Sunday, 9 August 2020

पुण्‍यतिथि विशेष: वंचित समाज की आवाज रहे कवि मलखान सिंह

दलित और वंचित समाज की आवाज माने जाने वाले प्रसिद्ध कवि मलखान सिंह की आज पुण्‍यतिथि है। 30 सितंबर 1948 के दिन उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्मे मलखान सिंह का निधन 09 अगस्‍त 2019 को हुआ था। मलखान सिंह समाज में शोषितों की सशक्त आवाज थे। लोगों ने कहा कि वह एक अपने आप में आंदोलन थे।
कवि मलखान सिंह हिन्दी दलित कविता के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। ‘सुनो ब्राह्मण’ कविता संग्रह से उन्होंने दलित कविता की भाषा शिल्प और कहने को नया अंदाज दिया था।
कवि मलखान सिंह का जाना सामाजिक न्याय की एक बुलंद आवाज का चले जाना है। सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें क्रांतिकारी बताते हुए नमन किया है। उनकी कुछ प्रमुख कृतियां हैं- सफेद हाथी, सुनो ब्राह्मण, एक पूरी उम्र, पूस का एक दिन, आजादी और ज्वालामुखी के मुहाने। कथाकार कैलाश वानखड़े ने कहा कि कवि मलखान सिंह नहीं रहे। दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान। विनम्र आदरांजलि।
मलखान सिंह की प्रमुख कविताएं…
सुनो ब्राह्मण
हमारे पसीने से बू आती है, तुम्हें।
तुम, हमारे साथ आओ
चमड़ा पकाएंगे दोनों मिल-बैठकर।
शाम को थककर पसर जाओ धरती पर
सूँघो खुद को
बेटों को, बेटियों को
तभी जान पाओगे तुम
जीवन की गंध को
बलवती होती है जो
देह की गंध से।
सफेद हाथी
गाँव के दक्खिन में पोखर की पार से सटा,
यह डोम पाड़ा है –
जो दूर से देखने में ठेठ मेंढ़क लगता है
और अन्दर घुसते ही सूअर की खुडारों में बदल जाता है।
यहाँ की कीच भरी गलियों में पसरी
पीली अलसाई धूप देख मुझे हर बार लगा है कि-
सूरज बीमार है या यहाँ का प्रत्येक बाशिन्दा
पीलिया से ग्रस्त है।
इसलिए उनके जवान चेहरों पर
मौत से पहले का पीलापन
और आँखों में ऊसर धरती का बौनापन
हर पल पसरा रहता है।
इस बदबूदार छत के नीचे जागते हुए
मुझे कई बार लगा है कि मेरी बस्ती के सभी लोग
अजगर के जबड़े में फंसे जि़न्दा रहने को छटपटा रहे है
और मै नगर की सड़कों पर कनकौए उड़ा रहा हूँ ।
कभी – कभी ऐसा भी लगा है कि
गाँव के चन्द चालाक लोगों ने लठैतों के बल पर
बस्ती के स्त्री पुरुष और बच्चों के पैरों के साथ
मेरे पैर भी सफेद हाथी की पूँछ से
कस कर बाँध दिए है।
मदान्ध हाथी लदमद भाग रहा है
हमारे बदन गाँव की कंकरीली
गलियों में घिसटते हुए लहूलूहान हो रहे हैं।
हम रो रहे हैं / गिड़गिड़ा रहे है
जिन्दा रहने की भीख माँग रहे हैं
गाँव तमाशा देख रहा है
और हाथी अपने खम्भे जैसे पैरों से
हमारी पसलियाँ कुचल रहा है
मवेशियों को रौद रहा है, झोपडि़याँ जला रहा है
गर्भवती स्त्रियों की नाभि पर
बन्दूक दाग रहा है और हमारे दूध-मुँहे बच्चों को
लाल-लपलपाती लपटों में उछाल रहा है।
इससे पूर्व कि यह उत्सव कोई नया मोड़ ले
शाम थक चुकी है,
हाथी देवालय के अहाते में आ पहुँचा है
साधक शंख फूंक रहा है / साधक मजीरा बजा रहा है
पुजारी मानस गा रहा है और बेदी की रज
हाथी के मस्तक पर लगा रहा है।
देवगण प्रसन्न हो रहे हैं
कलियर भैंसे की पीठ चढ़ यमराज
लाशों का निरीक्षण कर रहे हैं।
शब्बीरा नमाज पढ़ रहा है
देवताओं का प्रिय राजा मौत से बचे
हम स्त्री-पुरूष और बच्चों को रियायतें बाँट रहा है
मरे हुओं को मुआवजा दे रहा है
लोकराज अमर रहे का निनाद
दिशाओं में गूंज रहा है…
अधेरा बढ़ता जा रहा है और हम अपनी लाशें
अपने कन्धों पर टांगे संकरी बदबूदार गलियों में
भागे जा रहे हैं / हाँफे जा रहे हैं
अँधेरा इतना गाढ़ा है कि अपना हाथ
अपने ही हाथ को पहचानने में
बार-बार गच्चा खा रहा है।
एक पूरी उम्र
यक़ीन मानिए
इस आदमख़ोर गाँव में
मुझे डर लगता है
बहुत डर लगता है।
लगता है कि बस अभी
ठकुराइसी मेंढ़ चीख़ेगी
मैं अधसौंच ही
खेत से उठ जाऊँगा
कि अभी बस अभी
हवेली घुड़केगी
मैं बेगार में पकड़ा जाऊँगा
कि अभी बस अभी
महाजन आएगा
मेरी गाड़ी-सी भैंस
उधारी में खोल ले जाएगा
कि अभी बस अभी
बुलावा आएगा
खुलकर खाँसने के
अपराध में प्रधान
मुश्क बाँधकर मारेगा
लदवाएगा डकैती में
सीखचों के भीतर
उम्र भर सड़ाएगा।

Sunday, 26 July 2020

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कारावास यात्रा करने वाली कवयित्री विद्यावती ‘कोकिल’ की कव‍िताऐं

प्रसिद्ध कवयित्रियों में स्थान रखने वाली विद्यावती ‘कोकिल’ का आज जन्‍मदिन है। विद्यावती का जन्‍म 26 जुलाई 1914 के दिन मुरादाबाद के हसनपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
उनकी प्रारम्भिक रचनाओं का प्रथम काव्य-संकलन प्रणय, प्रगति एवं जीवनानुभूति के हृदयग्राही गीत संग्रह-रूप में प्रकाशित हुआ था। कोकिल जी मूलत: एक गीतकार थीं। गीति-तत्त्व की सहज तरलता उनकी कविताओं की आंतरिक विशेषता है।
विद्यावती ‘कोकिल’ के जीवन का अधिकांश समय प्रयागराज में बीता। इनका परिवार पुराना आर्य समाजी तथा देश-भक्त रहा है। स्कूल-कॉलेज काल से ही इनकी काव्य-साधना प्रारम्भ हो गई थी। अखिल भारत के काव्य-मंचों एवं आकाशवाणी केन्द्रों से फैलती हुई इनकी सहज-मधुर काव्य-स्वरलहरी इनके ‘कोकिल’ उपनाम को सार्थक करती रही है। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ में इन्होंने कारावास यात्रा भी की। अनेक सेवा-संस्थाएँ तथा जनायोजन इनके सहयोग से सम्पन्न होते रहे। इन्होंने पाण्डीचेरी के ‘अरविन्द आश्रम’ में भी समय व्यतीत किया और अरविन्द दर्शन को कवि-सहज अनुभूतियों प्रदान कीं।
सन 1942 ई. में ‘माँ’ नाम से इनका द्वितीय काव्य-संग्रह सामने आया। सम्पूर्ण विश्व को प्रजनन की एक महाक्रिया मानकर मातृत्व की विकासोन्मुख अभिव्यक्ति एवं लोरियों के माध्यम द्वारा ‘माँ’ में जीव के एक सतत विकास की कथा का द्योतन इस रचना का लक्ष्य है।
सन 1952 में इनकी ‘सुहागिन’ नाम की तृतीय कृति प्रकाश में आयी। इस संकलन के ‘अब घर नहीं रहा, मन्दिर है’ और ‘तुझे देश-परदेश भला क्या?’ आदि गीत जहाँ एक ओर सुहाग का एक विशद एवं महान् रूप उपस्थित करते हैं, वहीं स्वर के आलोक में परम-तत्त्व के साथ तादात्म्य और अंतर्मिलन का मर्मस्पर्शी स्वरूप भी उद्धाटित करते हैं। इस कृति ने विद्यावती ‘कोकिल’ जी के गीतकार को महिमान्वित किया है।
अरविन्द के लोक-परलोक एवं भूत-अध्यात्म के समन्वयवादी अद्वैत से विद्यावती विशेष प्रभावित हैं। इनके काव्य में अरविन्द दर्शन को नारी-हृदय की अनुभूति का कोमल परिधान मिला है।
विद्यावती ‘कोकिल’ की कव‍िताएं-  
मुझको तेरी अस्ति छू गई है
अब न भार से विथकित होती हूँ
अब न ताप से विगलित होती हूँ
अब न शाप से विचलित होती हूँ
जैसे सब स्वीकार बन गया हो।
मुझको तेरी अस्ति छू गई है।
पर्वत का हित मुझको जड़ न बनाता
प्रकृति हृदय का तम न मुझको ढँक पाता
आज उदधि का ज्वार न मुझे डुबोता
जैसे सब शृंगार बन गया हो।
मुझको तेरी अस्ति छू गई है।
दरिद्रता का यह मतवाला नर्तन
पीड़ाओं का उसमें आशिष-वर्षन
तेरी चितवन का जो मूक प्रदर्शन
तेरी मुख-अनुहार बन गया हो।
मुझको तेरी अस्ति छू गई है।
……
निंदिया बहुत ललन को प्यारी
अपने प्राणों को दीपक कर, जीवन को कर बाती,
सिरहाने बैठी-बैठी हूं कब से उसे जगाती,
भभक उठी है छाती मेरी, आंखें हैं कुछ भारी।
निंदिया बहुत ललन को प्यारी।
कभी हंसाने से न हंसा वह ऐसा असमझ भोरा,
सोते-सोते हंसा नींद में, मेरा कौन निहोरा,
प्रतिदिन मन मारे रह जाती कितनी उत्सुकता री।
निंदिया बहुत ललन को प्यारी।
कौन कथा कहकर न जाने परियां उसे हंसातीं,
मेरी कथा लड़खड़ाती-सी चुंबन में रह जाती।
मैं रह जाती हूं कहने को मन ही मन कुछ हारी।
निंदिया बहुत ललन को प्यारी।
……
कौन गाता जा रहा है?
मौनता को शब्द देकर
शब्द में जीवन सँजोकर
कौन बन्दी भावना के
पर लगाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?
घोर तम में जी रहे जो
घाव पर भी घाव लेकर
कौन मति के इन अपंगों
को चलाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?
कौन बिछुड़े मन मिलाता
और उजड़े घर बसाता
संकुचित परिवार का
नाता बढ़ाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?
मृत्तिका में आज फिर
निर्माण का सन्देश भर कर
खंडहरों के गिरे साहस
को उठाता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?
फटा बनकर ज्योति-स्रावक
जोकि हिमगिरी की शिखा-सा
कौन गंगाधर-सा
अविरोध बहता जा रहा है?
कौन गाता जा रहा है?

Sunday, 5 July 2020

साह‍ित्यकार ज्योति खरे के जन्मद‍िन पर आज पढ़‍िए उनकी ये कुछ कव‍ितायें

आज साह‍ित्यकार ज्योति खरे का जन्मद‍िन है,  5 जुलाई, 1956 को जन्मे श्री खरे अपने बारे में बताते हुए ल‍िखते हैं – “...अम्मा ने सिखाया कि भोग रहे यथार्थ को सहना पड़ता है। सम्मान और अपमान होते क्षणों में मौन रहकर समय को परखना पड़ता है...आदमी के भीतर पल रहे आदमी का यही सच है। और आदमी होने का सुख भी यही है।”

आज इतने वर्षों बाद वो सोशल मीडिया के सबसे ज़्यादा फ़ॉलो किए जाने वाले शीर्ष कवियों में से एक हैं, और विगत तीस-एक वर्षों से भारत के लगभग सभी प्रिन्ट मीडिया में छप चुके हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर भी वो पिछले तीन दशकों से अनवरत प्रसारित हो रहे हैं।

पढ़‍िए उनकी ये कव‍ितायें 

1.
जीवन के खेल में साँस रखी दाँव
दहशत की
धुन्ध से घबराया गाँव
भगदड़ में भागी धूप
और छाँव

अपहरण
गुण्डागिरी, खेत की सुपारी
दरकी ज़मीन पर मुरझी फुलवारी
मिट्टी को पूर रहे छिले
हुऐ पाँव

कटा फटा
जीवन खूँटी पर लटका
रोटी की खातिर गली-गली भटका
जीवन के खेल में साँस
रखी दाँव

प्यासों का
सूखा इकलौता कुआँ
उड़ रहा लाशों का मटमैला धुआँ
चुल्लू भर झील में डूब
रही नाँव।


2. उँगलियाँ सी लें

सूख गई सदियों की
भरी हुई झीलें
भूमिगत गिनते हैं
खपरीली कीलें

दीमकों को खा रहा
भूखा कबूतर
छेदता आकाश
पालतू तीतर
पर कटे कैसे उड़ें
पली हुई चीलें

कौन देखे बार-बार
बिके हुए जिराफ़
गोंद से चिपका नहीं
छिदा हुआ लिहाफ़
खिन्नियों की सोचकर
नीम छीलें

आवरण छोटा पड़ेगा
एक तरफ़ा ढाँकने में
छिपकली सफल है
दृष्टियों को आँकने में
बढ़ न पाएँ पोर सीमित
उँगलियाँ सी लें।

3. टपकी नीम जेठ मास में

अनजाने ही मिले अचानक
एक दोपहरी जेठ मास में
खड़े रहे हम नीम के नीचे
तपती गरमी जेठ मास में

प्यास प्यार की लगी हुई
होंठ माँगते पीना
सरकी चुनरी ने पोंछा
बहता हुआ पसीना
रूप साँवला हवा छू रही
महकी नीम जेठ मास में

बोली अनबोली आंखें
पता माँगती घर का
लिखा धूप में उँगली से
ह्रदय देर तक धड़का
कोलतार की सड़क ढूँढ़ती
पिघली नीम जेठ मास में

स्मृतियों के उजले वादे
सुबह-सुबह ही आते
भरे जलाशय शाम तलक
मन के सूखे जाते
आशाओं के बाग़ खिले जब
टपकी नीम जेठ मास में।

प्रस्तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह 

Thursday, 2 July 2020

प्रसिद्ध हिन्दी जनकवि आलोक धन्‍वा का जन्‍मदिन आज

प्रसिद्ध हिन्दी जनकवि आलोक धन्‍वा का जन्‍म 02 जुलाई 1948 को बिहार के मुंगेर में हुआ था।
आलोक धन्वा हिन्दी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने 70 के दशक में कविता को एक नई पहचान दी। उनकी गोली दागो पोस्टर, जनता का आदमी, कपड़े के जूते और ब्रूनों की बेटियाँ जैसी कविताएँ बहुचर्चित रही है। ‘दुनिया रोज़ बनती है’ उनका बहुचर्चित कविता संग्रह है। इनकी कविताओं के अंग्रेज़ी और रूसी भाषा में अनुवाद भी हुये हैं।

व्यक्तित्व
जनकवि “आलोक धन्वा” नई पीढ़ी के लिए एक हस्ताक्षर हैं। इस जनकवि ने जनता की आवाज़ में जनता के लिए सृजन कार्य किया है। “भागी हुई लड़कियां”, जिलाधीश, गोली दागो पोस्टर सरीखी कई प्रासंगिक रचनाएं इनकी पूंजी हैं। सहज और सुलभ दो शब्द इनके व्यक्तित्व की पहचान हैं। हर नुक्कड़ नाटक में धन्वा उपस्थित होते हैं। केवल उपस्थिति नहीं उसे बल भी देते हैं। इस जनकवि के लिए कई बड़े मंच दोनों हाथ खोल कर स्वागत करते हैं। हालांकि बकौल धन्वा उन्हें जनता के मंच पर रहना ही बेहतर लगता है। सलीके से फक्कड़ता को अपने साथ रखने वाले आलोक धन्वा बेहद संवेदनशील हैं। इनका व्यक्तित्व इनकी संवेदना कतई व्यक्तिगत नहीं रहा है। कवि धन्वा की रचनाओं में सार्वजनिक संवेदना, सार्वजनिक मानव पीड़ा, पीड़ा का विरोध, मर्म सब कुछ गहराई तक उतरता है जो हमें संवेदित ही नहीं आंदोलित भी करता है।
आलोक धन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तराशी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है, जिसमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है।
उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान मिले हैं।
पढ़‍िए उनकी लंबी कव‍िता
भागी हुई लड़कियाँ
 एक
घर की ज़ंजीरें
कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भागती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
सिर्फ़ आँखों की बेचैनी दिखाने-भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपर्दों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले !

क्या तुम यह सोचते थे कि
वे गाने सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गये थे ?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी ज़िदगियों में फैल जाता था?
दो
तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं
कभी वह ख़त
जिसे भागने से पहले वह
अपनी मेज़ पर रख गयी
तुम तो छिपाओगे पूरे ज़माने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा, उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफ़ी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीज़ों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूँज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
संतूर की तरह
केश में

तीन
उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहाँ से भी मिटाओगे
 
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहाँ से भी
मैं जानता हूँ
कुलीनता की हिंसा !
 
लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जायेगी
पुरानी पवन चक्कियों की तरह
 
वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अंतिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियाँ होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में
 
लड़की भागती है
जैसे फूलों में गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में
 
चार
अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा
 
कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे टैंक जैसे बंद और मज़बूत
घर से बाहर
लड़कियाँ काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा
कि तुम अब
उनकी संभावना की भी तस्करी करो
 
वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह ख़ुद शामिल होगी सब में
ग़लतियाँ भी ख़ुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी
शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जायेगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी
 
पाँच
लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आर-पार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है !
 
तुम जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेख़ौफ़ भटकती है
ढूँढ़ती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रेमिकाओं में !
 
अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में भी
जहाँ प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा !
 
छह

कितनी-कितनी लड़कियाँ
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे, अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है
 
क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?
 
क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं ?
क्या तुम्हें दांपत्य दे दिया गया ?
क्या तुम उसे उठा लाये
अपनी हैसियत, अपनी ताक़त से ?
तुम उठा लाये एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
जिसके निधन के बाद की भी रातें !
 
तुम नहीं रोये पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर
 
सिर्फ़ आज की रात रूक जाओ
तुम से नहीं कहा किसी स्त्री ने
 
सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
कितनी-कितनी बार कहा कितनी
स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाज़ों तक दौड़ती हुई आयीं वे
सिर्फ़ आज की रात रूक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ़ आज की रात भी रहेगी।
(1988)



Saturday, 6 June 2020

हर शाख पे उल्लू बैठा है… के रचयिता थे शौक बहराइची

मशहूर शायर शौक़ बहराइची का जन्म 6 जून 1884 को अयोध्या के सैयदवाड़ा मोहल्ले में हुआ था। शौक़ का वास्तविक नाम ‘रियासत हुसैन रिज़वी’ था। शौक़ का मृत्यु: 13 जनवरी 1964 को हुई।
नेताओं व ग़लत कार्यों में लिप्त व्यक्तियों पर कटाक्ष करने के लिए लिखा गया उनका एक शेर देश में सर्वाधिक इस्तेमाल होता है पर बहुत कम ऐसे लोग हैं, जिन्हें यह पता होगा कि इस शेर को लिखने वाले शायर का नाम ‘शौक़ बहराइची’ है।
वो शेर है-
‘बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है
हर शाख पे उल्लू बैठें हैं अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा।’
जीवन परिचय
शौक़ एक साधारण मुस्लिम शिया परिवार में पैदा हुए जो बाद में बहराइच जाकर बस गए। इस कारण इनके नाम से बहराइची जुड़ गया। यहीं पर उन्होंने ग़रीबी में भी शायरी से नाता जमाए रखा। रियासत हुसैन रिज़वी यहां ‘शौक़ बहराइची’ के नाम से शायरी के नए आयाम गढ़ने लगे। उनके बारे में जो भी जानकारी प्रामाणिक रूप से मिलती है, वह उनकी मौत के तकरीबन 50 साल बाद बहराइच जनपद के निवासी व लोक निर्माण विभाग के रिटायर्ड इंजीनियर ताहिर हुसैन नक़वी के नौ वर्षों की मेहनत का नतीजा है। उन्होंने उनके शेरों को संकलित कर ‘तूफ़ान’ किताब की शक्ल दी गयी है।
ग़रीबी में बीता जीवन
ताहिर नक़वी बताते हैं “जितने मशहूर अंतर्राष्‍ट्रीय शायर शौक़ साहब हुआ करते थे उतनी ही मुश्किलें उनके शेरों को ढूँढने में सामने आईं। निहायत ही ग़रीबी में जीने वाले शौक़ की मौत के बाद उनकी पीढ़ियों ने उनके कलाम या शेरों को सहेजा नहीं।
ऐसे में ताहिर को अपनी खोज के दौरान तमाम शेर कबाड़ी की दुकानों से खुशामत करके और ढूंढ-ढूंढकर खोजने पड़े”। शौक़ बहराइची की एक मात्र आयल पेंटिग वाली फोटो के बारे में ताहिर नक़वी बताते हैं “यह फोटो भी हमें अचानक एक कबाड़ी की ही दुकान पर मिल गई अन्यथा इनकी कोई भी फोटो मौजूद नहीं थी।” व्यंग्‍य जिसे उर्दू में तंज ओ मजाहिया कहा जाता है, इसी विधा के शायर शौक़ ने अपना वह मशहूर शेर बहराइच की कैसरगंज विधानसभा से विधायक और 1957 के प्रदेश मंत्री मंडल में कैबिनेट स्वास्थ मंत्री रहे हुकुम सिंह की एक स्वागत सभा में पढ़ा था, जहाँ से वह मशहूर होता ही चला गया। ताहिर नक़वी बताते हैं कि यह शेर जो प्रचलित है उसमें और उनके लिखे में थोड़ा सा अंतर कहीं कहीं होता रहता है। वह बताते हैं कि सही शेर यह है “बर्बाद ऐ गुलशन कि खातिर बस एक ही उल्लू काफ़ी था, हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलशन क्या होगा”


गुमनाम शायर
शौक़ बहराइची की मौत के बाद भी उनकी कहीं कोई सुध ना लेना एक मशहूर शायर को गुमनाम मौत देने का जिम्मेदार माना जा सकता है। शौक़ की इस गुमनामियत पर उनका ही एक और मशहूर शेर सही बैठता है।
“अल्लाहो गनी इस दुनिया में, सरमाया परस्ती का आलम, बेज़र का कोई बहनोई नहीं, ज़रदार के लाखों साले हैं”
शौक़ बहराइची के बहराइच में बीते दिन काफ़ी ग़रीबी में रहे और यहाँ तक की उन्हें कोई मदद भी नहीं मिलती थी। आज़ादी के बाद सरकार की ओर से कुछ पेंशन बाँध देने के बाद भी जब पेंशन की रकम उन तक नहीं पहुंची तो बहुत बीमार चल रहे शायर शौक़ के मन ने उस पर भी तंज कर ही दिया।
“सांस फूलेगी खांसी सिवा आएगी, लब पे जान हजी बराह आएगी, दादे फ़ानी से जब शौक़ उठ जाएगा, तब मसीहा के घर से दवा आएगी”
-संकलित

Monday, 1 June 2020

यशस्वी कवि की बलदेव वंशी की जयंती पर पढ़िए उनकी कुछ रचनाएं


भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका निभाने वाले बलदेव वंशी इतने अच्छे कवि और लेखक थे कि उनके शब्दों की गूंज से हिंदी साहित्य जगत आज भी जाज्वल्यमान है. उनका जन्म 1 जून 1938 को मुलतान में हुआ था. उनकी कविताओं में स्वातंत्र्योत्तर भारत के मनुष्य की तकलीफ, संघर्ष और संवेदना को हृदयग्राही अभिव्यक्ति मिली है. उनकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के बीच एक अनोखा तादात्म्य लिए है. उनकी कविताएं एक तरफ दूर-निकट इतिहास के पत्र और परिवेश उठाकर समकालीन जीवन की संभावनाएँ तलाशती हैं तो दूसरी तरफ मिथकों को उठाकर उनके जरिये अपनी बात अपने तरीके से कहने की कोशिश करती हैं.
उनके लगभग पंद्रह कविता संकलन ‘दर्शकदीर्घा से’, ‘उपनगर में वापसी’, ‘अंधेरे के बावजूद’, ‘बगो की दुनिया’, ‘आत्मदान’, ‘कहीं कोई आवाज़ नहीं’, ‘टूटता हुआ तार’, ‘एक दुनिया यह भी’, ‘हवा में खिलखिलाती लौ’, ‘पानी के नीचे दहकती आग’, ‘खुशबू की दस्तक’, ‘सागर दर्शन’, ‘अंधेरे में रह दिखाती लौ, ‘नदी पर खुलता द्वार’, ‘मन्यु’, ‘वाक् गंगा’, ‘इतिहास में आग’, ‘पत्थर तक जाग रहे हैं’, ‘धरती हांफ रही है’, ‘महाआकाश कथा’, ‘पूरा पाठ गलत’, तथा ‘चाक पर चढ़ी’ नाम से प्रकाशित हो चुके हैं. इनके अलावा दस आलोचक पुस्तकों सहित पैंतालीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित रहीं. उन्होंने ‘दादू ग्रंथावली’, ‘सन्त मलूकदास ग्रंथावली’, ‘सन्त मीराबाई’ और ‘सन्त सहजो कवितावलियाँ’ नाम से भक्ति साहित्य पर भी बड़ा काम किया और ‘कबीर शिखर सम्मान’, ‘मलूक रत्‍न पुरस्कार’ और ‘दादू शिखर सम्मान’ आदि से सम्मनित हुए. 07 जनवरी 2018 को उनका निधन हुआ.
यशस्वी कवि की बलदेव वंशी की जयंती पर पढ़िए उनकी कुछ रचनाएं:
1.
सूर्योदय
सुरमई अंधकार था–
मछुआरी खपरैलों पर बिछा-बिछा
टूटी नावों पर रोया-सोया
भीतर-बाहर लिखा-दिखा
समूचे सागर पर अछोर
इसे बेचने आते हैं त्रिनेत्र !
लो !
देखते-देखते
आरक्त हो उठी
प्रति दिशा-दिशा
रंग गई प्रति लहर-लहर
खिल-खिला उठा राग-
अब जीवन जल
पुन: छलल छलल छलल…
2.
जन-समुद्र
समुद्र की लहरों के साथ
लोग खेलते हैं
जबकि समुद्र भी खेलता है लोगों के साथ…
लहरों को अपनी ओर आता देख
पाँव उचका
उछल जाते हैं कौतुकी लोग
पर ये लहरें
उन्हें अपने सर्पमुखी फन पर उठा
किनारे पर छोड़ आती हैं–
लो, यह तुम्हारा किनारा है
इसे थामो !
लहरें
लोगों के किनारे जानती हैं
जबकि इन लोगों को पता नहीं
समुद्र का किनारा कहाँ है
जब-जब किनारा लांघते हैं लोग
तो ये लहरें उन्हें भिगोती-उछालती ही नहीं
अपने में समो लती हैं
जिन हाथों से थपकी देती हैं मस्ती-भरी
उन्हीं से पकड़ कर
बरबस,
भीतर डुबो देती हैं !
क्योंकि इन बेचारे लोगों को
पता नहीं,
समुद्र का किनारा कहाँ है !
3.
अधूरा है: सुन्दर है
अधूरा है!
इसीलिए सुन्दर है!
दुधिया दाँतों तोतला बोल
बुनाई हाथों के स्पर्श का अहसास!
ऊनी धागों में लगी अनजानी गाँठें, उचटने
सिलाई के टूटे-छूटे धागे
चित्र में उभरी, बे-तरतीब रंगतें-रेखाएं
शायद इसीलिए
अभावों में भाव अधिक खिलते हैं,
चुभते सालते और खलते हैं
एक टीस की अबूझ स्मृति
जीवन भर सालने वाली
आकाश को दो फाँक करती तड़ित रेखा
और ऐसा ही और भी बहुत कुछ
जिसे लोग अधूरा या अबूझ मानते आए हैं
उसे ही सयाने लोग
पूरा और सुन्दर बखानते गए हैं
चाहे हुए रास्ते, जीवन और पूरे व्यक्ति
कहाँ मिलते हैं!
नियति के हाथों
औचक मिले
मानसिक घाव
पूरे कहाँ सिलते हैं!…
4.
कैनवास पर काली लकीरें
बड़े करीने से
आकाँक्षा को काटकर
सजा दिया था कैनवस पर
मौन क्रन्दन !
तुम्हारा आत्मविश्वास
सम्वेदन
दुर्लभ स्पन्द
और सन्तुलन !
बड़ी महीन और तीखी और नफ़ीस
लकीरें कुछ
उकेर दी थीं तुमने
बचपन की
कैनवास पर खिंची
काली लकीरें
कला की क्या-क्या ख़ूबियाँ
बयाँ करतीं…
अचानक एक दिन घर आए
एक माहिर चित्रकार ने देखा वह
कोरा कैनवास
तो चकित रह गया । देखता
कि कैसे एक भोला बचपन
खिंची उन लकीरों में
उधर का
क्या कुछ नहीं कह गया !…
5.
लड़की का इतिहास
हर बाग़ का एक इतिहास होता है जैसे-
इस बाग़ का भी अपना एक इतिहास है
हर व्यक्ति का एक इतिहास होता है जैसे
इस लड़की का भी अपना एक इतिहास है
हर लड़की एक बाग़ होती है जैसे
इस लड़की का भी अपना एक बाग़ है
सबसे पहले यह एक लड़की है
जो बाग़ लगाती हुई इतिहास बनाती है
साथ-साथ कई-कई क्यारियाँ
जुदा-जुदा कई-कई फुलवारियाँ सजाती है
ख़ुशबू और रंग का
पहचान और पहनावे का अलग-अलग सिलसिला…
क्योंकि वह लड़की बाग़ है
इसलिए फूलों को तोड़ने
और भँवरों के मंडराने पर रोक है…
लड़की की पदचापों के संकेतों पर
खिलते हैं फूल; महकती हैं फूलवारियाँ
लड़की की साँसों के सुरों में
गाते हैं पक्षी, सजती हैं क्यारियाँ
ख़ुशबू की दस्तकें
झक्क खिली हरियाली के कहकहे…
यों इन फूल-बेलों से भारी / क्यारियों से घिरे-
मक़बरों / और उनकी पथराई ख़ामोशियों का भी
अपना इतिहास है…
लड़की कहीं कुछ बेल-बीज बो कर
गाती-गुनगुनाती करती है इन्तज़ार-
बेलों के दीवारों पर चढ़ने
दीवारों को फांदने का…
फिर एक दिन
इन बेलों के नाज़ुक इरादों के साथ
लड़की दीवार फांद
इतिहास में बदल जाती है
यों बाग़ों का इतिहास-
लड़की का इतिहास है-
जहाँ मुर्दे-गड़े मक़बरें हैं जीवित
डबडबाए पानी के तालाब; फूलों के सघन झाड़
गाते पक्षियों के समूह, मंडराते भँवरों के झुंड
ख़ामोश दीवारों के लम्बे साए…
यहाँ और-और लड़कियाँ आईं
आती रहीं…
यहाँ और-और फूल खिले
खिलते रहे…
यहाँ और-और मक़बरे बने
बनते रहे…
यहाँ और-और बेलें खिलीं
खिलती रहीं…
अपनी ख़ुशबुओं महकी मिट्टी को
अंजुरी में उठाए,
टप-टप आँसुओं भिगोती रही लड़की
बाग़ में चोरी छिपे
आती रही लड़की
जाती रही लड़की
फूल और पत्थर के साथ-साथ होने के
नए-नए रिश्तों के साथ
फूल खिलते रहे
बेलें दीवारें फांदती रहीं
मक़बरों की दीवारें उन्हें देखती ख़ामोश…
यों बड़े-बड़े ऎतिहासिक बाग़ों को
बाग़ों के इतिहासों को
लड़की ने बनाया है
अपनी ख़ुशबूदार साँसों से
दीवार फांदनी बेलदार इच्छाओं
डबडबाए तालाबों
और मक़बरा बनती देहों से
सजाया है!
-Legend News

Thursday, 28 May 2020

ब्रजभाषा और पिंगल के मर्मज्ञ थे साहित्‍यकार एवं कवि पद्मश्री गोपाल प्रसाद व्‍यास

ब्रजभाषा और पिंगल के मर्मज्ञ साहित्‍यकार एवं कवि पद्मश्री गोपाल प्रसाद व्‍यास की आज पुण्‍यतिथि है। 13 फरवरी 1915 को मथुरा जिले के कस्‍बा गोवर्धन अंतर्गत पारसौली गांव में पैदा हुए पंडित गोपालप्रसाद व्यास हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। उनका निधन 28 मई 2005 को दिल्‍ली में हुआ।
पिंगल नामक एक भाषा-शैली का जन्म पूर्वी राजस्थान में, ब्रज क्षेत्रीय भाषा-शैली के उपकरणों को ग्रहण करते हुआ था। इस भाषा में चारण परंपरा के श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई। राजस्थान के अनेक चारण कवियों ने इस नाम का उल्लेख किया है।

व्यास को भारत सरकार ने पद्मश्री, दिल्ली सरकार ने शलाका सम्मान और उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से विभूषित किया था।
दिल्ली के हिंदी भवन का निर्माण कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। लाल किले पर हर वर्ष होने वाले राष्ट्रीय कवि सम्मेलन की शुरुआत में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है।
गोपाल प्रसाद व्‍यास की प्रारंभिक शिक्षा पहले पारसौली के निकट भवनपुरा में हुई और उसके बाद अथ से इति तक मथुरा में केवल कक्षा सात तक। स्वतंत्रता-संग्राम के कारण उसकी भी परीक्षा नहीं दे सके और स्कूली शिक्षा समाप्त हो गई। गोपाल प्रसाद व्‍यास ने पिंगल की पढ़ाई स्व. नवनीत चतुर्वेदी से की। अंलकार, रस-सिद्धांत आदि सेठ कन्हैयालाल पोद्दार से पढ़े। नायिका भेद का ज्ञान सैंया चाचा से और पुरातत्व, मूर्तिकला, चित्रकला आदि का डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल से। विशारद और साहित्यरत्न का अध्ययन तथा हिन्दी के नवोन्मेष का पाठ पढ़ा डॉ. सत्येन्द्र से।
गोपाल प्रसाद व्‍यास पत्रकारिता के क्षेत्र में भी खूब सक्रिय रहे। वे ‘साहित्य संदेश’ आगरा, ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ दिल्ली, ‘राजस्थान पत्रिका’ जयपुर, ‘सन्मार्ग’, कलकत्ता में संपादन तथा दैनिक ‘विकासशील भारत’ आगरा के प्रधान संपादक रहे। स्तंभ लेखन में भी सन्‌ 1937 से अंतिम समय तक निरंतर संलग्न रहे।
इसके अलावा व्‍यास जी ने ब्रज साहित्य मंडल मथुरा के संस्थापक और मंत्री से लेकर अध्यक्ष तक का दायित्‍व निभाया। दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक और 35 वर्षों तक महामंत्री और अंत तक संरक्षक। श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास समिति के संस्थापक महामंत्री के पद पर अंत तक रहे। लाल किले के ‘राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन’ और देशभर में होली के अवसर पर ‘मूर्ख महासम्मेलनों’ के जन्मदाता और संचालक भी व्‍यास जी ही थे।

पढ़िए गोपाल प्रसाद व्‍यास की कुछ चुनिंदा रचनाएं:
बुद्धिप्रकाश, विद्यासागर?
पर अब कुछ दिन को कहा मान,
तुम लाला मूसलचंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
यदि मूर्ख बनोगे तो प्यारे,
दुनिया में आदर पाओगे।
जी, छोड़ो बात मनुष्यों की,
देवों के प्रिय कहलाओगे!
लक्ष्मीजी भी होंगी प्रसन्न,
गृहलक्ष्मी दिल से चाहेंगी।
हर सभा और सम्मेलन के
अध्यक्ष बनाए जाओगे!
पढ़ने-लिखने में क्या रक्खा,
आंखें खराब हो जाती हैं।
चिंतन का चक्कर ऐसा है,
चेतना दगा दे जाती है।
इसलिए पढ़ो मत, सोचो मत,
बोलो मत, आंखें खोलो मत,
तुम अब पूरे स्थितप्रज्ञ बनो,
सच्चे संपूर्णानन्द बनो ।
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
मत पड़ो कला के चक्कर में,
नाहक ही समय गंवाओगे।
नाहक सिगरेटें फूंकोगे,
नाहक ही बाल बढ़ाओगे ।
पर मूर्ख रहे तो आस-पास,
छत्तीस कलाएं नाचेंगी,
तुम एक कला के बिना कहे ही,
छह-छह अर्थ बताओगे।
सुलझी बातों को नाहक ही,
तुम क्यों उलझाया करते हो?
उलझी बातों को अमां व्यर्थ में,
कला बताया करते हो!
ये कला, बला, तबला, सारंगी,
भरे पेट के सौदे हैं,
इसलिए प्रथमतः चरो,
पुनः विचरो, पूरे निर्द्वन्द्व बनो,
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
हे नेताओ, यह याद रखो,
दुनिया मूर्खों पर कायम है
मूर्खों की वोटें ज्यादा हैं,
मूर्खों के चंदे में दम है।
हे प्रजातंत्र के परिपोषक,
बहुमत का मान करे जाओ!
जब तक हम मूरख जिन्दा हैं,
तब तक तुमको किसका ग़म है?
इसलिए भाइयो, एक बार
फिर बुद्धूपन की जय बोलो !
अक्कल के किवाड़ बंद करो,
अब मूरखता के पट खोलो।
यह विश्वशांति का मूलमंत्र,
यह राम-राज्य की प्रथम शर्त,
अपना दिमाग गिरवीं रखकर,
खाओ, खेलो, स्वच्छंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
-Legend News
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