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Sunday, 1 September 2013

खुदाई को भी ऑक्‍सीजन चाहिये

आइना
खुद को इतना ऊंचा भी न उठा
न पाल खुदाई का फ़ितूर
ये इम्‍तिहान तेरा है, कि
दे अपने  होने का भी सबूत
कैसा खुदा है तू कि ना तो
बचा पाता है लाज किसीकी
न रख पाता है नाजो-ताज़

हरसूं बस नज़र आते रहना ही तो,
काम खुदा का नहीं होता
संभल जा अब भी वक्‍त है
ज़मीं की पेशानी पर पड़ रहे हैं बल
तेरे ही बंदे कर रहे हैं छल
हमारी तरह जीना भी सीख
ज़मीं पर पांव धरना भी सीख

खुदाई के नये पैमाने अब
गढ़ने का वक्‍त है
अभी तू है यहां, ये जहां खाली नहीं
 ये बताने का वक्‍त है
बता दे कि.. अभी तू बाकी है अहसासों में,
बता दे कि अभी तू है सिसकियों में- आवाज़ों में,
फिर.. फिर उठ खड़े होने वाले जज्‍़बों में
तेरा यूं मुंह छिपाना जायज़ नहीं
ए खुदा, सच कहती हूं
हर शै में हर पल,
इमरजेंसी के मरीज़ की तरह
अब तेरी खुदाई को भी
ऑक्‍सीजन चाहिये
खुदा बने रहना है तो
आ के देख, जी के देख ,
हंस के देख- तो साथ रो के भी देख
सिर्फ अपने होने का ही अहसास न करा।
- अलकनंदा सिंह

 
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