Monday, 9 December 2013

स्‍त्री के 'उन' चार दिनों का प्रवास...

Painting: Self portrait by Freida Kahlo
जीवन के अंकुर से चलकर
क्षणभंगुर होते जाने तक यूं तो
स्‍त्री के 'इन' चार दिनों के प्रवास ने
पूरी सृष्‍टि को उलझाया है,
आज मुझे अपने गौरव का ये पन्‍ना
बस, बरबस ही याद आया है।

प्रकृति और प्रेम की हैं ये निशानी,
निज संबंधों के भावों का तोलमोल करते
प्रेम की परिभाषा को देते नये-नये नाम 
स्‍त्री में कर्मज्ञान की गांठ बांधते 'ये दिन'
आज हमें सुनाने को आतुर हैं...
प्रकृतिप्रदत्‍त इस सतरूपा के संग,
मनु-सृजन के 'इन' चार दिनों की कहानी।

प्रकृति की ये जाल-बुनावट टिकी हुई
'इन' चार दिनों की एक धुरी पर... बस, 
रिश्‍ते की हर गांठ...हर आस के धागे
'इन' दिनों के भंवर में डूबते-उतराते

भूत और भविष्‍य के पग भी स्‍त्री के
'इन' दिनों के पाश में ही तो बंधे हुये हैं
इनके आने पर विह्वल होकर... कोई जननी
बेटी का बोझ बढ़ा लेती है दिल पर,
इनके 'ना होने' पर अभिशापों का गुंठन
लक्ष्‍यहीन कर देता स्‍त्री-जीवन को....

सृष्‍टिकर्म की इस लंबी यात्रा में
धन्‍यवाद 'इन' चार दिनों का
देने को मन आतुर है क्‍योंकि...
संबंधों के सृजित पदों पर बैठा के  ,
'इन' दिनों ने....ही तो ठहराया है
स्‍त्री को संसार-रचना की अधिष्‍ठात्री
मां..बहन..पत्‍नी..और बेटी बनाया इन्‍हीं ने
संबंधों की हर नींव में बिखरी है
गंध 'इन' दिनों के होने और ना होने की

एक सा होता है इनका आना और जाना भी
दोनों में ही पीड़ा का होता साम्राज्‍य
कष्‍ट से उपजता है एक नया व्‍यक्‍तित्‍व
आते में भी ...जाते में भी..

दोनों ही संधि-वय में जन्‍म लेता है
अनुभूतियों का नया पुलिंदा,जिसे...
सामने पटक कर हंसता है समय... ठटाकर
हंसता रहता है..कि देख.. हे स्‍त्री तू भी
अभिमान कर स्‍वयं पर कि...
यही तो माया है 'प्रकृति' के 'इन' दिनों की
उसी पर डालती है बोझ जिसके कंधों में
शक्‍ति हो सह लेने की और...
अब मैं नतमस्‍तक हूं 'इन' दिनों के आगे।

- अलकनंदा सिंह

 

Monday, 2 December 2013

उन्‍मुक्‍त हास

Painting: Her Shame by  Dine Lowery
अरे जरा देखूं तो...
यह क्‍या है जो
अपरिचित सी है पर
लगती चिरपरिचित
ये आकुलता है...जो
चेतना से संग संग चल रही है
रेंग रही है...घिसट रही है..
कई स्‍तर हैं इस चेतना के
जिनमें ये चलती हैं एक साथ
दोनों हाथ थामें
चलती रहती है निरंतर
कुछ बुनते  हुये
कुछ गुनते हुये
कुछ सुलझते हुये
फिर क्‍यों मन करता है
कि-
इतना रोऊं..इतना चीखूं कि-
सारा आकुल रुदन बदल जाये
उन्‍मुक्‍त हास में
नहीं या फिर
इतना खिलखिलाऊं कि आंखें
निर्झर सी दीख पड़ें-
- अलकनंदा सिंह

Thursday, 28 November 2013

आकुल...आकुलता मन की

अरे जरा देखूं तो यह क्‍या है..
जो लागे है अपरिचित सी, पर......
चिरपरिचित सी जान पड़े है
कभी मेरा मन विचलित करती 
और कभी कर्म-दर्पण दिखलाती...

कभी प्रेम बन आंखों से झरती
और कभी क्रोध-कंपन बनकर
झुलसा देती ये रोम-रोम को,
कभी सखारूप में आकर पीड़ा को
सहला जाती- लेप लगाती और..
कभी टूटती स्‍वयं पर मेरे मन को
बींध-बींध कर चूर-चूर कर जाती...

देखे हैं इसके भिन्‍न रंग और रूप
कभी लहराते हुये...इठलाते हुये..
तो कभी सकुचाते हुये भी
पर पहचानूं इसको कैसे मैं ,
ये अंतर में दुबकी है मेरे...

मन हठात् ये कह बैठा आज ...कि
ये तो आकुलता है.. जीवन की,
तेरे उर की, पहचान इसे....
ये आकुलता है राग की..द्वेष की भी
चिपक गई है ये शरीर से..मन से भी
तो निकाल इसे.. या जी ले इसको,

हे! आकुल मन तू ठहर तनिक...तो,
क्षणभर को सांसें रोकूं तो..
दोनों हाथ पसार इसे अपने,
उर के अंतस से गा लूं मैं,
मुट्ठी खोल प्रवाहित कर दूं
और नदी बन जाऊं मैं...
आकुल ध्‍वनि के सिर पर बैठूं
राग द्वेष का नहीं, प्रेम के पग
का घुंघरू बन छनक जाऊं मैं....
समय-बिम्‍ब ने त्राटक करके
ये समझाया है मुझको अब...कि
जीवन की आकुलता को एक
धरातल पर बैठाऊं और ...
अब नमन मेरा इस आकुलता को
जो उर में बैठी मुझसे मेरा ही घर पूछ रही।
- अलकनंदा सिंह
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Tuesday, 19 November 2013

बस ऐसे ही...तुम

और प्रेम बन गये तुम....सखा
और कृष्‍ण हो गये तुम...सखा

वो सांवली रंगत के साये में
आंखों के लाल डोरे एकदम सुर्ख
हे कृष्‍ण...तुम ऐसे ही क्‍यों हो
अपने प्रेम की भांति अनूठे,

जल रही भीतर जो तुम्‍हारे,
अगन है या श्रद्धा मेरी
प्रेम है या छलना तेरी
वो जो राग भी है रंग भी,
वो जो द्वेष भी है कपट भी ,
सब ने कहा वो राधा है...
संभव है ऐसा ही हो भी...

'राधा' बनते जाने की-
अग्‍नि के ताप में ही तो...
ताप से सुर्ख होते गये और फिर
इस तरह कृष्‍ण बनते गये तुम
भस्‍म होते रहे और प्रेम बन गये तुम

- अलकनंदा सिंह 

Saturday, 16 November 2013

वह हंसी...

वह हंसी...
जिसके लिए पहचानते थे लोग
आज कहीं दरीचों में
समा गई है,या...
अंधे कुयें में, पत्‍थरों तले
दब गई है...
हंसते हंसते पेट में बल पड़ें ,
ऐसा अब होता नहीं...
कितने दिन हुये ?
खिलखिलाने में भी लगता है जैसे-
सांसों को बींध रहा हो कोई
गुब्‍बारे का छेद जैसे
गले में बैठकर, हंसी के आवेग को,
रिसते रिसते देख रहा है,
ये कोलाहल के पीछे करके
करना होगा एक संपूर्ण प्रयास कि-
ये हंसी सिर्फ हंसी ही बनी रहे 
न बन जाये अट्टहास।
- अलकनंदा सिंह

Wednesday, 13 November 2013

मेरे वातायन में........

मेरे घर के वातायन में
सूरज नहीं, आशायें उगती हैं
जीवन की हथेली पर
जो हर पल नया राग बुनती हैं

समय और लक्ष्‍य के बीच
चल रहा है द्वंद नया सा
देखें अब किसकी शक्‍ति
अपने अपने संधानों को
ठीक ठीक गुनती है

पग-पग.. पल-पल..
कल-कल.. चल कर
किरणें सूरज की, मेरे घर-
को नदी बनाकर, देखो-
कभी डूबती- उतराती सी
यूं अविरल होकर बहती हैं

नया राग है नई तरंगें
नये सुरों में जीवन का
पथ भी है नया नया सा
फिर.......
प्राचीन अनुबंधों से कह दो
देखें किसी और प्रभात को
सूरज तो अब बस मेरा है
मेरे ही वातायन में कैद

- अलकनंदा सिंह

Friday, 8 November 2013

वो नहीं चोखेरबाली..

तिनके ने उड़ते हुये, हवा से पूछा
क्‍या अपने साथ तुमने, मेरी चिरसाथी...
उस धूल को भी उठाया है
यदि नहीं..तो मुझे भी छोड़ो

रहने दो मुझे उसी के पहलू में
और कुछ पल थोड़ा सुकून से
न जाने फिर कब मिल पाऊं
मैं... अपनी इस चिर साथी से
यदि तुम ले जाओगी दूर मुझे
जीवित फिर ना पाओगी मुझे

तो ऐ हवा...! क्‍यूं ना ऐसा करो...
उसे भी संग ले लो अपने, या फिर...
छोड़ दो मुझे...उसके ही पास
तुम्‍हें तो मिलेंगे मुझसे और भी बड़े
तिनकों के सम्राट...

मेरा तो जीवन ही धूल ने सींचा है
उसी ने सालों से अपने पहलू में
बिछाकर मुझमें रोपा है प्रेम का अंकुर
ऐ हवा... तुम क्‍या जानो मेरी सहयात्री
धूल के उस आंचल का सुख
उसकी हथेलियों से मिलता अभयदान
अब बारी मेरी है देने की प्रतिदान

ताकि....कोई और हवा,
अकेला पाकर न बना दे...चोखेरबाली या
आंखों की किरकिरी उसको...
ऐ हवा.....! मुझे बताना है उसको
भिन्‍न रूप हैं पर एक है अस्‍तित्‍व अपना
मेरा भी और तेरा भी...
यह भी बताना है उसको कि...
तू धूल है रहेगी जीवित मेरे ही साथ
मैं तिनका हूं उड़ आऊंगा तेरे ही पास
यही इच्‍छा है यही नीयति अपनी
यही अंत है यही आरंभ अपना

सो ऐ हवा...! जीवन की प्राण...
मुझे तुम यूं निस्‍पंदित मत करना
प्राणदायी कहलाकर अपनी
गरिमा से मुझे अभिसिंचित करना

सो...ऐ हवा...तुम साक्षी बन दे देना
चोखेरबाली नहीं... उसे तुम
मां होने का देना वरदान
जिससे धरती के सारे तिनके...
फलें फूलें और..
बनें किसी के सर की छांव,
यही तुम्‍हारा अभिनंदन है...
हे प्राणदायी तुम्‍हें वंदन है...
- अलकनंदा सिंह


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