Friday, 12 October 2018

कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर को वर्ष 2018 का श्रीलाल शुक्ल स्मृति साहित्य सम्मान

वरिष्ठ कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर को वर्ष 2018 का श्रीलाल शुक्ल स्मृति साहित्य award दिये जाने की घोषणा की गयी है. 
रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गाँव का जटिल यथार्थ आद्यंत उपलब्ध है। गाँवों की सम्यक् तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्पन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है। आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्रायः नहीं मिलता है। 
गौरतलब है कि उर्वरक क्षेत्र की अग्रणी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कॉपरेटिव लिमिटेड (इफको) साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष एक हिंदी साहित्यकार को यह award देती है.
रामधारी सिंह दिनकर का चयन उनके व्यापक साहित्यिक अवदानों को ध्यान में रखकर किया गया है. पुरस्कार चयन समिति की अध्यक्षता डीपी त्रिपाठी ने की. इस समिति में मृदुला गर्ग, राजेंद्र कुमार, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, इब्बार रब्बी और दिनेश शुक्ल शामिल थे.
कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर बिहार के अररिया जिले के नरपतगंज गांव के रहने वाले हैं. वे मिथिला विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे और वहीं से रिटायर हुए. वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक भी रहे हैं.
रामधारी सिंह दिवाकर को ये सम्मान 31 जनवरी 2019 को दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान दिया जाएगा जिसमें  एक प्रतीक चिह्न, प्रशस्तिपत्र के साथ ग्यारह लाख रुपये की राशि का चेक दिया जाएगा.
रामधारी सिंह दिवाकर का नाम हिंदी साहित्य में उनके व्यापक योगदान को ध्यान में रखते हुए डी पी त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने चुना है जिसमें मृदुला गर्ग, राजेन्द्र कुमार, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, इब्बार रब्बी और दिनेश कुमार शुक्ल भी शामिल थे.
रामधारी सिंह दिवाकर का नाम श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान के लिए चुने जाने पर इफ्को के प्रबंध निदेशक डॉ. उदय शंकर अवस्थी ने कहा कि ‘खेती–किसानी को अपनी रचना का आधार बनाने वाले कथाकार श्री रामधारी सिंह दिवाकर का सम्मान देश के किसानों का सम्मान है.’
बिहार के अररिया जिले के नरपतगंज गाँव के एक निम्न मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्मे रामधारी सिंह दिवाकर मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर पद से रिटायर हुए हैं. रामधारी सिंह दिवाकर की कई कहानियां अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित हुई है. उनकी अलग-अलग कई रचनाएं जिनमें नये गाँव में, अलग-अलग अपरिचय, बीच से टूटा हुआ, नया घर चढ़े, सरहद के पार, धरातल, माटी-पानी, मखान पोखर, वर्णाश्रम, झूठी कहानी का सच (कहानी-संग्रह) और क्या घर क्या परदेस, काली सुबह का सूरज, पंचमी तत्पुरुष, दाख़िल–ख़ारिज, टूटते दायरे, अकाल संध्या (उपन्यास); मरगंगा में दूब (आलोचना) प्रमुख हैं.
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Tuesday, 25 September 2018

कन्हैयालाल नंदन की पांच कविता, आज नंदन जी की पुण्‍यतिथि है

प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन का जन्म 1 जुलाई 1933 को यूपी के फतेहपुर में हुआ था। उनका निधन दिल्‍ली के रॉकलैंड अस्पताल में 25 सितम्बर 2010 को हुआ। पद्म श्री, भारतेंदु पुरस्कार, अज्ञेय पुरस्कार तथा रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना पुरस्कार प्राप्‍त नंदन का जन्म उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले में एक जुलाई 1933 को हुआ था। डीएवी कानपुर से स्नातक करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएचडी की। पत्रकारिता में आने से पहले नंदन ने कुछ समय तक मुम्बई के महाविद्यालयों ने अध्यापन कार्य किया।
वह वर्ष 1961 से 1972 तक धर्मयुग में सहायक संपादक रहे। इसके बाद उन्होंने टाइम्स ऑफ इडिया की पत्रिकाओं पराग, सारिका और दिनमान में संपादक का कार्यभार संभाला। वह नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक भी रहे। नंदन की कविताओं में जीवन का समग्र दृष्टिकोण देखने को मिलता है। लुकुआ का शाहनामा, घाट-घाट का पानी, अंतरंग नाट्य परिवेश, आग के रंग, अमृता शेरगिल, समय की दहलीज, बंजर धरती पर इंद्रधनुष, गुज़रा कहां कहां से आदि इनकी मुख्य रचनाएं हैं।
नदी की कहानी
नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,
मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना।
मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भँवर देखना कूदना डूब जाना।
अभी मुझ से फिर आप से फिर किसी से
मियाँ ये मुहब्बत है या कारखाना।
ये तन्हाईयाँ, याद भी, चांदनी भी,
गज़ब का वज़न है सम्भल के उठाना।
सूरज की पेशी
आँखों में रंगीन नज़ारे
सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है जैसे
बालू बीच खड़े।
बहके हुए समंदर
मन के ज्वार निकाल रहे
दरकी हुई शिलाओं में
खारापन डाल रहे
मूल्य पड़े हैं बिखरे जैसे
शीशे के टुकड़े!
नजरों के ओछेपन
जब इतिहास रचाते हैं
पिटे हुए मोहरे
पन्ना-पन्ना भर जाते हैं
बैठाए जाते हैं
सच्चों पर पहरे तगड़े।
अंधकार की पंचायत में
सूरज की पेशी
किरणें ऐसे करें गवाही
जैसे परदेसी
सरेआम नीलाम रोशनी
ऊँचे भाव चढ़े।
आँखों में रंगीन नज़ारे
सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है जैसे
बालू बीच खड़े।
मुहब्बत का घर
तेरा जहान बड़ा है,तमाम होगी जगह
उसी में थोड़ी जगह मेरी मुकर्रर कर दे
मैं ईंट गारे वाले घर का तलबगार नहीं
तू मेरे नाम मुहब्बत का एक घर कर दे।
मैं ग़म को जी के निकल आया,बच गयीं खुशियाँ
उन्हें जीने का सलीका मेरी नज़र कर दे।
मैं कोई बात तो कह लूँ कभी करीने से
खुदारा! मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे!
अपनी महफिल से यूँ न टालो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ तुम तो सँभालो मुझे।
जिंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिये
हो सके तो भरम से निकालो मुझे।
मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे
जितना जी चाहो उतना खँगालो मुझे।
मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ
जब जी चाहो जला लो ,बुझा लो मुझे।
जिस्म तो ख्वाब है,कल को मिट जायेगा,
रूह कहने लगी है,बचा लो मुझे।
फूल बनकर खिलूँगा बिखर जाऊँगा
खुशबुओं की तरह से बसा लो मुझे।
दिल से गहरा न कोई समंदर मिला
देखना हो तो अपना बना लो मुझे।
बोगनबेलिया
ओ पिया
आग लगाए बोगनबेलिया!
पूनम के आसमान में
बादल छाया,
मन का जैसे
सारा दर्द छितराया,
सिहर-सिहर उठता है
जिया मेरा,
ओ पिया!
लहरों के दीपों में
काँप रही यादें
मन करता है
कि
तुम्हें
सब कुछ
बतला दें –
आकुल
हर क्षण को
कैसे जिया,
ओ पिया!
पछुआ की साँसों में
गंध के झकोरे
वर्जित मन लौट गए
कोरे के कोरे
आशा का
थरथरा उठा दिया!
ओ पिया!
चौंको मत मेरे दोस्त
चौंको मत मेरे दोस्त
अब जमीन किसी का इंतजार नहीं करती।
पांच साल का रहा होऊँगा मैं,
जब मैंने चलती हुई रेलगाड़ी पर से
ज़मीन को दूर-दूर तक कई रफ्तारों में सरकते हुये देखकर
अपने जवान पिता से सवाल किया था
कि पिताजी पेड़ पीछे क्यों भाग रहे हैं?
हमारे साथ क्यों नहीं चलते?
जवाब में मैंने देखा था कि
मेरे पिताजी की आँखें चमकी थीं।
और वे मुस्करा कर बोले थे,बेटा!
पेड़ अपनी जमीन नहीं छोड़ते।
और तब मेरे बालमन में एक दूसरा सवाल उछला था
कि पेड़ ज़मीन को नहीं छोड़ते
या ज़मीन उन्हें नहीं छोड़ती?
सवाल बस सवाल बना रह गया था,
और मैं जवाब पाये बगैर
खिड़की से बाहर
तार के खंभों को पास आते और सर्र से पीछे
सरक जाते देखने में डूब गया था।
तब शायद यह पता नहीं था
कि पेड़ पीछे भले छूट जायेंगे
सवाल से पीछा नहीं छूट पायेगा।
हर नयी यात्रा में अपने को दुहरायेग।
बूढ़े होते होते मेरे पिता ने
एक बार,
मुझसे और कहा था कि
बेटा ,मैंने अपने जीवन भर
अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी
हो सके तो तुम भी न छोड़ना।
और इस बार चमक मेरी आँखों में थी
जिसे मेरे पिता ने देखा था।
रफ्तार की उस पहली साक्षी से लेकर
इन पचास सालों के बीच की यात्राओं में
मैंने हजा़रों किलोमीटर ज़मीन अपने पैरों
के नीचे से सरकते देखी है।
हवा-पानी के रास्तों से चलते दूर,
ज़मीन का दामन थामकर दौड़ते हुए भी
अपनी यात्रा के हर पड़ाव पर नयी ज़मीन से ही पड़ा है पाला
ज़मीन जिसे अपनी कह सकें,
उसने कोई रास्ता नहीं निकाला।
कैसे कहूँ कि
विरसे में मैंने यात्राएँ ही पाया है
और पिता का वचन जब-जब मुझे याद आया है
मैंने अपनी जमीन के मोह में सहा है
वापसी यात्राओं का दर्द।
और देखा
कि अपनी बाँह पर
लिखा हुआ अपना नाम अजनबी की तरह
मुझे घूरने लगा,
अपनी ही नसों का खून
मुझे ही शक्ति से देने से इंकार करने लगा।
तब पाया
कि निर्रथक गयीं वे सारी यात्राएँ।
अनेक बार बिखरे हैं ज़मीन से जुड़े रहने के सपने
और जब भी वहाँ से लौटा हूँ,
हाथों में अपना चूरा बटोर कर लौटा हूँ!
सुनकर चौंको मत मेरे दोस्त!
अब ज़मीन किसी का इंतज़ार नहीं करती।
खुद बखुद खिसक जाने के इंतज़ार में रहती है
ज़मीन की इयत्ता अब इसी में सिमट गयी है
कि कैसे वह
पैरों के नीचे से खिसके
ज़मीन अब टिकाऊ नहीं
बिकाऊ हो गयी है!
टिकाऊ रह गयी है
ज़मीन से जुड़ने की टीस
टिकाऊ रह गयी हैं
केवल यात्राएँ…
यात्राएँ…
और यात्राएँ…!
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह/Legend News

Tuesday, 18 September 2018

काका हाथरसी के आज जन्‍मदिन पर उनके द्वारा लिखी गई रचना ‘दहेज की बारात’

काका हाथरसी के नाम से मशहूर हिंदी के हास्य कवि प्रभुलाल गर्ग का जन्‍म 1906 में हुआ था। उनकी शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही, आज भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं।
काका हाथरसी की पैनी नज़र छोटी से छोटी अव्यवस्थाओं को भी पकड़ लेती थी और बहुत ही गहरे कटाक्ष के साथ प्रस्तुत करती थी।
प्रस्‍तुत है काका हाथरसी के जन्‍मदिन पर उनकी ब्रज भाषा में लिखी रचना ‘दहेज की बारात’-
जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्र
फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र
यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी
बा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटी
कहँ ‘काका’ कविराय, लार म्हौंड़े सों टपके
कर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपन सी लपके
मारग में जब है गई अपनी मोटर फ़ेल
दौरे स्टेशन, लई तीन बजे की रेल
तीन बजे की रेल, मच रही धक्कम-धक्का
द्वै मोटे गिर परे, पिच गये पतरे कक्का
कहँ ‘काका’ कविराय, पटक दूल्हा ने खाई
पंडितजू रह गये, चढ़ि गयौ ननुआ नाई
नीचे को करि थूथरौ, ऊपर को करि पीठ
मुर्गा बनि बैठे हमहुँ, मिली न कोऊ सीट
मिली न कोऊ सीट, भीर में बनिगौ भुरता
फारि लै गयौ कोउ हमारो आधौ कुर्ता
कहँ ‘काका’ कविराय, परिस्थिति विकट हमारी
पंडितजी रहि गये, उन्हीं पे ‘टिकस’ हमारी
फक्क-फक्क गाड़ी चलै, धक्क-धक्क जिय होय
एक पन्हैया रह गई, एक गई कहुँ खोय
एक गई कहुँ खोय, तबहिं घुस आयौ टी-टी
मांगन लाग्यौ टिकस, रेल ने मारी सीटी
कहँ ‘काका’, समझायौ पर नहिं मान्यौ भैया
छीन लै गयौ, तेरह आना तीन रुपैया
जनमासे में मच रह्यौ, ठंडाई को सोर
मिर्च और सक्कर दई, सपरेटा में घोर
सपरेटा में घोर, बराती करते हुल्लड़
स्वादि-स्वादि में खेंचि गये हम बारह कुल्हड़
कहँ ‘काका’ कविराय, पेट हो गयौ नगाड़ौ
निकरौसी के समय हमें चढ़ि आयौ जाड़ौ
बेटावारे ने कही, यही हमारी टेक
दरबज्जे पे ले लऊँ नगद पाँच सौ एक
नगद पाँच सौ एक, परेंगी तब ही भाँवर
दूल्हा करिदौ बंद, दई भीतर सौं साँकर
कहँ ‘काका’ कवि, समधी डोलें रूसे-रूसे
अर्धरात्रि है गई, पेट में कूदें मूसे
बेटीवारे ने बहुत जोरे उनके हाथ
पर बेटा के बाप ने सुनी न कोऊ बात
सुनी न कोऊ बात, बराती डोलें भूखे
पूरी-लड़ुआ छोड़, चना हू मिले न सूखे
कहँ ‘काका’ कविराय, जान आफत में आई
जम की भैन बरात, कहावत ठीक बनाई
समधी-समधी लड़ि परै, तै न भई कछु बात
चलै घरात-बरात में थप्पड़- घूँसा-लात
थप्पड़- घूँसा-लात, तमासौ देखें नारी
देख जंग को दृश्य, कँपकँपी बँधी हमारी
कहँ ‘काका’ कवि, बाँध बिस्तरा भाजे घर को
पीछे सब चल दिये, संग में लैकें वर को
मार भातई पै परी, बनिगौ वाको भात
बिना बहू के गाम कों, आई लौट बरात
आई लौट बरात, परि गयौ फंदा भारी
दरबज्जै पै खड़ीं, बरातिन की घरवारीं
कहँ काकी ललकार, लौटकें वापिस जाऔ
बिना बहू के घर में कोऊ घुसन न पाऔ
हाथ जोरि माँगी क्षमा, नीची करकें मोंछ
काकी ने पुचकारिकें, आँसू दीन्हें पोंछ
आँसू दीन्हें पोंछ, कसम बाबा की खाई
जब तक जीऊँ, बरात न जाऊँ रामदुहाई
कहँ ‘काका’ कविराय, अरे वो बेटावारे
अब तो दै दै, टी-टी वारे दाम हमारे

Friday, 31 August 2018

जब अमृता केे दिल और कलम से निकला- इमरोज़... ''मैं तैनूं फिर मिलांगी''

आज मेरी पसंदीदा लेखिका अमृता प्रीतम का जन्‍मदिन है और आज ही मेरी बेटी का भी, ये इत्‍तिफाक भी हो सकता है और इच्‍छित कामना भी... अमृता को आजीवन असंतुष्‍ट प्रेमिका, रूह तक लेखनी को ले जाने वाली लेखिका के तौर पर जाना जाता है  मगर जो भी उन्‍हें पढता है वह स्‍वयं को अमृता की जगह ना रखे और उनकी तरह ना सोचे ,ऐसा होता नहीं...यानि हम उन्‍हें पढ़ते हुए उन जैसे ही होने लगते हैं...यही है अमृता के शब्‍दों की खूबी। आज उनके जन्‍मदिन पर उनकी कुछ कविताऐं साझा कर रही हूं। 
अमृता ने ‘मैं तैनूं फिर मिलांगी’ नज़्म इमरोज़ के लिए लिखी थी और पेशे से पेंटर इमरोज़ ने भी कई नज़्में अमृता के नाम लिख दीं। अमृता की किताब ‘रसीदी टिकट’ इसे साफ़गोई से बयान करती है। अमृता और साहिर के बीच एक कोरे काग़ज़ का रिश्ता था। मसलन एक बार जब प्रेस रिपोर्टर अमृता की तस्वीर ले रहे थे तब वह काग़ज़ पर कुछ लिख रहीं थीं। काग़ज़ उठाकर देखा तो वह बार-बार साहिर लिख रहीं थीं। उन्हें लगा कि अगले दिन इस काग़ज़ की तस्वीर अख़बार में छपेगी लेकिन वह काग़ज़ तस्वीर में कोरी दिखाई दे रही थी। 
पेश हैं इमरोज की अमृता के लिए लिखीं कुछ नज़्में…

घोंसला घर
अब ये घोंसला घर चालीस साल का हो चुका है
तुम भी अब उड़ने की तैयारी में हो
इस घोंसला घर का तिनका-तिनका
जैसे तुम्हारे आने पर सदा
तुम्हारा स्वागत करता था
वैसे ही इस उड़ान को
इस जाने को भी
इस घर का तिनका-तिनका
तुम्हें अलविदा कहेगा।
लोग कह रहे हैं
लोग कह रहे हैं उसके जाने के बाद
तू उदास और अकेला रह गया होगा
मुझे कभी वक़्त ही नही मिला
ना उदास होने का ना अकेले होने का ..
वह अब भी मिलती है
सुबह बन कर शाम बन कर
और अक्सर नज़मे बन कर
हम कितनी देर एक दूजे को देखते रहे हैं
और मिलकर अपनी अपनी नज़मे ज़िंदगी को सुनाते रहे हैं
एक ज़माने से
एक ज़माने से
तेरी ज़िंदगी का पेड़ कविता
फूलता फलता और फैलता
तुम्हारे साथ मिल कर देखा है
और जब तेरी ज़िंदगी के पेड़ ने
बीज बनाना शुरू किया
मेरे अंदर जैसे कविता की
पत्तियाँ फूटने लगी हैं.
-अलकनंदा सिंह

Wednesday, 29 August 2018

कृष्ण की कविताएं लिखने वाले बांग्ला कवि नजरूल की पुण्‍यतिथि पर विशेष

बांग्ला के प्रसिद्ध कवि काजी नजरूल इस्लाम का जन्म 24 मई 1899 को हुआ था। निधन 29 अगस्त 1976 को हुआ। भगवान कृष्ण पर उनकी 5 प्रसिद्ध रचनाएं उनकी पुण्यतिथि पर काव्य के पाठकों के लिए…
अगर तुम राधा होते श्याम।
मेरी तरह बस आठों पहर तुम,
रटते श्याम का नाम।।
वन-फूल की माला निराली
वन जाति नागन काली
कृष्ण प्रेम की भीख मांगने
आते लाख जनम।
तुम, आते इस बृजधाम।।
चुपके चुपके तुमरे हिरदय में
बसता बंसीवाला;
और, धीरे धारे उसकी धुन से
बढ़ती मन की ज्वाला।
पनघट में नैन बिछाए तुम,
रहते आस लगाए
और, काले के संग प्रीत लगाकर
हो जाते बदनाम।।
सुनो मोहन नुपूर गूँजत है…
आज बन-उपवन में चंचल मेरे मन में
मोहन मुरलीधारी कुंज कुंज फिरे श्याम
सुनो मोहन नुपूर गूँजत है
बाजे मुरली बोले राधा नाम
कुंज कुंज फिरे श्याम
बोले बाँसुरी आओ श्याम-पियारी,
ढुँढ़त है श्याम-बिहारी,
बनमाला सब चंचल उड़ावे अंचल,
कोयल सखी गावे साथ गुणधाम कुंज कुंज श्याम
फूल कली भोले घुँघट खोले
पिया के मिलन कि प्रेम की बोली बोले,
पवन पिया लेके सुन्दर सौरभ,
हँसत यमुना सखी दिवस-याम कुंज कुंज फिरे श्याम
सुनाओ सुमधूर नुपूर गुंजन….
कृष्ण कन्हईया आयो मन में मोहन मुरली बजाओ।
कान्ति अनुपम नील पद्मसम सुन्दर रूप दिखाओ।
सुनाओ सुमधूर नुपूर गुंजन
“राधा, राधा” करि फिर फिर वन वन
प्रेम-कुंज में फूलसेज पर मोहन रास रचाओ;
मोहन मुरली बजाओ।
राधा नाम लिखे अंग अंग में,
वृन्दावन में फिरो गोपी-संग में,
पहरो गले वनफूल की माला प्रेम का गीत सुनाओ,
मोहन मुरली बजाओ।
श्रवण-आनन्द बिछुआ की छंद रुनझुन बोले…
चंचल सुन्दर नन्दकुमार गोपी चितचोर प्रेम मनोहर नवल किशोर।
बाजतही मन में बाणरि की झंकार, नन्दकुमार नन्दकुमार नन्दकुमार।।
श्रवण-आनन्द बिछुआ की छंद रुनझुन बोले
नन्द के अंगना में नन्दन चन्द्रमा गोपाल बन झूमत डोले
डगमग डोले, रंगा पाव बोले लघू होके बिराट धरती का भार।
नन्दकुमार नन्दकुमार नन्दकुमार।।
रूप नेहारने आए लख छिप देवता
कोइ गोप गोपी बना कोइ वृक्ष लता।
नदी हो बहे लागे आनन्द के आँसू यमुना जल सुँ
प्रणता प्रकृति निराला सजाए, पूजा करनेको फूल ले आए बनडार।
नन्दकुमार नन्दकुमार नन्दकुमार।।
तुम्हारी मुरली बाजे धीर…
तुम प्रेम के घनश्याम मै प्रेम की श्याम-प्यारी।
प्रेम का गान तुम्हारे दान मै हूँ प्रेम भीखारी।।
हृदय बीच में यमुना तीर-
तुम्हारी मुरली बाजे धीर
नयन नीर की बहत यमुना प्रेम से मतवारी।।
युग युग होये तुम्हारी लीला मेरे हृदय बन में,
तुम्हारे मोहन-मन्दिर पिया मेहत मेरे मन में।
प्रेम-नदी नीर नित बहती जाय,
तुम्हारे चरण को काँहू ना पाय,
रोये श्याम-प्यारी साथ बृजनारी आओ मुरलीधारी।।
-Legend News

Thursday, 23 August 2018

कृष्‍ण को वीर रस में प्रस्‍तुत करने वाले शायर थे हफीज़ जालंधरी

भारत पाकिस्‍तान के बीच रिश्तों में तल्ख़ी के साथ साथ अभी भी कहीं ना कहीं कोई ना कोई कड़ी जुड़ती हुई दिखाई दे ही जाती है, ऐसी ही एक कड़ी थे हफीज जालंधरी साहब। हालांकि आज ना तो उनका जन्‍म दिन है और ना ही पुण्‍यतिथि परंतु ''अभी तो मैं जवान हूं'' सुन रही थी तो सोचा क्‍यों ना हफीज साहब केे बारे में मैंने जो कुछ पढ़ा उसे साझाा करूं। खासकर उनका लिखा हुआ कृष्‍णगीत।

हफ़ीज़ जालंधरी का पूरा नाम अबू अल-असर हफ़ीज़ जालंधरी था, इनका जन्म 14 जनवरी 1900 में पंजाब के जालंधर में हुआ था। 1947 में भारत के विभाजन के बाद वह लाहौर, पाकिस्तान में जाकर रहने लगे। पाकिस्ताान का कौमी तराना लिखने वाले इस शायर की जड़ें भारत की माटी और संस्कृति से बहुत गहरे जुड़ी हैं। हफ़ीज़ ने लिखा है, "मेरा खानदान तक़रीबन 200 बरस पहले चौहान राजपूत कहलाता था। मेरे बुज़ुर्ग हिन्दू से मुसलमान हो गये और बदले में अपनी जायदाद वग़ैरह खो बैठे। हां, सूरजबंसी होने का ग़ुरूर मुसलमान होने के बावजूद साथ रहा, मेरी ज़ात तक पहुंचा और ख़त्म हो गया।" 

पाकिस्तान का राष्ट्रगान 'पाक सरज़मीं' लिखने वाले प्रख्यात शायर हफ़ीज़ जालंधरी ने लिखा और अगस्त 1954 में पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस गीत को अपना राष्ट्रगान घोषित कर दिया था। कौमी तराना लिखने वाले शायर हफ़ीज़ की चर्चा कॉमी तराना से अधिक ‘कृष्ण गीत' लिखने वाले शायर के रूप में अधिक होती आई है।
खालिस हिंदुस्तानी जुबां में लिखी गई ''कृष्ण कन्हैया'' नज्म भक्तिकाल के कवियों की याद दिलाती है लेकिन हफीज को कृष्ण में बस श्रृंगार रस नहीं दिखता था। हफीज को उम्मीद थी कि श्याम आएंगे और उबार लेंगे। सवाल उठता है किस चीज से उबारेंगे कृष्ण? इस सवाल का एक मुमकिन जवाब तो यही है कि हफीज ने कृष्ण की भक्ति को हिंदुस्तान के प्रति अपनी मुहब्बत का लॉन्चपैड बनाया। जिस दौर में हफीज ने ये कविता लिखी, तब पाकिस्तान नहीं बना था। हिंदुस्तान गुलाम था और हफीज ने इस कविता में उम्मीद जताई कि जिस तरह महाभारत में कृष्ण ने सत्य को जीत दिलाई, वैसा ही करिश्मा वो फिर से दोहराएंगे। हफीज को उम्मीद थी कि अंग्रेजों से आजादी हासिल करने की लड़ाई में भी कृष्ण मददगार साबित होंगे।

हफीज के कृष्ण श्रृंगार रस के नहीं बल्‍कि वीर रस के प्रतीक हैं। भगवान कृष्‍ण से हफीज कह रहे हैं-

‘बेकस की रहे लाज,
आ जा मेरे काले,
भारत के उजाले ,
दामन में छुपा ले’.

यूं तो किसी भी भक्त की आरजू भगवान से मिलने की ख्वाहिश पर खत्म होती है, उसके आगे और उससे बड़ी किसी मुराद की कल्पना भक्त नहीं कर पाता है। हफीज ने भी यही कहा- लिखते हैं,
‘लौ तुझ से लगी है,
हसरत ही यही है,
ऐ हिन्द के राजा,
इक बार फिर आ जा,
दुख दर्द मिटा जा’।

तो ऐसे हैं हफीज जालंधरी के बोल जो आज भी उतने ही मौजूं हैं जितने तब थे।

"अभी तो मैं जवान हूं" हफ़ीज़ जालंधरी की ये नज़्म Mallika Pukhraj की जादुई आवाज़ में आपने ज़रूर सुनी होगी। इस नज़्म को नूरजहाँ ने भी अपनी ख़ूबसूरत आवाज़ दी है।
आज़ादी से पहले के दौर में  ये गजल हफ़ीज़ जालंधरी ने लिखी थी, वे शायद सबसे अधिक लोकप्रिय शायर थे, जिनकी नज़्में और ग़ज़लें साहित्य-प्रेमियों की ज़ुबान पर चढ़ी हुई थी -


हवा भी ख़ुश-गवार है

गुलों पे भी निखार है

तरन्नुम-ए-हज़ार है

बहार पुर-बहार है

कहाँ चला है साक़िया

इधर तो लौट इधर तो आ

पिलाए जा पिलाए जा

अभी तो मैं जवान हूं ।



इक बार फिर वतन में गया जा के आ गया

लख़्त-ए-जिगर को ख़ाक में दफ़ना के आ गया

हर हम-सफ़र पे ख़िज़्र का धोका हुआ मुझे

आब-ए-बक़ा की राह से कतरा के आ गया

अभी तो मैं जवान हूं ।

तो आप भी सुनिए ''अभी तो मैं जवान हूं'' मल्‍लिका पुखराज की आवाज़ में------

https://www.youtube.com/watch?v=CXlSUXBTDUs

- अलकनंदा सिंह


Friday, 3 August 2018

सोहर, चैती और होली गाकर हमें झुमाने वाले पं. छन्नूलाल मिश्र

वाराणसी। सोहर, चैती और होली खासकर 

वाराणसी। सोहर, चैती और होली खासकर ”खेलें मसाने में होली दिगंबर..खेले मसाने में होली..” को अपने सुरों में ढालने वाले और पूरब अंग की गायिकी के पहचान पं. छन्नूलाल मिश्र के किसे झूमने पर विवश न कर दें। आज पंडित जी का जन्‍म दिन है।

पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म ३ अगस्त १९३६ को हुआ था। ठुमरी के लब्धप्रतिष्ठ गायक हैं। वे किराना घराना और बनारस गायकी के मुख्‍य गायक हैं। उन्‍हें खयाल, ठुमरी, भजन, दादरा, कजरी और चैती के लिए जाना जाता है।

मौसम कोई भी हो जब भी इस होरी के सुर-शब्द कानों से टकराते हैं, काशी की धरती पर सैकड़ों फागुन झूम कर उतर आते हैं। आपनी मर्जी की मालिक प्रकृति को भी प्रकृति बदलने को मजबूर कर देने वाले सुरीले शहर बनारस का यह रुआब है सुरों के सम्राट पं. छन्नूलाल मिश्र के दम से जो आज बनारस की आन-बान के अलमबरदार हैं। पूरब अंग की गायिकी के लालकिला हैं, शोहरत के कुतुबमीनार हैं।

छन्‍नूलाल मिश्र की चैती यहां सुनिए- 
https://www.youtube.com/watch?v=dkM_T9RBol8&feature=youtu.be


लगभग आठ दशकों की जीवन यात्रा में पंडित जी ने अपनी साधना को उस मुकाम तक पहुंचाया है जहां पहुंचकर उनके वजूद और उनकी साधना की अलग-अलग पहचान कर पाना असंभव है।

ठुमरी के लब्धप्रतिष्ठ गायक हैं। वे किराना घराना और बनारस गायकी के मुख्य गायक हैं। उन्हें खयाल, ठुमरी, भजन, दादरा, कजरी और चैती के लिए जाना जाता है। पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म तीन अगस्त, 1936 को आजमगढ़ के हरिहपुर में हुआ था। वाराणसी इन दिनों छोटी गैबी में इनका निवास है। छह साल की उम्र में पिता बद्री प्रसाद मिश्र ने संगीत के क्षेत्र में डाला था। उन्होंने संगीत के लिए चार मत बताए। शिवमत, भरत मत, नारद मत एवं हनुमान मत को शिव मंत्रों के साथ जोड़कर देखा। संगीत का उद्भव भगवान से हुआ। जिसे किसी घराना में न बांधकर उसे ईश्वर प्राप्ति के मार्ग के रूप में जान सकते है।

नौ साल की उम्र में पहले गुरु गनी अली साहब ने खयाल सिखाया। स्वर, लय और शब्द का समावेश ही संगीत है। इसकी उत्पत्ति भगवान शिव की चरणों से हुई। देश का पहला लोकसंगीत सोहर और निर्गुण के रूप में देखा। जन्म से लेकर मृत्यु तक संगीत है। अमेरिका का 50वां स्मृति सोमिओ सेलिब्रेशन, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई सहित कई स्थानों पर दी गई प्रस्तुति और पुरस्कार की यादें संजोए हुए है।

पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र के मुताबिक अब तो ठुमकते हुए बोलों का उपयोग हो तो वह है ठुमरी। ठुमरी दो प्रकार की है गत भाव और भाव नृत्य। ठुमरी में मधुरता जरूरी है। अब तो पब्लिक को जो अच्छा लगे उसको गाना चाहिए। संगीत का सिरा आज इसलिए छूट रहा क्योंकि आजकल शिष्यों में धैर्य नहीं। थोड़ा गाकर खुद बड़ा समझने लगते हैं। जिनके पास समय नहीं वह खुद को कलाकार नहीं कलाबाज कहें। मोक्ष नहीं धन प्राप्ति का साधन बन रहा संगीत। अब तो ठुमकते हुए बोलों का उपयोग हो तो वह है ठुमरी। ठुमरी दो प्रकार की है गत भाव और भाव नृत्य। ठुमरी में मधुरता जरूरी है। अब तो पब्लिक को जो अच्छा लगे उसको गाना चाहिए। संगीत का सिरा आज इसलिए छूट रहा क्योंकि आजकल शिष्यों में धैर्य नहीं। थोड़ा गाकर खुद बड़ा समझने लगते हैं। जिनके पास समय नहीं वह खुद को कलाकार नहीं कलाबाज कहें। मोक्ष नहीं धन प्राप्ति का साधन बन रहा संगीत।

भारतीय संगीत-संस्कृति की जीवित किंवदंती, बनारस की कालातीत आनंदधारा के जीवंत द्वीप, अनेक अकिंचनो के स्नेहस्रोत स्वर-गंधर्व पूज्य पंडित छन्नूलाल मिश्र जी को जन्मदिवस की असीम शुभकामनायें।

-अलकनंदा सिंह

Wednesday, 1 August 2018

हँसी थमी है इन आँखों में यूँ नमी की तरह

क्‍या हम भी उनके दर्द को महसूस कर सकते हैं, जी हां आज ट्रेजडी क्‍वीन मीना कुमारी का जन्‍मदिन है

आज ट्रेजडी क्‍वीन मीना कुमारी का जन्‍मदिन है। इस अवसर पर अमिताभ बच्‍चन का कहा याद आता है कि हर डायलॉग को मीना कुमारी बोलती नहीं थीं बल्‍कि जीती थीं और दर्द को शबद में जीने वाली अदाकारा थीं। यह सच है कि आज भी उनकी फिल्‍म को हम फिल्‍म की तरह नहीं जीवन की तरह देखते हैं।

पढ़िए उनकी एक खास ग़ज़ल

हँसी थमी है इन आँखों में यूँ नमी की तरह 
चमक उठे हैं अंधेरे भी रौशनी की तरह 

तुम्हारा नाम है या आसमान नज़रों में 
सिमट गया मेरी गुम-गश्ता ज़िंदगी की तरह 

कोहर है धुँद धुआँ है वो जिस की शक्ल नहीं 
कि दिल ये रूह से लिपटा है अजनबी की तरह 

तुम्हारे हाथों की सरहद को पा के ठहरी हुईं 
ख़लाएँ ज़िंदा रगों में हैं सनसनी की तरह 

बॉलीवुड में ट्रेजडी क्वीन के नाम से मशहूर लिजेंडरी एक्ट्रेस मीना कुमारी की आज 85वां बर्थडे है। गूगल ने उनकी याद में आज बहुत ही खूबसूरत और शानदार डूडल बनाकर मीना कुमारी को याद किया है। 1 अगस्त, 1933 को को महजबीं बानो के रूप में जन्मीं इस अदाकारा ने बॉलीवुड में मीना कुमारी के नाम से पहचान बनाई।

गूगल ने मीना कुमारी के डूडल में एक्ट्रेस को आसमान में टिमटिमाते तारों के बीच अपनी चांदनी बिखेरते हुए दिखाया है। लाल साड़ी में मीना कुमारी इस डूडल में बहुत खूबसूरत लग रही हैं। बॉलीवुड में तीन दशक तक अपनी अदाकारी से सब का दिल जीतने वाली मीना कुमारी की पर्सनल लाइफ में काफी दुख रहा है। उनकी जीवन की यही पीड़ा उनकी फिल्मों में उनके अभिनय के जरिए सभी के सामने आई। मीना कुमारी ने साहिब, बीबी और गुलाम, परिणीता, फूल और पत्थर, दिल एक मंदिर, काजल और पाकीजा जैसी फिल्मों में अभिनय करके खुद को हमेशा के अमर बना दिया। दर्शकों के दिल में मीना कुमारी ने अपनी एक खास जगह बनाई है।

बेस्ट एक्ट्रेस कैटिगरी में एकसाथ चार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते

मीना कुमारी बेस्ट एक्ट्रेस कैटिगरी में चार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते थे। साल 1963 में हुए 10वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में बेस्ट एक्ट्रेस के सभी नॉमिनेशन पाकर उन्होंने इतिहास रच दिया था।

मीना कुमारी का जन्म इकबाल बेगम और अली बक्श की तीसरी बेटी के रूप में हुआ था। खबरों की मानें तो  जब मीना कुमारी का जन्म हुआ तो उनके माता-पिता के पास अस्पताल की फीस भरने के लिए पैसे तक नहीं थे। चार साल की उम्र में मीना कुमारी ने चाइल्ड एक्टर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। मीना कुमारी ने 1939 में फिल्म 'लैदरफेस' में बेबी महजबीं का रोल प्ले किया था। मीना कुमारी ने अपने 33 साल के करियर में करीब 92 फिल्मों में काम किया था।

मीना कुमारी ने फिल्म मेकर कमाल अमरोही से 1852 में निकाह किया था। 31 मार्च 1972 में सिर्फ 38 साल की उम्र में मीना कुमारी इस दुनिया को अलविदा कह के हमेशा के लिए चली गईं।

- अलकनंदा सिंह

Sunday, 22 July 2018

क्‍या आपको भी याद हैं वो रिवर्स गियर वाली कवितायें


पिछले एक सप्‍ताह से कभी रुक कर तो कभी तेज बारिश हो रही है। मुझे अपना बचपन याद आ रहा है। शायद आपको भी याद आ रहा होगा। गाहे ब गाहे आप भी अपने आसपास जो भी मौजूद होगा उसे बारिश के मौसम
से जुड़ी बचपन की बातें शेयर कर रहे होंगे। कहीं भुट्टे की तो कहीं पकौड़ियों की खुश्‍बू...कभी बारिश के समय नन्‍हीं बूंदों को आसमान की ओर मुंह करके जीभ से गले में उतारने की शरारत...आंगन के कोनों में भरे हुए या बाहर बहते हुए पानी में छप्‍प-छप्‍प करके सारे कपड़े गीले कर लेने और फिर घर की बड़ी महिलाओं से मिलती 'पानी में ना नहाने की नसीहत' को ठेंगा दिखने का दुस्‍साहस...उनसे मिली डांट को एक कान से दूसरे में हुंह कहकर 'जाया' करते हुए ऐसे ना जाने कितने ही अनुभव होंगे जिनसे आज के बच्‍चे महरूम हैं।

खैर, हम लोगों में से जो भी अपनी औसत उम्र के आधे हिस्‍से में पहुंच चुके हैं, उन्‍हें आज उन कविताओं की अच्‍छी तरह याद आ रही होगी। ऐसी ही दो कवितायें आज मैं शेयर करना चाहती हूं...यदि आप लोगों को और
भी कुछ याद आ रहा हो तो आप इसमें जोड़ सकते हैं।

प्राइमरी कक्षा की कविता है-''अम्मा जरा देख तो ऊपर...'' प्राइमरी कक्षा में ये कविता पढ़ा करते थे, मम्‍मी को सुनाते हुए उन्‍हें छेड़ा भी करते थे, कि देखो किताब में भी तो बारिश के लिए कितना अच्‍छा लिखा है, तुम्‍हीं क्यों रोकती हो बारिश में बाहर जाने से...खैर हमारी कोर्स की किताब में जो कविता थी, वो कुछ यूं थी। 


अम्मा जरा देख तो ऊपर 
चले आ रहे हैं बादल
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं
दीख रहा है जल ही जल 

हवा चल रही क्या पुरवाई 
भीग रही है डाली-डाली
ऊपर काली घटा घिरी है
नीचे फैली हरियाली

भीग रहे हैं खेत, बाग़, वन 
भीग रहे हैं घर, आँगन 
बाहर निकलूँ मैं भी भीगूँ
चाह रहा है मेरा मन। 

हालांकि इस कविता के रचयिता कौन थे (या हैं), यह तो अब याद नहीं आ रहा मगर अनायास हर बारिश में इसे गुनगुनाने के होठ फड़क ही उठते हैं...इसे कहते हैं कविताओं या शब्‍दों का ज़हन तक उतर जाना। इन कविताओं की मासूमियत आज भी हमारे भीतर बैठे बालक को छत्त पर जाने को बाध्‍य कर देती है। 

ऐसी ही एक और कविता है अब्दुल मलिक खान द्वारा रची हुई। अब ये तो याद नहीं आ रहा कि इसे कहां और कब पढ़ा था मगर इतना पता है कि इस मौसम में ये भी जुबान पर अपनी उपस्‍थिति दिखा ही देती है...आप भी पढ़िए....।

मुझे तो शायद इसलिए याद आ रही है ये...  क्‍योंकि जगजीत सिंह की आवाज़ में गाई और निदा फाज़ली की लिखी ग़ज़ल ''गरज बरस प्‍यासी धरती को फिर पानी दे मौला'' अभी अभी सुनी है और मौसम इससे मेल खा रहा है। इससे मिलती जुलती हैं अब्दुल मलिक खान की इस कविता की पंक्‍तियां...लीजिए... पढ़िये और अपने अपने बचपन को गुनगुनाइये।

अब्दुल मलिक खान की कविता- ''दिन प्यारे गुड़धानी के''

तान तड़ातड़-तान तड़ातड़
पानी पड़ता पड़-पड़-पड़!
तरपट-तरपट टीन बोलते,
सूखे पत्ते खड़-खड़-खड़।

ठुम्मक-ठुम्मक झरना ठुमका,
इठलाती जलधार चली।
खेतों में हरियाली नाची,
फर-फर मस्त बयार चली।

टप्पर-टप्पर, छप्पर-छप्पर,
टपक रहे हैं टप-टप-टप।
त्योहारों का मौसम आया,
हलुआ खाएँ गप-गप-गप।

झिरमिर-झिरमिर मेवा बरसे,
फूल बरसते पानी के।
कागज की नावें ले आईं
दिन प्यारे गुड़धानी के।

तो कैसा लगा रिवर्स गियर में अपने बचपन की ओर जीवन को बहाते हुए....।

- अलकनंदा सिंह

Tuesday, 10 July 2018

कालजयी कृति ‘बिदेसिया’ के रचयिता भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि आज, बिदेसिया का Video देखिए

आज भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि है. इस बार की पुण्यतिथि खास है. भिखारी ठाकुर की प्रदर्शन कला का, जिसे पॉपुलर शब्द में नाच कहा जाता है, यह 100वां साल है.
एक सदी पहले वह बंगाल में हजाम का काम करने के दौरान रामलीला देखकर उससे प्रभावित हुए थे और गांव लौटे थे. लिखना-पढ़ना-सीखना शुरू किये थे. न हिंदी आती थी, न अंग्रेजी, सिर्फ अपनी मातृभाषा भोजपुरी जानते थे. वह देश-दुनिया को भी नहीं जानते थे.
बस, अपने आसपास के समाज के मन-मिजाज को जानते थे, समझते थे. जो जानते थे, उसी को साधने में लग गये. मामूली, उपेक्षित, वंचित लोगों को मिलाकर टोली बना लिये और साधारण-सहज बातों को रच लोगों को सुनाने लगे, बताने लगे. इन 100 सालों के सफर में जो चमत्कार हुआ, वह अब दुनिया जानती है.
उतनी उमर में सीखने की प्रक्रिया आरंभ कर भिखारी ने दो दर्जन से अधिक रचनाएं कर दीं. वे रचनाएं अब देश-दुनिया में मशहूर हैं. भिखारी अब सिर्फ भोजपुरी के नहीं हैं. उस परिधि से निकल अब पूरे हिंदी इलाके के लिए एक बड़े सांस्कृतिक नायक और अवलंबन हैं. देश-दुनिया के रिसर्चर उनके उठाये विषयों पर, उनकी रचनाओं पर रिसर्च कर रहे हैं.
इसी खास साल में भिखारी ठाकुर के साथ काम करने वाले कलाकार रामचंद्र मांझी को संगीत नाटक अकादमी सम्मान मिला है. संजय उपाध्याय जैसे तपे-तपाये रंग निर्देशक भिखारी ठाकुर की कालजयी कृति ‘बिदेसिया’ को लेकर निरंतर देश-दुनिया के कोने में जा रहे हैं. भिखारी ठाकुर रिपेट्री एंड ट्रेनिंग सेंटर चलानेवाले जैनेंद्र दोस्त जैसे युवा निर्देशक ‘नाच भिखारी नाच’ को लेकर देश-दुनिया के कोने-कोने में जाना शुरू किये हैं. ऐसे ही ढेरों काम हो रहे हैं भिखारी पर.

नयी पीढ़ी को, खासकर ग्रामीण अंचल के बच्चों को, युवकों को भिखारी के बारे में इतना ही बता देना एक बड़ा संदेश है कि कुछ करने के लिए अंग्रेजी जानना ही जरूरी नहीं, देश-दुनिया में जाना ही जरूरी नहीं. अपनी भाषा में, अपने समाज के साथ, अपने समाज के बीच, किसी भी उम्र में कोई काम किया जा सकता है और ईमानदारी, मेहनत, साधना, लगन से वह काम और उससे निकला नाम भिखारी ठाकुर जैसा हो जाता है. लेकिन यह सब एक पक्ष है.
शुक्ल पक्ष जैसा. यह सब भिखारी ठाकुर और उनकी जिस भोजपुरी भाषा को केंद्र में रखकर आगे बढ़ रहा है, उस भोजपुरी को आज उनके मूल कर्म और धर्म के विरुद्ध इस्तेमाल किया जा रहा है. भिखारी जिंदगी भर जिस भोजपुरी का इस्तेमाल कर समुदाय के बीच की दूरियों को पाटते रहे, न्याय के साथ चलनेवाला समरसी समाज बनाते रहे, उसी भोजपुरी को लेकर आज नफरत और उन्माद का कारोबार बढ़ रहा है, समुदायों के बीच दूरियां बढ़ायी जा रही हैं.
हालिया दिनों में सांप्रदायिक तनाव की कई ऐसी घटनाएं घटी, जिसके भड़कने-भड़काने में गीतों की भूमिका प्रमुख मानी गयी. उसमें भी भोजपुरी लोकगीत ही प्रमुख रहे. भागलपुर, औरंगाबाद, रोहतास से लेकर रांची तक में यह समान रूप से देखा-पाया गया कि भोजपुरी गीतों में उन्माद का रंग भरकर तनाव बढ़ाने की कोशिश हुई.
ये उन्मादी गीत बनानेवाले कौन लोग हो सकते हैं? जाहिर-सी बात है कि वे चाहे कोई और हों, भोजपुरी और उसके गीतों का मर्म जाननेवाले तो नहीं ही होंगे. अगर वे होते तो कम से कम उन्माद का रंग भरने के लिए, नफरत की जमीन तैयार करने के लिए भोजपुरी या लोकगीतों का सहारा न लेते.
भोजपुरी की दुनिया वैसी कभी नहीं रही है. भोजपुरी लोकगीतों में पारंपरिक लोकगीतों की दुनिया छोड़ भी दें तो आधुनिक काल में भिखारी से ज्यादा किसने साधा अपनी भाषा को? किसने रचना उतने बड़े फलक पर? और भिखारी से ज्यादा भगवान को किसने जपा या रटा या उन पर रचा? बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी वियोग समेत अलग-अलग फलक पर रची हुई दो दर्जन कृतियां हैं भिखारी की, जिनमें एक दर्जन के करीब तो भगवान के गुणगान, राम,कृष्ण, शिव,रामलीला, हरिकीर्तन आदि को ही समर्पित है. राम के 67 पुश्तों से लेकर जनक के पुश्तों तक का बखान करते थे भिखारी अपने समय में. भोजपुरी में राम को उनसे ज्यादा कौन साधा उनके समय में? लेकिन भिखारी की किसी कृति में राम या कोई भगवान उन्माद का कारण नहीं बनते.
धर्म के कारण श्रेष्ठताबोध नहीं कराते. समुदाय को तोड़ने की बात नहीं करते. जाहिर-सी बात है कि जो आज भगवान के नाम पर लोकगीतों और भोजपुरी की चाशनी चढ़ाकर ऐसा कर रहे हैं, वे न तो भोजपुरी के लोग हैं, न भिखारी को जानने-माननेवाले. जो ऐसे गीत को सुनाये और कहे कि भोजपुरी में यह सब होता है उसे जरूर बताएं कि किस भोजपुरी में ऐसा होता है और कब होता रहा है.
भोजपुरी में भगवान और राम के सबसे बड़े भक्त भिखारी ने तो ऐसा नहीं किया कभी ऐसा? लोकगीतों का सहारा लेकर उन्माद बढ़ाने वाले आयोजकों, कारकों, गायकों, कलाकारों, गीतकारों में से कोई मिले, उससे भिखारी को ही सामने रखकर यह सवाल पूछें. जवाब ना दें तो कहें कि आप भोजपुरी और भिखारी दोनों के विरोधी हैं.

Saturday, 30 June 2018

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं

हरफनमौला कवि बाबा नागार्जुन के जन्‍मदिवस पर विशेष

बाबा नागार्जुन का जन्‍म 30 जून 1911 को वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा, हुसैनपुर में हुआ था। यह उन का ननिहाल था।
उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरौनी गांव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही ‘यात्री’ हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के ‘संयुक्त निकाय’ का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के ‘भिक्खुओं’ को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और विख्यात बौद्ध दार्शनिक के नाम पर अपना नाम नागार्जुन रखा।
नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी जो १९२९ ई० में लहेरियासराय, दरभंगा से प्रकाशित ‘मिथिला’ नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी रचना ‘राम के प्रति’ नामक कविता थी जो १९३४ ई० में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘विश्वबन्धु’ में छपी थी।
नागार्जुन ने हिन्दी में छह से अधिक उपन्यास, करीब एक दर्जन कविता-संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली (हिन्दी में भी अनूदित) कविता-संग्रह तथा एक मैथिली उपन्यास के अतिरिक्त संस्कृत एवं बाङ्ला में भी मौलिक रूप से लिखा।
जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं 
जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं
ये पंक्तियां सही मायनों में जन कवि बाबा नागार्जुन की पहचान हैं। साफगोई और जन सरोकार के मुद्दों की मुखरता से तरफदारी उनकी विशेषता रही। अपने समय की हर महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रहार करती कवितायें लिखने वाले बाबा नागार्जुन एक ऐसी हरफनमौला शख्सियत थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और भाषाओं में लेखन के साथ-साथ जनान्दोलनों में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और कुशासन के खिलाफ तनकर खड़े रहे।
रोजी-रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा 
कोई भी हो निश्चय ही वो कम्युनिस्‍ट कहलाएगा 
दो हज़ार मन गेहूं आया दस गांवों के नाम
जब वह बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर वापिस स्वदेश लौटे तो उनके जाति भाई ब्राह्मणों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। लेकिन बाबा ने ऐसी बातों की कभी परवाह नहीं की। राहुल सांस्कृत्यायन के बाद हिन्दी के सबसे बडे़ घुमक्कड़ साहित्यकार होने का गौरव भी बाबा को ही प्राप्त है। बाबा की औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं हो पायी। उन्होंने जो कुछ सीखा जीवन अनुभवों से सीखा और वही सब लिखा जो हिंदी कविता के लिए अमूल्य धरोहर हैं।
दो हज़ार मन गेहूं आया दस गांवों के नाम
राधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम 
सौदा पटा बड़ी मुश्किल से, पिघले नेताराम
पूजा पाकर साध गये चुप्पी हाकिम-हुक्काम
गरीबों और मजलूमों की आवाज
स्पष्ट विचार, धारदार टिप्पणी, गरीबों और मजलूमों की आवाज उनकी कविताओं में प्रमुखता से शामिल रही। हिंदी कविता में सही मायनों में कबीर के बाद कोई फक्कड़ और जनकवि कहलाने का उत्तराधिकारी हुआ तो वो थे बाबा नागार्जुन। घुमक्कड़ी स्वभाव और फक्कड़पन के बीच बाबा के मन में एक बेचैनी थी जो उनकी कविताओं में साफ दिखाई पड़ती है। बाबा, सामाजिक सरोकारों के कवि थे। आजादी के बाद जो मोहभंग की स्थिति हुई उससे उनको बड़ी पीड़ा होती थी। भ्रष्टाचार और बेईमानी से बड़े खिन्न होते थे लेकिन मुखर होकर शासन की करतूतों को अपनी कविता में शामिल करते थे।
घुमक्कड़ी स्वभाव के थे इसलिए लगातार यात्राएं करते रहते थे लेकिन समाज के पिछड़े, वंचित तबकों और गरीबों के लिए उनकी चिंता जगजाहिर थी। 1941 के आस-पास जब बिहार में किसान आंदोलित हुए तो बाबा भी सब कुछ छोड़कर आंदोलन का हिस्सा बन गये और जेल भी गये। अपनी बेबाकियों में एक स्वप्न वो हमेशा देखा करते थे समता मूलक समाज के लिए। बाबा हमेशा कहा करते थे कि हमने जनता से जो लिया है उसे कवि के रूप में जनता को लौटाना होगा। इसीलिए उनकी कविताएं सत्ता से सीधे सवाल करती थीं, टकराती थीं।
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के !
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के! 
साहित्य के मनीषियों का मानना है कि बाबा ने हमेशा गांधीजी का सम्मान किया लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और गांधीजी के अनुयायियों के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देने लगा। यह परिवर्तन बाबा को खलने लगा और इसीलिए उन्होंने कविता लिखी-बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ जो सबसे मजबूत आवाज थी वो थी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की। बाबा को जब भी कहीं कोई उम्मीद की किरण नजर आती थी तो उसे प्रोत्साहित जरूर करते थे लेकिन वो उम्मीद जैसे ही टूटती थी बाबा निराश होते थे और उतनी ही दृढ़ता से प्रहार भी करते थे। पटना में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ जेपी के समर्थन में बैठे थे।
अपनी एक महत्वपूर्ण कविता में देश के जिन पांच सेनानियों को जगह देते हैं, उसमें जेपी भी शामिल हैं। कविता में उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से जिनको शामिल किया उसमें नेहरू, चन्द्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंन्द्र बोष, जिन्ना तो थे ही साथ ही साथ जेपी भी शामिल हैं, ऐसा कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है।
पांच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार 
गोली खाकर एक मर गया बाकि रह गये चार 
चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन
तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो 
1975 में जब आपातकाल लगा नागरिकों के मूल अधिकार जब्त होने लगे, लोगों को जेलों में ठूसा जाने लगा। अभिव्यक्तियां बुरी तरह कुचली जा रहीं थीं, लोगों को बोलने की भी आजादी नहीं थी ऐसे में बाबा जो अपने स्पष्टवादी छवि के लिए जाने जाते थे, निर्भीकतापूर्वक अपनी कविताओं के जरिए सवाल पूछे-
क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको 
सत्ता के नशे में भूल गई बाप को 
इन्दु जी इन्दु जी क्या हुआ आपको
-Legend News
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