Tuesday, 7 July 2026

भरत व्यास... वह कवि, जिसने शब्दों को पूजा बना दिया

 


“भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने बचपन में स्कूल की प्रार्थना के दौरान ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ न गाया हो। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि इस अमर प्रार्थना को लिखने वाला कवि किन संघर्षों, टूटे सपनों और गहरे दर्द से गुज़रा था? क्या यह महज़ एक फिल्मी गीत था, या एक ऐसे इंसान की आत्मा की पुकार जिसने जीवन के हर मोड़ पर संघर्ष को गले लगाया? यह कहानी सिर्फ एक गीतकार की नहीं, बल्कि उस कलम की है जिसने दर्द को शब्दों में बदलकर उसे अमर कर दिया।”

एक ऐसा गीत, जो फिल्म से निकलकर करोड़ों बच्चों की प्रार्थना बन गया

साल 1957। भारतीय सिनेमा में कई शानदार फिल्में बन रही थीं, लेकिन किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वी. शांताराम की फिल्म “दो आंखें बारह हाथ” का एक गीत आने वाले सात दशकों तक देश के हजारों स्कूलों की सुबह का हिस्सा बन जाएगा। यह गीत था “ऐ मालिक तेरे बंदे हम”। यह केवल एक फिल्मी गीत नहीं था, बल्कि इंसानियत, आत्मचिंतन और सुधार की ऐसी प्रार्थना थी जिसने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं को पार कर लिया। फिल्म में यह गीत उन अपराधियों की आत्मा की आवाज़ बनकर सामने आया जो अपने भीतर के अंधकार से लड़ना चाहते थे। लता मंगेशकर की निर्मल आवाज़, वसंत देसाई का मधुर संगीत और भरत व्यास की आध्यात्मिक लेखनी ने मिलकर ऐसा इतिहास रचा, जो आज भी जीवित है। लेकिन इस अमर रचना के पीछे खड़े कवि का नाम धीरे-धीरे लोगों की यादों से धुंधला पड़ गया। करोड़ों लोग गीत गाते रहे, पर बहुत कम लोगों ने उसके रचनाकार को याद रखा।

कौन थे भरत व्यास? वह कवि, जिसने शब्दों को पूजा बना दिया

6 जनवरी 1918 को राजस्थान के बीकानेर में जन्मे भरत व्यास का बचपन किसी राजसी वैभव में नहीं, बल्कि संघर्षों के बीच बीता। बहुत छोटी उम्र में माता-पिता का साया सिर से उठ गया। उनका पालन-पोषण उनके विद्वान दादा पंडित घनश्याम दास व्यास ने किया। दादा ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने बालक भरत की कुंडली देखकर भविष्यवाणी की थी कि यह बच्चा एक दिन पूरे देश में अपना नाम करेगा। शायद तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह भविष्यवाणी एक दिन हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में सच साबित होगी।

भरत व्यास बचपन से ही शब्दों के प्रेमी थे। स्कूल की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते, कविताएँ लिखते और धार्मिक नाटकों में अभिनय करते। कृष्ण लीला में कभी स्वयं कृष्ण बनते तो कभी उनके छोटे भाई गोपी की भूमिका निभाते। शब्दों और मंच से उनका रिश्ता यहीं से शुरू हुआ। लेकिन जीवन ने उनके लिए आसान रास्ता नहीं चुना था।

रात का चौकीदार… जो अंधेरे में कविताएँ लिखा करता था

उच्च शिक्षा के लिए भरत व्यास को कोलकाता भेजा गया। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि आराम से पढ़ाई हो सके। दिन में कॉलेज, दोपहर में ट्यूशन और रात में एक सुनसान कंपनी में चौकीदारी—यही उनकी दिनचर्या थी। रात के गहरे सन्नाटे, चारों ओर फैला अंधेरा और अकेलापन अक्सर उनके मन में भय पैदा करता। लेकिन वही अंधेरा धीरे-धीरे उनकी कविताओं का साथी बन गया।

इन्हीं रातों में उनके मन से एक पंक्ति निकली—“निर्बल से लड़ाई बलवान की, ये कहानी है दिए की और तूफान की।” वर्षों बाद यही कविता वी. शांताराम की फिल्म “तूफान और दिया” का आधार बनी। यह केवल गीत नहीं था, बल्कि उस युवक की आत्मकथा थी जो जीवन के तूफानों से लड़ते हुए भी उम्मीद का दीपक बुझने नहीं देना चाहता था।

मुंबई… जहां सपने बिकते भी हैं और टूटते भी हैं

फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर भरत व्यास मुंबई पहुंचे। लेकिन यह सफर किसी फिल्मी कहानी जैसा आसान नहीं था। उन्होंने और उनकी पत्नी ने घर के बर्तन तक बेच दिए ताकि मुंबई आने का किराया जुट सके। मलाड की एक छोटी-सी खोली में पंद्रह रुपये महीने के किराए पर रहने लगे। उनके पास कविताओं का खजाना था, लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं।

उन्होंने अपनी कविताओं की पुस्तकें छपवाईं। उन्हें उम्मीद थी कि लोग पढ़ेंगे, सराहेंगे और उनका संघर्ष खत्म होगा। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। किताबें बिकने से पहले ही दीमकों ने चाट डालीं। जिस इंसान ने शब्दों में अपना भविष्य देखा था, उसकी मेहनत को दीमकों ने खा लिया। यह किसी लेखक के लिए सबसे बड़ा मानसिक आघात था।

जब एक कवि सम्मेलन ने उन्हें सिखाया कि सम्मान और भुगतान अलग-अलग चीज़ें हैं

संघर्ष जारी था। एक दिन एक बड़े उद्योगपति के घर आयोजित कवि सम्मेलन में उन्हें विशेष अतिथि के रूप में बुलाया गया। शानदार स्वागत हुआ। फूल-मालाएँ पहनाई गईं। लोगों ने खूब तालियाँ बजाईं। स्वादिष्ट भोजन कराया गया। भरत व्यास को लगा कि शायद अब उनकी किस्मत बदलने वाली है।

लेकिन जब कार्यक्रम समाप्त हुआ और वे बाहर निकले, तो न आयोजक थे, न उन्हें घर छोड़ने वाली गाड़ी और न ही मेहनताना। जेब में केवल एक अठन्नी थी। उसी से दादर तक तांगा किया और फिर दादर से मलाड तक पूरी रात पैदल चलते रहे।

उस रात रास्ते भर उनके भीतर एक कविता जन्म ले रही थी। बाद में यही कविता फिल्म “नवरंग” में अमर हुई—

“कविराजा कविता के मत अब कान मरोड़ो,

धंधे की कुछ बात करो, कुछ पैसे जोड़ो…”

यह व्यंग्य नहीं था, बल्कि उस कवि का दर्द था जिसे समाज सम्मान तो देता था, लेकिन उसके श्रम की कीमत नहीं।

जिस प्रार्थना ने भारत की आत्मा को छू लिया

1957 में वी. शांताराम अपनी फिल्म “दो आंखें बारह हाथ” बना रहे थे। कहानी एक ऐसे जेलर की थी जो अपराधियों को सज़ा नहीं, सुधार का अवसर देना चाहता था। इस दृश्य के लिए एक ऐसे गीत की आवश्यकता थी जो केवल भगवान से प्रार्थना न हो, बल्कि इंसान को अपने भीतर झाँकने के लिए मजबूर कर दे।

यह जिम्मेदारी भरत व्यास को मिली।

उन्होंने लिखा—

“ऐ मालिक तेरे बंदे हम…”

ये शब्द किसी धर्म विशेष की प्रार्थना नहीं थे। इनमें इंसानियत थी, करुणा थी, आत्मसंयम था और जीवन का दर्शन था। संगीतकार वसंत देसाई ने इसे स्वर दिए और लता मंगेशकर की आवाज़ ने इसे अमर बना दिया।

फिल्म रिलीज़ हुई, दर्शकों ने गीत को अपनाया, और धीरे-धीरे यह स्कूलों की प्रार्थना बन गया। शायद स्वयं भरत व्यास ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके लिखे शब्द आने वाली कई पीढ़ियों के बचपन का हिस्सा बन जाएंगे।

लेकिन दुनिया जिस गीत को भगवान की प्रार्थना समझती रही… उसके पीछे खड़ा कवि खुद जीवन से लड़ रहा था

जब लोग “ऐ मालिक तेरे बंदे हम” गा रहे थे, उसी समय भरत व्यास अपने निजी जीवन में ऐसे संघर्षों से गुजर रहे थे जिनकी कल्पना भी आसान नहीं। आर्थिक संकट, असफलताएँ, टूटते सपने और आगे चलकर बेटे के बिछड़ने का दर्द—इन सबने उनकी कलम को और गहरा बना दिया।

जब एक पिता का संसार अचानक बिखर गया

साल 1956-57 का दौर भरत व्यास के जीवन का सबसे कठिन समय था। उनके इकलौते बेटे श्यामसुंदर व्यास किसी बात से नाराज़ होकर घर छोड़कर चले गए। परिवार ने हर संभव कोशिश की। रिश्तेदारों से पूछताछ हुई, मित्रों से संपर्क किया गया, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। हर गुजरते दिन के साथ एक पिता की चिंता बढ़ती गई।

रातें जागते हुए कटतीं, दिन बेचैनी में बीतते। हर दरवाजे की दस्तक पर उन्हें लगता कि शायद बेटा लौट आया होगा। लेकिन हर बार उम्मीद टूट जाती। जिस व्यक्ति ने दूसरों की भावनाओं को शब्द दिए थे, वह खुद अपने दर्द को किसी से कह नहीं पा रहा था। अंततः उन्होंने वही किया जो एक कवि कर सकता है—अपने आँसुओं को कागज़ पर उतार दिया।

उन्होंने लिखा—

“ज़रा सामने तो आओ छलिए, छुप-छुप छलने में क्या राज़ है…”

दुनिया ने इसे प्रेमी-प्रेमिका का गीत समझा, लेकिन वास्तव में यह एक पिता की अपने बिछड़े बेटे को पुकार थी। हर शब्द में बेटे की तलाश थी, हर पंक्ति में एक पिता की तड़प छिपी थी।

जिस कागज़ को भरत व्यास ने गुस्से में फाड़ दिया था… वही सुपरहिट गीत कैसे बन गया?

इसी दौरान निर्माता सुभाष देसाई अपनी फिल्म “जनम जनम के फेरे” के लिए गीत लिखवाने भरत व्यास के घर पहुंचे। लेकिन भरत व्यास मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे। उन्होंने साफ़ कहा कि वे कुछ नया लिखने की स्थिति में नहीं हैं।

बहुत आग्रह करने पर उन्होंने अपनी जेब से वही पर्चा निकाला जिस पर बेटे के वियोग में लिखी कविता थी। सुभाष देसाई ने पढ़ा और कहा, “पंडित जी, यह तो पिता-पुत्र के रिश्ते की पीड़ा है। हमें तो फिल्म के नायक-नायिका के लिए प्रेम गीत चाहिए।”

यह सुनकर भरत व्यास ने बिना कुछ कहे वह पर्चा फाड़ दिया और कूड़ेदान में फेंक दिया।

यहीं से कहानी अप्रत्याशित मोड़ लेती है।

सुभाष देसाई ने उन फटे हुए टुकड़ों को उठाया। उन्हें जोड़कर पूरी कविता पढ़ी और महसूस किया कि यह दर्द इतना सच्चा है कि इसे बदला नहीं जाना चाहिए। उन्होंने लगभग बिना किसी बदलाव के उसी गीत को फिल्म में इस्तेमाल कर लिया।

फिल्म रिलीज़ हुई।

गीत सुपरहिट हो गया।

लाखों लोगों ने इसे प्रेम गीत माना, लेकिन शायद ही किसी को पता था कि यह एक पिता की पुकार थी।

क्या “आ लौट के आजा मेरे मीत” भी बेटे के लिए लिखा गया था? सच जानकर आप चौंक जाएंगे

सालों से यह धारणा बनी रही कि फिल्म “रानी रूपमती” का अमर गीत—

“आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं…”

भी भरत व्यास ने अपने बेटे के वियोग में लिखा था।

लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है।

यह गीत किसी बेटे के लिए नहीं, बल्कि एक दोस्त के लिए लिखा गया था।

दो दोस्तों का अहंकार… जिसने हिंदी सिनेमा को अमर गीत दे दिया

भरत व्यास और संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी केवल सहकर्मी नहीं, बल्कि बेहद करीबी मित्र थे। दोनों ने साथ मिलकर कई यादगार गीत रचे। लेकिन एक दिन किसी छोटी-सी बात ने दोनों के बीच ऐसी दूरी पैदा कर दी कि बातचीत पूरी तरह बंद हो गई।

दिन बीतते गए।

महीने गुजर गए।

दोनों एक-दूसरे को याद करते थे, लेकिन अहंकार उन्हें पहला कदम उठाने नहीं दे रहा था।

फिर एक रात…

लगभग आधी रात को एस. एन. त्रिपाठी के घर फोन की घंटी बजी।

दूसरी ओर भरत व्यास थे।

उन्होंने केवल एक वाक्य कहा—

“तू रूठकर क्यों बैठा है… मैंने तेरे लिए एक गीत लिखा है।”

फोन पर ही उन्होंने पूरा गीत सुनाया—

“आ लौट के आजा मेरे मीत…”

सुबह होते ही एस. एन. त्रिपाठी भरत व्यास के घर पहुंच गए। दोनों गले मिले। सारे गिले-शिकवे खत्म हो गए। उसी दिन गीत रिकॉर्ड हुआ और बाद में फिल्म “रानी रूपमती” का सबसे लोकप्रिय गीत बन गया।

आज भी करोड़ों लोग इसे प्रेम गीत मानते हैं, जबकि इसकी आत्मा दो दोस्तों की टूटी हुई दोस्ती और फिर उसके पुनर्मिलन की कहानी है।

हर गीत के पीछे एक सच्ची घटना… यही थी भरत व्यास की सबसे बड़ी ताकत

भरत व्यास कभी कल्पना के लिए कल्पना नहीं लिखते थे। उनके परिवार के लोगों ने कई बार बताया कि उनकी लगभग हर कविता के पीछे कोई वास्तविक घटना होती थी।

रात की चौकीदारी ने “निर्बल से लड़ाई बलवान की…” को जन्म दिया।

आर्थिक संघर्ष ने “कविराजा कविता के…” जैसी व्यंग्य रचना लिखवाई।

कैदियों के सुधार की कहानी ने “ऐ मालिक तेरे बंदे हम…” जैसा अमर प्रार्थना गीत दिया।

बेटे की जुदाई ने “ज़रा सामने तो आओ छलिए…” लिखा।

दोस्त की नाराज़गी ने “आ लौट के आजा मेरे मीत…” को जन्म दिया।

यही वजह है कि उनके शब्द केवल तुकबंदी नहीं लगते, बल्कि सीधे दिल तक पहुंचते हैं।

एक कवि चला गया… लेकिन उसके शब्द आज भी हर पीढ़ी के साथ चलते हैं

5 जुलाई 1982 को भरत व्यास इस दुनिया से विदा हो गए। उनके जाने के बाद हिंदी सिनेमा ने केवल एक गीतकार नहीं खोया, बल्कि एक ऐसा कवि खो दिया जिसने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में ढालने की अद्भुत कला विकसित की थी।

आज भी जब किसी स्कूल में सुबह की प्रार्थना होती है…

जब कोई पुरानी फिल्मों का प्रेमी “आधा है चंद्रमा रात आधी…” गुनगुनाता है…

जब रेडियो पर “आ लौट के आजा मेरे मीत…” बजता है…

या जब कोई अकेले में “ज़रा सामने तो आओ छलिए…” सुनता है…

तब शायद उसे यह एहसास नहीं होता कि इन गीतों में एक कवि का जीवन धड़क रहा है।

क्या हम सचमुच अपने गीतकारों को याद रखते हैं?

आज की पीढ़ी लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार को तो पहचानती है, लेकिन जिन लोगों ने उनके लिए अमर गीत लिखे, वे धीरे-धीरे स्मृतियों से ओझल होते जा रहे हैं। भरत व्यास उन्हीं अनमोल रचनाकारों में से एक हैं।

उनकी सबसे बड़ी विरासत केवल गीत नहीं हैं। उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने अपने जीवन के हर सुख-दुख को कला में बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि शब्द तब सबसे अधिक अमर होते हैं, जब वे किसी किताब से नहीं, बल्कि जीवन से निकलते हैं।

यही कारण है कि “ऐ मालिक तेरे बंदे हम” आज भी केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक प्रार्थना है। और जब तक यह गीत गाया जाता रहेगा, भरत व्यास भी हमारे बीच जीवित रहेंगे।

संकल‍ित: भूले ब‍िसरे गीत 

Sunday, 5 July 2026

सोशल मीडिया पर चर्चित कहानी: छोटू पप्पा आएं तो बता देना कि अंकल आए थे

 


एक शराबी महादेव का जबरदस्त भक्त था। वह रोज शाम में शराब पीता और फिर नशे में झूमता हुआ घर को लौटता। उसके घर के रास्ते में एक शिव मंदिर पड़ता था। वह रोज वहां रात बारह बजे पहुंचता था। मंदिर के बाहर चप्पल उतार कर अंदर जाता, जोर से घंटा बजाता। इसके बाद वहां पड़ी बाल्टी में पास के कुएं से पानी निकलता और शिवलिंग पर श्रद्धा से जलाभिषेक करता। फिर वह जेब से दो फूल और एक लड्डू निकाल कर शिवलिंग पर चढ़ाकर बाहर निकल जाता था। सालों से उसका यह नियम चल रहा था। कभी वह नागा नहीं करता और न कभी लेट होता।


एक दिन महादेव ने सोचा कि इस भक्त की परीक्षा ली जाए। यह नशे में धुत्त रहता है। इसे पता भी है यह किसकी पूजा कर रहा है। यह सोचकर महादेव ने एक दिन अपनी जगह गणेश जी को बिठा दिया।


उस दिन भी रोज की तरह नशे में झूमता शराबी आया और मंदिर का घंटा बजाने लगा। घंटा बजाने से पहले वह एक क्षण के लिए रुका। उसने एक नजर सामने देखा और फिर घंटा बजाने लगा। फिर वही सारी क्रिया दुहराई जो वह रोज करता था। मंदिर से निकलने से पहले उसने गणेश जी की ओर देखा और बोला, छोटू पप्पा आएं तो बता देना कि अंकल आए थे। इतना कहकर वह निकल गया।


इस कहानी की सीख यह है कि सच्चा भक्त चाहे जिस भी हालत में हो, अपने इष्टदेव को पहचानने में कभी भूल नहीं कर सकता है।

Sunday, 10 May 2026

जब एक संपादक ने खुद ही बनकर लिख डाले 14 लेखक…


 कल्पना कीजिए एक ऐसी पत्रिका की, जो हर महीने पाठकों के हाथों में जाती हो और लोग बेसब्री से उसके नए अंक का इंतजार करते हों, लेकिन उस पत्रिका के पास अचानक पर्याप्त सामग्री ही न हो। उस दौर में न इंटरनेट था, न सोशल मीडिया और न ही लेखकों की इतनी बड़ी संख्या, जो हर महीने गुणवत्तापूर्ण लेखन दे सके। ऐसे में एक संपादक के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि वह पत्रिका की गुणवत्ता और निरंतरता को कैसे बनाए रखे। यही वह क्षण था जब आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक ऐसा फैसला लिया, जो आज भी लोगों को हैरान करता है। उन्होंने तय किया कि ‘सरस्वती’ पत्रिका कभी कमजोर नहीं पड़ेगी, चाहे उन्हें खुद ही कई रूप क्यों न धारण करने पड़ें। यह सिर्फ एक संपादकीय निर्णय नहीं था, बल्कि एक जुनून था, एक जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने अपने कंधों पर उठाया और उसे निभाने के लिए हर संभव प्रयास किया।

भुजंगभूषण से लेकर ‘एक ग्रामीण’ तक – ये सभी कौन थे?

जब आप ‘सरस्वती’ के पुराने अंकों को देखते हैं, तो आपको अलग-अलग नामों से लिखे गए लेख, कविताएं और आलोचनाएं दिखाई देती हैं। पहली नजर में लगता है कि यह किसी बड़े लेखक समुदाय का योगदान है, लेकिन जब सच्चाई सामने आती है, तो यह कहानी और भी रोचक हो जाती है। भुजंगभूषण, कवि किंकर, सुकवि किंकर, कुंज, कमल किशोर त्रिपाठी, श्रीकंठ पाठक एमए, चक्रपाणि शर्मा, निपुण नारायण शर्मा, पुराणपाठी, परमेश्वर शर्मा, द्विरेफ, कल्लू अल्हइत, विपन्न और ‘एक ग्रामीण’—ये सभी नाम दरअसल एक ही व्यक्ति के थे। आचार्य द्विवेदी ने इन नामों के पीछे छिपकर अलग-अलग दृष्टिकोणों से लेखन किया, ताकि पत्रिका में विविधता बनी रहे और पाठकों को यह महसूस हो कि वे कई विचारधाराओं से रूबरू हो रहे हैं। यह एक तरह से साहित्यिक प्रयोग भी था और एक जिम्मेदारी भी, जिसे उन्होंने बेहद कुशलता से निभाया।

सरस्वती पत्रिका – जहां से शुरू हुआ एक युग

‘सरस्वती’ पत्रिका सिर्फ एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि वह एक आंदोलन थी, जिसने हिंदी भाषा को एक नई दिशा दी। 1903 से 1920 तक जब आचार्य द्विवेदी इसके संपादक रहे, तब उन्होंने इसे एक साधारण प्रकाशन से उठाकर एक साहित्यिक क्रांति का माध्यम बना दिया। उस समय हिंदी भाषा एक संक्रमण काल से गुजर रही थी, जहां उसे एक मानक रूप देने की जरूरत थी। द्विवेदी जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपने लेखन, संपादन और दृष्टिकोण से हिंदी को एक नई पहचान दी। यही कारण है कि इस काल को ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ‘सरस्वती’ सिर्फ मनोरंजन का साधन न रहे, बल्कि वह ज्ञान, विचार और सुधार का मंच बने।

अगर उन्होंने रेलवे की नौकरी नहीं छोड़ी होती तो…?

झांसी में रेलवे के तार विभाग में सीनियर क्लर्क के रूप में काम करते हुए आचार्य द्विवेदी का जीवन स्थिर और सुरक्षित था। 200 रुपए मासिक वेतन उस समय एक सम्मानजनक आय मानी जाती थी और कोई भी व्यक्ति इसे छोड़ने के बारे में सोचता भी नहीं था। लेकिन आचार्य द्विवेदी ने अपने भीतर की आवाज को सुना और यह महसूस किया कि उनका असली उद्देश्य कुछ और है। उन्होंने इस सुरक्षित नौकरी को छोड़कर साहित्य की दुनिया में कदम रखा, जहां न कोई निश्चित आय थी और न ही कोई गारंटी। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन इसी निर्णय ने उन्हें वह बना दिया, जिसे आज हम हिंदी साहित्य का युग प्रवर्तक कहते हैं। अगर उन्होंने यह जोखिम नहीं उठाया होता, तो शायद हिंदी साहित्य का स्वरूप आज बिल्कुल अलग होता।

गुरु जिन्होंने गढ़े कई महान साहित्यकार

आचार्य द्विवेदी की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनका लेखन नहीं था, बल्कि उनकी दृष्टि थी, जो दूसरों की प्रतिभा को पहचानने और उसे निखारने की क्षमता रखती थी। उनके मार्गदर्शन में कई ऐसे साहित्यकार उभरे, जिन्होंने आगे चलकर हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी जैसे नाम आज भी साहित्य जगत में सम्मान के साथ लिए जाते हैं। लेकिन इन सबके पीछे कहीं न कहीं द्विवेदी जी का हाथ था। उन्होंने न सिर्फ उनकी रचनाओं को सुधारा, बल्कि उन्हें सही दिशा भी दी। यह एक गुरु और शिष्य के रिश्ते का सबसे सुंदर उदाहरण है, जहां गुरु अपने शिष्य को खुद से भी आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है।

देशभक्ति और भाषा – दोनों में समान जुनून

आचार्य द्विवेदी के लेखन में सिर्फ साहित्यिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि एक गहरी देशभक्ति भी दिखाई देती है। उस समय भारत स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से गुजर रहा था और हर जागरूक व्यक्ति देश के भविष्य को लेकर चिंतित था। द्विवेदी जी भी इससे अछूते नहीं थे। उनकी कविताओं और लेखों में यह चिंता साफ झलकती है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए एकता, शिक्षा और जागरूकता की जरूरत है। ‘आर्य भूमि’ और ‘प्यारा वतन’ जैसी रचनाएं सिर्फ साहित्य नहीं हैं, बल्कि वे उस समय की भावनाओं का प्रतिबिंब हैं, जो पाठकों को प्रेरित करती हैं और उन्हें अपने देश के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराती हैं।

सरल भाषा, गहरी बात – यही थी उनकी ताकत

आचार्य द्विवेदी की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह जटिल विषयों को भी बेहद सरल भाषा में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि अगर भाषा कठिन होगी, तो वह आम लोगों तक नहीं पहुंच पाएगी। इसलिए उन्होंने हिंदी को सरल, सहज और प्रभावी बनाने पर जोर दिया। उनकी कविताएं और लेख ऐसे होते थे, जिन्हें पढ़कर कोई भी व्यक्ति आसानी से समझ सकता था और उनसे जुड़ाव महसूस कर सकता था। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और लोगों को प्रभावित करता है।

आलोचना भी की, मार्गदर्शन भी दिया

आचार्य द्विवेदी सिर्फ एक लेखक या संपादक नहीं थे, बल्कि एक सख्त मार्गदर्शक भी थे। वह गलतियों को नजरअंदाज नहीं करते थे और साहित्यकारों को सुधारने के लिए उन्हें स्पष्ट रूप से बताते थे कि कहां सुधार की जरूरत है। उनकी आलोचना का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं था, बल्कि उसे बेहतर बनाना था। यही कारण है कि उनके संपर्क में आने वाले अधिकांश साहित्यकार आगे चलकर सफल हुए। उनका मानना था कि अगर भाषा को मजबूत बनाना है, तो उसमें अनुशासन जरूरी है और यह अनुशासन बिना सख्ती के नहीं आ सकता।

क्या हम आज भी उनके योगदान को पूरी तरह समझ पाए हैं?

आज जब हम हिंदी साहित्य की बात करते हैं, तो हम उसकी समृद्धि और विविधता की चर्चा करते हैं, लेकिन अक्सर यह भूल जाते हैं कि इसकी नींव किसने रखी थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान इतना व्यापक है कि उसे पूरी तरह समझना आसान नहीं है। उन्होंने न सिर्फ एक भाषा को आकार दिया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को दिशा दी। उनका काम सिर्फ उस समय तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

एक सवाल जो आज भी बाकी है…

आज के डिजिटल युग में, जहां जानकारी का भंडार हमारे हाथों में है, क्या हम उस समर्पण और मेहनत को समझ पा रहे हैं, जो आचार्य द्विवेदी जैसे लोगों ने दिखाई थी? एक व्यक्ति, जिसने चौदह नामों से लिखकर एक पत्रिका को जिंदा रखा, उसने हमें क्या सिखाया? शायद यही कि अगर इरादा मजबूत हो, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं।

Thursday, 23 April 2026

पुराणों के अनुसार जल दान- देयं जलं प्रपेषु शीतलं पावनं शुभम्। तर्षार्तानां च जीवानां भवेत् प्राणाभिराक्षणम्॥

 पुराणों के अनुसार जल दान-


देयं जलं प्रपेषु शीतलं पावनं शुभम्।
तर्षार्तानां च जीवानां भवेत् प्राणाभिराक्षणम्॥

प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा धर्म है। कहते हैं कि जल ही जीवन है। गर्मी बहुत पड़ रही है, जल पिलाएं, जीवन बचाएं। मानव के साथ पशु-पक्षियों के लिए भी जल की व्यवस्था करें। यह करके देखिए; आपको अच्छा लगेगा। देख‍िए वीड‍ियो-



- अलकनंदा स‍िंंह

Saturday, 11 April 2026

आज पढ़‍िए...'पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना'



आज सुबह 4 बजे उठ गई, बाहर लॉन में आई तो देखा कल की बार‍िश के बाद आसमान कुछ अध‍िक ही स्वच्छ हो गया है.. कोने में चंद्रमा अपने को छुपाने का 'बेकार सा'  प्रयास कर रहा है मगर इस अनायास द‍िख जाने वाले चंद्रमा ने तो मैथ‍िली शरण गुप्त की ये रचना याद द‍िला दी जो कहीं मन की तहों में छुपी हुई थी...कोई नहीं आप भी एकबार इसका आनंद ले ही लीजि‍ए....  

मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'पंचवटी' काव्य की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करती हैं। इसमें चंद्रमा की चंचल किरणें जल-थल में खेल रही हैं और स्वच्छ चाँदनी अवनि-अंबर (धरती-आकाश) में बिछी है। यह पंक्तियाँ चाँदनी रात की शीतलता, शांति और मनमोहक दृश्य का चित्रण करती हैं।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥
किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।
सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!
और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!

Saturday, 28 February 2026

कालिदास! सच-सच बतलाना.....इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे?


 बाबा नागार्जुन की इस कविता में कालिदास के प्रति एक प्रकार की जिज्ञासा और उनके साहित्य के प्रति एक गहरी संवेदना छिपी है।

यह कविता रति के विलाप (कुमारसंभव) और यक्ष की वेदना (मेघदूत) में कालिदास की व्यक्तिगत भावनाओं को उजागर करती है। नागार्जुन पूछते हैं कि क्या वेदना की चरम सीमा पर यक्ष रोया था या तुम (कालिदास) रोए थे।

कविता में प्रकृति का चित्रण विशेषकर वर्षा ऋतु में यक्ष का अपनी प्रियतमा को याद करना मार्मिक रूप से प्रस्तुत है। यह कविता कवि की मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रश्न पूछती है और कालिदास की रचनाओं में निहित दर्द को उजागर करती है। 




ये ही है वो कालजई कव‍िता...आप भी पढ़‍िए ...  

कालिदास! सच-सच बतलाना

इन्दुमती के मृत्युशोक से

अज रोया या तुम रोये थे?

कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से

निकली हुई महाज्वाला में

घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम

कामदेव जब भस्म हो गया

रति का क्रंदन सुन आँसू से

तुमने ही तो दृग धोये थे

कालिदास! सच-सच बतलाना

रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका

प्रथम दिवस आषाढ़ मास का

देख गगन में श्याम घन-घटा

विधुर यक्ष का मन जब उचटा

खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर

चित्रकूट से सुभग शिखर पर

उस बेचारे ने भेजा था

जिनके ही द्वारा संदेशा

उन पुष्करावर्त मेघों का

साथी बनकर उड़ने वाले

कालिदास! सच-सच बतलाना

पर पीड़ा से पूर-पूर हो

थक-थककर औ' चूर-चूर हो

अमल-धवल गिरि के शिखरों पर

प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?

रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

#नागार्जुन


Wednesday, 25 February 2026

ह‍िन्दीनामा में आज अष्टभुजा की #काशी पर ल‍िखी ये कव‍िता पढ़ी...

 
सभ्यता का जल यहीं से जाता है

सभ्यता की राख यहीं आती है

लेकिन यहाँ से सभ्यता की कोई हवा नहीं बहती

न ही यहाँ सभ्यता की कोई हवा आती है

यह बनारस है

चाहे सारनाथ की ओर से आओ या लहरतारा की ओर से

वरुणा की ओर से आओ या गंगा की ओर से

इलाहाबाद की ओर से आओ या मुग़लसराय की ओर से

डमरू वाले की सौगंध

यह बनारस यहीं और इसी तरह मिलेगा

ठगों से ठगड़ी में

संतों से सधुक्कड़ी में

लोहे से पानी में

अँग्रेज़ों से अँग्रेज़ी में

पंडितों से संस्कृत में

बौद्धों से पालि में

पंडों से पंडई और गुंडों से गुंडई में

और निवासियों से भोजपुरी में

बतियाता हुआ यह बहुभाषाभाषी बनारस है

गुरु से संबोधन करके

किसी गाली पर ले जाकर पटकने वाले

बनारस में सब सबके गुरु हैं

रिक्शेवाला गुरु है

पानवाला गुरु है

पंडे, मल्लाह, मुल्ला, माली और डोम गुरु हैं

नाई गुरु है, क़साई गुरु है, भाई गुरु है

कॉमरेड गुरु हैं

शिष्य गुरु हैं और गुरु तो गुरु हैं ही

लेकिन गुरु के बारे में सबके अनुभव अलग-अलग हैं

किसी के लेखे गंगा ही गुरु हैं

किसी के लेखे ज्ञान ही गुरु है

किसी के लेखे स्त्री गुरु है

किसी के लिए सीढ़ी ही गुरु है

जबकि किसी के लिए ठेस ही गुरु है

बनारस में

बनारसी बाघ हैं

बनारसी माघ हैं

बनारसी घाघ हैं

बनारसी जगन्नाथ हैं

शैव हैं, वैष्णव हैं, सिद्ध हैं, बौद्ध कबीरपंथी, नाथ हैं

जगह-जगह लगती हैं यहाँ लोक-अदालतें

कहने को तो कचहरी भी है बनारस में

लेकिन यहाँ सबकी गवाह गंगा

और न्यायाधीश विश्वनाथ हैं

धन से धर्म नहीं होता बनारस में,

धर्म से धन होता है

जब बनारसी देवी रोती है

तब बनारसी दास सोता है

किसी को जोगी, किसी को जती

किसी को मल्लाह, किसी को पंडा

किसी को कवि, किसी को भाँड़

किसी को भँगेड़ी-गँजेड़ी, किसी को साँड़

बना देता है बनारस

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा... सिद्धिदात्री

आदि नवदुर्गा, भैरव, संकटमोचन आदि

बज्रहृदय पत्थर के देवी-देवता खड़े हैं

ताकते हैं टुकुर-टुकुर

गंगा भी खड़ी हैं यहाँ

पानी की प्रतिमा बनी है बनारस में

बनारस में

फूल—बिकते हैं

मालाएँ—बिकती हैं

चंदन—बिकता है

प्रसाद—बिकता है

देह—बिकती है

साहित्य—बिकता है

सुख नहीं बिकता बनारस में

फिर भी सुख प्राप्त होता है

रात का कालिख धोकर सूर्य

प्रतिदिन बनारस के मुँह में चंदन लगा देता है

इस तरह बनारस

अपना अंडा अपने माथे पर सेता है

बनारस गलियों में जीता है

और घाटों पर मुक्ति लेता है

इस तरह विश्व को

जीवन की सीख देता है

बनारस में

मल्ल हैं, अखाड़े हैं, मठ हैं, आश्रम हैं

व्यायाम, प्राणायाम हैं

यहाँ सबका बदन गीला है

लेकिन जाने क्यों

हर आदमी थोड़ा-थोड़ा ढीला है

किसी बनारसी को परिचय-पत्र की ज़रूरत नहीं होती

लगता है समूचा बनारस

गंगा की केवल एक बूँद से बना है

मूल है गंगा, बनारस तना है

जो भी बनारस जाता है

कोई सिर के बाल, कोई जेब, कोई मन, कोई तन

अर्थात् कुछ न कुछ खोकर आता है

और जब कोई यहाँ से जाता है

हरी झंडी की तरह

बनारस अपने दोनों हाथ हिलाता है।

- अष्टभुजा शुक्ल

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...