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Sunday, 29 January 2023

अन्तोन पाव्लविच चेख़व, पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी - शत्रु


 अन्तोन पाव्लविच चेख़व , 29 जनवरी,1860 को जन्‍मे वो रूसी कथाकार और नाटककार थे जिन्‍होंने अपने छोटे से साहित्यिक जीवन में उन्होंने रूसी भाषा को चार कालजयी नाटक दिए जबकि उनकी कहानियाँ विश्व के समीक्षकों और आलोचकों में बहुत सम्मान के साथ सराही जाती हैं। चेखव अपने साहित्यिक जीवन के दिनों में ज़्यादातर चिकित्सक के व्यवसाय में लगे रहे। वे कहा करते थे कि चिकित्सा मेरी धर्मपत्नी है और साहित्य प्रेमिका।


पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी - शत्रु (रूसी कहानी)


सितंबर की एक अँधेरी रात थी। डॉक्टर किरीलोव के इकलौते छह वर्षीय पुत्र आंद्रेई की नौ बजे के थोड़ी देर बाद डिप्थीरिया से मृत्यु हो गई। डॉक्टर की पत्नी बच्चे के पलंग के पास गहरे शोक व निराशा में घुटनों के बल बैठी हुई थी। तभी दरवाजे की घंटी कर्कश आवाज में बज उठी।


घर के नौकर सुबह ही घर से बाहर भेज दिए गए थे, क्योंकि डिप्थीरिया छूत से फैलनेवाला रोग है। किरीलोव ने कमीज पहनी हुई थी। उसके कोट के बटन खुले थे। उसका चेहरा गीला और उसके बिन पुछे हाथ कारबोलिक से झुलसे हुए थे। वह वैसे ही दरवाजा खोलने चल दिया। ड्योढ़ी के अँधेरे में डॉक्टर को आगंतुक का जो रूप दिखा, वह था औसत कद, सफेद गुलूबंद, बड़ा और इतना पीला पड़ा हुआ चेहरा कि लगता था जैसे कमरे में उससे रोशनी आ गई हो।


‘‘क्या डॉक्टर साहब घर पर हैं?’’ आगंतुक के स्वर में जल्दी थी।


‘‘हाँ! आप क्या चाहते हैं?’’ किरीलोव ने उत्तर दिया।


‘‘ओह! आपसे मिलकर खुशी हुई।’’ आगंतुक ने प्रसन्न होकर अँधेरे में डॉक्टर का हाथ टटोला और उसे पा लेने पर अपने दोनों हाथों से जोर से दबाकर कहा, ‘‘बेहद खुशी हुई। हम लोग पहले मिल चुके हैं। मेरा नाम अबोगिन है। गरमियों में ग्चुनेव परिवार में आपसे मिलने का सौभाग्य हुआ था। आपको घर पर पाकर मुझे खुशी हुई। भगवान् के लिए मुझ पर कृपा करें और फौरन मेरे साथ चलें। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरी पत्नी बेहद बीमार है। मैं गाड़ी लाया हूँ।’’


आगंतुक की आवाज और उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वह बेहद घबराया हुआ है। उसकी साँस बहुत तेज चल रही थी और वह काँपती हुई आवाज में तेजी से बोल रहा था, मानो वह किसी अग्निकांड या पागल कुत्ते से बचकर भागता हुआ आ रहा हो। उसकी बात में साफदिली झलक रही थी और वह किसी सहमे हुए बच्चे जैसा लग रहा था। वह छोटे-छोटे अधूरे वाक्य बोल रहा था और बहुत सी ऐसी फालतू बातें कर रहा था, जिनका मामले से कोई लेना-देना नहीं था।


‘‘मुझे डर था कि आप घर पर नहीं मिलेंगे।’’ आगंतुक ने कहना जारी रखा, ‘‘भगवान् के लिए आप अपना कोट पहनें और चलें। दरअसल हुआ यह कि पापचिंस्की, आप उसे जानते हैं, अलेक्जेंडर सेम्योनोविच पापचिंस्की मुझसे मिलने आया। थोड़ी देर हम लोग बैठे बातें करते रहे। फिर हमने चाय पी। एकाएक मेरी पत्नी चीखी और सीने पर हाथ रखकर कुरसी पर निढाल हो गई। उसे उठाकर हम लोग पलंग पर ले गए। मैंने अमोनिया लेकर उसकी कनपटियों पर मला और उसके मुँह पर पानी छिड़का, किंतु वह बिल्कुल मरी सी निढाल पड़ी है। मुझे डर है, उसे कहीं दिल का दौरा न पड़ा हो। आप चलिए, उसके पिता की मौत भी दिल का दौरा पड़ने से हुई थी।’’


किरीलोव चुपचाप ऐसे सुनता रहा जैसे वह रूसी भाषा समझता ही न हो।


जब आगंतुक अबोगिन ने फिर पापचिंस्की और अपनी पत्नी के पिता का जिक्र किया और अँधेरे में दोबारा उसका हाथ ढूँढ़ना शुरू किया, तब उसने सिर उठाया और उदासीन भाव से हर शब्द पर बल देते हुए बोला, ‘‘मुझे खेद है कि मैं आपके घर नहीं जा सकूँगा। पाँच मिनट पहले मेरे बेटे की मौत हो गई है।’’


‘‘अरे नहीं!’’ पीछे हटते हुए अबोगिन फुसफुसाया, ‘‘हे भगवान्! मैं कैसे गलत मौके पर आया हूँ। कैसा अभागा दिन है यह। यह कितनी अजीब बात है। यह कैसा संयोग है। कौन सोच सकता था!’’


उसने दरवाजे का हत्था पकड़ लिया। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह डॉक्टर की मिन्नत करे या लौट जाए। फिर वह किरीलोव की बाँह पकड़कर बोला, ‘‘मैं आपकी हालत बखूबी समझता हूँ। भगवान् जानता है, ऐसे बुरे वक्त में आपको परेशान करने के लिए मैं शर्मिंदा हूँ। लेकिन मैं क्या करूँ, आप ही बताइए, मैं कहाँ जाऊँ? इस जगह आपके अलावा कोई डॉक्टर नहीं है। भगवान् के लिए आप मेरे साथ चलिए!’’


वहाँ चुप्पी छा गई। किरीलोव अबोगिन की ओर पीठ फेरकर एक मिनट तक चुपचाप खड़ा रहा। फिर वह धीरे-धीरे ड्योढ़ी से बैठक में चला गया। उसकी चाल यंत्रवत् और अनिश्चित थी। बैठक में अनजले लैंपशेड की झालर सीधी करने और मेज पर पड़ी एक मोटी किताब के पन्ने उलटने के उसके खोए-खोए अंदाज से लग रहा था कि उस समय उसका न कोई इरादा था, न उसकी कोई इच्छा थी और न ही वह कुछ सोच पा रहा था। वह शायद यह भी भूल गया था कि बाहर ड्योढ़ी में कोई अजनबी खड़ा है। कमरे के सन्नाटे और धुँधलके में उसकी विमूढ़ता और मुखर हो उठी थी। बैठक से कमरे की ओर बढ़ते हुए उसने अपना दाहिना पैर जरूरत से ज्यादा ऊँचा उठा लिया और फिर दरवाजे की चौखट ढूँढ़ने लगा। उसकी आकृति से एक तरह का भौंचक्कापन झलक रहा था, जैसे वह किसी अनजाने मकान में भटक आया हो। रोशनी की एक चौड़ी पट्टी कमरे की एक दीवार और किताबों की अलमारियों पर पड़ रही थी। वह रोशनी ईथर और कार्बोलिक की तीखी और भारी गंध के साथ सोनेवाले उस कमरे से आ रही थी, जिसका दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था। डॉक्टर मेज के पासवाली कुरसी में जा धँसा। थोड़ी देर तक वह रोशनी में पड़ी किताबों को उनींदा सा घूरता रहा, फिर उठकर सोनेवाले कमरे में चला गया।


कमरे में मौत का सा सन्नाटा था। यहाँ की हर छोटी चीज उस तूफान का सबूत दे रही थी, जो हाल में ही यहाँ से गुजरा था। यहाँ पूर्ण निस्तब्धता थी। बक्सों, बोतलों और मर्तबानों से भरी तिपाई पर एक मोमबत्ती जल रही थी और अलमारी पर एक बड़ा लैंप जल रहा था। ये दोनों पूरे कमरे को रोशन कर रहे थे। खिड़की के पास पड़े पलंग पर एक बच्चा लेटा था, जिसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर अचरज का भाव था। वह हिल-डुल नहीं रहा था, किंतु उसकी खुली आँखें हर पल काली पड़कर उसके माथे में ही गहरी धँसती जा रही थीं। उसकी माँ उसकी देह पर हाथ रखे, बिस्तर में मुँह छिपाए, पलंग के पास झुकी बैठी थी। वह पलंग से पूरी तरह चिपटी हुई थी।


डॉक्टर मातम में झुकी बैठी अपनी पत्नी की बगल में आ खड़ा हुआ। पतलून की जेबों में हाथ डालकर और अपना सिर एक ओर झुकाकर वह अपने बेटे की ओर ताकने लगा। उसका चेहरा भावहीन था। केवल उसकी दाढ़ी पर चमक रही बूँदें ही इस बात की गवाही दे रही थीं कि वह अभी रोया है।


कमरे की उदास निस्तब्धता में भी एक अजीब सौंदर्य था, जो केवल संगीत द्वारा ही अभिव्यक्त किया जा सकता है। किरीलोव और उनकी पत्नी चुप थे। वे रोए नहीं। इस बच्चे के गुजर जाने के साथ उनका संतान पाने का स्वप्न भी वैसे ही विदा हो चुका था जैसे अपने समय से उनका यौवन विदा हो गया था। डॉक्टर की उम्र चौवालीस साल थी। उसके बाल अभी से पक गए थे और वह बूढ़ा लगता था। उसकी मुरझाई हुई पत्नी पैंतीस वर्ष की थी। आंद्रेई उनकी एकमात्र संतान थी।


अपनी पत्नी के विपरीत, डॉक्टर एक ऐसा व्यक्ति था, जो मानसिक कष्ट के समय कुछ कर डालने की जरूरत महसूस करता था। कुछ मिनट अपनी पत्नी के पास खड़े रहने के बाद वह सोनेवाले कमरे से बाहर आ गया। अपना दाहिना पैर उसी तरह जरूरत से ज्यादा उठाते हुए वह एक छोटे कमरे में गया, जहाँ एक बड़ा सोफा पड़ा था। वहाँ से होता हुआ वह रसोई में गया। रसोई और अलावघर के पास टहलते हुए वह झुककर एक छोटे से दरवाजे में घुसा और ड्योढ़ी में निकल आया।


यहाँ उसका सामना गुलूबंद पहने और फीके चेहरेवाले उस व्यक्ति से दोबारा हो गया।


‘‘आखिर आप आ गए!’’ दरवाजे के हत्थे पर हाथ रखते हुए अबोगिन ने लंबी साँस लेकर कहा, ‘‘भगवान् के लिए चलिए।’’


डॉक्टर चौंक गया। उसने अबोगिन की ओर देखा और उसे याद आ गया, फिर जैसे इस दुनिया में लौटते हुए उसने कहा, ‘‘अजीब बात है!’’


अपने गुलूबंद पर हाथ रखकर मिन्नत भरी आवाज में अबोगिन बोला, ‘‘डॉक्टर साहब! मैं आपकी हालत अच्छी तरह समझ रहा हूँ। मैं पत्थर-दिल आदमी नहीं हूँ। मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है। पर मैं आपसे अपने लिए प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ। वहाँ मेरी पत्नी मर रही है। यदि आपने उसकी वह हृदय-विदारक चीख सुनी होती, उसका वह जर्द चेहरा देखा होता तो आप मेरे इस अनुनय-विनय को समझ सकते। हे ईश्वर! मुझे लगा कि आप कपड़े पहनने गए हैं। डॉक्टर साहब, समय बहुत कीमती है। मैं हाथ जोड़ता हूँ, आप मेरे साथ चलिए।’’


किंतु बैठक की ओर बढ़ते हुए डॉक्टर ने एक-एक शब्द पर बल देते हुए दोबारा कहा, ‘‘मैं आपके साथ नहीं जा सकता।’’


अबोगिन उसके पीछे-पीछे गया और उसने डॉक्टर की बाँह पकड़ ली, ‘‘मैं समझ रहा हूँ कि आप सचमुच बहुत दुःखी हैं। लेकिन मैं मामूली दाँत-दर्द के इलाज या किसी रोग के लक्षण पूछने मात्र के लिए तो आपसे चलने की जिद नहीं कर रहा!’’ वह याचना भरी आवाज में बोला, ‘‘मैं आपसे एक इनसान का जीवन बचाने के लिए कह रहा हूँ। यह जीवन व्यक्तिगत शोक के ऊपर है, डॉक्टर साहब। अब आप मेरे साथ चलिए। मानवता के नाम पर मैं आपसे बहादुरी दिखाने और धीरज रखने की प्रार्थना कर रहा हूँ।’’


‘‘मानवता! यह एक दुधारी तलवार है!’’ किरीलोव ने झुँझलाकर कहा। ‘‘इसी मानवता के नाम पर मैं आपसे कहता हूँ कि आप मुझे मत ले जाइए। यह सचमुच अजीब बात है। यहाँ मेरे लिए खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा है और आप हैं कि मुझे ‘मानवता’ शब्द से धमका रहे हैं। इस समय मैं कोई भी काम करने के काबिल नहीं हूँ। मैं किसी भी तरह आपके साथ चलने के लिए राजी नहीं। दूसरी बात, यहाँ और कोई नहीं है, जिसे मैं अपनी पत्नी के पास छोड़कर जा सकूँ। नहीं, नहीं।’’


किरीलोव एक कदम पीछे हट गया और और हाथ हिलाते हुए इनकार करने लगा, ‘‘आप मुझे जाने को न कहें!’’ फिर एकाएक वह घबराकर बोला, ‘‘मुझे क्षमा करें, आचरण-संहिता के तेरहवें खंड के मुताबिक मैं आपके साथ जाने को बाध्य हूँ। आपको हक है कि आप मेरे कोट का कॉलर पकड़कर मुझे घसीटकर ले जाएँ। अच्छी बात है। आप बेशक यही करें। लेकिन अभी मैं कोई भी काम करने के काबिल नहीं हूँ। मैं अभी बोल भी नहीं पा रहा, मुझे क्षमा करें।’’


‘‘डॉक्टर साहब, आप ऐसा न कहें।’’ उसकी बाँह न छोड़ते हुए अबोगिन ने कहा, ‘‘मुझे आपके तेरहवें खंड से क्या लेना-देना? आपकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ चलने के लिए आपको मजबूर करने का मुझे कोई अधिकार नहीं। अगर आप चलने को राजी हैं तो ठीक, अगर नहीं तो मजबूरी में मैं आपके दिल से विनती करता हूँ। एक युवती मर रही है। आप कहते हैं कि आप के बेटे की अभी-अभी मौत हुई है। ऐसी स्थिति में तो आपको मेरी तकलीफ औरों से ज्यादा समझनी चाहिए।’’


किरीलोव चुपचाप खड़ा रहा। उधर अबोगिन डॉक्टरी के महान् पेशे और उससे जुड़े त्याग और तपस्या आदि के बारे में बोलता रहा। आखिर डॉक्टर ने रुखाई से पूछा, ‘‘क्या ज्यादा दूर जाना होगा?’’


‘‘बस, तेरह-चौदह मील। मेरे घोड़े बहुत बढि़या हैं डॉक्टर साहब, कसम से, वे केवल एक घंटे में आपको वापस पहुँचा देंगे, बस घंटे भर में।’’


डॉक्टर पर डॉक्टरी के पेशे और मानवता के संबंध में कही गई बातों से ज्यादा असर इन आखिरी शब्दों का पड़ा। एक पल सोचने के बाद उसने उसाँस भरकर कहा, ‘‘ठीक है, चलो, चलें।’’


फिर वह तेजी से कमरे में घुसा। अब उसकी चाल स्थिर थी। पलभर बाद वह अपना डॉक्टरी पेशेवाला कोट पहनकर वापस लौट आया। अबोगिन छोटे-छोटे डग भरता हुआ उसके साथ चलने लगा और कोट ठीक से पहनने में उसकी मदद करने लगा। फिर दोनों साथ-साथ घर से बाहर निकल गए।


बाहर अँधेरा था, लेकिन उतना गहरा नहीं, जितना ड्योढ़ी में था।


‘‘आप यकीन मानिए, आपकी उदारता की कद्र करना मैं जानता हूँ।’’ गाड़ी में डॉक्टर को बैठाते हुए वह बोला, ‘‘लुका भाई, तुम जितनी तेजी से हाँक सकते हो, हाँको। भगवान् के लिए जल्दी करो!’’


कोचवान ने घोड़े सरपट दौड़ा दिए। पूरे रास्ते किरीलोव और अबोगिन चुप रहे। अबोगिन केवल एक बार गहरी साँस लेकर बुदबुदाया, ‘‘कैसी विकट और दारुण परिस्थिति है। जो अपने करीबी हैं, उन पर इतना प्रेम कभी नहीं उमड़ता, जितना तब, जब उन्हें खो देने का डर पैदा हो जाता है!’’


जब नदी पार करने के लिए गाड़ी धीमी हुई, किरीलोव एकाएक चौंक पड़ा। लगा जैसे पानी के छप-छप की आवाज सुनकर वह दूर कहीं से वापस आ गया हो। वह अपनी जगह हिलने-डुलने लगा। फिर वह उदास स्वर में बोला, ‘‘देखो, मुझे जाने दो। मैं बाद में आ जाऊँगा। मैं केवल अपने सहायक को अपनी पत्नी के पास भेजना चाहता हूँ। वह इस समय बिल्कुल अकेली रह गई है।’’


दूसरी ओर, गाड़ी जैसे-जैसे अपने मुकाम पर पहुँच रही थी, अबोगिन और अधिक धैर्यहीन होता जा रहा था। कभी वह उठ जाता, कभी बैठता, कभी चौंककर उछल पड़ता तो कभी कोचवान के कंधे के ऊपर से आगे ताकता। अंत में गाड़ी जब धारीदार किरमिच के परदे से सजे ओसारे में जाकर रुकी, उसने जल्दी और जोर से साँस लेते हुए दूसरी मंजिल की खिड़कियों की ओर देखा, जिनसे रोशनी आ रही थी।


‘‘यदि कुछ हो गया तो मैं सह नहीं पाऊँगा।’’ अबोगिन ने डॉक्टर के साथ ड्योढ़ी की ओर बढ़ते हुए घबराहट में हाथ मलते हुए कहा। ‘‘लेकिन परेशानी वाली कोई आवाज नहीं आ रही, इसलिए अब तक सब ठीक ही होगा।’’ सन्नाटे में कुछ सुन पाने के लिए कान लगाए हुए वह बोला।


ड्योढ़ी में भी बोलने की कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ रही थी और समूचा घर तेज रोशनी के बावजूद सोया हुआ सा लग रहा था।


सीढि़याँ चढ़ते हुए उसने कहा, ‘‘न तो कोई आवाज आ रही है, न ही कोई दिखाई पड़ रहा है। कहीं कोई हलचल भी नहीं है। भगवान् करे...!’’


वे दोनों ड्योढ़ी से होते हुए हॉल में पहुँचे, जहाँ एक काला पियानो रखा हुआ था और छत से फानूस लटक रहा था। यहाँ से अबोगिन डॉक्टर को एक छोटे दीवानखाने में ले गया, जो आरामदेह और आकर्षक ढंग से सजा हुआ था और जिसमें गुलाबी कांति सी झिलमिला रही थी।


‘‘डॉक्टर साहब, आप यहाँ बैठें और इंतजार करें।’’ अबोगिन ने कहा, ‘‘मैं अभी आता हूँ। जरा जाकर देख लूँ और बता दूँ कि आप आ गए हैं।’’


चारों ओर शांति थी। दूर, किसी कमरे की बैठक में किसी ने आह भरी, किसी अलमारी का शीशे का दरवाजा झनझनाया और फिर सन्नाटा छा गया। लगभग पाँच मिनट के बाद किरीलोव ने हाथों की ओर निहारना छोड़कर उस द्वार की ओर देखा, जिससे अबोगिन भीतर गया था।


अबोगिन दरवाजे के पास खड़ा था, पर वह अब वह अबोगिन नहीं लग रहा था, जो कमरे के भीतर गया था। उसके चेहरे पर स्याह परछाइयाँ तैर रही थीं। अब उसकी छवि पहले जैसी साफ नहीं लग रही थी। उसके चेहरे पर विरक्ति के भाव सा कुछ आ गया था। पता नहीं, वह डर था या शारीरिक कष्ट। उसकी नाक, मूँछें और उसका सारा चेहरा फड़क रहा था, जैसे ये सारी चीजें उसके चेहरे से फूटकर अलग निकल पड़ना चाहती हों। उसकी आँखों में पीड़ा भरी हुई थी और वह मानसिक रूप से उद्वेलित लग रहा था।


लंबे और भारी डग भरता हुआ वह दीवानखाने के बीच आ खड़ा हुआ। फिर वह आगे बढ़कर मुट्ठियाँ बाँधते हुए कराहने लगा।


‘‘वह मुझे दगा दे गई, डॉक्टर।’’ फिर ‘दगा’ पर बल देते हुए वह चीखा, ‘‘मुझे छोड़ गई वह। दगा दे गई। यह सब झूठ क्यों? हे ईश्वर, यह घटिया फरेब भरी चालबाजी क्यों? यह शैतानियत भरा धोखे का जाल क्यों? मैंने उसका क्या बिगाड़ा था? आखिर वह मुझे क्यों छोड़ गई?’’


डॉक्टर के उदासीन चेहरे पर जिज्ञासा की झलक उभर आई। वह उठ खड़ा हुआ और उसने अबोगिन से पूछा, ‘‘पर मरीज कहाँ है?’’


‘‘मरीज! मरीज!’’ हँसता-रोता और मुट्ठियाँ हिलाता हुआ अबोगिन चिल्लाया, ‘‘वह मरीज नहीं, पापिन है! इतना कमीनापन! इतना ओछापन! शैतान भी ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करता। उसने मुझे यहाँ से भेज दिया। क्यों? ताकि वह उस दलाल, उस भाँड़ के साथ भाग जाए! हे ईश्वर! इससे तो अच्छा था, वह मर जाती। यह बेवफाई मैं नहीं सह सकूँगा, बिल्कुल नहीं।’’


यह सुनते ही डॉक्टर तनकर खड़ा हो गया। उसने आँसुओं से भरी अपनी आँखें झपकाईं। उसकी नुकीली दाढ़ी भी जबड़ों के साथ-साथ दाएँ-बाएँ हिल रही थी। वह भौंचक्का होकर बोला, ‘‘क्षमा करें, इसका क्या मतलब है? मेरा बच्चा कुछ देर पहले मर गया है। मेरी पत्नी मातम में है और शोक से मरी जा रही है। इस समय वह घर में अकेली है। मैं खुद भी बड़ी मुश्किल से खड़ा हो पा रहा हूँ। तीन रातों से मैं सोया नहीं हूँ और मुझे क्या ऐसी भद्दी नौटंकी में शामिल होने के लिए यहाँ बुलाया गया हूँ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।’’


अबोगिन ने एक मुट्ठी खोली और एक मुड़ा-तुड़ा सा पुरजा फर्श पर डालकर उसे कुचल दिया, मानो वह कोई कीड़ा हो, जिसे वह नष्ट कर डालना चाहता था। अपने चेहरे के सामने मुट्ठी हिलाते हुए दाँत भींचकर वह बोला, ‘‘और मैंने कुछ समझा ही नहीं, कुछ ध्यान ही नहीं दिया। वह रोज मेरे यहाँ आता था, इस बात पर गौर नहीं किया। यह भी नहीं सोचा कि आज वह मेरे घर बग्घी में आया था। बग्घी में क्यों? मैं अंधा और मूर्ख था, जिसने इसके बारे में सोचा ही नहीं, अंधा और मूर्ख।’’ उसके चेहरे से लग रहा था जैसे किसी ने उसके पैरों को कुचल दिया हो।


डॉक्टर फिर बड़बड़ाया, ‘‘मैं, मेरी समझ में नहीं आता कि इस सबका मतलब क्या है? यह तो किसी इनसान की बेइज्जती करना हुआ, इनसान के दुख और वेदना का उपहास करना हुआ। यह बिल्कुल नामुमकिन बात है, यह भद्दा मजाक है। मैंने अपनी जिंदगी में ऐसी बात कभी नहीं सुनी।’’


उस व्यक्ति की तरह, जो अब समझ गया है कि उसका घोर अपमान किया गया है, डॉक्टर ने अपने कंधे उचकाए और बेबसी में हाथ फैला दिए। बोलने या कुछ भी कर सकने में असमर्थ, वह फिर आरामकुरसी में धँस गया।


‘‘तो तुम अब मुझ से प्रेम नहीं करतीं, किसी दूसरे से प्यार करती हो। ठीक है, पर यह धोखा क्यों, यह ओछी दगाबाजी क्यों?’’ अबोगिन रोवाँसे स्वर में बोला, ‘‘इससे किसका भला होगा? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? तुमने यह घटिया हरकत क्यों की, डॉक्टर!’’ वह आवेग में चिल्लाता हुआ किरीलोव के पास पहुँच गया, ‘‘आप अनजाने में मेरे दुर्भाग्य के गवाह बन गए हैं और मैं आप से सच्ची बात नहीं छिपाऊँगा। मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैं उस औरत से मोहब्बत करता था। मैं उसका गुलाम था। मैं उसकी पूजा करता था। मैंने उसके लिए हर चीज कुरबान कर दी। अपने संबंधियों से झगड़ा किया। नौकरी छोड़ दी। संगीत का अपना शौक छोड़ दिया। उन बातों के लिए उसे माफ कर दिया, जिनके लिए मैं अपनी बहन या माँ को कभी माफ नहीं करता। मैंने उसे कभी कड़ी निगाह से नहीं देखा। मैंने उसे कभी बुरा मानने का जरा सा भी मौका नहीं दिया। यह सब झूठ और फरेब है, क्यों? अगर तुम मुझे प्यार नहीं करती थीं तो वह साफ-साफ कह क्यों नहीं दिया...इन सब मामलों में तुम मेरी राय जानती थीं!’’


काँपते हुए, आँखों में आँसू भरे अबोगिन ने अपना दिल डॉक्टर के सामने खोलकर रख दिया। वह भावोद्रेक में बोल रहा था। सीने से हाथ लगाए हुए, बिना किसी झिझक के वह गोपनीय घरेलू बातें बता रहा था। असल में, एक तरह से आश्वस्त सा होता हुआ कि आखिरकार ये गोपनीय बातें अब खुल गईं। यदि इसी तरह वह घंटे भर और बोल लेता, अपने दिल की बात कह लेता, गुबार निकाल लेता तो यकीनन वह स्वस्थ महसूस करने लगता। कौन जाने, यदि डॉक्टर दोस्ताना हमदर्दी से उसकी बात सुन लेता, शायद जैसा कि अकसर होता है, वह ना-नुकुर किए बिना और अनावश्यक गलतियाँ किए बिना ही अपनी किस्मत से संतुष्ट हो जाता, लेकिन हुआ कुछ और ही।


उधर अबोगिन बोलता जा रहा था, इधर अपमानित डॉक्टर के चेहरे पर एक बदलाव सा होता दिखाई दे रहा था। उसके चेहरे पर जो स्तब्धता और उदासीनता का भाव था, वह मिट गया और उसकी जगह क्रोध और अपमान ने ले ली। उसका चेहरा और भी हठपूर्ण और कठोर हो गया। ऐसी हालत में अबोगिन ने उसे धार्मिक पादरियों जैसे भावशून्य और रूखे चेहरेवाली एक सुंदर नवयुवती की फोटो दिखाते हुए पूछा कि क्या कोई यकीन कर सकता है कि ऐसे चेहरेवाली स्त्री झूठ बोल सकती है, छल कर सकती है?


डॉक्टर अबोगिन के पास से पीछे हट गया और भौंचक्का होकर उसे देखने लगा।


‘‘आप मुझे यहाँ लाए ही क्यों?’’ डॉक्टर बोला। उसकी दाढ़ी हिल रही थी, ‘‘आपने शादी की, क्योंकि आपके पास इससे अच्छा और कोई काम नहीं था और इसलिए आप अपना यह घटिया नाटक मनमाने ढंग से खेलते रहे, पर मुझे इससे क्या लेना-देना? मेरा आपके इस प्यार-मोहब्बत से क्या सरोकार? मुझे तो चैन से जीने दीजिए। आप अपनी मुक्केबाजी कीजिए, अपने मानवतावादी विचार बघारिए, वायलिन बजाइए, मुरगे की तरह मोटे होते जाइए, पर किसी को जलील मत कीजिए। यदि आप उनका सम्मान नहीं कर सकते तो कृपा करके उनसे अलग ही रहिए।’’


अबोगिन का चेहरा लाल हो गया। उसने पूछा, ‘‘इसका मतलब क्या है?’’


‘‘इसका मतलब यह है कि लोगों के साथ यह कमीना और कुत्सित खिलवाड़ है। मैं डॉक्टर हूँ। आप डॉक्टरों को, बल्कि हर ऐसा काम करनेवाले को, जिसमें से इत्र और वेश्यावृत्ति की गंध नहीं आती, नौकर और अर्दली किस्म का आदमी समझते हैं। आप जरूर समझिए। लेकिन दुःखी व्यक्ति की भावनाओं से खिलवाड़ करने का, उसे नाटक की सामग्री समझने का आपको कोई हक नहीं।’’


अबोगिन का चेहरा गुस्से से फड़क रहा था। उसने ललकारकर पूछा, ‘‘मुझसे ऐसी बात करने की आपकी हिम्मत कैसे हुई?’’


मेज पर घूँसा मारते हुए डॉक्टर चिल्लाया, ‘‘मेरा दुःख जानते हुए भी अपनी अनाप-शनाप बातें सुनाने के लिए मुझे यहाँ लाने की हिम्मत आपको कैसे हुई? दूसरे के दुःख का मखौल करने का हक आपको किसने दिया?’’


अबोगिन चिल्लाया, ‘‘आप जरूर पागल हैं। कितने बेरहम हैं आप। मैं खुद कितना दुःखी हूँ और...और...!’’


घृणा से मुसकराकर डॉक्टर ने कहा, ‘‘दुःखी! आप इस शब्द का इस्तेमाल मत कीजिए। इसका आपसे कोई वास्ता नहीं। जो आवारा-निकम्मे कर्ज नहीं ले पाते, वे भी अपने को दुखी कहते हैं। मोटापे से परेशान मुरगा भी दुःखी होता है। घटिया आदमी!’’


गुस्से से पिनपिनाते हुए अबोगिन ने कहा, ‘‘जनाब, आप अपनी औकात भूल रहे हैं! ऐसी बातों का जवाब लातों से दिया जाता है!’’


अबोगिन ने जल्दी से अंदर की जेब टटोलकर उसमें से नोटों की एक गड्डी निकाली और उसमें से दो नोट निकालकर मेज पर पटक दिए। नथुने फड़काते हुए उसने हिकारत से कहा, ‘‘यह रही आपकी फीस। आपके दाम अदा हो गए।’’


नोटों को जमीन पर फेंकते हुए डॉक्टर चिल्लाया, ‘‘रुपए देने की गुस्ताखी मत कीजिए। यह अपमान इससे नहीं धुल सकता।’’


अबोगिन और डॉक्टर एक-दूसरे को अपमानजनक और भद्दी-भद्दी बातें कहने लगे। उन दोनों ने जीवन भर शायद सन्निपात में भी कभी इतनी अनुचित, बेरहम और बेहूदी बातें नहीं कही थीं। दोनों में जैसे वेदनाजन्य अहं जाग गया था। जो दुःखी होते हैं, उनका अहं बहुत बढ़ जाता है। वे क्रोधी, नृशंस और अन्यायी हो जाते हैं। वे एक-दूसरे को समझने में मूर्खों से भी ज्यादा असमर्थ होते हैं। दुर्भाग्य लोगों को मिलाने की जगह अलग करता है। प्रायः यह समझा जाता है कि एक ही तरह का दुःख पड़ने पर लोग एक-दूसरे के नजदीक आ जाते होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे लोग अपेक्षाकृत संतुष्ट लोगों से बहुत ज्यादा नृशंस और अन्यायी साबित होते हैं।


डॉक्टर चिल्लाया, ‘‘मेहरबानी करके मुझे मेरे घर पहुँचा दीजिए।’’ गुस्से से उसका दम फूल रहा था।


अबोगिन ने जोर से घंटी बजाई। जब उसकी पुकार पर भी कोई नहीं आया तो गुस्से में उसने घंटी फर्श पर फेंक दी। कालीन पर एक हल्की, खोखली आह सी भरती हुई घंटी खामोश हो गई।


तब एक नौकर आया।


घूँसा ताने अबोगिन जोर से चीखा, ‘‘कहाँ मर गया था तू? बेड़ा गर्क हो तेरा ! तू अभी था कहाँ? जा इस आदमी के लिए गाड़ी लाने को कह और मेरे लिए बग्घी निकलवा!’’ जैसे ही नौकर जाने के लिए मुड़ा, अबोगिन फिर चिल्लाया, ‘‘ठहर! कल से इस घर में एक भी गद्दार, दगाबाज नहीं रहेगा। सब निकल जाएँ, दफा हो जाएँ यहाँ से। मैं नए नौकर रख लूँगा। बेईमान कहीं के!’’


गा‌ड़ियों के लिए प्रतीक्षा करते समय डॉक्टर और अबोगिन खामोश रहे। नाजुक सुरुचि का भाव अबोगिन के चेहरे पर फिर लौट आया था। बड़े सभ्य तरीके से वह अपना सिर हिलाता हुआ, कुछ योजना सी बनाता हुआ कमरे में टहलता रहा। उसका गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था, पर वह ऐसा जाहिर करने का प्रयास कर रहा था, जैसे कमरे में शत्रु की मौजूदगी की ओर उसका ध्यान भी न गया हो। उधर डॉक्टर एक हाथ से मेज पकड़े हुए स्थिर खड़ा अबोगिन की ओर हिकारत से देख रहा था, गोया वह उसका शत्रु हो।


कुछ देर बाद जब डॉक्टर गाड़ी में बैठा अपने घर जा रहा था, उसकी आँखों में तब भी वही घृणा भाव कायम था। घंटे भर पहले जितना अँधेरा था, अब वह ज्यादा बढ़ गया था। दूज का लाल चाँद पहाड़ी के पीछे छिप गया था और उसकी रखवाली करनेवाले बादल सितारों के आस-पास काले धब्बों की तरह पडे़ थे। पीछे से सड़क पर पहियों की आवाज सुनाई दी और बग्घी की लाल रंग की लालटेनों की चमक डॉक्टर की गाड़ी के आगे आ गई। वह अबोगिन था। जो प्रतिवाद करने, झगड़ा करने पर उतारू था।


पूरे रास्ते डॉक्टर अपनी शोकाकुल पत्नी या अपने मृत पुत्र आंद्रेई के बारे में नहीं बल्कि अबोगिन और उस घर में रहनेवालों के बारे में सोचता रहा, जिसे वह अभी छोड़कर आया था। उसके विचार नृशंस और अन्यायपूर्ण थे। उसने मन-ही-मन अबोगिन, उसकी बीवी, पापचिंस्की और सुगंधित गुलाबी उषा में रहनेवाले सभी लोगों पर क्षोभ प्रकट किया और रास्ते भर बराबर इन लोगों के लिए नफरत और हिकारत की बातें सोचता रहा। यहाँ तक कि उसके दिल में दर्द होने लगा और ऐसे लोगों के प्रति ऐसा ही दृष्टिकोण उसके जहन में स्थिर हो गया।


वक्त गुजरेगा और किरीलोव का दुःख भी गुजर जाएगा। किंतु यह अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण डॉक्टर के साथ हमेशा रहेगा—जीवनभर, उसकी मृत्यु के दिन तक।


(अनुवाद : सुशांत सुप्रिय)

Thursday, 22 September 2022

तमिल भाषा लेखक अशोकमित्रन का जन्‍मदिन आज , पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी 'सुंदर'


 आज 22 सितंबर 1931 को जन्‍मे थे तमिल भाषा के लेखक व उपन्यासकार अशोकमित्रन। उनका निधन 23 मार्च, 2017 को हुआ था। अशोकमित्रन का मूल नाम जगदीस त्यागराजन था। 

उनकी कृति में 200 लघु कथाएं, 8 उपन्यास, 15 अन्य लंबी कथाएं शामिल हैं। उनकी बहुत-सी लघु कथाएं अँग्रेजी, हिंदी, मलयालम, तेलगू और अन्य भाषाओं में अनुवादित की गई है। उन्हें वर्ष 1996 में उनके लघु कथाओं के संग्रह अप्पाविन सिनेहिदर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (तमिल) से सम्मानित किया गया था।

वर्ष 1931 में सिकंदराबाद में जन्में अशोकमित्रन वर्ष 1952 में चेन्नई चले गए थे। जिसके बाद वे तमिल साहित्य के एक प्रभावशाली साहित्यकार के रूप में उभरे। वे संक्षिप्त और सूक्ष्म हास्य के लिए जाने जाते थे। उन्होंने 1960 के दशक में अपना साहित्यिक नाम अशोकमित्रन ग्रहण किया था। वर्ष 2014 में तमिलनाडू की निवर्तमान मुख्यमंत्री जयललिता ने तमिल साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हे 'तिरु वी का' पुरस्कार प्रदान किया था।

उनको 1992 में 'दिल्ली मेमोरियल अवार्ड' भी मिला। उनकी रचनाओं को 'के.के. बिरला पुरस्कार' मिला। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उन्हें फेलोशिप भी दी गई। 1966 से 1989 तक कुछ समय के लिए 'कलैआडी' पत्रिका के संपादक भी रहे। उनके उपन्यासों में 'अप्पाविन स्नेगदी', 'तन्नीर' एवं 'मानसरोवर' बहुचर्चित रहा। 'तन्नीर' का अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है।।

 

पढ़िए उनकी कहानी- 'सुंदर'

हमने ठान लिया था कि जैसे भी हो, एक गाय खरीदकर ही चैन लेंगे। भैंसों को पल्ले बाँधकर रोने से तो बेहतर है कि पिछवाड़े एक गाय ही बाँध ली जाए। घर में लक्ष्मी आ जाएगी।

भैंसों को हमने आदर-सत्कार सहित बुलावा नहीं दिया था। एक बार हुआ यह कि किसी कारण से एक भैंस हमारे घर आ टपकी। हमने तो सोचा था कि वह कुछ दिनों की मेहमान होगी, परंतु वह स्थायी रूप से बस गई। जब उसमें दूध-उत्पादेयता की क्षमता सर्द हो गई, तब हमने दूध प्राप्ति हेतु एक और भैंस खरीद ली। दोनों जब एक ही साथ सर्द पड़ गई तो तीसरी आ गई।

हम जहाँ रहते थे, वहाँ साधारणतया कामकाज के लिए नौकर-चाकरों का मिलना अत्यंत कठिन था। हमारे घर के लोग ही बारी-बारी से रोज गोबर इकट्ठा करते थे। पाँच-छह दिनों में एक बार गोबर के उपले बनाते। गोबर को कोयले के चूरे के साथ मिलाकर गोले बनाकर सुखाते। इसकी उपलब्धि यह हुई कि हम अच्छी-खासी गरमी में भी गरम पानी से ही नहाते।

पिछवाड़े के एक कोने में गोबर का एक पहाड़ सा सदा रहता। दूसरे कोने में उपलों और गोलों का ढेर रहता। इन दो पहाड़ों के बीचोबीच इनकी कारणकर्ता भैंसें जुगाली करती हुई विराजमान रहतीं। शायद इन भैंसों का आपस में कोई गूढ़ समझौता हुआ होगा। किसी भी वक्त दो को दोहने की आवश्यकता ही नहीं रहती। ऐसे भी महीने थे, जब तीनों में से एक ने भी एक बूंद दूध नहीं दिया था।

अच्छे वक्त का अंत तो आता ही है, साथ ही कभी-कभी बुरे वक्त का भी। एक भैंस मर गई। दूसरी खो गई। तीसरी का बच्चा होनेवाला था। चार–पाँच महीनों बाद मेरी बड़ी बहन नन्हे से बच्चे के साथ कुछ महीने हमारे साथ रहनेवाली थी। ऐसे समय में दूधवाले की कृपा पर आश्रित होने की बजाय एक गाय ही क्यों न खरीद लें? वैसे भी पिछवाड़े में दो गाय को बाँधने के लिए जगह तो है ही।

यह खबर गाँव भर में फैल गई कि हम गाय खरीदनेवाले हैं। इस विषय में उन्हीं लोगों ने खूब दिलचस्पी दिखाई, जिनका गाय से कोई लेना-देना नहीं था। उनकी नोंक-झोंक से इतना खीज गए कि सोचा गाय न खरीदें, दूसरी ओर यह भी निश्चय हुआ कि इनके लिए ही सही, एक गाय घर में अवश्य लाएँगे।

हम भी लगभग पंद्रह गायों को देख चुके थे। पहली बार गर्भिणी हुई गाय से लेकर आठ बार जन्मदात्री की शोभा से मंडित एवं वृद्धा गाय तक। पहले मैं और पिताजी गाय को देख जाते और गाय के रंग, सींग, पूँछ की लंबाई आदि बुनियादी मुद्दों का भी माँ को भिन्न-भिन्न विवरण देते। माँ को पिताजी के सामर्थ्य पर शंका थी, अतः कभी हम तीनों गाय देखने जाते। हमारे पहुँचने तक गाय को दुहा जा चुका होता। वह कितना दूध देती है, उसे कैसा दुहा जाता है, यह देखने के लिए हम दुबारा जाते। एक-दो लोगों ने तो इतना कहा भी कि हम गाय को अपने पास दो दिन रखने के पश्चात ही निर्णय लें। एक ने यहाँ तक कहा, आधे पैसे अब दीजिए, आधे अगले महीने दे दीजिए। इन सभी को छोड़कर हम बाजार के पास वाले मारवाड़ी के घर से फौरन पूरे पैसे देकर एक गाय खरीद लाए।

जाने क्या-क्या कारणों के लिए गाय को तीन-चार बार देख–जाँच लेने के बाद नकारनेवाले हम इस मारवाड़ी के मामले में पाँच ही मिनटों में राजी हो गए। कारण यह था-बाजार के पास बाजार से भी बड़ी सब्जीमंडी थी। जिसमें जान-पहचानवाले एक सब्जीवाले ने माँ-पिताजी को बताया कि पास ही एक गाय बिक्री के लिए है और तुंरत दोनों को वहाँ ले भी गया। उसी वक्त गाय को दुहा जा रहा था। फेन सहित दूध बालटी भर दुहा गया। हमारी भैंसों ने भी कभी इतना दूध नहीं दिया था। माँ-पिताजी दोनों ने हामी भरी और एक रुपए का अग्रिम दे आए। दूसरे दिन 299 रुपए देकर गाय को घर लाया गया। साथ ही एक माह का बछड़ा भी।

गाय के आते ही माँ ने उसकी कर्पूर आरती उतारी, उसे कुंकुम का टीका लगाया और उसे 'लक्ष्मी' के नाम से संबोधित किया।

'लक्ष्मी...क्यों...?' मैंने पूछा।

'गाय का नाम' माँ ने कहा।

'सुंदर...?'

'हाँ माँ...उन्होंने वैसे ही तो बुलाया था।'

'कैसा नाम है? सुंदर...?'

'हाँ, माँ...। तुमने ध्यान नहीं दिया? सुंदर...सुंदर कहते हुए ही तो वह औरत उसकी पीठ पर हाथ फेर रही थी।'

'देखो, मैं बुलाता हूँ...सुंदर। गाय ने मुड़कर देखा।'

'देखा, इस गाय का नाम सुंदर ही है।'

'सुंदर तो पुल्लिंग है?'

'हो सकता है कि यह पुरुष-गाय हो?'

'छिह-छिह। ज्यादा बुद्धिमानी मत दिखाओ।'

हमारे मन को क्लेश का कारण केवल यह नहीं था कि गाय का नाम 'सुंदर' था। उसके थन पूरी तरह से काले थे। श्याम–थन गायों का दूध मंदिर के अलावा और कहीं भी उपयुक्त नहीं होना चाहिए। ऐसा हमारे घरों में कहा जाता है। मुझे इन बातों की खास जानकारी नहीं थी।

श्याम–थनवाली गाय भी तो गाय ही है। इसलिए यह तय किया गया कि महीने में एक बार दूध को मंदिर में अभिषेक के लिए दे दिया जाए।

गाय को अपने नए नामकरण की आदत पड़ जाए। इस कारण हम अकसर पिछवाड़े में जाकर 'लक्ष्मी...लक्ष्मी' कहकर पुकारने लगे। गाय ने इसकी कोई परवाह ही नहीं की। साथ ही वह बेचैनी से इधर-उधर हिलती-डुलती रही। शाम हुई। गाय को पहली बार हम दुहनेवाले थे। जब भैंस दूध दिया करती थी, तब एक आदमी दूध दुहने आया करता था। उसे सूचना देने के बावजूद वह नहीं आया। आखिरकार पीतल के बड़े मुँह के लोटे को लेकर माँ गाय के पास गई।

मैंने बछड़े की रस्सी खोल दी। वह माँ के थन से मुँह लगाकर चूसने लगा। गाय के थन रिसने लगे। मैंने बछड़े को फिर से बाँध दिया। गाय के पास बैठकर माँ ने उसके थन को छुआ। गाय ने लात मारी।

मैंने बछडे को एक कोने में बाँध दिया और गाय की पिछली टाँगों को बाँधने के लिए रस्सी हुँढने लगा। भैंसों को दुहते समय उनकी पिछली टाँगों को बाँधने की कभी नौबत न आई थी। अगर वे दूध नहीं देना चाहतीं तो परे हट जातीं। मगर टाँग उठाकर उन्होंने कभी नहीं मारा।

जैसे-तैसे एक रस्सी को ढूँढ़ निकाला और गाय की पिछली टाँगों को बाँध देने के बाद मैंने और माँ ने बारी-बारी से उसे दुहा। वह माँ को भी पास आने नहीं दे रही थी। माँ ने इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया कि उसका नाम लक्ष्मी है। उसके मुँह और पीठ पर थपथपा दिया। सबकुछ करने के बाद भी पाव भर भी दूध नहीं मिला। अगले दिन सुबह की भी वही कहानी थी। उस शाम की स्थिति बदतर थी। गाय ने दूध दिया ही नहीं।

गाय सींग मारनेवाली थी। साथ ही एक बात भी उजागर हुई। गाय को हमारे घर आए लगभग 36 घंटे बीत चुके थे। वह बैठी तक नहीं, खड़ी ही रही। हमने उसके खाने के लिए भूसी और खली रखी थी, उन्हें खाने में भी उसने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब दूसरे दिन भी उसने हमें पास फटकने नहीं दिया तो मैं उस मारवाड़ी के घर गया। उस गली में सबके सब मारवाड़ी परिवार ही थे। जैन धर्मावलंबी होने के कारण सूर्यास्त से पूर्व भोजन समाप्त कर बत्ती बुझा चुके थे। बुजुर्गों ने मुँह पर कपड़ा बाँध रखा था। गाय के विक्रेता के घर तक पहुँचने के लिए मुझे चार-पाँच घरों के आँगन में बँधी हुई गायों को खतरनाक ढंग से पार करके आना पड़ा। अपने विक्रेता के घर को पहचानने से पहले मैं एक बार अपना पैर गोबर के ढेर में घुसेड़ चुका था। एक स्त्री बाहर खड़ी थी, उससे मैंने कहा, 'आपकी गाय दूध नहीं देती।'

'उसे चारा दिया?' उस स्त्री के मुँह पर बँधा परदा उसके बोलने से फड़फड़ाने लगा।

'वह कुछ भी नहीं खाती, बस लात मारती रहती है।' वह घर के अंदर गई और ऊँची आवाज में ताबड़तोड़ बरसने लगी। फिर उसने आस-पड़ोस सबको यह कहा, 'सुंदर को ये लोग भूखा मार रहे हैं।' इसी तरह की बातें वह किए जा रही थी। सभी ने मुझे घेर लिया और मुझ पर प्रश्नों की बौछार करने लगे। 'क्या आप पत्थर दिल हैं? आप क्या गाय को मार डालेंगे? गाय को भूखा मारोगे तो कोटि जन्म नरक में उलटे लटका में भूने जाओगे।'

वह स्त्री मेरे साथ चल पड़ी। रास्ते में भी आते-आते लोगों से अपनी भाषा में यह कहती हुई आई कि मैं उसकी गाय को भूखा मार रहा हूँ। मुझे ताज्जुब हुआ कि वह स्त्री कैसे एक ही बात को घंटों दोहराए जा रही

हम घर पहुँचे। गाय ने उसे देखकर उछल-कूद करना शुरू कर दिया। जोर से रँभाई, पूँछ उठाकर मूत्र त्यागा, ऐसे साँस लिया, मानो पूरे विश्व को हिला देगी। वह मारवाड़ी स्त्री 'सुंदर!' कहकर पुकारती हुई उससे लिपट गई। अपने मुँह पर लगे श्वेत आवरण को हटाकर उसने गाय को चूमा। गाय के कान के पास पिस्कू पकड़कर जमीन पर फेंक उसे पैर से कुचल डाला। 'सुंदर मेरे सुंदर' कह-कहकर देर तक गाय को दुलारती–पुचकारती रही। इस दृश्य को देखकर मैं रुआँसा हो उठा। मेरे भाई-बहन तो रो ही पड़े।

केवल मेरी माँ अविचलित थी। एकाएक अनपेक्षित रूप से वह चिल्लाने लगी। 'कया सोचकर तुमने ऐसी गाय हमारे मत्थे मढ़ दी? पैसे गिनकर रखो और ले जाओ अपनी गाय।'

'गाय को अगर चारा नहीं दोगे तो वह दूध कैसे देगी? गाय को भूखा मारोगे तो कोटि जन्म उलटे भूने जा बदले में वह भी चिल्लाई।

हमारी माँ में भी इतना सामर्थ्य है, यह हममें से कोई नहीं जानता था। सवा घंटा बरसने के बाद वह मारवाड़ी स्त्री भी शांत हो गई। 'एक बरतन दो।' उसने सहज भाव से कहा।

उसने गाय की पिछली टाँगों को बाँधे बिना, बछड़े को एक बूंद दूध पिलाया और गाय को दुहा। एक बड़ा लोटा भर दुहने के बाद उसने दूसरा बरतन लिया और उसमें भी दूध दुहा। अब हमारी माँ नहीं चिल्लाई। उस रात सोने से पहले हम सभी ने दूध पिया।

रात के वक्त हमारे घर के पिछवाडे कोई भी बिना बत्ती के नहीं जा सकता। कारण यह था कि रसोई से बाहर आने पर आठ-दस सीढ़ियाँ थीं, जिन्हें उतरने के बाद ही समतल भूमि पर आया जा सकता था। मगर आँगन में केवल दो ही सीढ़ियाँ थीं। घर बनाते समय जमीन में जो भी ऊँच-नीच थी उसे बिना समतल किए बनाई गई थीं। पिछवाड़े में गोशाला के चारों ओर एक ऊँची दीवार थी। रात के वक्त सोने से पहले हममें से कोई एक इस पिछवाड़े के दरवाजे पर एक बड़ा सा ताला लगाकर आ जाता था। उस दिन रात को मैं ही लालटेन लेकर उस दरवाजे को ताला लगाकर आया। गाय हमारे घर में पहली बार बैठी हुई थी। यही नहीं, वह जुगाली भी कर रही थी। मुझे लगा कि आखिरकार वह हमारी पारिवारिक व्यवस्था के साथ घुल-मिल गई है। उसे मैंने 'सुंदर' कहकर पुकारा और उसके माथे को सहलाया।

सुबह माँ की चीख-पुकार सुन सभी उठ बैठे। सुंदर ने रात को ही रस्सी तोड़ ली होगी। जैसे ही माँ ने रसोई के पिछवाड़ेवाला दरवाजा खोला, एक ही छलाँग में सुंदर आठ-दस सीढ़ियाँ लाँघकर रसोई में घुस गई थी। माँ डर गई थी और चीखने-पुकारने लगी थीं। पिताजी ने आँगन के बाहर वाला दरवाजा खोला, यह सोचकर कि शायद कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो गाय को सँभाल सके। ज्यों ही बाहर का दरवाजा खला, सुंदर बाहर की ओर लपकी। जब तक हम यह सोच ही रहे थे कि हमें अब क्या करना चाहिए, तब तक सुंदर बाजार की ओर दौड़ती हुई हमारी आँखों से ओझल हो चुकी थी। माँ ने उस मारवाड़ी स्त्री को कोसा। गाय को कोसा। सब्जीवाले को कोसा। चूँकि मैंने दौड़ती हुई गाय को लाठी मारकर घर की ओर नहीं भगाया, इसलिए मुझे भी कोसा। आधे घंटे बाद मैं बरतन समेत बछड़े को लेकर मारवाड़ी स्त्री के घर की ओर निकल पड़ा।

उस स्त्री ने मुझे देखते ही जोर-जोर से भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। पता नहीं क्यों मुझे अपराधबोध होने लगा। वैसे जाँच-पड़ताल कर देखा जाए तो इसकी कोई गुंजाइश नहीं थी। वह अपनी गाय को बेचना चाहती थी, तभी तो हमने खरीदी थी। उसके मुँहमाँगे दाम को हमने चुकाया था। वह मुझे और मेरे घरवालों को बुरा-भला कहे क्या यह उचित था!

उस वक्त यह सब मुझे सूझा ही नहीं। संकोच का अनुभव करते हुए मैंने कहा, 'गाय को दुह लेता हूँ।' उस स्त्री ने बड़े दानवीर की भाँति स्वीकृति दी। सुंदर को दुहने के लिए मुझे आया देख सात-आठ बच्चों और बुजुर्गों ने मुझे घेर लिया। सुंदर ने लात नहीं मारी। यह आश्चर्य की बात थी। जब मैं घर लौटा तो माँ ने पूछा, 'गाय कहाँ है?' मैंने माँ की ओर दूध का बरतन बढ़ाया। उसे पकड़ते हुए माँ ने दुबारा प्रश्न किया, 'गाय कहाँ...?'

'मैं अभी उसे साथ नहीं ला सका, शाम को ले आऊँगा।' माँ ने मेरी ओर अविश्वास से भरी नजरों से देखा।

'उस पिशाचनी से गाय के पैसे वापस ले आएँ।' माँ ने पिताजी से कहा, लेकिन पिताजी ने कोई जवाब नहीं दिया।

शाम को जब मैं दूध दुहने गया तो गाय ने बहुत ही कम दूध दिया। ऊपर से दूध में से एक तरह की बदबू भी आ रही थी। पहले मैं इसका कारण न जान सका, मगर बाद में मुझे पता चल गया। दिन में मंडी का चक्कर लगाते हुए सुंदर कचरेदानों को भी नहीं छोड़ती थी। मारवाड़ी स्त्री गाय के लिए चारा नहीं डालती थी। वह जिम्मेदारी तो हमारे इलाके के लगभग तीन सौ सब्जीवालों, बाजार और उसके आस-पास के कचरादानों पर थी। इस बार माँ को मुझे डाँटने-फटकारने के लिए कई कारणों के होते हुए भी मैं बहादुरी से बोला-

'गाय को वहीं रहने दो माँ। वह वहीं खुश है।'

'पैसे देकर खरीदी गई गाय किसी और के घर बाँधी जाएगी? उस धोखेबाज औरत ने हमसे पैसे क्यों लिये? हर बार वहाँ जाकर दूध दुहने से तो बेहतर होगा कि सीधी तरह दूध कहीं से खरीद लें। गाय वहाँ रहेगी...? वह तो आधा दूध स्वयं ही दुह लेगी। मगर जब मैं यह कहती हैं कि पैसे लौटा दो और अपनी गाय ले जाओ तो वह बिना मुँह खोले भाग खड़ी होती है।

पिताजी ने इस गाय के विषय में दखल ही नहीं दिया। यह निश्चय किया गया कि अगले दिन मैं स्कूल से छुट्टी लेकर माँ के साथ जाकर सुंदर को घसीट लाऊँ।

'सुंदर।'

सवेरे-सवेरे मैं जाकर गाय को दुह आया। अब भी बहुत कम ही दूध दिया। उस स्त्री ने कहा कि बछड़े ने दूध पी लिया था। दूध की बदबू असहनीय थी। दोपहर का खाना समाप्त होते ही माँ ने मुझसे कहा। 'चल रे!'

दो व्यक्तियों द्वारा संचालित घोर विस्फोट को सँभालने का अशोभनीय कार्य मुझ पर थोपा गया। जिससे बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। अतः मैं अर्धचेतनावस्था में माँ के साथ दोपहर की कड़कती धूप में डेढ़ मील की दूरी पर स्थित बाजार की ओर चल पड़ा।

क्रोध का ऐसा विस्फोट हुआ, सारा बाजार उस मारवाड़ी स्त्री के यहाँ जमा हो गया। यही कहा जा सकता है कि दो भाषाएँ स्त्रियों की विशेष प्रयुक्तियों से समृद्ध हो तीव्र गति से विकासोन्मुख हो गई। मुझे ऐसा लगा कि मेरी माँ का पलड़ा ऊँचा था। वह मारवाड़ी स्त्री तब-तब लाचार दिखाई देती, जब-जब माँ उससे यह कहती, 'पैसे वापस दे और ले गाय को रख अपने पास।'

पचास लोग बीच-बचाव के लिए आ गए। अब हम अपनी गाय को ले जा सकते थे, मगर वह आए तब न? जितनी बार मैंने सुंदर की रस्सी खूटी से खोलने की कोशिश की, उतनी ही बार वह मारवाड़ी स्त्री दौड़ती हुई आती और गाय से लिपटकर जोर-जोर से रोने लगती। माँ जैसे ही पैसों की माँग करती, वह चुप हो जाती। सुंदर ने उछलकर मुझे पास आने से रोक दिया। माँ को तभी यह युक्ति सूझी होगी। एक बैलगाड़ी लिवा लाओ।' उन्होंने मुझसे कहा।

'सुंदर को बैलगाड़ी में कैसे चढ़ाएँगे?' मैंने पूछा। 'मैंने तुमसे कहा है कि बैलगाड़ी ला और तू मुझसे सवाल-जवाब कर रहा है?' माँ गरजी और मैं बैलगाड़ी लेने चल पड़ा।

बैलगाड़ी आने पर माँ उस पर बछड़े को लेकर बैठ गई। मुझे भी गाड़ी में बैठने को कहा। वहाँ के ही एक आदमी से सुंदर की रस्सी खूटी से खोलकर हाथ में पकड़ाने को कहा। माँ ने उस रस्सी को गाडी के पीछे बाँध दिया। मैं उस क्षण का इंतजार कर रहा था, जब संदर रस्सी तोड़कर भाग जाएगी। मगर सुंदर बैलगाड़ी के पीछे-पीछे चलते हुए शांतिपूर्वक आ गई।

इसके बाद दो हफ्तों के अंदर सुंदर पाँच-छह बार रस्सी तोड़कर मारवाड़ी के घर भाग गई। हर बार मुझे बैलगाड़ी ले जाकर उसे वापस लाना पड़ा। मैं समझ पा रहा था कि स्वतंत्र रूप से सब्जी मंडी में विचरण करते हुए कचरादानों में मुँह मारना दो सौ वुर्गफीट के दायरे में घूमना, मनचाहा व्यवहार करने की तुलना में एकांत विशाल गौशाला में उसे खूटी से बँधे रहना, खली -आदि खाना क्यों नहीं भाया। बाजार का शोरगुल उसके लिए इतना आवश्यक था कि वह अपने एक माह के बछड़े को भी छोड़कर भागने में तत्पर थी। कई अच्छे कारणों के लिए मनुष्य अपना स्वभाव परिवर्तित करने में असमर्थ है तो केवल मालिक के बदल जाने के कारण एक गाय से उसके स्वभाव के बदल जाने की अपेक्षा करना कितना अन्याय है।

कुछ ही दिनों में हम गाय से बिल्कुल तंग आ चुके थे। मारवाड़ी औरत पैसे वापस करनेवाली नहीं थी। मौका पाते ही गाय अपनी पुरानी मालकिन के पास दौड़ जाती। दूध तो बिल्कुल कम देती थी। गाय भी श्याम–थन थी। इतने दिन उसके दूध को पीकर न जाने कितने पाप लग गए होंगे। उसे बेच देना ही अच्छा था।

सुंदर को खरीदने के लिए एक आदमी मिल ही गया। बहुत शांत स्वभाव का था। हमने उससे कहा कि हमने गाय 350 रुपयों में खरीदी थी और 300 रुपयों में देने के लिए तैयार हो। वह तुरंत मान गया। एक दिन शाम को वह अपने साथ दो आदमियों को आया और गाय तथा बछड़े को ले गया।

उस रात मैंने पिताजी से पूछा, 'क्या आपने उन्हें बताया कि सुंदर अकसर रस्सी तोड़कर मारवाड़ी के घर भाग जाती है? '

पिताजी का ध्यान कहीं और था, उन्होंने जवाब नहीं दिया। आमतौर पर वे ऐसा बरताव नहीं करते।

मैंने माँ से पूछा, माँ ने मुझे डपट दिया सुंदर...। क्या सुंदर-सुंदर' लगा रखा है। घर की बला टली।

'वह तो ठीक है, मगर क्या नए खरीददार को यह बताया गया कि गाय के गुम हो जाने पर उसे बाजार में जाकर ढूँढ़ना होगा?'

माँ ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। उलटे मुझे डाँटने लगीं—'सुंदर नहीं...बंदर कहो उसे।'

मैंने सोचा, कम-से-कम उस मारवाड़ी के घर में तो माँ ने ऐसा नहीं कहा था, यही शुक्र है। अगर कह देती तो वह मारवाड़ी स्त्री चिल्लाई होती कि इसने मेरे बच्चे को बंदर कहा।

रात को मैं पिछवाड़े का दरवाजा बंद कर आया। इतने बड़े तमाशे के बीच सुंदर मेरी ओर से लापरवाह ही रही। ऐसा होते हुए भी मैं ही उसका नाम लेकर उसे याद करता था। उसके किसी गुण ने मुझे आकृष्ट कर लिया था।

मुझे उसके नए मालिक पर दया आई। बिना किसी सवाल के पूरा पैसा देकर गाय ले गया था, पता नहीं वह उसकी गौशाला में है या बाजार की तरफ भाग गई। मुझे उस रात नींद ही नहीं आई। मुझे बार-बार बस यही खयाल आता कि जरूर सुंदर मारवाड़ी के घर भाग गई होगी। जैसे भी हो, गाय को ढूँढ़ते हुए वह सुबह यहाँ जरूर आएगा। यहीं से एक बैलगाड़ी लेकर जाना होगा। वह इस वक्त शायद आ ही रहा हो?

सुबह दरवाजा खुलने पर वह दिखाई नहीं दिया। रस्सी तोड़कर आई हुई सुंदर खड़ी थी।

- अलकनंदा सिंंह

Thursday, 7 November 2019

कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले के जन्‍मदिन पर ....

मध्य प्रदेश के जिला बैतूल अंतर्गत गाँव जौलखेड़ा में 07 नवंबर को जन्‍मे प्रसिद्ध भारतीय कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले अपनी रचनाओं में सघन बुनावट और उनमें निहित राजनीतिक संवेदना के लिए जाने जाते हैं।
देश की 24 भाषाओं में विशेष साहित्यिक योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकारों में शामिल चंद्रकांत देवताले का देहावसान 14 अगस्त 2017 को हुआ.
उन्होंने अपनी कविता की कच्ची सामग्री मनुष्य के सुख दुःख, विशेषकर औरतों और बच्चों की दुनिया से इकट्ठी की थे. चूंकि बैतूल में हिंदी और मराठी बोली जाती है, इसलिए उनके काव्य संसार में यह दोनों भाषाएं जीवित थीं. मध्य भारत का वह हिस्सा जो महाराष्ट्र से छूता है, उसमें मराठी भाषा पहली या दूसरी भाषा के रूप में बोली जाती रही है. बैतूल भी ऐसी ही जगह है. अपने प्रिय कवि मुक्तिबोध की तरह देवताले मराठी से आंगन की भाषा की तरह बरताव करते थे. यह उनकी कविताओं में बार-बार देखा जा सकता है.
2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्‍मानित ने कवि गजानन माधव मुक्तिबोध पर पीएचडी की थी और इंदौर के एक कॉलेज में पढ़ाते थे.
वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। कविता की उनकी भाषा में अत्यंत पारदर्शिता और एक विरल संगीतात्मकता दिखाई देती है.
देवताले की कविताओं में जूता पॉलिश करते एक लड़के से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक जगह पाते हैं. वे ‘दुनिया के सबसे गरीब आदमी’ से लेकर ‘बुद्ध के देश में बुश’ तक पर कविताएं लिखते थे लेकिन सुखद यह है कि कविता के इस पूरे फैलाव में कहीं भी उनके गुस्से में कमी नहीं आती. वे अपने गुस्से को सर्जनात्मक बनाकर उससे भूख का निवारण चाहते हैं.
चंद्रकांत देवताले की 2 मशहूर कविताएं:
पत्थर की बैंच
जिस पर रोता हुआ बच्चा
बिस्कुट कुतरते चुप हो रहा है
जिस पर एक थका युवक
अपने कुचले हुए सपनों को सहला रहा है
जिस पर हाथों से आंखे ढांप
एक रिटायर्ड बूढ़ा भर दोपहरी सो रहा है
जिस पर वे दोनों
जिन्दगी के सपने बुन रहे हैं
पत्थर की बैंच
जिस पर अंकित है आंसू, थकान
विश्राम और प्रेम की स्मृतियां
इस पत्थर की बैंच के लिए भी
शुरु हो सकता है किसी दिन
हत्याओं का सिलसिला
इसे उखाड़ कर ले जाया
अथवा तोड़ा भी जा सकता है
पता नहीं सबसे पहले कौन आसीन हुआ होगा
इस पत्थर की बैंच पर!
................................................
मेरे होने के प्रगाढ़ अँधेरे को
पता नहीं कैसे जगमगा देती हो तुम
अपने देखने भर के करिश्मे से
कुछ तो है तुम्हारे भीतर
जिससे अपने बियाबान सन्नाटे को
तुम सितार-सा बजा लेती हो समुद्र की छाती में
अपने असंभव आकाश में
तुम आज़ाद चिड़िया की तरह खेल रही हो
उसकी आवाज़ की परछाई के साथ
जो लगभग गूँगा है
और मै कविता के बंदरगाह पर खड़ा
आँखे खोल रहा हूँ गहरी धुंध में
लगता है काल्पनिक ख़ुशी का भी
अंत हो चुका है
पता नहीं कहाँ किस चट्टान पर बैठी
तुम फूलों को नोच रही हो
मै यहाँ दुःख की सूखी आँखों पर
पानी के छींटें मार रहा हूँ
हमारे बीच तितलियों का अभेद्य पर्दा है शायद
जो भी हो
उड़ रहा हूँ तुम्हारी खनकती आवाज़ के
समुन्दर पर
हंस ध्वनि की तन की तरंगों के साथ
जुगलबंदी कर रहे हैं
मेरे फड़फड़ाते होंठ
याद है न जितनी बार पैदा हुआ
तुम्हें मैंने बैजनी कमल कहकर पुकारा
और अब भी अकेलेपन की पहाड़ से उतरकर
मैं आऊँगा हमारी परछाइयों के ख़ुशबूदार
गाते हुए दरख़्त के पास
मैं आता रहूँगा उजली रातों में
चन्द्रमा को गिटार-सा बजाऊँगा
तुम्हारे लिए
-Legend News

Monday, 5 August 2019

शिवमंगल सिंह सुमन: मैं फकत यह जानता, जो मिट गया वह जी गया

हिंदी साहित्य के प्रमुख नामों में से एक शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म 5 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिला अंतर्गत झगरपुर गांव में हुआ था। उन्‍होंने रीवा, ग्वालियर आदि स्थानों मे रहकर आरम्भिक शिक्षा प्राप्‍त की है | एक अग्रणी हिंदी लेखक और कवि थे।
सुमन ने 1968-78 के दौरान विक्रम विश्वविद्यालय (उज्जैन) के कुलपति के रूप में भी काम किया।
वह कालिदास अकादमी, उज्जैन के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे। 27 नवंबर 2002 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।
उनकी लिखी कविताएं प्रेरणा व जीवन का सार देती हैं। उन्हें किताब ‘मिट्टी की बारात’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी लिखी 3 चुनिंदा कविताएं-
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
चलना हमारा काम है
गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है।
कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है।
जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरुद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है।
इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पड़ा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।
मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।
साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।
मैं फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिश्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है।
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे।
हम बहता जल पीने वाले
मर जाएँगे भूखे-प्यासे,
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से,
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंचखोल
चुगते तारक-अनार के दाने।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।

Sunday, 30 June 2019

जन्‍मदिन: जनकवि बाबा नागार्जुन की कविताओं के अंश

मैथिली के अप्रतिम लेखक और जनकवि बाबा नागार्जुन का जन्‍म 30 जून 1911 को मधुबनी जिले के सतलखा गांव स्‍थित अपने ननिहाल में हुआ था। उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था। इनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माता का नाम उमा देवी था। नागार्जुन के बचपन का नाम ‘ठक्कन मिसर’ था।
नागार्जुन के काव्य संसार की बनावट में आम आदमी की उपस्थिति है। उसकी पक्षधरता से उपजे राजनीतिक, आर्थिक सरोकार हैं। व्यवस्था और प्रभुत्वसंपन्न वर्ग के प्रति आक्रोश की सक्रियता है। उनके रचना संसार में जीवन के यथार्थ प्रतिबिंब साफ नज़र आते हैं। कविता के यथार्थ और जीवन में वहां कोई अंतर नहीं है। उनकी कविताओं में मजदूरों की जुझारू चेतना की अभिव्यक्ति है। उनकी शक्ति, जनता के निकटतम संपर्क और जनसाधारण की आशा-आकांक्षाओं से अपने आपको एकाकार करने में है। वे सच्चे अर्थों में जनकवि थे।
प्रस्तुत है जनकवि बाबा नागार्जुन की कविताओं के अंश-
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !
बातें–
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चंदन में बसी हुई
बातें–
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य-बंधन में कसी हुईं
बातें–
उसाँस में झुलसीं
रोष की आँच में तली हुईं
सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
पीपल के पत्तों पर फिसल रही चाँदनी
नालियों के भीगे हुए पेट पर, पास ही
जम रही, घुल रही, पिघल रही चाँदनी
पिछवाड़े बोतल के टुकड़ों पर–
चमक रही, दमक रही, मचल रही चाँदनी
दूर उधर, बुर्जों पर उछल रही चाँदनी
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ…
प्यार का अनूठा रसायन…
अपूर्व विक्षोभ…
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी…
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई…
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता…
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!
तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चाँदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !
सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़
अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़
कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथ
बन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ
छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट
मिल सकती कैसे भला, अन्नचोर को छूट
कर गई चाक
तिमिर का सीना
जोत की फाँक
यह तुम थीं
सिकुड़ गई रग-रग
झुलस गया अंग-अंग
बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझार
उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार
अचानक उमगी डालों की सन्धि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं
कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?

Saturday, 29 June 2019

आज ही के दिन दुनिया में आए थे हास्य कवि और गीतकार शैल चतुर्वेदी

हिंदी के सुप्रसिद्ध हास्य कवि और गीतकार शैल चतुर्वेदी आज के दिन ही इस दुनिया में आए थे। हास्य व्यंग के लिए पहचाने जाने जाने वाले शैल चतुर्वेदी ने बॉलीवुड में भी बतौर चरित्र अभिनेता बेहतरीन काम किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राध्यापक के रूप में अपने करियर की शुरूआत करने वाले शैल चतुर्वेदी ने उपहार, चितचोर, नैया, हम दो हमारे दो, चमेली की शादी, नरसिम्हा और क़रीब जैसी हिंदी फिल्मों में काम किया। लोग उनकी समसामयिक राजनीति पर काव्यात्मक व्यंग्य से आज भी लोटपोट हो जाते हैं। 70 और 80 के दशक में बदलते राजनीतिक समीकरणों से उन्होंने खूब खाद-पानी लिया और अपनी काव्यात्मक टिप्पणियों में उसका उपयोग किया।
शैल चतुर्वेदी ने एक कवि और चरित्र अभिनेता के रूप में अपनी पीढ़ी को तो प्रभावित किया ही, आज की जनरेशन पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
पेश हैं उनकी कविताओं से चुनिंदा अंश-
सारे काम अपने-आप हो रहे हैं
जिसकी अंटी में गवाह है
उसके सारे खून
माफ़ हो रहे हैं
इंसानियत मर रही है
और राजनीति
सभ्यता के सफ़ेद कैनवास पर
आदमी के ख़ून से 
हस्ताक्षर कर रही है।
मूल अधिकार ?
बस वोट देना है
सो दिये जाओ
और गंगाजल के देश में
ज़हर पिये जाओ।
लोकल ट्रेन से उतरते ही
हमने सिगरेट जलाने के लिए
एक साहब से माचिस माँगी, 
तभी किसी भिखारी ने
हमारी तरफ हाथ बढ़ाया, 
हमने कहा- 
“भीख माँगते शर्म नहीं आती?”
ओके, वो बोला-
“माचिस माँगते आपको आयी थी क्या?”
बाबूजी! माँगना देश का करेक्टर है,
जो जितनी सफ़ाई से माँगे
उतना ही बड़ा एक्टर है
गरीबों का पेट काटकर
उगाहे गए चंदे से
ख़रीदा गया शाल
देश (अपने) कन्धों पर डाल
और तीन घंटे तक
बजाकर गाल
मंत्री जी ने
अपनी दृष्टि का संबंध 
तुलसी के चित्र से जोड़ा
फिर रामराज की जै बोलते हुए
(लंच नहीं) मंच छोड़ा
मार्ग में सचिव बोला-
“सर, आपने तो कमाल कर दिया
आज तुलसी जयंती है
और भाषण गांधी पर दिया।”
हमारे एक मित्र हैं
रहने वाले हैं रीवाँ के
एजेंट हैं बीमा के
मिलते ही पूछेंगे- “बीमा कब करा रहे हैं।”
मानो कहते हों- “कब मर रहे हैं?”
फिर धीरे से पूछेंगे- “कब आऊँ
कहिए तो दो फ़ार्म लाऊँ
पत्नी का भी करवा लीजिए
एक साथ दो-दो रिस्क कवर कीजिए
आप मर जाएँ तो उन्हें फ़ायदा
वो मर जाएँ
तो आपका फ़ायदा।”
अब आप ही सोचिए
मरने के बाद 
क्या फ़ायदा
और क्या घाटा
हमारे एक फ्रैंड हैं
सूरत-शक्ल से
बिल्कुल इंग्लैंड हैं 
एक दिन बोले-
“यार तीन लड़के हैं
एक से एक बढ़के हैं
एक नेता है
हर पाँचवें साल
दस-बीस हज़ार की चोट देता है
पिछले दस साल से
चुनाव लड़ रहा है
नहीं बन पाया सड़ा-सा एमएलए
बोलो तो कहता है-
“अनुभव बढ़ रहा है”
पालिटिक्स के चक्कर में
बन गया पोलिटिकल घनचक्कर
और दूसरा ले रहा है
कवियों से टक्कर
कविताएँ बनाता है
न सुनो तो
चाय पिलाकर सुनाता है
तीसरा लड़का डॉक्टर है
कई मरीज़ों को
छूते ही मार चुका है
बाहर तो बाहर
घर वालों को तार चुका है
हरा भरा घर था
दस थे खाने वाले
कुछ और थे आने वाले
केवल पांच रह गए
बाकी के सब 
दवा के साथ बह गए
मगर हमारी काकी
बड़े-बूढ़ों के नाम पर
वही थी बाकी
चल फिर लेती थी
कम से कम 
घर का काम तो कर लेती थी
जैसे-तैसे जी रही थी
कम से कम 
पानी तो पी रही थी
मगर हमारे डॉक्टर बेटे का
लगते ही हाथ
हो गया सन्निपात
बिना जल की मछली-सी
फड़फड़ाती रही
दो ही दिनों में सिकुड़कर
हाफ़ हो गई
और तीसरे दिन साफ़ हो गई
दुख तो इस बात का है
कि हमारी ग़ैरहाज़िरी में मर गई
पाला हमने 
और वसीयत दूसरे के नाम कर गई”
एक दिन अकस्मात
एक पुराने मित्र से
हो गई मुलाकात
कहने लगे-“जो लोग
कविता को कैश कर रहे हैं
वे ऐश कर रहे हैं
लिखने वाले मौन हैं
श्रोता तो यह देखता है
कि पढ़ने वाला कौन है
लोग-बाग
चार-ग़ज़लें
और दो लोक गीत चुराकर
अपने नाम से सुना रहे हैं
भगवान ने उन्हें ख़ूबसूरत बनाया है
वे ज़माने को
बेवकूफ़ बना रहे हैं
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