Sunday, 10 May 2026

जब एक संपादक ने खुद ही बनकर लिख डाले 14 लेखक…


 कल्पना कीजिए एक ऐसी पत्रिका की, जो हर महीने पाठकों के हाथों में जाती हो और लोग बेसब्री से उसके नए अंक का इंतजार करते हों, लेकिन उस पत्रिका के पास अचानक पर्याप्त सामग्री ही न हो। उस दौर में न इंटरनेट था, न सोशल मीडिया और न ही लेखकों की इतनी बड़ी संख्या, जो हर महीने गुणवत्तापूर्ण लेखन दे सके। ऐसे में एक संपादक के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि वह पत्रिका की गुणवत्ता और निरंतरता को कैसे बनाए रखे। यही वह क्षण था जब आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक ऐसा फैसला लिया, जो आज भी लोगों को हैरान करता है। उन्होंने तय किया कि ‘सरस्वती’ पत्रिका कभी कमजोर नहीं पड़ेगी, चाहे उन्हें खुद ही कई रूप क्यों न धारण करने पड़ें। यह सिर्फ एक संपादकीय निर्णय नहीं था, बल्कि एक जुनून था, एक जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने अपने कंधों पर उठाया और उसे निभाने के लिए हर संभव प्रयास किया।

भुजंगभूषण से लेकर ‘एक ग्रामीण’ तक – ये सभी कौन थे?

जब आप ‘सरस्वती’ के पुराने अंकों को देखते हैं, तो आपको अलग-अलग नामों से लिखे गए लेख, कविताएं और आलोचनाएं दिखाई देती हैं। पहली नजर में लगता है कि यह किसी बड़े लेखक समुदाय का योगदान है, लेकिन जब सच्चाई सामने आती है, तो यह कहानी और भी रोचक हो जाती है। भुजंगभूषण, कवि किंकर, सुकवि किंकर, कुंज, कमल किशोर त्रिपाठी, श्रीकंठ पाठक एमए, चक्रपाणि शर्मा, निपुण नारायण शर्मा, पुराणपाठी, परमेश्वर शर्मा, द्विरेफ, कल्लू अल्हइत, विपन्न और ‘एक ग्रामीण’—ये सभी नाम दरअसल एक ही व्यक्ति के थे। आचार्य द्विवेदी ने इन नामों के पीछे छिपकर अलग-अलग दृष्टिकोणों से लेखन किया, ताकि पत्रिका में विविधता बनी रहे और पाठकों को यह महसूस हो कि वे कई विचारधाराओं से रूबरू हो रहे हैं। यह एक तरह से साहित्यिक प्रयोग भी था और एक जिम्मेदारी भी, जिसे उन्होंने बेहद कुशलता से निभाया।

सरस्वती पत्रिका – जहां से शुरू हुआ एक युग

‘सरस्वती’ पत्रिका सिर्फ एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि वह एक आंदोलन थी, जिसने हिंदी भाषा को एक नई दिशा दी। 1903 से 1920 तक जब आचार्य द्विवेदी इसके संपादक रहे, तब उन्होंने इसे एक साधारण प्रकाशन से उठाकर एक साहित्यिक क्रांति का माध्यम बना दिया। उस समय हिंदी भाषा एक संक्रमण काल से गुजर रही थी, जहां उसे एक मानक रूप देने की जरूरत थी। द्विवेदी जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपने लेखन, संपादन और दृष्टिकोण से हिंदी को एक नई पहचान दी। यही कारण है कि इस काल को ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ‘सरस्वती’ सिर्फ मनोरंजन का साधन न रहे, बल्कि वह ज्ञान, विचार और सुधार का मंच बने।

अगर उन्होंने रेलवे की नौकरी नहीं छोड़ी होती तो…?

झांसी में रेलवे के तार विभाग में सीनियर क्लर्क के रूप में काम करते हुए आचार्य द्विवेदी का जीवन स्थिर और सुरक्षित था। 200 रुपए मासिक वेतन उस समय एक सम्मानजनक आय मानी जाती थी और कोई भी व्यक्ति इसे छोड़ने के बारे में सोचता भी नहीं था। लेकिन आचार्य द्विवेदी ने अपने भीतर की आवाज को सुना और यह महसूस किया कि उनका असली उद्देश्य कुछ और है। उन्होंने इस सुरक्षित नौकरी को छोड़कर साहित्य की दुनिया में कदम रखा, जहां न कोई निश्चित आय थी और न ही कोई गारंटी। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन इसी निर्णय ने उन्हें वह बना दिया, जिसे आज हम हिंदी साहित्य का युग प्रवर्तक कहते हैं। अगर उन्होंने यह जोखिम नहीं उठाया होता, तो शायद हिंदी साहित्य का स्वरूप आज बिल्कुल अलग होता।

गुरु जिन्होंने गढ़े कई महान साहित्यकार

आचार्य द्विवेदी की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनका लेखन नहीं था, बल्कि उनकी दृष्टि थी, जो दूसरों की प्रतिभा को पहचानने और उसे निखारने की क्षमता रखती थी। उनके मार्गदर्शन में कई ऐसे साहित्यकार उभरे, जिन्होंने आगे चलकर हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी जैसे नाम आज भी साहित्य जगत में सम्मान के साथ लिए जाते हैं। लेकिन इन सबके पीछे कहीं न कहीं द्विवेदी जी का हाथ था। उन्होंने न सिर्फ उनकी रचनाओं को सुधारा, बल्कि उन्हें सही दिशा भी दी। यह एक गुरु और शिष्य के रिश्ते का सबसे सुंदर उदाहरण है, जहां गुरु अपने शिष्य को खुद से भी आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है।

देशभक्ति और भाषा – दोनों में समान जुनून

आचार्य द्विवेदी के लेखन में सिर्फ साहित्यिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि एक गहरी देशभक्ति भी दिखाई देती है। उस समय भारत स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से गुजर रहा था और हर जागरूक व्यक्ति देश के भविष्य को लेकर चिंतित था। द्विवेदी जी भी इससे अछूते नहीं थे। उनकी कविताओं और लेखों में यह चिंता साफ झलकती है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए एकता, शिक्षा और जागरूकता की जरूरत है। ‘आर्य भूमि’ और ‘प्यारा वतन’ जैसी रचनाएं सिर्फ साहित्य नहीं हैं, बल्कि वे उस समय की भावनाओं का प्रतिबिंब हैं, जो पाठकों को प्रेरित करती हैं और उन्हें अपने देश के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराती हैं।

सरल भाषा, गहरी बात – यही थी उनकी ताकत

आचार्य द्विवेदी की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह जटिल विषयों को भी बेहद सरल भाषा में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि अगर भाषा कठिन होगी, तो वह आम लोगों तक नहीं पहुंच पाएगी। इसलिए उन्होंने हिंदी को सरल, सहज और प्रभावी बनाने पर जोर दिया। उनकी कविताएं और लेख ऐसे होते थे, जिन्हें पढ़कर कोई भी व्यक्ति आसानी से समझ सकता था और उनसे जुड़ाव महसूस कर सकता था। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और लोगों को प्रभावित करता है।

आलोचना भी की, मार्गदर्शन भी दिया

आचार्य द्विवेदी सिर्फ एक लेखक या संपादक नहीं थे, बल्कि एक सख्त मार्गदर्शक भी थे। वह गलतियों को नजरअंदाज नहीं करते थे और साहित्यकारों को सुधारने के लिए उन्हें स्पष्ट रूप से बताते थे कि कहां सुधार की जरूरत है। उनकी आलोचना का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं था, बल्कि उसे बेहतर बनाना था। यही कारण है कि उनके संपर्क में आने वाले अधिकांश साहित्यकार आगे चलकर सफल हुए। उनका मानना था कि अगर भाषा को मजबूत बनाना है, तो उसमें अनुशासन जरूरी है और यह अनुशासन बिना सख्ती के नहीं आ सकता।

क्या हम आज भी उनके योगदान को पूरी तरह समझ पाए हैं?

आज जब हम हिंदी साहित्य की बात करते हैं, तो हम उसकी समृद्धि और विविधता की चर्चा करते हैं, लेकिन अक्सर यह भूल जाते हैं कि इसकी नींव किसने रखी थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान इतना व्यापक है कि उसे पूरी तरह समझना आसान नहीं है। उन्होंने न सिर्फ एक भाषा को आकार दिया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को दिशा दी। उनका काम सिर्फ उस समय तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

एक सवाल जो आज भी बाकी है…

आज के डिजिटल युग में, जहां जानकारी का भंडार हमारे हाथों में है, क्या हम उस समर्पण और मेहनत को समझ पा रहे हैं, जो आचार्य द्विवेदी जैसे लोगों ने दिखाई थी? एक व्यक्ति, जिसने चौदह नामों से लिखकर एक पत्रिका को जिंदा रखा, उसने हमें क्या सिखाया? शायद यही कि अगर इरादा मजबूत हो, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं।

Thursday, 23 April 2026

पुराणों के अनुसार जल दान- देयं जलं प्रपेषु शीतलं पावनं शुभम्। तर्षार्तानां च जीवानां भवेत् प्राणाभिराक्षणम्॥

 पुराणों के अनुसार जल दान-


देयं जलं प्रपेषु शीतलं पावनं शुभम्।
तर्षार्तानां च जीवानां भवेत् प्राणाभिराक्षणम्॥

प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा धर्म है। कहते हैं कि जल ही जीवन है। गर्मी बहुत पड़ रही है, जल पिलाएं, जीवन बचाएं। मानव के साथ पशु-पक्षियों के लिए भी जल की व्यवस्था करें। यह करके देखिए; आपको अच्छा लगेगा। देख‍िए वीड‍ियो-



- अलकनंदा स‍िंंह

Saturday, 11 April 2026

आज पढ़‍िए...'पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना'



आज सुबह 4 बजे उठ गई, बाहर लॉन में आई तो देखा कल की बार‍िश के बाद आसमान कुछ अध‍िक ही स्वच्छ हो गया है.. कोने में चंद्रमा अपने को छुपाने का 'बेकार सा'  प्रयास कर रहा है मगर इस अनायास द‍िख जाने वाले चंद्रमा ने तो मैथ‍िली शरण गुप्त की ये रचना याद द‍िला दी जो कहीं मन की तहों में छुपी हुई थी...कोई नहीं आप भी एकबार इसका आनंद ले ही लीजि‍ए....  

मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'पंचवटी' काव्य की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करती हैं। इसमें चंद्रमा की चंचल किरणें जल-थल में खेल रही हैं और स्वच्छ चाँदनी अवनि-अंबर (धरती-आकाश) में बिछी है। यह पंक्तियाँ चाँदनी रात की शीतलता, शांति और मनमोहक दृश्य का चित्रण करती हैं।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥
किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।
सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!
और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!

Saturday, 28 February 2026

कालिदास! सच-सच बतलाना.....इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे?


 बाबा नागार्जुन की इस कविता में कालिदास के प्रति एक प्रकार की जिज्ञासा और उनके साहित्य के प्रति एक गहरी संवेदना छिपी है।

यह कविता रति के विलाप (कुमारसंभव) और यक्ष की वेदना (मेघदूत) में कालिदास की व्यक्तिगत भावनाओं को उजागर करती है। नागार्जुन पूछते हैं कि क्या वेदना की चरम सीमा पर यक्ष रोया था या तुम (कालिदास) रोए थे।

कविता में प्रकृति का चित्रण विशेषकर वर्षा ऋतु में यक्ष का अपनी प्रियतमा को याद करना मार्मिक रूप से प्रस्तुत है। यह कविता कवि की मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रश्न पूछती है और कालिदास की रचनाओं में निहित दर्द को उजागर करती है। 




ये ही है वो कालजई कव‍िता...आप भी पढ़‍िए ...  

कालिदास! सच-सच बतलाना

इन्दुमती के मृत्युशोक से

अज रोया या तुम रोये थे?

कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से

निकली हुई महाज्वाला में

घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम

कामदेव जब भस्म हो गया

रति का क्रंदन सुन आँसू से

तुमने ही तो दृग धोये थे

कालिदास! सच-सच बतलाना

रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका

प्रथम दिवस आषाढ़ मास का

देख गगन में श्याम घन-घटा

विधुर यक्ष का मन जब उचटा

खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर

चित्रकूट से सुभग शिखर पर

उस बेचारे ने भेजा था

जिनके ही द्वारा संदेशा

उन पुष्करावर्त मेघों का

साथी बनकर उड़ने वाले

कालिदास! सच-सच बतलाना

पर पीड़ा से पूर-पूर हो

थक-थककर औ' चूर-चूर हो

अमल-धवल गिरि के शिखरों पर

प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?

रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

#नागार्जुन


Wednesday, 25 February 2026

ह‍िन्दीनामा में आज अष्टभुजा की #काशी पर ल‍िखी ये कव‍िता पढ़ी...

 
सभ्यता का जल यहीं से जाता है

सभ्यता की राख यहीं आती है

लेकिन यहाँ से सभ्यता की कोई हवा नहीं बहती

न ही यहाँ सभ्यता की कोई हवा आती है

यह बनारस है

चाहे सारनाथ की ओर से आओ या लहरतारा की ओर से

वरुणा की ओर से आओ या गंगा की ओर से

इलाहाबाद की ओर से आओ या मुग़लसराय की ओर से

डमरू वाले की सौगंध

यह बनारस यहीं और इसी तरह मिलेगा

ठगों से ठगड़ी में

संतों से सधुक्कड़ी में

लोहे से पानी में

अँग्रेज़ों से अँग्रेज़ी में

पंडितों से संस्कृत में

बौद्धों से पालि में

पंडों से पंडई और गुंडों से गुंडई में

और निवासियों से भोजपुरी में

बतियाता हुआ यह बहुभाषाभाषी बनारस है

गुरु से संबोधन करके

किसी गाली पर ले जाकर पटकने वाले

बनारस में सब सबके गुरु हैं

रिक्शेवाला गुरु है

पानवाला गुरु है

पंडे, मल्लाह, मुल्ला, माली और डोम गुरु हैं

नाई गुरु है, क़साई गुरु है, भाई गुरु है

कॉमरेड गुरु हैं

शिष्य गुरु हैं और गुरु तो गुरु हैं ही

लेकिन गुरु के बारे में सबके अनुभव अलग-अलग हैं

किसी के लेखे गंगा ही गुरु हैं

किसी के लेखे ज्ञान ही गुरु है

किसी के लेखे स्त्री गुरु है

किसी के लिए सीढ़ी ही गुरु है

जबकि किसी के लिए ठेस ही गुरु है

बनारस में

बनारसी बाघ हैं

बनारसी माघ हैं

बनारसी घाघ हैं

बनारसी जगन्नाथ हैं

शैव हैं, वैष्णव हैं, सिद्ध हैं, बौद्ध कबीरपंथी, नाथ हैं

जगह-जगह लगती हैं यहाँ लोक-अदालतें

कहने को तो कचहरी भी है बनारस में

लेकिन यहाँ सबकी गवाह गंगा

और न्यायाधीश विश्वनाथ हैं

धन से धर्म नहीं होता बनारस में,

धर्म से धन होता है

जब बनारसी देवी रोती है

तब बनारसी दास सोता है

किसी को जोगी, किसी को जती

किसी को मल्लाह, किसी को पंडा

किसी को कवि, किसी को भाँड़

किसी को भँगेड़ी-गँजेड़ी, किसी को साँड़

बना देता है बनारस

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा... सिद्धिदात्री

आदि नवदुर्गा, भैरव, संकटमोचन आदि

बज्रहृदय पत्थर के देवी-देवता खड़े हैं

ताकते हैं टुकुर-टुकुर

गंगा भी खड़ी हैं यहाँ

पानी की प्रतिमा बनी है बनारस में

बनारस में

फूल—बिकते हैं

मालाएँ—बिकती हैं

चंदन—बिकता है

प्रसाद—बिकता है

देह—बिकती है

साहित्य—बिकता है

सुख नहीं बिकता बनारस में

फिर भी सुख प्राप्त होता है

रात का कालिख धोकर सूर्य

प्रतिदिन बनारस के मुँह में चंदन लगा देता है

इस तरह बनारस

अपना अंडा अपने माथे पर सेता है

बनारस गलियों में जीता है

और घाटों पर मुक्ति लेता है

इस तरह विश्व को

जीवन की सीख देता है

बनारस में

मल्ल हैं, अखाड़े हैं, मठ हैं, आश्रम हैं

व्यायाम, प्राणायाम हैं

यहाँ सबका बदन गीला है

लेकिन जाने क्यों

हर आदमी थोड़ा-थोड़ा ढीला है

किसी बनारसी को परिचय-पत्र की ज़रूरत नहीं होती

लगता है समूचा बनारस

गंगा की केवल एक बूँद से बना है

मूल है गंगा, बनारस तना है

जो भी बनारस जाता है

कोई सिर के बाल, कोई जेब, कोई मन, कोई तन

अर्थात् कुछ न कुछ खोकर आता है

और जब कोई यहाँ से जाता है

हरी झंडी की तरह

बनारस अपने दोनों हाथ हिलाता है।

- अष्टभुजा शुक्ल

Sunday, 25 January 2026

मधुर आवाज़, कोमल भावों के शायर ताहिर फ़राज का मुंबई में निधन, प्रशंसकों में शोक


 रामपुर। प्रख्यात शायर ताहिर फ़राज़ के निधन की खबर से शोक की लहर दौड़ गई है। 72 वर्ष की उम्र में उन्होंने मुंबई में आखिरी सांस ली। उनके परिवार में पत्नी के अलावा तीन बेटियां और एक बेटा शामिल हैं। 29 जून 1953 को बदायूं में जन्मे ताहिर फ़राज़ अपनी मधुर आवाज़, कोमल भावों और आध्यात्मिक रंग से काव्य जगत में एक उज्ज्वल सितारे की तरह चमकते रहे।

सीने में हुआ था तेज दर्द
वह पिछले सप्ताह अपने परिवार के साथ शादी समारोह में शामिल होने मुंबई गए थे। शनिवार सुबह उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन वह बच नहीं सके। ताहिर फ़राज़ ने बहुत कम उम्र में ही कविता और शायरी लिखना शुरू कर दिया था। थोड़े ही समय में वे देश के नामचीन कवियों और शायरों में से एक बन गए।

प्रशंसकों में शाेक की लहर
सौलत पब्लिक लाइब्रेरी सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य काशिफ खां ने ताहिर फ़राज़ के निधन पर शोक जताते हुए बताया कि ग़ज़लें हों, भजन हों, नात हों, सलाम हों या मनक़बत हों, उनकी विशिष्ट शैली, जोश और संगीतमयता ने हर वर्ग के श्रोताओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। गायन में उनका कोई सानी नहीं था और खानक़ाह नियाज़िया बरेली से उनके जुड़ाव ने उनकी कविताओं को आध्यात्मिक गहराई प्रदान की।

मुंबई में ही अंतिम संस्कार की तैयारी
ताहिर फ़राज का अंतिम संस्कार मुंबई में ही किए जाने की तैयारी हो रही है। उन्होंने बताया कि ताहिर फ़राज़ का निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक पूरे युग का, एक सांस्कृतिक आवाज़ का और उर्दू कविता के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है। उनके निधन से ग़ज़लें खामोश हो गई हैं और शब्द अनाथ हो गए हैं।

उर्दू शायरी के संसार में ताहिर फ़राज़ का नाम एक ऐसी आवाज़ के तौर पर याद किया जाएगा, जिसने ऊँची आवाज़ के बजाय ठहराव और संवेदना को चुना। उनकी शायरी में मोहब्बत, दर्द और इंसानी रिश्तों की नर्म परछाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं। ताहिर फ़राज़ उन शायरों में थे जिनकी पंक्तियाँ मंच से ज़्यादा दिलों में जगह बनाती थीं। उनके अशआर आम पाठक की ज़िंदगी से सीधे संवाद करते हैं। उर्दू साहित्य में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करता रहेगा। 

उनकी एक ग़ज़ल - 

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी
तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी

सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी

ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार
घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी

क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी
मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी

वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र
मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी

- Legend News

Sunday, 4 January 2026

नागरी प्रचारिणी सभा ने 'गुम' हो रही किताबों को दिया 'नया जीवन', रामचंद्र शुक्ल की कविता में हजारी प्रसाद का करेक्शन भी पढ़ने को मिलेगा


 किताबों का साथ न सिर्फ आपके अकेलेपन को दूर करता है, बल्कि आपके ज्ञान स्तर को भी बढ़ाता है. किताबें यदि दोस्त बन जाएं, तो फिर हर मोड़ पर इसका लाभ मिलता है. पुराने वक्त के साहित्य, उपन्यास और कविताएं जो समय के साथ कहीं गुम होती जा रही थी, उन्हें फिर से नया जीवन मिला है. इन किताबों को पुनः प्रकाशित कर लोगों तक पहुंचाया जा रहा है. आज हम ऐसी ही कुछ यूनिक किताबों पर चर्चा करेंगे. जिन्होंने पुनः प्रकाशित होने के बाद काफी सुर्खियां बटोरी हैं.


यह यूनिक और नया प्रयास बनारस की सबसे पुरानी और हिंदी खड़ी बोली में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा ने किया है. सभा ने आज भी सैकड़ों हस्तलिखित पन्नों, पांडुलिपियों और बड़े-बड़े कवियों, साहित्यकारों और संतों की लेखनी को संरक्षित रखा है. इन दुर्लभ लेखनी को नागरी प्रचारिणी सभा लोगों तक पहुंचा रहा है.



पुरानी किताबों को किया गया रिपब्लिश : हाल ही में सभा ने कुछ पुरानी लिटरेचर और अन्य महत्वपूर्ण किताबों को रिपब्लिश किया गया है. जिसने पब्लिशर के बीच एक चर्चा के साथ ही कंपटीशन का माहौल भी बना दिया है. पहली बार विदेश की तर्ज पर ऐसी किताबें तैयार हुई हैं जो न सिर्फ उसके ओरिजिनल लेखक के ओरिजिनल हस्तलिखित दस्तावेजों को समेटे हुए है, बल्कि उन किताबों में हुए करेक्शन के दौरान लगाए गए लाल निशान के उचित तथ्यों को भी साथ लेकर बाजार में उपलब्ध हैं.


जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं पांडुलिपियां : नागरी प्रचारिणी सभा के वर्तमान प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया, सभा में वर्तमान समय में एक दो नहीं, बल्कि सैकड़ों ऐसे हस्तलिखित दस्तावेज और पांडुलिपियां मौजूद हैं, जो समय के साथ बेहद जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं. सभा की लंबी लड़ाई और कुछ पुराने लोगों संग कानूनी जद्दोजहद के बाद जब इस स्थान की कमान उन्हें मिली, तो पता ही नहीं था कि यहां ऐसी चीज हैं, जो संरक्षित और सुरक्षित करने के साथ लोगों तक पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा.


तीन साल पहले शुरू किया रिपब्लिश करने का काम : व्योमेश शुक्ल बताते हैं, बहुत से लोग होते हैं जो चीजों को सुरक्षित तो करते हैं, लेकिन दूसरों तक पहुंचा नहीं पाते, जिसका लाभ ना उसे तैयार करने वाले को मिलता है और ना ही लोगों को. ऐसी स्थिति में गोस्वामी तुलसीदास, जायसी, मुंशी प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कबीर, सूरदास और तमाम ऐसे लेखक, साहित्यकार, संतों की लिखी किताबों के पुनः प्रकाशन का काम सभा ने लगभग तीन साल पहले शुरू किया.


नए रूप में किया गया पेश : उनका कहना है कि सबसे पहले हिंदी साहित्य का इतिहास जो सिविल सर्विसेज से लेकर तमाम हिंदी के प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण किताब मानी जाती है उसका पुनः प्रकाशन किया. पांडुलिपियों को असाधारण सांस्कृतिक महत्व माना जाता रहा है, लेकिन वह लोगों तक पहुंच में नहीं थी. बदलते समय और युवाओं की सोच, उनकी पसंद को पांडुलिपियों के नए रूप में पेश किया गया, जिससे पांडुलिपियों और ओरिजिनल लेख उनके दिलों को छू सके.


रामचंद्र शुक्ल ने 24 साल की उम्र में लिखी थी कविता क्या है? व्योमेश शुक्ल बताते हैं, इनमें एक है कविता क्या है? आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हाथों का लिखा हुआ एक निबंध है. हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक रामचंद्र शुक्ल का जन्म 1884 में हुआ लेकिन, उन्होंने निबंध का पहला हिस्सा 1908 अपने 24 वर्ष की उम्र में पूरा किया और इस निबंध का अंतिम प्रारूप 1930 में छपा यानी जब उनकी उम्र लगभग 46 वर्ष थी. उन्होंने एक ही निबंध को अलग-अलग रूप में लिखा और उसे अलग-अलग पब्लिशर्स से प्रकाशित करवाया. लगभग 22 -23 वर्ष की अपनी यात्रा में उन्होंने एक निबंध को चार बार लिखा.


एक ही कविता कई बार लिखी : उन्होंने कविता क्या है? जैसे सवाल को भारतीय समाज और हिंदी भाषी लोगों के लिए कई बार लिखा, इसमें कुछ परिवर्तन भी बताएं कि समय के साथ कैसे चीज बदल रही है. इसका एक प्रारूप उपलब्ध है जो लोग पढ़ रहे थे, बाद में सभा को धीरे-धीरे तीन और प्रारूप मिले जिनके हस्तलेखों को सुरक्षित रखने वालों ने एक बड़ा काम किया. हमने इन आर्काइव्स में रखी इन हस्तलेख निबंधों की श्रृंखला को एक साथ एक किताब में लाने का काम किया.


करेक्शन को भी किया गया है प्रकाशित : व्योमेश शुक्ल बताते हैं, 24 साल की उम्र में रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पब्लिशर्स के पास अपनी कविता भेजी. उस वक्त के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे. महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम साहित्य जगत में बड़ा था. उन्होंने इसकी प्रूफ्ररीडिंग की. जिसमें काफी गलतियां मिलीं. उन गलतियों और महावीर प्रसाद द्विवेदी के लगाए गए लाल निशानों के साथ किए गए करेक्शन को भी हमने किताब में हूबहू जगह दी है. ताकि लोगों को पता चले की ओरिजिनल के बाद की गई एडिटिंग के पश्चात यह किताब कैसी दिखाई दी.


प्रेमचंद की दो कहानियां एक साथ : व्योमेश ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद की सबसे महत्वपूर्ण कहानियों में एक पंच परमेश्वर और ईश्वर न्याय को भी कंपाइल करके एक किताब में हमने जगह दी है. यह पुनः प्रकाशन पहली बार था. जिसमें मुंशी प्रेमचंद की लेखनी का यह रूप सामने आया, यह भी एडिटिंग के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के पास ही गई थी. जिसमें प्रेमचंद जी ने इसका नाम पहले पंच भगवान रखा, लेकिन बाद में इसे महावीर जी ने बदलकर पंच परमेश्वर कर दिया, यह भी एडिटिंग का ओरिजिनल दस्तावेज हमने इस किताब में शामिल किया है.


हिंदी साहित्य का पुन: प्रकाशन : व्योमेश शुक्ल ने बताया, हिंदी साहित्य हिंदी पढ़ने और हिंदी समझने वालों के लिए गीता से कम नहीं है. इस किताब का पहला एडिशन 1929 में प्रकाशित हुआ था, तब से इसमें बहुत सी गलतियां चली आ रही थीं. कॉपीराइट खत्म होने के बाद 500 पब्लिशर्स ने छापा. लगभग 550 पन्ने की पुरानी किताब का अच्छे से करेक्शन करने के बाद 850 पन्नों की नई किताब दो साल पहले लॉन्च की गई. इसकी डिमांड आज भी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह पर है.


सबसे पहले सभा ने रामचरितमानस का किया था प्रकाशन : व्योमेश शुक्ल ने बताया, जो भी पांडुलिपियां या हस्तलिखित दस्तावेज हैं वह प्रमाणित हैं कि नहीं यह बहुत बड़ा सवाल है. हमारे पास इसका बहुत बड़ा दस्तावेज प्रमाण भी है. पांडुलिपियां अयोध्या, काशी नरेश के पर्सनल दस्तावेजों के साथ राजापुर और इस युग के आसपास की चीजें हमारे पास भी हैं. गीता प्रेस का एडिशन रामचरितमानस जिसे घर-घर पूजा जाता है, यह पुस्तक 1923 के पहले कहीं नहीं थी. गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई, लेकिन इसके पहले 1923 में सभा ने रामचरितमानस की तुलसीदास की पांडुलिपियों को रामचरितमानस संग मानसेतर एकादश ग्रन्थ को तीन जिल्दों में प्रकाशित किया था. इसके बाद 1974 में सभा ने बड़ा काम करते हुए देशभर के विद्वानों को जोड़ते हुए उसे पुनः तुलसी ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित किया.


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