Monday, 25 November 2019

हिंदुस्‍तान को जानने के लिए नज़ीर को जानना होगा

जैसा कि नाम से जाहिर होता है भारतीय उर्दू शायर नज़ीर बनारसी का जन्‍म 25 नवम्बर 1909 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की पांडे हवेली मदपुरा में हुआ था।
एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…
‘‘न जाने इस जमाने के दरिन्दे
कहां से उठा लाए चेहरा आदमी का’’
इसके बावजूद नज़ीर ताकीद करते हुए कहते हैं-
‘‘वहां भी काम आती है मोहब्बत
जहां नहीं होता कोई किसी का’’
अपनी कहानी अपनी जुबानी में खुद नज़ीर कहते हैं, ‘‘मैं जिन्दगी भर शान्ति, अहिंसा, प्रेम, मुहब्बत आपसी मेल मिलाप, इन्सानी दोस्ती, आपसी भाईचारा…. राष्ट्रीय एकता का गुन आज ही नहीं 1935 से गाता चला आ रहा हूं।
मेरी नज्में हो गजलें, गीत हो या रूबाईयां….. बरखा रुत हो या बस्त ऋतु, होली हो या दीवाली, शबे बारात हो या ईद, दशमी हो या मुहर्रम इन सबमें आपको प्रेम, प्यार, मुहब्बत, सेवा भावना, देशभक्ति ही मिलेगी। मेरी सारी कविताओं की बजती बांसुरी पर एक ही राग सुनाई देगा वह है देशराग…..मैंने अपने सारे कलाम में प्रेम प्यार मुहब्बत को प्राथमिकता दी है।
हालात चाहे जैसे भी रहे हो, नज़ीर ने उसका सामना किया, न खुद बदले और न अपनी शायरी को बदलने दिया। कहीं आग लगी तो नज़ीर की शायरी बोल उठी-
‘‘अंधेरा आया था, हमसे रोशनी की भीख मांगने
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?’’
गंगो जमन, जवाहर से लाल तक, गुलामी से आजादी तक, चेतना के स्वर, किताबे गजल, राष्ट्र की अमानत राष्ट्र के हवाले आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
घाट किनारे मन्दिरों के साये में बैठ कर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नज़ीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसे ढला-
‘‘बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी,
मन्दिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी,
जब चांदनी रातों में हम-तुम गंगा किनारे होते थे।”
नज़ीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संर्कीण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नज़ीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिंदुस्‍तान को जानना चाहते हैं तो हमें नजीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेष सरीखे शायर ने कैसे हिंदुस्‍तान की साझी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते हैं। उनके लफ्जों में कहें तो…
‘‘जिन्दगी एक कर्ज है, भरना हमारा काम है,
हमको क्या मालूम कैसी सुबह है, शाम है,
सर तुम्हारे दर पे रखना फर्ज था, सर रख दिया,
आबरू रखना न रखना यह तुम्हारा काम है।”

Sunday, 17 November 2019

कवयित्री रश्मिरेखा की दो कव‍ितायें

प्रख्यात कवयित्री डॉ. रश्मिरेखा का शुक्रवार देर रात ब‍िहार में मुजफ्फरपुर के रामबाग स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। उक्त रक्तचाप के कारण ब्रेन हेमरेज हुआ और उन्होंने तुरंत दम तोड़ दिया। 64 वर्षीया डॉ. रश्मिरेखा के निधन की खबर मिलते ही साहित्यकारों व कवियों में शोक की लहर दौड़ गई। 28 नवंबर को रश्मिरेखा के पुत्र की शादी थी। घर में उत्सवी माहौल था। वह अपने पीछे पति डॉ. अवधेश कुमार, पुत्र डॉ. संकेत व पुत्री डॉ. प्राची समेत भरा पूरा परिवार छोड़ गई हैं। समकालीन कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर डॉ. रश्मिरेखा आलोचना के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्तर पर जानी जाती थीं।
आज पढ़‍िए उनकी ये दो रचनायें-
झोला
नहीं जानती किन छोटी-मोटी जरूरतों के तहत
आविष्कार हुआ होगा झोले का
पहिये के बाद सृष्टि का सबसे बड़ा आविष्कार
समय की फिसलन से कुछ चीज़े बचा लेने की
इच्छाओं ने मिल -जुल कर रची होगी शक्ल झोले की
पर इससे पहले बनी होगी गठरियौ
कुछ सौगात अपनों के लिए
बांध लेने की ख्वाहिश में
उम्र के बहाव में पीछा करते एहसास
मुश्किलें आसन करने के कुछ आसन नुस्ख़े
अपनों के लिए बचाने की खातिर ही
बनी होगी तह-दर-तह
चेहरे पर झुर्रियो की झोली
जिसे बाँट देना चाहता होगा हर शख्स
जाने से पहले
कि बची रह सके उसके छाप और परछाईं
कुछ लेने के लिए भी तो चाहिए झोले
घर में एक के बाद एक आते है दूसरे नए-नए झोले
कभी-कभी सिर्फ़ अपने लिए बनते है ये
दिल की भीतरी तहों में
हर झोले में होते है चीज़ो के अलग महीन अर्थ
लिपि बनने को आतुर रेखाऍ
शिल्प में ढलने को मचलती आकृतियाँ
जागते हुए सपने देखने की कला
दरअसल इसी में फंसा होता है हमारा चेहरा।
…………..
मां
अंत:सलिला हो तुम मेरी माँ
ऊपर-ऊपर रेत
भीतर-भीतर शीतल जल
रेत भी कैसी स्वर्ण मिली
जिन्हें अलग करना संभव नहीं
अक्सर जब चाहा है
उसे कुरेदने पर
पाया हैं वह सब कुछ
जिसकी ज़रूरत होती है
अपनी जड़ों से कट कर जीने को विवश
तुम्हारी बेटी को
पिता से सीखा था सपनों में रंग भरना
पर जाना तुमसे
कैसे चलना है खुरदुरी जमींन पर
तुम संतुलित करती रहीं लगातार
दुनिया के अपने तीखे अनुभवों और
तपती रेत के इतिहास द्वारा
बहुत कुछ पाकर
बहुत कुछ खोकार
आधी-अधूरी बनी रह कर भी माँ
इंगित करती रही दिशाओं की ओर
सिखाती रही जूझना
समय ने वैसा नहीं बनने दिया
जैसा चाहती थी तुम हमें गढ़ना
पर अनंत जिजीविषा से भरी मेरी माँ
तुम्हारी आँखें तो भविष्य पर रहती हैं
शायद इसीलिये
तुम्हारी सोच में अब
हम नहीं हमारे आकार लेते बच्चे हैं।

Saturday, 9 November 2019

ड्रॉइंग रूम में बैठकर नहीं गढ़ी जातीं धूम‍िल जैसी कव‍ितायें

बड़ी बड़ी ड‍िग्र‍ियां हास‍िल कर लेना अच्छी कव‍िता गढ़ने से ब‍िल्कुल ही अलग है तभी तो सुदामा पाण्डेय धूम‍िल जैसे कव‍ि हमें ये रहस्य बताने को पैदा होते हैं क‍ि कव‍िता उच्चश‍िक्ष‍ितों की बपौती नहीं है। क‍िसी कव‍िता को क‍ितनी गहराई से गढ़ते रहे धूम‍िल यह तो उनकी कुछ रचनायें पढ़कर ही मालूम हो जाएगा। आज यान‍ि 9 नवंबर उनकी जन्म त‍िथ‍ि है , धूमिल का जन्म 9 नवंबर 1936 को वाराणसी में हुआ था। वे अपनी क्रांतिकारी और प्रतिरोधी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। आप उन्हें हिंदी कविता के ‘यंग एंग्री मैन’ कह सकते हैं –
शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।
लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ हिंदी की समकालीन कविता के दौर के मील के पत्थर हैं। उनकी कविताओं में आज़ादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। व्यवस्था, जिसने जनता को छला है, उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य है।
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ-
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।
‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’, ‘सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र’, उनके काव्य संग्रह हैं। 60 के बाद के दशक में हिंदी कविता के फलक पर धूमिल प्रमुखता से उभरकर सामने आते हैं। 10 फरवरी 1975 हिंदी के इस क्रांतिकारी कवि की ब्रेन ट्यूमर से मौत हो गई। उनके जीवन काल में एक ही काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ प्रकाशित हो सका, ‘कल सुनना मुझे’ का प्रकाशन तो उनके निधन के बाद ही संभव हो सका। 1979 में उन्हें मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया।
मैंने पहली बार महसूस किया है
कि नंगापन
अन्धा होने के खिलाफ़
एक सख़्त कार्यवाही है
उस औरत की बगल में लेटकर
मुझे लगा कि नफ़रत
और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार
साबित हो चुकी हैं और पिघले हुए
शब्दों की परछाईं
किसी खौफ़नाक जानवर के चेहरे में
बदल गयी है, मेरी कविताएँ
अँधेरा और कीचड़ और गोश्त की
खुराक़ पर ज़िन्दा है।
उनकी कविताओं में आक्रामकता है, व्यवस्था का विरोध है। धूमिल अपनी रचनाओं में एक ऐसी काव्य भाषा की इजाद करते हैं जो नई कविता के दौर की काव्य- भाषा की रुमानियत और अतिशय कल्पनाशीलता से मुक्त है। उनकी भाषा सहज और सरल है लेकिन कहन शैली में विद्रोह साफ तौर पर झलकता है –
उसकी सारी शख़्सियत
नखों और दाँतों की वसीयत है
दूसरों के लिए
वह एक शानदार छलांग है
अँधेरी रातों का
जागरण है, नींद के ख़िलाफ़
नीली गुर्राहट है
अपनी आसानी के लिए तुम उसे
कुत्ता कह सकते हो
उस लपलपाती हुई जीभ और हिलती हुई दुम के बीच
भूख का पालतूपन
हरकत कर रहा है
उसे तुम्हारी शराफ़त से कोई वास्ता
नहीं है, उसकी नज़र
न कल पर थी
न आज पर है
सारी बहसों से अलग
वह हड्डी के एक टुकड़े और
कौर-भर (सीझे हुए) अनाज पर है।
धूमिल अपनी कविताओं के माध्यम से उन तमाम शोषितों और वंचितों को आवाज़ देते हैं, जो आज भी अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं –
‘ठीक है, यदि कुछ नहीं तो विद्रोह ही सही’
हँसमुख बनिए ने कहा-
‘मेरे पास उसका भी बाज़ार है’
मगर आज दुकान बन्द है, कल आना
आज इतवार है। मैं ले लूँगा।
इसे मंच दूँगा और तुम्हारा विद्रोह
मंच पाते ही समारोह बन जाएगा
फिर कोई सिरफिर शौक़ीन विदेशी ग्राहक
आएगा। मैं इसे मुँहमाँगी क़ीमत पर बेचूँगा।
मैं होटल के तौलिया की तरह
सार्वजनिक हो गया हूँ
क्या ख़ूब, खाओ और पोंछो,
ज़रा सोचो,
यह भी क्या ज़िन्दगी है
जो हमेशा दूसरों के जूठ से गीली रहती है।
कटे हुए पंजे की तरह घूमते हैं अधनंगे बच्चे
गलियों में गोलियाँ खेलते हैं
मगर अव्वल यह कि
देश के नक़्शे की लकीरें इन पर निर्भर हैं
और दोयम यह कि
न सही मुझसे सही आदमी होने की उम्मीद
मगर आज़ादी ने मुझे यह तो सिखलाया है
कि इश्तहार कहाँ चिपकाना है
और पेशाब कहाँ करना है
और इसी तरह ख़ाली हाथ
वक़्त-बेवक़्त मतदान करते हुए
हारे हुओं को हींकते हुए
सफलों का सम्मान करते हुए
मुझे एक जनतान्त्रिक मौत मरना है।

Friday, 8 November 2019

Jaun elia… वो शख़्स ज‍िसे खुद को तबाह करने का मलाल नहीं रहा

Jaun elia की शायरी में उनकी छलकती हुई संवेदनाएं हैं, वो जो भी हैं, जैसे भी हैं अपने जैसे हैं। दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक संभ्रांत परिवार में जौन ने जन्म लिया। जौन का इंतकाल आज ही के द‍िन यान‍ि  8 नवंबर, 2002 को हुआ।
Jaun elia यानी ऐसा नाम, कौतूहल जिनके नाम के साथ ही शुरू हो जाता है। अमरोहा में जन्मे,विभाजन के बाद भी दस साल तक भारत में रहे और फिर कराची चले गए। उसके बाद दुबई भी गए। संवाद शैली में,आसान शब्दों में,लगभग हर विषय पर नज्म या ग़ज़ल कह सकने वाले … मन के उलझे हुए तारों के गुंजलक को बड़ी सादगी के साथ सुलझाने वाले जौन मौत के बाद और भी अधिक मश्हूर हुए। उनकी गजलों पर दो किताबें देवनागरी में सामने आई हैं।
हिंदी जानने पढ़ने वालों को भी इस शायर के पास हर एहसास की ग़ज़लें दिखी हैं। नौजवान हों या बुजुर्ग, जॉन को सब पसंद करते हैं। उनका सोचने और कहने का ढंग लगभग सभी शायरों से अलग है। अब दौर यह है कि सोशल मीडिया पर जॉन अहमद फरा़ज और ग़ालिब से भी अधिक लोकप्रिय दिखते हैं।
14 दिसंबर 1931 को अमरोहा में जन्मे एलिया अब के शायरों में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले शायरों में शुमार हैं।’शायद’,’यानी’,’गुमान’,’लेकिन’ और गोया’ प्रमुख संग्रह हैं। इनकी मृत्यु 8 नवंबर 2004 को हुई। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें 2000 में प्राइड ऑफ परफार्मेंस अवार्ड भी दिया था। उन्‍हें अब तक सहज शब्‍दों में कठिन बात करने वाला,अजीब-ओ-गरीब जिंदगी जीने वाला,मंच पर ग़ज़ल पढ़ते हुए विभिन्‍न मुद्राएं बनाने वाला शायर ही माना गया है,लेकिन जॉन को अभी और बाहर आना है।
वह केवल रूमान के शायर नहीं थे,उनकी निजी जिंदगी जितनी भी दुश्‍वार क्‍यों न रही हो,वह ऐसे शायर हैं जिन्‍हें हर पीढ़ी पढ़ती है।
उनकी दो ग़ज़लेंं-   

रूह प्यासी कहाँ से आती है
ये उदासी कहाँ से आती है
दिल है शब दो का तो ऐ उम्मीद
तू निदासी कहाँ से आती है
शौक में ऐशे वत्ल के हन्गाम
नाशिफासी कहाँ से आती है
एक ज़िन्दान-ए-बेदिली और शाम
ये सबासी कहाँ से आती है
तू है पहलू में फिर तेरी खुशबू
होके बासी कहाँ से आती है।
2. 
तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं
बस सर- ब-सर अज़ीयत-ओ-आज़ार ही रहो
बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम
जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो
तुम को यहाँ के साया-ए-परतौ से क्या ग़रज़
तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो
मैं इब्तदा-ए-इश्क़ में बेमहर ही रहा
तुम इन्तहा-ए-इश्क़ का मियार ही रहो
तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई
इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो
मैंने ये कब कहा था के मुहब्बत में है नजात
मैंने ये कब कहा था के वफ़दार ही रहो
अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिये
बाज़ार-ए-इल्तफ़ात में नादार ही रहो।
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