Friday, 3 August 2018

सोहर, चैती और होली गाकर हमें झुमाने वाले पं. छन्नूलाल मिश्र

वाराणसी। सोहर, चैती और होली खासकर 

वाराणसी। सोहर, चैती और होली खासकर ”खेलें मसाने में होली दिगंबर..खेले मसाने में होली..” को अपने सुरों में ढालने वाले और पूरब अंग की गायिकी के पहचान पं. छन्नूलाल मिश्र के किसे झूमने पर विवश न कर दें। आज पंडित जी का जन्‍म दिन है।

पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म ३ अगस्त १९३६ को हुआ था। ठुमरी के लब्धप्रतिष्ठ गायक हैं। वे किराना घराना और बनारस गायकी के मुख्‍य गायक हैं। उन्‍हें खयाल, ठुमरी, भजन, दादरा, कजरी और चैती के लिए जाना जाता है।

मौसम कोई भी हो जब भी इस होरी के सुर-शब्द कानों से टकराते हैं, काशी की धरती पर सैकड़ों फागुन झूम कर उतर आते हैं। आपनी मर्जी की मालिक प्रकृति को भी प्रकृति बदलने को मजबूर कर देने वाले सुरीले शहर बनारस का यह रुआब है सुरों के सम्राट पं. छन्नूलाल मिश्र के दम से जो आज बनारस की आन-बान के अलमबरदार हैं। पूरब अंग की गायिकी के लालकिला हैं, शोहरत के कुतुबमीनार हैं।

छन्‍नूलाल मिश्र की चैती यहां सुनिए- 
https://www.youtube.com/watch?v=dkM_T9RBol8&feature=youtu.be


लगभग आठ दशकों की जीवन यात्रा में पंडित जी ने अपनी साधना को उस मुकाम तक पहुंचाया है जहां पहुंचकर उनके वजूद और उनकी साधना की अलग-अलग पहचान कर पाना असंभव है।

ठुमरी के लब्धप्रतिष्ठ गायक हैं। वे किराना घराना और बनारस गायकी के मुख्य गायक हैं। उन्हें खयाल, ठुमरी, भजन, दादरा, कजरी और चैती के लिए जाना जाता है। पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म तीन अगस्त, 1936 को आजमगढ़ के हरिहपुर में हुआ था। वाराणसी इन दिनों छोटी गैबी में इनका निवास है। छह साल की उम्र में पिता बद्री प्रसाद मिश्र ने संगीत के क्षेत्र में डाला था। उन्होंने संगीत के लिए चार मत बताए। शिवमत, भरत मत, नारद मत एवं हनुमान मत को शिव मंत्रों के साथ जोड़कर देखा। संगीत का उद्भव भगवान से हुआ। जिसे किसी घराना में न बांधकर उसे ईश्वर प्राप्ति के मार्ग के रूप में जान सकते है।

नौ साल की उम्र में पहले गुरु गनी अली साहब ने खयाल सिखाया। स्वर, लय और शब्द का समावेश ही संगीत है। इसकी उत्पत्ति भगवान शिव की चरणों से हुई। देश का पहला लोकसंगीत सोहर और निर्गुण के रूप में देखा। जन्म से लेकर मृत्यु तक संगीत है। अमेरिका का 50वां स्मृति सोमिओ सेलिब्रेशन, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई सहित कई स्थानों पर दी गई प्रस्तुति और पुरस्कार की यादें संजोए हुए है।

पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र के मुताबिक अब तो ठुमकते हुए बोलों का उपयोग हो तो वह है ठुमरी। ठुमरी दो प्रकार की है गत भाव और भाव नृत्य। ठुमरी में मधुरता जरूरी है। अब तो पब्लिक को जो अच्छा लगे उसको गाना चाहिए। संगीत का सिरा आज इसलिए छूट रहा क्योंकि आजकल शिष्यों में धैर्य नहीं। थोड़ा गाकर खुद बड़ा समझने लगते हैं। जिनके पास समय नहीं वह खुद को कलाकार नहीं कलाबाज कहें। मोक्ष नहीं धन प्राप्ति का साधन बन रहा संगीत। अब तो ठुमकते हुए बोलों का उपयोग हो तो वह है ठुमरी। ठुमरी दो प्रकार की है गत भाव और भाव नृत्य। ठुमरी में मधुरता जरूरी है। अब तो पब्लिक को जो अच्छा लगे उसको गाना चाहिए। संगीत का सिरा आज इसलिए छूट रहा क्योंकि आजकल शिष्यों में धैर्य नहीं। थोड़ा गाकर खुद बड़ा समझने लगते हैं। जिनके पास समय नहीं वह खुद को कलाकार नहीं कलाबाज कहें। मोक्ष नहीं धन प्राप्ति का साधन बन रहा संगीत।

भारतीय संगीत-संस्कृति की जीवित किंवदंती, बनारस की कालातीत आनंदधारा के जीवंत द्वीप, अनेक अकिंचनो के स्नेहस्रोत स्वर-गंधर्व पूज्य पंडित छन्नूलाल मिश्र जी को जन्मदिवस की असीम शुभकामनायें।

-अलकनंदा सिंह

Wednesday, 1 August 2018

हँसी थमी है इन आँखों में यूँ नमी की तरह

क्‍या हम भी उनके दर्द को महसूस कर सकते हैं, जी हां आज ट्रेजडी क्‍वीन मीना कुमारी का जन्‍मदिन है

आज ट्रेजडी क्‍वीन मीना कुमारी का जन्‍मदिन है। इस अवसर पर अमिताभ बच्‍चन का कहा याद आता है कि हर डायलॉग को मीना कुमारी बोलती नहीं थीं बल्‍कि जीती थीं और दर्द को शबद में जीने वाली अदाकारा थीं। यह सच है कि आज भी उनकी फिल्‍म को हम फिल्‍म की तरह नहीं जीवन की तरह देखते हैं।

पढ़िए उनकी एक खास ग़ज़ल

हँसी थमी है इन आँखों में यूँ नमी की तरह 
चमक उठे हैं अंधेरे भी रौशनी की तरह 

तुम्हारा नाम है या आसमान नज़रों में 
सिमट गया मेरी गुम-गश्ता ज़िंदगी की तरह 

कोहर है धुँद धुआँ है वो जिस की शक्ल नहीं 
कि दिल ये रूह से लिपटा है अजनबी की तरह 

तुम्हारे हाथों की सरहद को पा के ठहरी हुईं 
ख़लाएँ ज़िंदा रगों में हैं सनसनी की तरह 

बॉलीवुड में ट्रेजडी क्वीन के नाम से मशहूर लिजेंडरी एक्ट्रेस मीना कुमारी की आज 85वां बर्थडे है। गूगल ने उनकी याद में आज बहुत ही खूबसूरत और शानदार डूडल बनाकर मीना कुमारी को याद किया है। 1 अगस्त, 1933 को को महजबीं बानो के रूप में जन्मीं इस अदाकारा ने बॉलीवुड में मीना कुमारी के नाम से पहचान बनाई।

गूगल ने मीना कुमारी के डूडल में एक्ट्रेस को आसमान में टिमटिमाते तारों के बीच अपनी चांदनी बिखेरते हुए दिखाया है। लाल साड़ी में मीना कुमारी इस डूडल में बहुत खूबसूरत लग रही हैं। बॉलीवुड में तीन दशक तक अपनी अदाकारी से सब का दिल जीतने वाली मीना कुमारी की पर्सनल लाइफ में काफी दुख रहा है। उनकी जीवन की यही पीड़ा उनकी फिल्मों में उनके अभिनय के जरिए सभी के सामने आई। मीना कुमारी ने साहिब, बीबी और गुलाम, परिणीता, फूल और पत्थर, दिल एक मंदिर, काजल और पाकीजा जैसी फिल्मों में अभिनय करके खुद को हमेशा के अमर बना दिया। दर्शकों के दिल में मीना कुमारी ने अपनी एक खास जगह बनाई है।

बेस्ट एक्ट्रेस कैटिगरी में एकसाथ चार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते

मीना कुमारी बेस्ट एक्ट्रेस कैटिगरी में चार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते थे। साल 1963 में हुए 10वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में बेस्ट एक्ट्रेस के सभी नॉमिनेशन पाकर उन्होंने इतिहास रच दिया था।

मीना कुमारी का जन्म इकबाल बेगम और अली बक्श की तीसरी बेटी के रूप में हुआ था। खबरों की मानें तो  जब मीना कुमारी का जन्म हुआ तो उनके माता-पिता के पास अस्पताल की फीस भरने के लिए पैसे तक नहीं थे। चार साल की उम्र में मीना कुमारी ने चाइल्ड एक्टर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। मीना कुमारी ने 1939 में फिल्म 'लैदरफेस' में बेबी महजबीं का रोल प्ले किया था। मीना कुमारी ने अपने 33 साल के करियर में करीब 92 फिल्मों में काम किया था।

मीना कुमारी ने फिल्म मेकर कमाल अमरोही से 1852 में निकाह किया था। 31 मार्च 1972 में सिर्फ 38 साल की उम्र में मीना कुमारी इस दुनिया को अलविदा कह के हमेशा के लिए चली गईं।

- अलकनंदा सिंह

Sunday, 22 July 2018

क्‍या आपको भी याद हैं वो रिवर्स गियर वाली कवितायें


पिछले एक सप्‍ताह से कभी रुक कर तो कभी तेज बारिश हो रही है। मुझे अपना बचपन याद आ रहा है। शायद आपको भी याद आ रहा होगा। गाहे ब गाहे आप भी अपने आसपास जो भी मौजूद होगा उसे बारिश के मौसम
से जुड़ी बचपन की बातें शेयर कर रहे होंगे। कहीं भुट्टे की तो कहीं पकौड़ियों की खुश्‍बू...कभी बारिश के समय नन्‍हीं बूंदों को आसमान की ओर मुंह करके जीभ से गले में उतारने की शरारत...आंगन के कोनों में भरे हुए या बाहर बहते हुए पानी में छप्‍प-छप्‍प करके सारे कपड़े गीले कर लेने और फिर घर की बड़ी महिलाओं से मिलती 'पानी में ना नहाने की नसीहत' को ठेंगा दिखने का दुस्‍साहस...उनसे मिली डांट को एक कान से दूसरे में हुंह कहकर 'जाया' करते हुए ऐसे ना जाने कितने ही अनुभव होंगे जिनसे आज के बच्‍चे महरूम हैं।

खैर, हम लोगों में से जो भी अपनी औसत उम्र के आधे हिस्‍से में पहुंच चुके हैं, उन्‍हें आज उन कविताओं की अच्‍छी तरह याद आ रही होगी। ऐसी ही दो कवितायें आज मैं शेयर करना चाहती हूं...यदि आप लोगों को और
भी कुछ याद आ रहा हो तो आप इसमें जोड़ सकते हैं।

प्राइमरी कक्षा की कविता है-''अम्मा जरा देख तो ऊपर...'' प्राइमरी कक्षा में ये कविता पढ़ा करते थे, मम्‍मी को सुनाते हुए उन्‍हें छेड़ा भी करते थे, कि देखो किताब में भी तो बारिश के लिए कितना अच्‍छा लिखा है, तुम्‍हीं क्यों रोकती हो बारिश में बाहर जाने से...खैर हमारी कोर्स की किताब में जो कविता थी, वो कुछ यूं थी। 


अम्मा जरा देख तो ऊपर 
चले आ रहे हैं बादल
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं
दीख रहा है जल ही जल 

हवा चल रही क्या पुरवाई 
भीग रही है डाली-डाली
ऊपर काली घटा घिरी है
नीचे फैली हरियाली

भीग रहे हैं खेत, बाग़, वन 
भीग रहे हैं घर, आँगन 
बाहर निकलूँ मैं भी भीगूँ
चाह रहा है मेरा मन। 

हालांकि इस कविता के रचयिता कौन थे (या हैं), यह तो अब याद नहीं आ रहा मगर अनायास हर बारिश में इसे गुनगुनाने के होठ फड़क ही उठते हैं...इसे कहते हैं कविताओं या शब्‍दों का ज़हन तक उतर जाना। इन कविताओं की मासूमियत आज भी हमारे भीतर बैठे बालक को छत्त पर जाने को बाध्‍य कर देती है। 

ऐसी ही एक और कविता है अब्दुल मलिक खान द्वारा रची हुई। अब ये तो याद नहीं आ रहा कि इसे कहां और कब पढ़ा था मगर इतना पता है कि इस मौसम में ये भी जुबान पर अपनी उपस्‍थिति दिखा ही देती है...आप भी पढ़िए....।

मुझे तो शायद इसलिए याद आ रही है ये...  क्‍योंकि जगजीत सिंह की आवाज़ में गाई और निदा फाज़ली की लिखी ग़ज़ल ''गरज बरस प्‍यासी धरती को फिर पानी दे मौला'' अभी अभी सुनी है और मौसम इससे मेल खा रहा है। इससे मिलती जुलती हैं अब्दुल मलिक खान की इस कविता की पंक्‍तियां...लीजिए... पढ़िये और अपने अपने बचपन को गुनगुनाइये।

अब्दुल मलिक खान की कविता- ''दिन प्यारे गुड़धानी के''

तान तड़ातड़-तान तड़ातड़
पानी पड़ता पड़-पड़-पड़!
तरपट-तरपट टीन बोलते,
सूखे पत्ते खड़-खड़-खड़।

ठुम्मक-ठुम्मक झरना ठुमका,
इठलाती जलधार चली।
खेतों में हरियाली नाची,
फर-फर मस्त बयार चली।

टप्पर-टप्पर, छप्पर-छप्पर,
टपक रहे हैं टप-टप-टप।
त्योहारों का मौसम आया,
हलुआ खाएँ गप-गप-गप।

झिरमिर-झिरमिर मेवा बरसे,
फूल बरसते पानी के।
कागज की नावें ले आईं
दिन प्यारे गुड़धानी के।

तो कैसा लगा रिवर्स गियर में अपने बचपन की ओर जीवन को बहाते हुए....।

- अलकनंदा सिंह

Tuesday, 10 July 2018

कालजयी कृति ‘बिदेसिया’ के रचयिता भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि आज, बिदेसिया का Video देखिए

आज भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि है. इस बार की पुण्यतिथि खास है. भिखारी ठाकुर की प्रदर्शन कला का, जिसे पॉपुलर शब्द में नाच कहा जाता है, यह 100वां साल है.
एक सदी पहले वह बंगाल में हजाम का काम करने के दौरान रामलीला देखकर उससे प्रभावित हुए थे और गांव लौटे थे. लिखना-पढ़ना-सीखना शुरू किये थे. न हिंदी आती थी, न अंग्रेजी, सिर्फ अपनी मातृभाषा भोजपुरी जानते थे. वह देश-दुनिया को भी नहीं जानते थे.
बस, अपने आसपास के समाज के मन-मिजाज को जानते थे, समझते थे. जो जानते थे, उसी को साधने में लग गये. मामूली, उपेक्षित, वंचित लोगों को मिलाकर टोली बना लिये और साधारण-सहज बातों को रच लोगों को सुनाने लगे, बताने लगे. इन 100 सालों के सफर में जो चमत्कार हुआ, वह अब दुनिया जानती है.
उतनी उमर में सीखने की प्रक्रिया आरंभ कर भिखारी ने दो दर्जन से अधिक रचनाएं कर दीं. वे रचनाएं अब देश-दुनिया में मशहूर हैं. भिखारी अब सिर्फ भोजपुरी के नहीं हैं. उस परिधि से निकल अब पूरे हिंदी इलाके के लिए एक बड़े सांस्कृतिक नायक और अवलंबन हैं. देश-दुनिया के रिसर्चर उनके उठाये विषयों पर, उनकी रचनाओं पर रिसर्च कर रहे हैं.
इसी खास साल में भिखारी ठाकुर के साथ काम करने वाले कलाकार रामचंद्र मांझी को संगीत नाटक अकादमी सम्मान मिला है. संजय उपाध्याय जैसे तपे-तपाये रंग निर्देशक भिखारी ठाकुर की कालजयी कृति ‘बिदेसिया’ को लेकर निरंतर देश-दुनिया के कोने में जा रहे हैं. भिखारी ठाकुर रिपेट्री एंड ट्रेनिंग सेंटर चलानेवाले जैनेंद्र दोस्त जैसे युवा निर्देशक ‘नाच भिखारी नाच’ को लेकर देश-दुनिया के कोने-कोने में जाना शुरू किये हैं. ऐसे ही ढेरों काम हो रहे हैं भिखारी पर.

नयी पीढ़ी को, खासकर ग्रामीण अंचल के बच्चों को, युवकों को भिखारी के बारे में इतना ही बता देना एक बड़ा संदेश है कि कुछ करने के लिए अंग्रेजी जानना ही जरूरी नहीं, देश-दुनिया में जाना ही जरूरी नहीं. अपनी भाषा में, अपने समाज के साथ, अपने समाज के बीच, किसी भी उम्र में कोई काम किया जा सकता है और ईमानदारी, मेहनत, साधना, लगन से वह काम और उससे निकला नाम भिखारी ठाकुर जैसा हो जाता है. लेकिन यह सब एक पक्ष है.
शुक्ल पक्ष जैसा. यह सब भिखारी ठाकुर और उनकी जिस भोजपुरी भाषा को केंद्र में रखकर आगे बढ़ रहा है, उस भोजपुरी को आज उनके मूल कर्म और धर्म के विरुद्ध इस्तेमाल किया जा रहा है. भिखारी जिंदगी भर जिस भोजपुरी का इस्तेमाल कर समुदाय के बीच की दूरियों को पाटते रहे, न्याय के साथ चलनेवाला समरसी समाज बनाते रहे, उसी भोजपुरी को लेकर आज नफरत और उन्माद का कारोबार बढ़ रहा है, समुदायों के बीच दूरियां बढ़ायी जा रही हैं.
हालिया दिनों में सांप्रदायिक तनाव की कई ऐसी घटनाएं घटी, जिसके भड़कने-भड़काने में गीतों की भूमिका प्रमुख मानी गयी. उसमें भी भोजपुरी लोकगीत ही प्रमुख रहे. भागलपुर, औरंगाबाद, रोहतास से लेकर रांची तक में यह समान रूप से देखा-पाया गया कि भोजपुरी गीतों में उन्माद का रंग भरकर तनाव बढ़ाने की कोशिश हुई.
ये उन्मादी गीत बनानेवाले कौन लोग हो सकते हैं? जाहिर-सी बात है कि वे चाहे कोई और हों, भोजपुरी और उसके गीतों का मर्म जाननेवाले तो नहीं ही होंगे. अगर वे होते तो कम से कम उन्माद का रंग भरने के लिए, नफरत की जमीन तैयार करने के लिए भोजपुरी या लोकगीतों का सहारा न लेते.
भोजपुरी की दुनिया वैसी कभी नहीं रही है. भोजपुरी लोकगीतों में पारंपरिक लोकगीतों की दुनिया छोड़ भी दें तो आधुनिक काल में भिखारी से ज्यादा किसने साधा अपनी भाषा को? किसने रचना उतने बड़े फलक पर? और भिखारी से ज्यादा भगवान को किसने जपा या रटा या उन पर रचा? बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी वियोग समेत अलग-अलग फलक पर रची हुई दो दर्जन कृतियां हैं भिखारी की, जिनमें एक दर्जन के करीब तो भगवान के गुणगान, राम,कृष्ण, शिव,रामलीला, हरिकीर्तन आदि को ही समर्पित है. राम के 67 पुश्तों से लेकर जनक के पुश्तों तक का बखान करते थे भिखारी अपने समय में. भोजपुरी में राम को उनसे ज्यादा कौन साधा उनके समय में? लेकिन भिखारी की किसी कृति में राम या कोई भगवान उन्माद का कारण नहीं बनते.
धर्म के कारण श्रेष्ठताबोध नहीं कराते. समुदाय को तोड़ने की बात नहीं करते. जाहिर-सी बात है कि जो आज भगवान के नाम पर लोकगीतों और भोजपुरी की चाशनी चढ़ाकर ऐसा कर रहे हैं, वे न तो भोजपुरी के लोग हैं, न भिखारी को जानने-माननेवाले. जो ऐसे गीत को सुनाये और कहे कि भोजपुरी में यह सब होता है उसे जरूर बताएं कि किस भोजपुरी में ऐसा होता है और कब होता रहा है.
भोजपुरी में भगवान और राम के सबसे बड़े भक्त भिखारी ने तो ऐसा नहीं किया कभी ऐसा? लोकगीतों का सहारा लेकर उन्माद बढ़ाने वाले आयोजकों, कारकों, गायकों, कलाकारों, गीतकारों में से कोई मिले, उससे भिखारी को ही सामने रखकर यह सवाल पूछें. जवाब ना दें तो कहें कि आप भोजपुरी और भिखारी दोनों के विरोधी हैं.

Saturday, 30 June 2018

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं

हरफनमौला कवि बाबा नागार्जुन के जन्‍मदिवस पर विशेष

बाबा नागार्जुन का जन्‍म 30 जून 1911 को वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा, हुसैनपुर में हुआ था। यह उन का ननिहाल था।
उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरौनी गांव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही ‘यात्री’ हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के ‘संयुक्त निकाय’ का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के ‘भिक्खुओं’ को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और विख्यात बौद्ध दार्शनिक के नाम पर अपना नाम नागार्जुन रखा।
नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी जो १९२९ ई० में लहेरियासराय, दरभंगा से प्रकाशित ‘मिथिला’ नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी रचना ‘राम के प्रति’ नामक कविता थी जो १९३४ ई० में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘विश्वबन्धु’ में छपी थी।
नागार्जुन ने हिन्दी में छह से अधिक उपन्यास, करीब एक दर्जन कविता-संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली (हिन्दी में भी अनूदित) कविता-संग्रह तथा एक मैथिली उपन्यास के अतिरिक्त संस्कृत एवं बाङ्ला में भी मौलिक रूप से लिखा।
जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं 
जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं
ये पंक्तियां सही मायनों में जन कवि बाबा नागार्जुन की पहचान हैं। साफगोई और जन सरोकार के मुद्दों की मुखरता से तरफदारी उनकी विशेषता रही। अपने समय की हर महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रहार करती कवितायें लिखने वाले बाबा नागार्जुन एक ऐसी हरफनमौला शख्सियत थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और भाषाओं में लेखन के साथ-साथ जनान्दोलनों में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और कुशासन के खिलाफ तनकर खड़े रहे।
रोजी-रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा 
कोई भी हो निश्चय ही वो कम्युनिस्‍ट कहलाएगा 
दो हज़ार मन गेहूं आया दस गांवों के नाम
जब वह बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर वापिस स्वदेश लौटे तो उनके जाति भाई ब्राह्मणों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। लेकिन बाबा ने ऐसी बातों की कभी परवाह नहीं की। राहुल सांस्कृत्यायन के बाद हिन्दी के सबसे बडे़ घुमक्कड़ साहित्यकार होने का गौरव भी बाबा को ही प्राप्त है। बाबा की औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं हो पायी। उन्होंने जो कुछ सीखा जीवन अनुभवों से सीखा और वही सब लिखा जो हिंदी कविता के लिए अमूल्य धरोहर हैं।
दो हज़ार मन गेहूं आया दस गांवों के नाम
राधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम 
सौदा पटा बड़ी मुश्किल से, पिघले नेताराम
पूजा पाकर साध गये चुप्पी हाकिम-हुक्काम
गरीबों और मजलूमों की आवाज
स्पष्ट विचार, धारदार टिप्पणी, गरीबों और मजलूमों की आवाज उनकी कविताओं में प्रमुखता से शामिल रही। हिंदी कविता में सही मायनों में कबीर के बाद कोई फक्कड़ और जनकवि कहलाने का उत्तराधिकारी हुआ तो वो थे बाबा नागार्जुन। घुमक्कड़ी स्वभाव और फक्कड़पन के बीच बाबा के मन में एक बेचैनी थी जो उनकी कविताओं में साफ दिखाई पड़ती है। बाबा, सामाजिक सरोकारों के कवि थे। आजादी के बाद जो मोहभंग की स्थिति हुई उससे उनको बड़ी पीड़ा होती थी। भ्रष्टाचार और बेईमानी से बड़े खिन्न होते थे लेकिन मुखर होकर शासन की करतूतों को अपनी कविता में शामिल करते थे।
घुमक्कड़ी स्वभाव के थे इसलिए लगातार यात्राएं करते रहते थे लेकिन समाज के पिछड़े, वंचित तबकों और गरीबों के लिए उनकी चिंता जगजाहिर थी। 1941 के आस-पास जब बिहार में किसान आंदोलित हुए तो बाबा भी सब कुछ छोड़कर आंदोलन का हिस्सा बन गये और जेल भी गये। अपनी बेबाकियों में एक स्वप्न वो हमेशा देखा करते थे समता मूलक समाज के लिए। बाबा हमेशा कहा करते थे कि हमने जनता से जो लिया है उसे कवि के रूप में जनता को लौटाना होगा। इसीलिए उनकी कविताएं सत्ता से सीधे सवाल करती थीं, टकराती थीं।
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के !
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के! 
साहित्य के मनीषियों का मानना है कि बाबा ने हमेशा गांधीजी का सम्मान किया लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और गांधीजी के अनुयायियों के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देने लगा। यह परिवर्तन बाबा को खलने लगा और इसीलिए उन्होंने कविता लिखी-बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ जो सबसे मजबूत आवाज थी वो थी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की। बाबा को जब भी कहीं कोई उम्मीद की किरण नजर आती थी तो उसे प्रोत्साहित जरूर करते थे लेकिन वो उम्मीद जैसे ही टूटती थी बाबा निराश होते थे और उतनी ही दृढ़ता से प्रहार भी करते थे। पटना में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ जेपी के समर्थन में बैठे थे।
अपनी एक महत्वपूर्ण कविता में देश के जिन पांच सेनानियों को जगह देते हैं, उसमें जेपी भी शामिल हैं। कविता में उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से जिनको शामिल किया उसमें नेहरू, चन्द्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंन्द्र बोष, जिन्ना तो थे ही साथ ही साथ जेपी भी शामिल हैं, ऐसा कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है।
पांच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार 
गोली खाकर एक मर गया बाकि रह गये चार 
चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन
तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो 
1975 में जब आपातकाल लगा नागरिकों के मूल अधिकार जब्त होने लगे, लोगों को जेलों में ठूसा जाने लगा। अभिव्यक्तियां बुरी तरह कुचली जा रहीं थीं, लोगों को बोलने की भी आजादी नहीं थी ऐसे में बाबा जो अपने स्पष्टवादी छवि के लिए जाने जाते थे, निर्भीकतापूर्वक अपनी कविताओं के जरिए सवाल पूछे-
क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको 
सत्ता के नशे में भूल गई बाप को 
इन्दु जी इन्दु जी क्या हुआ आपको
-Legend News

Friday, 29 June 2018

साल 2018 का साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार ”चौकीदार” के नाम

“हम नवटोली गांव के चौकीदार हैं. गांव के माहौल में जो देखते हैं, वो लिख देते हैं. कविता मेरे लिए टॉनिक की तरह है. ”
बातचीत के दौरान 34 साल के उमेश पासवान ये बात कई बार दोहराते हैं.
उमेश को उनके कविता संग्रह ‘वर्णित रस’ के लिए मैथिली भाषा में साल 2018 का साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार मिला है.
पेशे से चौकीदार, लेकिन दिल से कवि उमेश पासवान कहते हैं, “पुरस्कार मिला इसकी ख़ुशी है लेकिन लिखता आत्म-संतुष्टि के लिए ही हूं.”
बिहार के मधुबनी ज़िले के लौकही थाने में बीते नौ साल से चौकीदार उमेश पासवान की कविता का मुख्य स्वर ग्रामीण जीवन है.
कहां से हुई शुरुआत?
उमेश बताते हैं, “जब नौवीं क्लास में था तब मधुबनी के कुलदीप यादव की लॉज में रहते वक़्त एक सीनियर सुभाष चंद्रा से मुलाक़ात हो गई. वो कविता लिखते थे तो हमने भी टूटी-फूटी कविता लिखनी शुरू कर दी.”
लेकिन इस ज्वार ने ज़ोर कब पकड़ा?
इस सवाल पर उमेश का जवाब था, “बाद में मधुबनी के जेटी बाबू के यहां चलने वाली स्वचालित गोष्ठी में जाकर कविता पाठ किया. कविता तो बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन प्रोत्साहन मिला और कविता लेखन ने ज़ोर पकड़ा.”
22 भाषाओं में मिलने वाला साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 35 साल से कम उम्र के साहित्यकार को मिलता है.
विद्यानाथ झा मैथिली भाषा की कैटेगरी में अवॉर्ड तय करने वाली तीन सदस्यीय ज्यूरी मेंबर में से एक हैं.
वह कहते हैं, “उमेश की भाषा में एक नैसर्गिक प्रवाह है जो आपको अपने साथ लिए चलता है. उनकी कविताओं में बहुत विस्तार है. उमेश की कविताएं सामाजिक न्याय की बात करती हैं तो गांव के सुख-दुख से लेकर मैथिल समाज के तमाम सरोकारों को हमारे सामने रखती हैं. उमेश को अवॉर्ड मिलना दो वजहों से ख़ास है, पहला तो उनके पेशे के चलते और दूसरा उमेश को मिला पुरस्कार ये धारणा भी तोड़ता है कि मैथिली पर सिर्फ़ ब्राह्मणों या कायस्थों का अधिकार है.”
दरअसल, उमेश के जीवन के उतार-चढ़ाव ने उनकी कविता के लिए ज़मीन तैयार की.
मां को कविता पसंद नहीं
उमेश ने जब होश संभाला तो पिता खखन पासवान और मां अमेरीका देवी को खेतों में मज़दूरी करते देखा.
बाद में पिता खखन पासवान को लौकही थाने में चौकीदार की नौकरी मिली जो उनकी मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर उमेश को मिल गई.
दिलचस्प है कि 65 वर्षीय अमेरीका देवी को बेटे उमेश का यूं कविताई में उलझे रहना पसंद नहीं था.
वो बताती हैं, “बहुत बचपने से ही लिखता था. हमने बहुत समझाया पढ़ाई पर ध्यान दो, फबरा (कविता) लिखने से क्या होगा, लेकिन ये ध्यान नहीं देता था जब टाइम मिले फबरा लिखता था और हमें सुनाता था.”
काले अक्षरों से अनजान अमेरीका को जब उमेश ने साहित्य अकादमी अवॉर्ड मिलने की ख़बर सुनाई तो उनका पहला सवाल था, “इसके लिए पैसे देने होंगे या फिर मिलेगा?”
उमेश से बात करने पर दूर-दराज़ के इलाकों की एक और समस्या का पता चलता है.
रोज़ी-रोटी के जुगाड़ में उलझे इन इलाकों के लोगों का कविता, कथा, उससे जुड़े पुरस्कारों से रिश्ता लगभग न के बराबर है.
कई कविता संग्रह प्रकाशित
जैसा कि उमेश बताते भी हैं, “साहित्य अकादमी यहां कोई नहीं समझता. हम मधुबनी, दिल्ली, पटना सब जगह अपनी कविता सुनाते हैं, लेकिन हमारे गांव में कोई नहीं सुनता. जब किसी ने नहीं सुना तो हमने कांतिपुर एफएम और दूसरे रेडियो स्टेशनों पर कविता भेजनी शुरू की ताकि कम से कम रेडियो के श्रोता तो मेरी कविता सुनें.”
कांतिपुर एफ़एम नेपाल से प्रसारित होने वाला रेडियो स्टेशन है.
दो बच्चों के पिता उमेश के अब तक तीन कविता संग्रह ‘वर्णित रस’, ‘चंद्र मणि’, ‘उपराग’ आ चुके हैं.
फ़िलहाल वो गांव के जीवन और उनके थाने में आने वाली शिकायतों के इर्द-गिर्द बुनी कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित कराने की तैयारी में हैं.
विज्ञान से स्नातक उमेश अपने गांव में एक निःशुल्क शिक्षा केंद्र भी चलाते हैं. साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार के रूप में उन्हें 50 हजार की राशि पुरस्कार स्वरूप दी जाएगी.
उमेश ने इस पुरस्कार राशि को शहीद सैनिकों के बच्चों की मदद के लिए सरकारी कोष में जमा करने का फ़ैसला लिया है.
तकनीक से दूर रहने वाले उमेश का फ़ेसबुक पेज हैंडल करने वाली उनकी पत्नी प्रियंका कहती हैं, “हमें हमेशा लगता था कि ये एक दिन कोई बड़ा काम करेंगे.”


साभार-BBC

Sunday, 20 May 2018

आज तो सुमित्रानंदन पंत का जन्‍मदिन है, पढ़िए उनकी दो कवितायें

फोटो: प्रसार भारती से साभार
आज तो सुमित्रानंदन पंत का जन्‍मदिन है, तो चलिए इसी बात पर हो जाए उनकी दो कविताऐं जो हमें अपनी जड़ों तक ले जायेंगी।  वरना कौन ऐसा कर सकता है कि सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था....। 

सुमित्रानंदन पंत  हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसादमहादेवी वर्मासूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म उत्‍तराखंड के कौसानी, बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति,माथे पर पड़े हुए  लंबे घुंघराले बाल,सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। 

पहली कविता: तितली  जिसका रचनाकाल: मई’१९३५ है...


नीली, पीली औ’ चटकीली
पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,
प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली
तुम किस सुख में हो रही डोल?
चाँदी-सा फैला है प्रकाश,
चंचल अंचल-सा मलयानिल,
है दमक रही दोपहरी में
गिरि-घाटी सौ रंगों में खिल!
तुम मधु की कुसुमित अप्सरि-सी
उड़-उड़ फूलों को बरसाती,
शत इन्द्र चाप रच-रच प्रतिपल
किस मधुर गीति-लय में जाती?
तुमने यह कुसुम-विहग लिवास
क्या अपने सुख से स्वयं बुना?
छाया-प्रकाश से या जग के
रेशमी परों का रंग चुना?
क्या बाहर से आया, रंगिणि!
उर का यह आतप, यह हुलास?
या फूलों से ली अनिल-कुसुम!
तुमने मन के मधु की मिठास?
चाँदी का चमकीला आतप,
हिम-परिमल चंचल मलयानिल,
है दमक रही गिरि की घाटी
शत रत्न-छाय रंगों में खिल!
--चित्रिणि! इस सुख का स्रोत कहाँ
जो करता निज सौन्दर्य-सृजन?
’वह स्वर्ग छिपा उर के भीतर’--
क्या कहती यही, सुमन-चेतन?



दूसरी कविता चींटी 

चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

सुमित्रानंदन पंत की इन दो ही कविताओं में अपना बचपन ढूढ़ने वाले हम उन्‍हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं।
-अलकनंदा सिंह

Wednesday, 21 March 2018

आज विश्‍व कविता दिवस पर विशेष...संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य के प्रस्‍तुतकर्ता कौन थे

आज विश्‍व कविता दिवस है परंतु क्‍या हम जानते हैं कि संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य (एपिक) का प्रथम सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया है और परवर्ती आचार्यों में दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ ने अपने अपने ढंग से इस लक्षण का विस्तार किया है।
आचार्य विश्वनाथ का लक्षण निरूपण इस परंपरा में अंतिम होने के कारण सभी पूर्ववर्ती मतों के सारसंकलन के रूप में उपलब्ध है।


आचार्य विश्वनाथ के अनुसार महाकाव्य के लक्षण 
जिसमें सर्गों का निबंधन हो वह महाकाव्य कहलाता है।
 इसमें देवता या सदृश क्षत्रिय, जिसमें धीरोदात्तत्वादि गुण हों, नायक होता है। कहीं एक वंश के अनेक सत्कुलीन भूप भी नायक होते हैं।
शृंगार, वीर और शांत में से कोई एक रस अंगी होता है तथा अन्य सभी रस अंग रूप होते हैं। उसमें सब नाटकसंधियाँ रहती हैं। कथा ऐतिहासिक अथवा सज्जनाश्रित होती है। चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक उसका फल होता है। आरंभ में नमस्कार, आशीर्वाद या वर्ण्यवस्तुनिर्देश होता है।

कहीं खलों की निंदा तथा सज्जनों का गुणकथन होता है। न अत्यल्प और न अतिदीर्घ अष्टाधिक सर्ग होते हैं जिनमें से प्रत्येक की रचना एक ही छंद में की जाती है और सर्ग के अंत में छंदपरिवर्तन होता है। कहीं-कहीं एक ही सर्ग में अनेक छंद भी होते हैं। सर्ग के अंत में आगामी कथा की सूचना होनी चाहिए। उसमें संध्या, सूर्य, चंद्रमा, रात्रि, प्रदोष, अंधकार, दिन, प्रात:काल, मध्याह्न, मृगया, पर्वत, ऋतु, वन, सागर, संयोग, विप्रलंभ, मुनि, स्वर्ग, नगर, यज्ञ, संग्राम, यात्रा और विवाह आदि का यथासंभव सांगोपांग वर्णन होना चाहिए।

आचार्य विश्वनाथ का उपर्युक्त निरूपण महाकाव्य के स्वरूप की वैज्ञानिक एवं क्रमबद्ध परिभाषा प्रस्तुत करने के स्थान पर उसकी प्रमुख और गौण विशेषताओं का क्रमहीन विवरण उपस्थित करता है।

इसके आधार पर संस्कृत काव्यशास्त्र में उपलब्ध महाकाव्य के लक्षणों का सार इस प्रकार किया जा सकता है-

कथानक - महाकाव्य का कथानक ऐतिहासिक अथवा इतिहासाश्रित होना चाहिए।

विस्तार - कथानक का कलवेर जीवन के विविध रूपों एवं वर्णनों से समृद्ध होना चाहिए। ये वर्णन प्राकृतिक, सामाजिक और राजीतिक क्षेत्रों से इस प्रकार संबंद्ध होने चाहिए कि इनके माध्यम से मानव जीवन का पूर्ण चित्र उसके संपूर्ण वैभव, वैचित्र्य एवं विस्तार के साथ उपस्थित हो सके। इसीलिए उसका आयाम (अष्टाधिक सर्गों में) विस्तृत होना चाहिए।
विन्यास - कथानक की संघटना नाट्य संधियों के विधान से युक्त होनी चाहिए अर्थात् महाकाव्य के कथानक का विकास क्रमिक होना चाहिए। उसकी आधिकारिक कथा एवं अन्य प्रकरणों का पारस्परिक संबंध उपकार्य-उपकारक-भाव से होना चाहिए तथा इनमें औचित्यपूर्ण पूर्वापर अन्विति रहनी चाहिए।
नायक - महाकाव्य का नायक देवता या सदृश क्षत्रिय हो, जिसका चरित्र धीरोदात्त गुणों से समन्वित हो - अर्थात् वह महासत्त्व, अत्यंत गंभीर, क्षमावान् अविकत्थन, स्थिरचरित्र, निगूढ़, अहंकारवान् और दृढ़व्रत होना चाहिए। पात्र भी उसी के अनुरूप विशिष्ट व्यक्ति, राजपुत्र, मुनि आदि होने चाहिए।
रस - महाकाव्य में शृंगार, वीर, शांत एवं करुण में से किसी एक रस की स्थिति अंगी रूप में तथा अन्य रसों की अंग रूप में होती है।
फल - महाकाव्य सद्वृत होता है - अर्थात् उसकी प्रवृत्ति शिव एवं सत्य की ओर होती है और उसका उद्देश्य होता है चतुवर्ग की प्राप्ति।
शैली - शैली के संदर्भ में संस्कृत के आचार्यों ने प्राय: अत्यंत स्थूल रूढ़ियों का उल्लेख किया है। उदाहरणार्थ एक ही छंद में सर्ग रचना तथा सर्गांत में छंदपरिवर्तन, अष्टाधिक सर्गों में विभाजन, नामकरण का आधार आदि। परंतु महाकाव्य के अन्य लक्षणों के आलोक में यह स्पष्ट ही है कि महाकाव्य की शैली नानावर्णन क्षमा, विस्तारगर्भा, श्रव्य वृत्तों से अलंकृत, महाप्राण होनी चाहिए। आचार्य भामह ने इस भाषा को सालंकार, अग्राम्य शब्दों से युक्त अर्थात् शिष्ट नागर भाषा कहा है।

-प्रस्‍तुति: विकीपीडिया व साहित्यदर्पण, परिच्छेद 6,315-324 के आधार पर

Thursday, 15 March 2018

आज राही मासूम रजा की पुण्‍यतिथि है…

”कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता” के ये शब्‍द हमने रजा साहब का संस्‍मरण लेख से हिंदी समय से साभार लिया है
यहाँ (बंबई में) कई दोस्त मिले जिनके साथ अच्छी-बुरी गुजरी। कृष्ण चंदर, भारती, कमलेश्वर, जो शुरू ही में ये न मिल गए होते तो बंबई में मेरा रहना असंभव हो जाता। शुरू में मेरे पास कोई काम नहीं था और बंबई में मैं अजनबी था। उन दिनों इन दोस्तों ने बड़ी मदद की। इन्होंने मुझे जिंदा रखने के लिए चंदा देकर मेरी तौहीन नहीं की। इन्होंने मुझे उलटे-सीधे काम दिए और उस काम की मजदूरी दी। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं इन लोगों के एहसान से कभी बरी हो सकता हूँ।
मुझे वह दिन आज भी अच्छी तरह याद है जब नैयर होली फैमिली अस्पताल में थीं। चार दिन के बाद अस्पताल का बिल अदा करके मुझे नैयर और मरियम को वहाँ से लाना था। सात-साढ़े सात सौ का बिल था और मेरे पास सौ-सवा सौ रुपए थे। तब कमलेश्वर ने ‘सारिका’ से, भारती ने ‘धर्मयुग’ से मुझे पैसे एडवांस दिलवाए और कृष्ण जी ने अपनी एक फिल्म के कुछ संवाद लिखवा के पैसे दिये और मरियम घर आ गईं। आज सोचता हूँ कि जो यह तीनों न रहे होते तो मैंने क्या किया होता? क्या मरियम को अस्पताल में छोड़ देता? वह बहुत बुरे दिन थे। कुछ दोस्तों से उधार भी लिया। कलकत्ते से ओ.पी. टाँटिया और राजस्थान से मेरी एक मुँहबोली बहन लनिला और अलीगढ़ से मेरे भाई मेहँदी रजा और दोस्त कुँवरपाल सिंह ने मदद की। कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता। और कुछ बातें ऐसी हैं जो एहसान में नहीं आतीं पर उन्हें याद करो तो आँखें नम हो जाती हैं।
जब मैं अलीगढ़ से बंबई आया तो अपने छोटे भाई अहमद रजा के साथ ठहरा। छोटे भाई तो बहुतों के होते हैं, पर अहमद रजा यानी हद्दन जैसा छोटा भाई मुश्किल से होगा किसी की तकदीर में। उसने मेरा स्वागत यूँ किया कि मैं यह भूल गया कि फिलहाल मैं बेरोजगार हूँ। हम हद्दन के साथ ठहरे हुए थे, पर लगता था कि वह अपने परिवार के साथ हमारे साथ ठहरे हुए हैं। घर में होता वह था जो मैं चाहता था या मेरी पत्नी नैयर चाहती थी। वह घर बहुत सस्ता था। जिस फ्लैट में अब हूँ उससे बड़ा था। इसका किराया 600 दे रहा हूँ। उसका किराया केवल 150 रुपए माहवार था। तो हद्दन ने सोचा कि वह घर उन्हें मेरे लिए खाली कर देना चाहिए। रिजर्व बैंक से उन्हें फ्लैट मिल सकता था, मिल गया। जब वह जाने लगे तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ साजिश की कि घर का सारा सामान मेरे लिए छोड़ जाएँ क्योंकि मेरे पास तो कुछ था नहीं। जाहिर है कि मैं इस पर राजी नहीं हुआ। उन दोनों को बड़ी जबरदस्त डाँट पिलाई मैंने।
चुनांचे वह घर का सारा सामान लेकर चले गए और घर नंगा रह गया। मेरे पास दो कुर्सियाँ भी नहीं थीं। हम ने कमरे में दो गद्दे डाल दिए और वही दो गद्दोंवाला वीरान कमरा बंबई में हमारा पहला ड्राइंग रूम बना… उन दिनों मैं नैयर से शर्माने लगा था। मैं सोचता कि यह क्या मुहब्बत हुई, कैसी जिंदगी से निकाल कर कैसी जिंदगी में ले आया मैं उस औरत को जिसे मैंने अपना प्यार दे रक्खा है… अपना तमाम प्यार। मगर नैयर ने मुझे यह कभी महसूस नहीं होने दिया कि वह निम्नमध्यवर्गीय जिंदगी को झेल नहीं पा रही है। हम दोनों उस उजाड़ घर में बहुत खुश थे। उन दिनों कृष्ण चंदर, सलमा आपा, भारती और कमलेश्वर के सिवा कोई लेखक हमसे जी खोल के मिलता नहीं था। हम मजरूह साहब के घर उन से मिलने जाते तो वह अपने बेडरूम में बैठे शतरंज खेलते रहते और हम लोगों से मिलने के लिए बाहर न निकलते। फिरदौस भाभी बेचारी लीपापोती करती रहतीं… कई और लेखक इस डर से कतरा जाते थे कि मैं कहीं मदद न माँग बैठूँ।…
आप खुद सोच सकते हैं कि हमारे चारों ओर कैसा बेदर्द और बेमुरव्वत अँधेरा रहा होगा उन दिनों। नैयर लोगों से मिलते भी घबराती थीं, इसलिए मिलना-जुलना भी कम लोगों से था और बहुत कम था… कि एक दिन सलमा आपा आ गईं। इन्हें आप सलमा सिद्दीकी के नाम से जानते हैं। उस वक्त हम दोनों उन्हीं गद्दों पर बैठे रमी खेल रहे थे। सलमा आपा बैठीं। इधर-उधर की बातें होती रहीं। फिर वह चली गईं और थोड़ी देर के बाद उनका एक नौकर एक ठेले पर एक सोफा लदवाए हुए आया। हमने उस तोहफे को स्वीकार कर लिया, कि जो न करते तो सलमा आपा और कृष्ण जी को तकलीफ होती और हम उन्हें तकलीफ देना नहीं चाहते थे।
साभार: हिंदी समय
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Wednesday, 7 March 2018

आज अज्ञेय के जन्‍मदिन पर बावरा अहेरी सहित 3 कविताऐं

आज 7 मार्च, 1911 को कसया, उत्‍तरप्रदेश में अज्ञेय का जन्म हुआ, शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत-मौखिक परम्परा से हुआ 1915 से ’19 तक श्रीनगर और जम्मू में। यहीं पर संस्कृत पंडित से रघुवंश रामायण, हितोपदेश, फारसी मौलवी से शेख सादी और अमेरिकी पादरी से अंग्रेजी की शिक्षा घर पर पढ़कर सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को प्रेमचंद ने ‘अज्ञेय’ बनाकर हमारे लिए एक ऐसी साहित्‍यिक थाती सौंप दी जिसका आज भी कोई पूरी तरह विश्‍लेषण नहीं कर पाया।
दिल्ली में, 2 सितम्बर, 1951 को बावरा अहेरी उन्‍हीं की लिखी ऐसी कविता है जो सोचने पर विवश कर देती है कि  नाम बड़ा नहीं होता, बड़ी सोच होती है जो व्‍यक्‍ति को बड़ा बनाती है। ऐसे थे कवि अज्ञेय।
पढ़िए उनकी तीन कविताऐं
1. बावरा अहेरी
भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को
बाँध लेता है सभी को साथः
छोटी-छोटी चिड़ियाँ
मँझोले परेवे
बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले
डौल के बैडौल
उड़ने जहाज़
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल घुस्सों वाली
उपयोग-सुंदरी
बेपनाह कायों कोः
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुँए को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि
रूप-रेखा को
और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दण्ड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को
हरा देगी !
बावरे अहेरी रे
कुछ भी अवध्य नहीं तुझे, सब आखेट हैः
एक बस मेरे मन-विवर में दुबकी कलौंस को
दुबकी ही छोड़ कर क्या तू चला जाएगा ?
ले, मैं खोल देता हूँ कपाट सारे
मेरे इस खँढर की शिरा-शिरा छेद के
आलोक की अनी से अपनी,
गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर देः
विफल दिनों की तू कलौंस पर माँज जा
मेरी आँखे आँज जा
कि तुझे देखूँ
देखूँ और मन में कृतज्ञता उमड़ आये
पहनूँ सिरोपे-से ये कनक-तार तेरे –
बावरे अहेरी
2. जो पुल बनाएंगे
जो पुल बनाएँगे
वे अनिवार्यतः
पीछे रह जाएँगे।
सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगे राम;
जो निर्माता रहे
इतिहास में बन्दर कहलाएँगे
3. मेरे देश की आँखें 
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
पुते गालों के ऊपर
नकली भवों के नीचे
छाया प्यार के छलावे बिछाती
मुकुर से उठाई हुई
मुस्कान मुस्कुराती
ये आँखें –
नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं…
तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से
शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ –
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं…
वन डालियों के बीच से
चौंकी अनपहचानी
कभी झाँकती हैं
वे आँखें,
मेरे देश की आँखें,
खेतों के पार
मेड़ की लीक धारे
क्षिति-रेखा को खोजती
सूनी कभी ताकती हैं
वे आँखें…
उसने
झुकी कमर सीधी की
माथे से पसीना पोछा
डलिया हाथ से छोड़ी
और उड़ी धूल के बादल के
बीच में से झलमलाते
जाड़ों की अमावस में से
मैले चाँद-चेहरे सुकचाते
में टँकी थकी पलकें
उठायीं –
और कितने काल-सागरों के पार तैर आयीं
मेरे देश की आँखें…
(पुरी-कोणार्क, 2 जनवरी 1980)
  • Legend News

Tuesday, 6 March 2018

Gabriel García Márquez के जन्‍मदिन पर पढ़िए उनकी लिखी कहानी- ऐसे ही किसी दिन

गूगल ने आज कोलंबियाई मूल के लेखक Gabriel García Márquez की 91वीं जयंती पर डूडल बनाकर मशहूर हुए इस साहित्‍यकार को याद किया है।
गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की किताब ‘हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई और यह उनकी बेस्टसेलर में भी शामिल हुई। हिंदी में इसका अनुवाद ‘एकांत के सौ वर्ष’ शीर्षक से हुआ। ग्रैबियल की किताबों पर हॉलीवुड में कई फिल्में बनीं, लेकिन फिल्में उस तरह का जादू नहीं बिखेर सकीं, जिस तरह उन्होंने अपनी किताबों में उकेरा है। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिये जीवन और उससे जुड़े पहलुओं ,को बहुत ही खूबसूरती के साथ छुआ है।
गैब्रियल गार्सिया मार्खेज पत्रकारिता से शुरुआत करते हुए कहानियां, उपन्‍यास लिखे, 1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया था।
Gabriel García Márquez के बारे में जानिए-
गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ (6 मार्च 1927 – 17 अप्रैल 2014) नोबेल पुरस्कृत विश्वविख्यात साहित्यकार थे। १९५० में रोम और पेरिस में स्पेक्टेटर के संवाददाता रहे। १९५९ से १९६१ तक क्यूबा की संवाद एजेंसी के लिए हवाना और न्यूयार्क में काम किया। वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव के कारण उन पर अमेरिका और कोलम्बिया सरकारों द्वारा देश में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगया गया। उनका प्रथम कहानी-संग्रह लीफ स्टार्म एंड अदर स्टोरीज १९५५ में प्रकाशित: नो वन नाइट्, टु द कर्नल एंड अदर स्टोरीज और आइज़ ऑफ ए डॉग श्रेष्ठ कहानी संग्रह है। उनके उपन्यास सौ साल का एकांत (वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सालीच्यूड) को १९८२ में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। १७ अप्रैल २०१४ को ८७ वर्ष की आयु में मैक्सिको नगर में उनका निधन हो गया।
Márquez के जन्‍मदिन पर पढ़िए उनकी लिखी कहानी-
”ऐसे ही किसी दिन”
उस सोमवार की सुबह, गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने, जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था, अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने शीशे की आलमारी से नकली दाँत निकाले, जो अब भी खड़िया-मिट्टी के साँचे में जड़े हुए थे, और मुट्ठी भर औजारों को उनके आकार के क्रम में मेज पर यूँ सजा के रखा जैसे उनकी नुमाइश की जा रही हो। उसने बिना कालर वाली एक धारीदार कमीज पहन रखी थी जिसके बंद गले पर सुनहरा बटन था, और उसकी पैंट गेलिस से बँधी हुई थी। वह दुबला-पतला सींकिया इनसान था जिसकी निगाह कभी-कभार ही हालात के अनुरूप हो पाती थी, जैसा कि बहरे लोगों की निगाहों के मामले में होता है।
औजारों को मेज पर व्यवस्थित करने के बाद वह ड्रिल को कुर्सी के पास खींच लाया और नकली दाँतों को चमकाने बैठ गया। वह अपने काम के बारे में सोचता नहीं दिख रहा था, बल्कि, ड्रिल को अपने पैरों से चलाते हुए, तब भी जबकि उसकी जरूरत नहीं होती थी, वह निरंतर काम किए जा रहा था।
आठ बजे के बाद खिड़की से आसमान को देखने के इरादे से, वह थोड़ी देर के लिए रुका और उसने देखा कि दो विचारमग्न बाज बगल के मकान की शहतीर पर धूप ले रहे थे। वह इस खयाल के साथ फिर काम में जुट गया कि दोपहर के खाने के पहले फिर से बारिश होगी। अपने ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ।
‘पापा।’
‘क्या है?’
‘मेयर पूछ रहे हैं कि क्या आप उनका दाँत निकाल देंगे।’
‘उससे बता दो कि मैं यहाँ नहीं हूँ।’
वह एक सोने का दाँत चमका रहा था। हाथ भर की दूरी पर ले जाकर उसने आँखें भींचकर दाँत को जाँचा-परखा। छोटे से वेटिंग रूम से फिर उसका बेटा चिल्लाया।
‘वो कह रहे हैं कि आप यहीं हैं, और यह भी कि वह आपकी आवाज सुन सकते हैं।’
दंतचिकित्सक ने दाँतों की जाँच-पड़ताल जारी रखी। उसे मेज पर बाकी चमकाए जा चुके दाँतों के साथ रखने के बाद ही वह बोला : ‘अच्छा है, सुनने दो उसे।’
वह फिर से ड्रिल चलाने लगा। उसने गत्ते के डिब्बे से, जहाँ कि वह ऐसी चीजें रखता था जिनपर काम करना बाकी है, कुछ दाँत निकाले और सोने को चमकाने में जुट गया।
‘पापा।’
‘क्या है ?’
उसने अब भी अपना हाव-भाव नहीं बदला था।
‘वह कह रहे हैं कि अगर आप उनका दाँत नहीं निकालेंगे तो वह आपको गोली मार देंगे।’
बिना हड़बड़ाए, बहुत स्थिर गति से उसने ड्रिल को पैडल मारना बंद किया, उसे कुर्सी से परे धकेला और मेज की निचली दराज को पूरा बाहर खींच लिया। उसमें एक रिवाल्वर पड़ी थी। ‘ठीक है,’ उसने कहा। ‘उससे कहो कि आकर मुझे गोली मार दे।’
उसने कुर्सी को घुमाकर दरवाजे के सामने कर लिया, उसका हाथ दराज के सिरे पर टिका हुआ था। मेयर दरवाजे पर नजर आया। उसने अपने चेहरे के बाईं तरफ तो दाढ़ी बनाई हुई थी, लेकिन दूसरी तरफ, सूजन और दर्द की वजह से पाँच दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी मौजूद थी। दंतचिकित्सक ने उसकी नीरस आँखों में कई रातों की नाउम्मीदी देखी। उसने अपने उँगली के पोरों से दराज को बंद कर धीरे से कहा :
‘बैठ जाओ।’
‘गुड मार्निंग,’ मेयर ने कहा।
‘मार्निंग,’ दंतचिकित्सक ने जवाब दिया।
जब औजार उबल रहे थे, मेयर ने अपना सर कुर्सी के सिरहाने पर टिका दिया और कुछ बेहतर महसूस करने लगा। उसकी साँसे सर्द थीं। यह एक घटिया क्लीनिक थी : एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी, पैर से चलने वाली एक ड्रिल, मिट्टी की शीशियों से भरी एक शीशे की आलमारी। कुर्सी के सामने एक खिड़की थी जिस पर कंधों की ऊँचाई तक के परदे पड़े हुए थे। जब उसने दंतचिकित्सक को आता हुआ महसूस किया, तो उसने अपनी एड़ी को कड़ा करके मुँह खोल दिया।
औरेलियो एस्कोवार ने अपना सर रोशनी की दिशा में घुमा लिया। संक्रमित दाँत के मुआयने के बाद उसने उँगलियों के सतर्क दबाव से मेयर का जबड़ा बंद कर दिया।
‘यह काम संवेदनशून्य किए बिना ही करना पड़ेगा,’ उसने कहा।
‘क्यों?’
‘क्योंकि अंदर एक घाव है।’
मेयर ने उसकी आँखों में देखा। ‘ठीक है,’ उसने कहा, और मुस्कराने की कोशिश की। दंतचिकित्सक जवाब में नहीं मुस्कराया। अब भी बिना किसी जल्दबाजी के वह, विसंक्रमित औजारों का पात्र, काम करने की मेज तक ले आया और उन्हें एक ठंडी चिमटी की सहायता से पानी से बाहर निकाला। फिर उसने पीकदान को जूते की नोक से धकेला और वाशबेसिन में हाथ धुलने के लिए गया। यह सब उसने मेयर की तरफ देखे बिना ही किया। लेकिन मेयर ने उस पर से अपनी नजरें नहीं हटाईं।
घाव अक्ल दाढ़ के निचले हिस्से में था। दंतचिकित्सक ने अपने पैर फैलाकर गर्म संडासी से दाँत को पकड़ लिया। मेयर ने कुर्सी के हत्थों को मजबूती से थाम लिया, अपनी पूरी ताकत से पैरों को कड़ा कर लिया और अपने गुर्दों में एक बर्फीला खालीपन महसूस किया मगर कोई आवाज नहीं निकाली। दंतचिकित्सक ने महज अपनी कलाई को हरकत दी। बिना किसी विद्वेष के, बल्कि एक कटु कोमलता के साथ, उसने कहा :
‘अब तुम हमारे बीस मारे गए लोगों की कीमत अदा करोगे।’
मेयर ने अपने जबड़े में हड्डियों की चरमराहट महसूस की, और उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। लेकिन उसने तब तक साँस नहीं लिया जब तक कि उसे दाँत निकलने का एहसास न हो गया। फिर उसने अपने आँसुओं के बीच से उसे देखा। उसके दर्द के चलते वह इतना पराया नजर आ रहा था कि वह अपनी पिछली पाँच रातों की यातना समझने में नाकाम रहा।
पीकदान पर झुके, पसीने से तर, हाँफते हुए उसने अपनी जैकेट की बटन खोली और पैंट की जेब से रूमाल निकालने को हुआ। दंतचिकित्सक ने उसे एक साफ़ कपड़ा दिया।
‘अपने आँसू पोंछ लो,’ उसने कहा।
मेयर ने ऐसा ही किया। वह काँप रहा था। जब दंतचिकित्सक अपने हाथ धुल रहा था, उसने जीर्ण-शीर्ण छत और धूल से अटे, मकड़ी के अंडों और मरे हुए कीड़े-मकोड़ों से भरे मकड़ी के जाले की तरफ देखा। अपने हाथ पोंछते हुए दंतचिकित्सक वापस लौटा। ‘जाकर सो जाओ,’ उसने कहा, ‘और नमक-पानी से गरारा कर लेना।’ मेयर उठ खड़ा हुआ और एक अनौपचारिक फौजी सलामी के साथ विदा लेकर, जैकेट की बटन बंद किए बिना ही, अपने पैर फैलाते, दरवाजे की ओर बढ़ चला।
‘बिल भेज देना,’ उसने कहा।
‘तुम्हारे या शहर के नाम?’
मेयर ने उसकी तरफ नहीं देखा। उसने दरवाजा बंद कर दिया और परदे के पीछे से कहा :
‘एक ही बात है।’

साभार: हिंदीसमय,
अनुवादक: मनोज पटेल

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