Sunday, 22 October 2017

‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’

अदम गोंडवी के जन्‍मदिन पर उनकी poem
आज अदम गोंडवी का जन्‍मदिन है इस अवसर पर उनकी poem ‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’ की बात ना की जाए यह कैसे हो सकता है.
सामाजिक आलोचना के प्रखर कवि अदम गोंडवी की आज 22 अक्‍तूबर को जन्‍मदिन  है. इस मौके पर पेश है उनकी सबसे चर्चित poem, ‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको.’ 
यह कविता एक दलित युवती की कहानी है जिसे सवर्णों के अत्याचार का शिकार होने के बाद भी हमारा सामाजिक ढांचा न्याय नहीं दिला पाता. आइए, एक कड़वे सच से रूबरू हों.
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें
बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो।
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिेंह

Saturday, 23 September 2017

एक श्रृद्धांजलि: याचना


आज रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्‍म दिन है तो लीजिए  पढ़िए उनकी ये रचना जो उनकी 'रेणुका' से ली गई है जिसे दिनकर ने १९३४ में लिखा था -

याचना / रामधारी सिंह "दिनकर"

प्रियतम! कहूँ मैं और क्या?
शतदल, मृदुल जीवन-कुसुम में प्रिय! सुरभि बनकर बसो।
घन-तुल्य हृदयाकाश पर मृदु मन्द गति विचरो सदा।
प्रियतम! कहूँ मैं और क्या?


दृग बन्द हों तब तुम सुनहले स्वप्न बन आया करो,
अमितांशु! निद्रित प्राण में प्रसरित करो अपनी प्रभा।
प्रियतम! कहूँ मैं और क्या?

उडु-खचित नीलाकाश में ज्यों हँस रहा राकेश है,
दुखपूर्ण जीवन-बीच त्यों जाग्रत करो अव्यय विभा।
प्रियतम! कहूँ मैं और क्या?

निर्वाण-निधि दुर्गम बड़ा, नौका लिए रहना खड़ा,
कर पार सीमा विश्व की जिस दिन कहूँ ‘वन्दे, विदा।’
प्रियतम! कहूँ मैं और क्या?



Thursday, 31 August 2017

नाज सच्चे इश्‍क पर है, हुनर का दावा नहीं... मेरा इर्फाने-कलम सालक ही कोई पाएगा

बादलों से लेकर चांद पर अपने शब्‍दों  के दस्‍तखत करने वाली अमृता प्रीतम 31 अगस्‍त को ही जन्‍मी थीं और  आज ही यानि 31 अगस्‍त को मेरी बेटी का भी जन्‍म दिन है...शायद इसीलिए मुझे अब और भी प्रिय लगती हैं अमृता जी...

लीजिए मेरी प्रिय कवियत्री की 5 कविताओं को पढ़िए------

अमृता बेहद भावुक थीं, लेकिन उतनी ही खूबसूरती के साथ उन्हें अपनी भावनाओं और रिश्तों के बीच सामंजस्य बिठाना आता था। आजीवन उन्होंने साहिर से प्रेम किया, दो बच्चे कि मां बनी। साहिर कि मुहब्बत दिल में होने के कारण शादी- शुदा जीवन से बाहर निकलने का फैसला लिया और फिर साहिर ने भी उन्हें छोड़ दिया, लेकिन फिर भी वह सम्मान के साथ  उस रिश्ते से अलग हो गईं।जीवन के आखिरी समय में सच्चा प्यार उन्हें इमरोज के रूप में मिला। उनकी जीवन के उतर- चढाव को उनकी आत्मकथा के रूप में लिखा गया, खुशवंत सिंह के सुझाव पर उनके जीवनी को रशीदी टिकट नाम दिया गया।

1. रोजी

नीले आसमान के कोने में
रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
सफ़ेद गाढ़ा धुआँ उठता हैाेें

सपने — जैसे कई भट्टियाँ हैं
हर भट्टी में आग झोंकता हुआ
मेरा इश्क़ मज़दूरी करता है

तेरा मिलना ऐसे होता है
जैसे कोई हथेली पर
एक वक़्त की रोजी रख दे।

जो ख़ाली हँडिया भरता है
राँध-पकाकर अन्न परसकर
वही हाँडी उलटा रखता है

बची आँच पर हाथ सेकता है
घड़ी पहर को सुस्ता लेता है
और खुदा का शुक्र मनाता है।

रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
धुआँ इस उम्मीद पर निकलता है

जो कमाना है वही खाना है
न कोई टुकड़ा कल का बचा है
न कोई टुकड़ा कल के लिए है…

2. कुफ़्र

आज हमने एक दुनिया बेची
और एक दीन ख़रीद लिया
हमने कुफ़्र की बात की

सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी ली

आज हमने आसमान के घड़े से
बादल का एक ढकना उतारा
और एक घूँट चाँदनी पी ली

यह जो एक घड़ी हमने
मौत से उधार ली है
गीतों से इसका दाम चुका देंगे

3. मुकाम

क़लम ने आज गीतों का क़ाफ़िया तोड़ दिया
मेरा इश्क़ यह किस मुकाम पर आ गया है

देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे

जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी

उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी…

4.चुप की साज़िश

रात ऊँघ रही है…
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।

चोरों के निशान —
हर देश के हर शहर की
हर सड़क पर बैठे हैं
पर कोई आँख देखती नहीं,
न चौंकती है।
सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह
एक ज़ंजीर से बँधी
किसी वक़्त किसी की
कोई नज़्म भौंकती है।

5. आदि स्मृति

काया की हक़ीक़त से लेकर —
काया की आबरू तक मैं थी,
काया के हुस्न से लेकर —
काया के इश्क़ तक तू था।

यह मैं अक्षर का इल्म था
जिसने मैं को इख़लाक दिया।
यह तू अक्षर का जश्न था
जिसने ‘वह’ को पहचान लिया,
भय-मुक्त मैं की हस्ती
और भय-मुक्त तू की, ‘वह’ की

मनु की स्मृति
तो बहुत बाद की बात है…

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Wednesday, 5 April 2017

राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर

राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर बस वो ही कहना है
जो अनकहा रह जाए और अनकहा कह जाए
सुनो राम! सिया, शबरी, अहिल्‍या, सब तुम्‍हारी बाट जोहती हैं
आज भी ये सब कण कण में राम खोजती हैं।
गीध व्‍याध वानर को अब कौन गले लगाता है
करुणा, क्षमा, दया को बाजार में नित्‍य बेचा जाता है।

त्रेता से कलियुग की यात्रा बहुत कठिन रही होगी
अब बैठो राम किसी वन में छद्म भरा कलियुग देखो
नाम तुम्‍हारे बिकते , बाजारों में जोरशोर से
घर में मां-बाप-भाई के रिश्‍ते कैसे रिसते हैं देखो।

तुम्‍हारे नाम पर आज कितनों की रोजीरोटी ज़िंदा है
तुम्‍हारे नाम पर आज पूरे शहर-गांव-कस्‍बे में मेला है
सब पूजते हैं राम, कहां जानते हैं राम,नहीं मानते हैं राम
पाथर में ढूढ़कर तुम्‍हें पूजने वाले फिर भी कहां शर्मिदा हैं।

बस राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन इतना ही कहना है
क्षमा शील बन इनके व्‍यापारों को इतना मत उगने देना
कल हो जायें पाथर राम, राम को पाथर मत होने देना
राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर बस इतना ही अब कहना है।

बात अधूरी है मेरी फिर कभी बोलूंगी तुमसे
अभी जन्‍मदिन और मनाओ हे वनवासी राम
राजा रह कर मन में वन और वन में मन
व्‍याख्‍याओं से परे तुम्‍हें मुझे अपने मन में रखना है
बस राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन इतना ही कहना है।

-अलकनंदा सिंह

Sunday, 2 April 2017

'वेबलेंथ' का खेल

भावों के विशाल पर्वत पर, उगती
खिलती आकाश बेल चढ़ती-
कुछ हकीकतें और कुछ आस्‍था,
का मेल होती है मित्रता।

तय परिधियों के अरण्‍य में
ब्रह्म कमल सी एक बार खिलती
मन-सुगंध को अपनी नाभि में
समेटने का खेल होती है मित्रता।

स्‍त्री- पुरुष, पुरुष -स्‍त्री, स्‍त्री-स्‍त्री, पुरुष- पुरुष,
के सारे विभेद नापती,
अविश्‍वास से परे चलकर
'वेबलेंथ' का खेल होती है मित्रता

ये तेरा-मेरा, तुझमें-मुझमें,
अलग कहां, ये तो आत्‍मा से निकले,
रंगों से खेलती, उन्‍हें धूल में मिलाकर,
एक तस्‍वीर का शून्‍य उकेरती है मित्रता।

ये बंधन है पर खुला हुआ,
जो स्‍वतंत्रता की रक्षा में,
देह की देहरियों के पार आत्‍मा की,
आवाज की बात होती है मित्रता।

अपने मूल अर्थ और दृढ़ता के साथ,
समय की हथेलियों पर चलकर,
एक स्‍वयं से दूसरे स्‍वयं तक की यात्रा,
असीम यात्रा की मानिंद होती है मित्रता

ये मित्रता है...ये ही मित्रता है...हमारी,
हमारी जीभ पर घुलती सी होती है मित्रता ।

- अलकनंदा सिंह

Sunday, 26 February 2017

यूं आसमां न ताक...

यूं आसमां न ताक, ना नाप किसी परवाज को
कुछ परिंदे जमीं पर भी हैं,
जो अपनी आंखों में,
तेरी नज़र का आसमां सजाए बैठे हैं,

महसूस किया है कभी तुमने,
उस एक अनहद आसमां का ताप...
जो सतरंगी सा सुलग रहा है-
इनके परों से ढंके ठंडे पड़े सीनों में,

पर हैं सिले- भीगे हुए,...जकड़े हुए हैं अभी,
मगर यकीं है, एक दिन हठात्
अपनी सींवन उधेड़ लेंगे,
टांकों को भी ढीला कर लेंगे,

तब ये पर फैला कर परवज का दामन थामेंगे,
तब उन्‍हें चाहिए होगी तुम्‍हारी यही नज़र,
एक प्रेम और भरोसे की नज़र,
परवाज भरने को...,
अपने पर फैलाने को...,
तुम्‍हारी यही एक नज़र
उन्‍हें वजूद से मिला देगी,

हौसलों का आगाज़ अंजाम तक पहुंचेगा
तभी जब बचा कर रखो अपनी
ये गहरी नज़र...
उनके लिए...तबके लिए...।

-अलकनंदा सिंह

Friday, 24 February 2017

कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा

सृष्‍टि की खातिर शिव ने तब एक हलाहल पीया था,
अब एक हलाहल तुमको भी इसी तरह पीना होगा,

समरस सब होता जाए, निज और द्विज में फर्क मिटे,

आग्रह से अनाग्रह सब इसी तरह एक शून्‍य बनें ,

जीवन के अविरल तट तक पहुंचा दो सब तृष्‍णाओं को,

आस्‍तीनों के विषधरों को तुम्‍हें निजतन पै धारण करना होगा,

निश्‍चित कर लो इस रण के नियम- कि अब,
शीश उठाकर जीना है तो उन असुरों से लड़ना होगा,

जो छिपे हैं मन के कोनों में उन असुरों को बाहर करने को,
निज मन को विलोम में दौड़ाओ,
मन भीतर जिनका डेरा है, उन्‍हें त्‍याज्‍य अभी करना होगा,

धारण कर अब ‘त्रिशूल’ तुमको सृष्‍टि का शिव बनना होगा,
कालातीत को कालजयी कर काल-भाल पर मलना होगा।

कालजयी को अवसानों का भय कैसा, ये तो क्षणभर का तम है,
अंतहीन होता है वही जो स्‍वयं शिव सा सुंदरतम है,
ठीक समझ लो- फूल और कांटे दोनों ही शिव के अनन्‍य हैं

तो गरल उठा लो हर विरोध का, तुम सोना हो तो लपटों से भय क्‍या,
इसी आग से बाहर आकर तो तुमको शिव सा कुंदन बनना होगा।

- अलकनंदा सिंह
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