Tuesday, 13 February 2018

आज महाशिवरात्रि पर जानिए- क्‍या है महामृत्युंजय मंत्र की पूर्ण व्‍याख्‍या

आपने अकसर देखा सुना होगा धार्मिकजन किसी शारीरिक व मानसिक परेशानियों को दूर करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र की आराधना-जाप के बारे में बताते हैं मगर ऐसा क्‍यों, यह जानने के लिए इस महामंत्र की व्‍याख्‍या को जानना जरूरी है।


महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र -

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ’ लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे ‘त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है।

मंत्र विचार :
इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है।
इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।

शब्द बोधक -

‘त्र’ ध्रुव वसु ‘यम’ अध्वर वसु
‘ब’ सोम वसु ‘कम्‌’ वरुण
‘य’ वायु ‘ज’ अग्नि
‘म’ शक्ति ‘हे’ प्रभास
‘सु’ वीरभद्र ‘ग’ शम्भु
‘न्धिम’ गिरीश ‘पु’ अजैक
‘ष्टि’ अहिर्बुध्न्य ‘व’ पिनाक
‘र्ध’ भवानी पति ‘नम्‌’ कापाली
‘उ’ दिकपति ‘र्वा’ स्थाणु
‘रु’ भर्ग ‘क’ धाता
‘मि’ अर्यमा ‘व’ मित्रादित्य
‘ब’ वरुणादित्य ‘न्ध’ अंशु
‘नात’ भगादित्य ‘मृ’ विवस्वान
‘त्यो’ इंद्रादित्य ‘मु’ पूषादिव्य
‘क्षी’ पर्जन्यादिव्य ‘य’ त्वष्टा
‘मा’ विष्णुऽदिव्य ‘मृ’ प्रजापति
‘तात’ वषट

इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं, वे देवताओं के नाम हैं।

शब्द की शक्ति-
शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-  जैसे त्र्यम्बक का पूर्ण विवरण इस प्रकार है-


त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र
 ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘म’ मंगल ‘ब’ बालार्क तेज
‘कं’ काली का कल्याणकारी बीज ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘जा’ जालंधरेश ‘म’ महाशक्ति
‘हे’ हाकिनो ‘सु’ सुगन्धि तथा सुर
‘गं’ गणपति का बीज ‘ध’ धूमावती का बीज
‘म’ महेश ‘पु’ पुण्डरीकाक्ष
‘ष्टि’ देह में स्थित षटकोण ‘व’ वाकिनी
‘र्ध’ धर्म ‘नं’ नंदी
‘उ’ उमा ‘र्वा’ शिव की बाईं शक्ति
‘रु’ रूप तथा आँसू ‘क’ कल्याणी
‘व’ वरुण ‘बं’ बंदी देवी
‘ध’ धंदा देवी ‘मृ’ मृत्युंजय
‘त्यो’ नित्येश ‘क्षी’ क्षेमंकरी
‘य’ यम तथा यज्ञ ‘मा’ माँग तथा मन्त्रेश
‘मृ’ मृत्युंजय ‘तात’ चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण ‘देवो भूत्वा देवं यजेत’ के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।

प्रस्‍तुति : वेदोक्‍त विधियों से संकलन के आधार पर

Thursday, 8 February 2018

Nida Fazli साहब ने हमेशा रोटी, चटनी और मां से जुड़े लफ़्जों को जिया

भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से नवाजे गए निदा फ़ाज़ली की आज पुण्‍यतिथि है, उन्‍होंने आज ही के दिन 8 फरवरी 2016 को मुंबई में इस दुनिया को अलविदा कहा।
निदा फ़ाज़ली हिंदुस्तानी तहजीब में ‘वाचिक-परंपरा’ के शायर हैं. वाचिकी के लिए ये बेहद जरूरी है की बात चित्रों के जरिए की जाय. रोटी, चटनी, फूंकनी, खुर्री-खाट, कुण्डी कुलमिलाकर मां से जुड़े हर प्रतीक के सहारे निदा ने मां को जिया है। 
निदा फाजली दोहों की सरपरस्ती करते हैं इसीलिए प्रतीकों से दिलचस्पी रखते हैं.
लीजिए आप भी पढ़िए और महसूस कीजिए ज़िंदादिल शायर की ज़िंदादिली….
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो
यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
……………….

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया
बात बहुत मा’मूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया .

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Thursday, 28 December 2017

आज सुमित्रानंदन पंत की पुण्‍यतिथि है इस अवसर पर उनकी कुछ कविताएँ

आज सुमित्रानंदन पंत की पुण्‍यतिथि है इस अवसर पर उनकी कुछ कविताएँ 

सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० - २८ दिसम्बर १९७७)  हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में  से एक हैं। छायावादी युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे  कवियों का युग कहा जाता है।

बागेश्वर (उत्‍तराखंड) में जन्‍म लेने के कारण झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने।

निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के  रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही।

उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।



1. सुख-दुख

सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन;
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन !

मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
मैं नहीं चाहता चिर-दुख,
सुख दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख !
जग पीड़ित है अति-दुख से
जग पीड़ित रे अति-सुख से,
मानव-जग में बँट जाएँ
दुख सुख से औ’ सुख दुख से !

अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न;
दुख-सुख की निशा-दिवा में,
सोता-जगता जग-जीवन !

यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;
चिर हास-अश्रुमय आनन
रे इस मानव-जीवन का !



2. जीना अपने ही में

जीना अपने ही में… एक महान कर्म है
जीने का हो सदुपयोग… यह मनुज धर्म है
अपने ही में रहना… एक प्रबुद्ध कला है
जग के हित रहने में… सबका सहज भला है
जग का प्यार मिले… जन्मों के पुण्य चाहिए
जग जीवन को… प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए
ज्ञानी बनकर… मत नीरस उपदेश दीजिए
लोक कर्म भव सत्य… प्रथम सत्कर्म कीजिए



3. मोह

छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?
भूल अभी से इस जग को!
तज कर तरल-तरंगों को,
इन्द्र-धनुष के रंगों को,
तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन?
भूल अभी से इस जग को!
कोयल का वह कोमल-बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल,
कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लूँ सजनि!  श्रवन?
भूल अभी से इस जग को!
ऊषा-सस्मित किसलय-दल,
सुधा रश्मि से उतरा जल,
ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन?
भूल अभी से इस जग को!



4. झर पड़ता जीवन डाली से

झर पड़ता जीवन-डाली से
मैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात!–
केवल, केवल जग-कानन में
लाने फिर से मधु का प्रभात!
मधु का प्रभात!–लद लद जातीं
वैभव से जग की डाल-डाल,
कलि-कलि किसलय में जल उठती
सुन्दरता की स्वर्णीय-ज्वाल!
नव मधु-प्रभात!–गूँजते मधुर
उर-उर में नव आशाभिलास,
सुख-सौरभ, जीवन-कलरव से
भर जाता सूना महाकाश!
आः मधु-प्रभात!–जग के तम में
भरती चेतना अमर प्रकाश,
मुरझाए मानस-मुकुलों में
पाती नव मानवता विकास!
मधु-प्रात! मुक्त नभ में सस्मित
नाचती धरित्री मुक्त-पाश!
रवि-शशि केवल साक्षी होते
अविराम प्रेम करता प्रकाश!
मैं झरता जीवन डाली से
साह्लाद, शिशिर का शीर्ण पात!
फिर से जगती के कानन में
आ जाता नवमधु का प्रभात!



5. अमर स्पर्श

खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!

खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।

क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!

तन में आएँ शैशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के व्रण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!

जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!

तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Friday, 1 December 2017

30 दिस. पुण्‍यतिथि है हिंदी गज़ल के पहले शायर दुष्यंत कुमार की, पढ़िए ये चुनिंदा रचनाएं

हिंदी गज़ल के पहले शायर और सत्ता के खिलाफ मुखर होकर खड़े होने वाले लेखक दुष्यंत कुमार की आज पुण्‍यतिथि है. उनकी गज़लों के कुछ शेर युवाओं की ज़ुबां पर चढ़े हुए हैं. 1 सितंबर 1933 को उत्तर प्रदेश के राजपुर नवादा में जन्मे दुष्यंत कुमार को इलाहाबाद ने खूब संवारा. उसके बाद दिल्ली और भोपाल में भी वो कई वर्षों तक रहे. 30 दिसम्‍बर 1975 को उनका देहावसान हो गया.
दुष्यन्त कुमार त्यागी समकालीन हिन्दी कविता के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने कविता, गीति नाट्‌य, उपन्यास आदि सभी विधाओं पर लिखा है । उनकी गज़लों ने हिन्दी गज़ल को नया आयाम दिया । उर्दू गज़लों को नया परिवेश और नयी पहचान देते हुए उसे आम आदमी की संवेदना से जोड़ा ।
उनकी हर गज़ल आम आदमी की गज़ल बन गयी है, जिसमें चित्रित है, आम आदमी का संघर्ष, आम आदमी का जीवनादर्श, राजनैतिक विडम्बनाएं और विसंगतियां । राजनीतिक क्षेत्र का जो भ्रष्टाचार है, प्रशासन तन्त्र की जो संवेदनहीनता है, वही इसका स्वर है । दुष्यन्त कुमार ने गज़ल को रूमानी तबिअत से निकालकर आम आदमी से जोड़ने का कार्य किया है ।
कवि दुष्यन्त कुमार त्यागी का जन्म 1 सितम्बर सन् 1933 में बिजनौर जनपद की नजीबाबाद तहसील के अन्तर्गत नांगल के निकट ग्राम-नवादा में एक सम्पन्न त्यागी परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री भगवतसहाय तथा माता श्रीमती राजकिशोरी थीं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा नहटौर, जनपद-बिजनौर में हुई ।
उनके हाई स्कूल की परीक्षा एन॰एस॰एम॰ इन्टर कॉलेज चन्दौसी, जिला-मुरादाबाद से उत्तीर्ण की थी । उनका विवाह सन् 1949 में सहारनपुर जनपद निवासी श्री सूर्यभानु की सुपुत्री राजेश्वरी से हुआ । उन्होंने सन् 1954 में हिन्दी में एम॰ए॰ की उपाधि प्राप्त की ।
सन् 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में पटकथा लेखक के रूप में कार्य करते हुए सहायक निदेशक के पद पर उन्नत होकर सन् 1960 में भोपाल आ गये । साहित्य साधना स्थली भोपाल में 30 दिसम्बर 1975 में मात्र 42 वर्ष की अल्पायु में वे साहित्य जगत् से विदा हो गये ।
उन्होंने इतने अल्प समय में भी नाटक, एकांकी, रेडियो नाटक, आलोचना तथा अन्य विधाओं पर अपनी सशक्त लेखनी चलायी । उनकी रचनाओं में ”सूर्य का स्वागत”, ”आवाजों के घेरे में”, ”एक कण्ठ विषपायी”, ”छोटे-छोटे सवाल”, ”साये में धूप”, “जलते हुए वन का वसंत”, ”आगन में एक वृक्ष”, ”दुहरी जिन्दगी” प्रमुख हैं ।
साये में धूप से उनको विशेष पहचान मिली, जिसमें गज़लों का आक्रामक तेवर अन्दर तक तिलमिला देने वाला है । देशभक्तों ने आजादी के लिए इतनी कुरबानियां दी थीं कि देश का प्रत्येक व्यक्ति शान्ति और सुख से सामान्य जीवन जी सके, किन्तु राजतन्त्र एवं प्रशासन तन्त्र ने आम आदमी की ऐसी दुर्दशा की है।
उनकी कुछ अतिप्रसिद्ध रचनाऐं
कहा तो तै था, चिरागां हरेक घर के लिए,
कहां चिराग मयस्सर नही, शहर के लिए ।
आम आदमी बदहाली में जीने की विवशता पर-
न हो तो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब है, इस सफर के लिए ।
आजादी के बाद हम अपनी संस्कृति को भूलकर शोषण की तहजीब को आदर्श माने जाने पर-
अब नयी तहजीब की पेशे नजर हम,
आदमी को भूनकर खाने लगे हैं।
गरीबी व भुखमरी पर-
कई फांके बिताकर मर गया जो, उसके बारे में,
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा ।
संवेदनाएं इतनी मर गयी हैं, कवि के शब्दों में-
इस शहर में हो कोई बारात या वारदात ।
अब किसी बात पर नहीं, खुलती है खिड़कियां ।।
ऐसा नहीं है कि कवि व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं करना चाहता है; वह व्यवस्था तन्त्र को पूरी तरह बदल देना चाहता है-
सिर्फ हंगामा खड़ा करना, मेरा मकसद नहीं,
कोशिश ये है कि सूरत बदलनी चाहिए ।
वह परिवर्तन लाना चाहता है, आमूल-चूल परिवर्तन-
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं
पक गयी आदतें बातों से सर होंगी नहीं ।
कोई हंगामा खड़ा करो ऐसे गुजर होगी नहीं ।
आम आदमी की दुर्दशा और देश की दुर्दशा का व्यक्ति बिम्ब कवि के शब्दों में-
कल की नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है ।
कुलमिलाकर कवि दुष्यन्त कुमार एक ऐसे रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने गज़ल का परम्परागत रोमानी भावुकता से बाहर लाकर आम आदमी से जोड़ने का कार्य किया है ।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में आम आदमी की पीडा, शासकों का दोहरा चरित्र, चारित्रिक पतन, देश की दुर्दशा को देखकर कवि चुप नहीं रहना चाहता है; क्योंकि उन्हीं के शब्दों में-
मुझमें बसते हैं करोड़ो लोग, चुप रही कैसे ?
हर गज़ल अब सल्तनत के नाम बयान है ।
दुष्यन्त कुमार त्यागी सचमुच ही एक साहित्यकार थे । स्वधर्म से अच्छी तरह वाकिफ, जिसे उन्होंने निभाया भी है । उनका प्रदेय साहित्य जगत् में अमर रहेगा ।
-Legend News

Wednesday, 15 November 2017

एक एक कर चले जा रहे हैं सभी...कुंवर नारायण जी को उन्‍हीं की 5 कविताओं से हम श्रद्धांजलि देते हैं

एक एक कर चले जा रहे हैं सभी...आज 'अयोध्‍या 1992' पर कविता से भगवान श्री राम को मौजूदा हालात के प्रति आगाह करने वाले कवि-साहित्‍यकार कुंवर नारायण जी भी चले गए। मैं आज उनको उन्‍हीं की कुछ कविताओं के द्वारा श्रद्धांजलि दे रही हूं।

यूं तो वे हर विधा में लिखकर गए, मगर आज भी उनकी कुछ कविताऐं कितनी सटीक बैठ रही हैं ''बीत रहे समय'' पर ... तनिक आप भी देखिए।

1. अयोध्या, 1992 पर तब लिखी उनकी कविता-


हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक....
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !


2. मनुष्‍यता को घायल करती समाज की कुछ विषमताओं पर ये रचना-

अबकी बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूंगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से

अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूंगा
घर से निकलते
सड़को पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूंगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा

3. इसी भांति कभी हमें अपने बचपने में चले जाने को बाध्‍य करती उनकी ये कविता

मेले से लाया हूँ इसको
छोटी सी प्‍यारी गुड़िया,
बेच रही थी इसे भीड़ में
बैठी नुक्‍कड़ पर बुढ़िया


मोल-भव करके लया हूँ
ठोक-बजाकर देख लिया,
आँखें खोल मूँद सकती है
वह कहती पिया-पिया।


जड़ी सितारों से है इसकी
चुनरी लाल रंग वाली,
बड़ी भली हैं इसकी आँखें
मतवाली काली-काली।


ऊपर से है बड़ी सलोनी
अंदर गुदड़ी है तो क्‍या?
ओ गुड़िया तू इस पल मेरे
शिशुमन पर विजयी माया।


रखूँगा मैं तूझे खिलौने की
अपनी अलमारी में,
कागज़ के फूलों की नन्‍हीं
रंगारंग फूलवारी में।


नए-नए कपड़े-गहनों से
तुझको राज़ सजाऊँगा,
खेल-खिलौनों की दुनिया में
तुझको परी बनाऊँगा।

4. अब प्‍यार की अनेक परिभाषाओं में देखिए कुंवर नारायण जी को  

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है
पहला प्यार
ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में...
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:

दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में
एक सेनेटोरियम की उदासी तक :

फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी उंगुलियां:

एक परदे के दूसरी तरफ़
खिली धूप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में
देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है:

एक-से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल...

अगला प्यार
भूली बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़कर
हम बनाते हैं
प्यार की भाषा।

5. और अंत में उनकी वो रचना जो मुझे बेहद पसंद है 

"अभी-अभी आया हूँ दुनिया से
थका-मांदा
अपने हिस्से की पूरी सज़ा काट कर..."
स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
जिज्ञासु ने पूछा − "मेरी याचिकाओं में तो
नरक से सीधे मुक्तिधाम की याचना थी,
फिर बीच में यह स्वर्ग-वर्ग कैसा?"

स्वागत में खड़ी परिचारिका
मुस्करा कर उसे
एक सुसज्जित विश्राम-कक्ष में ले गई,
नियमित सेवा-सत्कार पूरा किया,
फिर उस पर अपनी कम्पनी का
'संतुष्ट-ग्राहक' वाला मशहूर ठप्पा
लगाते हुए बोली − "आपके लिए पुष्पक-विमान
बस अभी आता ही होगा।"

कुछ ही देर बाद आकाशवाणी हुई −
"मुक्तिधाम के यात्रियों से निवेदन है
कि अगली यात्रा के लिए
वे अपने विमान में स्थान ग्रहण करें।"

भीतर का दृश्य शांत और सुखद था।
अपने स्थान पर अपने को
सहेज कर बांधते हुए
सामने के आलोकित पर्दे पर
यात्री ने पढ़ा −
"कृपया अब विस्फोट की प्रतीक्षा करें।"

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

Wednesday, 8 November 2017

सबसे बड़ा हिन्‍दी उपन्‍यास ‘कृष्ण की आत्मकथा लिखने वाले मनु शर्मा को विनम्र श्रद्धांजलि

सबसे बड़ा हिन्‍दी novel लिखने वाले प्रख्‍यात साहित्यकार लेखक व चिंतक पद्मश्री मनु शर्मा का निधन हो गया। स्‍वच्‍छ भारत अभियान के नवरत्‍नों में शामिल थे मनु शर्मा। वरिष्ठ साहित्यकार और हिन्दी में सबसे बड़ा उपन्यास लिखने वाले मनु शर्मा का आज सुबह वाराणसी में निधन हो गया.

उन्‍हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि

मनु शर्मा का सबसे बड़ा हिन्‍दी उपन्‍यास  ‘कृष्ण की आत्मकथा’ 8 खण्डों में लिखा गया। इसका अंतिम 8वें खण्‍ड के ये अंश देखिए...

मुझे देखना हो तो तूफानी सिंधु की उत्ताल तरंगों में देखो। हिमालय के उत्तुंग शिखर पर मेरी शीतलता अनुभव करो। सहस्रों सूर्यों का समवेत ताप ही मेरा ताप है। एक साथ सहस्रों ज्वालामुखियों का विस्फोट मेरा ही विस्फोट है। शंकर के तृतीय नेत्र की प्रलयंकर ज्वाला मेरी ही ज्वाला है। शिव का तांडव मैं हूँ ; प्रलय में मैं हूँ, लय में मैं हूँ, विलय में मैं हूँ। प्रलय के वात्याचक्र का नर्तन मेरा ही नर्तन है। जीवन और मृत्यु मेरा ही विवर्तन है। ब्रह्मांड में मैं हूँ, ब्रह्मांड मुझमें है। संसार की सारी क्रियमाण शक्ति मेरी भुजाओं में है। मेरे पगों की गति धरती की गति है। आप किसे शापित करेंगे, मेरे शरीर को ? यह तो शापित है ही – बहुतों द्वारा शापित है ; और जिस दिन मैंने यह शरीर धारण किया था उसी दिन यह मृत्यु से शापित हो गया था।

यूं तो  नारद की भविष्यवाणी 
दुरभिसंधि 
द्वारका की स्थापना 
लाक्षागृह 
खांडव दाह 
राजसूय यज्ञ 
संघर्ष 
प्रलय

ये कुल 8 खंड लिखे गये मगर जिसतरह  इन खंडों में श्रीकृष्‍ण को मनु शर्मा जी ने जिया ...वह  अद्भुत है। 

कृष्ण के अनगिनत आयाम हैं। दूसरे उपन्यासों में कृष्ण के किसी विशिष्ट आयाम को लिया गया है। किन्तु आठ खण्डों में विभक्त इस औपन्यासिक श्रृंखला ‘कृष्ण की आत्मकथा’ में कृष्ण को उनकी संपूर्णता और समग्रता में उकेरने का सफल प्रयास किया गया है। किसी भी भाषा में कृष्णचरित को लेकर इतने विशाल और प्रशस्त कैनवस का प्रयोग नहीं किया गया है। 
यथार्थ कहा जाए तो ‘कृष्ण की आत्मकथा’ एक उपनिषदीय ग्रन्थ है।

प्रस्‍तुति:अलकनंदा सिंह

Sunday, 22 October 2017

‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’

अदम गोंडवी के जन्‍मदिन पर उनकी poem
आज अदम गोंडवी का जन्‍मदिन है इस अवसर पर उनकी poem ‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’ की बात ना की जाए यह कैसे हो सकता है.
सामाजिक आलोचना के प्रखर कवि अदम गोंडवी की आज 22 अक्‍तूबर को जन्‍मदिन  है. इस मौके पर पेश है उनकी सबसे चर्चित poem, ‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको.’ 
यह कविता एक दलित युवती की कहानी है जिसे सवर्णों के अत्याचार का शिकार होने के बाद भी हमारा सामाजिक ढांचा न्याय नहीं दिला पाता. आइए, एक कड़वे सच से रूबरू हों.
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें
बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो।
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिेंह
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