Friday, 5 September 2025

कड़ाह में तलीं, झारियों पर सजीं भंडारे की पूड़ियां


 



यह प्रसिद्ध वाक्य, "भंडारे की पूड़ियों पर किसी को प्रबंध-काव्य लिखना चाहिए!", हिंदी के महान कवि और लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा था, जो उनकी व्यंग्यात्मक और सामाजिक टिप्पणी को दर्शाता है कि कैसे लोग सामान्य चीज़ों (जैसे भंडारे की पूड़ी) में भी आनंद और महानता खोज लेते हैं, और इन पर महाकाव्य लिखे जा सकते हैं. 

ये लीज‍िये द‍िनकर द्वारा ल‍िखा गया पूरा लेख-----

भंडारे की पूड़ियों पर किसी को प्रबंध-काव्य लिखना चाहिए! लोक में उनकी आसक्ति और प्रभाव इतने व्यापक जो हैं। वे घर में बनाई जाने वाली पूड़ियों से थोड़ी पृथक होती हैं। किंचित लम्बोतर, ललछौंही-भूरी, मुलायम, अधिक अन्नमय, और व्यापक जनवृन्द के क्षुधा-निवारण के प्रयोजन में सिद्ध। 

बहुधा भंडारे की पूड़ियों में घर की गोलमटोल पूड़ियों सरीखे पुड़ नहीं होते, वे अद्वैत-भाव से ही आपकी पत्तल में सिधारती हैं। यों पूड़ी शब्द की उत्पत्ति ही पुड़ से हुई है- जैसे सतपुड़ा यानी सात तहों वाला पर्वत। पूड़ियाँ बेलते समय तो आटे की लोई एक ही पुड़ की, समतल भासती हैं, पर तले जाने पर उसमें दो पुड़े फूल आते हैं। पहला, बाहरी पुड़ा महीन और कोमल, जो जिह्वा को लालायित करता है, और दूसरा, आभ्यन्तर का, अन्न के सत्त्व को अपने में सँजोए, जिससे क्षुधा का उन्मूलन होगा!

किसी धर्मशाला के कक्ष में रसोई करने वाली स्त्रियों द्वारा तारतम्य के संगीत से बेली और तली जाने वाली पूड़ियों का मन को स्निग्ध कर देने वाला दृश्य कभी निहारिए! और फिर पूड़ियों की मियाद चुक जाने पर जूठे हाथ लिए बैठे उसकी बाट जोहते भंडारा-साधकों को देखिए। महाअष्टमी-महानवमी में तो यह पूड़ी-प्रसंग भारत-भूमि में यत्र-तत्र-सर्वत्र सजीव हो उठता है। भंडारों की रामभाजी और पूड़ी पर समस्त संसार का अन्नकूट निछावर है!

मैदा की पूड़ी लचुई या लूची कहलाई है। यह विशेषकर बंगभूमि में प्रचलित है। अवध में यही सोहारी कहलाई है। पूड़ियों का एक रूप बेड़ई या कचौड़ी है, वह उत्तर-मध्य भारत में बनने वाली मूँगदाल की कचौड़ी से भिन्न है। कुछ पूड़ियाँ तो पुरइन के पत्ते जैसी लम्बी-चौड़ी भी होती हैं। भोजपुर-अंचल में वह हाथीकान पूड़ी कहलाई है। यह बड़ी मुलायम होती है और एक पखवाड़े तक ख़राब नहीं होती।

मैं कहूँगा, भारत के निर्धनजन की राम-रसोई में पहली इकाई है- रोटियाँ। सेंक के भूरे-कत्थई ताप-बिंदुओं से सज्जित, किंतु बहुधा बिना घृत-लेपित। उन पर प्रगतिशील कवि-लोग बहुत काव्य रचते हैं। जिस दिन निर्धन का मन इठलाता है, उस दिन वो रोटियों के वर्तुल को त्रिभुज से बदलकर सेंक लेता है पराँठे। किंतु पूड़ियाँ? वे तो पर्वों-उत्सवों का मंगलगान हैं। भारतभूमि में पूड़ियाँ पर्व का पर्याय हैं। पूड़ियाँ नहीं तो पर्व नहीं। पूड़ियाँ तली जा रही हैं तो पर्व ही होगा, कुछ वैसा ही वह संयोग है। वे हिंदू-पर्वों की स्नान-ध्यान वाली सत्त्व-भावना को व्यंजित करती हैं- हल्दी और अजवाइन की पीताम्बरा पूड़ियाँ तो सबसे अधिक!

पूड़ियों की जो सबसे मधुर स्मृति मेरे मन में है, वह इस प्रकार है- अगस्त का महीना! नागदा-दाहोद लाइन पर बारिश की सुरंग के भीतर दौड़ती रेलगाड़ी! फिर मेघनगर में किकोरों के सावन के मध्य उतरना। वहाँ से बस पकड़कर झाबुआ जाना, जहाँ दाहोद से मेरी बुआ राखी मनाने आई होती थी। बुआ हाथ में मेहंदी लगाती थी। मेहंदी रचे हाथ से पूड़ियाँ मुझे खिलाती थी।

संसार में कोमलता का इससे सुंदर चित्र कोई दूसरा नहीं हो सकता कि कोई स्त्री मेहंदी लगे हाथों से आपको पूड़ियाँ खिलाए!

तब इसका क्या करें कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को गर्म नहीं ठंडी पूड़ियाँ ही भाती थीं। कवि अज्ञेय ने स्मृतिलेखा में बताया है कि चिरगाँव में जब भी पूड़ियाँ बनतीं, वे बैठक से ही आवाज़ देते कि चार-छह पूड़ियाँ अलग रखवा देना। इन्हें वे अगली सुबह खाते। कहते कि बासी पूड़ी के बराबर कोई स्वाद नहीं जान पड़ता है।

ऐन यहीं पर मुझको एक पुरानी हिंदी फ़िल्म का संवाद याद आ रहा है, जिसे गुज़रे ज़माने के अभिनेता गोप ने अपनी अदायगी से तब ख़ूब मशहूर बना दिया था। संवाद कुछ यों था- 

"बड़े घरों की औरतें सुबह-सवेरे क्या करती हैं? अजी कुछ नहीं, बस आम के अचार से बासी पूड़ियाँ खाती हैं!"

यह तो हुई बड़े घरों की बात। और छोटे घरों-संकुचित हृदयों की अंतर्कथा? वह प्रेमचंद ने बतलाई है। बूढ़ी काकी- जो पूड़ियों के प्रति अपनी तृष्णा से भरकर जूठी पत्तलों से उनकी खुरचन बटोरकर खाने लगी थीं, जिसे देखकर सन्न रह गई थी गृहस्वामिनी।

ये सब लोक में, आख्यान में, सामूहिक-स्मृति में प्रतिष्ठित पूड़ी-प्रसंग हैं। जनमानस से एकाकार। गृहणियों के मन का प्रफुल्ल-उत्सव। पूड़ियाँ न होतीं तो पर्व नहीं हो सकते थे, पर्व मनाने वाले मन पुलक से नहीं भर सकते थे- तिस पर कड़ाह में तलीं, झारियों पर सजीं भंडारे की पूड़ियों की तो बात ही क्या। 


- द‍िनकर की पूड़‍ियों पर फ‍िदा--- अलकनंदा 'पूड़ी बाज' 

Sunday, 31 August 2025

ब्रजभूमि के दिव्य संत: श्री विनोद बिहारी दास बाबा जी


 बाबा का पूर्व नाम विनय कुमार था। उनका जन्म 1947 में एक ब्राह्मण परिवार में पिता श्री दाम और माता लावण्या के यहाँ हुआ था। 

वे तीन भाई थे। उनके माता-पिता की मृत्यु के बाद, उन्हें छोड़ दिया गया था, उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। वे कुछ छोटी-छोटी नौकरियों की तलाश में या सिर्फ भोजन और पानी की तलाश में सड़कों पर घूमते रहते थे। वह बाबा के जीवन का सबसे कठिन समय था। वह 8-10 साल का था और उसे इतनी कम उम्र में अस्वीकृति, निंदा और मानव के अमानवीय पक्ष का सामना करना पड़ा था। उन्हें कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा और वे उन महिलाओं के प्रति आभारी थे जिन्होंने उन्हें एक रोटी या मुट्ठी भर चावल भी दिए।

विनोद बिहारी दास बाबा याद करते हैं कि एक बूढ़ी औरत अपने घर नहीं जाने पर गुस्सा हो जाती थी और पहले उसे कहती थी कि चले जाओ और कभी वापस मत आना। लेकिन जैसे ही बाबा अपनी पीठ फेरते, वह और भी क्रोधित हो जाती और कहती "देखो! वह कितना अभिमानी है! वह जाने की हिम्मत करता है!"

विनोद बिहारी दास बाबा को यकीन नहीं था कि किसे अपना गुरु बनाया जाए, लेकिन उन्होंने कीर्तन मंडलों द्वारा गाए गए हरे कृष्ण महामंत्र को सुना था। इसलिए वह दिन-रात, हर समय महामंत्र का जप करने लगे। अब बाबा छुट्टियों में तीर्थ स्थानों पर जाने लगे। उन्होंने शास्त्रों में वृंदावन के बारे में पढ़ा था और उस समय ब्रज में रहने वाले कुछ उच्च साधुओं के बारे में सुना था। इसलिए वे कुछ दिनों के लिए वृंदावन आए 

वह उन साधुओं को खोजने लगे जो घने जंगल में रहते थे (ब्रज धाम उस समय भी जंगलों से भरा हुआ था) और दृढ़ निश्चयी थे। इस तरह, उन्होंने श्री किशोरीकिशोरानंद दास बाबा, जिन्हें श्री तीनकौड़ी  गोस्वामी के नाम से भी जाना जाता है, से मुलाकात की। वह अपने पूर्ण त्याग के  प्रति आकर्षित थे। श्री तीनकौड़ी  गोस्वामी जी कभी किसी आश्रम में नहीं रहे, हालांकि उनके शिष्यों ने उनके नाम पर कई आश्रम और मंदिर बनवाए। 

श्री तीनकौड़ी  गोस्वामी जी घने जंगलों में रहना पसंद करते थे, वह बहुत कम बोलते थे कुछ भी नहीं खाते थे (वह भी केवल फलाहार) और दिन-रात हरिनाम जप में तल्लीन रहते थे , इतना कि उसे लोगों से पूछना पड़ता था कि दिन है या रात लेकिन विनोद बिहारी दास बाबा खुद इस तरह के पूर्ण त्याग के मूड में नहीं थे, इसलिए वे कोलकाता वापस चले गए और छुट्टियों में ब्रज धाम और श्री तीनकोड़ी गोस्वामी के दर्शन किए। बाबा ने अपने घर में ही त्यागी जीवन शैली का अभ्यास किया। वह बहुत कम खाते थे कुछ दिनों के लिए अनाज खाना छोड़ देते थे। और वह हर समय हरिनाम का जप करने लगे।

श्री तीनकौड़ी  गोस्वामीजी द्वारा विनोद बिहारी दास बाबा को दीक्षा दी गई और उन्हें बाबाजी वेश भी दिया गया। गोस्वामीजी के साथ त्यागी जीवन बहुत कठिन और सख्त था। गोस्वामीजी कभी एक स्थान पर कुछ दिनों के लिए तो कभी कुछ महीनों के लिए रहते थे। उनका स्वभाव ऐसा ही था, वे अचानक अपने आसन से उठ जाते थे, यह तय कर लेते थे कि वे एक अलग जगह पर जाना चाहते हैं, और चलना शुरू कर देते और  ऐसे स्थान का चयन करेंगे जहाँ साँप, बिच्छू और भूत रहते हों, ताकि स्थानीय लोग उन्हें बार-बार परेशान करने न आएँ।

गोस्वामीजी अपने शिष्यों के लिए मध्यरात्रि में 2 बजे जागने और जल्दी स्नान करने और खुद को ताज़ा करने के बाद कीर्तन में शामिल करते और उस समय वे अपने व्यक्तिगत भजन के लिए जाते थे। लेकिन शायद वह चाहते थे कि विनोद बिहारी दास बाबा अध्यात्म की चरम ऊंचाईयों पर चढ़ें। ऐसा करने के लिए वे चाहते थे कि बाबा की नींद भी कम कर दें। 

एक बार गोस्वामीजी ने बाबा को 1 बजे तक जगाए रखा। तब बाबा ने पूछा कि क्या वह सो सकते हैं। गोस्वामीजी ने उत्तर दिया, "अब?! यह तो जागने का समय है, सोने का नहीं।" तो, बाबा इस तरह नींद से भी वंचित हुए, हालांकि उन्होंने स्वीकार भी किया कि वे इस वजह से जप के दौरान सो गए थे। लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। वह जानते थे कि उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा है। आखिरकार, उसे इसकी आदत हो गई और ज्यादा नींद नहीं आई।

इस तरह विनोद बिहारी दास बाबा ने गुरु गोस्वामीजी के पास रहकर सेवा और साधना की। बाबा ने आखिरकार 2006 से बरसाना के पीलीपोखर में अपने आश्रम (प्रिया कुंज आश्रम नाम) में राधा रानी की दिव्य सेवा के तहत शरण ली। 

विनोद बिहारी दास बाबा न केवल श्री धाम बरसाना के निवासियों के लिए, बल्कि दुनिया भर में पतित आत्माओं के लिए भी दया के स्रोत हैं। उनकी अकारण कृपा से कोई भी दूर नहीं है यहाँ तक कि जानवर भी ... श्री जी महल के रास्ते में बंदरों पर बाबा का प्यार बरसता है। श्रीमहल के ऊँची अटारी में प्रत्येक शाम को विभिन्न विषयों पर उनके सत्संग से बहुत लाभ प्राप्त हो सकता है। 

विनोद बिहारी दास बाबा भक्ति की बहुत कठिन अवधारणाओं को इतने सरल तरीके से प्रस्तुत करते हैं कि कोई भी उनके दिव्य सत्संग से सीख सकता है। वह शास्त्रों के अपने गहरे ज्ञान से चीजों का हवाला देते थे और फिर उसे उस तरह से समझाते थे जिसे आप आसानी से समझ सकते हैं। बाबा श्री श्री राधामाधव सरकार की ओर दिव्यता और भावनाओं की नदी का उद्गम करते हैं जिसमें हर कोई स्नान कर सकता है।

- ब्रजभाषा के कव‍ि श्री अशोक अज्ञ की फेसबुक वॉल से साभार 

Tuesday, 26 August 2025

एक कहानी जो बचपन में सुनी थी


 एक समय की बात है, एक राजा ने निश्चय किया कि वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाएगा। एक दिन एक साँप ने खीर वाले दूध में मुँह डालकर उसमें ज़हर मिला दिया। ज़हरीली खीर खाने से सभी 100 अंधे मर गए। राजा को बहुत चिंता हुई कि कहीं उसे 100 लोगों की हत्या का पाप न लग जाए। चिंता में डूबा राजा अपना राज्य छोड़कर जंगलों में भक्ति करने चला गया ताकि उसे इस पाप की क्षमा मिल सके। रास्ते में एक गाँव पड़ा।

राजा ने सभा भवन में बैठे लोगों से पूछा कि क्या गाँव में कोई ऐसा परिवार है जो भक्ति भाव रखता हो, ताकि वह उनके घर रात बिता सके।

चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गाँव में दो भाई-बहन रहते हैं जो बहुत पूजा-पाठ करते हैं। राजा उनके घर रात रुके।

जब राजा सुबह उठे तो लड़की पूजा के लिए बैठी थी। पहले लड़की की दिनचर्या यह थी कि वह पौ फटने से पहले ही पूजा से उठकर नाश्ता तैयार कर लेती थी।

लेकिन उस दिन लड़की पूजा में बहुत देर तक बैठी रही। जब लड़की उठी, तो उसके भाई ने कहा, बहन, तुम इतनी देर से उठी हो। हमारे घर एक मुसाफिर आया है और उसे नाश्ता करके बहुत दूर जाना है।

लड़की ने उत्तर दिया, भाई, ऊपर एक पेचीदा मामला था। धर्मराज को एक पेचीदा स्थिति पर निर्णय लेना था और मैं उस निर्णय को सुनने के लिए रुकी थी। इसलिए मैं बहुत देर तक ध्यान करती रही।

तो उसके भाई ने पूछा कि क्या बात है? तो लड़की ने बताया कि एक राज्य का राजा अंधे लोगों को खीर खिलाता था। लेकिन दूध में साँप के ज़हर डालने से 100 अंधे लोग मर गए। अब धर्मराज समझ नहीं पा रहे हैं कि अंधे लोगों की मृत्यु का पाप राजा पर हो, साँप पर या उस रसोइए पर जिसने दूध खुला छोड़ दिया।

राजा भी सुन रहा था। राजा को उससे जुड़ी कुछ बातें सुनकर दिलचस्पी हुई और उन्होंने लड़की से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ?

लड़की ने कहा कि अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। तो राजा ने पूछा, क्या मैं तुम्हारे घर एक रात और रुक सकता हूँ? दोनों भाई-बहन ने खुशी-खुशी हाँ कह दी।

राजा अगले दिन रुक गए, लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि जो व्यक्ति कल हमारे गाँव में एक रात रुकने आया था और भक्ति भाव से घर माँग रहा था, उसकी भक्ति का नाटक उजागर हो गया है।

वह रात बिताने के बाद इसलिए नहीं गया क्योंकि उस व्यक्ति की नीयत युवती को देखकर खराब हो गई थी। इसलिए अब वह उस सुंदर और युवती के घर ज़रूर रुकेगा, वरना वह युवती को लेकर भाग जाएगा।

सभा भवन में दिन भर राजा की आलोचना होती रही।

अगली सुबह युवती फिर ध्यान के लिए बैठी और नियमित समय पर उठी। तब राजा ने पूछा- "बेटी, अंधे लोगों की हत्या का पाप किसने लगाया था?"

तब लड़की बोली- "वह पाप हमारे गाँव की चौपाल में बैठे लोगों ने बाँटकर ले लिया।"

सारांश:~ दूसरों की आलोचना करने से कितना नुकसान होता है? आलोचक हमेशा दूसरों के पापों को अपने सिर पर ढोता है और दूसरों द्वारा किए गए उन पापों का फल भी भोगता है। इसलिए हमें हमेशा आलोचना करने से बचना चाहिए..!!

Monday, 18 August 2025

दीवारों पर लिखती हुई इन स्त्रियों ने बचा रखा है संसार

आज एक च‍ित्र देखा तो सोचा आपसे शेयर करूं। देख‍िए इस च‍ित्र को और इसमें रंग भरने वाली हमारी उस पीढ़ी को जो आज के बदलावों से बेखबर अपना कर्तव्य पूरा क‍िये जा रही है।  

इस पर एक कव‍िता भी है हालांक‍ि ये मेरी रचना नहीं है परंतु कहीं पढ़ी है, अच्छी लगी..  

सो-- आप भी पढ़‍िएगा--- 


गेरू से

भीत पर लिख देती है

बाँसबीट

हारिल सुग्गा

डोली कहार

कनिया वर

पान सुपारी

मछली पानी

साज सिंघोरा

पउती पेटारी


अँचरा में काढ़ लेती है

फुलवारी

राम सिया

सखी सलेहर

तोता मैना


तकिया पर

नमस्ते

चादर पर

पिया मिलन


परदे पर

खेत पथार

बाग बगइचा

चिरई चुनमुन

कुटिया पिसीआ

झुम्मर सोहर

बोनी कटनी

दऊनि ओसऊनि

हाथी घोड़ा

ऊँट बहेड़ा


गोबर से बनाती है

गौर गणेश

चान सुरुज

नाग नागिन

ओखरी मूसर

जांता चूल्हा

हर हरवाहा

बेढ़ी बखाड़ी


जब लिखती है स्त्री

गेरू या गोबर से

या

काढ़ रही होती है

बेलबूटे

वह

बचाती है प्रेम

बचाती है सपना

बचाती है गृहस्थी

बचाती है वन

बचाती है प्रकृति

बचाती है पृथ्वी


संस्कृतियों की

संवाहक हैं

रंग भरती स्त्रियाँ


लिखती स्त्री

बचाती है सपने

संस्कृति और प्रेम।


स्त्री के मनोभावों को बख़ूबी बयान करती ये सुंदर रचना ज‍िसने भी ल‍िखी है उसने पूरा यथार्थ उतार कर रख द‍िया। हमारी माताएं ऐसी ही थीं। जो शायद अब गुम हैं किसी फ्रेम में, किसी घर के कोने में शायद इन चीजों से मुक्त होती आज की स्त्री।दिखती हैं मॉल में, पार्क में, ऑफिस में और संघर्ष का रूप बदल गया।अब खुद के लिए आत्मनिर्भर होती स्त्री। ये परिवर्तन शायद ले गया सब। 

मगर ऐसी परंपराएं सदैव ही जीवित रहनी चाहिए, भूत वर्तमान और भविष्य सब-कुछ भीत पर उकेरकर स्त्रियां इन्हें बचाए रखती हैं।

आजकल सब शहर की तरफ भाग रहे वहीं रहना भी पसंद है उनको, ये सब चित्र टाइल्स और पत्थर लगी दीवारों में कैसे बनेंगे वो भी गोबर से अगर बन भी जाएं तो कोई बनाना बनवाना भी पसंद नहीं करता दीवार खराब लगेगी उसको, अपने गांव में सही था हरछठ व्रत में हमेशा बनती थी, धीमे ही सही लेकिन लोग अपनी संस्कृतियों को ही भूल रहे हैं।

मेरी सासु मां भी ऐसी ही माएं-देवता की आकृत‍ियां शाद‍ियों बनाती हैं , अब उन्होंने मेरी बेटी के पास एक कागज पर सारी आकृत‍ियां सुरक्ष‍ित उतरवा दी हैं ताक‍ि यह प्रथा उनके बाद भी जीव‍ित रहे। 

- Legend News 

Tuesday, 17 June 2025

मुस्‍लिम उपन्यासकार ख़ालिद जावेद ने क्यों कहा, हिंदू धर्म में लचीलापन है


 हिंदू धर्म के चरित्रों को आधार बनाकर साहित्य लेखन में समय समय पर विभिन्न प्रयोग किए जाते रहे हैं और अब भी हो रहे हैं लेकिन इस्लाम धर्म में ऐसी कोई परंपरा नहीं पाए जाने की वजह पूछे जाने पर उर्दू के जाने माने उपन्यासकार ख़ालिद जावेद कहते हैं कि इस्लाम धर्म में कहानी कहने के लिए ज़मीन ही नहीं है।

2014 में लिखे गए अपने उपन्यास ‘नेमतखाना’ (द पैराडाइज आफ फूड) के लिए हाल ही में वर्ष 2022 के प्रतिष्ठित जेसीबी पुरस्कार से सम्मानित ख़ालिद जावेद ने ‘भाषा’ को दिए विशेष साक्षात्कार में यह बात कही।
अमीश त्रिपाठी, देवदत्त पटनायक जैसे लेखकों द्वारा हिंदू महाकाव्य रामायण और महाभारत के चरित्रों को आधार बनाकर उपन्यासों की रचना की पृष्ठभूमि में ख़ालिद जावेद से जब यह सवाल किया गया कि इस प्रकार के प्रयोग इस्लाम धर्म के साथ क्यों नहीं किए गए तो उनका कहना था, ‘‘हिंदू धर्म, पूरा का पूरा धर्म होने के साथ ही जीवन शैली भी है। हिंदू धर्म आचार संहिता नहीं है बल्कि वह एक संस्कृति है। भारतीय दर्शन और उसके सभी छह स्कूल पूरी तत्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा की सांस्कृतिक मूल के साथ व्याख्या करते हैं। इसके चलते हिंदू धर्म में लचीलापन है। उसमें चीजों को ग्रहण करने की बहुत बड़ी शक्ति हमेशा से मौजूद रही है।’’ 
उन्होंने आगे कहा, ‘‘हिंदू धर्म उस तरह का धर्म नहीं है जो कानूनी एतबार से चले। इसके भीतर मानवीय मूल्य, सांस्कृतिक तत्वों के साथ मिलकर सामने आते हैं। ऐसी जगह पर कहानी कहने के लिए ज़मीन पहले से मौजूद होती है। ’’ 
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रोफेसर ख़ालिद जावेद कहते हैं, ‘‘इस्लाम में आचार संहिता बहुत ज्यादा है । कुछ नियम बनाए गए हैं । सांस्कृतिक तत्व बहुत कम नजर आते हैं। इस्लाम में मेले ठेले, अगर ईद को छोड़ दें तो सांस्कृतिक परिदृश्य बहुत कम नजर आएगा। एक खास तरह से कुछ नियमों के ऊपर आपको चलना है।’’
वह कहते हैं, ‘‘इस्लाम के अपने खास नियम हैं। उन्हें तोड़ना बहुत मुश्किल है। वहां कहानी कहने के लिए जमीन ही नहीं है। उसके चरित्र ही इस तरह के नहीं हैं जिसके भीतर एक किरदार बनने की संभावनाएं पाई जाती हों। इस्लाम के चरित्र इतने ठोस हैं कि उनमें इस तरह का कहानी का चरित्र बनने के लिए, कल्पनाशीलता के लिए गुंजाइश बहुत कम है।’’
‘एक खंजर पानी में’,‘आखिरी दावत’, ‘मौत की किताब’, और ‘नेमतखाना’ के लेखक ख़ालिद जावेद विभिन्न पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं और न केवल भारत बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में बड़े चाव से पढ़े जाते हैं ।
सोशल मीडिया के जमाने में साहित्य पर मंडराते खतरों के संबंध में ख़ालिद जावेद ने कहा, ‘‘लॉकडाउन में साहित्यिक वेबसाइटों में इजाफा हुआ, सब कुछ ऑनलाइन था तो साहित्य भी। लेकिन प्रिंट मीडिया की दीर्घकालिक संदीजगी ज्यादा होती है। ऑनलाइन में तथाकथित स्वतंत्रता के चलते गुणवत्ता प्रभावित होती है। ’’
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘अदब (साहित्य) का गंभीर सौंदर्य शास्त्र होता है। आज के पाठक को अगर कोई लेखक या रचना समझ नहीं आती है तो इसकी वजह ये है कि पाठक की ग्रूमिंग ठीक से नहीं हो रही है। आवामी अदब (लोकप्रिय साहित्य), संजीदा अदब (गंभीर साहित्य) से अलग है। हमारे ज़माने में अदब का काम किसी पाठक की तरबीयत (प्रशिक्षण) करना था। ठीक है, आज पाठक अगर गुलशन नंदा पढ़ रहा है तो धीरे धीरे उसकी ऐसी ट्रेनिंग होती थी कि इन्हीं पाठकों ने आगे चलकर कुर्रतुल एन हैदर को पढ़ा, मंटो को पढ़ा, बेदी को पढ़ा, यशपाल को पढ़ा, मुक्तिबोध और निर्मल वर्मा को पढ़ा। अब ये प्रशिक्षण खत्म हो गया है। लोकप्रिय चीजें अंतरदृष्टि पैदा नहीं करती हैं, तात्कालिक खुशी देती हैं। गंभीर साहित्य आपको अंतरदृष्टि प्रदान करता है।’’
ख़ालिद जावेद ने आगे कहा, ‘‘इसीलिए गंभीर साहित्य को सबसे बड़ा खतरा पत्रकारिय लेखन से है। अदब के नाम पर, साहित्य के नाम पर रिपोर्टिंग कर दी जाती है, और फिर उस रिपोर्टिंग को उपन्यास बना दिया जाता है। सामाजिक यथार्थ को ठीक वैसे का वैसा ही पेश कर दिया जाता है। साहित्य की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक चिंताएं होती हैं लेकिन इन्हें प्लेट में रखकर अखबार वालों की तरह पेश नहीं किया जाता। इसी से असल साहित्य को लगातार खतरा बना हुआ है। ये पिछले बीस पच्चीस साल से हो रहा है। उर्दू साहित्य का सूरते हाल भी यही है।”
उर्दू साहित्य में गंभीर लेखन संबंधी एक सवाल पर वह कहते हैं, ‘‘प्रेमचंद हिंदी और उर्दू अदब के बाबा आदम हैं। इसी ज़बान में मंटो हैं, किसी और ज़बान ने कोई दूसरा मंटो पैदा नहीं किया। राजेन्द्र बेदी हैं, कृष्ण चंदर हैं, इंतजार हुसैन हैं। ये उर्दू साहित्य की एक पूरी समृद्ध विरासत है। लेकिन आज पूरे साहित्यिक परिदृश्य पर बुरा वक्त है। उर्दू साहित्य भी उससे अछूता नहीं है। ऐसा लिखा जा रहा है जो बहुत जल्दी से समझ में आ जाए। जो बहुत जल्द समझ में आ जाए, उसे इंसान को शक की नजर से देखना चाहिए।’’
अपने लेखन में इंसान की अस्तित्ववादी उलझनों से अधिक सरोकार रखने वाले जावेद अपने नए उपन्यास के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं,‘‘अभी तो किसी विषय ने मुझे नहीं चुना है। एक उपन्यास अभी खत्म किया है, बड़ा उपन्यास है। साढ़े चार सौ पन्नों का- उसका शीर्षक है ‘अर्थलान और बैजाद’। यह स्वप्न, भ्रम, वास्तविकता के बीच की सरहदों को तोड़ता है। इतिहास, तारीख से बहस करता है। तारीख जो ख्वाब देखकर भूल गई है, ये उन सपनों तक पहुंचने की कोशिश है।’’
Compiled: Legend News

Monday, 2 June 2025

है जन्मभूमि पर खड़ा हुआ ध्वजदण्ड अभय, स्वर्णाभ शिखर पर सूर्य उतर कर आया है...


 

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक और दार्शनिक हैंवे अपने विचारों और लेखन के माध्यम से लोगों को प्रेरित करते हैं , आज उनकी एक कव‍िता तब प्रस्फुट‍ित हुई जब अयोध्या नगरी भगवान श्री राम के भव्य मंद‍िर को स्वर्ण श‍िखरों से सजा हुआ देख रही थी, इस पल साक्षी बन रही थी। 

आप भी पढ़‍िए इस कव‍िता को----- 

 

मण्डित शिखरों की सुस्मित स्वर्ण-रश्मियों में 

खण्डित  विश्वासों के पल-छिन मुस्काते हैं।

इतिहास उमड़ता आता है स्मृति के पथ पर

संघर्षों के नायक मन पर छा जाते हैं।

सरयू की लहरें साक्षी हैं उस गाथा की

जो लिखी गयी पर अब तक गायी नहीं गयी।

पायी है ऐसी विजय अयोध्या ने अपूर्व 

जो कहीं विश्व में अब तक पायी नहीं गयी।

धरती के अन्तस्तल में कहीं दबे हैं जो

वे खण्ड-खण्ड पाषाण आज फिर बोले हैं

जो म्लेच्छ-धूलि से मुँदे हुए थे इतने दिन

वे नयन दिशाओं ने प्रमुदित हो खोले हैं। 

है जन्मभूमि पर खड़ा हुआ ध्वजदण्ड अभय

स्वर्णाभ शिखर पर सूर्य उतर कर आया है।

अभिषेक धर्मविग्रह का करने को अकुण्ठ

तपसी पीढ़ी ने सञ्चित पुण्य लुटाया है।

सरयू के तट पर शोभित पुरी अष्टचक्रा

युग-युग से अपराजिता कहाती आयी है। 

उस सत्या को उसकी मर्यादा आज पुनः

प्रभु मर्यादापरुषोत्तम ने लौटाई है। 

वसुधा को माना है कुटुम्ब जिस संस्कृति ने

जो सत्यमेव जयते का गान सुनाती है।

देखे दुनिया उस भारत भू की सिद्धि, स्वतः

किस भाँति लौट उसके चरणों में आती है।

ये अम्बर तक अम्लान सौध शिखरों पर जो

कञ्चन की कान्ति चमत्कृत करती छाई है।

यह नहीं मात्र सोना, रविकुल के आँगन में

उतरी मानवता की स्वर्णिम परछाई है।

जो लिखते आये हैं इतिहास, कहो उनसे

जो पढ़ते हैं भूगोल उन्हें भी बतलाओ।

भारत का गौरव, इसकी महिमा का प्रमाण

प्रत्यक्ष अयोध्या की मिट्टी से ले जाओ।

यह पुनर्नवा संस्कृति का केन्द्र, सदानीरा

आस्थाओं के अविरल प्रवाह का तट पावन।

श्रीराम यहाँ मानवता के प्रतिमान अमर

नारीत्व विमल, जानकी-चरित है मनभावन।

जिनका वेदात्मक चरित आदिकवि वाल्मीकि

रामायण रचकर धरती पर ले आते हैं। 

मण्डित शिखरों की सुस्मित स्वर्ण-रश्मियों में 

उन रामभद्र के गुण-गण शोभा पाते हैं।

देखें वे जिनको दृष्टि मिली है ईश्वर से

वे सुनें कि जिनको सुनने की अभिलाषा है।

यह है हिन्दूजन का अभेद्य संकल्प फलित

यह भारत भू की चिरसंचित अभिलाषा है। 

आँधियाँ समय की आती हैं, देखीं हमने

विप्लव भी हमने सहे, कपट-छल देखा है।

हम जूझे हैं अपनी भी दुर्बलताओं से

हमने प्रतिपक्षी दल का भी बल देखा है।

पर रहा सदा विश्वास हमारा अचल कि हम

बस सत्यमेव जयते को जीते आये हैं।

जब मथा समुद्र अमृत की इच्छा से हमने 

शिव होकर तब हम विष भी पीते आये हैं।

है अमृत छलकता ही धरती के आँचल में

हम धरती की सन्तान हमें घबराना क्या।

है लुटा दिया सर्वस्व विश्व के हित हमने

तो फिर अपने हित हमको खोना-पाना क्या।

फिर बसती हुई अयोध्या का सच, रामायण 

में वाल्मीकि की लिखी हुई वह वाणी है।

जो शताब्दियों के पार महाकवि तुलसी की

चौपाई बनकर उमड़ी ध्वनि कल्याणी है।


- आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

Monday, 26 May 2025

एंटोन चेखव द्वारा ल‍िखी गई एक कहानी आज भी याद है...आप भी पढ़ें


 एंटोन चेखव द्वारा ल‍िखी गई एक कहानी आज भी याद है। वे अपनी एक कहानी में लिखते हैं:


बस स्टॉप पर, एक बूढ़ा आदमी और एक युवा गर्भवती महिला साथ-साथ इंतज़ार कर रहे थे।

वह आदमी उत्सुकता से महिला के गोल पेट को घूरता रहा। फिर उसने धीरे से पूछने की हिम्मत की:

— तुम्हारे कितने महीने हो गए? 

युवती कहीं और, विचारों में खोई हुई लग रही थी। उसके थके हुए चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी। पहले तो उसने जवाब नहीं दिया। फिर, कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद, वह बुदबुदाई:

— तेईस सप्ताह…

— क्या यह तुम्हारा पहला बच्चा है? उसने पूछा।

— हाँ, उसने जवाब दिया, उसकी आवाज़ मुश्किल से सुनाई दे रही थी।

— डरो मत, उसने कहा। सब ठीक हो जाएगा, तुम देख लेना।

उसने अपने पेट पर हाथ रखा, सीधे सामने देखा, उसकी आँखें चमक रही थीं, आँसू रोक रही थीं।

— मुझे उम्मीद है... उसने जवाब दिया।

बूढ़े आदमी ने आगे कहा:

— कभी-कभी हम खुद को उन चिंताओं से अभिभूत होने देते हैं, जो वास्तव में, इसके लायक नहीं हैं...

— शायद..., उसने दुखी होकर फुसफुसाया।

उसने उसे और करीब से देखा, और अधिक करुणा के साथ।

— तुम मुश्किल समय से गुज़र रही हो। तुम्हारा पति... क्या वह तुम्हारे साथ नहीं है?

— उसने मुझे चार महीने पहले छोड़ दिया।

— क्यों?!

— यह प्रश्न जटिल है...

— और तुम्हारे प्रियजन? तुम्हारा परिवार, दोस्त? तुम्हारा साथ देने वाला कोई नहीं?

उसने गहरी साँस ली।

— मैं अपने पिता के साथ अकेली रहती हूँ... वह बीमार हैं।

एक लंबी खामोशी। फिर बूढ़े आदमी ने पूछा:

— क्या वह अब भी तुम्हारे लिए वही मजबूत स्तंभ है जैसा तुम बचपन में जानती थी?

युवती के गालों पर आँसू बह निकले।

— हाँ... अब भी।

— बीमार हालत में भी? उन्हें हुआ क्या है?

— उन्हें अब याद नहीं कि मैं कौन हूँ...

उसने ये शब्द बस के आते ही कहे।

वह खड़ी हुई, कुछ कदम चली... फिर कुछ सोचती हुई, बूढ़े आदमी के पास वापस आई, धीरे से उसका हाथ थामा, और प्यार से कहा: चलो, पापा।

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