Saturday, 16 November 2013

वह हंसी...

वह हंसी...
जिसके लिए पहचानते थे लोग
आज कहीं दरीचों में
समा गई है,या...
अंधे कुयें में, पत्‍थरों तले
दब गई है...
हंसते हंसते पेट में बल पड़ें ,
ऐसा अब होता नहीं...
कितने दिन हुये ?
खिलखिलाने में भी लगता है जैसे-
सांसों को बींध रहा हो कोई
गुब्‍बारे का छेद जैसे
गले में बैठकर, हंसी के आवेग को,
रिसते रिसते देख रहा है,
ये कोलाहल के पीछे करके
करना होगा एक संपूर्ण प्रयास कि-
ये हंसी सिर्फ हंसी ही बनी रहे 
न बन जाये अट्टहास।
- अलकनंदा सिंह

Wednesday, 13 November 2013

मेरे वातायन में........

मेरे घर के वातायन में
सूरज नहीं, आशायें उगती हैं
जीवन की हथेली पर
जो हर पल नया राग बुनती हैं

समय और लक्ष्‍य के बीच
चल रहा है द्वंद नया सा
देखें अब किसकी शक्‍ति
अपने अपने संधानों को
ठीक ठीक गुनती है

पग-पग.. पल-पल..
कल-कल.. चल कर
किरणें सूरज की, मेरे घर-
को नदी बनाकर, देखो-
कभी डूबती- उतराती सी
यूं अविरल होकर बहती हैं

नया राग है नई तरंगें
नये सुरों में जीवन का
पथ भी है नया नया सा
फिर.......
प्राचीन अनुबंधों से कह दो
देखें किसी और प्रभात को
सूरज तो अब बस मेरा है
मेरे ही वातायन में कैद

- अलकनंदा सिंह

Friday, 8 November 2013

वो नहीं चोखेरबाली..

तिनके ने उड़ते हुये, हवा से पूछा
क्‍या अपने साथ तुमने, मेरी चिरसाथी...
उस धूल को भी उठाया है
यदि नहीं..तो मुझे भी छोड़ो

रहने दो मुझे उसी के पहलू में
और कुछ पल थोड़ा सुकून से
न जाने फिर कब मिल पाऊं
मैं... अपनी इस चिर साथी से
यदि तुम ले जाओगी दूर मुझे
जीवित फिर ना पाओगी मुझे

तो ऐ हवा...! क्‍यूं ना ऐसा करो...
उसे भी संग ले लो अपने, या फिर...
छोड़ दो मुझे...उसके ही पास
तुम्‍हें तो मिलेंगे मुझसे और भी बड़े
तिनकों के सम्राट...

मेरा तो जीवन ही धूल ने सींचा है
उसी ने सालों से अपने पहलू में
बिछाकर मुझमें रोपा है प्रेम का अंकुर
ऐ हवा... तुम क्‍या जानो मेरी सहयात्री
धूल के उस आंचल का सुख
उसकी हथेलियों से मिलता अभयदान
अब बारी मेरी है देने की प्रतिदान

ताकि....कोई और हवा,
अकेला पाकर न बना दे...चोखेरबाली या
आंखों की किरकिरी उसको...
ऐ हवा.....! मुझे बताना है उसको
भिन्‍न रूप हैं पर एक है अस्‍तित्‍व अपना
मेरा भी और तेरा भी...
यह भी बताना है उसको कि...
तू धूल है रहेगी जीवित मेरे ही साथ
मैं तिनका हूं उड़ आऊंगा तेरे ही पास
यही इच्‍छा है यही नीयति अपनी
यही अंत है यही आरंभ अपना

सो ऐ हवा...! जीवन की प्राण...
मुझे तुम यूं निस्‍पंदित मत करना
प्राणदायी कहलाकर अपनी
गरिमा से मुझे अभिसिंचित करना

सो...ऐ हवा...तुम साक्षी बन दे देना
चोखेरबाली नहीं... उसे तुम
मां होने का देना वरदान
जिससे धरती के सारे तिनके...
फलें फूलें और..
बनें किसी के सर की छांव,
यही तुम्‍हारा अभिनंदन है...
हे प्राणदायी तुम्‍हें वंदन है...
- अलकनंदा सिंह


Sunday, 27 October 2013

मेरा छठा तत्‍व

देखो..
सखा आज तुमसे कहती हूं
सुनो और बूझो बतलाओ
तुम तो पढ़ लेते थे अंतस मेरा
फिर क्‍यों आज मेरे मन के...
आखर आखर बीन रहे हो,

देखो..
सब कहते ये पांच तत्‍व से
मिलकर बना शरीर...
पर छठे तत्‍व की बनी हूं मैं
इस छठे तत्‍व को कैसे भूलूं 
जिससे चले शरीर..!

देखो..
वो शरीर जिस पर तुमने... हे सखा
पिरो दिये हैं स्‍वर-श्‍वास के कुछ फूल
वो शरीर जिस पर गिर कर
रपट रहे हैं सारे जग के तीखे शूल

देखो..
पत्‍थर पर खुरच रही हूं कबसे
इस छठे तत्‍व का नाम पता
पर देह- भीतर जो भय बैठा है
नहीं लिख पा रहा इक आखर भी
कहो... तो, इस तरह कैसे होगा
मेरे छठे तत्‍व का साक्षात्‍कार

देखो..
यूं तो मुझमें क्षमता है इतनी,
कि पी जाऊं संसार, गरल का -
पर छठे तत्‍व ने रोका मुझको
तुम पर करने को आघात
ये जितने भी हैं गरल तुम्‍हारे
क्‍यों मैं ही पी कर दिखलाऊं
कुछ तेरा भी तो कंठ भिगोये
तुझको भी तो भान कराये
क्‍यों मेरे ही सब हिस्‍से आये
तू भी जाने गरिमा इसकी
इसका करे मान सम्‍मान
देह के भीतर ''मैं'' बैठी हूं
छठे तत्‍व का पल्‍लू थाम
- अलकनंदा सिंह

Monday, 14 October 2013

दंगों पर..

पत्‍थर सी बेजान पड़ी लाशें
कहीं धड़ है तो कहीं सिर
खून से लबालब हैं सारे शहर की नालियां
बहते हूये खून में भी, अब तो कीड़े पड़ गये

बचाओ बचाओ की आवाजें और उनका खौफ
न रोटी बेटी का मसला है ना मान सम्‍मान का
फिर क्‍यों श्‍मसान में तब्‍दील कीं बस्‍तियां
ए सियासत के मरीजो ! ज़रा बताओ तो
क्‍या बेचारगी से मर रही ज़िंदगी के,
नाटक तुम्‍हारे लिए कम पड़ गये

कौन रोया है हक़ीकत दंगों की देखने के बाद,
तुम तो अब मुर्दों के बनाये मंच पर
ज़़िंदा लाशों की तरह नाचते हो
शमसीर को रख लो मयान में अभी,
बचे हुये बच्‍चों के सीने छोटे हैं अभी

अरे..सियासत के मरीजो !
जाओ, कुछ साल रुक कर आना
तब तक बस्‍तियां जवान हो लेंगीं
तुम्‍हारी शमसीर भी कुछ सांस ले लेगी
तुम फिर रचोगे एक नदी
बहते हुये खून की..क्‍योंकि-
हमनिवालों का शिकार तुम्‍हें भाता है
नया जवान खून जो मुंह को है लगा
तो छूटने को हर बार शमसीर ही मांगता है
खून से सने हाथों को खून से ही धोने की
ये अजब शर्त है इस ज़मीं पर जिंदगी की
खून में नहाया भी सफेदपोश ही कहलाता है

सालों से इस माज़रे के गवाह रहे
एक गिद्ध ने दूसरे से कहा-
छोड़ो, अब ये खून.. शमसीर और
आम आदमी के रोने की बातें
अमां हमें तो कबके खाने के लाले पड़ गये
जब से मंचों पर सजे हैं ये सफेदपोश
तभी से हमें अपने बच्‍चे भी गंवाने पड़ गये...
- अलकनंदा सिंह

Wednesday, 9 October 2013

सूत्रधार शर्त का

कभी देखा है तुमने-
विश्‍वास को,
सांसों से घात करते हुये
उन्‍हें ठगते हुये ? मैंने देखा है,
विश्‍वास की असली रंगत को,
जिससे भयाक्रांत हैं सांसें कि-
विश्‍वास पर विश्‍वास कभी
न करना,वरना------
यही तो बनाता है---
दोस्‍तों को द़श्‍मन,
अपनों को पराया
खून को पानी
अल्‍हढ़ को संजीदा
समय की सार्थकता
यही सिद्ध करता है
यही परिभाषित करता है प्रेम
यही पालता है स्‍वार्थ के जंगल
जीवन के सारे युद्धों का
यही है सूत्रधार
फिर भी जीवन जीने की
पहली जरूरत है विश्‍वास
पहली शर्त है विश्‍वास
जीवन का विराम है विश्‍वास
तो आओ नकारा विश्‍वास को
कर दें पदावनत अपने विश्‍वास से
और बो दें नये विश्‍वास का अंकुर
जिसकी फसल से लहलहा जाये
ये पीढ़ी और इसकी रग रग
उसके मन की कोरों में भी
फिर जम जाये अपना विश्‍वास

- अलकनंदा सिंह

Tuesday, 1 October 2013

एक कदम शहर की ओर...

जा रही थी वह बेखबर
पगडंडी छोटी और
तमन्‍नायें हज़ार
निर्द्वंद प्‍यार का तूफान सांसों में
थामे आंचल में कांटे बेशुमार
वो बांटती थी प्‍यार
वो खोजती थी प्‍यार
चाहती थी ठंडी छांव
किसी की सांसों से हर बार
बस एक कदम चला शहर की ओर
और...और...और...अब तो
झोपड़ी को महल भी बनाकर देखा
मगर मिला उसे बस
दुखती रगों का अंबार
जो चाहा था नि:स्‍वार्थ प्रेम 
फिर देखा उसका रूप- विद्रूप
अंतस का स्‍वप्‍न
टूटा रहा है हर बार
क्‍यों अब भी बाकी है आशा
कि समेट ले उसके मन का भोजपत्र
कोई आकर जिस पर
टांका हुआ हो बस प्‍यार ही प्‍यार
- अलकनंदा सिंह

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