Monday, 10 July 2023

स्त्रियों के जीवन में रंग भरने वाला सबसे प्रिय ऋतु गीत- कजरी , आप भी सुनें


सबसे पहले आज सावन की शुरुआत पर आप भी सुनें ये ------- नीचे द‍िए गए ल‍िंक  पर क्ल‍िक करें 

https://www.youtube.com/watch?v=PBHHxbDNLE0

शुक्ला बहनों द्वारा गाई कजरी सुन‍िए 

#Kiran_Shukla #Prasann_Shukla (Shukla Sisters )are daughters of great #Indian_classical_music legend #Pandit_Shivkumar_Shukla.They performed all over India and abroad. Harmonium : #UstadFirozShah. Guitar : #ChintooSinghWasir. Tabla : #Mukaram. Video Creation : #FawaadRashid.


लोक संगीत में दो तरह के ऋतु गीत पाए जाते हैं। फागुन में फाग (होरी) और सावन में कजरी। होरी पुरुष प्रधान गीत है तो कजरी स्त्रियों के कंठ का शृंगार। इन दोनों ही ऋतुओं का मानव जीवन पर कितना गहरा और गाढ़ा प्रभाव है, वह सावन और फागुन में गाए जाने वाले गीतों से परिलक्षित होता है। भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जब शहनाई पर कजरी की धुन बजाते थे, तो संगीत के लोक में शास्त्र निखर जाता था। कजरी की धुनों पर जब वो दमकशी लगाते थे, तब उनकी शहनाई के सुरों की गजब की कसक होती थी।

यूं तो----

कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध लोकगीत है। कजरी की उत्पत्ति मिर्जापुर में मानी जाती है। मिर्जापुर पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे बसा जिला है। यह वर्षा ऋतु का लोकगीत है। इसे सावन के महीने में गाया जाता है। यह अर्ध-शास्त्रीय गायन की विधा के रूप में भी विकसित हुआ है और इसके गायन में बनारस घराने की ख़ास दखल है।


कजरी गीतों में वर्षा ऋतु का वर्णन विरह-वर्णन तथा राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन अधिकतर मिलता है। कजरी की प्रकृति क्षुद्र है। इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। उत्तरप्रदेश एवं बनारस में कजरी गाने का प्रचार खूब पाया जाता है। ब्रज क्षेत्र के प्रमुख लोक गीत झूला, होरी रसिया हैं। झूला, सावन में व होरी, फाल्गुन में गाया जाता है|


प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जनपद माँ विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज कजरी के वर्ण्य-विषय काफ़ी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गायन का प्रारम्भ देवी गीत से ही होता है। कुछ लोगों का मानना है कि कान्तित के राजा की लड़की का नाम कजरी था। वो अपने पति से बेहद प्यार करती थी। जिसे उस समय उससे अलग कर दिया गया था। उनकी याद में जो वो प्यार के गीत गाती थी। उसे मिर्जापुर के लोग कजरी के नाम से याद करते हैं। वे उन्हीं की याद में कजरी महोत्सव मनाते हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों में श्रावण मास का विशेष महत्त्व है।



कजरी के चार अखाड़े प.शिवदास मालिविय अखाड़ा, जहाँगीर अखाड़ा, बैरागी अखाड़ा व अक्खड़ अखाड़ा हैं। यह मुख्यतः बनारस, बलिया, चंदौली और जौनपुर जिले के क्षेत्रों में गाया जाता है।


कुछ प्रस‍िद्ध कजरी/कजली



1. देखो सावन में हिंडोला झूलैंदेखो सावन में हिंडोला झूलैं मन्दिर में गोपाल।

राधा जी तहाँ पास बिराजैं ठाड़ी बृज की बाल।।


सोना रूपा बना हिंडोला, पलना लाल निहार।

जंगाली रंग, सजा हिंडोला, हरियाली गुलज़ार।।


भीड़ भई है भारी, दौड़े आवैं, नर और नार।

सीस महल का अजब हिंडोला, शोभा का नहीं पार ।।


फूल काँच मेहराब जु लागी पत्तन बांधी डार।

रसिक किशोरी कहै सब दरसन करते ख़ूब बहार।।

2. छैला छाय रहे मधुबन मेंछैला छाय रहे मधुबन में सावन सुरत बिसारे मोर।

मोर शोर बरजोर मचावै, देखि घटा घनघोर।।


कोकिल शुक सारिका पपीहा, दादुर धुनि चहुंओर।

झूलत ललिता लता तरु पर, पवन चलत झकझोर।।


ताखि निकुंज सुनो सुधि आवै श्याम संवलिया तोर।

विरह विकल बलदेव रैन दिन बिनु चितये चितचोर।।

3. आई सावन की बहारछाई घटा घनघोर बन में, बोलन लागे मोर।

रिमझिम पनियां बरसै जोर मोरे प्यारे बलमू।।


धानी चद्दर सिंआव, सारी सबज रंगाव।

वामें गोटवा टकाव, मोरे बारे बलमू।।


मैं तो जइहों कुंजधाम, सुनो कजरी ललाम।

जहाँ झूले राधे-श्याम, मोरे बारे बलमू।।


बलदेव क्यों उदास पुनि अइहौ तोरे पास।

मानो मोरा विसवास, मोरे बारे बलमू।।

4. हरि संग डारि-डारि गलबहियाँहरि संग डारि-डारि गल बहियाँ झूलत बरसाने की नारि।

प्रेमानन्द मगन मतवारी सुधि बुधि सकल बिसारि।।


करि आलिंग प्रेमरस भीजत अंचल अलक उघारि।

टूटे बोल हिंडोल उठावति रुकि-रुकि अंग संवारि।।


श्रीधर ललित जुगल छबि ऊपर डारत तन-मन वारि।

हरि संग डाल-डाल गलबहियाँ, झूलत बरसाने की नारि।।

5. हरि बिन जियरा मोरा तरसेहरि बिन जियरा मोरा तरसे, सावन बरसै घना घोर।

रूम झूम नभ बादर आए, चहुँ दिसी बोले मोर।

रैन अंधेरी रिमझिम बरसै, डरपै जियरा मोर।।


बैठ रैन बिहाय सोच में, तड़प तड़प हो भोर।

पावस बीत्यौ जात, श्याम अब आओ भवन बहोर।।


आओ श्याम उर सोच मिटाऔ, लागौं पैयां तोर।

हरिजन हरिहिं मनाय 'हरिचन्द' विनय करत कर जोर।।

6. झूला झूलन हम लागी हो रामाझूला झूलन हम लागी हो रामा, मिल गए साजनवा।


आज तलक हम किन्हीं न बतियाँ, साजन देखे घर की छतियाँ,

नैना से नैना मिलाए न रामा, मिल गए साजनवा।


एक सखि मोरे ढिंग आई, आँख दिखा मोहे बात सुनाई

ऎसी क्यूं रूठी साजन से, फिर गए साजनवा।


मैं बोली सखि लाज की मारी, गोरी हँसती दे-दे तारी,

कैसी करूँ अब जतन बताय सखि, मिल जायें साजनवा।

7. अजहू न आयल तोहार छोटी ननदीअजहू न आयल तोहार छोटी ननदी


बरसत सावन तरसत बीता, कजरी के आइन बहार । छोटी ननदी०।।

सब सखि झूला झूलन सावन मां गावत कजरी मलार । छोटी ननदी०।।

पी-पी रटत पपीहा नाचत, मोर किए किलकार । छोटी ननदी०।।

प्रिया प्रेमघन बिन एको छन लागैना जियरा हमार । छोटी ननदी०।।

8. तरसत जियरा हमार नैहर मेंतरसत जियरा हमार नैहर में ।

बाबा हठ कीनॊ, गवनवा न दीनो

बीत गइली बरखा बहार नैहर में ।


फट गई चुन्दरी, मसक गई अंगिया

टूट गइल मोतिया के हार, नैहर में ।


कहत छ्बीले पिया घर नाही

नाही भावत जिया सिंगार, नैहर में ।


Tuesday, 2 May 2023

फ़ना बुलंदशहरी की 'मेरे रश्क-ए-क़मर' का हिंदी में अर्थ


 हिंदी में रश्क़े-क़मर का क्या अर्थ है? ये सवाल "फ़ना बुलंदशहरी" द्वारा लिखित इस ग़ज़ल से प्रेरित है। 

मेरे रश्के कमर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलायी मज़ा आ गया।
बर्क़ सी गिर गयी काम ही कर गयी आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया।।

आमतौर पे लोग इसे नाभि के पास का कमर समझते हैं । पर ऐसा नहीं है। दोनों के ‘क’ में फ़र्क़ है ।

कमर کمر : शरीर का अंग । इसमें ये क है ک

क़मर قمر : चाँद । इसमें ये क अलग है ق बिंदी/ नुक़्ता वाला

तो रश्के क़मर का अर्थ हुआ जिससे चाँद को भी जलन होने लगे।


दरअसल ये अरबी शब्द है। अरबी में सूरज को शम्स कहते हैं और चाँद को क़मर । हमलोग जो मेहताब जानते हैं वो फारसी से है । इनका फ़र्क़ यहाँ देखें- 

हिंदी सूरज चाँद
फ़ारसी आफताब माहताब
अरबी शम्स क़मर
अंग्रेज़ी सन मून

शम्स और क़मर दोनों को ‘मीर’ के इस शेर में देखें

फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

अर्थात, फूल , गुल , सूरज , चाँद सारे थे - जिन्हें सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, सुन्दरता का पैमाना माना जाता है, पर दुनिया के सर्वोत्कृष्ट सौंदर्य के रहते हुए भी - मुझे तुम्ही बहुत भाए।

अरबी, फ़ारसी, उर्दू, हिंदी कितनी अच्छी भाषाएं हैं, पर हम सब अंग्रेजी के गुलाम हो कर रह गए है, जिसमे न किसी की कोई पहचान है और न ही तहजीब। जितनी खूबसूरती से ईन भाषाओं में बात कर सकते हैं वो अंग्रेजी में मुमकिन नहीं बल्कि कई तो ऐसे भी शब्द या आवाजें हैं जो अंग्रेजी में हैं ही नहीं।


बहरहाल  यहां पढ़िए पूरी ग़ज़ल - 

मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया 

बर्क़ सी गिर गई काम ही कर गई आग ऐसी लगाई मज़ा आ गया 

जाम में घोल कर हुस्न की मस्तियाँ चाँदनी मुस्कुराई मज़ा आ गया 

चाँद के साए में ऐ मिरे साक़िया तू ने ऐसी पिलाई मज़ा आ गया 

नश्शा शीशे में अंगड़ाई लेने लगा बज़्म-ए-रिंदाँ में साग़र खनकने लगा 

मय-कदे पे बरसने लगीं मस्तियाँ जब घटा घिर के आई मज़ा आ गया 

बे-हिजाबाना वो सामने आ गए और जवानी जवानी से टकरा गई 

आँख उन की लड़ी यूँ मिरी आँख से देख कर ये लड़ाई मज़ा आ गया 

आँख में थी हया हर मुलाक़ात पर सुर्ख़ आरिज़ हुए वस्ल की बात पर 

उस ने शर्मा के मेरे सवालात पे ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया 

शेख़-साहब का ईमान बिक ही गया देख कर हुस्न-ए-साक़ी पिघल ही गया 

आज से पहले ये कितने मग़रूर थे लुट गई पारसाई मज़ा आ गया 

ऐ 'फ़ना' शुक्र है आज बाद-ए-फ़ना उस ने रख ली मिरे प्यार कि आबरू 

अपने हाथों से उस ने मिरी क़ब्र पे चादर-ए-गुल चढ़ाई मज़ा आ गया ।

Monday, 27 February 2023

आंचलिक संवेदना वाले समादृत कथाकार थे फणीश्वरनाथ रेणु, पढ़िए उनकी कहानी- रसप्रिया

एक समादृत कथाकार, कुछ कविताओं का भी लेखन, समाजवादी और आंचलिक संवेदना के लिए उल्लेखनीय साहित्‍य रचने वाले पद्मश्री से सम्मानित कथाकार थे फणीश्वरनाथ रेणु। आज उनका जन्‍मदिन है। साहित्‍यप्रेमी उन्‍हें हिंदी में आंचलिक कथा की नींव रखने वाले के रूप में याद कर रहे हैं। वो अकसर कहा करते थे कि साहित्य की पौध बड़ी नाज़ुक और हरी होती है। इसे राजनीति की भैंस द्वारा चर लिए जाने से बचाए रख सकें तभी फ़सल हमें मिल सकती है। 

उनके द्वारा रचित कहानी संग्रह: 'ठुमरी', 'अग्निखोर', 'आदिम रात्रि की महक', 'तीसरी कसम' आदि। उपन्यास: 'मैला आँचल', 'परती परिकथा' आदि। निबंध-संग्रह: 'श्रुत अश्रुतपूर्व। ' थे। उपन्यास रेणु को जितनी ख्याति हिंदी साहित्य में अपने उपन्यास मैला आँचल से मिली, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। इस उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें रातो-रात हिंदी के एक बड़े कथाकार के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। 

आज पढ़िए रेणु द्वारा लिखी कहानी- रसप्रिया 

धूल में पड़े कीमती पत्थर को देखकर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई - अपरूप-रूप!
चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया के मुँह से निकल पड़ा अपरूप-रूप!
....खेतों, मैंदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुन्दरता!
मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गई।
मोहना ने मुस्कराकर पूछा-तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हुई है; है न?
ऐं! -बूढ़े मिरदंगिया ने चैंकते हुए कहा - रसपिरिया ?.... हाँ.... नहीं। तुमने कैसे.........तुमने कहाँ सुना बे....? ‘बेटा’ कहते- कहते वह रूक गया।.....परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से ‘बेटा’ कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेरकर मारपीट की तैयारी की थी - बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेरकर!...... मृदंग फोड़ दो।
मिरदंगिया ने हँसकर कहा था - अच्छा, इस बार माफ़ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा। बच्चे खुश हो गए थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्डी पकड़कर वह बोला था - क्यों, ठीक है न बापजी?
बच्चे ठठाकर हँस पड़े थे।
लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देखकर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है।
- रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? .....बोलो बेटा!
दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। .....कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।
मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नन्दू बाबू के घराने में अब भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने का मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ है ही; कभी-कभी रस-चरचा भी यहीं आकर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। ....आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ़-साफ़ कह दिया - तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?
हाँ, यह जीना भी कोई जीना है? निर्लज्जता है; और थेथरई की भी सीमा होती है।....पन्द्रह साल से वह गले में मृदंग लटकाकर गाँव-गाँव घूमता है, भीख माँगता है। ....दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं है, मृदंग क्या बजाएगा! अब तो, ‘धा तिंग धा तिंग’ भी बड़ी मुश्किल से बजाता है।.....
अतिरिक्त गाँजा-भाँग सेवन से गले की आवाज़ विकृत हो गई है। किन्तु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की वह चेष्टा अवश्य करेगा।.......फूटी भाथी से जैसी आवाज़ निकलती है, वैसी ही आवाज़.....सों-य सों-य!
पन्द्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाम की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुण्डन-छेदन आदि शुभ कार्यों में विदपतिया मण्डली की बुलाहट होती थी। पँचकौड़ी मिरदंगिया की मण्डली ने सहरसा और पूर्णिया जिले में काफी यश कमाया है। पँचकौड़ी मिरदंगिया को कौन नहीं जानता! सभी जानते हैं, वह अधपगला है!....गाँव के बड़े-बूढ़े कहते हैं - अरे, पँचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक ज़माना था!
इस ज़माने में मोहना जैसा लड़का भी है - सुन्दर, सलोना और सुरीला!. .....रसप्रिया गाने का आग्रह करता है - एक रसपिरिया गाओ न मिरदंगिया!
-रसपिरिया सुनोगे?......अच्छा सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने.....
-हे-ए-ए हे-ए.......मोहना, बैल भागे......! - एक चरवाहा चिल्लाया -रे मोहना, पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू!
-अरे बाप! मोहना भागा। कल ही करमू ने उसे बुरी तरह पीटा है। दोनों बैलों को हरे-हरे पाट के पौधों की महक खींच ले जाती है बार-बार।......खटमिट्ठा पाट!
पँचकौड़ी ने पुकारकर कहा- मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठता हूँ। तुम बैल हाँककर लौटो। रसपिरिया नहीं सुनोगे?
मोहना जा रहा था। उसने पलटकर देखा भी नहीं।
रसप्रिया!
विदापत नाच वाले रसप्रिया गाते थे। सहरसा के जोगेन्दर झा ने एक बार विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी। मेले में खूब बिक्री हुई थी रसप्रिया पोथी की। विदापत नाच वालों ने गा-गाकर जनप्रिया बना दिया था रसप्रिया को।
खेत के ‘आल’ पर झरजामुन की छाया में पँचकौड़ी मिरदंगिया बैठा हुआ है; मोहना की राह देख रहा है। ....जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करने वाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। ...कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है! पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलारस बाकी था। ...पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-भरे पौधों से एक खास किस्म की गन्ध निकलती है। तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी-रस की डाली। वे गाने लगते थे बिरहा, चाँचर, लगनी। खेतों में काम करते हुए गाने वाले गीत भी समय-असमय का खयाल करके गाये जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर और लगनी-
"हाँ...रे, हल जोते हलवाहा भैया रे...
खुरपी रे चलावे...म-ज-दू-र!
एहि पंथे, धानी मोरा हे़ रूसलि...।"
खेतों में काम करते हलवाहों और मज़दूरों से कोई बिरही पूछ रहा है, कातर स्वर में-उसकी रूठी हुई धनी को इस राह से जाते देखा है किसीने ?....
अब तो दोपहरी नीरस ही कटती है, मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।
आसमान में चक्कर काटते हुए चील ने टिंहकारी भरी - टिं...ई....टिं-हि-क!
मिरदंगिया ने गाली दी-शैतान!
उसको छेड़कर मोहना दूर भाग गया है। वह आतुर होकर प्रतीक्षा कर रहा है। जी करता है, दौड़कर उसके पास चला जाए। दूर चरते हुए मवेशियों के झुंडों की ओर बार-बार वह बेकार देखने की चेष्टा करता है। सब धुँधला!
उसने अपनी झोली टटोलकर देखा-आम हैं, मूढ़ी है। ....उसे भूख लगी।
मोहना के सूखे मुँह की याद आई और भूख मिट गई।
मोहना जैसे सुन्दर, सुशील लड़कों की खोज में ही उसकी ज़िन्दगी के अधिकांश दिन बीते हैं। ...बिदापत नाच में नाचने वाले ‘नटुआ’ का अनुसन्धान खेल नहीं। ....सवर्णों के घर में नहीं, छोटी जाति के लोगों के यहाँ मोहना जैसे लड़की-मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर जदा जदा हि....
मैथिल ब्राह्मण, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापत वालों की बड़ी इज़्ज़त होती थी।....अपनी बोली-मिथिलाम-में नटुआ के मुँह से ‘जनम अवधि हम रूप निहारल’ सुनकर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मण्डली का मूलगैन नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था-ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजाकर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए।
-- ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न?
--मधुकान्त ठाकुर की बेटी की तरह...।
-- नः ! छोटी चम्पा जैसी सूरत है!
पँचकौड़ी गुनी आदमी है। दूसरी-दूसरी मण्डली में मूलगैन और मिरदंगिया की अपनी-अपनी जगह होती। पँचकौड़ी मूलगैन भी था और मिरदंगिया भी। गले में मृदंग लटकाकर बजाते हुए वह गाता था, नाचता था। एक सप्ताह में ही नया लड़का भाँवरी देकर परवेश में उतरने योग्य नाच सीख लेता था।
नाच और गाना सिखाने में कभी उसे कठिनाई नहीं हुई; मृदंग के स्पष्ट ‘बोल’ पर लड़कों के पाँव स्वयं ही थिरकने लगते थे। लड़कों के ज़िद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिल में और भी शहद लपेटकर वह फुसलाता..
-किसन कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है।....अरे, जाचक कहो या दसदुआरी। चोरी, डकैती और आवारागर्दी से अच्छा है अपना-अपना ‘गुन’ दिखाकर लोगों को रिझाकर गुजारा करना।
एक बार उसे लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी।....बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि....बहुत पुरानी बात है।
पुरानी ही सही, बात तो ठीक है।
रसपिरीया बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न? मोहना न जाने कब लौट आया।
मिरदंगिया के चेहरे पर चमक लौट आई। वह मोहना की ओर एक टकटकी लगाकर देखने लगा....यह गुणवान मर रहा है। धीरे-धीरे, तिल-तिलकर वह खो रहा है। लाल-लाल ओठों पर बीड़ी की कालिख लग गई है। पेट में तिल्ली है ज़रूर!...
मिरदंगिया वैद्य भी है। एक झुंड बच्चों का बाप धीरे-धीरे एक पारिवारिक डॉक्टर की योग्यता हासिल कर लेता है।....उत्सवों के बासी-टटका भोज्यान्नों की प्रतिक्रिया कभी-कभी बहुत बुरी होती। मिरदंगिया अपने साथ नमक-सुलेमानी, चानमार-पाचन और कुनैन की गोली हमेशा रखता था।...लड़कों को सदा गरम पानी के साथ हल्दी की बुकनी खिलाता। पीपल, काली मिर्च, अदरक वगैरह को घी में भूनकर शहद के साथ सुबह-शाम चटाता। ...गरम पानी!
पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए मिरदंगिया बोला-हाँ, गरम पानी! तेरी तिल्ली बढ़ गई है। गरम पानी पिओ!
- यह तुमने कैसे जान लिया? फारबिसगंज के डाकडर बाबू भी कह रहे थे तिल्ली बढ़ गई है। दवा....।
आगे कहने की ज़रूरत नहीं। मिरदंगिया जानता है, मोहना जैसे लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है! क्या होगा पूछकर, कि दवा क्यों नहीं करवाते!
- माँ भी कहती है, हल्दी की बुकनी के साथ रोज़ गरम पानी। तिल्ली गल जाएगी।
मिरदंगिया ने मुस्कराकर कहा-बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ! केले के सूखे पत्तल पर मूढ़ी और आम रखकर उसने बड़े प्यार से कहा- आओ, एक मुट्ठी खा लो।
- नहीं, मुझे भूख नहीं ।
किन्तु मोहना की आँखों से रह-रहकर कोई झाँकता था, मूढ़ी और आम को एक साथ निगल जाना चाहता था।...भूखा, बीमार भगवान् -आओ, खा लो बेटा! ....रसपिरिया नहीं सुनोगे?
माँ के सिवा, आज तक किसी अन्य व्यक्ति ने मोहना को इस तरह प्यार से कभी परोसे भोजन पर नहीं बुलाया।...लेकिन, दूसरे चरवाहे देख लें तो माँ से कह देंगे। ....भीख का अन्न!
- नहीं, मुझे भूख नहीं।
मिरदंगिया अप्रतिभ हो जाता है। उसकी आँखें फिर सजल हो जाती है। मिरदंगिया ने मोहना जैसे दर्जनों सुकुमार बालकों की सेवा की है। अपने बच्चों को भी शायद वह इतना प्यार नहीं दे सकता।.... और अपना बच्चा! हूँ!... अपना-पराया? अब तो सब अपने, सब पराये।...

-मोहन!
-कोई देख लेगा तो?
-तो क्या होगा?
-माँ से कह देगा। तुम भीख माँगते हो न?
- कौन भीख माँगता है? मिरदंगिया के आत्म-सम्मान को इस भोले लड़के ने बेवजह ठेस लगा दी। उसके मन की झाँपी में कुण्डलीकार सोया हुआ साँप फन फैलाकर फुफकार उठा-ए-स्साला! मारेंगे वह तमाचा कि... ऐ! गाली क्यों देते हो! मोहना ने डरते-डरते प्रतिवाद किया।
वह उठ खड़ा हुआ, पागलों का क्या विश्वास?
आसमान में उड़ती हुई चील ने फिर टिंहकारी भरी-टिं-हीं...ई...टिं टिं-ग!
- मोहना! मिरदंगिया की आवाज़ गम्भीर हो गई।
मोहना जरा दूर जाकर खड़ा हो गया।
- किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ? मिरदंग बजाकर पदावली गाकर, लोगों को रिझाकर पेट पालता हूँ।...तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है यह। भीख का ही फल है यह।...मैं नहीं दूँगा।... तुम बैठों, में रसपिरिया सुना दूँ।
मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत हो रहा है। ....आसमान में उड़ने वाली चील अब पेड़ की डाली पर आ बैठी है!-टिं-टिं-हिं टिंटिक!
मोहना डर गया। एक डग, दो डग... दे दौड़। वह भागा।
एक बीघा दूर जाकर उसने चिल्लाकर कहा-डायन ने बान मारकर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर दी है। झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय...-ऐ! कौन है यह लड़का? कौन है यह मोहना?...रमपतिया भी कहती थी, डायन ने बान मार दिया है!
- मोहना!
मोहना ने जाते-जाते चिल्लाकर कहा-करैला! अच्छा, तो मोहना यह भी जानता है कि मिरदंगिया करैला कहने से चिढ़ता है!...कौन है यह मोहना?
मिरदंगिया आतंकित हो गया। उसके मन में एक अज्ञात भय समा गया। वह थर-थर काँपने लगा। कमलपुर के बाबुओं के यहाँ जाने का उत्साह भी नहीं रहा।
...सुबह शोभा मिसर के लड़के ने ठीक ही कहा था। उसकी आँखों से आँसू झरने लगे।
जाते-जाते मोहना डंक मार गया। उसके अधिकांश शिष्यों ने ऐसा ही व्यवहार किया है उसके साथ। नाच सीखकर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजने वाले एक-एक लड़के की बातें उसे याद है।
सोनमा ने तो गाली ही दी थी-गुरुगिरी करता है, चोट्टा!
रसपतिया आकाश की ओर हाथ उठाकर बोली थी-हे दिनकर! साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसलाकर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर नहीं था। हे सुरुज भगवान् इस दसदुआरी कुत्ते का अंग-अंग फूटकर.... मिरदंगिया ने अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लम्बी साँस ली।....
रमपतिया? जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया! जिस दिन वह पहले-पहल जोधन की मण्डली में शामिल हुआ था-रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी। .... बाल-विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वह गुनगुनाती-नवअनुरागिनी राधा, किछु नँहि मानय बाधा।...मिरदंगिया मूलगैनी सीखने गया था और गुरुजी ने उसे मृदंग धरा दिया था....आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरुजी ने स्वजात पँचकौड़ी से रमपतिया के चुमौना की बात चलाई तो मिरदंगिया सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरुजी से उसने अपनी जात छिपा रखी थी। रमपतिया से उसने झूठा परेम किया था।
गुरुजी की मण्डली छोड़कर वह रातों-रात भाग गया। उसने गाँव आकर अपनी मण्डली बनाई, लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा। ...लेकिन, वह मूलगैन नहीं हो सका कभी। मिरदंगिया ही रहा सब दिन। ....जोधन गुरुजी की मृत्यु के बाद, एक बार गुलाब-बाग मेले में रमपतिया से उसकी भेंट हुई थी।
रमपतिया उसीसे मिलने आई थी। पँचकौड़ी ने साफ़ जवाब दे दिया था-क्या झूठ-फरेब जोड़ने आई है? कमलपुर के नन्दूबाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नन्दूबाबू का घोड़ा बारह बजे रात को...। चीख उठी थी रमपतिया-पाँचू!... चूप रहो!
उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उँगली टेढ़ी हो गई थी। मृदंग पर जमनिका देकर वह परबेस का ताल बजाने लगा। नटुआ ने डेढ़ मात्रा बेताल होकर प्रवेश किया तो उसका माथा ठनका। परबेस के बाद उसने नटुआ को झिड़की दी-एस्साला! थप्पड़ों से गाल लाल कर दूँगा। ...और रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट गई। मिरदंगिया ने ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा की।
मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठी, दहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगे और ताल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो गई। झूठी टेढ़ी उँगली!.....हमेशा के लिए पँचकौड़ी की मण्डली टूट गई। धीरे-धीरे इलाके से विद्यापति नाच ही उठ गया। अब तो कोई विद्यापति की चर्चा भी नहीं करते हैं। .....धूप-पानी से परे, पँचकौड़ी का शरीर ठण्डी महफ़िलों में ही पनपा था। ...बेकार ज़िन्दगी में मृदंग ने बड़ा काम दिया। बेकारी का एकमात्र सहारा-मृदंग!
एक युग से वह गले में मृदंग लटकाकर भीख माँग रहा है - धा तिंग, धा तिंग!
वह एक आम उठाकर चूसने लगा-लेकिन, लेकिन, ...लेकिन.... मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई?
उँगली टेढ़ी होने की खबर सुनकर रमपतिया दौड़ी आई थी, घण्टों उँगली को पकड़कर रोती रही थी - हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की? उसका बुरा हो। ....मेरी बात लौटा दो भगवान्! गुस्से में कही हुई बातें। नहीं, नहीं। पाँचू मैंने कुछ भी नहीं किया है। ज़रूर किसी डायन ने बान मार दिया है।
मिरदंगिया ने आँखें पोंछते हुए ढलते हुए सूरज की ओर देखा।.... इस मृदंग को कलेजे से सटाकर रमपतिया ने कितनी रातें काटी हैं!.... मिरदंग को उसने छाती से लगा लिया।
पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील ने उड़ते हुए जोड़े से कुछ कहा-टिं-टिं-हिंक्!
-एस्साला! उसने चील को गाली दी। तम्बाकू चुनियाकर मुँह में डाल ली
और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगा-धिरिनागि, धिरिनागि, धिरिनागि-धिनता!
पूरी जमनिका वह नहीं बजा सका। बीच में ही ताल टूट गया।
-अ्-कि-हे-ए-ए-ए-हा-आआ-ह-हा!
सामने झरबेरी के जंगल के उस पार किसीने सुरीली आवाज़ में, बड़े समारोह के साथ रसप्रिय़ा की पदावली उठाई-
न-व-वृन्दा-वन, न-व-न-व-तरु ग-न, न-व-नव विकसित फूल...
मिरदंगिया के सारे शरीर में एक लहर दौड़ गई। उसकी उँगलियाँ स्वयं की मृदंग के पूरे पर थिरकने लगीं। गाय-बैलों के झुण्ड दोपहर की उतरती छाया में आकर जमा होने लगे।
खेतों में काम करने वालों ने कहा-पागल है। जहाँ जी चाहा, बैठकर बजाने लगता है।
-बहुत दिन के बाद लौटा है।
- हम तो समझते थे कि कहीं मर-खप गया।
रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर आकर कट गई। मिरदंगिया का पागलपन अचानक बढ़ गया। वह उठकर दौड़ा। झरबेरी की झाड़ी के उस पास कौन है? कौन है यह शुद्ध रसप्रिया गाने वाला ?...इस ज़माने में रसप्रिया का रसिक...? झाड़ी में छिपकर मिरदंगिया ने देखा, मोहना तन्मय होकर दूसरे पद की तैयारी कर रहा है। गुनगुनाहट बन्द करके उसके गले को साफ़ किया।
मोहना के गले में राधा आकर बैठ गई है! ...क्या बन्दिश है!
"न-दी-बह नयनक नी...र!
आहो...पललि बहए ताहि ती....र!"
मोहना बेसुध होकर गा रहा था। मृदंग के बोल पर वह झूम-झूम-कर गा रहा था। मिरदंगिया की आँखें उसे एकटक निहार रही थीं और उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल हो रही थी।....चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगा। ....रह-रहकर वह अपनी विकृत आवाज़ में पदों की कड़ी धरता- फोंय-फोंय, सोंय-सोंय!
धिरिनागि धिनता!
"दुहु रस....म....य तनु गुने नहीं ओर।
लागल दुहुक न भाँगय जो-र!"

मोहना के आधे काले और आधे लाल ओठों पर नई मुस्कराहट दौड़ गई। पर समाप्त करते हुए वह बोल़ा - इस्स! टेढ़ी उँगली पर भी इतनी तेजी?
मोहना हाँफने लगा। उसकी छाती की हड्डियाँ!
- उफ़! मिरदंगिया धम्म से ज़मीन पर बैठक गया-कमाल! कमाल!...किससे सीखे? कहाँ सीखी तुमने पदावली? कौन है तुम्हारा गुरु?
मोहना ने हँसकर जवाब दिया-सीखूँगा कहाँ? माँ तो रोज़ गाती है। ... प्रातकी मुझे बहुत याद है, लेकिन अभी तो उसका समय नहीं।
- हाँ बेटा! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जाएगा।....समय-कुसमय का भी ख़याल रखना। लो, अब आम खा लो।
मोहना बेझिझक आम लेकर चूसने लगा।
- एक और लो।
मोहना ने तीन आम खाए और मिरदंगिया के विशेष आग्रह पर दो मुट्ठी मूढ़ी भी फाँक गया।
-अच्छा, अब एक बात बताओगे मोहना, तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं।
- बाप नहीं है, अकेली माँ है। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती है।
- और तुम नौकरी करते हो? किसके यहाँ?
-कमलपुर के नन्दू बाबू के यहाँ।
-नन्दू बाबू के यहाँ?
मोहना ने बताया, उसका घर सहरस में है। तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया। उसकी माँ उसे लेकर अपने ममहर आई है-कमलपुर।
-कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं?
मिरदंगिया कुछ देर तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहा।.... नन्दू बाबू.
..मोहना....मोहना की माँ!
-डायन वाली बात तुम्हारी माँ कह रही थी?
- हाँ। और एक बार सामदेव झा के यहाँ जनेऊ में तुमने गिरधरपट्टी मण्डली वालों का मिरदंग छीन लिया था। ...बेताला बजा रहा था। ठीक है न?
मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफ़ेद हो गई। उसने अपने को सम्हालकर पूछा-तुम्हारे बाप का क्या नाम है?
-अजोधादास!
-अजोधादास?
बूढ़ा अजोधादास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर।...मण्डली में गठरी होता था। बिना पैसे का नौकर बेचारा अजोधादास?
-बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ। एक लम्बी साँस लेकर मिदंगिया ने अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकाला। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोलकर कागज़ की एक पुड़िया निकाली उसने।
मोहन ने पहचान लिया-लोट? क्या है, लोट?
- हाँ, नोट है।
-कितने रुपये वाला है? पँचटकिया। ऐं.....दसटकिया? ज़रा छूने दोगे? कहाँ से लाए? मोहना एक साँस में सब-कुछ पूछ गया - सब दसटकिया हैं?
-हाँ, सब मिलाकर चालीस रुपये हैं। मिरदंगिया ने एक बार इधर-उधर निगाहें दौड़ाईं; फिर फुसफुसाकर बोला-मोहना बेटा! फारबिसगंज के डागडर बाबू को देकर बढ़िया दवा लिखा लेना।...खट्टा-मिट्ठा परहेज़ करना।....गरम पानी ज़रूर पीना।
-रुपये मुझे क्यों देते हो?
-जल्दी रख ले, कोई देख लेगा।
मोहना ने भी एक बार चारों ओर नज़र दौड़ाई। उसके ओठों की कालिख और गहरी हो गई।
मिरदंगिया बोला-बीड़ी-तम्बाकू भी पीते हो? खबरदार!
वह उठ खड़ा हुआ।
मोहना ने रुपये ले लिये।
-अच्छी तरह गाँठ में बाँध ले। माँ से कुछ मत कहना।
-और हाँ, यह भीख का पैसा नहीं। बेटा यह मेरी कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के....।
मिरदंगिया ने जाने के लिए पाँव बढ़ाया। मेरी माँ खेत में घास काट रही हैं, चलो न! - मोहना ने आग्रह किया।
मिरदंगिया रुक गया। कुछ सोचकर बोला-नहीं मोहना! तुम्हारे जैसा गुणवान बेटा पाकर तुम्हारी माँ ‘महारानी’ हैं, मैं महाभिखारी दसदुआरी हूँ। जाचक, फकीर.....। दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना।
मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नन्दू बाबू की आँखों जैसी हैं...।
-रे मो-ह-ना-रे-हे! बैल कहाँ हैं रे?
-तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद।
- हाँ। तुमने कैसे जान लिया?
-रे-मोहना-रे-हे!
एक गाय ने सुर-में-सुर मिलाकर अपने बछड़े को बुलाया।
गाय-बैलों के घर लौटने का समय हो गया। मोहना जानता है, माँ बैल हाँककर ला रही होगी। झूठ-मूठ उसे बुला रही है। वह चुप रहा।
-जाओ। मिरदंगिया ने कहा-माँ बुला रही हैं जाओ। ...अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल?
"अरे, चलू मन, चलू मन-ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहरा में अगिया लगायब रे-की...।"
खेतों की पगडंडी, झरबेरी के जंगल के बीच होकर जाती है। निरगुन गाता हुआ मिरदंगिया झरबेरी की झाड़ियों में छिप गया।
-ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है? कौन बजा रहा था मृदंग रे? घास का बोझा सिर पर लेकर मोहना की माँ खड़ी है।
-पँचकौड़ी मिरदंगिया।
-ऐं, वह आया है? आया है वह? उसकी माँ ने बोझ जमीन पर पटकते हुए पूछा।
-मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गया है। कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल! ...उसकी उँगली अब ठीक हो जाएगी।
माँ ने बीमार मोहना को आह्लाद से अपनी छाती से सटा लिया।
-लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी-भर शिकायत करती थी; बेईमान है, गुरु-द्रोही है झूठा है।
- है तो! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। ख़बरदार, जो उसके साथ फिर कभी गया। दसदुआरी जाचकों से हेलमेल करके अपना ही नुकसान होता है। .
..चल, उठा बोझ।
मोहना ने बोझ उठाते समय कहा-जो भी हो, गुनी आदमी के साथ रसपिरिया...।
-चोप! रसपिरिया का नाम मत ले।
अजीब है माँ। जब गुस्सायेगी तो बाघिन की तरह और जब खुश होती है तो गाय की तरह हुंकारती आएगी और छाती से लगा लेगी। तुरंत खुश, तुरंत नाराज।....
दूर से मृदंग की आवाज़ आई-धा तिंग, धा तिंग।
मोहना की माँ खेत की ऊबड़-खाबड़ मेड़ पर चल रही थी। ठोकर खाकर गिरते-गिरते बची। घास का बोझ गिरकर खुल गया। मोहना पीछे-पीछे मुँह लटकाकर जा रहा था। बोला -क्या हुआ, माँ?
- कुछ नहीं।
- धा तिंग, धा तिंग!
मोहना की माँ खेत की मेड़ पर बैठ गई। जेठ की शाम से पहले जो पुरवैया चलती है, धीरे-धीरे तेज़ हो गई। ....मिट्टी की सोंधी सुगन्ध हवा में धीर-धीरे घुलने लगी।
-धा तिंग, धा तिंग!
-मिरदंगिया और कुछ बोलता था, बेटा? मोहना की माँ आगे कुछ न बोल सकी।
-कहता था, तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा पाकर तुम्हारी माँ महारानी है, मैं तो दसदुआरी हूँ...।
- झूठा, बेईमान! मोहना की माँ आँसू पोंछकर बोली। ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।
मोहना चुपचाप खड़ा रहा।

Sunday, 19 February 2023

छत्रपती शिवाजी महाराज ने कैसे हिन्दू धर्म और राष्ट्ररक्षा की, पढ़िए कविवर भूषण की शिवा बावनी


  शिवा बावनी भूषण द्वारा रचित बावन (52) छन्दों का काव्य है जिसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, पराक्रम आदि का ओजपूर्ण वर्णन है। इसमें इस बात का वर्णन है कि किस प्रकार उन्होंने हिन्दू धर्म और राष्ट्र की रक्षा की।

हिन्दू धर्म के बचे रहने के पीछे हिंदुस्तान के छोटे-छोटे राज्यों और विकेद्रीकृत शासन का महत्वपूर्ण सहयोग रहा है। इस्लामी आक्रांताओं ने हमला कर ईरान के केंद्रीकृत शासन को हराकर सब अपने कब्जे में कर लिया था, और फिर पूरे ईरान के लोगों को धर्म परिवर्तन करने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन भारत में ऐसा कभी नहीं हो पाया।

इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब के समय मुग़ल साम्राज्य सबसे अधिक विस्तृत था। औरंगजेब जिहादी कट्टरपंथी था और हिंदुओं को प्रताड़ित कर उनका धर्म परिवर्तन कराना उसकी शासकीय नीति थी। उसके चरमोत्कर्ष पर भी शिवाजी महाराज जैसे शासकों ने डट कर उसका मुक़ाबला किया। महाकवि भूषण ने शिवा बावनी में लिखा है:

साजि चतुरंग बीररंग में तुरंग चढ़ि।
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है॥
भूषन भनत नाद विहद नगारन के।
नदी नद मद गैबरन के रलत हैं॥
ऐल फैल खैल भैल खलक में गैल गैल,

गाजन की ठेल-पेल सैल उसलत है।
तारा सों तरनि घूरि धरा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है॥

 

पीरा पयगम्बरा दिगम्बरा दिखाई देत,
सिद्ध की सिधाई गई, रही बात रब की।
कासी हूँ की कला गई मथुरा मसीत भई
शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी॥
कुम्करण असुर अवतारी औरंगजेब,
कशी प्रयाग में दुहाई फेरी रब की।
तोड़ डाले देवी देव शहर मुहल्लों के,
लाखो मुसलमाँ किये माला तोड़ी सब की॥
भूषण भणत भाग्यो काशीपति विश्वनाथ
और कौन गिनती में भुई गीत भव की।
काशी कर्बला होती मथुरा मदीना होती
शिवाजी न होते तो सुन्नत होती सब की ॥

 

बाने फहराने घहराने घण्टा गजन के,
नाहीं ठहराने राव राने देस देस के।
नग भहराने ग्रामनगर पराने सुनि,
बाजत निसाने सिवराज जू नरेस के ॥
हाथिन के हौदा उकसाने कुंभ कुंजर के,
भौन को भजाने अलि छूटे लट केस के।
दल के दरारे हुते कमठ करारे फूटे,
केरा के से पात बिगराने फन सेस के ॥ 

-अलकनंदा सिंह

Sunday, 29 January 2023

अन्तोन पाव्लविच चेख़व, पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी - शत्रु


 अन्तोन पाव्लविच चेख़व , 29 जनवरी,1860 को जन्‍मे वो रूसी कथाकार और नाटककार थे जिन्‍होंने अपने छोटे से साहित्यिक जीवन में उन्होंने रूसी भाषा को चार कालजयी नाटक दिए जबकि उनकी कहानियाँ विश्व के समीक्षकों और आलोचकों में बहुत सम्मान के साथ सराही जाती हैं। चेखव अपने साहित्यिक जीवन के दिनों में ज़्यादातर चिकित्सक के व्यवसाय में लगे रहे। वे कहा करते थे कि चिकित्सा मेरी धर्मपत्नी है और साहित्य प्रेमिका।


पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी - शत्रु (रूसी कहानी)


सितंबर की एक अँधेरी रात थी। डॉक्टर किरीलोव के इकलौते छह वर्षीय पुत्र आंद्रेई की नौ बजे के थोड़ी देर बाद डिप्थीरिया से मृत्यु हो गई। डॉक्टर की पत्नी बच्चे के पलंग के पास गहरे शोक व निराशा में घुटनों के बल बैठी हुई थी। तभी दरवाजे की घंटी कर्कश आवाज में बज उठी।


घर के नौकर सुबह ही घर से बाहर भेज दिए गए थे, क्योंकि डिप्थीरिया छूत से फैलनेवाला रोग है। किरीलोव ने कमीज पहनी हुई थी। उसके कोट के बटन खुले थे। उसका चेहरा गीला और उसके बिन पुछे हाथ कारबोलिक से झुलसे हुए थे। वह वैसे ही दरवाजा खोलने चल दिया। ड्योढ़ी के अँधेरे में डॉक्टर को आगंतुक का जो रूप दिखा, वह था औसत कद, सफेद गुलूबंद, बड़ा और इतना पीला पड़ा हुआ चेहरा कि लगता था जैसे कमरे में उससे रोशनी आ गई हो।


‘‘क्या डॉक्टर साहब घर पर हैं?’’ आगंतुक के स्वर में जल्दी थी।


‘‘हाँ! आप क्या चाहते हैं?’’ किरीलोव ने उत्तर दिया।


‘‘ओह! आपसे मिलकर खुशी हुई।’’ आगंतुक ने प्रसन्न होकर अँधेरे में डॉक्टर का हाथ टटोला और उसे पा लेने पर अपने दोनों हाथों से जोर से दबाकर कहा, ‘‘बेहद खुशी हुई। हम लोग पहले मिल चुके हैं। मेरा नाम अबोगिन है। गरमियों में ग्चुनेव परिवार में आपसे मिलने का सौभाग्य हुआ था। आपको घर पर पाकर मुझे खुशी हुई। भगवान् के लिए मुझ पर कृपा करें और फौरन मेरे साथ चलें। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरी पत्नी बेहद बीमार है। मैं गाड़ी लाया हूँ।’’


आगंतुक की आवाज और उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वह बेहद घबराया हुआ है। उसकी साँस बहुत तेज चल रही थी और वह काँपती हुई आवाज में तेजी से बोल रहा था, मानो वह किसी अग्निकांड या पागल कुत्ते से बचकर भागता हुआ आ रहा हो। उसकी बात में साफदिली झलक रही थी और वह किसी सहमे हुए बच्चे जैसा लग रहा था। वह छोटे-छोटे अधूरे वाक्य बोल रहा था और बहुत सी ऐसी फालतू बातें कर रहा था, जिनका मामले से कोई लेना-देना नहीं था।


‘‘मुझे डर था कि आप घर पर नहीं मिलेंगे।’’ आगंतुक ने कहना जारी रखा, ‘‘भगवान् के लिए आप अपना कोट पहनें और चलें। दरअसल हुआ यह कि पापचिंस्की, आप उसे जानते हैं, अलेक्जेंडर सेम्योनोविच पापचिंस्की मुझसे मिलने आया। थोड़ी देर हम लोग बैठे बातें करते रहे। फिर हमने चाय पी। एकाएक मेरी पत्नी चीखी और सीने पर हाथ रखकर कुरसी पर निढाल हो गई। उसे उठाकर हम लोग पलंग पर ले गए। मैंने अमोनिया लेकर उसकी कनपटियों पर मला और उसके मुँह पर पानी छिड़का, किंतु वह बिल्कुल मरी सी निढाल पड़ी है। मुझे डर है, उसे कहीं दिल का दौरा न पड़ा हो। आप चलिए, उसके पिता की मौत भी दिल का दौरा पड़ने से हुई थी।’’


किरीलोव चुपचाप ऐसे सुनता रहा जैसे वह रूसी भाषा समझता ही न हो।


जब आगंतुक अबोगिन ने फिर पापचिंस्की और अपनी पत्नी के पिता का जिक्र किया और अँधेरे में दोबारा उसका हाथ ढूँढ़ना शुरू किया, तब उसने सिर उठाया और उदासीन भाव से हर शब्द पर बल देते हुए बोला, ‘‘मुझे खेद है कि मैं आपके घर नहीं जा सकूँगा। पाँच मिनट पहले मेरे बेटे की मौत हो गई है।’’


‘‘अरे नहीं!’’ पीछे हटते हुए अबोगिन फुसफुसाया, ‘‘हे भगवान्! मैं कैसे गलत मौके पर आया हूँ। कैसा अभागा दिन है यह। यह कितनी अजीब बात है। यह कैसा संयोग है। कौन सोच सकता था!’’


उसने दरवाजे का हत्था पकड़ लिया। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह डॉक्टर की मिन्नत करे या लौट जाए। फिर वह किरीलोव की बाँह पकड़कर बोला, ‘‘मैं आपकी हालत बखूबी समझता हूँ। भगवान् जानता है, ऐसे बुरे वक्त में आपको परेशान करने के लिए मैं शर्मिंदा हूँ। लेकिन मैं क्या करूँ, आप ही बताइए, मैं कहाँ जाऊँ? इस जगह आपके अलावा कोई डॉक्टर नहीं है। भगवान् के लिए आप मेरे साथ चलिए!’’


वहाँ चुप्पी छा गई। किरीलोव अबोगिन की ओर पीठ फेरकर एक मिनट तक चुपचाप खड़ा रहा। फिर वह धीरे-धीरे ड्योढ़ी से बैठक में चला गया। उसकी चाल यंत्रवत् और अनिश्चित थी। बैठक में अनजले लैंपशेड की झालर सीधी करने और मेज पर पड़ी एक मोटी किताब के पन्ने उलटने के उसके खोए-खोए अंदाज से लग रहा था कि उस समय उसका न कोई इरादा था, न उसकी कोई इच्छा थी और न ही वह कुछ सोच पा रहा था। वह शायद यह भी भूल गया था कि बाहर ड्योढ़ी में कोई अजनबी खड़ा है। कमरे के सन्नाटे और धुँधलके में उसकी विमूढ़ता और मुखर हो उठी थी। बैठक से कमरे की ओर बढ़ते हुए उसने अपना दाहिना पैर जरूरत से ज्यादा ऊँचा उठा लिया और फिर दरवाजे की चौखट ढूँढ़ने लगा। उसकी आकृति से एक तरह का भौंचक्कापन झलक रहा था, जैसे वह किसी अनजाने मकान में भटक आया हो। रोशनी की एक चौड़ी पट्टी कमरे की एक दीवार और किताबों की अलमारियों पर पड़ रही थी। वह रोशनी ईथर और कार्बोलिक की तीखी और भारी गंध के साथ सोनेवाले उस कमरे से आ रही थी, जिसका दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था। डॉक्टर मेज के पासवाली कुरसी में जा धँसा। थोड़ी देर तक वह रोशनी में पड़ी किताबों को उनींदा सा घूरता रहा, फिर उठकर सोनेवाले कमरे में चला गया।


कमरे में मौत का सा सन्नाटा था। यहाँ की हर छोटी चीज उस तूफान का सबूत दे रही थी, जो हाल में ही यहाँ से गुजरा था। यहाँ पूर्ण निस्तब्धता थी। बक्सों, बोतलों और मर्तबानों से भरी तिपाई पर एक मोमबत्ती जल रही थी और अलमारी पर एक बड़ा लैंप जल रहा था। ये दोनों पूरे कमरे को रोशन कर रहे थे। खिड़की के पास पड़े पलंग पर एक बच्चा लेटा था, जिसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर अचरज का भाव था। वह हिल-डुल नहीं रहा था, किंतु उसकी खुली आँखें हर पल काली पड़कर उसके माथे में ही गहरी धँसती जा रही थीं। उसकी माँ उसकी देह पर हाथ रखे, बिस्तर में मुँह छिपाए, पलंग के पास झुकी बैठी थी। वह पलंग से पूरी तरह चिपटी हुई थी।


डॉक्टर मातम में झुकी बैठी अपनी पत्नी की बगल में आ खड़ा हुआ। पतलून की जेबों में हाथ डालकर और अपना सिर एक ओर झुकाकर वह अपने बेटे की ओर ताकने लगा। उसका चेहरा भावहीन था। केवल उसकी दाढ़ी पर चमक रही बूँदें ही इस बात की गवाही दे रही थीं कि वह अभी रोया है।


कमरे की उदास निस्तब्धता में भी एक अजीब सौंदर्य था, जो केवल संगीत द्वारा ही अभिव्यक्त किया जा सकता है। किरीलोव और उनकी पत्नी चुप थे। वे रोए नहीं। इस बच्चे के गुजर जाने के साथ उनका संतान पाने का स्वप्न भी वैसे ही विदा हो चुका था जैसे अपने समय से उनका यौवन विदा हो गया था। डॉक्टर की उम्र चौवालीस साल थी। उसके बाल अभी से पक गए थे और वह बूढ़ा लगता था। उसकी मुरझाई हुई पत्नी पैंतीस वर्ष की थी। आंद्रेई उनकी एकमात्र संतान थी।


अपनी पत्नी के विपरीत, डॉक्टर एक ऐसा व्यक्ति था, जो मानसिक कष्ट के समय कुछ कर डालने की जरूरत महसूस करता था। कुछ मिनट अपनी पत्नी के पास खड़े रहने के बाद वह सोनेवाले कमरे से बाहर आ गया। अपना दाहिना पैर उसी तरह जरूरत से ज्यादा उठाते हुए वह एक छोटे कमरे में गया, जहाँ एक बड़ा सोफा पड़ा था। वहाँ से होता हुआ वह रसोई में गया। रसोई और अलावघर के पास टहलते हुए वह झुककर एक छोटे से दरवाजे में घुसा और ड्योढ़ी में निकल आया।


यहाँ उसका सामना गुलूबंद पहने और फीके चेहरेवाले उस व्यक्ति से दोबारा हो गया।


‘‘आखिर आप आ गए!’’ दरवाजे के हत्थे पर हाथ रखते हुए अबोगिन ने लंबी साँस लेकर कहा, ‘‘भगवान् के लिए चलिए।’’


डॉक्टर चौंक गया। उसने अबोगिन की ओर देखा और उसे याद आ गया, फिर जैसे इस दुनिया में लौटते हुए उसने कहा, ‘‘अजीब बात है!’’


अपने गुलूबंद पर हाथ रखकर मिन्नत भरी आवाज में अबोगिन बोला, ‘‘डॉक्टर साहब! मैं आपकी हालत अच्छी तरह समझ रहा हूँ। मैं पत्थर-दिल आदमी नहीं हूँ। मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है। पर मैं आपसे अपने लिए प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ। वहाँ मेरी पत्नी मर रही है। यदि आपने उसकी वह हृदय-विदारक चीख सुनी होती, उसका वह जर्द चेहरा देखा होता तो आप मेरे इस अनुनय-विनय को समझ सकते। हे ईश्वर! मुझे लगा कि आप कपड़े पहनने गए हैं। डॉक्टर साहब, समय बहुत कीमती है। मैं हाथ जोड़ता हूँ, आप मेरे साथ चलिए।’’


किंतु बैठक की ओर बढ़ते हुए डॉक्टर ने एक-एक शब्द पर बल देते हुए दोबारा कहा, ‘‘मैं आपके साथ नहीं जा सकता।’’


अबोगिन उसके पीछे-पीछे गया और उसने डॉक्टर की बाँह पकड़ ली, ‘‘मैं समझ रहा हूँ कि आप सचमुच बहुत दुःखी हैं। लेकिन मैं मामूली दाँत-दर्द के इलाज या किसी रोग के लक्षण पूछने मात्र के लिए तो आपसे चलने की जिद नहीं कर रहा!’’ वह याचना भरी आवाज में बोला, ‘‘मैं आपसे एक इनसान का जीवन बचाने के लिए कह रहा हूँ। यह जीवन व्यक्तिगत शोक के ऊपर है, डॉक्टर साहब। अब आप मेरे साथ चलिए। मानवता के नाम पर मैं आपसे बहादुरी दिखाने और धीरज रखने की प्रार्थना कर रहा हूँ।’’


‘‘मानवता! यह एक दुधारी तलवार है!’’ किरीलोव ने झुँझलाकर कहा। ‘‘इसी मानवता के नाम पर मैं आपसे कहता हूँ कि आप मुझे मत ले जाइए। यह सचमुच अजीब बात है। यहाँ मेरे लिए खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा है और आप हैं कि मुझे ‘मानवता’ शब्द से धमका रहे हैं। इस समय मैं कोई भी काम करने के काबिल नहीं हूँ। मैं किसी भी तरह आपके साथ चलने के लिए राजी नहीं। दूसरी बात, यहाँ और कोई नहीं है, जिसे मैं अपनी पत्नी के पास छोड़कर जा सकूँ। नहीं, नहीं।’’


किरीलोव एक कदम पीछे हट गया और और हाथ हिलाते हुए इनकार करने लगा, ‘‘आप मुझे जाने को न कहें!’’ फिर एकाएक वह घबराकर बोला, ‘‘मुझे क्षमा करें, आचरण-संहिता के तेरहवें खंड के मुताबिक मैं आपके साथ जाने को बाध्य हूँ। आपको हक है कि आप मेरे कोट का कॉलर पकड़कर मुझे घसीटकर ले जाएँ। अच्छी बात है। आप बेशक यही करें। लेकिन अभी मैं कोई भी काम करने के काबिल नहीं हूँ। मैं अभी बोल भी नहीं पा रहा, मुझे क्षमा करें।’’


‘‘डॉक्टर साहब, आप ऐसा न कहें।’’ उसकी बाँह न छोड़ते हुए अबोगिन ने कहा, ‘‘मुझे आपके तेरहवें खंड से क्या लेना-देना? आपकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ चलने के लिए आपको मजबूर करने का मुझे कोई अधिकार नहीं। अगर आप चलने को राजी हैं तो ठीक, अगर नहीं तो मजबूरी में मैं आपके दिल से विनती करता हूँ। एक युवती मर रही है। आप कहते हैं कि आप के बेटे की अभी-अभी मौत हुई है। ऐसी स्थिति में तो आपको मेरी तकलीफ औरों से ज्यादा समझनी चाहिए।’’


किरीलोव चुपचाप खड़ा रहा। उधर अबोगिन डॉक्टरी के महान् पेशे और उससे जुड़े त्याग और तपस्या आदि के बारे में बोलता रहा। आखिर डॉक्टर ने रुखाई से पूछा, ‘‘क्या ज्यादा दूर जाना होगा?’’


‘‘बस, तेरह-चौदह मील। मेरे घोड़े बहुत बढि़या हैं डॉक्टर साहब, कसम से, वे केवल एक घंटे में आपको वापस पहुँचा देंगे, बस घंटे भर में।’’


डॉक्टर पर डॉक्टरी के पेशे और मानवता के संबंध में कही गई बातों से ज्यादा असर इन आखिरी शब्दों का पड़ा। एक पल सोचने के बाद उसने उसाँस भरकर कहा, ‘‘ठीक है, चलो, चलें।’’


फिर वह तेजी से कमरे में घुसा। अब उसकी चाल स्थिर थी। पलभर बाद वह अपना डॉक्टरी पेशेवाला कोट पहनकर वापस लौट आया। अबोगिन छोटे-छोटे डग भरता हुआ उसके साथ चलने लगा और कोट ठीक से पहनने में उसकी मदद करने लगा। फिर दोनों साथ-साथ घर से बाहर निकल गए।


बाहर अँधेरा था, लेकिन उतना गहरा नहीं, जितना ड्योढ़ी में था।


‘‘आप यकीन मानिए, आपकी उदारता की कद्र करना मैं जानता हूँ।’’ गाड़ी में डॉक्टर को बैठाते हुए वह बोला, ‘‘लुका भाई, तुम जितनी तेजी से हाँक सकते हो, हाँको। भगवान् के लिए जल्दी करो!’’


कोचवान ने घोड़े सरपट दौड़ा दिए। पूरे रास्ते किरीलोव और अबोगिन चुप रहे। अबोगिन केवल एक बार गहरी साँस लेकर बुदबुदाया, ‘‘कैसी विकट और दारुण परिस्थिति है। जो अपने करीबी हैं, उन पर इतना प्रेम कभी नहीं उमड़ता, जितना तब, जब उन्हें खो देने का डर पैदा हो जाता है!’’


जब नदी पार करने के लिए गाड़ी धीमी हुई, किरीलोव एकाएक चौंक पड़ा। लगा जैसे पानी के छप-छप की आवाज सुनकर वह दूर कहीं से वापस आ गया हो। वह अपनी जगह हिलने-डुलने लगा। फिर वह उदास स्वर में बोला, ‘‘देखो, मुझे जाने दो। मैं बाद में आ जाऊँगा। मैं केवल अपने सहायक को अपनी पत्नी के पास भेजना चाहता हूँ। वह इस समय बिल्कुल अकेली रह गई है।’’


दूसरी ओर, गाड़ी जैसे-जैसे अपने मुकाम पर पहुँच रही थी, अबोगिन और अधिक धैर्यहीन होता जा रहा था। कभी वह उठ जाता, कभी बैठता, कभी चौंककर उछल पड़ता तो कभी कोचवान के कंधे के ऊपर से आगे ताकता। अंत में गाड़ी जब धारीदार किरमिच के परदे से सजे ओसारे में जाकर रुकी, उसने जल्दी और जोर से साँस लेते हुए दूसरी मंजिल की खिड़कियों की ओर देखा, जिनसे रोशनी आ रही थी।


‘‘यदि कुछ हो गया तो मैं सह नहीं पाऊँगा।’’ अबोगिन ने डॉक्टर के साथ ड्योढ़ी की ओर बढ़ते हुए घबराहट में हाथ मलते हुए कहा। ‘‘लेकिन परेशानी वाली कोई आवाज नहीं आ रही, इसलिए अब तक सब ठीक ही होगा।’’ सन्नाटे में कुछ सुन पाने के लिए कान लगाए हुए वह बोला।


ड्योढ़ी में भी बोलने की कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ रही थी और समूचा घर तेज रोशनी के बावजूद सोया हुआ सा लग रहा था।


सीढि़याँ चढ़ते हुए उसने कहा, ‘‘न तो कोई आवाज आ रही है, न ही कोई दिखाई पड़ रहा है। कहीं कोई हलचल भी नहीं है। भगवान् करे...!’’


वे दोनों ड्योढ़ी से होते हुए हॉल में पहुँचे, जहाँ एक काला पियानो रखा हुआ था और छत से फानूस लटक रहा था। यहाँ से अबोगिन डॉक्टर को एक छोटे दीवानखाने में ले गया, जो आरामदेह और आकर्षक ढंग से सजा हुआ था और जिसमें गुलाबी कांति सी झिलमिला रही थी।


‘‘डॉक्टर साहब, आप यहाँ बैठें और इंतजार करें।’’ अबोगिन ने कहा, ‘‘मैं अभी आता हूँ। जरा जाकर देख लूँ और बता दूँ कि आप आ गए हैं।’’


चारों ओर शांति थी। दूर, किसी कमरे की बैठक में किसी ने आह भरी, किसी अलमारी का शीशे का दरवाजा झनझनाया और फिर सन्नाटा छा गया। लगभग पाँच मिनट के बाद किरीलोव ने हाथों की ओर निहारना छोड़कर उस द्वार की ओर देखा, जिससे अबोगिन भीतर गया था।


अबोगिन दरवाजे के पास खड़ा था, पर वह अब वह अबोगिन नहीं लग रहा था, जो कमरे के भीतर गया था। उसके चेहरे पर स्याह परछाइयाँ तैर रही थीं। अब उसकी छवि पहले जैसी साफ नहीं लग रही थी। उसके चेहरे पर विरक्ति के भाव सा कुछ आ गया था। पता नहीं, वह डर था या शारीरिक कष्ट। उसकी नाक, मूँछें और उसका सारा चेहरा फड़क रहा था, जैसे ये सारी चीजें उसके चेहरे से फूटकर अलग निकल पड़ना चाहती हों। उसकी आँखों में पीड़ा भरी हुई थी और वह मानसिक रूप से उद्वेलित लग रहा था।


लंबे और भारी डग भरता हुआ वह दीवानखाने के बीच आ खड़ा हुआ। फिर वह आगे बढ़कर मुट्ठियाँ बाँधते हुए कराहने लगा।


‘‘वह मुझे दगा दे गई, डॉक्टर।’’ फिर ‘दगा’ पर बल देते हुए वह चीखा, ‘‘मुझे छोड़ गई वह। दगा दे गई। यह सब झूठ क्यों? हे ईश्वर, यह घटिया फरेब भरी चालबाजी क्यों? यह शैतानियत भरा धोखे का जाल क्यों? मैंने उसका क्या बिगाड़ा था? आखिर वह मुझे क्यों छोड़ गई?’’


डॉक्टर के उदासीन चेहरे पर जिज्ञासा की झलक उभर आई। वह उठ खड़ा हुआ और उसने अबोगिन से पूछा, ‘‘पर मरीज कहाँ है?’’


‘‘मरीज! मरीज!’’ हँसता-रोता और मुट्ठियाँ हिलाता हुआ अबोगिन चिल्लाया, ‘‘वह मरीज नहीं, पापिन है! इतना कमीनापन! इतना ओछापन! शैतान भी ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करता। उसने मुझे यहाँ से भेज दिया। क्यों? ताकि वह उस दलाल, उस भाँड़ के साथ भाग जाए! हे ईश्वर! इससे तो अच्छा था, वह मर जाती। यह बेवफाई मैं नहीं सह सकूँगा, बिल्कुल नहीं।’’


यह सुनते ही डॉक्टर तनकर खड़ा हो गया। उसने आँसुओं से भरी अपनी आँखें झपकाईं। उसकी नुकीली दाढ़ी भी जबड़ों के साथ-साथ दाएँ-बाएँ हिल रही थी। वह भौंचक्का होकर बोला, ‘‘क्षमा करें, इसका क्या मतलब है? मेरा बच्चा कुछ देर पहले मर गया है। मेरी पत्नी मातम में है और शोक से मरी जा रही है। इस समय वह घर में अकेली है। मैं खुद भी बड़ी मुश्किल से खड़ा हो पा रहा हूँ। तीन रातों से मैं सोया नहीं हूँ और मुझे क्या ऐसी भद्दी नौटंकी में शामिल होने के लिए यहाँ बुलाया गया हूँ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।’’


अबोगिन ने एक मुट्ठी खोली और एक मुड़ा-तुड़ा सा पुरजा फर्श पर डालकर उसे कुचल दिया, मानो वह कोई कीड़ा हो, जिसे वह नष्ट कर डालना चाहता था। अपने चेहरे के सामने मुट्ठी हिलाते हुए दाँत भींचकर वह बोला, ‘‘और मैंने कुछ समझा ही नहीं, कुछ ध्यान ही नहीं दिया। वह रोज मेरे यहाँ आता था, इस बात पर गौर नहीं किया। यह भी नहीं सोचा कि आज वह मेरे घर बग्घी में आया था। बग्घी में क्यों? मैं अंधा और मूर्ख था, जिसने इसके बारे में सोचा ही नहीं, अंधा और मूर्ख।’’ उसके चेहरे से लग रहा था जैसे किसी ने उसके पैरों को कुचल दिया हो।


डॉक्टर फिर बड़बड़ाया, ‘‘मैं, मेरी समझ में नहीं आता कि इस सबका मतलब क्या है? यह तो किसी इनसान की बेइज्जती करना हुआ, इनसान के दुख और वेदना का उपहास करना हुआ। यह बिल्कुल नामुमकिन बात है, यह भद्दा मजाक है। मैंने अपनी जिंदगी में ऐसी बात कभी नहीं सुनी।’’


उस व्यक्ति की तरह, जो अब समझ गया है कि उसका घोर अपमान किया गया है, डॉक्टर ने अपने कंधे उचकाए और बेबसी में हाथ फैला दिए। बोलने या कुछ भी कर सकने में असमर्थ, वह फिर आरामकुरसी में धँस गया।


‘‘तो तुम अब मुझ से प्रेम नहीं करतीं, किसी दूसरे से प्यार करती हो। ठीक है, पर यह धोखा क्यों, यह ओछी दगाबाजी क्यों?’’ अबोगिन रोवाँसे स्वर में बोला, ‘‘इससे किसका भला होगा? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? तुमने यह घटिया हरकत क्यों की, डॉक्टर!’’ वह आवेग में चिल्लाता हुआ किरीलोव के पास पहुँच गया, ‘‘आप अनजाने में मेरे दुर्भाग्य के गवाह बन गए हैं और मैं आप से सच्ची बात नहीं छिपाऊँगा। मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैं उस औरत से मोहब्बत करता था। मैं उसका गुलाम था। मैं उसकी पूजा करता था। मैंने उसके लिए हर चीज कुरबान कर दी। अपने संबंधियों से झगड़ा किया। नौकरी छोड़ दी। संगीत का अपना शौक छोड़ दिया। उन बातों के लिए उसे माफ कर दिया, जिनके लिए मैं अपनी बहन या माँ को कभी माफ नहीं करता। मैंने उसे कभी कड़ी निगाह से नहीं देखा। मैंने उसे कभी बुरा मानने का जरा सा भी मौका नहीं दिया। यह सब झूठ और फरेब है, क्यों? अगर तुम मुझे प्यार नहीं करती थीं तो वह साफ-साफ कह क्यों नहीं दिया...इन सब मामलों में तुम मेरी राय जानती थीं!’’


काँपते हुए, आँखों में आँसू भरे अबोगिन ने अपना दिल डॉक्टर के सामने खोलकर रख दिया। वह भावोद्रेक में बोल रहा था। सीने से हाथ लगाए हुए, बिना किसी झिझक के वह गोपनीय घरेलू बातें बता रहा था। असल में, एक तरह से आश्वस्त सा होता हुआ कि आखिरकार ये गोपनीय बातें अब खुल गईं। यदि इसी तरह वह घंटे भर और बोल लेता, अपने दिल की बात कह लेता, गुबार निकाल लेता तो यकीनन वह स्वस्थ महसूस करने लगता। कौन जाने, यदि डॉक्टर दोस्ताना हमदर्दी से उसकी बात सुन लेता, शायद जैसा कि अकसर होता है, वह ना-नुकुर किए बिना और अनावश्यक गलतियाँ किए बिना ही अपनी किस्मत से संतुष्ट हो जाता, लेकिन हुआ कुछ और ही।


उधर अबोगिन बोलता जा रहा था, इधर अपमानित डॉक्टर के चेहरे पर एक बदलाव सा होता दिखाई दे रहा था। उसके चेहरे पर जो स्तब्धता और उदासीनता का भाव था, वह मिट गया और उसकी जगह क्रोध और अपमान ने ले ली। उसका चेहरा और भी हठपूर्ण और कठोर हो गया। ऐसी हालत में अबोगिन ने उसे धार्मिक पादरियों जैसे भावशून्य और रूखे चेहरेवाली एक सुंदर नवयुवती की फोटो दिखाते हुए पूछा कि क्या कोई यकीन कर सकता है कि ऐसे चेहरेवाली स्त्री झूठ बोल सकती है, छल कर सकती है?


डॉक्टर अबोगिन के पास से पीछे हट गया और भौंचक्का होकर उसे देखने लगा।


‘‘आप मुझे यहाँ लाए ही क्यों?’’ डॉक्टर बोला। उसकी दाढ़ी हिल रही थी, ‘‘आपने शादी की, क्योंकि आपके पास इससे अच्छा और कोई काम नहीं था और इसलिए आप अपना यह घटिया नाटक मनमाने ढंग से खेलते रहे, पर मुझे इससे क्या लेना-देना? मेरा आपके इस प्यार-मोहब्बत से क्या सरोकार? मुझे तो चैन से जीने दीजिए। आप अपनी मुक्केबाजी कीजिए, अपने मानवतावादी विचार बघारिए, वायलिन बजाइए, मुरगे की तरह मोटे होते जाइए, पर किसी को जलील मत कीजिए। यदि आप उनका सम्मान नहीं कर सकते तो कृपा करके उनसे अलग ही रहिए।’’


अबोगिन का चेहरा लाल हो गया। उसने पूछा, ‘‘इसका मतलब क्या है?’’


‘‘इसका मतलब यह है कि लोगों के साथ यह कमीना और कुत्सित खिलवाड़ है। मैं डॉक्टर हूँ। आप डॉक्टरों को, बल्कि हर ऐसा काम करनेवाले को, जिसमें से इत्र और वेश्यावृत्ति की गंध नहीं आती, नौकर और अर्दली किस्म का आदमी समझते हैं। आप जरूर समझिए। लेकिन दुःखी व्यक्ति की भावनाओं से खिलवाड़ करने का, उसे नाटक की सामग्री समझने का आपको कोई हक नहीं।’’


अबोगिन का चेहरा गुस्से से फड़क रहा था। उसने ललकारकर पूछा, ‘‘मुझसे ऐसी बात करने की आपकी हिम्मत कैसे हुई?’’


मेज पर घूँसा मारते हुए डॉक्टर चिल्लाया, ‘‘मेरा दुःख जानते हुए भी अपनी अनाप-शनाप बातें सुनाने के लिए मुझे यहाँ लाने की हिम्मत आपको कैसे हुई? दूसरे के दुःख का मखौल करने का हक आपको किसने दिया?’’


अबोगिन चिल्लाया, ‘‘आप जरूर पागल हैं। कितने बेरहम हैं आप। मैं खुद कितना दुःखी हूँ और...और...!’’


घृणा से मुसकराकर डॉक्टर ने कहा, ‘‘दुःखी! आप इस शब्द का इस्तेमाल मत कीजिए। इसका आपसे कोई वास्ता नहीं। जो आवारा-निकम्मे कर्ज नहीं ले पाते, वे भी अपने को दुखी कहते हैं। मोटापे से परेशान मुरगा भी दुःखी होता है। घटिया आदमी!’’


गुस्से से पिनपिनाते हुए अबोगिन ने कहा, ‘‘जनाब, आप अपनी औकात भूल रहे हैं! ऐसी बातों का जवाब लातों से दिया जाता है!’’


अबोगिन ने जल्दी से अंदर की जेब टटोलकर उसमें से नोटों की एक गड्डी निकाली और उसमें से दो नोट निकालकर मेज पर पटक दिए। नथुने फड़काते हुए उसने हिकारत से कहा, ‘‘यह रही आपकी फीस। आपके दाम अदा हो गए।’’


नोटों को जमीन पर फेंकते हुए डॉक्टर चिल्लाया, ‘‘रुपए देने की गुस्ताखी मत कीजिए। यह अपमान इससे नहीं धुल सकता।’’


अबोगिन और डॉक्टर एक-दूसरे को अपमानजनक और भद्दी-भद्दी बातें कहने लगे। उन दोनों ने जीवन भर शायद सन्निपात में भी कभी इतनी अनुचित, बेरहम और बेहूदी बातें नहीं कही थीं। दोनों में जैसे वेदनाजन्य अहं जाग गया था। जो दुःखी होते हैं, उनका अहं बहुत बढ़ जाता है। वे क्रोधी, नृशंस और अन्यायी हो जाते हैं। वे एक-दूसरे को समझने में मूर्खों से भी ज्यादा असमर्थ होते हैं। दुर्भाग्य लोगों को मिलाने की जगह अलग करता है। प्रायः यह समझा जाता है कि एक ही तरह का दुःख पड़ने पर लोग एक-दूसरे के नजदीक आ जाते होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे लोग अपेक्षाकृत संतुष्ट लोगों से बहुत ज्यादा नृशंस और अन्यायी साबित होते हैं।


डॉक्टर चिल्लाया, ‘‘मेहरबानी करके मुझे मेरे घर पहुँचा दीजिए।’’ गुस्से से उसका दम फूल रहा था।


अबोगिन ने जोर से घंटी बजाई। जब उसकी पुकार पर भी कोई नहीं आया तो गुस्से में उसने घंटी फर्श पर फेंक दी। कालीन पर एक हल्की, खोखली आह सी भरती हुई घंटी खामोश हो गई।


तब एक नौकर आया।


घूँसा ताने अबोगिन जोर से चीखा, ‘‘कहाँ मर गया था तू? बेड़ा गर्क हो तेरा ! तू अभी था कहाँ? जा इस आदमी के लिए गाड़ी लाने को कह और मेरे लिए बग्घी निकलवा!’’ जैसे ही नौकर जाने के लिए मुड़ा, अबोगिन फिर चिल्लाया, ‘‘ठहर! कल से इस घर में एक भी गद्दार, दगाबाज नहीं रहेगा। सब निकल जाएँ, दफा हो जाएँ यहाँ से। मैं नए नौकर रख लूँगा। बेईमान कहीं के!’’


गा‌ड़ियों के लिए प्रतीक्षा करते समय डॉक्टर और अबोगिन खामोश रहे। नाजुक सुरुचि का भाव अबोगिन के चेहरे पर फिर लौट आया था। बड़े सभ्य तरीके से वह अपना सिर हिलाता हुआ, कुछ योजना सी बनाता हुआ कमरे में टहलता रहा। उसका गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था, पर वह ऐसा जाहिर करने का प्रयास कर रहा था, जैसे कमरे में शत्रु की मौजूदगी की ओर उसका ध्यान भी न गया हो। उधर डॉक्टर एक हाथ से मेज पकड़े हुए स्थिर खड़ा अबोगिन की ओर हिकारत से देख रहा था, गोया वह उसका शत्रु हो।


कुछ देर बाद जब डॉक्टर गाड़ी में बैठा अपने घर जा रहा था, उसकी आँखों में तब भी वही घृणा भाव कायम था। घंटे भर पहले जितना अँधेरा था, अब वह ज्यादा बढ़ गया था। दूज का लाल चाँद पहाड़ी के पीछे छिप गया था और उसकी रखवाली करनेवाले बादल सितारों के आस-पास काले धब्बों की तरह पडे़ थे। पीछे से सड़क पर पहियों की आवाज सुनाई दी और बग्घी की लाल रंग की लालटेनों की चमक डॉक्टर की गाड़ी के आगे आ गई। वह अबोगिन था। जो प्रतिवाद करने, झगड़ा करने पर उतारू था।


पूरे रास्ते डॉक्टर अपनी शोकाकुल पत्नी या अपने मृत पुत्र आंद्रेई के बारे में नहीं बल्कि अबोगिन और उस घर में रहनेवालों के बारे में सोचता रहा, जिसे वह अभी छोड़कर आया था। उसके विचार नृशंस और अन्यायपूर्ण थे। उसने मन-ही-मन अबोगिन, उसकी बीवी, पापचिंस्की और सुगंधित गुलाबी उषा में रहनेवाले सभी लोगों पर क्षोभ प्रकट किया और रास्ते भर बराबर इन लोगों के लिए नफरत और हिकारत की बातें सोचता रहा। यहाँ तक कि उसके दिल में दर्द होने लगा और ऐसे लोगों के प्रति ऐसा ही दृष्टिकोण उसके जहन में स्थिर हो गया।


वक्त गुजरेगा और किरीलोव का दुःख भी गुजर जाएगा। किंतु यह अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण डॉक्टर के साथ हमेशा रहेगा—जीवनभर, उसकी मृत्यु के दिन तक।


(अनुवाद : सुशांत सुप्रिय)

Monday, 2 January 2023

पुण्‍यतिथ: पढ़िए जैनेन्द्र कुमार द्वारा अनूदित रूसी कहानीकार #LeoTolstoy की कहानी ''कितनी जमीन ?


 हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक जैनेन्द्र कुमार आज के ही दिन पैदा हुए थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिला अंतर्गत कौड़ियालगंज में 2 जनवरी 1905 को हुआ था जबकि निधन 24 दिसंबर 1988 को हुआ। 

वो हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार, उपन्यासकार तथा निबंधकार थे। जैनेन्द्र अपने पात्रों की खोज करके उन्हें बड़े कौशल से प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ इसी कारण से संयुक्त रूप से उभरती हैं। 
साहित्यिक परिचय
'फाँसी' इनका पहला कहानी संग्रह था, जिसने इनको प्रसिद्ध कहानीकार बना दिया। उपन्यास 'परख' से सन्‌ 1929 में पहचान बनी। 'सुनीता' का प्रकाशन 1935 में हुआ। 'त्यागपत्र' 1937 में और 'कल्याणी' 1939 में प्रकाशित हुए। इसके बाद 1930 में 'वातायन', 1933 में 'नीलम देश की राजकन्या', 1934 में 'एक रात', 1935 में 'दो चिड़ियाँ' और 1942 में 'पाजेब' का प्रकाशन हुआ। 'जैनेन्द्र की कहानियां' सात भागों उपलब्ध हैं। उनके अन्य महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं- 'विवर्त,' 'सुखदा', 'व्यतीत', 'जयवर्धन' और 'दशार्क'। 'प्रस्तुत प्रश्न', 'जड़ की बात', 'पूर्वोदय', 'साहित्य का श्रेय और प्रेय', 'मंथन', 'सोच-विचार', 'काम और परिवार', 'ये और वे' इनके निबंध संग्रह हैं। तालस्तोय की रचनाओं का इनके द्वारा किया गया अनुवाद उल्लेखनीय है। 'समय और हम' प्रश्नोत्तर शैली में जैनेन्द्र को समझने की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। 

पढ़िए जैनेन्द्र कुमार द्वारा अनूदित रूसी कहानीकार #LeoTolstoy की कहानी ''कितनी जमीन ?

दो बहनें थीं बड़ी बहन की शादी कस्बे में एक सौदागर से हुई थी जबकि छोटी बहन की शादी देहात में किसान के घर हुई थी बड़ी बहन छोटी बहन के घर आकर अपने शहर के जीवन की तारीफ़ करने लगी देखो कैसे आराम से हम रहते हैं फैंसी कपड़े पहनते हैं अच्छे-अच्छे पकवान खाते हैं और फिल्म देखने चाहते हैं और बाग-बगीचों में घूमते हैं.


छोटी बहन को बड़ी बहन की कही बातें बुरी लगी वह अपनी बहन से कहने लगी थी मैं तो तुम्हारे बाल बराबरी कभी नहीं करुंगी क्योंकि हम तो सीधे-साधे रहते हैं हम किसान हैं हमारी जिंदगी फूलों के समान है महकती रहती है हमें किसी से भी कोई जलन नहीं होती और हमारा शरीर मजबूत रहता है क्योंकि हम दिन भर काम करते हैं.

छोटी बहन का पति दीना बाहर बैठा दोनों की यह बातें सुन रहा था उसने सोचा कि बड़ी बहन की बातें तो खड़ी हैं बात आई गई हो गई एक दिन  टीना अपने घर के बरामदे में बैठा था कि एक सौदागर उधर से गुजरता हुआ उसके घर आया उसने बताया कि यह दरिया किनारे की बस्ती है बिना नहीं सोचा कि वहां की “जमीन” तो बहुत ही उपजाऊ है उसके मन में इच्छा हुई थी वह यहां क्यों पड़ा है.

जबकि दूसरी जगह मौका है यहां की जमीन बेचकर पैसे लेकर क्यों न नए सिरे से जीवन शुरू करके देखूं उसके अपने तैयारी शुरु कर दी बीवी से कहा कि घर की देखभाल करना और खुद एक को साथ लेकर निकल गया रास्ते में चाय के डिब्बे और उपहार की अन्य चीजें खरीदी, सातवें दिन में कॉल लोगों की बस्ती में पहुंच गए वहां पहुंचकर उसने देखा कि सौदागर ने जो बात बताई थी वह सच थी कॉल लोगों की जमीन बहुत ही अच्छी थी बीमा को देखते ही सब अपने तंबुओं से निकल आए और उसके चारों तरफ आकर खड़े हो गए उनमें से एक आदमी ऐसा था जो देना और उन लोगों की भाषा को समझता था.

देना ने उसी के जरिए उन लोगों को बताया कि वह यहां “जमीन” के लिए आया है वह लोग बड़े खुश हुए बड़ी आओ भगत के साथ उसे अपने अच्छे अच्छे घरों में ले गए पीने को चाय दी देना ने भी अपने पास से कुछ उपहार की चीजें से निकाली और उन सबको दे दी वे लोग भी बड़े खुश हुए फिर उस आदमी ने कहा की मेहमान को सब समझा दो किस दे कहना चाहते हैं कि हम आपके आने से खुश हैं बताओ हमारे पास कौन सी चीज है जो आप को सबसे अधिक पसंद है.

ताकि हम उसे आपके लिए ला सकें बिना ने जवाब दिया की जिस चीज को देखकर मैं खुश हूं वह आप की “जमीन” है हमारे यहां “जमीन” कम है और इतनी अच्छी भी नहीं है उसमें कुछ भी खेती अच्छी तरह नहीं होती लेकिन यहां तो उसका कोई अंत नहीं है यहां की जमीन बहुत उपजाऊ है मैंने तो अपनी आंखों से यहां जैसी धरती कहीं और नहीं देखी.

बिना ने अपनी बात उन लोगों को समझा दी कुछ देर से आपस में सलाह करने लगे उन लोगों की आपस में बातचीत चल रही थी की बड़ी सी टोपी पहने उनका सरदार वहां आया सब चुप होकर उसके सम्मान में खड़े हो गए दीना को बताया कि यह हमारे सरदार हैं बिना ने फौरन अपने सामान में से एक बढ़िया सा तोहफा निकाला और उस को दे दिया सरदार ने भेंट ले ली और अपने आसन पर बैठ गया और बोला तुम्हें कितनी “जमीन” चाहिए ले लो हमारे यहां जमीन की कोई कमी नहीं है.

बिना ने सोचा कि मैं चाहे जितनी “जमीन” कैसे ले सकता हूं पक्का करने के लिए कागज भी तो चाहिए नहीं तो जैसे आज उन्होंने कह दिया है वैसे ही कल यह ले भी लेंगे टीना ने कहा कि मैं जमीन  लूंगा जब आप मुझे कागज पर पक्का करके देंगे सरदार बोला ठीक है यह तो आसानी से हो जाएगा हमारे यहां एक मुंशी है जो लिखा-पढ़ी पक्की कर लेगा दीना बोला तो कीमत क्या होगी सरदार ने कहा एक दिन के 1000 दी ना समझ नहीं पाया.

वह बोला यह हिसाब तो मुझे नहीं आता एकड़ का हिसाब बताएं सरदार ने कहा कि जितना चलोगे उतनी “जमीन” तुम्हारी हो जाएगी और उस दिन का 1000 लेंगे देना सोच में पड़ गया बोला इस से तो हो सारी “जमीन” गिरी जा सकती है सरदार हंसा बोला था क्यों नहीं पर शर्त यह है कि अगर तुम उसी दिन उसी जगह ना आ गए जहां से चले थे तो कीमत दोगुनी हो जाएगी दीना खुश हो गया और अगले दिन सवेरे ही चलना शुरु कर दिया फिर कुछ बातें हो खाना पीना हुआ ऐसे करते करते रात हो गई बिना बिस्तर पर लेटा तो रहा पर उसे नींद नहीं आई रह रह कर उसे वही “जमीन” दिखाई दे रही थी.

सवेरा हुआ और उसने अपने दोस्त को उठाया जो गाड़ी में सोते हुए जा रहा था बोला उठ जाओ गज जमीन नापने चलना है सब तैयार हुए और सब चल पड़े दीना ने फावड़ा खरीद लिया खुले मैदान में जब पहुंचे तब तक सूरज चढ़ चुका था बस एक ऊंची पहाड़ी थी और खुला मैदान सरदार ने इशारा करते हुए कहा जहां तक नजर जाती है हमारी जमीन है अब तुम देख लो तुम्हें “जमीन” जमीन लेनी है वीना ने रुपए निकाले और  गिन कर रख दिए फिर उसमें पहना हुआ अपना कोट उतार डाला और धोती को कस लिया कुर्ते की बाजू ऊपर की और पानी लेकर चल दिया.

फिर देखने लगा कि मैं किस तरफ चलूं क्योंकि उसे “जमीन” का बहुत बड़ा लालच था उसने फावड़ा लिया और चलना शुरु किया 2 3 4 चल के पैर फिर एक गड्ढा खोदा और उसमें ऊंची घास चिंदी फिर वह आगे बढ़ा और फुर्ती से चलने लगा तथा जहां रखता ही गड्ढा खोद दे ता ता के सरदार को पता चल जाए कि वह कितनी दूर चला है उसने अपने जूते उतार दिए और धोती ऊपर कर ली अब चलना आसान हो गया वह दो तीन मिल चला और उसने सोचा और चलता हूं ताकि और जमीन ले सकूं वह इतनी दूर चल चुका था कि जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो वह पहाड़ी बहुत दूर दिख रही थी जहां से उसने चलना शुरु किया था.

वहां धूप में जाने क्या कुछ चलता हुआ था दिखाई पड़ रहा था वीना ने सोचा मैं तो बहुत दूर आ गया हूं अब लौटना चाहिए उसे पसीना भी आ रहा था और प्यास लग रही थी पर फिर सोचा थोड़ी “जमीन” को ले लूं फिर वापस लौट लूंगा क्योंकि थोड़ा सा काम कर लूं फिर तो जिंदगी भर आराम ही आराम हो जाएगा, एक तरफ उसने काफी लंबी जमीन नाप ली थी वहीं दूसरी तरफ मुड़ कर देखा तो उसे वह जगह ही नहीं मिल रही थी.

जहां उसने गड्ढा बनाया और जहां से चलना शुरु किया था टीना ने सोचा आज मैंने ज्यादा “जमीन” नाप ली वह तेज कदमों से तीसरी तरफ बढ़ा उसने सूरज को देखा सूरज अब तिहाई पर था अब वह वापस उस पार्टी की तरफ मुड़ने लगा जहां से उसने चलना शुरु किया था उसके पैरों में छाले पड़ चुके थे और सुरक्षित नाही वाला था सूरज जैसे जैसे नीचे भंगा था उसके मन में सोच होने लगी कि मुझे तो बड़ी भूल हो गई थी.

मैंने इतने पैर क्यों पसार लिए जब मैं वापस नहीं पूछूंगा तो सरदार  भी जमीन भी नहीं देगा पैसे दुगने कर देगा आप जीना डेट एंड भागने लगा उसकी सांस फूलने लगी और उसे बहुत दुख हो दर्द होने लगा रहते तेज भागने लगा उसने अपने कंधे से धोती अलग के जूते फेंक दिए और बस वह उस पहाड़ी की तरफ दौड़ने लगा बोला क्या करूं मेरा काम तो बिगड़ने ही वाला है इस सोच में डर के कारण मैं तेज तेज हाफ ने लगा पसीना हो गया उसका सारा मुंह लाल हो गया था आगे जाकर उसे उन लोगों की आवाज सुनाई दी.

जिनके पास वह “जमीन” लेने आया वह उसे जोर जोर से बुला रहे थे सूरज धरती से लगा जा रहा था अंधेरा होने ही वाला था अब उसे वह सरदार और वो लोग दिखाई दे रहे थे उसके पैरों ने उसका साथ छोड़ दिया था उसकी सास लंबी-लंबी चल रही थी लेकिन फिर भी वह दौड़ आ जा रहा था क्योंकि जहां वह लोग खड़े थे वहां से तो सूरज चमक रहा था पर देना को नहीं जीना खूब भाग भाग के सरदार के पास आया, सरदार जोर-जोर से हंसने लगा और आकर गिर गया जैसे ही गिरा देना का नौकर उसे पकड़ने आया तो देखा और दीना के मुंह से खून निकल रहा था वह मर चुका था नौकर ने उसको उठाया और वहीं पर दफना दिया.

कहानी का सार: 
हम पूरी जिंदगी इसी उलझन में रहते हैं कि हमें यह मिल जाए हमें वह मिल जाए और हमारी इच्छाएं कभी भी पूरी नहीं होती जीवन खुशियों से भरा है लेकिन हम उसे इसी दुख में बिता देते हैं कि हमें यह नहीं मिला वह नहीं मिला हमारा मोह इस संसार में भरा है जब तक हमारा लालच रहेगा हम ना तो जी पाएंगे और ना ही दूसरों को जीने देंगे.

Wednesday, 21 December 2022

सआदत हसन मंटो की ये पांच लघुकथाएं...इंसानियत के परखच्‍चे उड़ा देती हैं


 मैंने आज मंटो की लघुकथाऐं पढ़कर ये जाना कि कहानी के नाम पर खर्रे के खर्रे भरना जरूरी नहीं, एक पूरी कथा एक छोटी सी लाइन में कही जा सकती है। हम हिंदू मुसलमान करते रहते हैं और इंसानियत इस बीच इन्‍हीं शब्‍दों के बीच उधेड़ दी जाती है और कोई  उफ तक नहीं करता मगर मंटो ने ये कर दिखाया।  

सआदत हसन मंटो भारतीय उपमहाद्वीप के महान उर्दू कहानीकार थे। उनकी कहानियां भारत-पाक विभाजन के दंश का प्रामाणिक दस्तावेज हैं। बंटवारे के दर्द को बेहद गहराई से समझने, उसके संवेदनात्मक व मानवीय पहलू को बेहतरीन रूप से प्रस्तुत करने का नाम है मंटो! मानवीय त्रासदी उनकी रचनाओं में बेहद शिद्दत से उपस्थित हुआ है, इसीलिए वे दोनों देशों में आज भी लोकप्रिय हैं।

मंटो की रचना यात्रा उनकी कहानियों की तरह ही बड़ी ही विचित्रता से भरी हुई है। एक ऐसा शख्स जो जालियांवाला बाग कांड से उद्वेलित होकर पहली बार अपनी कहानी लिखने बैठता है वो औरत-मर्द के रिश्तों की उन परतों को उघाड़ने लगता है जहाँ से पूरा समाज ही नंगा दिखने लगता है।

मंटो ने ताउम्र मजहबी कट्टरता के खिलाफ लिखा, मजहबी दंगे की वीभत्सता को अपनी कहानियों में एक जिंदा तस्वीर के रूप में प्रस्तुत किया। उनके लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत की थी।

1 ) करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए।

लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, कानूनी गिरफ्त से बचे रहें।

एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उनके पास शक्कर की दो बोरियाँ थीं जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अँधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा तो खुद भी साथ चला गया।

शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गए। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं। जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया; लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया।

दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।

उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे ।



2 ) गलती का सुधार

"कौन हो तुम?"

"तुम कौन हो?"

"हर-हर महादेव…हर-हर महादेव!"

"हर-हर महादेव!"

"सुबूत क्या है?"

"सुबूत…? मेरा नाम धरमचंद है।"

"यह कोई सुबूत नहीं।"

"चार वेदों में से कोई भी बात मुझसे पूछ लो।"

"हम वेदों को नहीं जानते…सुबूत दो।"

"क्या?"

"पायजामा ढीला करो।"

पायजामा ढीला हुआ तो एक शोर मच गया-"मार डालो…मार डालो…"

"ठहरो…ठहरो…मैं तुम्हारा भाई हूँ…भगवान की कसम, तुम्हारा भाई हूँ।"

"तो यह क्या सिलसिला है?"

"जिस इलाके से मैं आ रहा हूँ, वह हमारे दुश्मनों का है…इसलिए मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा, सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए…एक यही चीज गलत हो गई है, बाकी मैं बिल्कुल ठीक हूँ…"

"उड़ा दो गलती को…"

गलती उड़ा दी गई…धरमचंद भी साथ ही उड़ गया।



3 ) घाटे का सौदा

दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक लड़की चुनी और बयालीस रुपए देकर उसे खरीद लिया।

रात गुजारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा-"तुम्हारा क्या नाम है?"

लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया-"हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मजहब की हो…"

लड़की ने जवाब दिया-"उसने झूठ बोला था।"

यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा-"उस हरामजादे ने हमारे साथ धोखा किया है…हमारे ही मजहब की लड़की थमा दी…चलो, वापस कर आएँ…।"


4 ) मिशटेक

छुरी पेट चाक करती (चीरती) हुई नाफ (नाभि) के नीचे तक चली गई।

इजारबंद (नाड़ा) कट गया।

छुरी मारने वाले के मुँह से पश्चात्ताप के साथ निकला-"च् च् च्…मिशटेक हो गया!"



5 ) रियायत

"मेरी आँखों के सामने मेरी बेटी को न मारो…"

"चलो, इसी की मान लो…कपड़े उतारकर हाँक दो एक तरफ…"।

- अलकनंदा सिंह 



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