Thursday, 22 September 2022

तमिल भाषा लेखक अशोकमित्रन का जन्‍मदिन आज , पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कहानी 'सुंदर'


 आज 22 सितंबर 1931 को जन्‍मे थे तमिल भाषा के लेखक व उपन्यासकार अशोकमित्रन। उनका निधन 23 मार्च, 2017 को हुआ था। अशोकमित्रन का मूल नाम जगदीस त्यागराजन था। 

उनकी कृति में 200 लघु कथाएं, 8 उपन्यास, 15 अन्य लंबी कथाएं शामिल हैं। उनकी बहुत-सी लघु कथाएं अँग्रेजी, हिंदी, मलयालम, तेलगू और अन्य भाषाओं में अनुवादित की गई है। उन्हें वर्ष 1996 में उनके लघु कथाओं के संग्रह अप्पाविन सिनेहिदर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (तमिल) से सम्मानित किया गया था।

वर्ष 1931 में सिकंदराबाद में जन्में अशोकमित्रन वर्ष 1952 में चेन्नई चले गए थे। जिसके बाद वे तमिल साहित्य के एक प्रभावशाली साहित्यकार के रूप में उभरे। वे संक्षिप्त और सूक्ष्म हास्य के लिए जाने जाते थे। उन्होंने 1960 के दशक में अपना साहित्यिक नाम अशोकमित्रन ग्रहण किया था। वर्ष 2014 में तमिलनाडू की निवर्तमान मुख्यमंत्री जयललिता ने तमिल साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हे 'तिरु वी का' पुरस्कार प्रदान किया था।

उनको 1992 में 'दिल्ली मेमोरियल अवार्ड' भी मिला। उनकी रचनाओं को 'के.के. बिरला पुरस्कार' मिला। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उन्हें फेलोशिप भी दी गई। 1966 से 1989 तक कुछ समय के लिए 'कलैआडी' पत्रिका के संपादक भी रहे। उनके उपन्यासों में 'अप्पाविन स्नेगदी', 'तन्नीर' एवं 'मानसरोवर' बहुचर्चित रहा। 'तन्नीर' का अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है।।

 

पढ़िए उनकी कहानी- 'सुंदर'

हमने ठान लिया था कि जैसे भी हो, एक गाय खरीदकर ही चैन लेंगे। भैंसों को पल्ले बाँधकर रोने से तो बेहतर है कि पिछवाड़े एक गाय ही बाँध ली जाए। घर में लक्ष्मी आ जाएगी।

भैंसों को हमने आदर-सत्कार सहित बुलावा नहीं दिया था। एक बार हुआ यह कि किसी कारण से एक भैंस हमारे घर आ टपकी। हमने तो सोचा था कि वह कुछ दिनों की मेहमान होगी, परंतु वह स्थायी रूप से बस गई। जब उसमें दूध-उत्पादेयता की क्षमता सर्द हो गई, तब हमने दूध प्राप्ति हेतु एक और भैंस खरीद ली। दोनों जब एक ही साथ सर्द पड़ गई तो तीसरी आ गई।

हम जहाँ रहते थे, वहाँ साधारणतया कामकाज के लिए नौकर-चाकरों का मिलना अत्यंत कठिन था। हमारे घर के लोग ही बारी-बारी से रोज गोबर इकट्ठा करते थे। पाँच-छह दिनों में एक बार गोबर के उपले बनाते। गोबर को कोयले के चूरे के साथ मिलाकर गोले बनाकर सुखाते। इसकी उपलब्धि यह हुई कि हम अच्छी-खासी गरमी में भी गरम पानी से ही नहाते।

पिछवाड़े के एक कोने में गोबर का एक पहाड़ सा सदा रहता। दूसरे कोने में उपलों और गोलों का ढेर रहता। इन दो पहाड़ों के बीचोबीच इनकी कारणकर्ता भैंसें जुगाली करती हुई विराजमान रहतीं। शायद इन भैंसों का आपस में कोई गूढ़ समझौता हुआ होगा। किसी भी वक्त दो को दोहने की आवश्यकता ही नहीं रहती। ऐसे भी महीने थे, जब तीनों में से एक ने भी एक बूंद दूध नहीं दिया था।

अच्छे वक्त का अंत तो आता ही है, साथ ही कभी-कभी बुरे वक्त का भी। एक भैंस मर गई। दूसरी खो गई। तीसरी का बच्चा होनेवाला था। चार–पाँच महीनों बाद मेरी बड़ी बहन नन्हे से बच्चे के साथ कुछ महीने हमारे साथ रहनेवाली थी। ऐसे समय में दूधवाले की कृपा पर आश्रित होने की बजाय एक गाय ही क्यों न खरीद लें? वैसे भी पिछवाड़े में दो गाय को बाँधने के लिए जगह तो है ही।

यह खबर गाँव भर में फैल गई कि हम गाय खरीदनेवाले हैं। इस विषय में उन्हीं लोगों ने खूब दिलचस्पी दिखाई, जिनका गाय से कोई लेना-देना नहीं था। उनकी नोंक-झोंक से इतना खीज गए कि सोचा गाय न खरीदें, दूसरी ओर यह भी निश्चय हुआ कि इनके लिए ही सही, एक गाय घर में अवश्य लाएँगे।

हम भी लगभग पंद्रह गायों को देख चुके थे। पहली बार गर्भिणी हुई गाय से लेकर आठ बार जन्मदात्री की शोभा से मंडित एवं वृद्धा गाय तक। पहले मैं और पिताजी गाय को देख जाते और गाय के रंग, सींग, पूँछ की लंबाई आदि बुनियादी मुद्दों का भी माँ को भिन्न-भिन्न विवरण देते। माँ को पिताजी के सामर्थ्य पर शंका थी, अतः कभी हम तीनों गाय देखने जाते। हमारे पहुँचने तक गाय को दुहा जा चुका होता। वह कितना दूध देती है, उसे कैसा दुहा जाता है, यह देखने के लिए हम दुबारा जाते। एक-दो लोगों ने तो इतना कहा भी कि हम गाय को अपने पास दो दिन रखने के पश्चात ही निर्णय लें। एक ने यहाँ तक कहा, आधे पैसे अब दीजिए, आधे अगले महीने दे दीजिए। इन सभी को छोड़कर हम बाजार के पास वाले मारवाड़ी के घर से फौरन पूरे पैसे देकर एक गाय खरीद लाए।

जाने क्या-क्या कारणों के लिए गाय को तीन-चार बार देख–जाँच लेने के बाद नकारनेवाले हम इस मारवाड़ी के मामले में पाँच ही मिनटों में राजी हो गए। कारण यह था-बाजार के पास बाजार से भी बड़ी सब्जीमंडी थी। जिसमें जान-पहचानवाले एक सब्जीवाले ने माँ-पिताजी को बताया कि पास ही एक गाय बिक्री के लिए है और तुंरत दोनों को वहाँ ले भी गया। उसी वक्त गाय को दुहा जा रहा था। फेन सहित दूध बालटी भर दुहा गया। हमारी भैंसों ने भी कभी इतना दूध नहीं दिया था। माँ-पिताजी दोनों ने हामी भरी और एक रुपए का अग्रिम दे आए। दूसरे दिन 299 रुपए देकर गाय को घर लाया गया। साथ ही एक माह का बछड़ा भी।

गाय के आते ही माँ ने उसकी कर्पूर आरती उतारी, उसे कुंकुम का टीका लगाया और उसे 'लक्ष्मी' के नाम से संबोधित किया।

'लक्ष्मी...क्यों...?' मैंने पूछा।

'गाय का नाम' माँ ने कहा।

'सुंदर...?'

'हाँ माँ...उन्होंने वैसे ही तो बुलाया था।'

'कैसा नाम है? सुंदर...?'

'हाँ, माँ...। तुमने ध्यान नहीं दिया? सुंदर...सुंदर कहते हुए ही तो वह औरत उसकी पीठ पर हाथ फेर रही थी।'

'देखो, मैं बुलाता हूँ...सुंदर। गाय ने मुड़कर देखा।'

'देखा, इस गाय का नाम सुंदर ही है।'

'सुंदर तो पुल्लिंग है?'

'हो सकता है कि यह पुरुष-गाय हो?'

'छिह-छिह। ज्यादा बुद्धिमानी मत दिखाओ।'

हमारे मन को क्लेश का कारण केवल यह नहीं था कि गाय का नाम 'सुंदर' था। उसके थन पूरी तरह से काले थे। श्याम–थन गायों का दूध मंदिर के अलावा और कहीं भी उपयुक्त नहीं होना चाहिए। ऐसा हमारे घरों में कहा जाता है। मुझे इन बातों की खास जानकारी नहीं थी।

श्याम–थनवाली गाय भी तो गाय ही है। इसलिए यह तय किया गया कि महीने में एक बार दूध को मंदिर में अभिषेक के लिए दे दिया जाए।

गाय को अपने नए नामकरण की आदत पड़ जाए। इस कारण हम अकसर पिछवाड़े में जाकर 'लक्ष्मी...लक्ष्मी' कहकर पुकारने लगे। गाय ने इसकी कोई परवाह ही नहीं की। साथ ही वह बेचैनी से इधर-उधर हिलती-डुलती रही। शाम हुई। गाय को पहली बार हम दुहनेवाले थे। जब भैंस दूध दिया करती थी, तब एक आदमी दूध दुहने आया करता था। उसे सूचना देने के बावजूद वह नहीं आया। आखिरकार पीतल के बड़े मुँह के लोटे को लेकर माँ गाय के पास गई।

मैंने बछड़े की रस्सी खोल दी। वह माँ के थन से मुँह लगाकर चूसने लगा। गाय के थन रिसने लगे। मैंने बछड़े को फिर से बाँध दिया। गाय के पास बैठकर माँ ने उसके थन को छुआ। गाय ने लात मारी।

मैंने बछडे को एक कोने में बाँध दिया और गाय की पिछली टाँगों को बाँधने के लिए रस्सी हुँढने लगा। भैंसों को दुहते समय उनकी पिछली टाँगों को बाँधने की कभी नौबत न आई थी। अगर वे दूध नहीं देना चाहतीं तो परे हट जातीं। मगर टाँग उठाकर उन्होंने कभी नहीं मारा।

जैसे-तैसे एक रस्सी को ढूँढ़ निकाला और गाय की पिछली टाँगों को बाँध देने के बाद मैंने और माँ ने बारी-बारी से उसे दुहा। वह माँ को भी पास आने नहीं दे रही थी। माँ ने इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया कि उसका नाम लक्ष्मी है। उसके मुँह और पीठ पर थपथपा दिया। सबकुछ करने के बाद भी पाव भर भी दूध नहीं मिला। अगले दिन सुबह की भी वही कहानी थी। उस शाम की स्थिति बदतर थी। गाय ने दूध दिया ही नहीं।

गाय सींग मारनेवाली थी। साथ ही एक बात भी उजागर हुई। गाय को हमारे घर आए लगभग 36 घंटे बीत चुके थे। वह बैठी तक नहीं, खड़ी ही रही। हमने उसके खाने के लिए भूसी और खली रखी थी, उन्हें खाने में भी उसने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब दूसरे दिन भी उसने हमें पास फटकने नहीं दिया तो मैं उस मारवाड़ी के घर गया। उस गली में सबके सब मारवाड़ी परिवार ही थे। जैन धर्मावलंबी होने के कारण सूर्यास्त से पूर्व भोजन समाप्त कर बत्ती बुझा चुके थे। बुजुर्गों ने मुँह पर कपड़ा बाँध रखा था। गाय के विक्रेता के घर तक पहुँचने के लिए मुझे चार-पाँच घरों के आँगन में बँधी हुई गायों को खतरनाक ढंग से पार करके आना पड़ा। अपने विक्रेता के घर को पहचानने से पहले मैं एक बार अपना पैर गोबर के ढेर में घुसेड़ चुका था। एक स्त्री बाहर खड़ी थी, उससे मैंने कहा, 'आपकी गाय दूध नहीं देती।'

'उसे चारा दिया?' उस स्त्री के मुँह पर बँधा परदा उसके बोलने से फड़फड़ाने लगा।

'वह कुछ भी नहीं खाती, बस लात मारती रहती है।' वह घर के अंदर गई और ऊँची आवाज में ताबड़तोड़ बरसने लगी। फिर उसने आस-पड़ोस सबको यह कहा, 'सुंदर को ये लोग भूखा मार रहे हैं।' इसी तरह की बातें वह किए जा रही थी। सभी ने मुझे घेर लिया और मुझ पर प्रश्नों की बौछार करने लगे। 'क्या आप पत्थर दिल हैं? आप क्या गाय को मार डालेंगे? गाय को भूखा मारोगे तो कोटि जन्म नरक में उलटे लटका में भूने जाओगे।'

वह स्त्री मेरे साथ चल पड़ी। रास्ते में भी आते-आते लोगों से अपनी भाषा में यह कहती हुई आई कि मैं उसकी गाय को भूखा मार रहा हूँ। मुझे ताज्जुब हुआ कि वह स्त्री कैसे एक ही बात को घंटों दोहराए जा रही

हम घर पहुँचे। गाय ने उसे देखकर उछल-कूद करना शुरू कर दिया। जोर से रँभाई, पूँछ उठाकर मूत्र त्यागा, ऐसे साँस लिया, मानो पूरे विश्व को हिला देगी। वह मारवाड़ी स्त्री 'सुंदर!' कहकर पुकारती हुई उससे लिपट गई। अपने मुँह पर लगे श्वेत आवरण को हटाकर उसने गाय को चूमा। गाय के कान के पास पिस्कू पकड़कर जमीन पर फेंक उसे पैर से कुचल डाला। 'सुंदर मेरे सुंदर' कह-कहकर देर तक गाय को दुलारती–पुचकारती रही। इस दृश्य को देखकर मैं रुआँसा हो उठा। मेरे भाई-बहन तो रो ही पड़े।

केवल मेरी माँ अविचलित थी। एकाएक अनपेक्षित रूप से वह चिल्लाने लगी। 'कया सोचकर तुमने ऐसी गाय हमारे मत्थे मढ़ दी? पैसे गिनकर रखो और ले जाओ अपनी गाय।'

'गाय को अगर चारा नहीं दोगे तो वह दूध कैसे देगी? गाय को भूखा मारोगे तो कोटि जन्म उलटे भूने जा बदले में वह भी चिल्लाई।

हमारी माँ में भी इतना सामर्थ्य है, यह हममें से कोई नहीं जानता था। सवा घंटा बरसने के बाद वह मारवाड़ी स्त्री भी शांत हो गई। 'एक बरतन दो।' उसने सहज भाव से कहा।

उसने गाय की पिछली टाँगों को बाँधे बिना, बछड़े को एक बूंद दूध पिलाया और गाय को दुहा। एक बड़ा लोटा भर दुहने के बाद उसने दूसरा बरतन लिया और उसमें भी दूध दुहा। अब हमारी माँ नहीं चिल्लाई। उस रात सोने से पहले हम सभी ने दूध पिया।

रात के वक्त हमारे घर के पिछवाडे कोई भी बिना बत्ती के नहीं जा सकता। कारण यह था कि रसोई से बाहर आने पर आठ-दस सीढ़ियाँ थीं, जिन्हें उतरने के बाद ही समतल भूमि पर आया जा सकता था। मगर आँगन में केवल दो ही सीढ़ियाँ थीं। घर बनाते समय जमीन में जो भी ऊँच-नीच थी उसे बिना समतल किए बनाई गई थीं। पिछवाड़े में गोशाला के चारों ओर एक ऊँची दीवार थी। रात के वक्त सोने से पहले हममें से कोई एक इस पिछवाड़े के दरवाजे पर एक बड़ा सा ताला लगाकर आ जाता था। उस दिन रात को मैं ही लालटेन लेकर उस दरवाजे को ताला लगाकर आया। गाय हमारे घर में पहली बार बैठी हुई थी। यही नहीं, वह जुगाली भी कर रही थी। मुझे लगा कि आखिरकार वह हमारी पारिवारिक व्यवस्था के साथ घुल-मिल गई है। उसे मैंने 'सुंदर' कहकर पुकारा और उसके माथे को सहलाया।

सुबह माँ की चीख-पुकार सुन सभी उठ बैठे। सुंदर ने रात को ही रस्सी तोड़ ली होगी। जैसे ही माँ ने रसोई के पिछवाड़ेवाला दरवाजा खोला, एक ही छलाँग में सुंदर आठ-दस सीढ़ियाँ लाँघकर रसोई में घुस गई थी। माँ डर गई थी और चीखने-पुकारने लगी थीं। पिताजी ने आँगन के बाहर वाला दरवाजा खोला, यह सोचकर कि शायद कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो गाय को सँभाल सके। ज्यों ही बाहर का दरवाजा खला, सुंदर बाहर की ओर लपकी। जब तक हम यह सोच ही रहे थे कि हमें अब क्या करना चाहिए, तब तक सुंदर बाजार की ओर दौड़ती हुई हमारी आँखों से ओझल हो चुकी थी। माँ ने उस मारवाड़ी स्त्री को कोसा। गाय को कोसा। सब्जीवाले को कोसा। चूँकि मैंने दौड़ती हुई गाय को लाठी मारकर घर की ओर नहीं भगाया, इसलिए मुझे भी कोसा। आधे घंटे बाद मैं बरतन समेत बछड़े को लेकर मारवाड़ी स्त्री के घर की ओर निकल पड़ा।

उस स्त्री ने मुझे देखते ही जोर-जोर से भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। पता नहीं क्यों मुझे अपराधबोध होने लगा। वैसे जाँच-पड़ताल कर देखा जाए तो इसकी कोई गुंजाइश नहीं थी। वह अपनी गाय को बेचना चाहती थी, तभी तो हमने खरीदी थी। उसके मुँहमाँगे दाम को हमने चुकाया था। वह मुझे और मेरे घरवालों को बुरा-भला कहे क्या यह उचित था!

उस वक्त यह सब मुझे सूझा ही नहीं। संकोच का अनुभव करते हुए मैंने कहा, 'गाय को दुह लेता हूँ।' उस स्त्री ने बड़े दानवीर की भाँति स्वीकृति दी। सुंदर को दुहने के लिए मुझे आया देख सात-आठ बच्चों और बुजुर्गों ने मुझे घेर लिया। सुंदर ने लात नहीं मारी। यह आश्चर्य की बात थी। जब मैं घर लौटा तो माँ ने पूछा, 'गाय कहाँ है?' मैंने माँ की ओर दूध का बरतन बढ़ाया। उसे पकड़ते हुए माँ ने दुबारा प्रश्न किया, 'गाय कहाँ...?'

'मैं अभी उसे साथ नहीं ला सका, शाम को ले आऊँगा।' माँ ने मेरी ओर अविश्वास से भरी नजरों से देखा।

'उस पिशाचनी से गाय के पैसे वापस ले आएँ।' माँ ने पिताजी से कहा, लेकिन पिताजी ने कोई जवाब नहीं दिया।

शाम को जब मैं दूध दुहने गया तो गाय ने बहुत ही कम दूध दिया। ऊपर से दूध में से एक तरह की बदबू भी आ रही थी। पहले मैं इसका कारण न जान सका, मगर बाद में मुझे पता चल गया। दिन में मंडी का चक्कर लगाते हुए सुंदर कचरेदानों को भी नहीं छोड़ती थी। मारवाड़ी स्त्री गाय के लिए चारा नहीं डालती थी। वह जिम्मेदारी तो हमारे इलाके के लगभग तीन सौ सब्जीवालों, बाजार और उसके आस-पास के कचरादानों पर थी। इस बार माँ को मुझे डाँटने-फटकारने के लिए कई कारणों के होते हुए भी मैं बहादुरी से बोला-

'गाय को वहीं रहने दो माँ। वह वहीं खुश है।'

'पैसे देकर खरीदी गई गाय किसी और के घर बाँधी जाएगी? उस धोखेबाज औरत ने हमसे पैसे क्यों लिये? हर बार वहाँ जाकर दूध दुहने से तो बेहतर होगा कि सीधी तरह दूध कहीं से खरीद लें। गाय वहाँ रहेगी...? वह तो आधा दूध स्वयं ही दुह लेगी। मगर जब मैं यह कहती हैं कि पैसे लौटा दो और अपनी गाय ले जाओ तो वह बिना मुँह खोले भाग खड़ी होती है।

पिताजी ने इस गाय के विषय में दखल ही नहीं दिया। यह निश्चय किया गया कि अगले दिन मैं स्कूल से छुट्टी लेकर माँ के साथ जाकर सुंदर को घसीट लाऊँ।

'सुंदर।'

सवेरे-सवेरे मैं जाकर गाय को दुह आया। अब भी बहुत कम ही दूध दिया। उस स्त्री ने कहा कि बछड़े ने दूध पी लिया था। दूध की बदबू असहनीय थी। दोपहर का खाना समाप्त होते ही माँ ने मुझसे कहा। 'चल रे!'

दो व्यक्तियों द्वारा संचालित घोर विस्फोट को सँभालने का अशोभनीय कार्य मुझ पर थोपा गया। जिससे बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। अतः मैं अर्धचेतनावस्था में माँ के साथ दोपहर की कड़कती धूप में डेढ़ मील की दूरी पर स्थित बाजार की ओर चल पड़ा।

क्रोध का ऐसा विस्फोट हुआ, सारा बाजार उस मारवाड़ी स्त्री के यहाँ जमा हो गया। यही कहा जा सकता है कि दो भाषाएँ स्त्रियों की विशेष प्रयुक्तियों से समृद्ध हो तीव्र गति से विकासोन्मुख हो गई। मुझे ऐसा लगा कि मेरी माँ का पलड़ा ऊँचा था। वह मारवाड़ी स्त्री तब-तब लाचार दिखाई देती, जब-जब माँ उससे यह कहती, 'पैसे वापस दे और ले गाय को रख अपने पास।'

पचास लोग बीच-बचाव के लिए आ गए। अब हम अपनी गाय को ले जा सकते थे, मगर वह आए तब न? जितनी बार मैंने सुंदर की रस्सी खूटी से खोलने की कोशिश की, उतनी ही बार वह मारवाड़ी स्त्री दौड़ती हुई आती और गाय से लिपटकर जोर-जोर से रोने लगती। माँ जैसे ही पैसों की माँग करती, वह चुप हो जाती। सुंदर ने उछलकर मुझे पास आने से रोक दिया। माँ को तभी यह युक्ति सूझी होगी। एक बैलगाड़ी लिवा लाओ।' उन्होंने मुझसे कहा।

'सुंदर को बैलगाड़ी में कैसे चढ़ाएँगे?' मैंने पूछा। 'मैंने तुमसे कहा है कि बैलगाड़ी ला और तू मुझसे सवाल-जवाब कर रहा है?' माँ गरजी और मैं बैलगाड़ी लेने चल पड़ा।

बैलगाड़ी आने पर माँ उस पर बछड़े को लेकर बैठ गई। मुझे भी गाड़ी में बैठने को कहा। वहाँ के ही एक आदमी से सुंदर की रस्सी खूटी से खोलकर हाथ में पकड़ाने को कहा। माँ ने उस रस्सी को गाडी के पीछे बाँध दिया। मैं उस क्षण का इंतजार कर रहा था, जब संदर रस्सी तोड़कर भाग जाएगी। मगर सुंदर बैलगाड़ी के पीछे-पीछे चलते हुए शांतिपूर्वक आ गई।

इसके बाद दो हफ्तों के अंदर सुंदर पाँच-छह बार रस्सी तोड़कर मारवाड़ी के घर भाग गई। हर बार मुझे बैलगाड़ी ले जाकर उसे वापस लाना पड़ा। मैं समझ पा रहा था कि स्वतंत्र रूप से सब्जी मंडी में विचरण करते हुए कचरादानों में मुँह मारना दो सौ वुर्गफीट के दायरे में घूमना, मनचाहा व्यवहार करने की तुलना में एकांत विशाल गौशाला में उसे खूटी से बँधे रहना, खली -आदि खाना क्यों नहीं भाया। बाजार का शोरगुल उसके लिए इतना आवश्यक था कि वह अपने एक माह के बछड़े को भी छोड़कर भागने में तत्पर थी। कई अच्छे कारणों के लिए मनुष्य अपना स्वभाव परिवर्तित करने में असमर्थ है तो केवल मालिक के बदल जाने के कारण एक गाय से उसके स्वभाव के बदल जाने की अपेक्षा करना कितना अन्याय है।

कुछ ही दिनों में हम गाय से बिल्कुल तंग आ चुके थे। मारवाड़ी औरत पैसे वापस करनेवाली नहीं थी। मौका पाते ही गाय अपनी पुरानी मालकिन के पास दौड़ जाती। दूध तो बिल्कुल कम देती थी। गाय भी श्याम–थन थी। इतने दिन उसके दूध को पीकर न जाने कितने पाप लग गए होंगे। उसे बेच देना ही अच्छा था।

सुंदर को खरीदने के लिए एक आदमी मिल ही गया। बहुत शांत स्वभाव का था। हमने उससे कहा कि हमने गाय 350 रुपयों में खरीदी थी और 300 रुपयों में देने के लिए तैयार हो। वह तुरंत मान गया। एक दिन शाम को वह अपने साथ दो आदमियों को आया और गाय तथा बछड़े को ले गया।

उस रात मैंने पिताजी से पूछा, 'क्या आपने उन्हें बताया कि सुंदर अकसर रस्सी तोड़कर मारवाड़ी के घर भाग जाती है? '

पिताजी का ध्यान कहीं और था, उन्होंने जवाब नहीं दिया। आमतौर पर वे ऐसा बरताव नहीं करते।

मैंने माँ से पूछा, माँ ने मुझे डपट दिया सुंदर...। क्या सुंदर-सुंदर' लगा रखा है। घर की बला टली।

'वह तो ठीक है, मगर क्या नए खरीददार को यह बताया गया कि गाय के गुम हो जाने पर उसे बाजार में जाकर ढूँढ़ना होगा?'

माँ ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। उलटे मुझे डाँटने लगीं—'सुंदर नहीं...बंदर कहो उसे।'

मैंने सोचा, कम-से-कम उस मारवाड़ी के घर में तो माँ ने ऐसा नहीं कहा था, यही शुक्र है। अगर कह देती तो वह मारवाड़ी स्त्री चिल्लाई होती कि इसने मेरे बच्चे को बंदर कहा।

रात को मैं पिछवाड़े का दरवाजा बंद कर आया। इतने बड़े तमाशे के बीच सुंदर मेरी ओर से लापरवाह ही रही। ऐसा होते हुए भी मैं ही उसका नाम लेकर उसे याद करता था। उसके किसी गुण ने मुझे आकृष्ट कर लिया था।

मुझे उसके नए मालिक पर दया आई। बिना किसी सवाल के पूरा पैसा देकर गाय ले गया था, पता नहीं वह उसकी गौशाला में है या बाजार की तरफ भाग गई। मुझे उस रात नींद ही नहीं आई। मुझे बार-बार बस यही खयाल आता कि जरूर सुंदर मारवाड़ी के घर भाग गई होगी। जैसे भी हो, गाय को ढूँढ़ते हुए वह सुबह यहाँ जरूर आएगा। यहीं से एक बैलगाड़ी लेकर जाना होगा। वह इस वक्त शायद आ ही रहा हो?

सुबह दरवाजा खुलने पर वह दिखाई नहीं दिया। रस्सी तोड़कर आई हुई सुंदर खड़ी थी।

- अलकनंदा सिंंह

Friday, 29 July 2022

सावन में ब्रज: संत सनातन स्‍वामी और उनके ठाकुर मदनमोहन


 प्रारंभ करूंगी सनातन स्‍वामी के इस पद से- 


जो करैं प्यारे सो मो हितकारी ।

गरभ में पालन नर तन पोषण सदगुरु भेंटे जाऊँ बलिहारी ।१।

नीकी काल आज अब नीकी तिन चरनन कल हू सुखकारी ।

प्रीति प्रतीति रसरीति बढ़त दिन सब अनुकूल सबहि उपकारी ।२।

तन वन मन निकुंज मनरंजन मधुर केलि विलसैं पिय प्यारी ।

कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि भज जुगल मंत्र नित आनंदकारी ।३।


अब पढ़िए सनातन स्‍वामी के बारे में- 


सनातन गोस्वामी ने अपनी कुटिया के निकट ही एक फूँस की झोंपड़ी का निर्माण किया और उसमें मदनगोपाल जी को स्थापित किया। उनके भोग के लिये वे मधुकरी (साधु-संन्यासियों की वह भिक्षा जिसमें केवल पका हुआ भोजन लिया जाता हैपर ही निर्भर करते। मधुकरी में जो आटा मिलता उसकी अंगाकड़ी (बाटी) बनाकर भोग के रूप में उनके सामने प्रस्तुत करते। साथ में निवेदन करते जंगली पत्तियों का बना अलोना साग। कुछ दन बीते ठाकुर को इस आटे के पिंड और अलोने साग को किसी प्रकार निगलते। संकोच में पड़कर वे अपने प्रेमी भक्त से कुछ न कह सके। पर अन्त में उनसे न रहा गया। स्वप्न में दर्शन देकर कहा-

"सनातन, अलोने (बिना नमक का) साग के साथ तुम्हारी अंगाकड़ी मेरे गले के नीचे नहीं उतरतीं और कब तक उसे जबरदस्ती ठेलता रहूँगा। उसके साथ थोड़ा नमक दिया करो न।"

सनातन के नेत्रों से बह चली प्रेमाश्रु की धारा। कातर स्वर से उन्होंने कहा-

"प्रभु मैं ठहरा आपका एक तुच्छ सेवक, जिसका डोर-कौपीन के सिवा कोई सम्बल नहीं। आप आज नमक की कह रहे हैं, कल गुड़ की कहेंगे, रसों राजभोग की, तो मैं कहाँ से लाऊँगा? यदि आपकी राजभोग की इच्छा है, तो स्वयं ही उसकी व्यवस्था कर लें।"

यह कैसी सनातन की निष्टुरता अपने ही प्राणप्रिय मदनगोपाल के प्रति! जिनकी सेवा की तीव्र आकाँक्षा ने उन्हें पागल कर रखा था, उन्हीं की सेवा में ऐसी कृपणता और उदासीनता! ऐसी कौन सी वस्तु थी, जिसे विरक्त होते हुए भी मदनगोपाल की सेवा के लिए वे संग्रह नहीं कर सकते थे, जब उन जैसे महात्मा की इच्छापूर्ति करने के किसी भी अवसर के लिए बड़े-बड़े धनी व्यक्ति लालायित रहते थे? बात कुछ गूढ़ है। थोड़ा गहराई में उतरे बिना समझ में आने की नहीं। सनातन मदनगोपाल की सेवा के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर सकते थे, पर उस भजन-पथ को नहीं त्याग सकते थे, जो उनकी सर्वोत्तम सेवा का अधिकार जन्माने के लिए आवश्यक था। उनकी सर्वोत्तम सेवा है मानसी-सेवा। मानसी-सेवा में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं होता। देश, काल, समाज और प्रकृति के नियमों की सीमा से बाहर रहकर इष्ट की प्राणभर मनचाही सेवा कर उन्हें सुखी कर सकता है। मानसी-सेवा का अधिकार प्राप्त उसे होता है, जिसका अन्त:करण शुद्ध होता है। अन्त:करण की शुद्धि के लिये त्याग-वैराग्ययुक्त एकांतिक भजन-पथ का अनुशीलन आवश्यक है। यदि सनातन मदनगोपाल के राजभोग के लिए तरह-तरह की सामग्री जुटाने में लग जाते, तो उनकी परापेक्षा बढ़ जाती और वे एकांतिक भजन-पथ से च्युत हो जाते। इष्ट की सर्वोत्तम मानसी-सेवा की योग्यता प्राप्त करने के लिए उनकी व्यावहारिक सेवा की सीमा बाँधना आवश्यक था।

इसके अतिरिक्त स्वयं उनके इष्ट ने महाप्रभु में जगद्गुरु का दायित्व ओटते हुए उन्हें आज्ञा दी थी वैराग्यमय जीवन का चरम आदर्श स्थापित करने की। गुरु-आज्ञा ईश्वराज्ञा से भी अधिक बलवती है। तब वे गुरुरूपी इष्ट की आज्ञा का पालन करते या उपास्यरूपी इष्ट की इच्छा की पूर्ति करते? इसीलिए उन्हें दो टूक कह देना पड़ा मदनगोपालजी से-अपने उत्तम भोग की व्यवस्था आप स्वयं कर लें। यदि कहा जाय कि ऐसा कह सनातन गोस्वामी ने उनकी मर्यादा की हानि की, तो इसके लिए भी मूल रूप से दोषी मदनगोपाल ही हैं। वे क्या जानते नहीं थे कि सनातन एक निष्किञ्चन साधक हैं, जिनका डोर-कौपीन के सिवा दूसरा कोई सम्बल नहीं? उनकी सेवा अंगीकार करने के पहले उन्हें नहीं समझ लेना चाहिए था कि उन्हें भी उन्हीं की तरह रूखी-सूखी खाकर रहना पड़ेगा? असल बात यह है कि उनसे अपने प्रेमी भक्तों के साथ चुहल किये बिना भी तो नहीं रहा जाता। वे उनके साथ जानबूझ कर अटपटा व्यवहार कर, उन्हें झूठा-सच्चा उलहना देकर या किसी न किसी प्रकार उन्हें उपहासास्पद स्थिति में डालकर और उनकी खरी-खोटी सुनकर प्रसन्न होते हैं। उन रसिक-शेखर को उनकी खरी-खोटी जितनी अच्छी लगती है, उतनी वेद-स्तुति भी अच्छी नहीं लगती।

-अलकनंदा सिंह

Sunday, 12 June 2022

 “You are not the victim of the world, but rather the master of your own destiny. It is your choices and decisions that determine your destiny.” ― Roy T. Bennett. 

 



These two pictures are enough to speak on today's environment.

#Stonepelting 


Monday, 23 May 2022

जयंती विशेष: साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त अन्नाराम सुदामा, पढ़िए उनकी कहानी- ''सूझती दीठ''


 राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार अन्नाराम सुदामा का जन्म 23 मई 1923 में हुआ था। सुदामा ने राजस्थानी भाषा में साहित्य की कई विधाओं में रचनांए की हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध, नाटक, यात्रा स्मरण एवं बाल साहित्य लिखा है। उन्होंने अन्य कई विधाओं में 25 से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं।

सुदामा जी का साहित्य अन्नाराम सुदामा समग्र के नाम से सात खण्डों में प्रकाशित किया गया था। सुदामा जी की साहित्यिक रचनांए विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। इनकी सबसे प्रमुख रचना का नाम है ‘मेवे का रूंख’ जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
रूणिया बड़ा बांस में इस बालक के जन्म के समय अच्छा जमाना हुआ तो अकाल से पीड़ित अन्न की किल्लत भुगत रहे परिजनों ने नाम अन्नाराम रख दिया। स्कूल में गुरूजन की सुदामा के नाम की उपमा से बाद नाम के पीछे सुदामा जुड़ गया। राजस्थानी में लोक विधा के विजयदान देथा के दौर के सुदामा ने मौलिक लेखन के साथ राजस्थानी को ऊंचाई दी। साहित्यकार डॉ. मदन सैनी ने सुदामा के साहित्य पर डाक्टरेट भी करवाई है।

सुदमा जी ने कई रचनाएं की हैं जिसमें मैकती कायाः मुलकती धरती, आंधी अर आस्था, डंकीजता मानवी, घर-संसार, अचूक इलाज, आंधे नै आंख्यां, अचूक इलाज, गॉंव रो गौरव, बंधती अंवलाई, दूर-दिसावर, पिरोल में कुत्ती ब्याई, व्यथा-कथा अर दूजी कवितावां इत्यादि। सुदामा जी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था जिसमें- केन्द्रीय साहित्य अकादमी दिल्ली में पुरस्कृत, मीरा पुरस्कार, सूर्यमल्ल मीसण, राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, टैसीटोरी गद्य पुरस्कार इत्यादि। अन्नाराम सुदामा का निधन 2 जनवरी 2004 में हुआ था।

राजस्थानी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में जिन महान रचनाकारों का योगदान है, उनमें अन्नाराम सुदामा का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। राजस्थान के ग्रामीण जनजीवन में नित्य होने वाली घटनाओं को वे अत्यंत पारखी नजर से देखते हुए गहरी सामाजिक चेतना से सराबोर रचनाएं लिखते थे और यही उनके लेखन की विशेषता थी।

राजस्थान के ग्राम्य जीवन की संवेदना, मानवीय सरोकार और विविध छवियां आप अन्नाराम सुदामा के साहित्य से गुजरे बिना देख ही नहीं सकते। वे राजस्थानी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिनके यहां अभावों में जीते मनुष्य की चेतना और विपरीत हालात से संघर्ष इतनी शिद्दत के साथ मौजूद होते हैं कि स्वयं पाठक भी एकबारगी लेखक और उसके अद्भुत जीवट वाले पात्रों के साथ खड़ा हो जाता है। 
अन्नाराम सुदामा के विपुल साहित्य में ‘सूझती दीठ, एक ऐसी कहानी है, जो अकाल से ग्रस्त एक सामान्य निर्धन ग्रामीण स्त्री के संघर्ष के बीच उसकी वैज्ञानिक दृष्टि को ही नहीं उसके नैतिक बल और साहस को बहुत गहराई के साथ रेखांकित करती है। पढ़े-लिखे पात्रों के माध्यम से चेतना जगाना आसान होता है, लेकिन सुदामा तो अपने निरक्षर पात्रों से ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समता-बंधुत्व की बात अत्यंत सहज रूप से पैदा कर देते हैं। इस एक कहानी से आप उनकी रचनात्मकता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।

सूझती दीठ-अन्नाराम सुदामा की कहानी

इस एक कहानी से आप उनकी रचनात्मकता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।
तुलसी को गांव छोड़कर कस्बे में आए तीनेक महीने हुए हैं। लगातार पड़ते अकाल के इस तीसरे साल वह यहां आई है। दो साल तो उसने जैसे-तैसे काट दिये, घर तो वो फिर भी चला लेती लेकिन गाय-बछड़ों का क्या करे। तीन जानवरों के लिए रोज पचास-साठ रुपये का बीस-बाइस किलो चारा कहां से आए। चरागाह से लेकर खेत तक सब सफाचट मैदान हुए पड़े हैं। गांव में जब कोई आस नहीं दिखी तो तुलसी अपनी बूढ़ी सास, पांच साल के लड़के और आठ साल की लड़की वाले परिवार को लेकर इस कस्बे में चली आई।
गांव की एक नाइन के परिचय से उसे एक मोहल्ले में एक सेठ का छह सौ गज का बाड़ा बीस रुपये महीने में किराये पर मिल गया। सेठ ने इस शर्त पर बाड़ा दिया था कि कहने पर एक-दो दिनों में ही खाली करना होगा। तुलसी ने शर्त मान ली और नाइन ने जिम्मेदारी ले ली। बाड़ा क्या था, बाहर एक पक्का अहाता, भीतर एक कमरा और बाकी खुली जगह। इस बाड़े में कभी जलावन की लकड़ियां और चारा होता था, लेकिन सालों से देखभाल के अभाव में पूरा बाड़ा उजाड़ पड़ा था, जिसमें मकड़ी और चमगादड़ों का डेरा था। तुलसी ने बेटे-बेटी के साथ मिलकर इस जगह को रहने लायक बनाया। कमरे के आधे हिस्से में चार बोरी चारा और आधे में रहने का ठीया बनाया। बाहर के अहाते में चौका-चूल्हा जमाया और खुले में गाय और बछड़ा-बछड़ी। रोज दोनों वक्त आठ किलो दूध होता, जिसमें थोड़ा बचाकर बाकी तुलसी बेच देती। दिन में मां-बेटी पापड़ बेल कर पांच छह रुपये कमा लेती। इस तरह घर की गाड़ी चलने लगी।
एकाध बार सेठानी ने तुलसी को घर में बुलाया और दाल-दलिया पिसवाने-बीनने का काम कराया। काम के बाद सेठानी ने उसे मजदूरी के बदले बच्चों के लिए दो कटोरी सब्जी देनी चाही तो तुलसी साफ मना कर गई। तुलसी ने कहा कि घर में प्याज-पोदीने की चटनी और पालक की सब्जी रखी है। सेठानी ने पूछा कि तुलसी ब्राह्मण होकर प्याज खाती है तो जवाब में वह कहती है कि इंसान के लिए तो चोरी, छल-कपट और चुगली जैसे अवगुण भी मना है लेकिन कौन मानता है। इस महंगाई के दौर में गरीब आदमी क्यों सब्जी खाये, प्याज की गांठ सामने हो तो रोटी सहज ही गले से नीचे उतर जाती है। तुलसी के जवाब के आगे सेठानी निरुत्तर हो गई। तुलसी वापस आ गई।
तुलसी के बाड़े के पास एक सरकारी जमीन पर पोकरण की तरफ से आए मजदूरों ने अस्थायी बसेरा बना रखा है। ये भी तुलसी की तरह ही अकाल का भारी वक्त काटने आए हैं। यहां कई बीमार बूढ़े रात-दिन खांसते रहते हैं। बच्चे दिन में आसपास से कचरा, लकड़ी, कागज आदि बीनते हैं, जिनसे कुछ आमदनी भी हो जाती है और शाम के वक्त खाना पकाने के लिए जलावन भी। जवान आदमी-औरतें सड़क के किनारे रेत डालने के काम में मजूरी करते हैं।
एक दिन सुबह-सुबह पांच-सात औरतें तुलसी के दरवाजे पर आ पहुंची। इनमें से एक ने दो दिन पहले तुलसी से मिलकर बच्चों के लिए दूध देने की विनती की थी कि वे रोज नकद पैसे देंगी, बस बदले में अच्छा दूध मिल जाए। तुलसी ने हामी भर दी। अब ये मजदूर महिलाएं तुलसी की नई ग्राहक बन गईं थीं।
एक रोज सूरज उगने से पहले ही सेठ का एक नौकर आया और कहा कि आज सेठ ने सारा दूध मंगाया है। सेठ के घर इतने दूध की क्या जरूरत, पता चला कि आज सेठ के पिताजी का श्राद्ध है, जिसके लिए गाय के शुद्ध दूध से हवेली के चारों तरफ लकीर निकाली जाएगी। तुलसी ने सोचा, चार किलो दूध रेत में बहा दिया जाएगा, इसका मतलब रोगियों का आधार, निरोगियों का बल और देश की संपत्ति आखिर वह क्यों बेचे, उसने नौकर से कह दिया कि जाकर सेठ से कह दो कि आज कहीं ओर से दूध का इंतजाम कर लें, मैं नहीं दे सकूंगी।
नौकर के बाद खुद सेठ चला आया। सेठ ने कहा कि दूध तो कहीं भी मिल जाएगा लेकिन ज्यादा तो मिलावट वाला मिलता है और तुमने नौकर से ना कह दी। उसने सेठ से कहाकि सच्ची बात तो यह है कि मैं रेत में बिखराने के लिए दूध नहीं बेचती। सेठ ने कहाकि वो चाहे धूल में मिलाए या कुछ भी करे उसे तो पैसों से मतलब होना चाहिए, वह ज्यादा पैसे दे सकता है। लेकिन तुलसी नहीं मानी तो नहीं ही मानी। इस पर सेठ को गुस्सा आ गया और उसने कह दिया कि आज की आज बाड़ा खाली हो जाना चाहिए। तुलसी ने कह दिया कि वह इस सुविधा की खातिर अपनी समझ पर पर्दा नहीं गिरने देगी। उदासी की हल्की रेखा चेहरे पर तैर गई। सेठ भांप गया और आज ही बाड़ा खाली करने की कहकर चला गया।
सेठ घर गया तो सेठानी को सारी बात बताई तो सेठानी ने कहा कोई बात नहीं, दूध तो कहीं से भी ले आएंगे। सेठ ने बताया कि उसने तुलसी को आज ही बाड़ा खाली करने के लिए कह दिया है। सेठानी ने कहाकि वह तो बाड़े की देखभाल ठीक कर रही है और कभी-कभार बिना किसी लोभ के वह आकर मेरा कुछ काम भी कर देती है। अलग किस्म की औरत है वह। हमें उससे क्यों बराबरी करनी चाहिए। सेठ ने कहा, अगर तुम ऐसा सोचती हो तो ठीक है, अगर शाम तक तुलसी आती है तो तुम ही उसे रहने के लिए कह देना, मैं तो अपने मुंह से नहीं कहूंगा।
दो दिन से तुलसी की सास का दमा का रोग जोर मार रहा था और लड़के को भी मलेरिया बुखार हो रखा था। लेकिन तुलसी को तो इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि इतनी जल्दी जगह का इंतजाम कैसे होगा, उसने कोशिश करने की सोची और कुछ खा-पीकर जगह ढूंढने निकल पड़ी। उसने ठान लिया था कि सेठ के आगे जाकर हाथ नहीं फैलाएगी, किसी साधारण गुवाड़ी में उसके स्वभाव को देखते हुए जगह मिल ही जाएगी। और आखिर ढूंढ़ने पर उसे एक अकेली मालिन के पास कामचलाउ जगह मिल ही गई। उसे अपना सामान ढोने और लगाने में बहुत असुविधा तो हुई, लेकिन मां-बेटी लगी रही और दो बजे तक भूखे पेट बिना पानी पिये काम करती रही। ढाई बजे वह सेठ के यहां जा पहुंची।
सेठ अपनी गद्दी पर बैठा पान खा रहा था, देखते ही बोला, तेरे दूध नहीं देने से मेरा काम थोड़े ही रुका, पैसों के बदले दूध की कोई कमी थोड़े ही है।
तुलसी ने कहा, आप पर लक्ष्मी की कृपा है आप चार किलो क्या चार मण दूध से लकीर खींचो। लेकिन मेरी मान्यता है कि यही दूध अगर धूल में ना गिराकर भूखी-प्यासी जनता को पिलाते तो उसमें प्राणों का संचार होता, आपको आशीष मिलती और आपके पिता की आत्मा को कहीं ज्यादा खुशी मिलती।
सेठ ने कहा कि इन बातों को छोड़ और एक बार घर जाकर सेठानी से मिल ले। तुलसी ने कहा कि उनसे तो मिलती रहूंगी, लेकिन पहले आप यह चाबी सम्हालो। सेठ ने कहा, चाबी, बाड़ा खाली कर दिया क्या। हां, कहकर तुलसी चुपचाप चल दी। सेठ जाती हुई तुलसी की पीठ ऐसे देखता रहा, जैसे किसी अफीमची का नशा उतर गया हो।
कहानी अंश
समझदार तो कार्तिक लगते ही अपना-अपना पशुधन लेकर शहर के पास जा पहुंचे और नासमझ में से ज्यादातर के जानवर दो बरस में ही भूख की मार से रेत खा-खाकर सिधार गए। तुलसी ने देख लिया, अब यहां किसी हालत में गुजारा नहीं होगा, जल्दी से जल्दी किसी कस्बे की तरफ कूच करने में ही भलाई है। वहां पशुओं का भी पेट पाल लूंगी और परिवार का भी। परिवार में पांच बरस का एक लड़का, एक आठ साल की लड़की और दमे की रोगी एक बूढ़ी सास। देहरी को सीस नवा कर वह एक कस्बे की तरफ चल दी।
....................
वो आधा मिनट सोचने लगी, लकीर खींची जाएगी, थोड़ी दूर में नहीं, हवेली के चारों तरफ, वो भी पानी से नहीं दूध से। मतलब चार किलो दूध रेत में बिखेरा दिया जाएगा, किसके काम आएगा वो दूध, वो तो रोगियों का आधार है और निरोगियों का बल। देश की संपत्ति को इस तरह धूल में डालने के लिए बेचूं तो मेरी समझ ही खराब है।
सहसा उसकी आंखों के आगे उसके पास रहने वाले बीमार बच्चे, बुझते हुए और चाय के लिए तरसते बुजुर्ग औरत-आदमी, हारे थके मजूर नाच उठे। उसने कहा, ‘भाई, सेठजी को मेरी तरफ से हाथ जोड़कर कह देना कि दूध का इंतजाम कहीं ओर से कर लें, मैं नहीं दे सकूंगी।

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह

Sunday, 15 May 2022

‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’: ‘ठुमरी’ के पर्याय थे वाज‍िद अली

 


 संगीत की विधा ‘ठुमरी’ के जन्मदाता के रूप में जाने जाने वाले अवध के नवाब वाज‍िद अली शाह ने ठुमरी के साथ एक और प्रयोग क‍िया, इस प्रयोग में ठुमरी को कत्थक नृत्य के साथ गाया जाता था। इन्होंने कई बेहतरीन ठुमरियां रचीं। कहा जाता है कि जब अंग्रेजों ने अवध पर कब्जा कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को देश निकाला दे दिया, तब उन्होंने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय’ यह प्रसिद्ध ठुमरी गाते हुए अपनी रियासत से अलविदा कहा।

अवध में संगीत, विशेषकर ठुमरी की समृद्धि के लिए बड़े पैमाने पर काम हुआ। वाजिद अली शाह ने स्वयं कई ठुमरियां कम्पोज़ कीं, जिनमें से बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए… मील का पत्थर साबित हुई।

ठुमरी की उत्पत्ति लखनऊ के नवाब वाज़िद अली शाह के दरबार से मानी जाती है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने इसे मात्र प्रश्रय दिया और उनके दरबार में ठुमरी गायन नई ऊँचाइयों तक पहुँचा क्योंकि वे खुद 'अख्तर पिया' के नाम से ठुमरियों की रचना करते और गाते थे। हालाँकि इसे मूलतः ब्रज शैली की रचना माना जाता है और इसकी अदाकारी के आधार पर पुनः पूरबी अंग की ठुमरी और पंजाबी अंग की ठुमरी में बाँटा जाता है पूरबी अंग की ठुमरी के भी दो रूप लखनऊ और बनारस की ठुमरी के रूप में प्रचलित हैं। ठुमरी की बंदिश छोटी होती है और श्रृंगार रस प्रधान होती है। भक्ति भाव से अनुस्यूत ठुमरियों में भी बहुधा राधा-कृष्ण के प्रेमाख्यान से विषय उठाये जाते हैं। ठुमरी में प्रयुक्त होने वाले राग भी चपल प्रवृत्ति के होते हैं जैसे: खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, तिलंग, पीलू, काफी, झिंझोटी, जोगिया इत्यादि।

शास्त्रीय नृत्‍य कथक का वाजिद अली शाह के दरबार में विशेष विकास हुआ। गुलाबों सिताबों नामक विशिष्ट कठपुतली शैली जो कि वाजिद अली शाह के जीवनी पर आधारित है, का विकास प्रमुख आंगिक दृश्य कला रूप में हुआ।

परफॉर्मिंग आर्ट्स की तरह, वाजिद अली शाह ने भी अपनी अदालत में साहित्य और कई कवियों और लेखकों को संरक्षित किया। उनमें से उल्लेखनीय ‘बराक’, ‘अहमद मिर्जा सबीर’, ‘मुफ्ती मुंशी’ और ‘आमिर अहमद अमीर’ थे, जिन्होंने वाजिद अली शाह, इरशाद-हम-सुल्तान और हिदायत-हम-सुल्तान के आदेशों पर किताबें लिखीं।

ठुमरी के साथ-साथ उन्होंने कथक को लोकप्रियता के शिखर तक ले जाने में अहम भूमिका अदा की। नवाब वाजिद अली शाह की लिखी पुस्तक बानी में 36 प्रकार के रहस वर्णित हैं। ये सभी कथक शैली में व्यवस्थित हैं और इन सभी प्रकारों का अपना एक नाम है, जैसे घूंघट, सलामी, मुजरा, मोरछत्र, मोरपंखी आदि। इनके साथ-साथ इस पुस्तक में रहस विशेष में पहनी जाने वाली पोषाकों, आभूषणों और मंचसज्जा का विस्तृत वर्णन है।

अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कुशल शासक के बजाय उन्हें कला, संगीत प्रेम, विलासिता और रंगीन मिजाज़ के लिए इतिहास में जाना जाता है लेकिन आज हम उनके योगदान का विस्तृत रूप में जानने की कोशिश करते हैं। दरअसल 9 साल तक अवध के शासक रहे वाजिद अली शाह को विरासत में एक कमज़ोर राज्य मिला। उनके पहले के नवाब अंग्रेज़ों से प्लासी और बक्सर में भिड़ चुके थे और उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। अवध को इसके चलते अंग्रेज़ों को भारी जुर्माना देते रहना पड़ता था।

ललित कलाओं के क्षेत्र में वाजिद अली शाह ने अपना विशेष योगदान दिया, जो आज तक उन्हें प्रसिद्ध बनाता है। उन्हें एक दयालु, उदार, करुणामय और एक अच्छे शासक के रूप में जाना जाता है, जो राज्य के कार्यों में ज्यादा रुचि रखते थे।

वाजिद अली शाह के शासन के अन्तर्गत अवध एक समृद्ध और धनी राज्य था। प्रशासन में सुधार लाने और न्याय एवं सैन्य मामलों की देख रेख के अलावा, वाजिद अली शाह एक कवि, नाटककार, संगीतकार और नर्तक भी थे, जिनके भव्य संरक्षण के तहत ललित कलाएं विकसित हुई थीं।

वाजिद अली शाह ने केसरबाग बारादरी महल परिसर का निर्माण करवाया। इसमें नृत्य-नाटक, रास, जोगियाजश्न और कथक नृत्य की सजीवता झलकती थी, जिसने लखनऊ को एक आकर्षक सांस्कृतिक केंद्र बनाया।

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह

Tuesday, 3 May 2022

परशुराम जयंती: वे पीयें शीत तुम आतम घाम पियो रे....


 आज भगवान परशुराम की जयंती जोर शोर से मनाई जा रही है। जातिवादी व्‍यवस्‍था में घिरे समाज में आज भगवान परशुराम को ब्राह्मणों ने अपना आराध्‍य माना हुआ है। एक पक्ष के तौर पर देखा जाये तो यह ठीक लग सकता है परंतु समग्रता में भगवान परशुराम न तो ब्राह्मणों के हितैषी थे और ना ही क्षत्रियों के विरोधी। वो तो आतताइयों के विरोधी थे और निर्बलों के रक्षक। 

मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मात्र मूर्ति की आराधना करके भगवान परशुराम के वास्‍तविक धर्म को नहीं जाना जा सकता। परशुराम धर्म भारत की जनता का धर्म है परशुराम भारत की जागरूक जनता के प्रतीक थे। 

अब देखिए न कि राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने तो  इसी ''परशुराम धर्म'' पर ही ''परशुराम की प्रतीक्षा'' लिख दी, उनकी इस काव्‍यकृति से मैं ही क्‍या कोई भी आतताइयों को ललकार सकता है। आज जबकि सभी अपने-अपने स्वार्थ भाव के पोषण में लगे हैं तब आवश्यकता है एक ऐसे धर्म की जो सर्वजन हितकारी हो और लोगों के लिए हो। परशुराम धर्म वह धर्म है जो पौरुषमयी चेतना का वाहक है, अर्थात्  अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आज के युग का एकमात्र धर्म यही है।

परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, और समय की मांग भी यही है। यह समय की आवाज को न सुनना वालों के लिए यह उनके बहरेपनन की गवाही भी है और कायरता एवं नपुंसकता का स्वीकार्य भी।

राष्‍ट्रकवि  दिनकर के अनुसार इतने गूढ़ संदेशों को धारण करने वाला भगवान परशुराम का धर्म ही परशुराम धर्म कहलाया तथा इस धर्म के निर्वाहक के लिए 8 आवश्यक तत्व हैं पहला- स्वतंत्रता की कामना, दूसरा -वीर भाव , तीसरा- जागृति,चौथा- निवृत्ति मूल्क मार्ग का परित्याग,पांचवां- वर्ग वैमनस्य का विरोध,छठवां- भविष्य के प्रति सतर्क तथा आस्था मूल्क दृष्टि,सातवां - परशुराम धर्म की महत्ता और औचित्य जीवन और आठवां तत्‍व है- जीवन मानकर सिर ऊंचा कर जीवित करना।

 आज अधिक न लिखते हुए मेरे साथ आप भी पढ़िये परशुराम की प्रतीक्षा के ये अंश जो कालजयी है...आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि अपने रचनाकाल में थे।  

तीन खंडों में लिखी गई इस कविता -''परशुराम की प्रतीक्षा'' का (शक्ति और कर्तव्य) कुछ भाग मुझे यहां उद्धृत करना अधिक प्रिय लगा- आप भी पढ़ें। 


वीरता जहां पर नहीं‚ पुण्य का क्षय है‚

वीरता जहां पर नहीं‚ स्वार्थ की जय है।


तलवार पुण्य की सखी‚ धर्मपालक है‚

लालच पर अंकुश कठिन‚ लोभ–सालक है।

असि छोड़‚ भीरु बन जहां धर्म सोता है‚

पातक प्रचंडतम वहीं प्रगट होता है।


तलवारें सोतीं जहां बंद म्यानों में‚

किस्मतें वहां सड़ती हैं तहखानों में।

बलिवेदी पर बालियें–नथें चढ़ती हैं‚

सोने की ईंटें‚ मगर‚ नहीं कढ़ती हैं।


पूछो कुबेर से कब सुवर्ण वे देंगे?

यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे?

तूफान उठेगा‚ प्रलय बाण छूटेगा‚

है जहां स्वर्ण‚ बम वहीं‚ स्यात्‚ फूटेगा।


जो करें‚ किंतु‚ कंचन यह नहीं बचेगा‚

शायद‚ सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।

हम पर अपने पापों का बोझ न डालें‚

कह दो सब से‚ अपना दायित्व संभालें।


कह दो प्रपंचकारी‚ कपटी‚ जाली से‚

आलसी‚ अकर्मठ‚ काहिल‚ हड़ताली से‚

सी लें जबान‚ चुपचाप काम पर जायें‚

हम यहां रक्त‚ वे घर पर स्वेद बहायें।


हम दे दें उस को विजय‚ हमें तुम बल दो‚

दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।

हों खड़े लोग कटिबद्ध वहां यदि घर में‚

है कौन हमें जीते जो यहां समर में?

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गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?

शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?


उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,

तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;

सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,

निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;


गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,

तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;

शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,

शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;


सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,

प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को

जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,

(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)


हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,

शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।

- रामधारी सिंह ‘दिनकर’

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह


Friday, 25 March 2022

जन्मद‍िन: पढ़िए कवि तेज राम शर्मा की कविताऐं

आज ही के द‍िन यान‍ि 25 मार्च 1943 को हिन्दी भाषा के कवि तेज राम शर्मा का जन्म शिमला (हिमाचल प्रदेश) के गाँव बम्न्होल (सुन्नी) में हुआ था । वे भारत सरकार में विशेष सचिव के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद स्वतंत्र लेखन में लगातार सक्र‍िय रहे।

उनके दो कव‍िता संग्रह 1984 में प्रकाश‍ित ”धूप की छाया” और 2000 में प्रकाश‍ित ”बंदनवार ”, ज‍िसमें बंदनवार का अनुवाद बांग्ला में हुआ। इसके अलावा एक कविता संग्रह “नहाए रोशनी में” भी प्रकाश‍ित हुआ।

कविताओं में- अकेलापन, उसने चुना, ऐनक, फ़ोटो, बहुत दूर, वरना वह भी, सागर का रंग बहुत प्रस‍िद्ध रहीं। उनकी कविताएं पहाड़ की प्रकृति से आत्मीय संवाद की कविताएं हैं। प्रकृति के उपादानों का ही प्रतीकों और बिंबों के रूप में होन इन कविताओं की विशिष्टता है।  

कवि तेजराम शर्मा के सातवें कविता संग्रह ‘कंप्यूटर पर बैठी लड़की’ में कुल 79 कविताएं संगृहीत हैं जो ज्यादातर भीतर से बाहर की तरफ खुलती है। मिट्टी की गंध से सुवासित इन कविताओं की मुख्य टेक प्रकृति है। यहां तक कि कवि पुरखों की स्मृति में डूबता है तो प्रकृति के उपनाम और बिंब स्वत: आते चले गए हैं।

उनकी शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला से एम.ए. हिंदी, पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा इन ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट, मॅन्चेस्टर विश्वविद्यालय, यू.के.से क‍िया था । इसके अलावा डिप्लोमा इन ट्रेनिंग मॅनेजमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट, यू.के व डिप्लोमा इन फ्रेंच, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला भी उन्होंने क‍िया ।

कव‍ि तेजराम शर्मा को अखिल भारतीय कलाकार संघ साहित्य पुरस्कार, ठाकुर वेद राम राष्ट्रीय पुरस्कार, पंजाब कला साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिमाचल साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजा जा चुका है।

आज पढ़‍िए उनकी कुछ प्रस‍ि‍द्ध कव‍ितायें- 

गाँव के मन्दिर के प्राँगण में-
गाँव के मंदिर प्राँगण में
यहां जीर्ण-शीर्ण होते देवालय के सामने
धूप और छाँव का
नृत्य होता रहता है

यहाँ स्लेट छत की झालर से लटके
लकड़ी के झुमके
इतिहास पृष्ठों की तरह
गुम हो गए है

दुपहर बाद की मीठी धूप को छेड़ता
ठण्डी हवा का कोई झोंका
कुछ बचे झुमकों को हिला कर
विस्मृत युग को जगा जाता है

धूप में चमकती है ऊँची कोठी
पहाड़ का विस्मृत युग
देवदार की कड़ियों की तरह
कटे पत्थर की तहों के नीचे
काला पड़ रहा है
बूढे बरगद की पंक्तियों सा
सड़ रहा है
बावड़ी के तल में

इस गुनगुनी धूप में
पुरानी कोठी की छाया कुछ हिलती है
और लम्बी तन कर सो जाती है।

सपने अपने-अपने-

बालक ने सपना देखा
उड़ गया वह आकाश में
पीठ से फिसला उसका बस्ता
एक-एक कर आसमान से गिरी
पुस्तकें और काँपियाँ
देख कर मुस्कराया और उड़ता रहा
फिर गिरा आँखों से उसका चश्मा
धरती इतनी सुंदर है
उसने कभी सपने में भी न सोचा था

युवा ने सपना देखा
हवाई जहाज़ से
उसने लगाई छलांग
करतब दिखाता हुआ
निर्भय गिरता रहा धरती की ओर
जंगल जब तेजी से उसके पास आया
तो उसने पैराशूट खोल दिया
हवा का एक तेज़ झोंका
उसे राह से विचलित कर गया
पैराशूट को नियंत्रित करता हुआ
साहस के साथ वह
पेड़ों से घिरी चारागाह में उतरा
वहाँ एक युवती दौड़कर उसके पास आई
और प्यार भरी आँखों से उसे देखने लगी
सपने में ही अपना सिर उसकी गोद में रखकर
वह जीने के सपने देखने लगा

बूढ़े ने सपना देखा
सुबह-सुबह नदी स्नान करते हुए
फिसला जाता है उसका पाँव
वह नदी में डूबने लगता है
शिथिल इन्द्रियोँ से
छटपताता है बाहर निकलने के लिए
अपने-पराये कोई नहीं सुनते उसकी चीख
सब कुछ छूटता नज़र आता है
जैसे ही अंतिम साँस निकलने को होती है
बिस्तर पर जाग पड़ता है वह भयानक सपने से
काँपते हाथों से पानी पीता है और
सपने देखने से डरने लगता है।

कोई दिन-

हमारे सारे के सारे दिन
नष्ट नहीं हो जाते
कहीं एक दिन बच निकलता है
और जीवित रहता है
हवा,पानी, धूप, तूफान,काल
सब से लड़ता रहता है
लड़ते-लड़ते दूर तक निकल जाता है

सभी दिन तितली नहीं होते
कोई दिन तितली की तरह
पन्नों के बीच बच निकलता है
और क्षण-भंगुरता को चकमा दे जाता है
दिन
जिसमें मैं जीता हूँ
मेरा अपना नहीं हो पाता
मुट्ठी की रेत हो जाता है

पर वह दिन
जो बादलों की पीठ पर चढ़ कर
घूम आता है पर्वत–पर्वत
जीवित रहेगा बहुत दिनों
चीड़ और देवदार की गंध
आती रहेगी बरसों तक
उसके कोट से

मुझे अच्छा लगता है
जब बर्फ़ में ठिठुर रहे दिनों से
मैं उठा लाता हूँ एक दिन
गर्म पानी में हाथ-पाँव धुला कर
आग के पास बैठता हूँ
और शब्दों का एक गर्म-सा कंबल ओढ़ाता हूँ।

राग देस-

फासला
कि पार ही नहीं होता
हाथ से भाग्य-रेखा
रहती है सदा गायब
किसके पक्ष में
घटित हो रहा है सब कुछ
खतरनाक भीड़
कहाँ से उमड़ रही है?

इधर दीवारों से पलस्तर
उखड़ रहा है
उभर रहा है उसमें एक ही चेहरा
इस मौसम में
मिट्टी-गारे को ही
ताकती रह जाती है
दीवार पर उभरी इबारत

चोटियों पर गिरती है संकल्पों–सी लुभावनी बर्फ़
पर घाटी में ग्लेशियर
पिछली रात
नींव तक हिला गया है
गाँव-गाँव
घरों की दीवारें

उधर वैज्ञानिक
शुक्राणुओं में कम होती हलचल से
चिंतित हैं

इधर ऊसर में छिड़के बीज
चिड़ियाँ चुग जाती हैं
हाथ मलते रह जाते हैं शब्द

चरागाह में
भेड़ें पंक्तिबद्ध हैं
उतर रही है ऊन
सूरज छिपा है काले बादलों के बीच
पगडंडियाँ
कि दबती ही जा रही हैं
और उड़ती जाती है धूल
रंगमंच
कि नायक सभी हुए जाते हैं पतझड़ के चिनार
अगस्त्य हुए अरमानों के आगे
उमड़ रही है
आचमन के लिए भीड़
अबाअ सातों सुतों सहित हाथ जोड़े खड़ी है

विरासत
कि रेगिस्तान
फैला है ओर–छोर
शून्य में ताकते लोग़
पूछ रहे हैं
कौन-सी ऋचाओं के
अधिष्ठाता हैं
इन्द्र?
संस्कार
कि फिसल न जाए जनेऊ कान से
शंका करते हुए
नदियों से उठती
आग की लपटें
अग्निपुत्र पी रहें हैं लावा
सपनों की सूरत
निखरी हुई रेतीली आँखों में
साफ झलकते
परियों की चेहरे

मौसम कि बदलते ही
बीहड़ वन में फूलते हैं बरूस
पहाड़ में औरते छानती हैं सफेद मिट्टी
चमकती हैं घरो की दीवारें
स्लेट छत के चारों और
खिंचती हैं बरूस की बंदनवार रस्सियाँ
नज़र
कि अटकी रह जाती है
समुद्र किनारे के
नारियल के झुरमुटों बीच।

.....

सपने में नदी 

वर्षों तक

बार-बार

आता रहा एक ही सपना

नदी के तटबंधों पर

हाथों से सहलाता हूँ

उभरी तंरगें

नदी देती है खुला निमन्त्रण

पर बल खाती तरंगों पर

तैरने से घबराता हूं

डरते-डरते

गहरे में उतरता हूं

और जल के आवेग की तालों बीच

नदी पर तैरते हुए दूर निकल जाता हूं

तटों के बंधन से मुक्त नदी

मंझधार में

समूचा समेट लेती है मुझे

डूबते-डूबते

शिथिल होता है भुजाओं का पौरुष

नदी पता नहीं

कहां लेती होगी करवट

टूटे सपने की डोर पकड़े

बदलता हूं करवट बिस्तर पर।

-अलकनंदा सिंंह


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