Friday, 19 July 2019

पिछले वर्ष आज ही के दिन गुजरा था गोपाल दास नीरज का कारवां

4 जनवरी 1925 को जन्‍मे प्रसिद्ध कवि, गीतकार और साहित्‍यकार गोपाल दास नीरज की आज पहली पुण्‍यतिथि है। नीरज का देहांत पिछले साल 19 जुलाई को हुआ था।
पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्‍मानित गोपाल दास नीरज को फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से भी नावाज गया।
अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक गोपाल दास नीरज वहीं मैरिस रोड स्‍थित जनकपुरी में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे थे।
पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।
किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका मन बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये।
अपने बारे में उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है:
इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥
गोपालदास नीरज साहित्य के आसमान के ऐसे सितारे हैं जिनसे गीतों की रौशनी बहती है। नीरज और उनका काव्य भी उसी अधिकार के साथ साहित्यांबर में यात्रा करते हैं। इसीलिए लोग उन्हें गीत-ऋषि कहते हैं।
यूं तो नीरज को गुजरे एक साल बीत चुका है लेकिन कवि की दैहिक यात्रा ही समाप्त हो सकती है। उनकी कलम से निकले शब्द तो अनंत काल तक लोक में भ्रमण करते हुए लोगों को तृप्त करते हैं। सरल शब्दों में अपनी बात को किसी पानी की धार की तरह छोड़ देना नीरज बखूबी जानते हैं।
आदमी को आदमी बनाने के लिए
ज़िंदगी में प्यार की कहानी चाहिए
और कहने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए
नीरज अपने गीतों और कविताओं में भावनाओं के धरातल से बात करते हैं। कोई भी बात आसमान में दिखाई नहीं देती। चूंकि वह ज़मीन से बात करते हैं इसलिए लोगों को उन्हें पकड़ लेना भी बेहद आसान है। वह अक्सर प्रेम की बात करते हैं। कहते हैं कि
जो पुण्य करता है वह देवता बन जाता है
जो पाप करता है वह पशु बन जाता है
और जो प्रेम करता है वह आदमी बन जाता है
कमाल यह है कि जितना गहरा प्रेम का आकर्षण उन्हें है उतने ही वह आध्यात्मिक भी हैं। वह जीवन के मोह-पाश से मुक्त नज़र आते हैं। मानो किसी सन्यासी की तरह मुक्ति-मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं।
कफ़न बढ़ा तो किस लिए नज़र तू डबडबा गई?
सिंगार क्यों सहम गया बहार क्यों लजा गई?
न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ बस इतनी सिर्फ़ बात है-
किसी की आँख खुल गई, किसी को नींद आ गई
इसके साथ ही किसी देवदूत की तरह उन्हें इंसानी कौम की चिंता भी होती है। वह नफ़रतों में उलझी इस सभ्यता को सचेत करना चाहते हैं। तभी वह लिखते हैं कि-
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए
नीरज के कलाम वह ख़त हैं जो हज़ारों रंग के नज़ारे देता है। उसमें प्रेम, अध्यात्म और सौहार्द तो है ही साथ ही आशा के दीपक भी हैं।
पढ़ें उनकी सबसे मशहूर कविता
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा
एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ
हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।
माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन
पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

Sunday, 14 July 2019

इक्कीस साल बाद आया अरुंधति रॉय का दूसरा उपन्यास

इक्कीस साल बाद अरुंधति रॉय अपना दूसरा उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ लेकर आयी हैं. वर्ष 1997 में अपने पहले ही उपन्यास ‘गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था. उसके बाद उन्होंने अपनी सक्रियता सामाजिक जन आंदोलनों से जूझने में लगा दी. अब इसका हिंदी अनुवाद प्रख्यात कवि मंगलेश डबराल ने ‘अपार खुशी का घराना’ शीर्षक से किया है.


राजकमल प्रकाशन से आये इस उपन्यास को पढ़ने से पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि बीते इक्कीस सालों के दौरान अरुंधति रॉय लगातार राजनीति और पर्यावरण पर लिखती रहीं. नर्मदा बचाओ आंदोलन के पक्ष में खड़ी हुईं, माओवादियों के साथ रहीं और कश्मीर पर अपने विचारों को लेकर आलोचना की शिकार हुईं. इन सब हलचलों का प्रभाव ‘अपार खुशी का घराना’ के पन्नों पर दर्ज भी हुआ है.


यह उपन्यास परिवार, वर्ग और जाति की कहानी तो कहता ही है, साथ ही कश्मीर में आतंकवाद, हिंदू राष्ट्रवाद की बढ़ती सक्रियता का भी जिक्र करता है.


और यह भी कि भारत और उसके जनसंख्या पर अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के दुष्प्रभाव एवं एक प्रतिकूल वातावरण में एक हिजड़े के जीवन जीने का क्या अर्थ है?


इसका कथानक बहुत विस्तृत है. इसके दो छोर हैं. एक छोर पर अंजुम हिजड़ा है. जन्म के समय उसका नाम आफताब था, वह अपना जीवन चलाने के लिए दिल्ली में संघर्षरत है. संघर्ष का परिणाम इतना ही आया है कि वह एक कब्रिस्तान के निकट गेस्ट हाउस की मालकिन है, जिसकी पनाहगाह में आसपास के खोये हुए, टूटे हुए और अपने समाज से बहिष्कृत लोगों की बस्ती है, जो निरंतर बड़ी होती जा रही है.


दूसरे छोर पर तिलो है, जो अत्यंत सम्मोहक आर्किटेक्ट है. वह अपने लिए एक्टिविस्ट की भूमिका चुनती है. उसके तीन पुरुष मित्र हैं. तिलो एक बच्ची को गोद ले लेती है. तिलो की सोच का एक अंश- ‘बच्चे का पिता कौन है. उसने सोचा. ऐसे ही चलने दिया जाए. क्यों नहीं? अगर लड़का हुआ तो गुलरेज. अगर लड़की हुई तो जबीन. उसने कभी न मां के रूप में अपनी कल्पना की थी और न दुल्हन के रूप में, हालांकि वह दुल्हन रह चुकी थी, बन चुकी थी और बची हुई रही थी. फिर यह भी क्यों नहीं?’


इस ‘क्यों नहीं?’ के प्रश्नवाचक चिह्न को डीकोड करने के लिए उपन्यास पढ़ा जाना जरूरी है.

Sunday, 7 July 2019

नये दिन के साथ एक पन्ना खुल गया कोरा हमारे प्यार का!...कवि केदारनाथ सिंह

आज कवि केदारनाथ सिंह का जन्‍म दिन है। केदार नाथ सिंह आज की युवा पीढ़ी पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। अपनी पूरी रचनात्मकता के साथ एक गहरा प्रतिरोध का स्वर भी उनकी कविता में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है।
7 जुलाई १९३४ को जन्‍मे थे, केदारनाथ सिंह हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष २०१३ का 49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के 10वें लेखक थे।
उनकी ‘बाघ’ कविता संग्रह पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रही है। ‘बाघ’ कविता के हर टुकड़े में बाघ चाहे एक अलग इकाई के रूप में दिखाई पड़ता हो, पर आख़िरकार सारे चित्र एक दीर्घ सामूहिक ध्वनि-रूपक में समाहित हो जाते हैं। कविता इतने बड़े फलक पर आकार लेती है कि उसमें जीवन की चुप्पियाँ और आवाजें साफ-साफ़ सुनाई देंगी।
‘बाघ’ कविता संग्रह के विषय में वे लिखते हैं, ”आज का मनुष्य बाघ की प्रत्यक्ष वास्तविकता से इतनी दूर आ गया है कि जाने-अनजाने बाघ उसके लिए एक मिथकीय सत्ता में बदल गया है। पर इस मिथकीय सत्ता के बाहर बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भविष्य जुड़ा हुआ है। 
 ‘बाघ’ कविता का एक अंश देखिए---
समय चाहे जितना कम हो स्थान चाहे उससे भी कम चाहे शहर में बची हो बस उतनी-सी हवा जितनी एक साइकिल में होती है पर जीना होगा जीना होगा और यहीं यहीं इसी शहर में जीना होगा इंच-इंच जीना होगा चप्पा-चप्पा जीना होगा और जैसे भी हो यहाँ से वहाँ तक समूचा जीना होगा
इस प्राकृतिक ‘बाघ’ के साथ उसकी सारी दुर्लबता के बावजूद-मनुष्य का एक ज़्यादा गहरा रिश्ता है, जो अपने भौतिक रूप में जितना पुराना है, मिथकीय रूप में उतना ही समकालीन।” उनकी कविताओं में ‘बाघ’ कई रूपों में पाठकों के सामने आता है।

कवि केदारनाथ सिंह ने अपने कविता संग्रह ”आंसू का वज़न” में लिखा है –
नये दिन के साथ
एक पन्ना खुल गया कोरा
हमारे प्यार का!
सुबह,
इस पर कहीं अपना नाम तो लिख दो।
बहुत से मनहूस पन्नों में
इसे भी कहीं रख दूँगा।
और जब-जब
हवा आकर
उड़ा जायेगी अचानक बन्द पन्नों को;
कहीं भीतर
मोरपंखी की तरह रखे हुए उस नाम को
हर बार पढ़ लूँगा।
समकालीन हिंदी कविता के क्षेत्र में केदारनाथ सिंह उन गिने-चुने कवियों में से हैं जिनमें ‘नयी कविता’ उत्कर्ष पर पहुँचती है। गाँव और शहर, लोक और आधुनिकता, चुप्पी और भाषा एवं प्रकृति और स्कृति सभी पर संवाद चलता रहता है।

Sunday, 30 June 2019

जन्‍मदिन: जनकवि बाबा नागार्जुन की कविताओं के अंश

मैथिली के अप्रतिम लेखक और जनकवि बाबा नागार्जुन का जन्‍म 30 जून 1911 को मधुबनी जिले के सतलखा गांव स्‍थित अपने ननिहाल में हुआ था। उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था। इनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माता का नाम उमा देवी था। नागार्जुन के बचपन का नाम ‘ठक्कन मिसर’ था।
नागार्जुन के काव्य संसार की बनावट में आम आदमी की उपस्थिति है। उसकी पक्षधरता से उपजे राजनीतिक, आर्थिक सरोकार हैं। व्यवस्था और प्रभुत्वसंपन्न वर्ग के प्रति आक्रोश की सक्रियता है। उनके रचना संसार में जीवन के यथार्थ प्रतिबिंब साफ नज़र आते हैं। कविता के यथार्थ और जीवन में वहां कोई अंतर नहीं है। उनकी कविताओं में मजदूरों की जुझारू चेतना की अभिव्यक्ति है। उनकी शक्ति, जनता के निकटतम संपर्क और जनसाधारण की आशा-आकांक्षाओं से अपने आपको एकाकार करने में है। वे सच्चे अर्थों में जनकवि थे।
प्रस्तुत है जनकवि बाबा नागार्जुन की कविताओं के अंश-
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !
बातें–
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चंदन में बसी हुई
बातें–
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य-बंधन में कसी हुईं
बातें–
उसाँस में झुलसीं
रोष की आँच में तली हुईं
सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
पीपल के पत्तों पर फिसल रही चाँदनी
नालियों के भीगे हुए पेट पर, पास ही
जम रही, घुल रही, पिघल रही चाँदनी
पिछवाड़े बोतल के टुकड़ों पर–
चमक रही, दमक रही, मचल रही चाँदनी
दूर उधर, बुर्जों पर उछल रही चाँदनी
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ…
प्यार का अनूठा रसायन…
अपूर्व विक्षोभ…
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी…
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई…
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता…
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!
तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चाँदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !
सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़
अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़
कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथ
बन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ
छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट
मिल सकती कैसे भला, अन्नचोर को छूट
कर गई चाक
तिमिर का सीना
जोत की फाँक
यह तुम थीं
सिकुड़ गई रग-रग
झुलस गया अंग-अंग
बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझार
उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार
अचानक उमगी डालों की सन्धि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं
कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?

Saturday, 29 June 2019

आज ही के दिन दुनिया में आए थे हास्य कवि और गीतकार शैल चतुर्वेदी

हिंदी के सुप्रसिद्ध हास्य कवि और गीतकार शैल चतुर्वेदी आज के दिन ही इस दुनिया में आए थे। हास्य व्यंग के लिए पहचाने जाने जाने वाले शैल चतुर्वेदी ने बॉलीवुड में भी बतौर चरित्र अभिनेता बेहतरीन काम किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राध्यापक के रूप में अपने करियर की शुरूआत करने वाले शैल चतुर्वेदी ने उपहार, चितचोर, नैया, हम दो हमारे दो, चमेली की शादी, नरसिम्हा और क़रीब जैसी हिंदी फिल्मों में काम किया। लोग उनकी समसामयिक राजनीति पर काव्यात्मक व्यंग्य से आज भी लोटपोट हो जाते हैं। 70 और 80 के दशक में बदलते राजनीतिक समीकरणों से उन्होंने खूब खाद-पानी लिया और अपनी काव्यात्मक टिप्पणियों में उसका उपयोग किया।
शैल चतुर्वेदी ने एक कवि और चरित्र अभिनेता के रूप में अपनी पीढ़ी को तो प्रभावित किया ही, आज की जनरेशन पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
पेश हैं उनकी कविताओं से चुनिंदा अंश-
सारे काम अपने-आप हो रहे हैं
जिसकी अंटी में गवाह है
उसके सारे खून
माफ़ हो रहे हैं
इंसानियत मर रही है
और राजनीति
सभ्यता के सफ़ेद कैनवास पर
आदमी के ख़ून से 
हस्ताक्षर कर रही है।
मूल अधिकार ?
बस वोट देना है
सो दिये जाओ
और गंगाजल के देश में
ज़हर पिये जाओ।
लोकल ट्रेन से उतरते ही
हमने सिगरेट जलाने के लिए
एक साहब से माचिस माँगी, 
तभी किसी भिखारी ने
हमारी तरफ हाथ बढ़ाया, 
हमने कहा- 
“भीख माँगते शर्म नहीं आती?”
ओके, वो बोला-
“माचिस माँगते आपको आयी थी क्या?”
बाबूजी! माँगना देश का करेक्टर है,
जो जितनी सफ़ाई से माँगे
उतना ही बड़ा एक्टर है
गरीबों का पेट काटकर
उगाहे गए चंदे से
ख़रीदा गया शाल
देश (अपने) कन्धों पर डाल
और तीन घंटे तक
बजाकर गाल
मंत्री जी ने
अपनी दृष्टि का संबंध 
तुलसी के चित्र से जोड़ा
फिर रामराज की जै बोलते हुए
(लंच नहीं) मंच छोड़ा
मार्ग में सचिव बोला-
“सर, आपने तो कमाल कर दिया
आज तुलसी जयंती है
और भाषण गांधी पर दिया।”
हमारे एक मित्र हैं
रहने वाले हैं रीवाँ के
एजेंट हैं बीमा के
मिलते ही पूछेंगे- “बीमा कब करा रहे हैं।”
मानो कहते हों- “कब मर रहे हैं?”
फिर धीरे से पूछेंगे- “कब आऊँ
कहिए तो दो फ़ार्म लाऊँ
पत्नी का भी करवा लीजिए
एक साथ दो-दो रिस्क कवर कीजिए
आप मर जाएँ तो उन्हें फ़ायदा
वो मर जाएँ
तो आपका फ़ायदा।”
अब आप ही सोचिए
मरने के बाद 
क्या फ़ायदा
और क्या घाटा
हमारे एक फ्रैंड हैं
सूरत-शक्ल से
बिल्कुल इंग्लैंड हैं 
एक दिन बोले-
“यार तीन लड़के हैं
एक से एक बढ़के हैं
एक नेता है
हर पाँचवें साल
दस-बीस हज़ार की चोट देता है
पिछले दस साल से
चुनाव लड़ रहा है
नहीं बन पाया सड़ा-सा एमएलए
बोलो तो कहता है-
“अनुभव बढ़ रहा है”
पालिटिक्स के चक्कर में
बन गया पोलिटिकल घनचक्कर
और दूसरा ले रहा है
कवियों से टक्कर
कविताएँ बनाता है
न सुनो तो
चाय पिलाकर सुनाता है
तीसरा लड़का डॉक्टर है
कई मरीज़ों को
छूते ही मार चुका है
बाहर तो बाहर
घर वालों को तार चुका है
हरा भरा घर था
दस थे खाने वाले
कुछ और थे आने वाले
केवल पांच रह गए
बाकी के सब 
दवा के साथ बह गए
मगर हमारी काकी
बड़े-बूढ़ों के नाम पर
वही थी बाकी
चल फिर लेती थी
कम से कम 
घर का काम तो कर लेती थी
जैसे-तैसे जी रही थी
कम से कम 
पानी तो पी रही थी
मगर हमारे डॉक्टर बेटे का
लगते ही हाथ
हो गया सन्निपात
बिना जल की मछली-सी
फड़फड़ाती रही
दो ही दिनों में सिकुड़कर
हाफ़ हो गई
और तीसरे दिन साफ़ हो गई
दुख तो इस बात का है
कि हमारी ग़ैरहाज़िरी में मर गई
पाला हमने 
और वसीयत दूसरे के नाम कर गई”
एक दिन अकस्मात
एक पुराने मित्र से
हो गई मुलाकात
कहने लगे-“जो लोग
कविता को कैश कर रहे हैं
वे ऐश कर रहे हैं
लिखने वाले मौन हैं
श्रोता तो यह देखता है
कि पढ़ने वाला कौन है
लोग-बाग
चार-ग़ज़लें
और दो लोक गीत चुराकर
अपने नाम से सुना रहे हैं
भगवान ने उन्हें ख़ूबसूरत बनाया है
वे ज़माने को
बेवकूफ़ बना रहे हैं

Saturday, 1 June 2019

आज अनायास ही ...प्रयाण-गीत


प्रयाण-गीत गाए जा!
तू स्वर में स्वर मिलाए जा!
ये जिन्दगी का राग है--जवान जोश खाए जा !
प्रयाण-गीत ...

तू कौम का सपूत है!
स्वतन्त्रता का दूत है!
निशान अपने देश का उठाए जा, उठाए जा !
प्रयाण-गीत...

ये आंधियां पहाड़ क्या?
ये मुश्किलों की बाढ़ क्या?
दहाड़ शेरे हिन्द! आसमान को हिलाए जा !
प्रयाण-गीत...

तू बाजुओं में प्राण भर!
सगर्व वक्ष तान कर!
गुमान मां के दुश्मनों का धूल में मिलाए जा।
प्रयाण-गीत गाए जा!
तू स्वर में स्वर मिलाए जा!
ये जिन्दगी का राग है--जवान जोश खाए जा।

- गोपालप्रसाद व्यास

Friday, 24 May 2019

मजरूह की पुण्‍यतिथि आज: रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

1 अक्टूबर 1919 को निजामाबाद जन्‍मे उर्दू के मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी का इंतकाल 24 मई 2000 को मुंबई में हुआ था। पेशे से हकीम लेकिन हर्फों के जादूगर इस अजीम शायर का नाम असल नाम असरारुल हसन खान था।
मुशायरे के मंचों से होते हुए लोगों के दिलों में दाखिल होने वाले मजरूह सुल्तानपुरी ‘जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे’ जैसे सदाबहार गीत के रचियता थे। कहा जाता है कि ये उस वक़्त के दिलफ़िगार आशिकों के लिए राष्ट्रीय गीत की तरह था।
सारे हिंदुस्तान को अपनी कलम की नोक पर नचाने वाले मजरूह सुल्तानपुरी ने बंबई में मजदूरों की एक हड़ताल के दौरान एक ऐसी कविता पढ़ी कि खुद को भारत के जवान समाजवादी सपनों का कस्टोडियन कहने वाली नेहरू सरकार आग-बबूला हो गई।
तत्कालीन गवर्नर मोरार जी देसाई ने महान अभिनेता बलराज साहनी और अन्य लोगों के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया। मजरूह सुल्तानपुरी को अपनी कविता के लिए माफ़ी मांगने के लिए कहा गया और उसके एवज में जेल से आजादी का प्रस्ताव दिया गया पर मजरूह के लिए किसी नेहरू का क़द उनकी कलम से बड़ा नहीं था सो उन्होंने साफ़ शब्दों में इंकार कर दिया। मजरूह सुल्तानपुरी को दो साल की जेल हुई और आज़ाद भारत में एक शायर आज़ाद लबों के बोल के लिए दो साल तक सलाखों के पीछे कैद रहा। आप भी पढ़िए, मजरूह साहब ने पंडित नेहरू के लिए क्या कहा था-
मन में ज़हर डॉलर के बसा के,
फिरती है भारत की अहिंसा
खादी की केंचुल को पहनकर,
ये केंचुल लहराने न पाए
ये भी है हिटलर का चेला,
मार लो साथी जाने न पाए
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू,
मार लो साथी जाने न पाए 
सत्ता की छाती पर चढ़कर एक शायर ने वह कह दिया था, जो इससे पहले इतनी साफ़ और सपाट आवाज़ में नहीं कहा गया था। यह मज़रूह का वह इंक़लाबी अंदाज़ था, जिससे उन्हें इश्क़ था। वह फिल्मों के लिए लिखे गए गानों को एक शायर की अदाकारी कहते थे और चाहते थे कि उन्हें उनकी ग़ज़लों और ऐसी ही इंक़लाबी शायरी के लिए जाना जाए।
शायद इसीलिए वो ऐसे शेर भी लिख सके-
अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम
उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम
बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने
ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह
-Legend News
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