पुराणों के अनुसार जल दान-
देयं जलं प्रपेषु शीतलं पावनं शुभम्।
तर्षार्तानां च जीवानां भवेत् प्राणाभिराक्षणम्॥
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पुराणों के अनुसार जल दान-
मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'पंचवटी' काव्य की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करती हैं। इसमें चंद्रमा की चंचल किरणें जल-थल में खेल रही हैं और स्वच्छ चाँदनी अवनि-अंबर (धरती-आकाश) में बिछी है। यह पंक्तियाँ चाँदनी रात की शीतलता, शांति और मनमोहक दृश्य का चित्रण करती हैं।
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
यह कविता रति के विलाप (कुमारसंभव) और यक्ष की वेदना (मेघदूत) में कालिदास की व्यक्तिगत भावनाओं को उजागर करती है। नागार्जुन पूछते हैं कि क्या वेदना की चरम सीमा पर यक्ष रोया था या तुम (कालिदास) रोए थे।
कविता में प्रकृति का चित्रण विशेषकर वर्षा ऋतु में यक्ष का अपनी प्रियतमा को याद करना मार्मिक रूप से प्रस्तुत है। यह कविता कवि की मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रश्न पूछती है और कालिदास की रचनाओं में निहित दर्द को उजागर करती है।
ये ही है वो कालजई कविता...आप भी पढ़िए ...
कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!
कालिदास! सच-सच बतलाना!
#नागार्जुन
सभ्यता की राख यहीं आती है
लेकिन यहाँ से सभ्यता की कोई हवा नहीं बहती
न ही यहाँ सभ्यता की कोई हवा आती है
यह बनारस है
चाहे सारनाथ की ओर से आओ या लहरतारा की ओर से
वरुणा की ओर से आओ या गंगा की ओर से
इलाहाबाद की ओर से आओ या मुग़लसराय की ओर से
डमरू वाले की सौगंध
यह बनारस यहीं और इसी तरह मिलेगा
ठगों से ठगड़ी में
संतों से सधुक्कड़ी में
लोहे से पानी में
अँग्रेज़ों से अँग्रेज़ी में
पंडितों से संस्कृत में
बौद्धों से पालि में
पंडों से पंडई और गुंडों से गुंडई में
और निवासियों से भोजपुरी में
बतियाता हुआ यह बहुभाषाभाषी बनारस है
गुरु से संबोधन करके
किसी गाली पर ले जाकर पटकने वाले
बनारस में सब सबके गुरु हैं
रिक्शेवाला गुरु है
पानवाला गुरु है
पंडे, मल्लाह, मुल्ला, माली और डोम गुरु हैं
नाई गुरु है, क़साई गुरु है, भाई गुरु है
कॉमरेड गुरु हैं
शिष्य गुरु हैं और गुरु तो गुरु हैं ही
लेकिन गुरु के बारे में सबके अनुभव अलग-अलग हैं
किसी के लेखे गंगा ही गुरु हैं
किसी के लेखे ज्ञान ही गुरु है
किसी के लेखे स्त्री गुरु है
किसी के लिए सीढ़ी ही गुरु है
जबकि किसी के लिए ठेस ही गुरु है
बनारस में
बनारसी बाघ हैं
बनारसी माघ हैं
बनारसी घाघ हैं
बनारसी जगन्नाथ हैं
शैव हैं, वैष्णव हैं, सिद्ध हैं, बौद्ध कबीरपंथी, नाथ हैं
जगह-जगह लगती हैं यहाँ लोक-अदालतें
कहने को तो कचहरी भी है बनारस में
लेकिन यहाँ सबकी गवाह गंगा
और न्यायाधीश विश्वनाथ हैं
धन से धर्म नहीं होता बनारस में,
धर्म से धन होता है
जब बनारसी देवी रोती है
तब बनारसी दास सोता है
किसी को जोगी, किसी को जती
किसी को मल्लाह, किसी को पंडा
किसी को कवि, किसी को भाँड़
किसी को भँगेड़ी-गँजेड़ी, किसी को साँड़
बना देता है बनारस
शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा... सिद्धिदात्री
आदि नवदुर्गा, भैरव, संकटमोचन आदि
बज्रहृदय पत्थर के देवी-देवता खड़े हैं
ताकते हैं टुकुर-टुकुर
गंगा भी खड़ी हैं यहाँ
पानी की प्रतिमा बनी है बनारस में
बनारस में
फूल—बिकते हैं
मालाएँ—बिकती हैं
चंदन—बिकता है
प्रसाद—बिकता है
देह—बिकती है
साहित्य—बिकता है
सुख नहीं बिकता बनारस में
फिर भी सुख प्राप्त होता है
रात का कालिख धोकर सूर्य
प्रतिदिन बनारस के मुँह में चंदन लगा देता है
इस तरह बनारस
अपना अंडा अपने माथे पर सेता है
बनारस गलियों में जीता है
और घाटों पर मुक्ति लेता है
इस तरह विश्व को
जीवन की सीख देता है
बनारस में
मल्ल हैं, अखाड़े हैं, मठ हैं, आश्रम हैं
व्यायाम, प्राणायाम हैं
यहाँ सबका बदन गीला है
लेकिन जाने क्यों
हर आदमी थोड़ा-थोड़ा ढीला है
किसी बनारसी को परिचय-पत्र की ज़रूरत नहीं होती
लगता है समूचा बनारस
गंगा की केवल एक बूँद से बना है
मूल है गंगा, बनारस तना है
जो भी बनारस जाता है
कोई सिर के बाल, कोई जेब, कोई मन, कोई तन
अर्थात् कुछ न कुछ खोकर आता है
और जब कोई यहाँ से जाता है
हरी झंडी की तरह
बनारस अपने दोनों हाथ हिलाता है।
- अष्टभुजा शुक्ल
सीने में हुआ था तेज दर्द
वह पिछले सप्ताह अपने परिवार के साथ शादी समारोह में शामिल होने मुंबई गए थे। शनिवार सुबह उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन वह बच नहीं सके। ताहिर फ़राज़ ने बहुत कम उम्र में ही कविता और शायरी लिखना शुरू कर दिया था। थोड़े ही समय में वे देश के नामचीन कवियों और शायरों में से एक बन गए।
प्रशंसकों में शाेक की लहर
सौलत पब्लिक लाइब्रेरी सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य काशिफ खां ने ताहिर फ़राज़ के निधन पर शोक जताते हुए बताया कि ग़ज़लें हों, भजन हों, नात हों, सलाम हों या मनक़बत हों, उनकी विशिष्ट शैली, जोश और संगीतमयता ने हर वर्ग के श्रोताओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। गायन में उनका कोई सानी नहीं था और खानक़ाह नियाज़िया बरेली से उनके जुड़ाव ने उनकी कविताओं को आध्यात्मिक गहराई प्रदान की।
मुंबई में ही अंतिम संस्कार की तैयारी
ताहिर फ़राज का अंतिम संस्कार मुंबई में ही किए जाने की तैयारी हो रही है। उन्होंने बताया कि ताहिर फ़राज़ का निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक पूरे युग का, एक सांस्कृतिक आवाज़ का और उर्दू कविता के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है। उनके निधन से ग़ज़लें खामोश हो गई हैं और शब्द अनाथ हो गए हैं।
उर्दू शायरी के संसार में ताहिर फ़राज़ का नाम एक ऐसी आवाज़ के तौर पर याद किया जाएगा, जिसने ऊँची आवाज़ के बजाय ठहराव और संवेदना को चुना। उनकी शायरी में मोहब्बत, दर्द और इंसानी रिश्तों की नर्म परछाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं। ताहिर फ़राज़ उन शायरों में थे जिनकी पंक्तियाँ मंच से ज़्यादा दिलों में जगह बनाती थीं। उनके अशआर आम पाठक की ज़िंदगी से सीधे संवाद करते हैं। उर्दू साहित्य में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करता रहेगा।
उनकी एक ग़ज़ल -
जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी
तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी
सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी
ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार
घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी
क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी
मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी
वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र
मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी
- Legend News
यह यूनिक और नया प्रयास बनारस की सबसे पुरानी और हिंदी खड़ी बोली में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा ने किया है. सभा ने आज भी सैकड़ों हस्तलिखित पन्नों, पांडुलिपियों और बड़े-बड़े कवियों, साहित्यकारों और संतों की लेखनी को संरक्षित रखा है. इन दुर्लभ लेखनी को नागरी प्रचारिणी सभा लोगों तक पहुंचा रहा है.
पुरानी किताबों को किया गया रिपब्लिश : हाल ही में सभा ने कुछ पुरानी लिटरेचर और अन्य महत्वपूर्ण किताबों को रिपब्लिश किया गया है. जिसने पब्लिशर के बीच एक चर्चा के साथ ही कंपटीशन का माहौल भी बना दिया है. पहली बार विदेश की तर्ज पर ऐसी किताबें तैयार हुई हैं जो न सिर्फ उसके ओरिजिनल लेखक के ओरिजिनल हस्तलिखित दस्तावेजों को समेटे हुए है, बल्कि उन किताबों में हुए करेक्शन के दौरान लगाए गए लाल निशान के उचित तथ्यों को भी साथ लेकर बाजार में उपलब्ध हैं.
जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं पांडुलिपियां : नागरी प्रचारिणी सभा के वर्तमान प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया, सभा में वर्तमान समय में एक दो नहीं, बल्कि सैकड़ों ऐसे हस्तलिखित दस्तावेज और पांडुलिपियां मौजूद हैं, जो समय के साथ बेहद जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं. सभा की लंबी लड़ाई और कुछ पुराने लोगों संग कानूनी जद्दोजहद के बाद जब इस स्थान की कमान उन्हें मिली, तो पता ही नहीं था कि यहां ऐसी चीज हैं, जो संरक्षित और सुरक्षित करने के साथ लोगों तक पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा.
तीन साल पहले शुरू किया रिपब्लिश करने का काम : व्योमेश शुक्ल बताते हैं, बहुत से लोग होते हैं जो चीजों को सुरक्षित तो करते हैं, लेकिन दूसरों तक पहुंचा नहीं पाते, जिसका लाभ ना उसे तैयार करने वाले को मिलता है और ना ही लोगों को. ऐसी स्थिति में गोस्वामी तुलसीदास, जायसी, मुंशी प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कबीर, सूरदास और तमाम ऐसे लेखक, साहित्यकार, संतों की लिखी किताबों के पुनः प्रकाशन का काम सभा ने लगभग तीन साल पहले शुरू किया.
नए रूप में किया गया पेश : उनका कहना है कि सबसे पहले हिंदी साहित्य का इतिहास जो सिविल सर्विसेज से लेकर तमाम हिंदी के प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण किताब मानी जाती है उसका पुनः प्रकाशन किया. पांडुलिपियों को असाधारण सांस्कृतिक महत्व माना जाता रहा है, लेकिन वह लोगों तक पहुंच में नहीं थी. बदलते समय और युवाओं की सोच, उनकी पसंद को पांडुलिपियों के नए रूप में पेश किया गया, जिससे पांडुलिपियों और ओरिजिनल लेख उनके दिलों को छू सके.
रामचंद्र शुक्ल ने 24 साल की उम्र में लिखी थी कविता क्या है? व्योमेश शुक्ल बताते हैं, इनमें एक है कविता क्या है? आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हाथों का लिखा हुआ एक निबंध है. हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक रामचंद्र शुक्ल का जन्म 1884 में हुआ लेकिन, उन्होंने निबंध का पहला हिस्सा 1908 अपने 24 वर्ष की उम्र में पूरा किया और इस निबंध का अंतिम प्रारूप 1930 में छपा यानी जब उनकी उम्र लगभग 46 वर्ष थी. उन्होंने एक ही निबंध को अलग-अलग रूप में लिखा और उसे अलग-अलग पब्लिशर्स से प्रकाशित करवाया. लगभग 22 -23 वर्ष की अपनी यात्रा में उन्होंने एक निबंध को चार बार लिखा.
एक ही कविता कई बार लिखी : उन्होंने कविता क्या है? जैसे सवाल को भारतीय समाज और हिंदी भाषी लोगों के लिए कई बार लिखा, इसमें कुछ परिवर्तन भी बताएं कि समय के साथ कैसे चीज बदल रही है. इसका एक प्रारूप उपलब्ध है जो लोग पढ़ रहे थे, बाद में सभा को धीरे-धीरे तीन और प्रारूप मिले जिनके हस्तलेखों को सुरक्षित रखने वालों ने एक बड़ा काम किया. हमने इन आर्काइव्स में रखी इन हस्तलेख निबंधों की श्रृंखला को एक साथ एक किताब में लाने का काम किया.
करेक्शन को भी किया गया है प्रकाशित : व्योमेश शुक्ल बताते हैं, 24 साल की उम्र में रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पब्लिशर्स के पास अपनी कविता भेजी. उस वक्त के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे. महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम साहित्य जगत में बड़ा था. उन्होंने इसकी प्रूफ्ररीडिंग की. जिसमें काफी गलतियां मिलीं. उन गलतियों और महावीर प्रसाद द्विवेदी के लगाए गए लाल निशानों के साथ किए गए करेक्शन को भी हमने किताब में हूबहू जगह दी है. ताकि लोगों को पता चले की ओरिजिनल के बाद की गई एडिटिंग के पश्चात यह किताब कैसी दिखाई दी.
प्रेमचंद की दो कहानियां एक साथ : व्योमेश ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद की सबसे महत्वपूर्ण कहानियों में एक पंच परमेश्वर और ईश्वर न्याय को भी कंपाइल करके एक किताब में हमने जगह दी है. यह पुनः प्रकाशन पहली बार था. जिसमें मुंशी प्रेमचंद की लेखनी का यह रूप सामने आया, यह भी एडिटिंग के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के पास ही गई थी. जिसमें प्रेमचंद जी ने इसका नाम पहले पंच भगवान रखा, लेकिन बाद में इसे महावीर जी ने बदलकर पंच परमेश्वर कर दिया, यह भी एडिटिंग का ओरिजिनल दस्तावेज हमने इस किताब में शामिल किया है.
हिंदी साहित्य का पुन: प्रकाशन : व्योमेश शुक्ल ने बताया, हिंदी साहित्य हिंदी पढ़ने और हिंदी समझने वालों के लिए गीता से कम नहीं है. इस किताब का पहला एडिशन 1929 में प्रकाशित हुआ था, तब से इसमें बहुत सी गलतियां चली आ रही थीं. कॉपीराइट खत्म होने के बाद 500 पब्लिशर्स ने छापा. लगभग 550 पन्ने की पुरानी किताब का अच्छे से करेक्शन करने के बाद 850 पन्नों की नई किताब दो साल पहले लॉन्च की गई. इसकी डिमांड आज भी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह पर है.
सबसे पहले सभा ने रामचरितमानस का किया था प्रकाशन : व्योमेश शुक्ल ने बताया, जो भी पांडुलिपियां या हस्तलिखित दस्तावेज हैं वह प्रमाणित हैं कि नहीं यह बहुत बड़ा सवाल है. हमारे पास इसका बहुत बड़ा दस्तावेज प्रमाण भी है. पांडुलिपियां अयोध्या, काशी नरेश के पर्सनल दस्तावेजों के साथ राजापुर और इस युग के आसपास की चीजें हमारे पास भी हैं. गीता प्रेस का एडिशन रामचरितमानस जिसे घर-घर पूजा जाता है, यह पुस्तक 1923 के पहले कहीं नहीं थी. गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई, लेकिन इसके पहले 1923 में सभा ने रामचरितमानस की तुलसीदास की पांडुलिपियों को रामचरितमानस संग मानसेतर एकादश ग्रन्थ को तीन जिल्दों में प्रकाशित किया था. इसके बाद 1974 में सभा ने बड़ा काम करते हुए देशभर के विद्वानों को जोड़ते हुए उसे पुनः तुलसी ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित किया.
दिन दुल्हिन दूलहु बलिहारी
अधिक फबीं श्री वन की स्वामिनी , देखीं न सरि की कोऊ वधू वारी ।१।
अतलस अंगिया चोली राती , पैने कुच कंचुकी उकारी ।
सारी सुरंग जरी बुँटे मणिं , जडीं अंचल सब कोर किनारी ।२।
भूषण वसन हू शोभा पाई , अद्भुत रूप अंग अंग धारी ।
मोतिन मौर माथे कछु टेढ़ी , घूँघट अँखिंयाँ चलें कजरारी ।३।
दूल्हा रूप अनूप बन्यौ , जामा अचकन मणि जटित किबारी ।
पेचदार पगिया पर सेहरो , मोहत मन श्यामा सुकुमारी ।४।
साजि सँवारि नाहु वधू ललिता , हस्त मिलाप रच्यौ सुखकारी ।
प्रथम समागम कौ सुख विलसत , कृष्णचन्द्र पिया राधा प्यारी ।५।
प्रथम मिलन पिया प्यारी कौ गाऊँ
श्री ललिता कृपा नित जुगल लड़ाऊं ।१।
श्री वृंदावन संपत्ति पूंजत सुख , जुगल भाव मन ध्यावै ।
सुमिरि श्री राधा चरण दासि संग ,गौर श्याम हिय आवै ।२।
छिन छिन रस विलसत नव दंपति , निरखि सतत सुख पाऊं ।
आनंद रस न समात उमंगि उर ,सोई सखी हरखि सुनाऊं ।३।
श्री जमुना नव अम्बुज फूले , अलि अवलि दल छाये ।
गूंजत तान संगीत मृदु पवन , नव तरु द्रुमि मन भाये ।४।
सुंदर खग निरतत मन मोहक , मधुर पिया जस गाये ।
विविध बरन रँग फूले सुमन दल, रुचि रुचि हार बनाये ।५।
घाटन बाटन बीथी बागन , मनहर मधुर निकाई ।
कुँज महल शुभ मिलन की बेला , हर्षित सखी समुदाई ।६।
नव वधू सरस सँवारी श्यामा ,नहिं सरि कोऊ वधू वारी ।
तैसेई सुघड श्याम दूलहु फबे ,दंपति छबि अति न्यारी ।७।
लाड़ लड़ावत वर वधू रुख लै ,सखी सहचरी प्रवीना ।
सुखद सुरति सम्पति रुचि पूंजत ,विलसैं जुगल नवीना ।८।
नैंनन नैंन जोरि झपि पलकैं ,पुनि पुनि नैंन मिलावें ।
हाव भाव बिन बैंनन सैंनन ,हँसि लजि मुरि बतरावें ।९।
रूप माधुरी चुबत अंग अंग, पीबत दृग जिय प्यासे ।
करसत मन तन भेंट अँकौ भरि,सखीं जिय जानि हुलासे ।१०।
पारिजात संग कल्प सुमन गुहि ,कौमल सेज सजाई ।
हस्त मिलाप कराय जुग सखी ,प्रेम प्रीति पुंजवाई ।११।
गावत विरदनि गीत मिलन सखीं , मदन मोद जुग लीने ।
नव नव रति रत रसिक शिरोमणि , मिलत हू मिलत नवीने ।१२।
नित ही प्रथम समागम कौ सुख ,काम केलि नित न्यारी ।
श्री हरिदासी सखीन संग सुख, विलसत नित्य बिहारी ।१३।
आस करत आशीष देत सखीं , उर वन बसौ जुग जिय मन ।
विलसौ कृष्णचन्द्र श्री राधा , चरणदासि वृंदावन ।१४।
नवल दोऊ जागैं सारी रतियां
सुरंग सेज सुख परे प्रथम दिन ,कोक प्रेम रस मधुरी गतियां ।१।
कबहूं कटि कटि सौं जुरि भेंटें , कबहु टटोरैं अँगुरिन छतियां ।
अधरसधर रस पान अरत बिबि , पीबत कुच मधु करि छल घतियां ।२।
झाँकत नैंन परस्पर गहरे , नैंन सैंन जानत मन बतियां ।
नव जोरी सुकुमार सलौनी , विलसत सरस सुरति सम्पतियां।३।
गावत विरदनि सखी समूह मन , पूँजत रति सुख नव दम्पतियां ।
कृष्ण चंद्र राधा चरण दासि मृदु , काम प्रेम रस पागीं मतियां ।४।