक उदात्त नैतिक एवं सामाजिक चेतना दायित्व बोधों के प्रति सचेत करती रहती है। इसीलिए निष्क्रियता पर उन्हें ग्लानि और आक्रोश होता है और ल‍िख डालते हैं कि‍ -

कोई काम नहीं कर पाया

कोई किसी के काम न आया

जगती से अन्न-जल-पवन लेता हूँ

क्या मेरा जीवन जीवन है?

शोषकों के प्रति, राज नेताओं के प्रति, अवसरवादियों के प्रति व्यंग्य उनके काव्य में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं-

"झूरी बोला कि बाढ़ क्या आई

लीलने अन्न को सुरसा आई

अब कि श्रीनाथ तिवारी का घर

पक्का बन जाने की सुविधा आई।"


सत्यं, शिवं, सुन्दर के दिन प्रति दिन हारने का उल्लेख भी उनके काव्य में यहाँ वहाँ मिल जाता है-

अच्छाई इन दिनों बुराई के घर पानी

भरती है

अच्छाई के बिगड़े दिन हैं, और बुराई

राजपाट करती है।

कला पक्ष के विषय में भी त्र‍िलोचन जी लिखते हैं-

सीधे सादे सुर में अर के गान सुनाए

मन के करघों पर रेशम के भाव बुनाए।

शब्दों से ही वर्ण गंध का काम लिया है

मैंने शब्दों को असहाय नहीं पाया है।

प्रस्‍तुत‍ि -अलकनंदा स‍िंंह


Saturday, 30 June 2018

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं

हरफनमौला कवि बाबा नागार्जुन के जन्‍मदिवस पर विशेष

बाबा नागार्जुन का जन्‍म 30 जून 1911 को वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा, हुसैनपुर में हुआ था। यह उन का ननिहाल था।
उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरौनी गांव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही ‘यात्री’ हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के ‘संयुक्त निकाय’ का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के ‘भिक्खुओं’ को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और विख्यात बौद्ध दार्शनिक के नाम पर अपना नाम नागार्जुन रखा।
नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी जो १९२९ ई० में लहेरियासराय, दरभंगा से प्रकाशित ‘मिथिला’ नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी रचना ‘राम के प्रति’ नामक कविता थी जो १९३४ ई० में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘विश्वबन्धु’ में छपी थी।
नागार्जुन ने हिन्दी में छह से अधिक उपन्यास, करीब एक दर्जन कविता-संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली (हिन्दी में भी अनूदित) कविता-संग्रह तथा एक मैथिली उपन्यास के अतिरिक्त संस्कृत एवं बाङ्ला में भी मौलिक रूप से लिखा।
जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं 
जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं
ये पंक्तियां सही मायनों में जन कवि बाबा नागार्जुन की पहचान हैं। साफगोई और जन सरोकार के मुद्दों की मुखरता से तरफदारी उनकी विशेषता रही। अपने समय की हर महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रहार करती कवितायें लिखने वाले बाबा नागार्जुन एक ऐसी हरफनमौला शख्सियत थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और भाषाओं में लेखन के साथ-साथ जनान्दोलनों में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और कुशासन के खिलाफ तनकर खड़े रहे।
रोजी-रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा 
कोई भी हो निश्चय ही वो कम्युनिस्‍ट कहलाएगा 
दो हज़ार मन गेहूं आया दस गांवों के नाम
जब वह बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर वापिस स्वदेश लौटे तो उनके जाति भाई ब्राह्मणों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। लेकिन बाबा ने ऐसी बातों की कभी परवाह नहीं की। राहुल सांस्कृत्यायन के बाद हिन्दी के सबसे बडे़ घुमक्कड़ साहित्यकार होने का गौरव भी बाबा को ही प्राप्त है। बाबा की औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं हो पायी। उन्होंने जो कुछ सीखा जीवन अनुभवों से सीखा और वही सब लिखा जो हिंदी कविता के लिए अमूल्य धरोहर हैं।
दो हज़ार मन गेहूं आया दस गांवों के नाम
राधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम 
सौदा पटा बड़ी मुश्किल से, पिघले नेताराम
पूजा पाकर साध गये चुप्पी हाकिम-हुक्काम
गरीबों और मजलूमों की आवाज
स्पष्ट विचार, धारदार टिप्पणी, गरीबों और मजलूमों की आवाज उनकी कविताओं में प्रमुखता से शामिल रही। हिंदी कविता में सही मायनों में कबीर के बाद कोई फक्कड़ और जनकवि कहलाने का उत्तराधिकारी हुआ तो वो थे बाबा नागार्जुन। घुमक्कड़ी स्वभाव और फक्कड़पन के बीच बाबा के मन में एक बेचैनी थी जो उनकी कविताओं में साफ दिखाई पड़ती है। बाबा, सामाजिक सरोकारों के कवि थे। आजादी के बाद जो मोहभंग की स्थिति हुई उससे उनको बड़ी पीड़ा होती थी। भ्रष्टाचार और बेईमानी से बड़े खिन्न होते थे लेकिन मुखर होकर शासन की करतूतों को अपनी कविता में शामिल करते थे।
घुमक्कड़ी स्वभाव के थे इसलिए लगातार यात्राएं करते रहते थे लेकिन समाज के पिछड़े, वंचित तबकों और गरीबों के लिए उनकी चिंता जगजाहिर थी। 1941 के आस-पास जब बिहार में किसान आंदोलित हुए तो बाबा भी सब कुछ छोड़कर आंदोलन का हिस्सा बन गये और जेल भी गये। अपनी बेबाकियों में एक स्वप्न वो हमेशा देखा करते थे समता मूलक समाज के लिए। बाबा हमेशा कहा करते थे कि हमने जनता से जो लिया है उसे कवि के रूप में जनता को लौटाना होगा। इसीलिए उनकी कविताएं सत्ता से सीधे सवाल करती थीं, टकराती थीं।
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के !
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के! 
साहित्य के मनीषियों का मानना है कि बाबा ने हमेशा गांधीजी का सम्मान किया लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और गांधीजी के अनुयायियों के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देने लगा। यह परिवर्तन बाबा को खलने लगा और इसीलिए उन्होंने कविता लिखी-बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ जो सबसे मजबूत आवाज थी वो थी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की। बाबा को जब भी कहीं कोई उम्मीद की किरण नजर आती थी तो उसे प्रोत्साहित जरूर करते थे लेकिन वो उम्मीद जैसे ही टूटती थी बाबा निराश होते थे और उतनी ही दृढ़ता से प्रहार भी करते थे। पटना में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ जेपी के समर्थन में बैठे थे।
अपनी एक महत्वपूर्ण कविता में देश के जिन पांच सेनानियों को जगह देते हैं, उसमें जेपी भी शामिल हैं। कविता में उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से जिनको शामिल किया उसमें नेहरू, चन्द्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंन्द्र बोष, जिन्ना तो थे ही साथ ही साथ जेपी भी शामिल हैं, ऐसा कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है।
पांच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार 
गोली खाकर एक मर गया बाकि रह गये चार 
चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन
तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो 
1975 में जब आपातकाल लगा नागरिकों के मूल अधिकार जब्त होने लगे, लोगों को जेलों में ठूसा जाने लगा। अभिव्यक्तियां बुरी तरह कुचली जा रहीं थीं, लोगों को बोलने की भी आजादी नहीं थी ऐसे में बाबा जो अपने स्पष्टवादी छवि के लिए जाने जाते थे, निर्भीकतापूर्वक अपनी कविताओं के जरिए सवाल पूछे-
क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको 
सत्ता के नशे में भूल गई बाप को 
इन्दु जी इन्दु जी क्या हुआ आपको
-Legend News
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