Friday, 15 January 2021

तुर्की के क्रांतिकारी कवि नाज़िम हिकमत की 118वीं जन्मतिथि, उनकी कुछ कव‍ितायें (अनूद‍ित ) पढ़‍िए-


 तुर्की के महान क्रांतिकारी कवि नाज़िम हिकमत की आज 118वीं जन्मतिथि है. उनका जन्म 15 जनवरी 1902 को तत्कालीन ऑटोमन साम्राज्य के सालोनिका में हुआ था. 3 जून 1963 को मास्को में उनकी मृत्यु हुई. उन्होंने अपनी ज़िंदगी का लंबा अर्सा जेल में बिताया. जेल में रहते हुए उन्होंने कई कविताएं लिखी थीं. नाज़िम को रूमानी विद्रोही कहा जाता था क्योंकि वो कहीं रूमानी तो कहीं विद्रोही और कहीं दार्शनिक नज़र आते हैं. नाज़िम की कविताओं में ज़िंदगी और विद्रोह एक साथ दिखता है. यहां पेश है उनकी एक कविता जिसमें उनके तेवर और ज़िंदगी का फलसफा नज़र आता है-

जीने के लिए मरना

जीने के लिए मरना
ये कैसी स‍आदत है
मरने के लिए जीना
ये कैसी हिमाक़त है

अकेले जीओ
एक शमशाद तन की तरह
और मिलकर जीओ
एक बन की तरह। 

यह नाज़िम हिकमत की पहली कविता है, जो उन्होंने तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक मुस्तफ़ा सुबही और उनके चौदह साथियों की स्मृति में 1921 में लिखी थी, जिन्हें 28 जनवरी 1921 को तुर्की के बन्दरगाह ’त्रापेजुन्द’ के क़रीब काले सागर में डुबकियाँ दे-देकर मार डाला गया था।


मेरी छाती पर लगे हैं पन्द्रह घाव

पन्द्रह चाकू

हत्थों तक घुसा दिए गए मेरी छाती में


पर धड़क रहा है

और धड़केगा दिल

 बन्द नहीं हो सकती उसकी धड़कन !


मेरी छाती पर हैं पन्द्रह घाव

और उनके चारों ओर घोर काला अन्धेरा

काले सागर का पानी

लिपटा है उनके चारों तरफ़

चिकने साँपों की तरह कुण्डलाकार


वे मेरा दम घोंट देंगे

मेरे ख़ून से रंग देंगे

काले जल को


मेरी छाती में आ घुसे हैं पन्द्रह छुरे

लेकिन फिर भी धड़क रहा है दिल

 मेरी छाती के भीतर !


मेरी छाती पर लगे हैं पन्द्रह घाव

पन्द्रह बार बेधा गया मेरा सीना

सोचते रहे वे कि छेद दिया दिल

लेकिन धड़कता रहा वह

बन्द नहीं होगी धड़कन !


मेरी छाती में जला दिए पन्द्रह अलाव

तोड़ दिए पन्द्रह चाकू मेरी छाती में

लेकिन दिल है कि धड़क रहा है

 लाल पताका की तरह

धड़केगा, धड़कता रहेगा

 बन्द नहीं होगी धड़कन !


1921

रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय 

कचोटती स्वतन्त्रता 

तुम खर्च करते हो अपनी आँखों का शऊर,

अपने हाथों की जगमगाती मेहनत,

और गूँधते हो आटा दर्जनों रोटियों के लिए काफ़ी

मगर ख़ुद एक भी कौर नहीं चख पाते,

तुम स्वतन्त्र हो दूसरों के वास्ते खटने के लिए

अमीरों को और अमीर बनाने के लिए

तुम स्वतन्त्र हो ।


जन्म लेते ही तुम्हारे चारों ओर

वे गाड़ देते हैं झूठ कातने वाली तकलियाँ

जो जीवनभर के लिए लपेट देती हैं

तुम्हें झूठ के जाल में ।

अपनी महान स्वतन्त्रता के साथ

सिर पर हाथ धरे सोचते हो तुम

ज़मीर की आज़ादी के लिए तुम स्वतन्त्र हो ।


तुम्हारा सिर झुका हुआ मानो आधा कटा हो

गर्दन से,

लुंज-पुंज लटकती हैं बाँहें,

यहाँ-वहाँ भटकते हो तुम

अपनी महान स्वतन्त्रता में,

बेरोज़गार रहने की आज़ादी के साथ

तुम स्वतन्त्र हो ।


तुम प्यार करते हो देश को

सबसे क़रीबी, सबसे क़ीमती चीज़ के समान ।

लेकिन एक दिन, वे उसे बेच देंगे,

उदाहरण के लिए अमेरिका को

साथ में तुम्हें भी, तुम्हारी महान आज़ादी समेत

सैनिक अड्डा बन जाने के लिए तुम स्वतन्त्र हो ।

तुम दावा कर सकते हो कि तुम नहीं हो

महज़ एक औज़ार, एक संख्या या एक कड़ी

बल्कि एक जीता-जागते इन्सान

वे फौरन हथकड़ियाँ जड़ देंगे

तुम्हारी कलाइयों पर ।

गिरफ़्तार होने, जेल जाने

या फिर फाँसी चढ़ जाने के लिए

तुम स्वतन्त्र हो ।


नहीं है तुम्हारे जीवन में लोहे, काठ

या टाट का भी परदा,

स्वतन्त्रता का वरण करने की कोई ज़रूरत नहीं :

तुम तो हो ही स्वतन्त्र ।

मगर तारों की छाँह के नीचे

इस क़िस्म की स्वतन्त्रता कचोटती है ।

जीने के लिए मरना (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा अनूद‍ित) 


जीने के लिए मरना

ये कैसी स‍आदत है

मरने के लिए जीना

ये कैसी हिमाक़त है


अकेले जीओ

एक शमशाद तन की तरह

अओर मिलकर जीओ

एक बन की तरह

हमने उम्मीद के सहारे

टूटकर यूँ ही ज़िन्दगी जी है

जिस तरह तुमसे आशिक़ी की है।

- Alaknand singh 


Sunday, 10 January 2021

विश्व हिंदी दिवस पर पढ़िए हिंदी की कुछ बेहतरीन रचनाएं


 विश्व हिंदी दिवस हर साल 10 जनवरी को मनाया जाता है जिसका उद्देश्य हिंदी का प्रचार-प्रसार करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इसे ख़ास उत्साह के साथ मनाते हैं साथ ही सरकारी कार्यालयों में भी व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं।

विश्व हिंदी दिवस पर हिंदी के बेहतरीन कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की रचनाओं से हम आपको रूबरू करा रहे हैं। इसी कड़ी में हिंदी के प्रसिद्ध कवियों में शुमार हरिवंशराय बच्चन, रघुवीर सहाय, पाश, भवानी प्रसाद मिश्र, दुष्यंत कुमार की कविताएं निश्चित तौर पर आपके दिलों-दिमाग पर गहरा असर करेंगी।

सबसे पहले रामधारी स‍िंंह द‍िनकर की कव‍िता - हिमालय 

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

साकार, दिव्य, गौरव विराट्,

पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!

मेरी जननी के हिम-किरीट!

मेरे भारत के दिव्य भाल!

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,

युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,

निस्सीम व्योम में तान रहा

युग से किस महिमा का वितान?

कैसी अखंड यह चिर-समाधि?

यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान?

तू महाशून्य में खोज रहा

किस जटिल समस्या का निदान?

उलझन का कैसा विषम जाल?

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

ओ, मौन, तपस्या-लीन यती!

पल भर को तो कर दृगुन्मेष!

रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल

है तड़प रहा पद पर स्वदेश।

सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,

गंगा, यमुना की अमिय-धार

जिस पुण्यभूमि की ओर बही

तेरी विगलित करुणा उदार,

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त

सीमापति! तू ने की पुकार,

'पद-दलित इसे करना पीछे

पहले ले मेरा सिर उतार।'

उस पुण्यभूमि पर आज तपी!

रे, आन पड़ा संकट कराल,

व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे

डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल।

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा

कितना मेरा वैभव अशेष!

तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर

वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।

वैशाली के भग्नावशेष से

पूछ लिच्छवी-शान कहाँ?

ओ री उदास गण्डकी! बता

विद्यापति कवि के गान कहाँ?

तू तरुण देश से पूछ अरे,

गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग?

अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी

यह सुलग रही है कौन आग?

प्राची के प्रांगण-बीच देख,

जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल,

तू सिंहनाद कर जाग तपी!

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,

जाने दे उनको स्वर्ग धीर,

पर, फिर हमें गाण्डीव-गदा,

लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।

कह दे शंकर से, आज करें

वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।

सारे भारत में गूँज उठे,

'हर-हर-बम' का फिर महोच्चार।

ले अंगडाई हिल उठे धरा

कर निज विराट स्वर में निनाद

तू शैलीराट हुँकार भरे

फट जाए कुहा, भागे प्रमाद

तू मौन त्याग, कर सिंहनाद

रे तपी आज तप का न काल

नवयुग-शंखध्वनि जगा रही

तू जाग, जाग, मेरे विशाल


रचनाकाल १९३३

हरिवंशराय बच्चन…

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने…
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी,
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे

अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,

मैं लगा दूँ आग इस संसार में है
प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर,
जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,
खूबियों के साथ परदे को उठाता,

एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,
और मैंने था उतारा एक चेहरा,
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,
फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका
उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,

और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं–
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
रघुवीर सहाय…
अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि जिसमें छंद घूमकर आय
घुमड़ता जाय देह में दर्द
कहीं पर एक बार ठहराय

कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूं
वही दो बार शब्द बन जाय
बताऊँ बार-बार वह अर्थ
न भाषा अपने को दोहराय

अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि कोई मूड़ नहीं मटकाय
न कोई पुलक-पुलक रह जाय
न कोई बेमतलब अकुलाय

छंद से जोड़ो अपना आप
कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय
थामकर हँसना-रोना आज
उदासी होनी की कह जाय।

भवानी प्रसाद मिश्र…
एडिथ सिटवेल ने
सूरज को धरती का
पहला प्रेमी कहा है

धरती को सूरज के बाद
और शायद पहले भी
तमाम चीज़ों ने चाहा

जाने कितनी चीज़ों ने
उसके प्रति अपनी चाहत को
अलग-अलग तरह से निबाहा

कुछ तो उस पर
वातावरण बनकर छा गए
कुछ उसके भीतर समा गए
कुछ आ गए उसके अंक में

मगर एडिथ ने
उनका नाम नहींलिया
ठीक किया मेरी भी समझ में

प्रेम दिया उसे तमाम चीज़ों ने
मगर प्रेम किया सबसे पहले
उसे सूरज ने

प्रेमी के मन में
प्रेमिका से अलग एक लगन होती है
एक बेचैनी होती है
एक अगन होती है
सूरज जैसी लगन और अगन
धरती के प्रति
और किसी में नहीं है

चाहते हैं सब धरती को
अलग-अलग भाव से
उसकी मर्ज़ी को निबाहते हैं
खासे घने चाव से

मगरप्रेमी में
एक ख़ुदगर्ज़ी भी तो होती है
देखता हूँ वह सूरज में है

रोज़ चला आता है
पहाड़ पार कर के
उसके द्वारे
और रुका रहता है
दस-दस बारह-बारह घंटों

मगर वह लौटा देती है उसे
शाम तक शायद लाज के मारे

और चला जाता है सूरज
चुपचाप
टाँक कर उसकी चूनरी में
अनगिनत तारे
इतनी सारी उपेक्षा के
बावजूद।

अवतार सिंह संधू ‘पाश’…
हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता
ज़िन्दगी के जश्न शुरू कर लेता है
सूली के गीत छेड़ लेता है

शब्द हैं की पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है की तब भी गाता है
ज़रा सोचें की रूठी सर्द रातों को कौन मनाए ?
निर्मोही पलों को हथेलियों पर कौन खिलाए ?
लहू ही है जो रोज़ धाराओं के होंठ चूमता है
लहू तारीख़ की दीवारों को उलांघ आता है
यह जश्न यह गीत किसी को बहुत हैं —
जो कल तक हमारे लहू की ख़ामोश नदी में
तैरने का अभ्यास करते थे ।
दुष्यंत कुमार…
ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारो

दर्दे—दिल वक़्त पे पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सैयाद को महफ़िल में बुला लो यारो

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे
आज संदूक से वो ख़त तो निकालो यारो

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो। 

प्रस्तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह 

Wednesday, 16 December 2020

डॉ.कलीम आजिज़: जिन्होंने आपातकाल के उस नाज़ुक दौरा में इंदिरा गांधी से सीधे पूछा, “तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो”


 वर्ष 1976 के दौरान विज्ञान भवन में भारत के राष्ट्रपति द्वारा उनकी प्रथम पुस्तक का लोकार्पण किया गया था। कलीम आजिज़ 60 और 70 के दशक में स्वतंत्रता दिवस की संध्या पर होने वाले लाल क़िले के मुशायरे में बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र शायर थे। यहीं उनकी प्रसिद्धि एक निडर और बेबाक शायर के रूप में भी हुई, लाल क़िला के डाईस से ही 1975 में डॉ. कलीम आजिज़ ने आपातकाल के उस नाज़ुक दौरा में उस समय मुशायरे में मौजूद भारत की प्रधानमंत्री इंदरा गांधी की जानिब इशारा करते हुए एक शेर पढ़ डाला:- दामन पे कोई छींट, न ख़ंजर पे कोई दाग, तुम क़त्ल करे हो, के करामात करो हो.. इस शेर उन्हे बहुत दाद मिला पर मुशायरा करवाने वालों का ख़ून सूख चुका था।

इसके बाद जीवन भर “तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो” जैसी गज़ल डॉ कलीम आजिज़ की पहचान बनी रही।
डॉ. कलीम आजिज़ साहेब की हालात ए ज़िन्दगी और गज़ल के संग्रह ‘वो जो शायरी का सबब हुआ’ जब शाए हुई तो आपबीती जगबीती बन गई। आज़ाद भारत में अश्क का सैलाब उमड़ गया। आज़ाद भारत की हुकूमत हिल सी गई। ज़ख़्म पर मरहम रखने के लिए डॉ. कलीम आजिज़ को सालों बाद जनवरी 1989 में इसी किताब के लिए पद्मश्री अवार्ड दिया गया। आज यह किताब पटना विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में शामिल है।
बात चीत के दौरान इस अज़ीम शायर ने एक बार कहा था कि मैंने पद्मश्री को कभी हाथ नहीं लगाया। राष्ट्रपति भवन से कई बार पद्मश्री अवार्ड लेने के लिए बुलावा आया लेकिन मैं नहीं गया। हार कर सरकार ने पद्मश्री का तमगा और प्रमाण-पत्र डाक से भेज दिया। बांकीपुर डाकघर में महीनों यह अवार्ड पड़ा रहा। हार कर डाकख़ाना से अवार्ड बीएन कॉलेज के सामने स्थित घर भिजवाया गया। डॉ. कलीम आजिज़ ने जिस चौकी पर बैठ कर कभी एक संवाददाता को साक्षात्कार दिया था, उसी के नीचे रखे बदरंग हो चुके टीन के एक बक्से की ओर इशारा कर कहा था कि तब से लेकर आज तक पद्मश्री इसी बक्से में बंद है। मुझे इसे देखना भी गवारा नहीं। यह मेरे ज़ख़्म का मरहम कभी नहीं हो सकता है।
तीन नवम्बर 1946 ई. के दौरान एक भयानक हिंसा की घटना का उनकी ज़िन्दगी और शायरी पर बड़ा गहरा असर पड़ा। जिसमें उनकी मां और छोटी बहन की मौत हो गई थी। इस ग़म की आग को वो सारी ज़िन्दगी अपने सीने में दबाए रहे। इस हादसे की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा :-
वो जो शायरी का सबब हुआ, वो मुआमला भी अजब हुआ – मैं ग़ज़ल सुनाऊं हूं इसलिए कि ज़माना उसको भुला न दे।
कलीम आजिज ने अपनी बेमिसाल और ख़ूबसूरत शायरी से पूरी दुनिया में अपनी काव्यात्मक निपुणता एवं महानता का लोहा मनवा लिया। उनकी शायरी में एहसास की तीव्रता, फ़िक्र की नवीनता और प्रस्तुति की जो सुन्दरता का सम्मिश्रण मिलता है, वह अपनी मिसाल आप है। उनकी शायरी नवीन चिंतन की क्लासिकी शायरी का बेहतरीन नमूना है।

ये दीवाने कभी पाबंदियों का गम नहीं लेंगे
गरेबां चाक जब तक कर न लेंगे, दम नहीं लेंगे

लहू देंगे तो लेंगे प्यार, मोती हम नहीं लेंगे
हमें फूलों के बदले फूल दो, शबनम नहीं लेंगे

मुहब्बत करने वाले भी अजब खुद्दार होते है
जिगर पर ज़ख्म लेंगे, ज़ख्म पर मरहम नहीं लेंगे

संवारें जा रहे हैं हम, तो उलझी जाती हैं ज़ुल्फें
तुम अपने जिम्मे लो, अब ये बखेड़ा हम नहीं लेंगे
दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी जो मात करो हो.

मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो,
मुझसे ही अमीरों की तरह बात करो हो.

हम ख़ाकनशीं तुम सुखन आरा ए सरे बाम,
पास आके मिलो दूर से क्या बात करो हो.

हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है,
हम और भुला दें तुम्हें, क्या बात करो हो.

प्रस्तुत‍ि: अलकनंदा स‍िंंह 

Monday, 23 November 2020

मेरी कव‍िता: शेष रह गया बिंदु

यह चक्रवृत्‍त सी है एक पहेली कि
पहले आदमी बना या इंसान
शून्‍य की ही भांति एकटक
समय हमें घूर रहा है निरंतर ,
पूछ रहा है वह कि- शून्‍य, जो है पूर्ण,
वह कैसे रह पाया है पूर्ण
यही शून्‍यता है उसकी
कि शून्‍य में से शून्‍य के जाने पर भी
उसका शून्‍य ही बना रह जाना

यह ब्रह्म ही तो है
जो पूर्ण है - अकाट्य है,
जो अनादि है- अनंत भी ,
रेखा- त्रिभुज- चतुर्भुज के अनेक कोणों से मुक्‍त
इसी वृत्‍त- में समाये ब्रह्म- ब्रह्मांड में से,
खोजना है वह शेष-बिंदु अभी , कि जहां से
शुरू होता है इस धरती पर-
आदमी का इंसान में और
इंसान का आदमी में बदलते जाना।

- अलकनंदा सिंह

Sunday, 22 November 2020

'चली फगुनहट बौरे आम' कव‍िता रचने वाले ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि साह‍ित्यकार थे व‍िवेकी राय


 हिन्दी और भोजपुरी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार विवेकी राय की आज पुण्‍यतिथि है। उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर में 19 नवंबर 1924 को जन्‍मे विवेकी राय की मृत्‍यु 22 नवंबर 2016 के दिन वाराणसी में हुई।

ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार विवेकी राय ने 50 से अधिक पुस्तकों की रचना की थी। वे ललित निबंध, कथा साहित्य और कविता कर्म में समभ्यस्त थे। आज भी विवेकी राय को ‘कविजी’ उपनाम से जाना जाता है।
पिता के अभाव में उनका बचपन ननिहाल में मामा बसाऊ राय की देख-रेख में बीता था। विवेकी राय गाँव की खेती-बारी देखते थे और गाजीपुर में अध्यापन तथा साहित्य सेवा में भी लीन रहते थे। गाँव के उत्तरदायित्व का पूरा निर्वाह करते हुए उन्होंने बहुत लगन से विपुल साहित्य पढ़े और लिखे।

अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।
ये लाईनें हैं श्री विवेकी राय जी के एक लेख की जो उन्होंने एक नदी मंगई के बारे में लिखी हैं।

जब 7वीं कक्षा में अध्यन कर रहे थे उसी समय से डॉ.विवेकी राय जी ने लिखना शुरू किया। सन् 1945 ई. में आपकी प्रथम कहानी ‘पाकिस्तानी’ दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद इनकी लेखनी हर विधा पर चलने लगी जो कभी थमनें का नाम ही नहीं ले सकी। इनका रचना कार्य कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी, समीक्षा, सम्पादन एवं पत्रकारिता आदि विविध विधाओं से जुड़ा रहा। अब तक इन सभी विधाओं से सम्बन्धित लगभग 60 कृतियाँ आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं और लगभग 10 प्रकाशनाधीन हैं।

प्रकाशित कृतियाँ निम्न हैं-

काव्य संग्रह : अर्गला,राजनीगंधा, गायत्री, दीक्षा, लौटकर देखना आदि।

कहानी संग्रह : जीवन परिधि, नई कोयल, गूंगा जहाज बेटे की बिक्री, कालातीत, चित्रकूट के घाट पर, विवेकी राय की श्रेष्ठ कहानियाँ , श्रेष्ठ आंचलिक कहानियाँ, अतिथि, विवेकी राय की तेरह कहानियाँ आदि।

उपन्यास : बबूल,पूरुष पुराण, लोक ऋण, बनगंगी मुक्त है, श्वेत पत्र, सोनामाटी, समर शेष है, मंगल भवन, नमामि ग्रामम्, अमंगल हारी, देहरी के पार आदि।

फिर बैतलवा डाल पर, जुलूस रुका है, मन बोध मास्टर की डायरी, नया गाँवनाम, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ ,जगत तपोवन सो कियो, आम रास्ता नहीं है, जावन अज्ञात की गणित है, चली फगुनाहट, बौरे आम आदि अन्य रचनाओं का प्रणयन भी डॉ. विवेकी राय ने किया है। इसके अलावा डॉ. विवेकी राय ने 5 भोजपुरी ग्रन्थों का सम्पादन भी किया है। सर्वप्रथम इन्होंने अपना लेखन कार्य कविता से शुरू किया। इसीलिए उन्हें आज भी ‘कविजी’ उपनाम से जाना जाता है।

अन्य लेखन कार्य
सन 1945 ई. में डॉ. विवेकी राय की प्रथम कहानी ‘पाकिस्तानी’ दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद इनकी लेखनी हर विधा पर चलने लगी जो कभी थमने का नाम ही नहीं ले सकी। इनका रचना कार्य कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी, समीक्षा, सम्पादन एवं पत्रकारिता आदि विविध विधाओं से जुड़े रहे। इन सभी विधाओं से सम्बन्धित उनकी लगभग 60 कृतियाँ आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं।
डॉ. विवेकी राय अनेक पुरस्कारों एवं मानद उपाधियों से सम्मानित किये गये थे। डॉ. राय ने हिंदी के साथ ही भोजपुरी साहित्य जगत में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उन्होंने आंचलिक उपन्यासकार के रूप में ख्याति अर्जित की।

आज उनकी कव‍िता पोखरा पढ़‍िए- 

1. 

राज भरपूर बा

नॉव मसहूर बा

काहे तू उदास पोखर

काहे मजबूर बा ?

तोहके बन्हावल केहू, तोहके सॅवारल केहू

हियरा क सुन्नर सपना, तोहके उरेहल केहू।

‘सरगे क सीढ़ी सोझे’ सोचि के बनावल केहू

तोहरा के देखि-देखि नैनवा जुरावल केहू।

आजू तोहर दाही ना, केहू तोहार मोही ना,

बाति-बीति गइली भइया, केहू तोरे छोही ना।

टूटलना जवानी जइसे सीढी छितराइल बाड़ी।

बेकसी गरीबी कादो भारी भहराइल बाड़ी।

पॉव का बेवाई अइसन फाटल दरार बाड़े

देखि नाहिं जाला हाय, उठती बजार बाड़े।

पोखरा के नाकि लट्ठा लाजे झुकि गइले

बरुजी बेचारी सारी चीख के चटकि रे गइली।


2

फोरी के पलस्तर पाजी जामि गइले झाड़-झारी

कॉटा फहरवले दखिन ओरी भगभाँड़ भारी

काल मरकीलवना ईंट-ईंट के उघरले बाड़े

पोखरा चिअरले दाँत मुँह करीखवले बाडे़

जूग बीति गइले सूने तुलसी के चउरा बाड़े

खाँची भर पसरल फइलल घूर बा, गन्हउरा बाड़े

रंग उड़ि गइले बाकी तनले सिवाला बा

आसनी बिछली मकरी कोने-कोने जाला बा

भीतर से सालेवाला भारी-भारी काँटा बा

झंखे लखरउआँ ठाढ़े सूने सूना भींडा बा

कुहुकेले कबहीं-कबहीं कारी कोइलरि निरदइया

ठनकेले कबहीं-कबहीं गइया चरवहवा भइया

फूल पर किरिनिया कबहीं घूँघरू बजावत आवे

रनिया बसन्ती कबहीं बेनिया डोलावति आवे

सभके द तरी तू

जरि घरी-घरी तू

दुनिया धधाइलि तोहार

दिल्ली बड़ी दूर बा।

- प्रस्तुत‍ि अलकनंदा स‍िंंह 


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