Wednesday, 12 August 2026

'अकसर शब-ए-तन्‍हाई में' ये जो नज़्म है नादिर काकोरवी की... पढ़ें और रेशमा की आवाज़ में सुनें ...


 आज दोपहर बाद बार‍िश ने शहर को अपने आगोश में ले ल‍िया...सोचा कुछ सुना जाये..गुनगुनाता हुआ सा.. तो अचानक ये नज्म सामने आ गई... नादिर काकोरवी की लि‍खी.. द‍िल की तहों तक जम जाती है ये नज़्म।

इस नज्म़ को रेशमा की आवाज़ में सुनें - 

https://www.youtube.com/watch?v=8ji89eu3R4o


नादिर काकोरवी ज‍िन्होंने मुन्शी अली ख़ाँ (1887-1912) काकोरी, ज़िला लखनऊ में आँखें खोलीं। फ़ारसी और उर्दू के अलावा अंग्रज़ी भी पढ़ी। अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा और बहुत सी अंग्रेज़ी शायरी का उर्दू अनुवाद किया। उर्दू में नई शायरी के आन्दोलन में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने नज़्में ज़ियादा लिखीं और अपना एक अन्दाज़ भी पैदा किया। बहुत कम-उम्र में चल बसे।


'अकसर शब-ए-तन्‍हाई में' ये जो नज़्म है, वो दरअसल मूल रूप से थॉमस मूर की कविता "Oft, in the Stilly Night" का उर्दू/हिंदी रूपांतरण है, जिसे नादिर काकोरवी ने प्रस्तुत किया था।


फ‍िलहाल आप इस उर्दू रूपांतरण को पढ़‍िये ... 


अकसर शब-ए-तन्‍हाई में, कुछ देर पहले नींद से

गुज़री हुई दिलचस्पियां, बीते हुए दिन एश के

बनते हैं शम्‍मा-ए-ज़िंदगी

और डालते हैं रोशनी

मेरे दिल-ए-सद-चाक पर


वो बचपन और वो सादगी

वो रोना ओर हंसना कभी

फिर वो जवानी के मज़े

वो दिल्‍लगी वो क़हक़हे

वो इश्क़ वो अहद-ए-वफ़ा

वो वादा और वो शुक्रिया

वो लज़्ज़त-ए-बज़्मे तरब * खुशियों की महफ़िल के मज़े

याद आती हैं एक-एक सब।

अकसर शब-ए-तन्‍हाई में।।


दिल का कंवल जो रोज़-ओ-शब

रहता शगुफ़्ता था सो अब

उसका ये अब तर हाल है

एक सब्‍ज़ा-ए-पामाल है *मुरझाए हुए पौधा

एक फूल कुम्‍हलाया हुआ

सूखा हुआ बिख़रा हुआ

रौंदा पड़ा है ख़ाक पर।।


यूं ही शब-ए-तन्‍हाई में

कुछ देर पहले नींद से

गुज़री हुई नाकामियां

बीते हुए दिन रंज के

बनते हैं शाम-ए-बेकसी

और डालते हैं हैं रोशनी

उन हसरतों की क़ब्र पर।


जो आरज़ुएं पहले थीं

फिर ग़म-ए-हसरत बन गयीं

ग़म दोस्‍तों की फ़ौत का

उनकी जवान मौत का

ले देख शीशे में मेरे

उन हसरतों का ख़ून है

जो गर्दिश-ए-अय्याम से *रोज़मर्रा के दुख

जो क़िस्मत-ए-नाकाम से

या एश-ए-ग़म अनजान से

मर्ग़-ए-बुत-ए-गुलफ़ाम से

ख़ुद मेरे ग़म में मर गयीं

किस तरह पाऊं मैं हज़ीं

काबू दिल-ए-बेसब्र पर।


जब आह उन अहबाब को

मैं याद कर उठा हूं जो

यूं मुझ से पहले उठ गये

जिस तरह ताईर बाग़ के

या जैसे फूल और पत्तियां

गिर जायें सब क़ब्‍ल खिज़ां

और ख़ुश्‍क रह जाये शजर


उस वक़्त तन्‍हाई मेरी

बन कर मुजस्‍सम बेकसी

कर देती है पेश-ए-नज़र

हो हक़ सा इक वीरान घर

बरबाद जिसको छोड़कर

सब रहने वाले चल बसे

टूटे किवाड़ और खिड़कियां

छत के टपकने के निशां

परनाले हैं रोज़ा नहीं

ये 'हॉल' है आंगन नहीं

परदे नहीं चिलमन नहीं

एक शमा तक रोशन नहीं

मेरे सिवा जिसमें कोई

झांकें ना भूले से कोई


वो ख़ाना-ए-शाली है दिल

पूछे ना जिसको देव कोई

उजड़ा हुआ वीरान घर


अकसर शब-ए-तन्‍हाई में

कुछ देर पहले नींद से

गुज़री हुई दिलचस्पियां

बीते हुए दिन ऐश के

बनते हैं शमा-ए-ज़िंदगी

और डालते हैं रोशनी

मेरे दिल-ए-सद-चाक पर।। 


इस उर्दू रूपांतरण का असल ज‍िस कव‍िता से ल‍िया गया है वो ये है ज‍िसे थॉमस मूर ने क्या खूब ल‍िखा है ..आप भी पढ़‍िये- 

Oft in the stilly night

Ere slumber's chains have bound me

Fond mem'ry brings the light

Of other days around me

The smiles, the tears of boyhood years

The words of love unspoken

The eyes that shone, now dimmed and gone

The cheerful hearts now broken

Oft in the stilly night

Ere slumber's chain has bound me

Fond mem'ries bring the light

Of other days around me

When I remember all the friends

So linked together

I've seen around me fall

Like leaves in wintry weather

I feel like one who treads alone

Some banquet hall deserted

Whose lights have fled, whose garland's dead

And all but he departed

Thus, in the stilly night

Ere slumber's chains have bound me

Fond mem'ries bring the light

Of other days around me. 

- अलकनंदा स‍िंंह 

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