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Wednesday, 8 November 2023

अपने अपारम्परिक अंदाज़ के लिए मशहूर थे उर्दू शायर जौन एलिया, पढ़‍िए उनकी कुछ नज्में

 

भारत के प्रसिद्ध उर्दू शायर जौन एलिया का पूरा नाम सय्यद हुसैन जौन असग़र नक़वी था। 14 दिसम्बर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में पैदा हुए जौन एलिया का इंतकाल 8 नवम्बर 2002 पाकिस्‍तान के शहर कराची में हुआ। सादा लेकिन तीखी तराशी और चमकाई हुई ज़बान में निहायत गहरी और शोर अंगेज़ बातें कहने वाले हफ़्त ज़बान शायर, पत्रकार, विचारक, अनुवादक, गद्यकार, बुद्धिजीवी और स्व-घोषित नकारात्मकतावादी एवं अनारकिस्ट जौन एलिया एक ऐसे ओरिजनल शायर थे जिनकी शायरी ने न सिर्फ उनके ज़माने के अदब नवाज़ों के दिल जीत लिए बल्कि जिन्होंने अपने बाद आने वाले अदीबों और शायरों के लिए ज़बान-ओ-बयान के नए मानक निर्धारित किए। जौन एलिया ने अपनी शायरी में इश्क़ की नई दिशाओं का सुराग़ लगाया। वो बाग़ी, इन्क़िलाबी और परंपरा तोड़ने वाले थे लेकिन उनकी शायरी का लहजा इतना सभ्य, नर्म और गीतात्मक है कि उनके अशआर में मीर तक़ी मीर के नश्तरों की तरह सीधे दिल में उतरते हुए श्रोता या पाठक को फ़ौरी तौर पर उनकी कलात्मक विशेषताओं पर ग़ौर करने का मौक़ा ही नहीं देते। मीर के बाद यदा-कदा नज़र आने वाली तासीर की शायरी को निरंतरता के साथ नई गहराईयों तक पहुंचा देना जौन एलिया का कमाल है। 


जौन एलिया ने अपनी शाइरी की शुरुआत 8 साल की उम्र से की लेकिन उनका पहला काव्य संग्रह "शायद" उस वक़्त आया जब उनकी उम्र 60 साल की हो गयी थी और इसी किताब ने उनको शोहरत की बलन्दियों को पहुँचा दिया


पढ़‍िए उनकी कुछ नज़्में - 


तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे 

मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं 

मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें 

मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं 

इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर 

इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन 

मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता 

ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता 


2


हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम 

हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं 

तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम 

मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं 

तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में 

और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं 

तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं 

पस सर-ब-सर अज़िय्यत ओ आज़ार ही रहो 

बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुम 

जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो 

तुम को यहाँ के साया ओ परतव से क्या ग़रज़ 

तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो 

मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहा 

तुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो 

तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई 

इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो 

मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात 

मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो 

अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मिरे लिए 

बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो 

जब मैं तुम्हें नशात-ए-मोहब्बत न दे सका 

ग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सका 

जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं 

जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैं 

फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं 

तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं 


3

चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें 

और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल 

जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं 

बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ 

याद की इक किरन भी आ न सके 

चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें 

और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें 

जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं 

जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था 


4

धुँद छाई हुई है झीलों पर 

उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर 

सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़ 

बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़ 

अपने गल्लों को ले के चरवाहे 

सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे 

दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ 

अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ 



वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा 

वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा 

किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार 

किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार 

गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए 

और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए 

रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं 

कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं 

वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी 

जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी 

मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं 

ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं 

दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं 

वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं 


Tuesday, 17 March 2020

आज के ही दिन उर्दू शायर दाग़ देहलवी ने छोड़ दी थी दुनिया

25 May 1831 को दिल्‍ली में जन्‍मे दाग़ देहलवी का 17 मार्च 1905 को हैदराबाद में इंतकाल हुआ था। नवाब मिर्जा खाँ ‘दाग़’ , उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे। इनके पिता शम्सुद्दीन खाँ नवाब लोहारू के भाई थे। जब दाग़ पाँच-छह वर्ष के थे तभी इनके पिता मर गए। इनकी माता ने बहादुर शाह “ज़फर” के पुत्र मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया, तब यह भी दिल्ली में लाल किले में रहने लगे। यहाँ दाग़ को हर प्रकार की अच्छी शिक्षा मिली। यहाँ ये कविता करने लगे और जौक़ को गुरु बनाया। सन् 1856 में मिर्जा फखरू की भी मृत्यु हो गई।
सन् 1890 ई. में दाग़ हैदराबाद गए और निज़ाम के कविता गुरु नियत हो गए। इन्हें यहाँ धन तथा सम्मान दोनों मिला और यहीं सन् 1905 ई. में फालिज से इनकी मृत्यु हुई।

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था

न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़
कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमामकिसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

अगर्चे देखने वाले तेरे हज़ारों थे
तबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम किसका था

हर इक से कहते हैं क्या 'दाग़' बेवफ़ा निकला

ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था.

दाग़ नाम शायद उन्हें रास न आया

अपने भीतर के शायर के लिए उन्होंने दाग नाम चुना था और देहलवी यानी दिल्लीवाला को उन्होंने अपना तखल्लुस बनाया। पर दाग़ नाम शायद उन्हें रास न आया। उनका जीवन भी उनके नाम की तरह ही दर्द, जख्म और बेदखली की बानगी से भरा रहा। साल 1856 में मिर्जा फखरू की मौत होने के दूसरे ही साल बलवा शुरू हो गया. मजबूरन दाग ने दिल्ली छोड़ दिया, वह रामपुर चले गए लेकिन मन से कभी दिल्ली को भूल नहीं पाए। स्थान परिवर्तन का यह गम उन्हें जिंदगी भर सालता रहा।
दाग़ देहलवी 1857 की तबाहियों से गुजरे थे। दिल्ली के गली-मोहल्लों में लाशों का नज़ारा उन्होंने देखा था। उनकी शायरी में दर्द और नयेपन के मिश्रण का ऐसा घोल है, जिसे पढ़ने के बाद लंबे समय तक उसमें खोए रहने का मन करता है। उनकी शायरी में दिल्ली की तहजीब नजर आती है। छोटी उम्र में पिता को खोने का दर्द, मां की दूसरी शादी, जिस दिल्ली से उन्हें बेहद लगाव, उसी दिल्ली से उनकी रूखसत, और जिस प्यार को उन्होंने गले लगाना चाहा उस प्यार से भी रुसवाई… दाग की ज़िंदगी और उनकी शायरी दोनों ही ऐसे फलसफों से भरी है।
आज दाग़ देहलवी को दुनिया से रुखसत हुए भले ही करीब 25 साल गुजर गए हों पर उनकी शायरी आज भी गुनगुनाई जाती है-
ब’अद मुद्दत के ये ऐ ‘दाग़’ समझ में आया।
वही दाना है कहा जिस ने न माना दिल का।।

Monday, 25 November 2019

हिंदुस्‍तान को जानने के लिए नज़ीर को जानना होगा

जैसा कि नाम से जाहिर होता है भारतीय उर्दू शायर नज़ीर बनारसी का जन्‍म 25 नवम्बर 1909 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की पांडे हवेली मदपुरा में हुआ था।
एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…
‘‘न जाने इस जमाने के दरिन्दे
कहां से उठा लाए चेहरा आदमी का’’
इसके बावजूद नज़ीर ताकीद करते हुए कहते हैं-
‘‘वहां भी काम आती है मोहब्बत
जहां नहीं होता कोई किसी का’’
अपनी कहानी अपनी जुबानी में खुद नज़ीर कहते हैं, ‘‘मैं जिन्दगी भर शान्ति, अहिंसा, प्रेम, मुहब्बत आपसी मेल मिलाप, इन्सानी दोस्ती, आपसी भाईचारा…. राष्ट्रीय एकता का गुन आज ही नहीं 1935 से गाता चला आ रहा हूं।
मेरी नज्में हो गजलें, गीत हो या रूबाईयां….. बरखा रुत हो या बस्त ऋतु, होली हो या दीवाली, शबे बारात हो या ईद, दशमी हो या मुहर्रम इन सबमें आपको प्रेम, प्यार, मुहब्बत, सेवा भावना, देशभक्ति ही मिलेगी। मेरी सारी कविताओं की बजती बांसुरी पर एक ही राग सुनाई देगा वह है देशराग…..मैंने अपने सारे कलाम में प्रेम प्यार मुहब्बत को प्राथमिकता दी है।
हालात चाहे जैसे भी रहे हो, नज़ीर ने उसका सामना किया, न खुद बदले और न अपनी शायरी को बदलने दिया। कहीं आग लगी तो नज़ीर की शायरी बोल उठी-
‘‘अंधेरा आया था, हमसे रोशनी की भीख मांगने
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?’’
गंगो जमन, जवाहर से लाल तक, गुलामी से आजादी तक, चेतना के स्वर, किताबे गजल, राष्ट्र की अमानत राष्ट्र के हवाले आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
घाट किनारे मन्दिरों के साये में बैठ कर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नज़ीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसे ढला-
‘‘बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी,
मन्दिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी,
जब चांदनी रातों में हम-तुम गंगा किनारे होते थे।”
नज़ीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संर्कीण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नज़ीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिंदुस्‍तान को जानना चाहते हैं तो हमें नजीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेष सरीखे शायर ने कैसे हिंदुस्‍तान की साझी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते हैं। उनके लफ्जों में कहें तो…
‘‘जिन्दगी एक कर्ज है, भरना हमारा काम है,
हमको क्या मालूम कैसी सुबह है, शाम है,
सर तुम्हारे दर पे रखना फर्ज था, सर रख दिया,
आबरू रखना न रखना यह तुम्हारा काम है।”
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