Sunday, 20 May 2018

आज तो सुमित्रानंदन पंत का जन्‍मदिन है, पढ़िए उनकी दो कवितायें

फोटो: प्रसार भारती से साभार
आज तो सुमित्रानंदन पंत का जन्‍मदिन है, तो चलिए इसी बात पर हो जाए उनकी दो कविताऐं जो हमें अपनी जड़ों तक ले जायेंगी।  वरना कौन ऐसा कर सकता है कि सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था....। 

सुमित्रानंदन पंत  हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसादमहादेवी वर्मासूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म उत्‍तराखंड के कौसानी, बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति,माथे पर पड़े हुए  लंबे घुंघराले बाल,सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। 

पहली कविता: तितली  जिसका रचनाकाल: मई’१९३५ है...


नीली, पीली औ’ चटकीली
पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,
प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली
तुम किस सुख में हो रही डोल?
चाँदी-सा फैला है प्रकाश,
चंचल अंचल-सा मलयानिल,
है दमक रही दोपहरी में
गिरि-घाटी सौ रंगों में खिल!
तुम मधु की कुसुमित अप्सरि-सी
उड़-उड़ फूलों को बरसाती,
शत इन्द्र चाप रच-रच प्रतिपल
किस मधुर गीति-लय में जाती?
तुमने यह कुसुम-विहग लिवास
क्या अपने सुख से स्वयं बुना?
छाया-प्रकाश से या जग के
रेशमी परों का रंग चुना?
क्या बाहर से आया, रंगिणि!
उर का यह आतप, यह हुलास?
या फूलों से ली अनिल-कुसुम!
तुमने मन के मधु की मिठास?
चाँदी का चमकीला आतप,
हिम-परिमल चंचल मलयानिल,
है दमक रही गिरि की घाटी
शत रत्न-छाय रंगों में खिल!
--चित्रिणि! इस सुख का स्रोत कहाँ
जो करता निज सौन्दर्य-सृजन?
’वह स्वर्ग छिपा उर के भीतर’--
क्या कहती यही, सुमन-चेतन?



दूसरी कविता चींटी 

चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

सुमित्रानंदन पंत की इन दो ही कविताओं में अपना बचपन ढूढ़ने वाले हम उन्‍हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं।
-अलकनंदा सिंह

Wednesday, 21 March 2018

आज विश्‍व कविता दिवस पर विशेष...संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य के प्रस्‍तुतकर्ता कौन थे

आज विश्‍व कविता दिवस है परंतु क्‍या हम जानते हैं कि संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य (एपिक) का प्रथम सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया है और परवर्ती आचार्यों में दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ ने अपने अपने ढंग से इस लक्षण का विस्तार किया है।
आचार्य विश्वनाथ का लक्षण निरूपण इस परंपरा में अंतिम होने के कारण सभी पूर्ववर्ती मतों के सारसंकलन के रूप में उपलब्ध है।


आचार्य विश्वनाथ के अनुसार महाकाव्य के लक्षण 
जिसमें सर्गों का निबंधन हो वह महाकाव्य कहलाता है।
 इसमें देवता या सदृश क्षत्रिय, जिसमें धीरोदात्तत्वादि गुण हों, नायक होता है। कहीं एक वंश के अनेक सत्कुलीन भूप भी नायक होते हैं।
शृंगार, वीर और शांत में से कोई एक रस अंगी होता है तथा अन्य सभी रस अंग रूप होते हैं। उसमें सब नाटकसंधियाँ रहती हैं। कथा ऐतिहासिक अथवा सज्जनाश्रित होती है। चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक उसका फल होता है। आरंभ में नमस्कार, आशीर्वाद या वर्ण्यवस्तुनिर्देश होता है।

कहीं खलों की निंदा तथा सज्जनों का गुणकथन होता है। न अत्यल्प और न अतिदीर्घ अष्टाधिक सर्ग होते हैं जिनमें से प्रत्येक की रचना एक ही छंद में की जाती है और सर्ग के अंत में छंदपरिवर्तन होता है। कहीं-कहीं एक ही सर्ग में अनेक छंद भी होते हैं। सर्ग के अंत में आगामी कथा की सूचना होनी चाहिए। उसमें संध्या, सूर्य, चंद्रमा, रात्रि, प्रदोष, अंधकार, दिन, प्रात:काल, मध्याह्न, मृगया, पर्वत, ऋतु, वन, सागर, संयोग, विप्रलंभ, मुनि, स्वर्ग, नगर, यज्ञ, संग्राम, यात्रा और विवाह आदि का यथासंभव सांगोपांग वर्णन होना चाहिए।

आचार्य विश्वनाथ का उपर्युक्त निरूपण महाकाव्य के स्वरूप की वैज्ञानिक एवं क्रमबद्ध परिभाषा प्रस्तुत करने के स्थान पर उसकी प्रमुख और गौण विशेषताओं का क्रमहीन विवरण उपस्थित करता है।

इसके आधार पर संस्कृत काव्यशास्त्र में उपलब्ध महाकाव्य के लक्षणों का सार इस प्रकार किया जा सकता है-

कथानक - महाकाव्य का कथानक ऐतिहासिक अथवा इतिहासाश्रित होना चाहिए।

विस्तार - कथानक का कलवेर जीवन के विविध रूपों एवं वर्णनों से समृद्ध होना चाहिए। ये वर्णन प्राकृतिक, सामाजिक और राजीतिक क्षेत्रों से इस प्रकार संबंद्ध होने चाहिए कि इनके माध्यम से मानव जीवन का पूर्ण चित्र उसके संपूर्ण वैभव, वैचित्र्य एवं विस्तार के साथ उपस्थित हो सके। इसीलिए उसका आयाम (अष्टाधिक सर्गों में) विस्तृत होना चाहिए।
विन्यास - कथानक की संघटना नाट्य संधियों के विधान से युक्त होनी चाहिए अर्थात् महाकाव्य के कथानक का विकास क्रमिक होना चाहिए। उसकी आधिकारिक कथा एवं अन्य प्रकरणों का पारस्परिक संबंध उपकार्य-उपकारक-भाव से होना चाहिए तथा इनमें औचित्यपूर्ण पूर्वापर अन्विति रहनी चाहिए।
नायक - महाकाव्य का नायक देवता या सदृश क्षत्रिय हो, जिसका चरित्र धीरोदात्त गुणों से समन्वित हो - अर्थात् वह महासत्त्व, अत्यंत गंभीर, क्षमावान् अविकत्थन, स्थिरचरित्र, निगूढ़, अहंकारवान् और दृढ़व्रत होना चाहिए। पात्र भी उसी के अनुरूप विशिष्ट व्यक्ति, राजपुत्र, मुनि आदि होने चाहिए।
रस - महाकाव्य में शृंगार, वीर, शांत एवं करुण में से किसी एक रस की स्थिति अंगी रूप में तथा अन्य रसों की अंग रूप में होती है।
फल - महाकाव्य सद्वृत होता है - अर्थात् उसकी प्रवृत्ति शिव एवं सत्य की ओर होती है और उसका उद्देश्य होता है चतुवर्ग की प्राप्ति।
शैली - शैली के संदर्भ में संस्कृत के आचार्यों ने प्राय: अत्यंत स्थूल रूढ़ियों का उल्लेख किया है। उदाहरणार्थ एक ही छंद में सर्ग रचना तथा सर्गांत में छंदपरिवर्तन, अष्टाधिक सर्गों में विभाजन, नामकरण का आधार आदि। परंतु महाकाव्य के अन्य लक्षणों के आलोक में यह स्पष्ट ही है कि महाकाव्य की शैली नानावर्णन क्षमा, विस्तारगर्भा, श्रव्य वृत्तों से अलंकृत, महाप्राण होनी चाहिए। आचार्य भामह ने इस भाषा को सालंकार, अग्राम्य शब्दों से युक्त अर्थात् शिष्ट नागर भाषा कहा है।

-प्रस्‍तुति: विकीपीडिया व साहित्यदर्पण, परिच्छेद 6,315-324 के आधार पर

Thursday, 15 March 2018

आज राही मासूम रजा की पुण्‍यतिथि है…

”कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता” के ये शब्‍द हमने रजा साहब का संस्‍मरण लेख से हिंदी समय से साभार लिया है
यहाँ (बंबई में) कई दोस्त मिले जिनके साथ अच्छी-बुरी गुजरी। कृष्ण चंदर, भारती, कमलेश्वर, जो शुरू ही में ये न मिल गए होते तो बंबई में मेरा रहना असंभव हो जाता। शुरू में मेरे पास कोई काम नहीं था और बंबई में मैं अजनबी था। उन दिनों इन दोस्तों ने बड़ी मदद की। इन्होंने मुझे जिंदा रखने के लिए चंदा देकर मेरी तौहीन नहीं की। इन्होंने मुझे उलटे-सीधे काम दिए और उस काम की मजदूरी दी। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं इन लोगों के एहसान से कभी बरी हो सकता हूँ।
मुझे वह दिन आज भी अच्छी तरह याद है जब नैयर होली फैमिली अस्पताल में थीं। चार दिन के बाद अस्पताल का बिल अदा करके मुझे नैयर और मरियम को वहाँ से लाना था। सात-साढ़े सात सौ का बिल था और मेरे पास सौ-सवा सौ रुपए थे। तब कमलेश्वर ने ‘सारिका’ से, भारती ने ‘धर्मयुग’ से मुझे पैसे एडवांस दिलवाए और कृष्ण जी ने अपनी एक फिल्म के कुछ संवाद लिखवा के पैसे दिये और मरियम घर आ गईं। आज सोचता हूँ कि जो यह तीनों न रहे होते तो मैंने क्या किया होता? क्या मरियम को अस्पताल में छोड़ देता? वह बहुत बुरे दिन थे। कुछ दोस्तों से उधार भी लिया। कलकत्ते से ओ.पी. टाँटिया और राजस्थान से मेरी एक मुँहबोली बहन लनिला और अलीगढ़ से मेरे भाई मेहँदी रजा और दोस्त कुँवरपाल सिंह ने मदद की। कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता। और कुछ बातें ऐसी हैं जो एहसान में नहीं आतीं पर उन्हें याद करो तो आँखें नम हो जाती हैं।
जब मैं अलीगढ़ से बंबई आया तो अपने छोटे भाई अहमद रजा के साथ ठहरा। छोटे भाई तो बहुतों के होते हैं, पर अहमद रजा यानी हद्दन जैसा छोटा भाई मुश्किल से होगा किसी की तकदीर में। उसने मेरा स्वागत यूँ किया कि मैं यह भूल गया कि फिलहाल मैं बेरोजगार हूँ। हम हद्दन के साथ ठहरे हुए थे, पर लगता था कि वह अपने परिवार के साथ हमारे साथ ठहरे हुए हैं। घर में होता वह था जो मैं चाहता था या मेरी पत्नी नैयर चाहती थी। वह घर बहुत सस्ता था। जिस फ्लैट में अब हूँ उससे बड़ा था। इसका किराया 600 दे रहा हूँ। उसका किराया केवल 150 रुपए माहवार था। तो हद्दन ने सोचा कि वह घर उन्हें मेरे लिए खाली कर देना चाहिए। रिजर्व बैंक से उन्हें फ्लैट मिल सकता था, मिल गया। जब वह जाने लगे तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ साजिश की कि घर का सारा सामान मेरे लिए छोड़ जाएँ क्योंकि मेरे पास तो कुछ था नहीं। जाहिर है कि मैं इस पर राजी नहीं हुआ। उन दोनों को बड़ी जबरदस्त डाँट पिलाई मैंने।
चुनांचे वह घर का सारा सामान लेकर चले गए और घर नंगा रह गया। मेरे पास दो कुर्सियाँ भी नहीं थीं। हम ने कमरे में दो गद्दे डाल दिए और वही दो गद्दोंवाला वीरान कमरा बंबई में हमारा पहला ड्राइंग रूम बना… उन दिनों मैं नैयर से शर्माने लगा था। मैं सोचता कि यह क्या मुहब्बत हुई, कैसी जिंदगी से निकाल कर कैसी जिंदगी में ले आया मैं उस औरत को जिसे मैंने अपना प्यार दे रक्खा है… अपना तमाम प्यार। मगर नैयर ने मुझे यह कभी महसूस नहीं होने दिया कि वह निम्नमध्यवर्गीय जिंदगी को झेल नहीं पा रही है। हम दोनों उस उजाड़ घर में बहुत खुश थे। उन दिनों कृष्ण चंदर, सलमा आपा, भारती और कमलेश्वर के सिवा कोई लेखक हमसे जी खोल के मिलता नहीं था। हम मजरूह साहब के घर उन से मिलने जाते तो वह अपने बेडरूम में बैठे शतरंज खेलते रहते और हम लोगों से मिलने के लिए बाहर न निकलते। फिरदौस भाभी बेचारी लीपापोती करती रहतीं… कई और लेखक इस डर से कतरा जाते थे कि मैं कहीं मदद न माँग बैठूँ।…
आप खुद सोच सकते हैं कि हमारे चारों ओर कैसा बेदर्द और बेमुरव्वत अँधेरा रहा होगा उन दिनों। नैयर लोगों से मिलते भी घबराती थीं, इसलिए मिलना-जुलना भी कम लोगों से था और बहुत कम था… कि एक दिन सलमा आपा आ गईं। इन्हें आप सलमा सिद्दीकी के नाम से जानते हैं। उस वक्त हम दोनों उन्हीं गद्दों पर बैठे रमी खेल रहे थे। सलमा आपा बैठीं। इधर-उधर की बातें होती रहीं। फिर वह चली गईं और थोड़ी देर के बाद उनका एक नौकर एक ठेले पर एक सोफा लदवाए हुए आया। हमने उस तोहफे को स्वीकार कर लिया, कि जो न करते तो सलमा आपा और कृष्ण जी को तकलीफ होती और हम उन्हें तकलीफ देना नहीं चाहते थे।
साभार: हिंदी समय
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Wednesday, 7 March 2018

आज अज्ञेय के जन्‍मदिन पर बावरा अहेरी सहित 3 कविताऐं

आज 7 मार्च, 1911 को कसया, उत्‍तरप्रदेश में अज्ञेय का जन्म हुआ, शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत-मौखिक परम्परा से हुआ 1915 से ’19 तक श्रीनगर और जम्मू में। यहीं पर संस्कृत पंडित से रघुवंश रामायण, हितोपदेश, फारसी मौलवी से शेख सादी और अमेरिकी पादरी से अंग्रेजी की शिक्षा घर पर पढ़कर सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को प्रेमचंद ने ‘अज्ञेय’ बनाकर हमारे लिए एक ऐसी साहित्‍यिक थाती सौंप दी जिसका आज भी कोई पूरी तरह विश्‍लेषण नहीं कर पाया।
दिल्ली में, 2 सितम्बर, 1951 को बावरा अहेरी उन्‍हीं की लिखी ऐसी कविता है जो सोचने पर विवश कर देती है कि  नाम बड़ा नहीं होता, बड़ी सोच होती है जो व्‍यक्‍ति को बड़ा बनाती है। ऐसे थे कवि अज्ञेय।
पढ़िए उनकी तीन कविताऐं
1. बावरा अहेरी
भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को
बाँध लेता है सभी को साथः
छोटी-छोटी चिड़ियाँ
मँझोले परेवे
बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले
डौल के बैडौल
उड़ने जहाज़
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल घुस्सों वाली
उपयोग-सुंदरी
बेपनाह कायों कोः
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुँए को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि
रूप-रेखा को
और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दण्ड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को
हरा देगी !
बावरे अहेरी रे
कुछ भी अवध्य नहीं तुझे, सब आखेट हैः
एक बस मेरे मन-विवर में दुबकी कलौंस को
दुबकी ही छोड़ कर क्या तू चला जाएगा ?
ले, मैं खोल देता हूँ कपाट सारे
मेरे इस खँढर की शिरा-शिरा छेद के
आलोक की अनी से अपनी,
गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर देः
विफल दिनों की तू कलौंस पर माँज जा
मेरी आँखे आँज जा
कि तुझे देखूँ
देखूँ और मन में कृतज्ञता उमड़ आये
पहनूँ सिरोपे-से ये कनक-तार तेरे –
बावरे अहेरी
2. जो पुल बनाएंगे
जो पुल बनाएँगे
वे अनिवार्यतः
पीछे रह जाएँगे।
सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगे राम;
जो निर्माता रहे
इतिहास में बन्दर कहलाएँगे
3. मेरे देश की आँखें 
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
पुते गालों के ऊपर
नकली भवों के नीचे
छाया प्यार के छलावे बिछाती
मुकुर से उठाई हुई
मुस्कान मुस्कुराती
ये आँखें –
नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं…
तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से
शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ –
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं…
वन डालियों के बीच से
चौंकी अनपहचानी
कभी झाँकती हैं
वे आँखें,
मेरे देश की आँखें,
खेतों के पार
मेड़ की लीक धारे
क्षिति-रेखा को खोजती
सूनी कभी ताकती हैं
वे आँखें…
उसने
झुकी कमर सीधी की
माथे से पसीना पोछा
डलिया हाथ से छोड़ी
और उड़ी धूल के बादल के
बीच में से झलमलाते
जाड़ों की अमावस में से
मैले चाँद-चेहरे सुकचाते
में टँकी थकी पलकें
उठायीं –
और कितने काल-सागरों के पार तैर आयीं
मेरे देश की आँखें…
(पुरी-कोणार्क, 2 जनवरी 1980)
  • Legend News

Tuesday, 6 March 2018

Gabriel García Márquez के जन्‍मदिन पर पढ़िए उनकी लिखी कहानी- ऐसे ही किसी दिन

गूगल ने आज कोलंबियाई मूल के लेखक Gabriel García Márquez की 91वीं जयंती पर डूडल बनाकर मशहूर हुए इस साहित्‍यकार को याद किया है।
गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की किताब ‘हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई और यह उनकी बेस्टसेलर में भी शामिल हुई। हिंदी में इसका अनुवाद ‘एकांत के सौ वर्ष’ शीर्षक से हुआ। ग्रैबियल की किताबों पर हॉलीवुड में कई फिल्में बनीं, लेकिन फिल्में उस तरह का जादू नहीं बिखेर सकीं, जिस तरह उन्होंने अपनी किताबों में उकेरा है। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिये जीवन और उससे जुड़े पहलुओं ,को बहुत ही खूबसूरती के साथ छुआ है।
गैब्रियल गार्सिया मार्खेज पत्रकारिता से शुरुआत करते हुए कहानियां, उपन्‍यास लिखे, 1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया था।
Gabriel García Márquez के बारे में जानिए-
गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ (6 मार्च 1927 – 17 अप्रैल 2014) नोबेल पुरस्कृत विश्वविख्यात साहित्यकार थे। १९५० में रोम और पेरिस में स्पेक्टेटर के संवाददाता रहे। १९५९ से १९६१ तक क्यूबा की संवाद एजेंसी के लिए हवाना और न्यूयार्क में काम किया। वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव के कारण उन पर अमेरिका और कोलम्बिया सरकारों द्वारा देश में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगया गया। उनका प्रथम कहानी-संग्रह लीफ स्टार्म एंड अदर स्टोरीज १९५५ में प्रकाशित: नो वन नाइट्, टु द कर्नल एंड अदर स्टोरीज और आइज़ ऑफ ए डॉग श्रेष्ठ कहानी संग्रह है। उनके उपन्यास सौ साल का एकांत (वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सालीच्यूड) को १९८२ में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। १७ अप्रैल २०१४ को ८७ वर्ष की आयु में मैक्सिको नगर में उनका निधन हो गया।
Márquez के जन्‍मदिन पर पढ़िए उनकी लिखी कहानी-
”ऐसे ही किसी दिन”
उस सोमवार की सुबह, गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने, जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था, अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने शीशे की आलमारी से नकली दाँत निकाले, जो अब भी खड़िया-मिट्टी के साँचे में जड़े हुए थे, और मुट्ठी भर औजारों को उनके आकार के क्रम में मेज पर यूँ सजा के रखा जैसे उनकी नुमाइश की जा रही हो। उसने बिना कालर वाली एक धारीदार कमीज पहन रखी थी जिसके बंद गले पर सुनहरा बटन था, और उसकी पैंट गेलिस से बँधी हुई थी। वह दुबला-पतला सींकिया इनसान था जिसकी निगाह कभी-कभार ही हालात के अनुरूप हो पाती थी, जैसा कि बहरे लोगों की निगाहों के मामले में होता है।
औजारों को मेज पर व्यवस्थित करने के बाद वह ड्रिल को कुर्सी के पास खींच लाया और नकली दाँतों को चमकाने बैठ गया। वह अपने काम के बारे में सोचता नहीं दिख रहा था, बल्कि, ड्रिल को अपने पैरों से चलाते हुए, तब भी जबकि उसकी जरूरत नहीं होती थी, वह निरंतर काम किए जा रहा था।
आठ बजे के बाद खिड़की से आसमान को देखने के इरादे से, वह थोड़ी देर के लिए रुका और उसने देखा कि दो विचारमग्न बाज बगल के मकान की शहतीर पर धूप ले रहे थे। वह इस खयाल के साथ फिर काम में जुट गया कि दोपहर के खाने के पहले फिर से बारिश होगी। अपने ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ।
‘पापा।’
‘क्या है?’
‘मेयर पूछ रहे हैं कि क्या आप उनका दाँत निकाल देंगे।’
‘उससे बता दो कि मैं यहाँ नहीं हूँ।’
वह एक सोने का दाँत चमका रहा था। हाथ भर की दूरी पर ले जाकर उसने आँखें भींचकर दाँत को जाँचा-परखा। छोटे से वेटिंग रूम से फिर उसका बेटा चिल्लाया।
‘वो कह रहे हैं कि आप यहीं हैं, और यह भी कि वह आपकी आवाज सुन सकते हैं।’
दंतचिकित्सक ने दाँतों की जाँच-पड़ताल जारी रखी। उसे मेज पर बाकी चमकाए जा चुके दाँतों के साथ रखने के बाद ही वह बोला : ‘अच्छा है, सुनने दो उसे।’
वह फिर से ड्रिल चलाने लगा। उसने गत्ते के डिब्बे से, जहाँ कि वह ऐसी चीजें रखता था जिनपर काम करना बाकी है, कुछ दाँत निकाले और सोने को चमकाने में जुट गया।
‘पापा।’
‘क्या है ?’
उसने अब भी अपना हाव-भाव नहीं बदला था।
‘वह कह रहे हैं कि अगर आप उनका दाँत नहीं निकालेंगे तो वह आपको गोली मार देंगे।’
बिना हड़बड़ाए, बहुत स्थिर गति से उसने ड्रिल को पैडल मारना बंद किया, उसे कुर्सी से परे धकेला और मेज की निचली दराज को पूरा बाहर खींच लिया। उसमें एक रिवाल्वर पड़ी थी। ‘ठीक है,’ उसने कहा। ‘उससे कहो कि आकर मुझे गोली मार दे।’
उसने कुर्सी को घुमाकर दरवाजे के सामने कर लिया, उसका हाथ दराज के सिरे पर टिका हुआ था। मेयर दरवाजे पर नजर आया। उसने अपने चेहरे के बाईं तरफ तो दाढ़ी बनाई हुई थी, लेकिन दूसरी तरफ, सूजन और दर्द की वजह से पाँच दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी मौजूद थी। दंतचिकित्सक ने उसकी नीरस आँखों में कई रातों की नाउम्मीदी देखी। उसने अपने उँगली के पोरों से दराज को बंद कर धीरे से कहा :
‘बैठ जाओ।’
‘गुड मार्निंग,’ मेयर ने कहा।
‘मार्निंग,’ दंतचिकित्सक ने जवाब दिया।
जब औजार उबल रहे थे, मेयर ने अपना सर कुर्सी के सिरहाने पर टिका दिया और कुछ बेहतर महसूस करने लगा। उसकी साँसे सर्द थीं। यह एक घटिया क्लीनिक थी : एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी, पैर से चलने वाली एक ड्रिल, मिट्टी की शीशियों से भरी एक शीशे की आलमारी। कुर्सी के सामने एक खिड़की थी जिस पर कंधों की ऊँचाई तक के परदे पड़े हुए थे। जब उसने दंतचिकित्सक को आता हुआ महसूस किया, तो उसने अपनी एड़ी को कड़ा करके मुँह खोल दिया।
औरेलियो एस्कोवार ने अपना सर रोशनी की दिशा में घुमा लिया। संक्रमित दाँत के मुआयने के बाद उसने उँगलियों के सतर्क दबाव से मेयर का जबड़ा बंद कर दिया।
‘यह काम संवेदनशून्य किए बिना ही करना पड़ेगा,’ उसने कहा।
‘क्यों?’
‘क्योंकि अंदर एक घाव है।’
मेयर ने उसकी आँखों में देखा। ‘ठीक है,’ उसने कहा, और मुस्कराने की कोशिश की। दंतचिकित्सक जवाब में नहीं मुस्कराया। अब भी बिना किसी जल्दबाजी के वह, विसंक्रमित औजारों का पात्र, काम करने की मेज तक ले आया और उन्हें एक ठंडी चिमटी की सहायता से पानी से बाहर निकाला। फिर उसने पीकदान को जूते की नोक से धकेला और वाशबेसिन में हाथ धुलने के लिए गया। यह सब उसने मेयर की तरफ देखे बिना ही किया। लेकिन मेयर ने उस पर से अपनी नजरें नहीं हटाईं।
घाव अक्ल दाढ़ के निचले हिस्से में था। दंतचिकित्सक ने अपने पैर फैलाकर गर्म संडासी से दाँत को पकड़ लिया। मेयर ने कुर्सी के हत्थों को मजबूती से थाम लिया, अपनी पूरी ताकत से पैरों को कड़ा कर लिया और अपने गुर्दों में एक बर्फीला खालीपन महसूस किया मगर कोई आवाज नहीं निकाली। दंतचिकित्सक ने महज अपनी कलाई को हरकत दी। बिना किसी विद्वेष के, बल्कि एक कटु कोमलता के साथ, उसने कहा :
‘अब तुम हमारे बीस मारे गए लोगों की कीमत अदा करोगे।’
मेयर ने अपने जबड़े में हड्डियों की चरमराहट महसूस की, और उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। लेकिन उसने तब तक साँस नहीं लिया जब तक कि उसे दाँत निकलने का एहसास न हो गया। फिर उसने अपने आँसुओं के बीच से उसे देखा। उसके दर्द के चलते वह इतना पराया नजर आ रहा था कि वह अपनी पिछली पाँच रातों की यातना समझने में नाकाम रहा।
पीकदान पर झुके, पसीने से तर, हाँफते हुए उसने अपनी जैकेट की बटन खोली और पैंट की जेब से रूमाल निकालने को हुआ। दंतचिकित्सक ने उसे एक साफ़ कपड़ा दिया।
‘अपने आँसू पोंछ लो,’ उसने कहा।
मेयर ने ऐसा ही किया। वह काँप रहा था। जब दंतचिकित्सक अपने हाथ धुल रहा था, उसने जीर्ण-शीर्ण छत और धूल से अटे, मकड़ी के अंडों और मरे हुए कीड़े-मकोड़ों से भरे मकड़ी के जाले की तरफ देखा। अपने हाथ पोंछते हुए दंतचिकित्सक वापस लौटा। ‘जाकर सो जाओ,’ उसने कहा, ‘और नमक-पानी से गरारा कर लेना।’ मेयर उठ खड़ा हुआ और एक अनौपचारिक फौजी सलामी के साथ विदा लेकर, जैकेट की बटन बंद किए बिना ही, अपने पैर फैलाते, दरवाजे की ओर बढ़ चला।
‘बिल भेज देना,’ उसने कहा।
‘तुम्हारे या शहर के नाम?’
मेयर ने उसकी तरफ नहीं देखा। उसने दरवाजा बंद कर दिया और परदे के पीछे से कहा :
‘एक ही बात है।’

साभार: हिंदीसमय,
अनुवादक: मनोज पटेल

Friday, 16 February 2018

निराला के शब्‍द-क्रीड़ांगन में यमुना-गान

आज के दिन 16 फरवरी 1896- हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार और लेखक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म हुआ था, हालांकि विकीपीडिया पर 21 फरवरी अंकित है परंतु पंचांग-तिथि के अनुसार इनके जन्‍म के संबंध में अलग अलग मत हैं।

बहरहाल इस अवसर पर उन्‍हें याद करते हुए हम ब्रजवासी उनके अत्‍यंत आभारी हैं क्‍योंकि उन्‍होंने ''यमुना के प्रति'' लिखकर हमारी आराध्‍या यमुना को जिसतरह शब्‍दों के क्रीड़ांगन में उतारा है, वह आजतक हमारी प्रार्थना में है और सदैव रहेगा। यमुना आज जिस दयनीय दशा से गुजर रही हैं, उस दर्द से व्‍यथित ब्रजवासियों को निराला के ये शब्‍द उपहार हैं। 

ये रहीं वो अद्भुत रचना ''यमुना के प्रति''-----

स्वप्नों-सी उन किन आँखों की
पल्लव-छाया में अम्लान
यौवन की माया-सा आया
मोहन का सम्मोहन ध्यान?
गन्धलुब्ध किन अलिबालों के
मुग्ध हृदय का मृदु गुञ्जार
तेरे दृग-कुसुमों की सुषमा
जाँच रहा है बारम्बार?

यमुने, तेरी इन लहरों में
किन अधरों की आकुल तान
पथिक-प्रिया-सी जगा रही है
उस अतीत के नीरव गान?

बता कहाँ अब वह वंशी-वट?
कहाँ गये नटनागर श्याम?
चल-चरणों का व्याकुल पनघट
कहाँ आज वह वृंदा धाम?
कभी यहाँ देखे थे जिनके
श्याम-विरह से तप्त शरीर,
किस विनोद की तृषित गोद में
आज पोंछती वे दृगनीर?



रंजित सहज सरल चितवन में     
उत्कण्ठित सखियों का प्यार
क्या आँसू-सा ढुलक गया वह
विरह-विधुर उर का उदगार?



तू किस विस्मृति की वीणा से
उठ-उठकर कातर झंकार
उत्सुकता से उकता-उकता
खोल रही स्मृति के दृढ़ द्वार?----
अलस प्रेयसी-सी स्वप्नों में
प्रिय की शिथिल सेज के पास
लघु लहरों के मधुर स्वरों में
किस अतीत का गूढ़ विलास?


उर-उर में नूपुर की ध्वनि-सी
मादकता की तरल तरंग
विचर रही है मौन पवन में
यमुने, किस अतीत के संग?


किस अतीत का दुर्जय जीवन
अपनी अलकों में सुकुमार
कनक-पुष्प-सा गूँथ लिया है ----
किसका है यह रूप अपार?
निर्निमेष नयनों में छाया
किस विस्मृति मदिरा का राग
जो अब तक पुलकित पलकों से
छलक रहा यह मृदुल सुहाग?


मुक्त हृदय के सिंहासन पर
किस अतीत के ये सम्राट
दीप रहे जिनके मस्तक पर
रवि-शशि-तारे-विश्व-विराट? 


निखिल विश्व की जिज्ञासा-सी
आशा की तू झलक अमन्द
अंत:पुर की निज शय्या पर
रच-रच मृदु छन्दों के बन्द,
किस अतीत के स्नेह-सुहृद को
अर्पण करती तू निज ध्यान ---
ताल-ताल के कम्पन से, द्रुत
बहते हैं ये किसके गान?



विहगों की निद्रा से नीरव
कानन के संगीत अपार
किस अतीत के स्वप्न-लोक में
करते हैं मृदु-पद-संचार?


मुग्धा के लज्जित पलकों पर
तू यौवन की छवि अज्ञात
आँख-मिचौनी खेल रही है
किस अतीत शिशुता के साथ?
किस अतीत सागर-संगम को
बहते खोल हृदय के द्वार
बोहित के हित सरल अनिल-से
नयन-सलिल के स्त्रोत अपार?

उस सलज्ज ज्योत्स्ना-सुहाग की
फेनिल शय्या पर सुकुमार,
उत्सुक, किस अभिसार-निशा में,
गयी कौन स्वप्निल पर मार ?



उठ-उठकर अतीत विस्मृति से
किसकी स्मिति यह --- किसका प्यार
तेरे श्याम कपोलों में खुल
कर जाती है चकित विहार?
जीवन की इस सरस सुरा में,
कह, यह किसका मादक राग
फूट पड़ा तेरी ममता में
जिसकी समता का अनुराग?



किन नियमों का निर्मम बन्धन
जग की संसृति का परिहास
कर बन जाते करुणा-क्रन्दन?
सखि, वे किसके निर्दय पाश?



कलियों की मुद्रित पलकों में
सिसक रही जो गन्ध अधीर
जिसकी आतुर दुख-गाथा पर
ढुलकाते दृग-पल्लव नीर,
बता, करुण-कर-किरण बढ़ाकर
स्वप्नों का सचित्र संसार
आँसू पोंछ दिखाया किसने
जगती का रहस्यमय द्वार?


जागृति के इस नवजीवन में
किस छाया का माया-मन्त्र
गूँज-गूँज मृदु खींच रहा है
अलि दुर्बल जन का मन-यन्त्र ?



अलि अलकों के तरल तिमिर में
किसकी लोल लहर अज्ञात
जिसके गूढ़ मर्म में निश्चित
शशि-सा मुख ज्योत्स्ना-सी गात?
कह, सोया किस खंजन-वन में
उन नयनों का अंजन-राग?
बिखर गये अब किन पातों में
वे कदम्ब-मुख-स्वर्ण-पराग?


चमक रहे अब किन तारों में
उन हारों के मुक्ता-हीर?
बजते हैं अब किन चरणों में
वे अधीर नुपुर-मंजीर?



किस समीर से कांप रही वह
वंशी की स्वर-सरित-हिलोर?
किस वितान से तनी प्राण तक
छू जाती वह करुण मरोर?
खींच रही किस आशा-पथ पर
वह यौवन की प्रथम पुकार?
सींच रही लालसा-लता नित
किस कंकन की मृदु झंकार?


उमड़ चला अब वह किस तट पर
क्षुब्ध प्रेम का पारावार?
किसकी विकच वीचि-चितवन पर
अब होता निर्भय अभिसार



भटक रहे वे किस के मृग-दृग?
बैठी पथ पर कौन निराश?---
मारी मरु-मरीचिका की-सी
ताक रही उदास आकाश।
हिला रहा अब कुंजों के किन
द्रुम-पुंजों का हृदय कठोर
विगलित विफल वासनाओं से
क्रन्दन-मलिन पुलिन का रोर?


किस प्रसाद के लिए बढ़ा अब
उन नयनों का विरस विषाद?
किस अजान में छिपा आज वह
श्याम गगन का घन उन्माद?



कह किस अलस मराल-चाल पर
गूंज उठे सारे संगीत
पद-पद के लघु ताल-ताल पर
गति स्वच्छन्द, अजीत अभीत?
स्मित-विकसित नीरज नयनों पर
स्वर्ण-किरण-रेखा अम्लान
साथ-साथ प्रिय तरुण अरुण के
अन्धकार में छिपी अजान।


किस दुर्गम गिरि के कंदर में
डूब जग का नि:श्वास?
उतर रहा अब किस अरण्य में
दिन मणिहीन अस्त आकाश?



आप आ गया प्रिय के कर में
कह, किसका वह कर सुकुमार
विटप-विहग ज्यों फिरा नीड़ में
सहम तमिस्त्र देख संसार?
स्मर-सर के निर्मल अन्तर में
देखा था जो शशि प्रतिभात
छिपा लिया है उसे जिन्होंने
हैं वे किस घन वन के पात?


कहाँ आज वह निद्रित जीवन
बंधा बाहुओं में भी मुक्त?
कहाँ आज वह चितवन चेतन
श्याम--मोह--कज्जल--अभियुक्त?



वह नयनों का स्वप्न मनोहर
हृदय-सरोवर का जलजात,
एक चन्द्र निस्सीम व्योम का,
वह प्राची का विमल प्रभात,
वह राका की निर्मल छवि, वह
गौरव रवि, कवि का उत्साह,
किस अतीत से मिला आज वह
यमुने तेरा सरस प्रवाह?


खींच रहा है मेरा मन वह
किस अतीत का इंगित मौन
इस प्रसुप्ति से जगा रही जो
बता, प्रिया-सी है वह कौन?


वह अविकार गहन-सुख-दुःख-गृह,
वह उच्छृंखलता उद्दाम,
वह संसार भीरु-दृग-संकुल,
ललित-कल्पना-गति अभिराम,
वह वर्षों का हर्षित क्रीड़न,
पीड़न का चंचल संसार,
वह विलास का लास-अंक, वह
भृकुटि-कुटिल-प्रिय-पथ का पार ;


वह जागरण मधुर अधरों पर,
वह प्रसुप्ति नयनों में लीन,
मुग्ध मौन मन में सुख उन्मुख,
आकर्षण मय नित्य नवीन,



वह सहसा सजीव कम्पन-द्रुत
सुरभि-समीर, अधीर वितान,
वह सहसा स्तम्भित वक्षस्थल,
टलमल पद, प्रदीप निर्वाण,
गुप्त-रहस्य-सृजन-अतिशय श्रम,
वह क्रम-क्रम से संचित ज्ञान,
स्खलित-वसन-तनु-सा तनु अभरण,
नग्न, उदास, व्यथित अभिमान,


वह मुकुलित लावण्य लुप्तामधु,
सुप्त पुष्प में विकल विकास,
वह सहसा अनुकूल प्रकृति के
प्रिय दुकूल में प्रथम प्रकाश;



वह अभिराम कामनाओं का
लज्जित उर, उज्ज्वल विश्वास,
वह निष्काम दिवा-विभावरी,
वह स्वरूप-मद-मंजुल हास,
वह सुकेश-विस्तार कुंज में
प्रिय का अति-उत्सुक सन्धान,
तारों के नीरव समाज में,
यमुने, वह तेरी मृदु गान;


वह अतृप्त आग्रह से सिंचित
विरह-विटप का मूल मलीन
अपने ही फूलों से वंचित
वह गौरव-कर निष्प्रभ, क्षीण,



वह  निशीथ की नग्न वेदना,
दिन की दम्य दुराशा आज
कहाँ अँधेरे का प्रिय-परिचय,
कहाँ दिवस की अपनी लाज?
उदासीनता गृह-कर्मों में,
मर्म मर्म में विकसित स्नेह,
निरपराध हाथों में छाया
अंजन-रंजन-भ्रम, सन्देह;


विस्मृत-पथ-परिचायक स्वर से
छिन्न हुए सीमा-दृढ़पाश,
ज्योत्स्ना के मण्डप में निर्भय
कहाँ हो रहा है वह रास?



वह कटाक्ष-चंचल यौवन-मन
वन-वन प्रिय-अनुसरण-प्रयास
वह निष्पलक सहज चितवन पर
प्रिय का अचल अटल विश्वास;
अलक-सुगन्ध-मंदिर सरि-शीतल
मंद अनिल, स्वच्छन्द प्रवाह,
वह विलोल हिल्लोल चरण कटि,
भुज, ग्रीवा का वह उत्साह;



मत्त-भृंग-सम संग-संग तम---
तारा मुख-अम्बुज-मधु-लुब्ध,
विकल विलोड़ित चरण-अंक पर
शरण-विमुख नूपुर-उर क्षुब्ध,
वह संगीत विजय-मद-गर्वित

नृत्य-चपल अधरों पर आज
वह अजीत-इंगित-मुखरित मुख
कहाँ आज वह सुखमय साज?

         
वह अपनी अनुकूल प्रकृति का
फूल, वृन्त पर विचक अधीर,
वह उदार सम्वाद विश्व का
वह अनन्त नयनों का नीर,



वह स्वरूप-मध्याह्न-तृषा का
प्रचुर आदि-रस, वह विस्तार
सफल प्रेम का, जीवन के वह
दुस्तर सर-सागर का पार;



वह अंजलि कलिका की कोमल,
वह प्रसून की अन्तिम दृष्टि,
वह अनन्त का ध्वंस सान्त, वह
सान्त विश्व की अगणित सृष्टि:
वह विराम-अलसित पलकों पर
सुधि की चंचल प्रथम तरंग,
वह उद्दीपन, वह मृदु कम्पन,
वह अपनापन, वह प्रिय-संग,


वह अज्ञात पतन लज्जा का
स्खलन शिथिल घूंघट का देख
हास्य-मधुर निर्लज्ज उक्ति वह
वह नवयौवन का अभिषेक;



मुग्ध रूप का वह क्रय-विक्रय,
वह विनिमय का निर्दय भाव,
कुटिल करों को सौंप सुहृद-मन,
वह विस्मरण, मरण, वह चाव,
असफल छल की सरल कल्पना,
ललनाओं का मृदु उदगार
बता, कहाँ विक्षुब्ध हुआ वह
दृढ़ यौवन का पीन उभार;


उठा तूलिका मृदु चितवन की,
भर मन की मदिरा में मौन,
निर्निमेष नभ-नील-पटल पर
अटल खींचती छवि, वह कौन?



कहाँ यहाँ अस्थिर तृष्णा का
बहता अब वह स्त्रोत अजान?
कहाँ हाय निरुपाय तृणों से
बहते अब वे अगणित प्राण?
नहीं यहाँ नयनों में पाया
कहीं समाया वह अपराध,
कहाँ यहाँ अधिकृत अधरों पर
उठता वह संगीत अबाध?


मिली विरह के दीर्घ श्वास से
बहती कहीं नहीं बातास,
कहाँ सिसक मृदु मलिन मर्म में
मुरझा जाता वह निश्वास?



कहाँ छलकते अब वैसे ही
ब्रज-नागरियों के गागर?
कहाँ भीगते अब वैसे ही
बाहु, उरोज़, अधर, अम्बर?
बंधा बहुओं में घट क्षण-क्षण
कहाँ प्रकट बकता अपवाद?
अलकों को किशोर पलकों को
कहाँ वायु  देती सम्वाद?


कहाँ कनक-कोरों के  नीरव,
अश्रु-कणों में भर मुस्कान,
विरह-मिलन के एक साथ ही
खिल पड़ते वे भाव महान!



कहाँ सूर के रूप-बाग़ के
दाड़िम, कुन्द, विकच अरविन्द,
कदली, चम्पक, श्रीफल, मृगशिशु,
खंजन, शुक, पिक, हंस, मिलिन्द!
एक रूप में कहाँ आज वह   
हरि मृग का निर्वैर विहार,
काले नागों से मयूर का
बन्धु-भाव सुख सहज अपार!



पावस की प्रगल्भ धारा में
कुंजों का वह कारागार
अब जग के विस्मित नयनों में
दिवस-स्वप्न-सा पड़ा असार!


द्रव-नीहार अचल-अधरों से
गल-गल गिरि उर के सन्ताप
तेरे तट से अटक रहे थे
करते अब सिर पटक विलाप;
विवश दिवस के-से आवर्त्तन
बढ़ते हैं अम्बुधि की ओर,
फिर-फिर फिर भी ताक रहे हैं
कोरों में निज नयन मरोर!



एक रागिनी रह जाती जो
तेरे तट पर मौन उदास,
स्मृति-सी भग्न भवन की, मन को 
दे जाती अति क्षीण प्रकाश।


टूट रहे हैं पलक-पलक पर
तारों के ये जितने तार
जग के अब तक के रागों से
जिनमें छिपा पृथक गुंजार,
उन्हें खींच निस्सीम व्योम की
वीणा में कर कर झंकार,
गाते हैं अविचल आसन पर
देवदूत जो गीत अपार,


कम्पित उनसे करुण करों में
तारक तारों की-सी तान
बता, बता, अपने अतीत के
क्या तू भी गाती है गान?

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Tuesday, 13 February 2018

आज महाशिवरात्रि पर जानिए- क्‍या है महामृत्युंजय मंत्र की पूर्ण व्‍याख्‍या

आपने अकसर देखा सुना होगा धार्मिकजन किसी शारीरिक व मानसिक परेशानियों को दूर करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र की आराधना-जाप के बारे में बताते हैं मगर ऐसा क्‍यों, यह जानने के लिए इस महामंत्र की व्‍याख्‍या को जानना जरूरी है।


महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र -

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ’ लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे ‘त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है।

मंत्र विचार :
इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है।
इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।

शब्द बोधक -

‘त्र’ ध्रुव वसु ‘यम’ अध्वर वसु
‘ब’ सोम वसु ‘कम्‌’ वरुण
‘य’ वायु ‘ज’ अग्नि
‘म’ शक्ति ‘हे’ प्रभास
‘सु’ वीरभद्र ‘ग’ शम्भु
‘न्धिम’ गिरीश ‘पु’ अजैक
‘ष्टि’ अहिर्बुध्न्य ‘व’ पिनाक
‘र्ध’ भवानी पति ‘नम्‌’ कापाली
‘उ’ दिकपति ‘र्वा’ स्थाणु
‘रु’ भर्ग ‘क’ धाता
‘मि’ अर्यमा ‘व’ मित्रादित्य
‘ब’ वरुणादित्य ‘न्ध’ अंशु
‘नात’ भगादित्य ‘मृ’ विवस्वान
‘त्यो’ इंद्रादित्य ‘मु’ पूषादिव्य
‘क्षी’ पर्जन्यादिव्य ‘य’ त्वष्टा
‘मा’ विष्णुऽदिव्य ‘मृ’ प्रजापति
‘तात’ वषट

इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं, वे देवताओं के नाम हैं।

शब्द की शक्ति-
शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-  जैसे त्र्यम्बक का पूर्ण विवरण इस प्रकार है-


त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र
 ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘म’ मंगल ‘ब’ बालार्क तेज
‘कं’ काली का कल्याणकारी बीज ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘जा’ जालंधरेश ‘म’ महाशक्ति
‘हे’ हाकिनो ‘सु’ सुगन्धि तथा सुर
‘गं’ गणपति का बीज ‘ध’ धूमावती का बीज
‘म’ महेश ‘पु’ पुण्डरीकाक्ष
‘ष्टि’ देह में स्थित षटकोण ‘व’ वाकिनी
‘र्ध’ धर्म ‘नं’ नंदी
‘उ’ उमा ‘र्वा’ शिव की बाईं शक्ति
‘रु’ रूप तथा आँसू ‘क’ कल्याणी
‘व’ वरुण ‘बं’ बंदी देवी
‘ध’ धंदा देवी ‘मृ’ मृत्युंजय
‘त्यो’ नित्येश ‘क्षी’ क्षेमंकरी
‘य’ यम तथा यज्ञ ‘मा’ माँग तथा मन्त्रेश
‘मृ’ मृत्युंजय ‘तात’ चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण ‘देवो भूत्वा देवं यजेत’ के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।

प्रस्‍तुति : वेदोक्‍त विधियों से संकलन के आधार पर

Thursday, 8 February 2018

Nida Fazli साहब ने हमेशा रोटी, चटनी और मां से जुड़े लफ़्जों को जिया

भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से नवाजे गए निदा फ़ाज़ली की आज पुण्‍यतिथि है, उन्‍होंने आज ही के दिन 8 फरवरी 2016 को मुंबई में इस दुनिया को अलविदा कहा।
निदा फ़ाज़ली हिंदुस्तानी तहजीब में ‘वाचिक-परंपरा’ के शायर हैं. वाचिकी के लिए ये बेहद जरूरी है की बात चित्रों के जरिए की जाय. रोटी, चटनी, फूंकनी, खुर्री-खाट, कुण्डी कुलमिलाकर मां से जुड़े हर प्रतीक के सहारे निदा ने मां को जिया है। 
निदा फाजली दोहों की सरपरस्ती करते हैं इसीलिए प्रतीकों से दिलचस्पी रखते हैं.
लीजिए आप भी पढ़िए और महसूस कीजिए ज़िंदादिल शायर की ज़िंदादिली….
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो
यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
……………….

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया
बात बहुत मा’मूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया .

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह
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