Thursday, 7 November 2019

कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले के जन्‍मदिन पर ....

मध्य प्रदेश के जिला बैतूल अंतर्गत गाँव जौलखेड़ा में 07 नवंबर को जन्‍मे प्रसिद्ध भारतीय कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले अपनी रचनाओं में सघन बुनावट और उनमें निहित राजनीतिक संवेदना के लिए जाने जाते हैं।
देश की 24 भाषाओं में विशेष साहित्यिक योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकारों में शामिल चंद्रकांत देवताले का देहावसान 14 अगस्त 2017 को हुआ.
उन्होंने अपनी कविता की कच्ची सामग्री मनुष्य के सुख दुःख, विशेषकर औरतों और बच्चों की दुनिया से इकट्ठी की थे. चूंकि बैतूल में हिंदी और मराठी बोली जाती है, इसलिए उनके काव्य संसार में यह दोनों भाषाएं जीवित थीं. मध्य भारत का वह हिस्सा जो महाराष्ट्र से छूता है, उसमें मराठी भाषा पहली या दूसरी भाषा के रूप में बोली जाती रही है. बैतूल भी ऐसी ही जगह है. अपने प्रिय कवि मुक्तिबोध की तरह देवताले मराठी से आंगन की भाषा की तरह बरताव करते थे. यह उनकी कविताओं में बार-बार देखा जा सकता है.
2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्‍मानित ने कवि गजानन माधव मुक्तिबोध पर पीएचडी की थी और इंदौर के एक कॉलेज में पढ़ाते थे.
वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। कविता की उनकी भाषा में अत्यंत पारदर्शिता और एक विरल संगीतात्मकता दिखाई देती है.
देवताले की कविताओं में जूता पॉलिश करते एक लड़के से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक जगह पाते हैं. वे ‘दुनिया के सबसे गरीब आदमी’ से लेकर ‘बुद्ध के देश में बुश’ तक पर कविताएं लिखते थे लेकिन सुखद यह है कि कविता के इस पूरे फैलाव में कहीं भी उनके गुस्से में कमी नहीं आती. वे अपने गुस्से को सर्जनात्मक बनाकर उससे भूख का निवारण चाहते हैं.
चंद्रकांत देवताले की 2 मशहूर कविताएं:
पत्थर की बैंच
जिस पर रोता हुआ बच्चा
बिस्कुट कुतरते चुप हो रहा है
जिस पर एक थका युवक
अपने कुचले हुए सपनों को सहला रहा है
जिस पर हाथों से आंखे ढांप
एक रिटायर्ड बूढ़ा भर दोपहरी सो रहा है
जिस पर वे दोनों
जिन्दगी के सपने बुन रहे हैं
पत्थर की बैंच
जिस पर अंकित है आंसू, थकान
विश्राम और प्रेम की स्मृतियां
इस पत्थर की बैंच के लिए भी
शुरु हो सकता है किसी दिन
हत्याओं का सिलसिला
इसे उखाड़ कर ले जाया
अथवा तोड़ा भी जा सकता है
पता नहीं सबसे पहले कौन आसीन हुआ होगा
इस पत्थर की बैंच पर!
................................................
मेरे होने के प्रगाढ़ अँधेरे को
पता नहीं कैसे जगमगा देती हो तुम
अपने देखने भर के करिश्मे से
कुछ तो है तुम्हारे भीतर
जिससे अपने बियाबान सन्नाटे को
तुम सितार-सा बजा लेती हो समुद्र की छाती में
अपने असंभव आकाश में
तुम आज़ाद चिड़िया की तरह खेल रही हो
उसकी आवाज़ की परछाई के साथ
जो लगभग गूँगा है
और मै कविता के बंदरगाह पर खड़ा
आँखे खोल रहा हूँ गहरी धुंध में
लगता है काल्पनिक ख़ुशी का भी
अंत हो चुका है
पता नहीं कहाँ किस चट्टान पर बैठी
तुम फूलों को नोच रही हो
मै यहाँ दुःख की सूखी आँखों पर
पानी के छींटें मार रहा हूँ
हमारे बीच तितलियों का अभेद्य पर्दा है शायद
जो भी हो
उड़ रहा हूँ तुम्हारी खनकती आवाज़ के
समुन्दर पर
हंस ध्वनि की तन की तरंगों के साथ
जुगलबंदी कर रहे हैं
मेरे फड़फड़ाते होंठ
याद है न जितनी बार पैदा हुआ
तुम्हें मैंने बैजनी कमल कहकर पुकारा
और अब भी अकेलेपन की पहाड़ से उतरकर
मैं आऊँगा हमारी परछाइयों के ख़ुशबूदार
गाते हुए दरख़्त के पास
मैं आता रहूँगा उजली रातों में
चन्द्रमा को गिटार-सा बजाऊँगा
तुम्हारे लिए
-Legend News

Thursday, 31 October 2019

निरक्षर शायर रफीक शादानी की रचना है एक मिसाल

Illiterate shair Rafiq Shadani's indite is an example

अयोध्‍या में मुमताजनगर गांव के निवासी अजीम शायर रफीक शादानी की यह रचना गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है।
अपने क्षेत्र में कबीर माने जाने वाले शायर रफीक शादानी ने रामलला के मेक शिफ्ट स्ट्रक्चर को वर्ष 2005 में बम से उड़ाने आए आतंकवादियों पर मंच से पढ़ा था-
नोट की गड्डी पाई गये तो तन डोला मन डोला/रामलला पर फैंके आए कुछ लोगै हथगोला। उन्हीं के हाथे मा दगिगा हुइगे उडनखटोला/ और.. बड़े बहादुर बनत हौ बेटा, आई के देखौ फैजाबाद!
9 फरवरी 2010 को बहराइच में हुई वाहन दुर्घटना में इंतकाल से पहले मुशायरों की शान हुआ करते थे। उनके गांव में आज भी हिंदू-मुस्लिम मिलकर रामलीला करते हैं।
ऐसा ही समां अयोध्या की सोंधी मिट्टी सदियों रोशन करती आ रही है। उर्दू अदब के महान शायर मीर अनीस, मीर गुलाम हसन, ख़्वाजा हैदर अली आतिश, नवाब सैयद मोहम्मद खां हिंद, मोहम्मद रफी सौदा, पं. बृज नारायण चकबस्त, मिर्जा हातिम अली बेग महर, मजाज रुदौलवी, मेराज फैजाबादी, सैयद शमीम अहमद शमीम को जिसने भी पढ़ा व सुना, उसे सांप्रदायिकता की हवा कभी छू नहीं सकती।
भगवत गीता का उर्दू में अनुवाद करने वाले अनवर जलालपुरी का पिछले साल ही इंतकाल हुआ, उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।
फैजाबाद के मोतीबाग में 9 सितंबर 1927 पैदा हुए समकालीन हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष कुंवर नारायण को तो अयोध्या 1992 : हे राम, जीवन एक कटु यथार्थ है।
और तुम एक महाकाव्य! तुम्हारे बस की नहीं।
उस अविवेक पर विजय/ जिसके दस बीस नहीं अब लाखों सर।
लाखों हाथ हैं, और विभीषण भी अब न जाने किसके साथ है।
कविता लिखने पर धमकी दी गई थी। उनका निधन 15 नवंबर 2017 को 90 वर्ष की उम्र में हुआ। उन्‍हें ज्ञानपीठ मिलने के बाद 2009 में पद्मभूषण अवॉर्ड दिया गया, साहित्य अकादमी पुरस्कार उनको 1995 में ही मिल चुका था।
समाजसेवी सूर्यकांत पांडेय कहते हैं कि आध्यात्मिक गुरु संत पं. रामकृष्ण पांडेय आमिल की रचना-हकीरों में फकीरों में जरा मिल बैठ कर देखो, पता चल जाएगा आमिल मुझे कुछ भी नहीं आता..। हमेशा सौहार्द का संदेश देती है।
शहर के कसाबबाड़ा मोहल्ले में रहने वाले अजीम शायर सैयद शमीम अहमद शमीम अब हमारे बीच नहीं है मगर उनकी रचनाएं आज भी एकता का अटूट संदेश देती हैं, उन्होंने लिखा है कि सभ्यताओं का इसे शीश महल कहते हैं/कुछ तो ऐसे हैं जो जन्नत का बदल कहते हैं।
कोई कहता है अवध और कोई फैजाबाद/हम जुनूं वाले इसे शहर-ए-गजल कहते हैं। कैंसर की बीमारी से 71 वर्ष की उम्र में 30 नवंबर 2013 को लखनऊ में अंतिम सांस लेने वाले सोहावल के कोला गांव निवासी अजीम शायर मेराज फैजाबादी आपसी एकता व सौहार्द के साथ इंसानियत के मिसाल थे, वे लिखते हैं कि-किसको फिक्र है कि कबीले का क्या हुआ, सब इस बार लड़ रहे हैं कि सरदार कौन है। अंबेडकरनगर के प्रो. मलिकजादा मंजूर व श्रीराम सिंह शलभ न रहते हुए भी अपनी रचनाओं से आज भी लोगों के सांसों की डोर बांधे हुए हैं।
साकेत पीजी कॉलेज में वाणिज्य संकाय के अध्यक्ष डॉ. मिर्जा साहेब शाह कहते हैं कि बृज नारायण चकबस्त (1882-1926) का राठ हवेली मोहल्ला में जन्म हुआ था, बाद में लखनऊ के काश्मीरी मोहल्ला में बस गये। उनकी गजलें व नज्में सुबह-ए-वतन, खाक़े हिंद, रामायण का एक सीन कभी नहीं भूलतीं। वे लिखते हैं कि-गुल सम-ए-अंजुमन है, गो अंजुमन वही है, हुब्बे वतन नहीं है, खाके वतन वही है..।
डॉ. मिर्जा कहते हैं कि रफीक साहब निरक्षर थे मगर उनकी रचनाओं में गहराई बहुत थी। सब उनको फैजाबाद का कबीर कहते थे। शत्रुघ्न सिंह कहते हैं कि फोर्ब्‍स इंटर कालेज में रफीक साहेब मुशायरे का संचालन कर रहे थे, 1992 के पहले की बात है जब राममंदिर के लिए चंदे जुटाया जा रहा था।
इस प्रहार करते हुए वे बोले-का करिहैं चंदा मंगिहैं, जनता से छल-बल का करिहैं। जब राम का मंदिर बनि जाए, तब जोसी सिंघल का करिहैं।.. इसे सुन लोगों ने खड़े होकर मुसलमानों से ज्यादा हिंदुओं ने दाद दी।
जिले के रुदौली के रहने वाले लखनऊ विवि में प्रो. शारिब रूदौलवी आज भी एकता का राग मंचों पर साझा करते हैं। बीकापुर में रहने वाले भारत भूषण से सम्मानित कवि जमुना उपाध्याय कहते हैं कि-नदी के घाट पर गर सियासी लोग बस जाएं, प्यासे होठ एक-एक बूंद को तरस जाएं..।
हमें आने वाले वक्त में भी अयोध्या के माहौल पर सावधान रहना चाहिए। शहर के जफ्ती मोहल्ले में रहने वाले शायर सलाम जाफरी सुनाते हैं कि-जब भी इंसान ने इंसान से नफरत की है, प्यार हारा है, तबाही ने हुकूमत की है…। वे कहते हैं कि अभी अयोध्या पर फैसले का इंतजार हो रहा है, फैसला आने के बाद का माहौल शहर में अमनोअमन का भविष्य तय करेगा। यहां के लोग तो 1992 में भी प्यार से थे, मगर तबाही तो बाहर के लोगों ने मचाई।

Sunday, 27 October 2019

दीपावली की शुभकामनाओं के साथ ....बुझे दीपक जला लूँ- महादेवी वर्मा

सब बुझे दीपक जला लूँ!
घिर रहा तम आज दीपक-रागिनी अपनी जगा लूँ!

क्षितिज-कारा तोड़ कर अब
गा उठी उन्मत आँधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास-तन्मय तड़ित् बाँधी,
धूलि की इस वीण पर मैं तार हर तृण का मिला लूँ!

भीत तारक मूँदते दृग
भ्रान्त मारुत पथ न पाता
छोड़ उल्का अंक नभ में
ध्वंस आता हरहराता,
उँगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूँ!

लय बनी मृदु वर्त्तिका
हर स्वर जला बन लौ सजीली,
फैलती आलोक-सी
झंकार मेरी स्नेह गीली,
इस मरण के पर्व को मैं आज दीपावली बना लूँ!

देख कर कोमल व्यथा को
आँसुओं के सजल रथ में,
मोम-सी साधें बिछा दी
थीं इसी अंगार-पथ में
स्वर्ण हैं वे मत हो अब क्षार में उन को सुला लूँ!

अब तरी पतवार ला कर
तुम दिखा मत पार देना,
आज गर्जन में मुझे बस
एक बार पुकार लेना !
ज्वार को तरणी बना मैं; इस प्रलय का पार पा लूँ!
आज दीपक राग गा लूँ !

Tuesday, 22 October 2019

शताब्दियाँ जिनका इंतजार करती हैं, ऐसे कवि और शायर थे अदम गोंडवी

22 अक्टूबर 1947 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिला अंतर्गत आटा परसूपुर गाँव में जन्‍मे अदम गोंडवी की मृत्‍यु 18 दिसंबर 2011 को हुई। सामाजिक राजनीतिक आलोचना के प्रखर कवि और शायर अदम गोंडवी का असली नाम यूं तो रामनाथ सिंह था लेकिन सबने उन्हें ‘अदम गोंडवी’ के नाम से ही जाना।
उनकी रचनाओं में राजनीति और व्यवस्था पर किए गए कटाक्ष काफी तीखे हैं। उनकी शायरी में जनता की गुर्राहट और आक्रामक मुद्रा का सौंदर्य नजर आता है। लेखनी में सत्ता पर शब्दों के बाण चलाना अदम की रचनाओं की खासियत है। उनकी निपट गंवई अंदाज में महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई को हैरान कर देने वाली अदा सबसे जुदा और विलक्षण है।
अदम की रचनाओं का अंदाज कुछ ऐसा था-
(1)
काजू भुने पलेट में व्हिस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गई है यहां की नखास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूं मैं होशो-हवास में
(2)
तुम्‍हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जमहूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ’ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है
तुम्‍हारी मेज चांदी की तुम्‍हारे ज़ाम सोने के
यहाँ जुम्‍मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
(3)
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है
भटकती है हमारे गांव में गूंगी भिखारन-सी
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में
मैं जब भी देखता हूं आंख बच्चों की पनीली है
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है
(4)
आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
तालिबे-शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
एक जन सेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें माइक रहे माला रहे
वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित शायर मुनव्वर राना की किताब ‘ढलान से उतरते हुए’ में मुनव्वर लिखते हैं- ”अदम जी ठाकुर थे, राजपूत ठाकुर। ज़मींदार भी थे, छोटे-मोटे ही सही। ज़ुल्म और नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ बग़ावती तेवर और क़ागज़ क़लम उठाने के लिए किसी जाति विशेष का होना ज़रूरी नहीं होता। यह फूल तो किसी भी बाग़ में, किसी भी गमले में और कभी-कभी तो कीचड़ में भी खिल जाता है। समाजी नाइंसाफ़ियों और नहमवारियों के ख़िलाफ़ उठी आवाज को ग़ज़ल बना देना सबके बस की बात नहीं होती, इसके लिए शताब्दियाँ किसी अच्छे कवि का इंतज़ार करती हैं।”
-Legend News

Thursday, 10 October 2019

Olga Tokarjuk को 2018, पीटर हैंडके को 2019 के लिए साहित्य का नोबेल

स्टॉकहोम/स्वीडन। नोबेल पुरस्कारों की सीरीज में गुरुवार को साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेताओं की घोषणा हो गई है। वर्ष 2018 के लिए पोलैंड की लेखिका Olga Tokarjuk को इस पुरस्कार से नवाजा जाएगा जबकि साल 2019 का पुरस्कार आस्ट्रियाई लेखक पीटर हैंडके को दिया जाएगा।
साल 2018 और 2019 के लिए साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार की घोषणा गुरुवार को की गई। पोलिश लेखिका Olga Tokarjuk को साल 2018 के लिए साहित्य नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। पिछले साल विवादों के कारण इसे स्थगित किया गया था।
लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता ओल्गा टोकारजुक को मौजूदा पीढ़ी के व्यावसायिक रूप से सफल लेखकों में से एक के रूप में जाना जाता है। 2018 में, उन्हें उपन्यास फ्लाइट्स (जेनिफर क्रॉफ्ट द्वारा अनुवादित) के लिए बुकर प्राइज से नवाजा गया था। यह पुरस्कार जीतने वाली वह पोलैंड की पहली लेखिका हैं।
उन्होंने वारसॉ विश्वविद्यालय से मनोवैज्ञानिक के तौर पर प्रशिक्षण लिया है और छोटी गद्य रचनाओं के साथ कविताओं, कई उपन्यासों, साथ ही अन्य पुस्तकों का संग्रह प्रकाशित किया। ‘फ्लाइट्स’ ने 2008 में, पोलैंड का शीर्ष साहित्यिक पुरस्कार नाइकी अवार्ड भी जीता।
मीटू के चलते पिछले साल नहीं दिया गया था साहित्य का नोबेल
पिछले साल नोबेल संस्थान की एक पूर्व सदस्या के पति फ्रांसीसी फोटोग्राफर ज्यां क्लाउड अर्नाल्ट पर यौन शोषण के आरोप लगे थे। इसके बाद स्वीडन की अकादमी को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। इसी वजह से उसने 2018 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार नहीं देने की घोषणा की थी।
1936 में भी नहीं दिए गए थे पुरस्कार
हालांकि ये पहला मौका नहीं था। इससे पहले 1936 में भी पुरस्कार नहीं दिए गए थे। उस साल का पुरस्कार एक साल बाद इयुगेन ओ’नील को दिया गया था।


Thursday, 19 September 2019

नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण का जन्मद‍िन आज

नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण तीसरा सप्तक (१९५९) के प्रमुख कवियों में रहे हैं, आज ही के द‍िन यान‍ि १९ सितंबर १९२७ को वे जन्मे थे।
तीसरा सप्तक अज्ञेय द्वारा संपादित नई कविता के सात कवियों की कविताओं का संग्रह है। इसमें कुँवर नारायण, कीर्ति चौधरी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्स्यायन, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह और विजयदेवनरायण साही की रचनाएँ शाम‍ि‍ल  थींं
 
कुंवर नारायण का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं। उन्होंने अपनी मूल विधा कविता ही रखी परंतु उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। ‘तनाव‘ पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है। 2009 में कुँवर नारायण को वर्ष 2005 के लिए देश के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
आज पढ़‍िये उनकी कुछ रचनायें जो मुझे बेहद अजीज़ हैं - 
अयोध्या, 1992
हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर – लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है !
हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान – किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक….
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !
अबकी बार लौटा तो
अबकी बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूंगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से
अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूंगा
घर से निकलते
सड़को पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं
अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूंगा
अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा
किसी पवित्र इच्छा की घड़ी में
व्यक्ति को
विकार की ही तरह पढ़ना
जीवन का अशुद्ध पाठ है।
वह एक नाज़ुक स्पन्द है
समाज की नसों में बन्द
जिसे हम किसी अच्छे विचार
या पवित्र इच्छा की घड़ी में भी
पढ़ सकते हैं ।
समाज के लक्षणों को
पहचानने की एक लय
व्यक्ति भी है,
अवमूल्यित नहीं
पूरा तरह सम्मानित
उसकी स्वयंता
अपने मनुष्य होने के सौभाग्य को
ईश्वर तक प्रमाणित हुई !

Sunday, 15 September 2019

"एक पखवाड़े की जीवनयात्रा" वाले कव‍ि थे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

हिंदी नई कविता के सबसे प्रखर किरदारों में से एक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के साथ एक एसा संयोग जुड़ा है जैसा हिंदी के किसी साहित्यकार के साथ नहीं है। वह पैदा भी हिंदी पखवाड़े में हुए (सितंबर 15, 1927) और निधन भी हिंदी पखवाड़े में हुआ (सितंबर 24, 1983)।
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में एक साधारण परिवार में जन्मे सर्वेश्वर की शिक्षा बस्ती, बनारस और इलाहाबाद में हुई, कुछ समय तक स्कूल मास्टरी की और थोड़े समय तक क्लर्की दोनों ही जगहों पर जब मन नहीं लगा तो इस्तीफ़ा देकर दिल्ली आ गए जहां कुछ वर्ष उन्होंने आकाशवाणी में समाचार विभाग में काम किया। आगे चलकर ‘दिनमान’ के उप संपादक रहे और ‘पराग’ पत्रिका के संपादक।
सर्वेश्वर अपने समय में अपने समकालीन लोगों के मध्य में सबसे साफ नज़रिए के आदमी थे। उनके भीतर न मुक्तिबोध जैसा मध्यवर्गीय ऊहापोह था न श्रीकांत वर्मा जैसा महसूस किया गया ‘बुखार’।
वह जितना सृजन के महत्व से परिचित थे उतना ही उसकी सीमा से, मूल्यों और ध्येय की इस निर्द्वंदता ने उनके लेखन में जो अभूतपूर्व स्पष्टता और ईमानदारी पैदा की वह सर्वत्र उनकी कविताओं में दिखायी देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी प्रतिबद्धता को लेकर दुविधाग्रस्त थे। अपनी ‘साधारणता’ और सहज आत्मीयता के साथ वह घोषित रूप से आम आदमी के संग खड़े थे।
पढ़‍िए उनकी कुछ कव‍िताऐं – 
देह का संगीत
मूझे चूमो
और फूल बना दो
मुझे चूमो
और फल बना दो
मुझे चूमो
और बीज बना दो
मुझे चूमो
और वृक्ष बना दो
फिर मेरी छाँह में बैठ रोम रोम जुड़ाओ ।
मुझे चूमो
हिमगिरि बना दो
मुझे चूमो
उद्गम सरोवर बना दो
मुझे चूमो
नदी बना दो
मुझे चूमो
सागर बना दो
फिर मेरे तट पर धूप में निर्वसन नहाओ ।
मुझे चूमो
खुला आकाश बना दो
मुझे चूमो
जल भरा मेघ बना दो
मुझे चूमो
शीतल पवन बना दो
मुझे चूमो
दमकता सूर्य बना दो
फिर मेरे अनंत नील को इंद्रधनुष सा लपेट कर
मुझमें विलय हो जाओ।
ईश्वर
बहुत बडी जेबों वाला कोट पहने
ईश्वर मेरे पास आया था,
मेरी मां, मेरे पिता,
मेरे बच्चे और मेरी पत्नी को
खिलौनों की तरह,
जेब में डालकर चला गया
और कहा गया,
बहुत बडी दुनिया है
तुम्हारे मन बहलाने के लिए।
मैंने सुना है,
उसने कहीं खोल रक्खी है
खिलौनों की दुकान,
अभागे के पास
कितनी जरा-सी पूंजी है
रोजगार चलाने के लिए।
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई
पेड़ों के झुनझुने,
बजने लगे;
लुढ़कती आ रही है
सूरज की लाल गेंद।
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।
तूने जो छोड़े थे,
गैस के गुब्बारे,
तारे अब दिखाई नहीं देते,
(जाने कितने ऊपर चले गए)
चांद देख, अब गिरा, अब गिरा,
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।
तूने थपकियां देकर,
जिन गुड्डे-गुड्डियों को सुला दिया था,
टीले, मुंहरंगे आंख मलते हुए बैठे हैं,
गुड्डे की ज़रवारी टोपी
उलटी नीचे पड़ी है, छोटी तलैया
वह देखो उड़ी जा रही है चूनर
तेरी गुड़िया की, झिलमिल नदी
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।
तेरे साथ थककर
सोई थी जो तेरी सहेली हवा,
जाने किस झरने में नहा के आ गई है,
गीले हाथों से छू रही है तेरी तस्वीरों की किताब,
देख तो, कितना रंग फैल गया
उठ, घंटियों की आवाज धीमी होती जा रही है
दूसरी गली में मुड़ने लग गया है बूढ़ा आसमान,
अभी भी दिखाई दे रहे हैं उसकी लाठी में बंधे
रंग बिरंगे गुब्बारे, कागज़ पन्नी की हवा चर्खियां,
लाल हरी ऐनकें, दफ्ती के रंगीन भोंपू,
उठ मेरी बेटी, आवाज दे, सुबह हो गई।
उठ देख,
बंदर तेरे बिस्कुट का डिब्बा लिए,
छत की मुंडेर पर बैठा है,
धूप आ गई।
लीक पर वे चलें
लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।
साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट,
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं।
शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ;
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़,
हिलती क्षितिज की झालरें;
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं।
लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
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