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Sunday, 26 September 2021

अवधी भाषा के कव‍ि पढ़ीस जी, पढ़‍िए उनकी ये अनमोल कव‍ितायें


 आज कवि एवम् गद्यकार बलभद्र प्रसाद दीक्षित उर्फ “पढ़ीस” जी का जन्मदिन है। 25 सितम्बर 1898 को ग्राम अम्बरपुर, सीतापुर, उत्तर प्रदेश में जन्‍मे पढ़ीस जी का न‍िधन 09 जनवरी 1943 को हुआ था। 

अवधी भाषा में कविताओं के अलावा उन्होंने हिंदी में कई कहानियों का भी सृजन किया। 

अगर आपके पास समय है तो पढ़ीस जी कि ‘क्या से क्या’, ‘चमार भाई’, ‘कंगले’, ‘कांग्रेसी भाई’, ‘काजी साहब’ कहानियाँ पढ़ डालिए। पढ़ने पर स्पष्ट हो जाएगा कि जिस लेखक को सिर्फ एक लोकभाषा का कवि जानकर साहित्य रसिको ने जिनकी उपेक्षा की वो दरअसल सामाजिक मतभेद, छुआछूत, साम्राज्यवाद के काल प्रबल आलोचक व हिन्दू - मुस्लिम एकता, समता व किसान हितों के प्रबल पक्षधर थे।

फरवरी सन् 1937 से लेकर मार्च 38 के बीच “पढ़ीस” जी के कुछ बालमनोवैज्ञानिक लेखों की श्रंखला उस जमाने की चर्चित पत्रिका “माधुरी” में छपी, जिसे वे “बच्चो के बाप” शीर्षक पुस्तक में संग्रहित कराना चाहते थे जो कि उनके जीवन तो क्या ? आज तक सफल नहीं हो सकी।

इनके कविता संग्रह “चकल्लस” की भूमिका स्वयं “महाप्राण निराला” ने लिखी थी।

निराला जी और पढ़ीस जी परम मित्र थे। निराला जी द्वारा लिखित चकल्लस की भूमिका की अंतिम पंक्तियाँ...

पुस्तक के पाठ से स्मरण हो आया ------- “वयं शस्त्रान्वेषणे हता:। मधुकर, त्वं खलु कृती।”


लीज‍िये पढ़‍िए "पढ़ीस" जी की पांच अवधी कव‍िताऐं - 

1.  कयिसी चकल्लस आई!


अब च्यातउ (सजग हो) कढ़िले काका, बिथरे कर पुरला झारउ!

जंगल की डुँड़ी-डँगरी, बाड़ी तक पूँछ उठायिनि!

अँउँघानी आँखी ख्वालउ,

अब बड़ी चकल्लस आई।

द्याखउ तउ तनुकु उकसि कयि, दुनिया कस पल्टा खायिस,

उयि लाटि [लाट साहब] कमहटर[कमांडर] बच्चा, खरगू ते खीस निप्वारयिं!

जब हमका बेदु पढ़ावहिं,

तब बड़ी चकल्लस आई।

बड़कये काँग्रेस वाले, पहिंदे गज्जी के ज्वाड़ा,

तुम अपना का पहिंचान्यउ, तबहे तुमका पहिंचानिनि,

यहि पर कुछु स्वाचउ समुझउ,

तउ बड़ी चकल्लस आई।

द्यााखउ तउ को-को आवयि, यी खगई के ख्यातन मा

चकिया म्यलवारि न होई ? जो देयि किसनऊ झाँसा।

तुम चितवउ चारिउ कयिती,

तउ बड़ी चकल्लस आई।

सब अपने-अपने मन मा, हयिं बइठ बसंतु बनाए,

स्यावा का सोंगु[स्वाँग, नाटक] सजाये पउढ़े घर पर तनियाए।

तुम सबकी कलई ख्वालउ।

हो, बड़ी चकल्लस आई।

तुमरे टुकरन के ऊपर सब व्वार मचा लतिहाउजु[लत्तम-जूतम]

मुलु कोई कबहूँ जानिसि, यह किहिकी कयिसि तपस्या ?

सब हयि पढ़ीस के बच्चा,

बस बड़ी चकल्लस आई!


2.  
बउरे आँबन की डारन क्वयिली मदमहती[मदमस्त] बूँकयि लागी;
भँउरा फूलन का चूमि-चूमि झन्नायि उठे, भन्नाय लाग;
कटनासु बसन्ती ब्वालन पर गरगय्या ते अठिलायि लाग;
तुइ बड़ी चुवानि सयानि देखु,
आवा बसन्तु छावा बसन्तु!
कोई बनरा अस बना-ठना, जानउ जनवासे जाइ रहा,
जिरई चुन-गुन बिरवा किरवा तकु, बिहँसि उठे अगवानी का;
अधखिली कली कचनार, कुआँरी कन्या की आभा ओढ़े,
पूजयि लागीं, परिछयि लागीं,
आवा बसन्तु छावा बसन्तु!
फूलन की केसरि भरी बयारी, लपटि-लपटि लहँकयि[तीव्र होना] लागीं,
बेली फूलन के घूँघुट काढ़े, दुलहिन असि महकयि लागीं,
सहिंजन से हँसि-हँसि फूल झरयि, पछियउहा जब धक्का मारयि-
करूआ कस फूलि-फूलि गावयि,
आवा बसन्तु छावा बसन्तु!
दिनु अयिस मातदिल जान परयि, गरमी-सरदी का भेदु भूला,
स्वॅतियन[वर्षा का नक्षत्र-‘स्वाती’] का पानी जूड़-जूड़, चीख्ति मा कयिस नीक लागयि,
कथरी-गुदरी काने धरिकयि, चरवाह कंज गोली ख्यालयिं,
गंधरब[गायन कला पारंगत -‘गंधर्व’] अलापि बसन्तु रहे,
आवा बसन्तु छावा बसन्तु!
माह की उजेरी पाँचयि ते, डूँड़ि-डँगरिउ[बिना पूँछ की दुबली-पतली] कूदयि लागीं,
ह्वरिहार अरंडा गाड़ि-गाड़ि, फिर अण्टु-सण्टु अल्लायि लाग,
लरिका खुरपा के बेंटु अयिस, तउनउ कबीर चिल्लायि चले,
बाबा बुढ़वा बउरायि उठे,
आवा बसन्तु छावा बसन्तु!

3.  उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं? 
धरती पर जब ते पाउँ धरिनि, सुभ करमन का संहारू किहिनि,
उलटी-पलटी बुद्धि के सहारे, अपनयि मतु पहचारि दिहिनि;
कोई जो सूधे दिल ते ब्वाला, बड़े दिमागन झारि दिहिनि-
उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!
जो-नंगे भूखे परे रहीयँ, तिन का अउरउ नंगा किहनिनि;
जेतनी मरजादयि झंपी रहयि, बेदरदी से उधारि लिहिनिनि,
जबरन ते धक्का खायिनि तउ, निबरन के मुक्का जड़ि दिहिनिनि;
उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!
कोई की सुन्दरि बिटिया देखिनि, तुरतयि पाछे लागि लिहिनिद्ध
अपनिन से कउनु बात पूँछयि, उयि जहाँ चहिनि उधारू मारू खायिनि-
कुतवा ब्वकरा अस घुसे छहोरिन, मारिनि अउर मारू खायिनि-
उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!
हन्निन-भइँसन का मारिनि, ध्वाखा-धंधी मा, मचानु गाड़िनि!
ढुक्के-ढुक्के लुक्के लुक्के चुप्पे ते बाघु पछारि दिहिनि,
दूयिउ ते दउरि दहारि हिहिसिन तउ तंबा तकु तर कयि डारिनि;
उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!
तोबइ, बंबयि, जहरीली गैसयि, बड़ी-बड़ी ईजाद किहिनि,
बदरे चढ़ि कयि, पिरथी पर डारिनि मानउ सक कुछु संघारिनि,
दिन-राति निहत्थे मनइन का जयिसी पायिनि तायिसि भूँजिनि;
उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!
साह्यब का हाथा-पइयाँ  ध्यरउ, द्याखउ असिलि बहादुरी जब,
खींसयि द्याखउ लूरखुरिया द्याखउ, अउर पालिसी द्याखउ अब;
उयि हत्या करयि क बड़े सिपाही, यिहि का मउका पावयिं तब
उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!

4. कयिस-कयिस कनवजिया ह‍उ? 

घर मा, बँभनन माँ, हिन्दुन मा, हिन्दुस्तानिन, संसार बीच
मरजाद का झंडा गाड़ि दिह्यउ, अब कयिस-कयिस कनवजिया हउ।
तुम बड़े पवित्र, पूर पण्डित, नस-नस मा दउरा असिल खून,
तुम खटकुल की खीसयि द्याखउ ? तुम अयिस बड़े कनवजिया हउ।
बहिनी, बिटिया कंगाल जाति की, तुमरे कारन पिसी जायि,
तुम सह्यब बने सभा मा भूल्यउ, कयिस, अयिस कनवजिया हउ।
पढ़ि-पढ़ि पूरे पथरा भे हउ, घर-घर मा जगुआ छायि रहा।
यी सयिति दिल्ली ते घाखति हयि, अयस बड़े कनवजिया हउ।
ध्वड़हा, उँटहा लदुआ किसान निज करमु करयि तउ तुम डहुँकउ,
अपनी बिरादरी का तूरति हउ, अयिस नीक कनवजिया हउ।
तुम दकियानूसी बतन भूल, देस-काल ते पाछे हउ,
तुम का गल्लिन का गिटई हँसती, अयिस खरे कनवजिया हउ।
तुम जस-जस चउका पर झगरय्उ, तस जाति बीच भमोलु भवा,
दादा, अब हे कुछु चेति जाउ, तुम कयिस कनवजिया हउ।

5.  चमारिनि 

फूले मटरा के म्याड़न पर, हम जोलिन ते ठलुहायि करति
निःचिंत जुवानि जगी नस-नस, जागे मन-हे-मन खिलति
वह चटकि चमारिन च्वाट करयि, कच ढिल्लन पर डिंगारूअयिसि-
सतजुग वाली।
वुयि साँची-सूधी बातयि वहि की, आपुइ रूपु बनयिं कविता-
जस उवति सुर्ज्ज-किरनन की कॉबी हिरदउॅ भीतर घुसि जायि,
बेजा दबावु पर तिलमिलायि का नागिनि असि फनु काढ़ि देयि;
को चितयि सकयि?
दुनिया के पाप-पुण्य की कयिंची का वुहिका का कतरिसि-ब्यउँतिसि?
‘तुइ अस न हँसे,’ ‘तुइ वसयि रहे’ मुरही बातन के तीख तीर;
अपने साथी बिरवा पर मानउ लता अयिसि लपिटायि रही-
तन ते - मन ते।
‘मइँ तुहि ते, तब तुई महिते हयि,’ जिहि के चमार का एकु कौल
दूनउ वारन के खुले क्यॅवाँरन की पियार की क्वठरी मा,
अंतरजामी बनि, आँखी मँूदे, लुकी - लुकउवरि खेलि रहे,
को छुइ पावयि ?
ब्यल्हरातयि आवा, हँसतयि पूछिसि, ‘के री, रोटी कहाँ धरी ?’
‘‘रूखी-सूखी, सिकहर मोरे छइला, मोरे साजन।’’
कहि आँखिन पर बइठारि लिहिस, धनु धूरि भवा, युहु धरमु देखि,
समुझवु कोई? 

प्रस्‍तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह



Sunday, 7 March 2021

''किसी का सत्य था, मैंने संदर्भ में जोड़ दिया'' ल‍िखने वाले अज्ञेय, पढ़‍िए उनकी और भी कव‍ितायें

आधुनिक साहित्य के शलाका-पुरुष, जिन्‍होंने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया। 

प्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय” का जन्‍म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला अंतर्गत कुशीनगर में हुआ था। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। बीएससी करके अंग्रेजी में एमए करते वक्‍त क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकड़े गये और वहाँ से फरार भी हो गए। सन् 1930 ई. के अन्त में पकड़ लिये गये। 1930 से 1936 तक का समय विभिन्न जेलों में कटा। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।

अज्ञेय ने गूढ़ कविताओं की रचना कर कविता में ‘दर्शन’ का रहस्य पैदा कर दिया। उनकी शब्द साधना ने हिंदी में कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ दिया। नई कविताओं में उनका योगदान काफी अहम है।

आज पढ़‍िए उनकी कुछ चुन‍िंदा कव‍ितायें ... 

नया कवि : आत्म-स्वीकार

किसी का सत्य था,

मैंने संदर्भ में जोड़ दिया ।

कोई मधुकोष काट लाया था,

मैंने निचोड़ लिया ।


किसी की उक्ति में गरिमा थी

मैंने उसे थोड़ा-सा संवार दिया,

किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था

मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया ।


कोई हुनरमन्द था:

मैंने देखा और कहा, 'यों!'

थका भारवाही पाया -

घुड़का या कोंच दिया, 'क्यों!'


किसी की पौध थी,

मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली।

किसी की लगाई लता थी,

मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली ।


किसी की कली थी

मैंने अनदेखे में बीन ली,

किसी की बात थी

मैंने मुँह से छीन ली ।


यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ:

काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ ?

चाहता हूँ आप मुझे

एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें ।

पर प्रतिमा--अरे, वह तो

जैसी आप को रुचे आप स्वयं गढ़ें ।

.......................

सत्य तो बहुत मिले

खोज़ में जब निकल ही आया

सत्य तो बहुत मिले ।


कुछ नये कुछ पुराने मिले

कुछ अपने कुछ बिराने मिले

कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले

कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले

कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले

कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।


कुछ ने लुभाया

कुछ ने डराया

कुछ ने परचाया-

कुछ ने भरमाया-

सत्य तो बहुत मिले

खोज़ में जब निकल ही आया ।


कुछ पड़े मिले

कुछ खड़े मिले

कुछ झड़े मिले

कुछ सड़े मिले

कुछ निखरे कुछ बिखरे

कुछ धुँधले कुछ सुथरे

सब सत्य रहे

कहे, अनकहे ।


खोज़ में जब निकल ही आया

सत्य तो बहुत मिले

पर तुम

नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम

मोम के तुम, पत्थर के तुम

तुम किसी देवता से नहीं निकले:

तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले

मेरे ही रक्त पर पले

अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती

मेरी अशमित चिता पर

तुम मेरे ही साथ जले ।


तुम-

तुम्हें तो

भस्म हो

मैंने फिर अपनी भभूत में पाया

अंग रमाया

तभी तो पाया ।


खोज़ में जब निकल ही आया,

सत्य तो बहुत मिले-

एक ही पाया ।


काशी (रेल में), 15 फरवरी, 1954

...................

चांदनी जी लो


शरद चांदनी बरसी

अँजुरी भर कर पी लो


ऊँघ रहे हैं तारे

सिहरी सरसी

ओ प्रिय कुमुद ताकते

अनझिप क्षण में

तुम भी जी लो ।


सींच रही है ओस

हमारे गाने

घने कुहासे में

झिपते

चेहरे पहचाने


खम्भों पर बत्तियाँ

खड़ी हैं सीठी

ठिठक गये हैं मानों

पल-छिन

आने-जाने


उठी ललक

हिय उमगा

अनकहनी अलसानी

जगी लालसा मीठी,

खड़े रहो ढिंग

गहो हाथ

पाहुन मन-भाने,

ओ प्रिय रहो साथ

भर-भर कर अँजुरी पी लो


बरसी

शरद चांदनी

मेरा अन्त:स्पन्दन

तुम भी क्षण-क्षण जी लो !

.......................

उड़ चल हारिल


उड़ चल हारिल लिये हाथ में

यही अकेला ओछा तिनका

उषा जाग उठी प्राची में

कैसी बाट, भरोसा किन का!


शक्ति रहे तेरे हाथों में

छूट न जाय यह चाह सृजन की

शक्ति रहे तेरे हाथों में

रुक न जाय यह गति जीवन की!


ऊपर ऊपर ऊपर ऊपर

बढ़ा चीर चल दिग्मण्डल

अनथक पंखों की चोटों से

नभ में एक मचा दे हलचल!


तिनका तेरे हाथों में है

अमर एक रचना का साधन

तिनका तेरे पंजे में है

विधना के प्राणों का स्पंदन!


काँप न यद्यपि दसों दिशा में

तुझे शून्य नभ घेर रहा है

रुक न यद्यपि उपहास जगत का

तुझको पथ से हेर रहा है!


तू मिट्टी था, किन्तु आज

मिट्टी को तूने बाँध लिया है

तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का

गुर तूने पहचान लिया है!


मिट्टी निश्चय है यथार्थ पर

क्या जीवन केवल मिट्टी है?

तू मिट्टी, पर मिट्टी से

उठने की इच्छा किसने दी है?


आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का

तू है दुर्निवार हरकारा

दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका

सूने पथ का एक सहारा!


मिट्टी से जो छीन लिया है

वह तज देना धर्म नहीं है

जीवन साधन की अवहेला

कर्मवीर का कर्म नहीं है!


तिनका पथ की धूल स्वयं तू

है अनंत की पावन धूली

किन्तु आज तूने नभ पथ में

क्षण में बद्ध अमरता छू ली!


ऊषा जाग उठी प्राची में

आवाहन यह नूतन दिन का

उड़ चल हारिल लिये हाथ में

एक अकेला पावन तिनका!


गुरदासपुर, 2 अक्टूबर, 1938

..................

दृष्टि-पथ से तुम जाते हो जब


दृष्टि-पथ से तुम जाते हो जब।

 

तब ललाट की कुंचित अलकों-

तेरे ढरकीले आँचल को,

तेरे पावन-चरण कमल को,

छू कर धन्य-भाग अपने को लोग मानते हैं सब के सब।


मैं तो केवल तेरे पथ से

उड़ती रज की ढेरी भर के,

चूम-चूम कर संचय कर के

रख भर लेता हूँ मरकत-सा मैं अन्तर के कोषों में तब।


पागल झंझा के प्रहार सा,

सान्ध्य-रश्मियों के विहार-सा,

सब कुछ ही यह चला जाएगा-

इसी धूलि में अन्तिम आश्रय मर कर भी मैं पाऊँगा दब !


दृष्टि-पथ से तुम जाते हो जब।


दिल्ली जेल, दिसम्बर, 1931.

प्रस्तुत‍ि : अलकनंदा स‍िंंह 

Friday, 15 January 2021

तुर्की के क्रांतिकारी कवि नाज़िम हिकमत की 118वीं जन्मतिथि, उनकी कुछ कव‍ितायें (अनूद‍ित ) पढ़‍िए-


 तुर्की के महान क्रांतिकारी कवि नाज़िम हिकमत की आज 118वीं जन्मतिथि है. उनका जन्म 15 जनवरी 1902 को तत्कालीन ऑटोमन साम्राज्य के सालोनिका में हुआ था. 3 जून 1963 को मास्को में उनकी मृत्यु हुई. उन्होंने अपनी ज़िंदगी का लंबा अर्सा जेल में बिताया. जेल में रहते हुए उन्होंने कई कविताएं लिखी थीं. नाज़िम को रूमानी विद्रोही कहा जाता था क्योंकि वो कहीं रूमानी तो कहीं विद्रोही और कहीं दार्शनिक नज़र आते हैं. नाज़िम की कविताओं में ज़िंदगी और विद्रोह एक साथ दिखता है. यहां पेश है उनकी एक कविता जिसमें उनके तेवर और ज़िंदगी का फलसफा नज़र आता है-

जीने के लिए मरना

जीने के लिए मरना
ये कैसी स‍आदत है
मरने के लिए जीना
ये कैसी हिमाक़त है

अकेले जीओ
एक शमशाद तन की तरह
और मिलकर जीओ
एक बन की तरह। 

यह नाज़िम हिकमत की पहली कविता है, जो उन्होंने तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक मुस्तफ़ा सुबही और उनके चौदह साथियों की स्मृति में 1921 में लिखी थी, जिन्हें 28 जनवरी 1921 को तुर्की के बन्दरगाह ’त्रापेजुन्द’ के क़रीब काले सागर में डुबकियाँ दे-देकर मार डाला गया था।


मेरी छाती पर लगे हैं पन्द्रह घाव

पन्द्रह चाकू

हत्थों तक घुसा दिए गए मेरी छाती में


पर धड़क रहा है

और धड़केगा दिल

 बन्द नहीं हो सकती उसकी धड़कन !


मेरी छाती पर हैं पन्द्रह घाव

और उनके चारों ओर घोर काला अन्धेरा

काले सागर का पानी

लिपटा है उनके चारों तरफ़

चिकने साँपों की तरह कुण्डलाकार


वे मेरा दम घोंट देंगे

मेरे ख़ून से रंग देंगे

काले जल को


मेरी छाती में आ घुसे हैं पन्द्रह छुरे

लेकिन फिर भी धड़क रहा है दिल

 मेरी छाती के भीतर !


मेरी छाती पर लगे हैं पन्द्रह घाव

पन्द्रह बार बेधा गया मेरा सीना

सोचते रहे वे कि छेद दिया दिल

लेकिन धड़कता रहा वह

बन्द नहीं होगी धड़कन !


मेरी छाती में जला दिए पन्द्रह अलाव

तोड़ दिए पन्द्रह चाकू मेरी छाती में

लेकिन दिल है कि धड़क रहा है

 लाल पताका की तरह

धड़केगा, धड़कता रहेगा

 बन्द नहीं होगी धड़कन !


1921

रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय 

कचोटती स्वतन्त्रता 

तुम खर्च करते हो अपनी आँखों का शऊर,

अपने हाथों की जगमगाती मेहनत,

और गूँधते हो आटा दर्जनों रोटियों के लिए काफ़ी

मगर ख़ुद एक भी कौर नहीं चख पाते,

तुम स्वतन्त्र हो दूसरों के वास्ते खटने के लिए

अमीरों को और अमीर बनाने के लिए

तुम स्वतन्त्र हो ।


जन्म लेते ही तुम्हारे चारों ओर

वे गाड़ देते हैं झूठ कातने वाली तकलियाँ

जो जीवनभर के लिए लपेट देती हैं

तुम्हें झूठ के जाल में ।

अपनी महान स्वतन्त्रता के साथ

सिर पर हाथ धरे सोचते हो तुम

ज़मीर की आज़ादी के लिए तुम स्वतन्त्र हो ।


तुम्हारा सिर झुका हुआ मानो आधा कटा हो

गर्दन से,

लुंज-पुंज लटकती हैं बाँहें,

यहाँ-वहाँ भटकते हो तुम

अपनी महान स्वतन्त्रता में,

बेरोज़गार रहने की आज़ादी के साथ

तुम स्वतन्त्र हो ।


तुम प्यार करते हो देश को

सबसे क़रीबी, सबसे क़ीमती चीज़ के समान ।

लेकिन एक दिन, वे उसे बेच देंगे,

उदाहरण के लिए अमेरिका को

साथ में तुम्हें भी, तुम्हारी महान आज़ादी समेत

सैनिक अड्डा बन जाने के लिए तुम स्वतन्त्र हो ।

तुम दावा कर सकते हो कि तुम नहीं हो

महज़ एक औज़ार, एक संख्या या एक कड़ी

बल्कि एक जीता-जागते इन्सान

वे फौरन हथकड़ियाँ जड़ देंगे

तुम्हारी कलाइयों पर ।

गिरफ़्तार होने, जेल जाने

या फिर फाँसी चढ़ जाने के लिए

तुम स्वतन्त्र हो ।


नहीं है तुम्हारे जीवन में लोहे, काठ

या टाट का भी परदा,

स्वतन्त्रता का वरण करने की कोई ज़रूरत नहीं :

तुम तो हो ही स्वतन्त्र ।

मगर तारों की छाँह के नीचे

इस क़िस्म की स्वतन्त्रता कचोटती है ।

जीने के लिए मरना (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा अनूद‍ित) 


जीने के लिए मरना

ये कैसी स‍आदत है

मरने के लिए जीना

ये कैसी हिमाक़त है


अकेले जीओ

एक शमशाद तन की तरह

अओर मिलकर जीओ

एक बन की तरह

हमने उम्मीद के सहारे

टूटकर यूँ ही ज़िन्दगी जी है

जिस तरह तुमसे आशिक़ी की है।

- Alaknand singh 


Sunday, 17 November 2019

कवयित्री रश्मिरेखा की दो कव‍ितायें

प्रख्यात कवयित्री डॉ. रश्मिरेखा का शुक्रवार देर रात ब‍िहार में मुजफ्फरपुर के रामबाग स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। उक्त रक्तचाप के कारण ब्रेन हेमरेज हुआ और उन्होंने तुरंत दम तोड़ दिया। 64 वर्षीया डॉ. रश्मिरेखा के निधन की खबर मिलते ही साहित्यकारों व कवियों में शोक की लहर दौड़ गई। 28 नवंबर को रश्मिरेखा के पुत्र की शादी थी। घर में उत्सवी माहौल था। वह अपने पीछे पति डॉ. अवधेश कुमार, पुत्र डॉ. संकेत व पुत्री डॉ. प्राची समेत भरा पूरा परिवार छोड़ गई हैं। समकालीन कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर डॉ. रश्मिरेखा आलोचना के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्तर पर जानी जाती थीं।
आज पढ़‍िए उनकी ये दो रचनायें-
झोला
नहीं जानती किन छोटी-मोटी जरूरतों के तहत
आविष्कार हुआ होगा झोले का
पहिये के बाद सृष्टि का सबसे बड़ा आविष्कार
समय की फिसलन से कुछ चीज़े बचा लेने की
इच्छाओं ने मिल -जुल कर रची होगी शक्ल झोले की
पर इससे पहले बनी होगी गठरियौ
कुछ सौगात अपनों के लिए
बांध लेने की ख्वाहिश में
उम्र के बहाव में पीछा करते एहसास
मुश्किलें आसन करने के कुछ आसन नुस्ख़े
अपनों के लिए बचाने की खातिर ही
बनी होगी तह-दर-तह
चेहरे पर झुर्रियो की झोली
जिसे बाँट देना चाहता होगा हर शख्स
जाने से पहले
कि बची रह सके उसके छाप और परछाईं
कुछ लेने के लिए भी तो चाहिए झोले
घर में एक के बाद एक आते है दूसरे नए-नए झोले
कभी-कभी सिर्फ़ अपने लिए बनते है ये
दिल की भीतरी तहों में
हर झोले में होते है चीज़ो के अलग महीन अर्थ
लिपि बनने को आतुर रेखाऍ
शिल्प में ढलने को मचलती आकृतियाँ
जागते हुए सपने देखने की कला
दरअसल इसी में फंसा होता है हमारा चेहरा।
…………..
मां
अंत:सलिला हो तुम मेरी माँ
ऊपर-ऊपर रेत
भीतर-भीतर शीतल जल
रेत भी कैसी स्वर्ण मिली
जिन्हें अलग करना संभव नहीं
अक्सर जब चाहा है
उसे कुरेदने पर
पाया हैं वह सब कुछ
जिसकी ज़रूरत होती है
अपनी जड़ों से कट कर जीने को विवश
तुम्हारी बेटी को
पिता से सीखा था सपनों में रंग भरना
पर जाना तुमसे
कैसे चलना है खुरदुरी जमींन पर
तुम संतुलित करती रहीं लगातार
दुनिया के अपने तीखे अनुभवों और
तपती रेत के इतिहास द्वारा
बहुत कुछ पाकर
बहुत कुछ खोकार
आधी-अधूरी बनी रह कर भी माँ
इंगित करती रही दिशाओं की ओर
सिखाती रही जूझना
समय ने वैसा नहीं बनने दिया
जैसा चाहती थी तुम हमें गढ़ना
पर अनंत जिजीविषा से भरी मेरी माँ
तुम्हारी आँखें तो भविष्य पर रहती हैं
शायद इसीलिये
तुम्हारी सोच में अब
हम नहीं हमारे आकार लेते बच्चे हैं।
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