Saturday, 4 January 2025

श्री हरिदास, जै जै श्री कुँज बिहारिन लाल

 



एक दिन ठाकुर जी अत्यंत प्रसन्न होकर मुस्कुरा रहे थे । श्री प्रिया जी ने पूछा की प्रियतम क्या बात है जो आप अकेले अकेले मुस्कुरा रहे है ? ठाकुर जी बोले नारद जी ने कलयुग मे कप प्रतिज्ञा की थी वह पूरी होते हुए दिखाई दे रही है । नारद जी ने प्रतिज्ञा की थी की मै विविध उत्सवों के माध्यम से (रामनवमी, झूलन उत्सव, चंदन लेपन, अन्नकूट महोत्सव आदी) कलयुग में घर घर मे भक्ति की स्थापना करुंगा । यदि मैने ऐसा नही किया तो मै श्रीहरि का दास नही । इस कराल कलिकाल मे भी कितने जीव तीव्र गति से मेरे चरणों तक पहुंच रहे है । प्रिया जी ने कहा - आप तक पहुंचने का रास्ता तो आपने खोल दिया है । 

यदि कोई जीव सखी सहचरी बनकर निज महल की सेवा प्राप्त करना चाहे, उस मार्ग को तो आपने खोला ही नही । उसको आपने गुप्त ही रखा है । ठाकुर जी ने कहा की यह रस तो आपकी सहचरियों की कृपा करुणा के आधीन है । सहचरी अनुग्रह न करे तो मुझे भी श्रीमहल की टहल दुर्लभ है । 

जब श्री श्यामा श्याम मे यह रसमयी वार्ता चल रही थी उसी समय वहां श्री ललिता जी पधारी । एकसाथ युगल की प्रेमपूर्ण दृष्टि ललिता जी पर पड़ी । ललिता जी ने कहा की आज आप दोनों बड़ी स्नेहभरी दृष्टि से मुझे निहार रहे है, इस दासी के लिए क्या आज्ञा है? 

युगल ने कहा - तुम एक अंश से पृथ्वी पर अवतार ग्रहण करो और महल टहल की प्राप्ति का अत्यंत दुर्लभ मार्ग खोलो । 

जन्म और दीक्षा -

वृंदावन से आधे कोस दूर राजपुर गांव मे सं १५३७ वि को इनका जन्म हुआ था । इनके पिता का नाम श्री गंगाधर और माता का नाम श्री चित्रा देवी था । इनका मन संसार मे बिल्कुल भी नही लगता था । श्री गुरुदेव आशुधीर जी सिद्ध महात्मा थे । उन्होंने बाल्यकाल मे ही स्वामी हरिदास जी के पिता को बता दिया था की यह बालक ललिता जी के अवतार है और समय आने पर यह भजन करने निकल पड़ेगा, तब इसको कोई रोकना टोकना नही। पिता ने एक दिन बालक हरिदास जी से अपने असली स्वरूप के दर्शन कराने का आग्रह किया । स्वामी हरिदास जी ने उनको साक्षात ललिता जी के रूप मे दर्शन देकर कृतार्थ किया था । २५ वर्ष की अवस्था मे एक विरक्त की भांति घर से निकल कर वृंदावन चले आये । वृंदावन के एक निम्बार्क सम्प्रदाय के संत श्री आशुधीर देवाचार्य जी से दीक्षा और विरक्त देश लेकर भजन करने लगे । 

श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य - 

श्री निधिवनराज को अपनी साधना स्थली बनायी और निरंतर श्री युगल की रस केली का आपने दर्शन किया । स्वामी जी जहां विराजते वही एक परम सुरम्य लता कुंज की ओर एकाग्र दृष्टि रखते थे । कभी उसकी ओर देखकर हसते थे, कभी भाव मे भरकर रोते थे, कभी लोट जाते । उसी लता कुंज की ओर देखकर राग भी गाते । उनके शिष्य श्री विट्ठल विपुल देव जी ने एक दिन पूछा की हे गुरुदेव ! इस विशेष कुंज की ओर आपकी दृष्टि सदा रखते है और भाव विह्फल होते है । 

क्या इस कुंज मे कोई विशेष बात है ? स्वामी जी ने उन्हे दिव्य दृष्टि प्रदान की । उन्होंने देखा की दिव्य रंग महल मे एक रूप होकर श्यामा श्याम कुसुम सेज पर रस विलास कर रहे है । उस रूप को देखकर विट्ठल विपुल देव जी भाव विह्फल हो गए । उन्होंने स्वामी जी से प्रार्थना की के इस स्वरूप का दर्शन हमे सर्वदा होता रहे । स्वामी जी ने गाकर श्यामा श्याम को पुकारा है और देखते देखते एक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ जिसमें से श्री बांकेबिहारी का श्रीविग्रह बाहर आया । आज बांके बिहारी जी के मंदीर मे ईसी श्रीविग्रह का दर्शन होता है ।


श्री हरिदास, जै जै श्री कुँज बिहारिन लाल, 

शीतकालीन शयन स्तुत‍ि 


पौढ़ीं संग पिया के प्यारी ।

शीत सुहावनो तरुनि भावनो ,आयौ सुरति केलि सुखकारी ।।

सुखद अँगरखा तन कछु भरके , पाई भरक जुरैं तन न्यारी ।

भली अँगीठी उष्म अटा भई ,ओढ़ी सौर मदन मतवारी ।।

सेज सौर तप नवल नवेली , पौढ़े अंस अंस भुज डारी ।

कृष्ण चन्द्र राधा चरणदासि वर ,भाई शीत शयन बलिहारी ।।

प्रस्तुत‍ि: अलकनंदा स‍िंंह 

Wednesday, 1 January 2025

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर- नव वर्ष 2025 पर कव‍िवर नागार्जुन की कव‍िता


 आप सभी को नव वर्ष 2025 की हार्द‍िक शुभकामनायें इसीके साथ आज मैं कव‍िवर नागार्जुन की कव‍िता शेयर कर रही हूं- ''चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर'' 


चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा


चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू

चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू


चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो


चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर


चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो

चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो


चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा


चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो

चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो


चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम


चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर।

प्रस्तुत‍ि : अलकनंदा स‍िंंह 


Tuesday, 31 December 2024

पढ़‍िए शायर जगन्नाथ आज़ाद की तीन गजलें.. ज‍िन्होंने ल‍िखा- नींद क्या है ज़रा सी देर की मौत

 


कि‍तनी गहरी बात है इन चंद लाइनों में .. 

''नींद क्या है ज़रा सी देर की मौत, मौत क्या है तमाम उम्र की नींद''


आज जानते हैं इन्हीं शायर जगन्नाथ आज़ाद के बारे में 

आज़ाद की पैदाइश 15 दिसम्बर 1918 को पंजाब स्थित ज़िला मियांवाली के ईसा ख़लील नामक गाँव में हुई. उन्होंने 1944 में पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर से एम.ए. और 1945 में एम.ओ. एल. की सनद हासिल की. उसके बाद वह उर्दू और अंग्रेज़ी के बाद वह उर्दू और अंग्रेज़ी के  कई अख़बारों व रिसालों से सम्बद्ध रहे. 1948 से 1955 तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के मासिक आजकल के सहायक सम्पादक भी रहे जहाँ उन दिनों जोश मलीहाबादी सम्पादक थे. 1955 में प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो में इनफार्मेशन ऑफिसर नियुक्त हुए .इसके अतिरिक्त विभिन्न मंत्रालयों में इनफार्मेशन सर्विस में सेवारत रहे. 1977 में डायरेक्टर पब्लिक रिलेशन ,प्रेस इनफार्मेशन (श्रीनगर) के पद से सेवानिवृत के बाद जम्मू यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए. आनन्द नारायन मुल्ला के देहांत के बाद अंजुमन तरक्क़ी उर्दू के सद्र भी रहे . 2 जुलाई 2005 को नई दिल्ली में देहांत हुआ.

काव्य संग्रह: तिब्ल व इल्म (1948),बेकराँ (1949),सितारों से ज़र्रों तक (1951), वतन में अजनबी (1954) ,इन्तेखाबे कलाम (1957) , नवाए परेशां (1961), कहकशां (1961), बच्चों की नज़्में (1976), बच्चों के इक़बाल (1977), बुए रमीदा (1987), गहवाराए इल्म व हुनर (1988). आलोचना/ यात्रावृतांत व डायरी, तिलोकचन्द महरूम,इक़बाल और उसका अह्द, मेरे गुज़िश्ता शबो रोज़, इक़बाल और मग़रबी मुफ़क्किरिन, इक़बाल और कश्मीर, आँखें तरस्तियाँ हैं, फ़िक्रे इक़बाल के बाज़ अहम पहलू,निशाने मंज़िल, पुश्किन के देश में, कोलम्बस के देश में, हयाते महरूम, हिन्दुस्तान में इक़बालियात, जुनुबी हिन्द में नौ हफ़्ते, इक़बाल ज़िंदगी: शख्सियत और शायरी , मुरक्क़ा इक़बाल. 

जगन्नाथ जी की कुछ और गजलें... 

 

मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ


मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ

अब ये भी है बहुत कि तुम्हें याद आ सकूँ


ये क्या तिलिस्म है कि तिरी जल्वा-गाह से

नज़दीक आ सकूँ न कहीं दूर जा सकूँ


ज़ौक़-ए-निगाह और बहारों के दरमियाँ

पर्दे गिरे हैं वो कि न जिन को उठा सकूँ


किस तरह कर सकोगे बहारों को मुतमइन

अहल-ए-चमन जो मैं भी चमन में न आ सकूँ


तेरी हसीं फ़ज़ा में मिरे ऐ नए वतन

ऐसा भी है कोई जिसे अपना बना सकूँ


'आज़ाद' साज़-ए-दिल पे हैं रक़्साँ वो ज़मज़मे

ख़ुद सुन सकूँ मगर न किसी को सुना सकूँ


मुद्दत हो गई साज़-ए-मोहब्बत खोल दे अब ये राज़


मुद्दत हो गई साज़-ए-मोहब्बत खोल दे अब ये राज़

वो मेरी आवाज़ हैं बाँहों में उन की आवाज़


कितनी मनाज़िल तय कर आया मेरा शौक़-ए-नियाज़

ऐ नज़रों से छुपने वाले अब तो दे आवाज़


क्यूँ हर गाम पे मेरा दिल है सज्दों पे मजबूर

क्या नज़दीक कहीं है तेरी जल्वा-गाह-ए-नाज़


अस्ल में एक ही कैफ़िय्यत की दो तस्वीरें हैं

तेरा किब्र-ओ-नाज़ हो या हो मेरा जज़्ब-ए-नियाज़

नशे में हूँ मगर आलूदा-ए-शराब नहीं


नशे में हूँ मगर आलूदा-ए-शराब नहीं

ख़राब हूँ मगर इतना भी मैं ख़राब नहीं


कहीं भी हुस्न का चेहरा तह-ए-नक़ाब नहीं

ये अपना दीदा-ए-दिल है कि बे-हिजाब नहीं


वो इक बशर है कोई नूर-ए-आफ़ताब नहीं

मैं क्या करूँ कि मुझे देखने की ताब नहीं


ये जिस ने मेरी निगाहों में उँगलियाँ भर दीं

तो फिर ये क्या है अगर ये तिरा शबाब नहीं


मिरे सुरूर से अंदाजा-ए-शराब न कर

मिरा सुरूर ब-अंदाजा-ए-शराब नहीं

प्रस्तुत‍ि: अलकनंदा स‍िंंह 

Friday, 27 December 2024

युद्ध नहीं जिनके जीवन में वे भी बहुत अभागे होंगे- द‍िनकर


 हम दि‍न प्रत‍िद‍िन अपने अपने युद्धों को लड़ रह हैं..ऐसे में महाकव‍ि द‍िनकर की ये कव‍िता याद आती है..आप भी पढ़ें... 
  
दिनकर की कविताओं में ओज और पौरुष का स्वर है. उनके काव्य में देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक परिस्थितियों का समावेश है.

यह पंक्ति कवि रामधारी सिंह दिनकर की है. 


युद्ध नहीं जिनके जीवन में

वे भी बहुत अभागे होंगे
या तो प्रण को तोड़ा होगा
या फिर रण से भागे होंगे
दीपक का कुछ अर्थ नहीं है
जब तक तम से नहीं लड़ेगा
दिनकर नहीं प्रभा बाँटेगा
जब तक स्वयं नहीं धधकेगा

कभी दहकती ज्वाला के बिन
कुंदन भला बना है सोना
बिना घिसे मेहंदी ने बोलो
कब पाया है रंग सलौना
जीवन के पथ के राही को
क्षण भर भी विश्राम नहीं है
कौन भला स्वीकार करेगा
जीवन एक संग्राम नहीं है।।

अपना अपना युद्ध सभी को
हर युग में लड़ना पड़ता है
और समय के शिलालेख पर
खुद को खुद गढ़ना पड़ता है
सच की खातिर हरिश्चंद्र को
सकुटुम्ब बिक जाना पड़ता
और स्वयं काशी में जाकर
अपना मोल लगाना पड़ता

दासी बनकरके भरती है
पानी पटरानी पनघट में
और खड़ा सम्राट वचन के
कारण काशी के मरघट में
ये अनवरत लड़ा जाता है
होता युद्ध विराम नहीं है
कौन भला स्वीकार करेगा
जीवन एक संग्राम नहीं है।।

हर रिश्ते की कुछ कीमत है
जिसका मोल चुकाना पड़ता
और प्राण पण से जीवन का
हर अनुबंध निभाना पड़ता
सच ने मार्ग त्याग का देखा
झूठ रहा सुख का अभिलाषी
दशरथ मिटे वचन की खातिर
राम जिये होकर वनवासी

पावक पथ से गुजरीं सीता
रही समय की ऐसी इच्छा
देनी पड़ी नियति के कारण
सीता को भी अग्नि परीक्षा
वन को गईं पुनः वैदेही
निरपराध ही सुनो अकारण
जीतीं रहीं उम्रभर बनकर
त्याग और संघर्ष उदाहरण

लिए गर्भ में निज पुत्रों को
वन का कष्ट स्वयं ही झेला
खुद के बल पर लड़ा सिया ने
जीवन का संग्राम अकेला
धनुष तोड़ कर जो लाए थे
अब वो संग में राम नहीं है
कौन भला स्वीकार करेगा
जीवन एक संग्राम नहीं है।।

Friday, 20 December 2024

गगन गिल ने हिन्दी कविता को नया स्वर, नया आयाम दिया, साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2024 से होंगी सम्मानित


 गगन गिल ने हिन्दी कविता को नया स्वर, नया आयाम दिया है। उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया जाना उनके इस योगदान का रेखांकन है। इस पुरस्कार के लिए उनके चयन से हमें अत्यन्त प्रसन्नता है और हम उन्हें बधाई देते हैं। राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने हिन्दी की प्रतिष्ठित कवि गगन गिल को उनके कविता संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ के लिए वर्ष 2024 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा पर बयान जारी करते हुए यह बातें कही।

उन्होंने कहा, प्रकाशक और लेखक दोनों की यात्रा साझी होती है। गगन गिल की सभी कृतियाँ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हैं। हमें खुशी है कि हम गगन गिल के साथ उनकी लेखन-यात्रा में साझीदार रहे हैं। उनकी पहली कृति ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ 1989 में राजकमल प्रकाशन से ही प्रकाशित हुई थी, जिसने हिन्दी साहित्य जगत में व्यापक चर्चा पायी। उनको एक साहित्यकार के रूप में स्थापित करने में इस कविता संग्रह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

गगन गिल की रचनाएँ पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती हैं और उन्हें आत्म से साक्षात्कार कराती है। उन्होंने अपनी रचनात्मकता से एक नया साहित्यिक दृष्टिकोण देकर हिन्दी भाषा के साहित्य को समृद्ध किया है।

यह हमारे लिए गर्व और खुशी की बात है कि साहित्य अकादेमी के गगन गिल को पुरस्कृत करने के निर्णय से साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हमारे लेखकों की सूची में एक और महत्वपूर्ण नाम जुड़ गया है। हम इसके लिए साहित्य अकादेमी को धन्यवाद देते हैं।

गगन गिल को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए हम उन्हें एक बार फिर बधाई देते हैं और भविष्य में उनके साहित्यिक कार्यों का स्वागत करते हैं। हम आशा करते हैं कि उनका लेखन नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए के प्रेरणास्त्रोत बनेगा।

गगन गिल का परिचय

गगन गिल हिन्दी कविता-साहित्य का एक अनिवार्य नाम हैं। उनका जन्म 1959 में नई दिल्ली में हुआ था। 1983 में ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ कविता-शृंखला के प्रकाशित होते ही उनकी कविताओं ने सबका ध्यान आकर्षित किया। तब से उनकी रचनाशीलता साहित्य के अध्येताओं, पाठकों और आलोचकों के विमर्श का हिस्सा रही है। अब तक पाँच कविता-संग्रह और चार गद्य कृतियाँ प्रकाशित। पत्रकारिता से भी नाता रहा। एशिया, यूरोप और अमेरिका के अनेक देशों की साहित्यिक यात्राएँ कर चुकी हैं। ‘भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार’ (1984), ‘संस्कृति सम्मान’ (1989), ‘केदार सम्मान’ (2000), ‘हिन्दी अकादमी साहित्यकार सम्मान’ (2008) और ‘द्विजदेव सम्मान’ (2010), साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2024) से सम्मानित।

प्रकाशित कृतियाँ  

कविता संग्रह— एक दिन लौटेगी लड़की (1989), अँधेरे में बुद्ध (1996), यह आकांक्षा समय नहीं (1998), थपक थपक दिल थपक थपक (2003), मैं जब तक आई बाहर (2018), प्रतिनिधि कविताएँ (2023)

यात्रा वृत्तान्त— अवाक् (2008)

स्मृति आख्यान— दिल्ली में उनींदे (2000), इत्यादि (2019)

साहित्यिक निबन्ध— देह की मुँडेर पर तथा अन्य निबन्ध (2019),

अनुवाद-सम्पादन— जंगल में झील जागती : हरिभजन सिंह की प्रतिनिधि कविताएँ (1989), देवदूत की बजाय कुछ भी : ज़्बीग्निएव हेबैर्त की कविताएँ (2022), तेजस्विनी : अक्क महादेवी के वचन (2023)
- Legend News

Monday, 28 October 2024

पुण्यतिथि व‍िशेष: रागदरबारी ल‍िखने वाले श्रीलाल शुक्ल ने ल‍िखी थी एक चोर की कहानी...आप भी पढ़‍िए

 




माघ की रात। तालाब का किनारा। सूखता हुआ पानी। सड़ती हुई काई। कोहरे में सब कुछ ढँका हुआ। तालाब के किनारे बबूल, नीम, आम और जामुन के कई छोटे-बड़े पेड़ों का बाग। सब सर झुकाए खड़े हुए। पेड़ों के बीच की जमीन कुशकास के फैलाव में ढँकी हुई। उसके पार गन्‍ने का खेत। उसका आधा गन्‍ना कटा हुआ। उस पर गन्‍ने की सूखी पत्तियाँ फैली हुईं। उन पर जमती हुई ओस। कटे हुए गन्‍ने की ठूँठियाँ उन्‍हें पत्तियों में ढँकी हुईं। आधे खेत में उगा हुआ गन्‍ना, जिसकी फुनगी पर सफेद फूल आ गए थे। क्‍योंकि वह पुराना हो रहा था।

रात के दो बजे। पास की अमराइयों में चिडि़यों ने पंख फटकारे। कोई चमगादड़ ''कैं कैं'' करता रहा। एक लोमड़ी दूर की झाडि़यों में खाँसती रही। पर रात के सन्‍नाटे के अजगर ने अपनी बर्फीली साँस की एक फुफकार से इन सब ध्‍वनियों को अपने पेट में डाल लिया और रह-रहकर फुफकारता रहा।

तभी, जैसे गन्‍ने के सुनसान घने खेत से अकस्‍मात बनैले सुअरों का कोई झुण्‍ड बाहर निकल आए, बड़े जोर का शोर मचा, ''चोर! चोSSSर। चोSSSर!"

गाँव की ओर से लगभग पच्‍चीस आवाजें हवा में गूँज रही थीं :

''चोर! चोर! चोSSSर। चोSSSर!"

''चारों ओर से घेर लो। जाने न पाए।''

''ठाकुर बाबा के बाग की तरफ गया है…''

''भगंती के खेत की तरफ देखना।''

''हाँ, हाँ गन्‍ने वाला खेत....।''

''चोSSSर। चोSSSर!"

देखते-देखते गाँव वाले ठाकुर के बाग में पहुँच गए। चारों ओर से उन्‍होंने बाग को और उससे मिले हुए गन्‍ने के खेत को घेर लिया। लायटेनों की रोशनी में एक-एक झाड़ी की तलाशी ली जाने लगी। सब बोल रहे थे। कोई भी सुन नहीं रहा था।

तभी एक आदमी ने टॉर्च की रोशनी फेंकनी शुरू की। भगंती के खेत में उसने कुछ गन्‍नों को हिलते देखा। फिर वह धीरे-धीरे खेत के किनारे तक गया। दो-तीन कोमल गन्‍ने जमीन पर झुके पड़े थे। उसी की सीध में कुछ गन्‍ने ऐसे थे जिन पर से पाले की बूँदें नीचे ढुलक गई थीं। टॉर्च की रोशनी में और पौधों के सामने ये कुछ अधिक हरे दिख रहे थे।

टॉर्च की रोशनी को खेत की गहराइयों में फेंकते हुए उस आदमी ने चिल्‍लाकर कहा, ''होशियार भाइयो, होशियार! चोर इसी खेत में छिपा है। चारों ओर से इसे घेर लो। जाने न पाए!"

फिर शोर मचा और लोगों ने खेत को चारों ओर से घेर लिया। उस आदमी ने मुँह पर दोनों हाथ लगाकर जोर-से कहा, ''खेत में छिपे रहने से कुछ नहीं होगा। बाहर आ जाओ, नहीं तो गोली मार दी जाएगी।''

वह बार-बार इसी बात को कई प्रकार से आतंक-भरी आवाज में कहता रहा। भीड़ में खड़े एक अधबैसू किसान ने अपने पास वाले साथी से कहा, ''नरैना है बड़ा चाईं। कलकत्‍ता कमाकर जब से लौटा है, बड़ा हुसियार हो गया है।''

उसके साथी ने कहा, ''बड़े-बड़े साहबों से रफ्त-जब्‍त रखता है। कलकत्‍ते में इसके ठाठ हैं। मैं तो देख आया हूँ। लड़का समझदार है।''

''जान कैसे लिया कि चोर खेत में है?"

तभी किसी ने कहा, ''यह चोट्टा खेत से नहीं निकलता तो आग लगा दो खेत में। तभी बाहर जाएगा।''

इस प्रस्‍ताव के समर्थन में कई लोग एक साथ बोलने लगे। किसी ने इसी बीच में दियासलाई भी निकाल ली।

भगंती ने आकर नरायन उर्फ नरैना से हाथ जोड़कर कहा, ''हे नरायन भैया, एक चोर के पीछे हमारा गन्‍ना न जलवाओ। सैकड़ों का नुकसान हो जाएगा। कोई और तरकीब निकालो।''

नरायन ने कहा, ''देखते जाओ भगंती काका, खेत का गन्‍ना जलेगा नहीं, पर कहा यही जाएगा।''

उसने तेजी से चारों ओर घूमकर कुछ लोगों से बातें कीं और खेत के आधे हिस्‍से में गन्‍ने की जो सूखी पत्तियाँ पड़ी थीं। उनके छोटे-छोटे ढरों में आग लगा दी। बहुत-से लोग आग तापने के लिए और भी नजदीक सिमट आए। सब तरह का शोर मचता रहा।

खेत के बीच में गन्‍ने के कुछ पेड़ हिल। नरायन ने उत्‍साह से कहा, ''शाबाश! इसी तरह चले आओ।''

पास खड़े हुए भगंती से उसने कहा, ''चोर आ रहा है। दस-पन्‍द्रह आदमियों को इधर बुला लो।''

चारों ओर से उठने वाली आवाजें शांत हो गईं। लोगों ने गर्दन उठा-उठाकर खेत के बीच में ताकना शुरू कर दिया।

चोर के निकलने का पता लोगों को तब चला जब वह नरायन के पास खड़ा हो गया।

सहसा चोर को अपने पैरों से लिपटा हुआ देख वह उछलकर पीछे खड़ा हो गया जैसे साँप छू लिया हो। एक बार फिर शोर मचा, ''चोर! चोSSSर!"

चोर घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़ा।

न जाने आसपास खड़े लोगों को क्‍या हुआ कि तीन-चार आदमी उछलकर चोर के पास गए और उसे लातों-मुक्‍कों से मारना शुरू कर दिया। पर उसे ज्‍यादा मार नहीं खानी पड़ी। मारने वालों के साथ ही नरायन भी उसके पास पहुँच गया। उनको इधर-उधर ढकेलकर वह चोर के पास खड़ा हो गया और बोला, ''भाई लोगो, यह बात बेजा है। हमने वादा किया है कि मारपीट नहीं होगी, यह शरनागत है। इसे मारा न जाएगा।''

एक बुड्ढे ने दूर से कहा, ''चोट्टे को मारा न जाएगा तो क्‍या पूजा जाएगा।''

पर नरायन ने कहा, ''अब चाहे जो हो, इसे पुलिस के हाथों में देकर अपना काम पूरा हो जाएगा। मारपीट से कोई मतलब नहीं।''

लोग चारों ओर से चोर के पास सिमट आए थे। नरायन ने टॉर्च की रोशनी उस पर फेंकते हुए पूछा, ''क्‍यों जी, माल कहाँ है?"

पर उसकी निगाह चोर के शरीर पर अटकी रही। चोर लगभग पाँच फुट ऊँचा, दुबला-पतला आदमी था। नंगे पैर, कमर से घुटनों तक एक मैला-सा अँगोछा बाँधे हुए। जिस्‍म पर एक पुरानी खाकी कमीज थी। कानों पर एक मटमैले कपड़े का टुकड़ा बँधा था। उमर लगभग पचास साल होगी। दाढ़ी बढ़ रही थी। बाल सफेद हो चले थे। जाड़े के मारे वह काँप रहा था और दाँत बज रहे थे। उसका मुँह चौकोर-सा था। आँखों के पास झुर्रियाँ पड़ी थीं। दाँत मजबू थे। मुँह को वह कुछ इस प्रकार खोले हुए था कि लगता था कि मुस्‍कुरा रहा है।

उसे कुछ जवाब ने देते देख कुछ लोग उसे फिर मारने को बढ़े पर नरायन ने उन्‍हें रोक लिया। उसने अपना सवाल दोहराया, ''माल कहाँ है?"

लगा कि उसके चेहरे की मुस्‍कान बढ़ गई है। उसने हाथ जोड़कर खेत की ओर इशारा किया। इस बार नरायन को गुस्‍सा आ गया। अपनी टॉर्च उसकी पीठ पर पटककर उसने डाँटकर कहा, ''माल ले आओ।''

दो आदमी लालटेनें लिए हुए चोर के साथ खेत के अंदर घुसे। पाले और ईख की नुकीली पत्तियों की चोट पर बार-बार वे चोर को गाली देते रहे। थोड़ी देर बाद जब वे बाहर आए तो चोर के हाथ में एक मटमैली पोटली थी। पोटली लाकर उसने नरायन के पैरों के पास रख दी।

नरायन ने कहा, ''खोलो इसे। क्‍या-क्‍या चुरा रक्‍खा है?"

उसने धीरे-धीरे थके हाथों से पोटली खोली। उसमें एक पुरानी गीली धोती, लगभग दो सेर चने और एक पीतल का लोटा था। भीड़ में एक आदमी ने सामने आकर चोर की पीठ पर लात मारी। कुछ गालियाँ दीं और कहा, ''यह सब मेरा माल है।''

लोग चारों ओर से चोर के ऊपर झुक आए थे। वह नरायन के पैरों के पास चने, लोटे और धोती को लिए सर झुकाए बैठा था। सर्दी के मारे उसके दाँत किटकिटा रहे थे और हाथ हिल रहे थे। नरायन ने कहा, ''इसे इसी धोती में बाँध लो और शाने ले चलो।''

दो-तीन लोगों ने चोर की कमर धोती से बाँध ली और उसका दूसरा सिरा पकड़कर चलने को तैयार हो गए।

चोर के खड़े होते ही किसी ने उसके मुँह पर तमाचा मारा और गालियाँ देते हुए कहा, ''अपना पता बता वरना जान ले ली जाएगी।''

चोर जमीन पर सर लटकाकर बैठ गया। कुछ नहीं बोला। तब नरायन ने कहा, ''क्‍यों उसके पीछे पड़े हो भाइयो! चोर भी आदमी ही है। इसे थाने लिए चलते हैं। वहाँ सब कुछ बता देगा।''

किसी ने पीछे से कहा, ''चोर-चोर मौसेरे भाई।''

नरायन ने घूमकर कहा, ''क्‍यों जी, मैं भी चोर हूँ? यह किसकी शामत आई!"

दो-एक लोग हँसने लगे। बात आई-गई हो गई।

वे गाँव के पास आ गए। तब रात के चार बज रहे थे। चोर की कमर धोती से बाँधकर, उसका एक छोर पकड़कर दीना चौकीदार थाने चला। साथ में नरायन और गाँव के दो और आदमी भी चले।

चारों में पहले वाला बुड्ढा किसान रास्‍ता काटने के लिए कहानियाँ सुनाता जा रहा था, ''तो जुधिष्ठिर ने कहा कि बामन ने हमारे राज में सोने की थाली चुराई है। उसे क्‍या दंड दिया जाए? तो बिदुर बोले कि महाराज, बामन को दंड नहीं दिया जाता। तो राजा बोले कि इसने चोरी की है तो दंड तो देना ही पड़ेगा। तब बिदुर ने कहा कि महाराज, इसे राजा बलि के पास इंसाफ के लिए भेज दो। जब राजा बलि ने बामन को देखा तो उसे आसन पर बैठाला।...''

चौकीदार ने बात काटकर कहा, ''चोर को आसन पर बैठाला? यह कैसे?"

बुड्ढा बोला, ''क्‍या चोर, क्‍या साह! आदमी आदमी की बात! राजा ने उसे आसन दिया और पूरा हाल पूछा। पूछा कि आपने चोरी क्‍यों की तो बामन बोला कि चोरी पेट की खातिर की।''

चौकीदार ने पूछा, ''तब?"

''तब क्‍या?" बुड्ढा बोला, ''राजा बलि ने कहा कि राजा युधिष्ठिर को चाहिए कि वे खुद दंड लें। बामन को दंड नहीं होगा। जिस राजा के राज में पेट की खातिर चोरी करनी पड़े वह राजा दो कौड़ी का है। उसे दंड मिलना चाहिए। राजा बलि ने उठकर...।''

चौकीदार जी खोलकर हँसा। बोला, ''वाह रे बाबा, क्‍या इंसाफ बताया है राजा बलि का। राजा विकरमाजीत को मात कर दिया।''

वे हँसते हुए चलते रहे। चोर भी अपनी पोटली को दबाए पँजों के बल उचकता-सा आगे बढ़ता गया।

पूरब की ओर घने काले बादलों के बीच से रोशनी का कुछ-कुछ आभास फूटा। चौकीदार ने धोती का छोर नरायन को देते हुए कहा, ''तुम लोग यहीं महुवे के नीचे रूक जाओ। मैं दिशा मैदान से फारिग हो लूँ।''

साथ के दोनों आदमी भी बोल उठे। बुड्ढे ने कहा, ''ठीक तो है नरायन भैया, यहीं तुम इसे पकड़े बैठे रहो। हम लोग भी निबट आवें।''

वे चले गए। नरायन थोड़ी देर चोर के साथ महुवे के नीचे बैठा रहा। फिर अचानक बोला, ''क्‍यों जी, मुझे पहचानते हो?"

दया की भीख-सी माँगते हुए चोर ने उसकी ओर देखा। कुछ कहा नहीं। नरायन ने फिर धीरे-से कहा, ''हम सचमुच मौसेरे भाई हैं।''

इस बार चोर ने नरायन की ओर देखा। देखता रहा। पर इस सूचना पर नरायन जिस आश्‍चर्य-भरी निगाह की उम्‍मीद कर रहा था, वह उसे नहीं मिली। बढ़ी हुई दाढ़ी वाला एक दुबला-पतला चौकोर चेहरा उससे दया की भीख माँग रहा था। नरायन ने धीरे-से रूक-रूककर कहा, ''कलकत्‍ते के शाह मकसूद का नाम सुना है? उन्‍हीं के गोल का हूँ।''

जैसे किसी को किसी अनजाने जाल में फँसाया जा रहा हो, चोर ने उसी तरह बिंधी हुई निगाह से उसे फिर देखा। नरायन ने फिर कहा, ''कलकत्‍ते के बड़े-बड़े सेठ मेरे नाम से थर्राते हैं। मेरी शक्‍ल देखकर तिजोरियों के ताले खुल जाते हैं, रोशनदान टूट जाते हैं।''

वह कुछ और कहता। लगातार बात करने का लालच उसकी रग-रग में समा गया था। अपनी तारीफ में वह बहुत कुछ कहता। पर चोर की आँखों में न आनंद झलका, न स्‍नेह दिखाई दिया। न उसकी आँखों में प्रशंसा की किरण फूटी, न उनमें आतंक की छाया पड़ी। वह चुपचाप नरायन की ओर देखता रहा।

सहसा नरायन ने गुस्‍से में भरकर उसकी देह को बड़े जोर-से झकझोरा और जल्‍दी-जल्‍दी कहना शुरू किया, ''सुन बे, चोरों की बेइज्‍जती न करा। चोरी ही करनी है तो आदमियों जैसी चोरी कर। कुत्‍ते, बिल्‍ली, बंदरों की तरह रोटी का एक-एक टुकड़ा मत चुरा। सुन रहा है बे?"

मालूम पड़ा कि वह सुन रहा है। उसकी चेहरे पर हैरानी का चढ़ाव-उतार दीख पड़ने लगा था। नरायन ने कहा, ''यह सेर-आध सेर चने और यह लोटा चुराते हुए तुझे शर्म भी नहीं आई? यही करना है तो कलकत्‍ते क्‍यों नहीं आता?"

न जाने क्‍यों, चोर की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसके होंठ इतना फैल गए थे कि लग रहा था, वह हँस पड़ेगा। पर आँसू बहते ही जा रहे थे। वह अपने पेट पर दोनों हाथों से मुक्‍के मारने लगा। आँसुओं का वेग और बढ़ गया।

नरायन ने बात करनी बंद कर दी। कुछ देर रूककर कहा, ''भाग जो। कोई कुछ न कहेगा। जब तू दूर निकल जाएगा तभी मैं शोर मचाऊँगा।"

जब इस पर भी चोर ने कुछ जवाब न दिया तो उसे आश्‍चर्य हुआ। फिर कुछ रूककर उसने कहा, ''बहरा है क्‍या बे?"

फिर भी चोर ने कुछ नहीं कहा।

नरायन ने उसे बाँधने वाली धोती का छोर उसकी ओर फेंका, उसे ढकेलकर दूर किया और हाथ से उसे भाग जाने का इशारा किया। पर चोर भागा नहीं। थका-सा जमीन पर औंधे मुँह पड़ा रहा।

इतने में दूसरे लोग आते हुए दिखाई पड़े। नरायन ने गंभीरतापूर्वक उठकर चोर को जकउ़ने वाली धोती पकड़ ली। उसे हिला-डुलाकर खड़ा कर दिया। एक-एक करके वे सब लोग आ गए।

सवेरा होते-होते वे थाने पहुँच गए। थाना मुंशी ने देखते ही कहा, ''सबेरे-सबेरे किस का मुँह देखा!"

पर मुँह देखते ही वह फिर बोला, ''अजब जानवर है! चेहरा तो देखो, लगता है हँस पड़ेगा।''

दिन के उजाले में सबने देखा कि उसका चेहरा सचमुच ऐसा ही है। छोटी-छोटी सूजी हुई आँखों और बढ़ी हुई दाढ़ी के बावजूद चौकोर चेहरे मे फैल हुआ मुँह, लगता था, हँसने ही वाला है।

थाना मुंशी ने पूछा, ''क्‍या नाम है?"

चोर ने पहले की तरह हाथ जोड़ दिए। तब उसने उसके मुँह पर दो तमाचे मारकर अपना सवाल दोहराया। चोर का मुँह कुछ और फैल गया। उसने-दो-चार तमाचे फिर मारे।

इस बार उसकी चीख से सब चौंक पड़े। मुँह जितना फैल सकता था, उतना फैलाकर चोर बड़ी जोर-से रोया। लगा, कोई सियार अकेले में चाँद की ओर देखकर बड़ी जोर-से चीख उठा है।

मुंशी ने उदासीन भाव से पूछा, ''माल कहाँ है?"

नरायन ने चने, लोटे और धोती को दिखाकर कहा, ''यह है।''

न जाने क्‍यों सब थके-थके से, चुपचार खड़ रहे। चोर अब सिसक रहा था। सहसा एक सिपाही ने अपनी कोठरी से निकलकर कहा, ''मुंशी जी, यह तो पाँच बार का सजायाफ्ता है। इसके लिए न जेल में जगह है, न बाहर। घूम-फिरकर फिर यहीं आ जाता है।''

मुंशी ने कहा, ''कुछ अधपगला-सा है क्‍या?"

सिपाही ने मुंशी के सवाल का जवाब स्‍वीकार में सिर हिलाकर दिया। फिर पास आकर चोर की पीठ थपथपाते हुए कहा, ''क्‍यों गूँगे, फिर आ गए। कितने दिन के लिए जाओगे छह महीने कि साल-भर?"

चोर सिसर रहा था, पर उसकी आँखों में भय, विस्‍मय और जड़ता के भाव समाप्‍त हो चले थे। सिपाही की ओर वह बार-बार हाथ जोड़कर झुकने लगा, जैसे पुराना परिचित हो।

चौकीदार ने साथ के बुड्ढे को कुहनी से हिलाकर कहा, ''साल-भर को जा रहा है। समझ गए बलि महाराज?"

पर कोई भी नहीं हँसा।

- प्रस्तुत‍ि: अलकनंदा स‍िंंह 

Tuesday, 22 October 2024

फ़हमी बदायूंनी: आज पैबंद की ज़रूरत है, ये सज़ा है रफ़ू न करने की...

 


बदायूं: मशहूर शायर फहमी बदायूंनी 86 साल की उम्र में दुनिया से रुख्सत कर गए, , उनकी शायरी सीधे दिल में उतरती थी, उन्होंने अपने हुनर से देश दुनिया में बदायूं का नाम रोशन किया.


 'कितना महफूज हूं कोने में, कोई अड़चन नहीं है रोने में' जैसे कई बेहतरीन शायरी पेश करने वाले मशहूर शायर शेर खान उर्फ पुत्तन खां फहमी बदायूंनी दुनिया से रुख्सत हो गए. कस्बा बिसौली के रहने वाले जमा शेर खान उर्फ पुत्तन खां फहमी बदायूंनी का बीमारी के चलते रविवार को 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था.


वक़्त के साथ ग़ज़ल के भी मौसम बदलते रहते हैं,  कुछ शोअरा उस मौसम के मुताबिक़ फ़स्लें पैदा करते हैं और कुछ उन फ़स्लों के लिए नई ज़मीनें तय्यार करते हैं। इक्कीसवीं सदी में फ़हमी बदायूनी साहब वही ज़मीन तय्यार कर रहे हैं जिनपर ग़ज़ल की नई फस्लें लहलहाऐंगी।

पढ़‍िये उनकी ये कुछ गज़लें----- 


नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं


नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं

हमारे ज़ख़्म वर्ज़िश कर रहे हैं


सुनो लोगों को ये शक हो गया है

कि हम जीने की साज़िश कर रहे हैं


हमारी प्यास को रानी बना लें

कई दरिया ये कोशिश कर रहे हैं


मिरे सहरा से जो बादल उठे थे

किसी दरिया पे बारिश कर रहे हैं


ये सब पानी की ख़ाली बोतलें हैं

जिन्हें हम नज़्र-ए-आतिश कर रहे हैं


अभी चमके नहीं 'ग़ालिब' के जूते

अभी नक़्क़ाद पॉलिश कर रहे हैं


तिरी तस्वीर, पंखा, मेज़, मुफ़लर

मिरे कमरे में गर्दिश कर रहे हैं

................


जब रेतीले हो जाते हैं


जब रेतीले हो जाते हैं

पर्वत टीले हो जाते हैं


तोड़े जाते हैं जो शीशे

वो नोकीले हो जाते हैं


बाग़ धुएँ में रहता है तो

फल ज़हरीले हो जाते हैं


नादारी में आग़ोशों के

बंधन ढीले हो जाते हैं


फूलों को सुर्ख़ी देने में

पत्ते पीले हो जाते हैं

............


जाहिलों को सलाम करना है


जाहिलों को सलाम करना है

और फिर झूट-मूट डरना है


काश वो रास्ते में मिल जाए

मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है


पूछती है सदा-ए-बाल-ओ-पर

क्या ज़मीं पर नहीं उतरना है


सोचना कुछ नहीं हमें फ़िलहाल

उन से कोई भी बात करना है


भूक से डगमगा रहे हैं पाँव

और बाज़ार से गुज़रना है

- अलकनंदा स‍िंंह 

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