Saturday, 15 October 2022

कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' की पुण्‍यतिथि आज, पढ़िए उनकी रचना - कुकुरमुत्‍ता


 'निराला' भारतीय संस्कृति के द्रष्टा कवि हैं-वे गलित रूढ़ियों के विरोधी तथा संस्कृति के युगानुरूप पक्षों के उद्घाटक और पोषक रहे हैं पर काव्य तथा जीवन में निरन्तर रूढ़ियों का मूलोच्छेद करते हुए इन्हें अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा। मध्यम श्रेणी में उत्पन्न होकर परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से मोर्चा लेता हुआ आदर्श के लिए सब कुछ उत्सर्ग करने वाला महापुरुष जिस मानसिक स्थिति को पहुँचा, उसे बहुत से लोग व्यक्तित्व की अपूर्णता कहते हैं। पर जहाँ व्यक्ति के आदर्शों और सामाजिक हीनताओं में निरन्तर संघर्ष हो, वहाँ व्यक्ति का ऐसी स्थिति में पड़ना स्वाभाविक ही है। हिन्दी की ओर से 'निराला' को यह बलि देनी पड़ी। जागृत और उन्नतिशील साहित्य में ही ऐसी बलियाँ सम्भव हुआ करती हैं- प्रतिगामी और उद्देश्यहीन साहित्य में नहीं। 

पढ़िए उनकी रचना - कुकुरमुत्‍ता    


एक थे नव्वाब,
फ़ारस से मंगाए थे गुलाब।
बड़ी बाड़ी में लगाए
देशी पौधे भी उगाए
रखे माली, कई नौकर
गजनवी का बाग मनहर
लग रहा था।
एक सपना जग रहा था
सांस पर तहजबी की,
गोद पर तरतीब की।
क्यारियां सुन्दर बनी
चमन में फैली घनी।
फूलों के पौधे वहाँ
लग रहे थे खुशनुमा।
बेला, गुलशब्बो, चमेली, कामिनी,
जूही, नरगिस, रातरानी, कमलिनी,
चम्पा, गुलमेंहदी, गुलखैरू, गुलअब्बास,
गेंदा, गुलदाऊदी, निवाड़, गन्धराज,
और किरने फ़ूल, फ़व्वारे कई,
रंग अनेकों-सुर्ख, धनी, चम्पई,
आसमानी, सब्ज, फ़िरोज सफ़ेद,
जर्द, बादामी, बसन्त, सभी भेद।
फ़लों के भी पेड़ थे,
आम, लीची, सन्तरे और फ़ालसे।
चटकती कलियां, निकलती मृदुल गन्ध,
लगे लगकर हवा चलती मन्द-मन्द,
चहकती बुलबुल, मचलती टहनियां,
बाग चिड़ियों का बना था आशियाँ।
साफ़ राह, सरा दानों ओर,
दूर तक फैले हुए कुल छोर,
बीच में आरामगाह
दे रही थी बड़प्पन की थाह।
कहीं झरने, कहीं छोटी-सी पहाड़ी,
कही सुथरा चमन, नकली कहीं झाड़ी।
आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,
बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;
वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्ता
पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-
“अब, सुन बे, गुलाब,
भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!
कितनों को तूने बनाया है गुलाम,
माली कर रक्खा, सहाया जाड़ा-घाम,
हाथ जिसके तू लगा,
पैर सर रखकर वो पीछे को भागा
औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर,
तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर,
शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा
तभी साधारणों से तू रहा न्यारा।
वरना क्या तेरी हस्ती है, पोच तू
कांटो ही से भरा है यह सोच तू
कली जो चटकी अभी
सूखकर कांटा हुई होती कभी।
रोज पड़ता रहा पानी,
तू हरामी खानदानी।
चाहिए तुझको सदा मेहरून्निसा
जो निकाले इत्र, रू, ऐसी दिशा
बहाकर ले चले लोगो को, नही कोई किनारा
जहाँ अपना नहीं कोई भी सहारा
ख्वाब में डूबा चमकता हो सितारा
पेट में डंड पेले हों चूहे, जबां पर लफ़्ज प्यारा।
देख मुझको, मैं बढ़ा
डेढ़ बालिश्त और ऊंचे पर चढ़ा
और अपने से उगा मैं
बिना दाने का चुगा मैं
कलम मेरा नही लगता
मेरा जीवन आप जगता
तू है नकली, मै हूँ मौलिक
तू है बकरा, मै हूँ कौलिक
तू रंगा और मैं धुला
पानी मैं, तू बुलबुला
तूने दुनिया को बिगाड़ा
मैंने गिरते से उभाड़ा
तूने रोटी छीन ली जनखा बनाकर
एक की दी तीन मैने गुन सुनाकर।

काम मुझ ही से सधा है
शेर भी मुझसे गधा है
चीन में मेरी नकल, छाता बना
छत्र भारत का वही, कैसा तना
सब जगह तू देख ले
आज का फिर रूप पैराशूट ले।
विष्णु का मैं ही सुदर्शनचक्र हूँ।
काम दुनिया मे पड़ा ज्यों, वक्र हूँ।
उलट दे, मैं ही जसोदा की मथानी
और लम्बी कहानी-
सामने लाकर मुझे बेंड़ा
देख कैंडा
तीर से खींचा धनुष मैं राम का।
काम का-
पड़ा कन्धे पर हूँ हल बलराम का।
सुबह का सूरज हूँ मैं ही
चांद मैं ही शाम का।
कलजुगी मैं ढाल
नाव का मैं तला नीचे और ऊपर पाल।
मैं ही डांड़ी से लगा पल्ला
सारी दुनिया तोलती गल्ला
मुझसे मूछें, मुझसे कल्ला
मेरे उल्लू, मेरे लल्ला
कहे रूपया या अधन्ना
हो बनारस या न्यवन्ना
रूप मेरा, मै चमकता
गोला मेरा ही बमकता।
लगाता हूँ पार मैं ही
डुबाता मझधार मैं ही।
डब्बे का मैं ही नमूना
पान मैं ही, मैं ही चूना

मैं कुकुरमुत्ता हूँ,
पर बेन्जाइन (Bengoin) वैसे
बने दर्शनशास्त्र जैसे।
ओमफ़लस (Omphalos) और ब्रहमावर्त
वैसे ही दुनिया के गोले और पर्त
जैसे सिकुड़न और साड़ी,
ज्यों सफ़ाई और माड़ी।
कास्मोपालिटन और मेट्रोपालिटन
जैसे फ़्रायड और लीटन।
फ़ेलसी और फ़लसफ़ा
जरूरत और हो रफ़ा।
सरसता में फ़्राड
केपिटल में जैसे लेनिनग्राड।
सच समझ जैसे रकीब
लेखकों में लण्ठ जैसे खुशनसीब

मैं डबल जब, बना डमरू
इकबगल, तब बना वीणा।
मन्द्र होकर कभी निकला
कभी बनकर ध्वनि छीणा।
मैं पुरूष और मैं ही अबला।
मै मृदंग और मैं ही तबला।
चुन्ने खां के हाथ का मैं ही सितार
दिगम्बर का तानपूरा, हसीना का सुरबहार।
मैं ही लायर, लिरिक मुझसे ही बने
संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, ग्रीक, लैटिन के जने
मन्त्र, गज़लें, गीत, मुझसे ही हुए शैदा
जीते है, फिर मरते है, फिर होते है पैदा।
वायलिन मुझसे बजा
बेन्जो मुझसे सजा।
घण्टा, घण्टी, ढोल, डफ़, घड़ियाल,
शंख, तुरही, मजीरे, करताल,
करनेट, क्लेरीअनेट, ड्रम, फ़्लूट, गीटर,
बजानेवाले हसन खां, बुद्धू, पीटर,
मानते हैं सब मुझे ये बायें से,
जानते हैं दाये से।

ताताधिन्ना चलती है जितनी तरह
देख, सब में लगी है मेरी गिरह
नाच में यह मेरा ही जीवन खुला
पैरों से मैं ही तुला।
कत्थक हो या कथकली या बालडान्स,
क्लियोपेट्रा, कमल-भौंरा, कोई रोमान्स
बहेलिया हो, मोर हो, मणिपुरी, गरबा,
पैर, माझा, हाथ, गरदन, भौंहें मटका
नाच अफ़्रीकन हो या यूरोपीयन,
सब में मेरी ही गढ़न।
किसी भी तरह का हावभाव,
मेरा ही रहता है सबमें ताव।
मैने बदलें पैंतरे,
जहां भी शासक लड़े।
पर हैं प्रोलेटेरियन झगड़े जहां,
मियां-बीबी के, क्या कहना है वहां।
नाचता है सूदखोर जहां कहीं ब्याज डुचता,
नाच मेरा क्लाईमेक्स को पहुचंता।

नहीं मेरे हाड़, कांटे, काठ का
नहीं मेरा बदन आठोगांठ का।
रस-ही-रस मैं हो रहा
सफ़ेदी का जहन्नम रोकर रहा।
दुनिया में सबने मुझी से रस चुराया,
रस में मैं डूबा-उतराया।
मुझी में गोते लगाये वाल्मीकि-व्यास ने
मुझी से पोथे निकाले भास-कालिदास ने।
टुकुर-टुकुर देखा किये मेरे ही किनारे खड़े
हाफ़िज-रवीन्द्र जैसे विश्वकवि बड़े-बड़े।
कहीं का रोड़ा, कही का पत्थर
टी.एस. एलीयट ने जैसे दे मारा
पढ़नेवाले ने भी जिगर पर रखकर
हाथ, कहां,’लिख दिया जहां सारा’।
ज्यादा देखने को आंख दबाकर
शाम को किसी ने जैसे देखा तारा।
जैसे प्रोग्रेसीव का कलम लेते ही
रोका नहीं रूकता जोश का पारा
यहीं से यह कुल हुआ
जैसे अम्मा से बुआ।
मेरी सूरत के नमूने पीरामेड
मेरा चेला था यूक्लीड।
रामेश्वर, मीनाछी, भुवनेश्वर,
जगन्नाथ, जितने मन्दिर सुन्दर
मैं ही सबका जनक
जेवर जैसे कनक।
हो कुतुबमीनार,
ताज, आगरा या फ़ोर्ट चुनार,
विक्टोरिया मेमोरियल, कलकत्ता,
मस्जिद, बगदाद, जुम्मा, अलबत्ता
सेन्ट पीटर्स गिरजा हो या घण्टाघर,
गुम्बदों में, गढ़न में मेरी मुहर।
एरियन हो, पर्शियन या गाथिक आर्च
पड़ती है मेरी ही टार्च।
पहले के हो, बीच के हो या आज के
चेहरे से पिद्दी के हों या बाज के।
चीन के फ़ारस के या जापान के
अमरिका के, रूस के, इटली के, इंगलिस्तान के।
ईंट के, पत्थर के हों या लकड़ी के
कहीं की भी मकड़ी के।
बुने जाले जैसे मकां कुल मेरे
छत्ते के हैं घेरे।

सर सभी का फ़ांसनेवाला हूं ट्रेप
टर्की टोपी, दुपलिया या किश्ती-केप।
और जितने, लगा जिनमें स्ट्रा या मेट,
देख, मेरी नक्ल है अंगरेजी हेट।
घूमता हूं सर चढ़ा,
तू नहीं, मैं ही बड़ा।”

(२)
बाग के बाहर पड़े थे झोपड़े
दूर से जो देख रहे थे अधगड़े।
जगह गन्दी, रूका, सड़ता हुआ पानी
मोरियों मे; जिन्दगी की लन्तरानी-
बिलबिलाते किड़े, बिखरी हड्डियां
सेलरों की, परों की थी गड्डियां
कहीं मुर्गी, कही अण्डे,
धूप खाते हुए कण्डे।
हवा बदबू से मिली
हर तरह की बासीली पड़ी गयी।
रहते थे नव्वाब के खादिम
अफ़्रिका के आदमी आदिम-
खानसामां, बावर्ची और चोबदार;
सिपाही, साईस, भिश्ती, घुड़सवार,
तामजानवाले कुछ देशी कहार,
नाई, धोबी, तेली, तम्बोली, कुम्हार,
फ़ीलवान, ऊंटवान, गाड़ीवान
एक खासा हिन्दु-मुस्लिम खानदान।
एक ही रस्सी से किस्मत की बंधा
काटता था जिन्दगी गिरता-सधा।
बच्चे, बुड्ढे, औरते और नौजवान
रह्ते थे उस बस्ती में, कुछ बागबान
पेट के मारे वहां पर आ बसे
साथ उनके रहे, रोये और हंसे।

एक मालिन
बीबी मोना माली की थी बंगालिन;
लड़की उसकी, नाम गोली
वह नव्वाबजादी की थी हमजोली।
नाम था नव्वाबजादी का बहार
नजरों में सारा जहां फ़र्माबरदार।
सारंगी जैसी चढ़ी
पोएट्री में बोलती थी
प्रोज में बिल्कुल अड़ी।
गोली की मां बंगालिन, बहुत शिष्ट
पोयट्री की स्पेशलिस्ट।
बातों जैसे मजती थी
सारंगी वह बजती थी।
सुनकर राग, सरगम तान
खिलती थी बहार की जान।
गोली की मां सोचती थी-
गुर मिला,
बिना पकड़े खिचे कान
देखादेखी बोली में
मां की अदा सीखी नन्हीं गोली ने।
इसलिए बहार वहां बारहोमास
डटी रही गोली की मां के
कभी गोली के पास।
सुबहो-शाम दोनों वक्त जाती थी
खुशामद से तनतनाई आती थी।
गोली डांडी पर पासंगवाली कौड़ी
स्टीमबोट की डोंगी, फ़िरती दौड़ी।
पर कहेंगे-
‘साथ-ही-साथ वहां दोनो रहती थीं
अपनी-अपनी कहती थी।
दोनों के दिल मिले थे
तारे खुले-खिले थे।
हाथ पकड़े घूमती थीं
खिलखिलाती झूमती थीं।
इक पर इक करती थीं चोट
हंसकर होतीं लोटपोट।
सात का दोनों का सिन
खुशी से कटते थे दिन।
महल में भी गोली जाया करती थी
जैसे यहां बहार आया करती थी।

एक दिन हंसकर बहार यह बोली-
“चलो, बाग घूम आयें हम, गोली।”
दोनों चली, जैसे धूप, और छांह
गोली के गले पड़ी बहार की बांह।
साथ टेरियर और एक नौकरानी।
सामने कुछ औरतें भरती थीं पानी
सिटपिटायी जैसे अड़गड़े मे देखा मर्द को
बाबू ने देखा हो उठती गर्दन को।
निकल जाने पर बहार के, बोली
पहली दूसरी से, “देखो, वह गोली
मोना बंगाली की लड़की ।
भैंस भड़्की,
ऎसी उसकी मां की सूरत
मगर है नव्वाब की आंखों मे मूरत।
रोज जाती है महल को, जगे भाग
आखं का जब उतरा पानी, लगे आग,
रोज ढोया आ रहा है माल-असबाब
बन रहे हैं गहने-जेवर
पकता है कलिया-कबाब।”
झटके से सिर-आंख पर फ़िर लिये घड़े
चली ठनकाती कड़े।
बाग में आयी बहार
चम्पे की लम्बी कतार
देखती बढ़्ती गयी
फ़ूल पर अड़ती गयी।
मौलसिरी की छांह में
कुछ देर बैठ बेन्च पर
फ़िर निगाह डाली एक रेन्ज पर
देखा फ़िर कुछ उड़ रही थी तितलियां
डालों पर, कितनी चहकती थीं चिड़ियां।
भौरें गूंजते, हुए मतवाले-से
उड़ गया इक मकड़ी के फ़ंसकर बड़े-से जाले से।
फ़िर निगाह उठायी आसमान की ओर
देखती रही कि कितनी दूर तक छोर
देखा, उठ रही थी धूप-
पड़ती फ़ुनगियों पर, चमचमाया रूप।
पेड़ जैसे शाह इक-से-इक बड़े
ताज पहने, है खड़े।
आया माली, हाथ गुलदस्ते लिये
गुलबहार को दिये।
गोली को इक गुलदस्ता
सूंघकर हंसकर बहार ने दिया।
जरा बैठकर उठी, तिरछी गली
होती कुन्ज को चली!
देखी फ़ारांसीसी लिली
और गुलबकावली।
फ़िर गुलाबजामुन का बाग छोड़ा
तूतो के पेड़ो से बायें मुंह मोड़ा।
एक बगल की झाड़ी
बढ़ी जिधर थी बड़ी गुलाबबाड़ी।
देखा, खिल रहे थे बड़े-बड़े फ़ूल
लहराया जी का सागर अकूल।
दुम हिलाता भागा टेरियर कुत्ता
जैसे दौड़ी गोली चिल्लाती हुई ‘कुकुरमुत्ता’।
सकपकायी, बहार देखने लगी
जैसे कुकुरमुत्ते के प्रेम से भरी गोली दगी।
भूल गयी, उसका था गुलाब पर जो कुछ भी प्यार
सिर्फ़ वह गोली को देखती रही निगाह की धार।
टूटी गोली जैसे बिल्ली देखकर अपना शिकार
तोड़कर कुकुरमुत्तों को होती थी उनके निसार।
बहुत उगे थे तब तक
उसने कुल अपने आंचल में
तोड़कर रखे अब तक।
घूमी प्यार से
मुसकराती देखकर बोली बहार से-
“देखो जी भरकर गुलाब
हम खायंगे कुकुरमुत्ते का कबाब।”
कुकुरमुत्ते की कहानी
सुनी उससे जीभ में बहार की आया पानी।
पूछा “क्या इसका कबाब
होगा ऎसा भी लजीज?
जितनी भाजियां दुनिया में
इसके सामने नाचीज?”
गोली बोली-”जैसी खुशबू
इसका वैसा ही स्वाद,
खाते खाते हर एक को
आ जाती है बिहिश्त की याद
सच समझ लो, इसका कलिया
तेल का भूना कबाब,
भाजियों में वैसा
जैसा आदमियों मे नव्वाब”

“नहीं ऎसा कहते री मालिन की
छोकड़ी बंगालिन की!”
डांटा नौकरानी ने-
चढ़ी-आंख कानी ने।
लेकिन यह, कुछ एक घूंट लार के
जा चुके थे पेट में तब तक बहार के।
“नहीं नही, अगर इसको कुछ कहा”
पलटकर बहार ने उसे डांटा-
“कुकुरमुत्ते का कबाब खाना है,
इसके साथ यहां जाना है।”
“बता, गोली” पूछा उसने,
“कुकुरमुत्ते का कबाब
वैसी खुशबु देता है
जैसी कि देता है गुलाब!”
गोली ने बनाया मुंह
बाये घूमकर फ़िर एक छोटी-सी निकाली “उंह!”
कहा,”बकरा हो या दुम्बा
मुर्ग या कोई परिन्दा
इसके सामने सब छू:
सबसे बढ़कर इसकी खुशबु।
भरता है गुलाब पानी
इसके आगे मरती है इन सबकी नानी।”
चाव से गोली चली
बहार उसके पीछे हो ली,
उसके पीछे टेरियर, फ़िर नौकरानी
पोंछती जो आंख कानी।
चली गोली आगे जैसे डिक्टेटर
बहार उसके पीछे जैसे भुक्खड़ फ़ालोवर।
उसके पीछे दुम हिलाता टेरियर-
आधुनिक पोयेट (Poet)
पीछे बांदी बचत की सोचती
केपीटलिस्ट क्वेट।
झोपड़ी में जल्दी चलकर गोली आयी
जोर से ‘मां’ चिल्लायी।
मां ने दरवाजा खोला,
आंखो से सबको तोला।
भीतर आ डलिये मे रक्खे
मोली ने वे कुकुरमुत्ते।
देखकर मां खिल गयी।
निधि जैसे मिल गयी।
कहा गोली ने, “अम्मा,
कलिया-कबाब जल्द बना।
पकाना मसालेदार
अच्छा, खायेंगी बहार।
पतली-पतली चपातियां
उनके लिए सेख लेना।”
जला ज्यों ही उधर चूल्हा,
खेलने लगीं दोनों दुल्हन-दूल्हा।
कोठरी में अलग चलकर
बांदी की कानी को छलकर।
टेरियर था बराती
आज का गोली का साथ।
हो गयी शादी कि फ़िर दूल्हन-बहार से।
दूल्हा-गोली बातें करने लगी प्यार से।
इस तरह कुछ वक्त बीता, खाना तैयार
हो गया, खाने चलीं गोली और बहार।
कैसे कहें भाव जो मां की आंखो से बरसे
थाली लगायी बड़े समादर से।
खाते ही बहार ने यह फ़रमाया,
“ऎसा खाना आज तक नही खाया”
शौक से लेकर सवाद
खाती रहीं दोनो
कुकुरमुत्ते का कलिया-कबाब।
बांदी को भी थोड़ा-सा
गोली की मां ने कबाब परोसा।
अच्छा लगा, थोड़ा-सा कलिया भी
बाद को ला दिया,
हाथ धुलाकर देकर पान उसको बिदा किया।

कुकुरमुत्ते की कहानी
सुनी जब बहार से
नव्वाब के मुंह आया पानी।
बांदी से की पूछताछ,
उनको हो गया विश्वास।
माली को बुला भेजा,
कहा,”कुकुरमुत्ता चलकर ले आ तू ताजा-ताजा।”
माली ने कहा,”हुजूर,
कुकुरमुत्ता अब नहीं रहा है, अर्ज हो मन्जूर,
रहे है अब सिर्फ़ गुलाब।”
गुस्सा आया, कांपने लगे नव्वाब।
बोले;”चल, गुलाब जहां थे, उगा,
सबके साथ हम भी चाहते है अब कुकुरमुत्ता।”
बोला माली,”फ़रमाएं मआफ़ खता,
कुकुरमुत्ता अब उगाया नहीं उगता।”

- अलकनंदा सिंह 

Thursday, 6 October 2022

साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार फ्रांसीसी लेखिका एनी एर्नाक्‍स को दिया गया


 

फ्रांसीसी लेखिका एनी एर्नाक्‍स (Annie Ernaux) को साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार दिया गया है। उन्हें यह पुरस्कार निजी यादों की परतों, जड़ों को स्पष्टता और साहस के साथ लिखने के लिए दिया गया। एनी ने अपनी लेखनी के जरिए साहसिक क्लिनिकल एक्यूटी (clinical acuity) पर कई लेख लिखे हैं। एनी एर्नाक्‍स ने फ्रेंच, इंग्लिश में कई उपन्यास, लेख, नाटक और फिल्में भी लिखी हैं। फ्रांसीसी लेखिका एनी अर्नॉक्स का जन्म 1940 में हुआ था। वह फ्रांस के नॉर्मंडी के छोटे से शहर यवेटोट में पली-बढ़ी थीं। यहां उनके माता-पिता की एक किराने की दुकान और कैफे था। 

साल 2021 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार उपन्यासकार अब्दुलराजक गुरनाह को दिया गया था। उन्हें अपनी लेखनी के जरिए उपनिवेशवाद के प्रभावों, संस्कृतियों को लेकर लिखने के लिए यह पुरस्कार दिया गया था। 2019 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार आस्ट्रियाई मूल के लेखक पीटर हैंडका को दिया गया था। उन्हें यह पुरस्कार इनोवेटिव लेखन और भाषा में नवीनतम प्रयोगों के लिए दिया गया था। 

Thursday, 22 September 2022

तमिल भाषा लेखक अशोकमित्रन का जन्‍मदिन आज , पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी 'सुंदर'


 आज 22 सितंबर 1931 को जन्‍मे थे तमिल भाषा के लेखक व उपन्यासकार अशोकमित्रन। उनका निधन 23 मार्च, 2017 को हुआ था। अशोकमित्रन का मूल नाम जगदीस त्यागराजन था। 

उनकी कृति में 200 लघु कथाएं, 8 उपन्यास, 15 अन्य लंबी कथाएं शामिल हैं। उनकी बहुत-सी लघु कथाएं अँग्रेजी, हिंदी, मलयालम, तेलगू और अन्य भाषाओं में अनुवादित की गई है। उन्हें वर्ष 1996 में उनके लघु कथाओं के संग्रह अप्पाविन सिनेहिदर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (तमिल) से सम्मानित किया गया था।

वर्ष 1931 में सिकंदराबाद में जन्में अशोकमित्रन वर्ष 1952 में चेन्नई चले गए थे। जिसके बाद वे तमिल साहित्य के एक प्रभावशाली साहित्यकार के रूप में उभरे। वे संक्षिप्त और सूक्ष्म हास्य के लिए जाने जाते थे। उन्होंने 1960 के दशक में अपना साहित्यिक नाम अशोकमित्रन ग्रहण किया था। वर्ष 2014 में तमिलनाडू की निवर्तमान मुख्यमंत्री जयललिता ने तमिल साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हे 'तिरु वी का' पुरस्कार प्रदान किया था।

उनको 1992 में 'दिल्ली मेमोरियल अवार्ड' भी मिला। उनकी रचनाओं को 'के.के. बिरला पुरस्कार' मिला। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उन्हें फेलोशिप भी दी गई। 1966 से 1989 तक कुछ समय के लिए 'कलैआडी' पत्रिका के संपादक भी रहे। उनके उपन्यासों में 'अप्पाविन स्नेगदी', 'तन्नीर' एवं 'मानसरोवर' बहुचर्चित रहा। 'तन्नीर' का अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है।।

 

पढ़िए उनकी कहानी- 'सुंदर'

हमने ठान लिया था कि जैसे भी हो, एक गाय खरीदकर ही चैन लेंगे। भैंसों को पल्ले बाँधकर रोने से तो बेहतर है कि पिछवाड़े एक गाय ही बाँध ली जाए। घर में लक्ष्मी आ जाएगी।

भैंसों को हमने आदर-सत्कार सहित बुलावा नहीं दिया था। एक बार हुआ यह कि किसी कारण से एक भैंस हमारे घर आ टपकी। हमने तो सोचा था कि वह कुछ दिनों की मेहमान होगी, परंतु वह स्थायी रूप से बस गई। जब उसमें दूध-उत्पादेयता की क्षमता सर्द हो गई, तब हमने दूध प्राप्ति हेतु एक और भैंस खरीद ली। दोनों जब एक ही साथ सर्द पड़ गई तो तीसरी आ गई।

हम जहाँ रहते थे, वहाँ साधारणतया कामकाज के लिए नौकर-चाकरों का मिलना अत्यंत कठिन था। हमारे घर के लोग ही बारी-बारी से रोज गोबर इकट्ठा करते थे। पाँच-छह दिनों में एक बार गोबर के उपले बनाते। गोबर को कोयले के चूरे के साथ मिलाकर गोले बनाकर सुखाते। इसकी उपलब्धि यह हुई कि हम अच्छी-खासी गरमी में भी गरम पानी से ही नहाते।

पिछवाड़े के एक कोने में गोबर का एक पहाड़ सा सदा रहता। दूसरे कोने में उपलों और गोलों का ढेर रहता। इन दो पहाड़ों के बीचोबीच इनकी कारणकर्ता भैंसें जुगाली करती हुई विराजमान रहतीं। शायद इन भैंसों का आपस में कोई गूढ़ समझौता हुआ होगा। किसी भी वक्त दो को दोहने की आवश्यकता ही नहीं रहती। ऐसे भी महीने थे, जब तीनों में से एक ने भी एक बूंद दूध नहीं दिया था।

अच्छे वक्त का अंत तो आता ही है, साथ ही कभी-कभी बुरे वक्त का भी। एक भैंस मर गई। दूसरी खो गई। तीसरी का बच्चा होनेवाला था। चार–पाँच महीनों बाद मेरी बड़ी बहन नन्हे से बच्चे के साथ कुछ महीने हमारे साथ रहनेवाली थी। ऐसे समय में दूधवाले की कृपा पर आश्रित होने की बजाय एक गाय ही क्यों न खरीद लें? वैसे भी पिछवाड़े में दो गाय को बाँधने के लिए जगह तो है ही।

यह खबर गाँव भर में फैल गई कि हम गाय खरीदनेवाले हैं। इस विषय में उन्हीं लोगों ने खूब दिलचस्पी दिखाई, जिनका गाय से कोई लेना-देना नहीं था। उनकी नोंक-झोंक से इतना खीज गए कि सोचा गाय न खरीदें, दूसरी ओर यह भी निश्चय हुआ कि इनके लिए ही सही, एक गाय घर में अवश्य लाएँगे।

हम भी लगभग पंद्रह गायों को देख चुके थे। पहली बार गर्भिणी हुई गाय से लेकर आठ बार जन्मदात्री की शोभा से मंडित एवं वृद्धा गाय तक। पहले मैं और पिताजी गाय को देख जाते और गाय के रंग, सींग, पूँछ की लंबाई आदि बुनियादी मुद्दों का भी माँ को भिन्न-भिन्न विवरण देते। माँ को पिताजी के सामर्थ्य पर शंका थी, अतः कभी हम तीनों गाय देखने जाते। हमारे पहुँचने तक गाय को दुहा जा चुका होता। वह कितना दूध देती है, उसे कैसा दुहा जाता है, यह देखने के लिए हम दुबारा जाते। एक-दो लोगों ने तो इतना कहा भी कि हम गाय को अपने पास दो दिन रखने के पश्चात ही निर्णय लें। एक ने यहाँ तक कहा, आधे पैसे अब दीजिए, आधे अगले महीने दे दीजिए। इन सभी को छोड़कर हम बाजार के पास वाले मारवाड़ी के घर से फौरन पूरे पैसे देकर एक गाय खरीद लाए।

जाने क्या-क्या कारणों के लिए गाय को तीन-चार बार देख–जाँच लेने के बाद नकारनेवाले हम इस मारवाड़ी के मामले में पाँच ही मिनटों में राजी हो गए। कारण यह था-बाजार के पास बाजार से भी बड़ी सब्जीमंडी थी। जिसमें जान-पहचानवाले एक सब्जीवाले ने माँ-पिताजी को बताया कि पास ही एक गाय बिक्री के लिए है और तुंरत दोनों को वहाँ ले भी गया। उसी वक्त गाय को दुहा जा रहा था। फेन सहित दूध बालटी भर दुहा गया। हमारी भैंसों ने भी कभी इतना दूध नहीं दिया था। माँ-पिताजी दोनों ने हामी भरी और एक रुपए का अग्रिम दे आए। दूसरे दिन 299 रुपए देकर गाय को घर लाया गया। साथ ही एक माह का बछड़ा भी।

गाय के आते ही माँ ने उसकी कर्पूर आरती उतारी, उसे कुंकुम का टीका लगाया और उसे 'लक्ष्मी' के नाम से संबोधित किया।

'लक्ष्मी...क्यों...?' मैंने पूछा।

'गाय का नाम' माँ ने कहा।

'सुंदर...?'

'हाँ माँ...उन्होंने वैसे ही तो बुलाया था।'

'कैसा नाम है? सुंदर...?'

'हाँ, माँ...। तुमने ध्यान नहीं दिया? सुंदर...सुंदर कहते हुए ही तो वह औरत उसकी पीठ पर हाथ फेर रही थी।'

'देखो, मैं बुलाता हूँ...सुंदर। गाय ने मुड़कर देखा।'

'देखा, इस गाय का नाम सुंदर ही है।'

'सुंदर तो पुल्लिंग है?'

'हो सकता है कि यह पुरुष-गाय हो?'

'छिह-छिह। ज्यादा बुद्धिमानी मत दिखाओ।'

हमारे मन को क्लेश का कारण केवल यह नहीं था कि गाय का नाम 'सुंदर' था। उसके थन पूरी तरह से काले थे। श्याम–थन गायों का दूध मंदिर के अलावा और कहीं भी उपयुक्त नहीं होना चाहिए। ऐसा हमारे घरों में कहा जाता है। मुझे इन बातों की खास जानकारी नहीं थी।

श्याम–थनवाली गाय भी तो गाय ही है। इसलिए यह तय किया गया कि महीने में एक बार दूध को मंदिर में अभिषेक के लिए दे दिया जाए।

गाय को अपने नए नामकरण की आदत पड़ जाए। इस कारण हम अकसर पिछवाड़े में जाकर 'लक्ष्मी...लक्ष्मी' कहकर पुकारने लगे। गाय ने इसकी कोई परवाह ही नहीं की। साथ ही वह बेचैनी से इधर-उधर हिलती-डुलती रही। शाम हुई। गाय को पहली बार हम दुहनेवाले थे। जब भैंस दूध दिया करती थी, तब एक आदमी दूध दुहने आया करता था। उसे सूचना देने के बावजूद वह नहीं आया। आखिरकार पीतल के बड़े मुँह के लोटे को लेकर माँ गाय के पास गई।

मैंने बछड़े की रस्सी खोल दी। वह माँ के थन से मुँह लगाकर चूसने लगा। गाय के थन रिसने लगे। मैंने बछड़े को फिर से बाँध दिया। गाय के पास बैठकर माँ ने उसके थन को छुआ। गाय ने लात मारी।

मैंने बछडे को एक कोने में बाँध दिया और गाय की पिछली टाँगों को बाँधने के लिए रस्सी हुँढने लगा। भैंसों को दुहते समय उनकी पिछली टाँगों को बाँधने की कभी नौबत न आई थी। अगर वे दूध नहीं देना चाहतीं तो परे हट जातीं। मगर टाँग उठाकर उन्होंने कभी नहीं मारा।

जैसे-तैसे एक रस्सी को ढूँढ़ निकाला और गाय की पिछली टाँगों को बाँध देने के बाद मैंने और माँ ने बारी-बारी से उसे दुहा। वह माँ को भी पास आने नहीं दे रही थी। माँ ने इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया कि उसका नाम लक्ष्मी है। उसके मुँह और पीठ पर थपथपा दिया। सबकुछ करने के बाद भी पाव भर भी दूध नहीं मिला। अगले दिन सुबह की भी वही कहानी थी। उस शाम की स्थिति बदतर थी। गाय ने दूध दिया ही नहीं।

गाय सींग मारनेवाली थी। साथ ही एक बात भी उजागर हुई। गाय को हमारे घर आए लगभग 36 घंटे बीत चुके थे। वह बैठी तक नहीं, खड़ी ही रही। हमने उसके खाने के लिए भूसी और खली रखी थी, उन्हें खाने में भी उसने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब दूसरे दिन भी उसने हमें पास फटकने नहीं दिया तो मैं उस मारवाड़ी के घर गया। उस गली में सबके सब मारवाड़ी परिवार ही थे। जैन धर्मावलंबी होने के कारण सूर्यास्त से पूर्व भोजन समाप्त कर बत्ती बुझा चुके थे। बुजुर्गों ने मुँह पर कपड़ा बाँध रखा था। गाय के विक्रेता के घर तक पहुँचने के लिए मुझे चार-पाँच घरों के आँगन में बँधी हुई गायों को खतरनाक ढंग से पार करके आना पड़ा। अपने विक्रेता के घर को पहचानने से पहले मैं एक बार अपना पैर गोबर के ढेर में घुसेड़ चुका था। एक स्त्री बाहर खड़ी थी, उससे मैंने कहा, 'आपकी गाय दूध नहीं देती।'

'उसे चारा दिया?' उस स्त्री के मुँह पर बँधा परदा उसके बोलने से फड़फड़ाने लगा।

'वह कुछ भी नहीं खाती, बस लात मारती रहती है।' वह घर के अंदर गई और ऊँची आवाज में ताबड़तोड़ बरसने लगी। फिर उसने आस-पड़ोस सबको यह कहा, 'सुंदर को ये लोग भूखा मार रहे हैं।' इसी तरह की बातें वह किए जा रही थी। सभी ने मुझे घेर लिया और मुझ पर प्रश्नों की बौछार करने लगे। 'क्या आप पत्थर दिल हैं? आप क्या गाय को मार डालेंगे? गाय को भूखा मारोगे तो कोटि जन्म नरक में उलटे लटका में भूने जाओगे।'

वह स्त्री मेरे साथ चल पड़ी। रास्ते में भी आते-आते लोगों से अपनी भाषा में यह कहती हुई आई कि मैं उसकी गाय को भूखा मार रहा हूँ। मुझे ताज्जुब हुआ कि वह स्त्री कैसे एक ही बात को घंटों दोहराए जा रही

हम घर पहुँचे। गाय ने उसे देखकर उछल-कूद करना शुरू कर दिया। जोर से रँभाई, पूँछ उठाकर मूत्र त्यागा, ऐसे साँस लिया, मानो पूरे विश्व को हिला देगी। वह मारवाड़ी स्त्री 'सुंदर!' कहकर पुकारती हुई उससे लिपट गई। अपने मुँह पर लगे श्वेत आवरण को हटाकर उसने गाय को चूमा। गाय के कान के पास पिस्कू पकड़कर जमीन पर फेंक उसे पैर से कुचल डाला। 'सुंदर मेरे सुंदर' कह-कहकर देर तक गाय को दुलारती–पुचकारती रही। इस दृश्य को देखकर मैं रुआँसा हो उठा। मेरे भाई-बहन तो रो ही पड़े।

केवल मेरी माँ अविचलित थी। एकाएक अनपेक्षित रूप से वह चिल्लाने लगी। 'कया सोचकर तुमने ऐसी गाय हमारे मत्थे मढ़ दी? पैसे गिनकर रखो और ले जाओ अपनी गाय।'

'गाय को अगर चारा नहीं दोगे तो वह दूध कैसे देगी? गाय को भूखा मारोगे तो कोटि जन्म उलटे भूने जा बदले में वह भी चिल्लाई।

हमारी माँ में भी इतना सामर्थ्य है, यह हममें से कोई नहीं जानता था। सवा घंटा बरसने के बाद वह मारवाड़ी स्त्री भी शांत हो गई। 'एक बरतन दो।' उसने सहज भाव से कहा।

उसने गाय की पिछली टाँगों को बाँधे बिना, बछड़े को एक बूंद दूध पिलाया और गाय को दुहा। एक बड़ा लोटा भर दुहने के बाद उसने दूसरा बरतन लिया और उसमें भी दूध दुहा। अब हमारी माँ नहीं चिल्लाई। उस रात सोने से पहले हम सभी ने दूध पिया।

रात के वक्त हमारे घर के पिछवाडे कोई भी बिना बत्ती के नहीं जा सकता। कारण यह था कि रसोई से बाहर आने पर आठ-दस सीढ़ियाँ थीं, जिन्हें उतरने के बाद ही समतल भूमि पर आया जा सकता था। मगर आँगन में केवल दो ही सीढ़ियाँ थीं। घर बनाते समय जमीन में जो भी ऊँच-नीच थी उसे बिना समतल किए बनाई गई थीं। पिछवाड़े में गोशाला के चारों ओर एक ऊँची दीवार थी। रात के वक्त सोने से पहले हममें से कोई एक इस पिछवाड़े के दरवाजे पर एक बड़ा सा ताला लगाकर आ जाता था। उस दिन रात को मैं ही लालटेन लेकर उस दरवाजे को ताला लगाकर आया। गाय हमारे घर में पहली बार बैठी हुई थी। यही नहीं, वह जुगाली भी कर रही थी। मुझे लगा कि आखिरकार वह हमारी पारिवारिक व्यवस्था के साथ घुल-मिल गई है। उसे मैंने 'सुंदर' कहकर पुकारा और उसके माथे को सहलाया।

सुबह माँ की चीख-पुकार सुन सभी उठ बैठे। सुंदर ने रात को ही रस्सी तोड़ ली होगी। जैसे ही माँ ने रसोई के पिछवाड़ेवाला दरवाजा खोला, एक ही छलाँग में सुंदर आठ-दस सीढ़ियाँ लाँघकर रसोई में घुस गई थी। माँ डर गई थी और चीखने-पुकारने लगी थीं। पिताजी ने आँगन के बाहर वाला दरवाजा खोला, यह सोचकर कि शायद कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो गाय को सँभाल सके। ज्यों ही बाहर का दरवाजा खला, सुंदर बाहर की ओर लपकी। जब तक हम यह सोच ही रहे थे कि हमें अब क्या करना चाहिए, तब तक सुंदर बाजार की ओर दौड़ती हुई हमारी आँखों से ओझल हो चुकी थी। माँ ने उस मारवाड़ी स्त्री को कोसा। गाय को कोसा। सब्जीवाले को कोसा। चूँकि मैंने दौड़ती हुई गाय को लाठी मारकर घर की ओर नहीं भगाया, इसलिए मुझे भी कोसा। आधे घंटे बाद मैं बरतन समेत बछड़े को लेकर मारवाड़ी स्त्री के घर की ओर निकल पड़ा।

उस स्त्री ने मुझे देखते ही जोर-जोर से भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। पता नहीं क्यों मुझे अपराधबोध होने लगा। वैसे जाँच-पड़ताल कर देखा जाए तो इसकी कोई गुंजाइश नहीं थी। वह अपनी गाय को बेचना चाहती थी, तभी तो हमने खरीदी थी। उसके मुँहमाँगे दाम को हमने चुकाया था। वह मुझे और मेरे घरवालों को बुरा-भला कहे क्या यह उचित था!

उस वक्त यह सब मुझे सूझा ही नहीं। संकोच का अनुभव करते हुए मैंने कहा, 'गाय को दुह लेता हूँ।' उस स्त्री ने बड़े दानवीर की भाँति स्वीकृति दी। सुंदर को दुहने के लिए मुझे आया देख सात-आठ बच्चों और बुजुर्गों ने मुझे घेर लिया। सुंदर ने लात नहीं मारी। यह आश्चर्य की बात थी। जब मैं घर लौटा तो माँ ने पूछा, 'गाय कहाँ है?' मैंने माँ की ओर दूध का बरतन बढ़ाया। उसे पकड़ते हुए माँ ने दुबारा प्रश्न किया, 'गाय कहाँ...?'

'मैं अभी उसे साथ नहीं ला सका, शाम को ले आऊँगा।' माँ ने मेरी ओर अविश्वास से भरी नजरों से देखा।

'उस पिशाचनी से गाय के पैसे वापस ले आएँ।' माँ ने पिताजी से कहा, लेकिन पिताजी ने कोई जवाब नहीं दिया।

शाम को जब मैं दूध दुहने गया तो गाय ने बहुत ही कम दूध दिया। ऊपर से दूध में से एक तरह की बदबू भी आ रही थी। पहले मैं इसका कारण न जान सका, मगर बाद में मुझे पता चल गया। दिन में मंडी का चक्कर लगाते हुए सुंदर कचरेदानों को भी नहीं छोड़ती थी। मारवाड़ी स्त्री गाय के लिए चारा नहीं डालती थी। वह जिम्मेदारी तो हमारे इलाके के लगभग तीन सौ सब्जीवालों, बाजार और उसके आस-पास के कचरादानों पर थी। इस बार माँ को मुझे डाँटने-फटकारने के लिए कई कारणों के होते हुए भी मैं बहादुरी से बोला-

'गाय को वहीं रहने दो माँ। वह वहीं खुश है।'

'पैसे देकर खरीदी गई गाय किसी और के घर बाँधी जाएगी? उस धोखेबाज औरत ने हमसे पैसे क्यों लिये? हर बार वहाँ जाकर दूध दुहने से तो बेहतर होगा कि सीधी तरह दूध कहीं से खरीद लें। गाय वहाँ रहेगी...? वह तो आधा दूध स्वयं ही दुह लेगी। मगर जब मैं यह कहती हैं कि पैसे लौटा दो और अपनी गाय ले जाओ तो वह बिना मुँह खोले भाग खड़ी होती है।

पिताजी ने इस गाय के विषय में दखल ही नहीं दिया। यह निश्चय किया गया कि अगले दिन मैं स्कूल से छुट्टी लेकर माँ के साथ जाकर सुंदर को घसीट लाऊँ।

'सुंदर।'

सवेरे-सवेरे मैं जाकर गाय को दुह आया। अब भी बहुत कम ही दूध दिया। उस स्त्री ने कहा कि बछड़े ने दूध पी लिया था। दूध की बदबू असहनीय थी। दोपहर का खाना समाप्त होते ही माँ ने मुझसे कहा। 'चल रे!'

दो व्यक्तियों द्वारा संचालित घोर विस्फोट को सँभालने का अशोभनीय कार्य मुझ पर थोपा गया। जिससे बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। अतः मैं अर्धचेतनावस्था में माँ के साथ दोपहर की कड़कती धूप में डेढ़ मील की दूरी पर स्थित बाजार की ओर चल पड़ा।

क्रोध का ऐसा विस्फोट हुआ, सारा बाजार उस मारवाड़ी स्त्री के यहाँ जमा हो गया। यही कहा जा सकता है कि दो भाषाएँ स्त्रियों की विशेष प्रयुक्तियों से समृद्ध हो तीव्र गति से विकासोन्मुख हो गई। मुझे ऐसा लगा कि मेरी माँ का पलड़ा ऊँचा था। वह मारवाड़ी स्त्री तब-तब लाचार दिखाई देती, जब-जब माँ उससे यह कहती, 'पैसे वापस दे और ले गाय को रख अपने पास।'

पचास लोग बीच-बचाव के लिए आ गए। अब हम अपनी गाय को ले जा सकते थे, मगर वह आए तब न? जितनी बार मैंने सुंदर की रस्सी खूटी से खोलने की कोशिश की, उतनी ही बार वह मारवाड़ी स्त्री दौड़ती हुई आती और गाय से लिपटकर जोर-जोर से रोने लगती। माँ जैसे ही पैसों की माँग करती, वह चुप हो जाती। सुंदर ने उछलकर मुझे पास आने से रोक दिया। माँ को तभी यह युक्ति सूझी होगी। एक बैलगाड़ी लिवा लाओ।' उन्होंने मुझसे कहा।

'सुंदर को बैलगाड़ी में कैसे चढ़ाएँगे?' मैंने पूछा। 'मैंने तुमसे कहा है कि बैलगाड़ी ला और तू मुझसे सवाल-जवाब कर रहा है?' माँ गरजी और मैं बैलगाड़ी लेने चल पड़ा।

बैलगाड़ी आने पर माँ उस पर बछड़े को लेकर बैठ गई। मुझे भी गाड़ी में बैठने को कहा। वहाँ के ही एक आदमी से सुंदर की रस्सी खूटी से खोलकर हाथ में पकड़ाने को कहा। माँ ने उस रस्सी को गाडी के पीछे बाँध दिया। मैं उस क्षण का इंतजार कर रहा था, जब संदर रस्सी तोड़कर भाग जाएगी। मगर सुंदर बैलगाड़ी के पीछे-पीछे चलते हुए शांतिपूर्वक आ गई।

इसके बाद दो हफ्तों के अंदर सुंदर पाँच-छह बार रस्सी तोड़कर मारवाड़ी के घर भाग गई। हर बार मुझे बैलगाड़ी ले जाकर उसे वापस लाना पड़ा। मैं समझ पा रहा था कि स्वतंत्र रूप से सब्जी मंडी में विचरण करते हुए कचरादानों में मुँह मारना दो सौ वुर्गफीट के दायरे में घूमना, मनचाहा व्यवहार करने की तुलना में एकांत विशाल गौशाला में उसे खूटी से बँधे रहना, खली -आदि खाना क्यों नहीं भाया। बाजार का शोरगुल उसके लिए इतना आवश्यक था कि वह अपने एक माह के बछड़े को भी छोड़कर भागने में तत्पर थी। कई अच्छे कारणों के लिए मनुष्य अपना स्वभाव परिवर्तित करने में असमर्थ है तो केवल मालिक के बदल जाने के कारण एक गाय से उसके स्वभाव के बदल जाने की अपेक्षा करना कितना अन्याय है।

कुछ ही दिनों में हम गाय से बिल्कुल तंग आ चुके थे। मारवाड़ी औरत पैसे वापस करनेवाली नहीं थी। मौका पाते ही गाय अपनी पुरानी मालकिन के पास दौड़ जाती। दूध तो बिल्कुल कम देती थी। गाय भी श्याम–थन थी। इतने दिन उसके दूध को पीकर न जाने कितने पाप लग गए होंगे। उसे बेच देना ही अच्छा था।

सुंदर को खरीदने के लिए एक आदमी मिल ही गया। बहुत शांत स्वभाव का था। हमने उससे कहा कि हमने गाय 350 रुपयों में खरीदी थी और 300 रुपयों में देने के लिए तैयार हो। वह तुरंत मान गया। एक दिन शाम को वह अपने साथ दो आदमियों को आया और गाय तथा बछड़े को ले गया।

उस रात मैंने पिताजी से पूछा, 'क्या आपने उन्हें बताया कि सुंदर अकसर रस्सी तोड़कर मारवाड़ी के घर भाग जाती है? '

पिताजी का ध्यान कहीं और था, उन्होंने जवाब नहीं दिया। आमतौर पर वे ऐसा बरताव नहीं करते।

मैंने माँ से पूछा, माँ ने मुझे डपट दिया सुंदर...। क्या सुंदर-सुंदर' लगा रखा है। घर की बला टली।

'वह तो ठीक है, मगर क्या नए खरीददार को यह बताया गया कि गाय के गुम हो जाने पर उसे बाजार में जाकर ढूँढ़ना होगा?'

माँ ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। उलटे मुझे डाँटने लगीं—'सुंदर नहीं...बंदर कहो उसे।'

मैंने सोचा, कम-से-कम उस मारवाड़ी के घर में तो माँ ने ऐसा नहीं कहा था, यही शुक्र है। अगर कह देती तो वह मारवाड़ी स्त्री चिल्लाई होती कि इसने मेरे बच्चे को बंदर कहा।

रात को मैं पिछवाड़े का दरवाजा बंद कर आया। इतने बड़े तमाशे के बीच सुंदर मेरी ओर से लापरवाह ही रही। ऐसा होते हुए भी मैं ही उसका नाम लेकर उसे याद करता था। उसके किसी गुण ने मुझे आकृष्ट कर लिया था।

मुझे उसके नए मालिक पर दया आई। बिना किसी सवाल के पूरा पैसा देकर गाय ले गया था, पता नहीं वह उसकी गौशाला में है या बाजार की तरफ भाग गई। मुझे उस रात नींद ही नहीं आई। मुझे बार-बार बस यही खयाल आता कि जरूर सुंदर मारवाड़ी के घर भाग गई होगी। जैसे भी हो, गाय को ढूँढ़ते हुए वह सुबह यहाँ जरूर आएगा। यहीं से एक बैलगाड़ी लेकर जाना होगा। वह इस वक्त शायद आ ही रहा हो?

सुबह दरवाजा खुलने पर वह दिखाई नहीं दिया। रस्सी तोड़कर आई हुई सुंदर खड़ी थी।

- अलकनंदा सिंंह

Friday, 29 July 2022

सावन में ब्रज: संत सनातन स्‍वामी और उनके ठाकुर मदनमोहन


 प्रारंभ करूंगी सनातन स्‍वामी के इस पद से- 


जो करैं प्यारे सो मो हितकारी ।

गरभ में पालन नर तन पोषण सदगुरु भेंटे जाऊँ बलिहारी ।१।

नीकी काल आज अब नीकी तिन चरनन कल हू सुखकारी ।

प्रीति प्रतीति रसरीति बढ़त दिन सब अनुकूल सबहि उपकारी ।२।

तन वन मन निकुंज मनरंजन मधुर केलि विलसैं पिय प्यारी ।

कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि भज जुगल मंत्र नित आनंदकारी ।३।


अब पढ़िए सनातन स्‍वामी के बारे में- 


सनातन गोस्वामी ने अपनी कुटिया के निकट ही एक फूँस की झोंपड़ी का निर्माण किया और उसमें मदनगोपाल जी को स्थापित किया। उनके भोग के लिये वे मधुकरी (साधु-संन्यासियों की वह भिक्षा जिसमें केवल पका हुआ भोजन लिया जाता हैपर ही निर्भर करते। मधुकरी में जो आटा मिलता उसकी अंगाकड़ी (बाटी) बनाकर भोग के रूप में उनके सामने प्रस्तुत करते। साथ में निवेदन करते जंगली पत्तियों का बना अलोना साग। कुछ दन बीते ठाकुर को इस आटे के पिंड और अलोने साग को किसी प्रकार निगलते। संकोच में पड़कर वे अपने प्रेमी भक्त से कुछ न कह सके। पर अन्त में उनसे न रहा गया। स्वप्न में दर्शन देकर कहा-

"सनातन, अलोने (बिना नमक का) साग के साथ तुम्हारी अंगाकड़ी मेरे गले के नीचे नहीं उतरतीं और कब तक उसे जबरदस्ती ठेलता रहूँगा। उसके साथ थोड़ा नमक दिया करो न।"

सनातन के नेत्रों से बह चली प्रेमाश्रु की धारा। कातर स्वर से उन्होंने कहा-

"प्रभु मैं ठहरा आपका एक तुच्छ सेवक, जिसका डोर-कौपीन के सिवा कोई सम्बल नहीं। आप आज नमक की कह रहे हैं, कल गुड़ की कहेंगे, रसों राजभोग की, तो मैं कहाँ से लाऊँगा? यदि आपकी राजभोग की इच्छा है, तो स्वयं ही उसकी व्यवस्था कर लें।"

यह कैसी सनातन की निष्टुरता अपने ही प्राणप्रिय मदनगोपाल के प्रति! जिनकी सेवा की तीव्र आकाँक्षा ने उन्हें पागल कर रखा था, उन्हीं की सेवा में ऐसी कृपणता और उदासीनता! ऐसी कौन सी वस्तु थी, जिसे विरक्त होते हुए भी मदनगोपाल की सेवा के लिए वे संग्रह नहीं कर सकते थे, जब उन जैसे महात्मा की इच्छापूर्ति करने के किसी भी अवसर के लिए बड़े-बड़े धनी व्यक्ति लालायित रहते थे? बात कुछ गूढ़ है। थोड़ा गहराई में उतरे बिना समझ में आने की नहीं। सनातन मदनगोपाल की सेवा के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर सकते थे, पर उस भजन-पथ को नहीं त्याग सकते थे, जो उनकी सर्वोत्तम सेवा का अधिकार जन्माने के लिए आवश्यक था। उनकी सर्वोत्तम सेवा है मानसी-सेवा। मानसी-सेवा में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं होता। देश, काल, समाज और प्रकृति के नियमों की सीमा से बाहर रहकर इष्ट की प्राणभर मनचाही सेवा कर उन्हें सुखी कर सकता है। मानसी-सेवा का अधिकार प्राप्त उसे होता है, जिसका अन्त:करण शुद्ध होता है। अन्त:करण की शुद्धि के लिये त्याग-वैराग्ययुक्त एकांतिक भजन-पथ का अनुशीलन आवश्यक है। यदि सनातन मदनगोपाल के राजभोग के लिए तरह-तरह की सामग्री जुटाने में लग जाते, तो उनकी परापेक्षा बढ़ जाती और वे एकांतिक भजन-पथ से च्युत हो जाते। इष्ट की सर्वोत्तम मानसी-सेवा की योग्यता प्राप्त करने के लिए उनकी व्यावहारिक सेवा की सीमा बाँधना आवश्यक था।

इसके अतिरिक्त स्वयं उनके इष्ट ने महाप्रभु में जगद्गुरु का दायित्व ओटते हुए उन्हें आज्ञा दी थी वैराग्यमय जीवन का चरम आदर्श स्थापित करने की। गुरु-आज्ञा ईश्वराज्ञा से भी अधिक बलवती है। तब वे गुरुरूपी इष्ट की आज्ञा का पालन करते या उपास्यरूपी इष्ट की इच्छा की पूर्ति करते? इसीलिए उन्हें दो टूक कह देना पड़ा मदनगोपालजी से-अपने उत्तम भोग की व्यवस्था आप स्वयं कर लें। यदि कहा जाय कि ऐसा कह सनातन गोस्वामी ने उनकी मर्यादा की हानि की, तो इसके लिए भी मूल रूप से दोषी मदनगोपाल ही हैं। वे क्या जानते नहीं थे कि सनातन एक निष्किञ्चन साधक हैं, जिनका डोर-कौपीन के सिवा दूसरा कोई सम्बल नहीं? उनकी सेवा अंगीकार करने के पहले उन्हें नहीं समझ लेना चाहिए था कि उन्हें भी उन्हीं की तरह रूखी-सूखी खाकर रहना पड़ेगा? असल बात यह है कि उनसे अपने प्रेमी भक्तों के साथ चुहल किये बिना भी तो नहीं रहा जाता। वे उनके साथ जानबूझ कर अटपटा व्यवहार कर, उन्हें झूठा-सच्चा उलहना देकर या किसी न किसी प्रकार उन्हें उपहासास्पद स्थिति में डालकर और उनकी खरी-खोटी सुनकर प्रसन्न होते हैं। उन रसिक-शेखर को उनकी खरी-खोटी जितनी अच्छी लगती है, उतनी वेद-स्तुति भी अच्छी नहीं लगती।

-अलकनंदा सिंह

Sunday, 12 June 2022

 “You are not the victim of the world, but rather the master of your own destiny. It is your choices and decisions that determine your destiny.” ― Roy T. Bennett. 

 



These two pictures are enough to speak on today's environment.

#Stonepelting 


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