Monday, 23 May 2022

जयंती विशेष: साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त अन्नाराम सुदामा, पढ़िए उनकी कहानी- ''सूझती दीठ''


 राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार अन्नाराम सुदामा का जन्म 23 मई 1923 में हुआ था। सुदामा ने राजस्थानी भाषा में साहित्य की कई विधाओं में रचनांए की हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध, नाटक, यात्रा स्मरण एवं बाल साहित्य लिखा है। उन्होंने अन्य कई विधाओं में 25 से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं।

सुदामा जी का साहित्य अन्नाराम सुदामा समग्र के नाम से सात खण्डों में प्रकाशित किया गया था। सुदामा जी की साहित्यिक रचनांए विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। इनकी सबसे प्रमुख रचना का नाम है ‘मेवे का रूंख’ जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
रूणिया बड़ा बांस में इस बालक के जन्म के समय अच्छा जमाना हुआ तो अकाल से पीड़ित अन्न की किल्लत भुगत रहे परिजनों ने नाम अन्नाराम रख दिया। स्कूल में गुरूजन की सुदामा के नाम की उपमा से बाद नाम के पीछे सुदामा जुड़ गया। राजस्थानी में लोक विधा के विजयदान देथा के दौर के सुदामा ने मौलिक लेखन के साथ राजस्थानी को ऊंचाई दी। साहित्यकार डॉ. मदन सैनी ने सुदामा के साहित्य पर डाक्टरेट भी करवाई है।

सुदमा जी ने कई रचनाएं की हैं जिसमें मैकती कायाः मुलकती धरती, आंधी अर आस्था, डंकीजता मानवी, घर-संसार, अचूक इलाज, आंधे नै आंख्यां, अचूक इलाज, गॉंव रो गौरव, बंधती अंवलाई, दूर-दिसावर, पिरोल में कुत्ती ब्याई, व्यथा-कथा अर दूजी कवितावां इत्यादि। सुदामा जी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था जिसमें- केन्द्रीय साहित्य अकादमी दिल्ली में पुरस्कृत, मीरा पुरस्कार, सूर्यमल्ल मीसण, राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, टैसीटोरी गद्य पुरस्कार इत्यादि। अन्नाराम सुदामा का निधन 2 जनवरी 2004 में हुआ था।

राजस्थानी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में जिन महान रचनाकारों का योगदान है, उनमें अन्नाराम सुदामा का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। राजस्थान के ग्रामीण जनजीवन में नित्य होने वाली घटनाओं को वे अत्यंत पारखी नजर से देखते हुए गहरी सामाजिक चेतना से सराबोर रचनाएं लिखते थे और यही उनके लेखन की विशेषता थी।

राजस्थान के ग्राम्य जीवन की संवेदना, मानवीय सरोकार और विविध छवियां आप अन्नाराम सुदामा के साहित्य से गुजरे बिना देख ही नहीं सकते। वे राजस्थानी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिनके यहां अभावों में जीते मनुष्य की चेतना और विपरीत हालात से संघर्ष इतनी शिद्दत के साथ मौजूद होते हैं कि स्वयं पाठक भी एकबारगी लेखक और उसके अद्भुत जीवट वाले पात्रों के साथ खड़ा हो जाता है। 
अन्नाराम सुदामा के विपुल साहित्य में ‘सूझती दीठ, एक ऐसी कहानी है, जो अकाल से ग्रस्त एक सामान्य निर्धन ग्रामीण स्त्री के संघर्ष के बीच उसकी वैज्ञानिक दृष्टि को ही नहीं उसके नैतिक बल और साहस को बहुत गहराई के साथ रेखांकित करती है। पढ़े-लिखे पात्रों के माध्यम से चेतना जगाना आसान होता है, लेकिन सुदामा तो अपने निरक्षर पात्रों से ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समता-बंधुत्व की बात अत्यंत सहज रूप से पैदा कर देते हैं। इस एक कहानी से आप उनकी रचनात्मकता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।

सूझती दीठ-अन्नाराम सुदामा की कहानी

इस एक कहानी से आप उनकी रचनात्मकता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।
तुलसी को गांव छोड़कर कस्बे में आए तीनेक महीने हुए हैं। लगातार पड़ते अकाल के इस तीसरे साल वह यहां आई है। दो साल तो उसने जैसे-तैसे काट दिये, घर तो वो फिर भी चला लेती लेकिन गाय-बछड़ों का क्या करे। तीन जानवरों के लिए रोज पचास-साठ रुपये का बीस-बाइस किलो चारा कहां से आए। चरागाह से लेकर खेत तक सब सफाचट मैदान हुए पड़े हैं। गांव में जब कोई आस नहीं दिखी तो तुलसी अपनी बूढ़ी सास, पांच साल के लड़के और आठ साल की लड़की वाले परिवार को लेकर इस कस्बे में चली आई।
गांव की एक नाइन के परिचय से उसे एक मोहल्ले में एक सेठ का छह सौ गज का बाड़ा बीस रुपये महीने में किराये पर मिल गया। सेठ ने इस शर्त पर बाड़ा दिया था कि कहने पर एक-दो दिनों में ही खाली करना होगा। तुलसी ने शर्त मान ली और नाइन ने जिम्मेदारी ले ली। बाड़ा क्या था, बाहर एक पक्का अहाता, भीतर एक कमरा और बाकी खुली जगह। इस बाड़े में कभी जलावन की लकड़ियां और चारा होता था, लेकिन सालों से देखभाल के अभाव में पूरा बाड़ा उजाड़ पड़ा था, जिसमें मकड़ी और चमगादड़ों का डेरा था। तुलसी ने बेटे-बेटी के साथ मिलकर इस जगह को रहने लायक बनाया। कमरे के आधे हिस्से में चार बोरी चारा और आधे में रहने का ठीया बनाया। बाहर के अहाते में चौका-चूल्हा जमाया और खुले में गाय और बछड़ा-बछड़ी। रोज दोनों वक्त आठ किलो दूध होता, जिसमें थोड़ा बचाकर बाकी तुलसी बेच देती। दिन में मां-बेटी पापड़ बेल कर पांच छह रुपये कमा लेती। इस तरह घर की गाड़ी चलने लगी।
एकाध बार सेठानी ने तुलसी को घर में बुलाया और दाल-दलिया पिसवाने-बीनने का काम कराया। काम के बाद सेठानी ने उसे मजदूरी के बदले बच्चों के लिए दो कटोरी सब्जी देनी चाही तो तुलसी साफ मना कर गई। तुलसी ने कहा कि घर में प्याज-पोदीने की चटनी और पालक की सब्जी रखी है। सेठानी ने पूछा कि तुलसी ब्राह्मण होकर प्याज खाती है तो जवाब में वह कहती है कि इंसान के लिए तो चोरी, छल-कपट और चुगली जैसे अवगुण भी मना है लेकिन कौन मानता है। इस महंगाई के दौर में गरीब आदमी क्यों सब्जी खाये, प्याज की गांठ सामने हो तो रोटी सहज ही गले से नीचे उतर जाती है। तुलसी के जवाब के आगे सेठानी निरुत्तर हो गई। तुलसी वापस आ गई।
तुलसी के बाड़े के पास एक सरकारी जमीन पर पोकरण की तरफ से आए मजदूरों ने अस्थायी बसेरा बना रखा है। ये भी तुलसी की तरह ही अकाल का भारी वक्त काटने आए हैं। यहां कई बीमार बूढ़े रात-दिन खांसते रहते हैं। बच्चे दिन में आसपास से कचरा, लकड़ी, कागज आदि बीनते हैं, जिनसे कुछ आमदनी भी हो जाती है और शाम के वक्त खाना पकाने के लिए जलावन भी। जवान आदमी-औरतें सड़क के किनारे रेत डालने के काम में मजूरी करते हैं।
एक दिन सुबह-सुबह पांच-सात औरतें तुलसी के दरवाजे पर आ पहुंची। इनमें से एक ने दो दिन पहले तुलसी से मिलकर बच्चों के लिए दूध देने की विनती की थी कि वे रोज नकद पैसे देंगी, बस बदले में अच्छा दूध मिल जाए। तुलसी ने हामी भर दी। अब ये मजदूर महिलाएं तुलसी की नई ग्राहक बन गईं थीं।
एक रोज सूरज उगने से पहले ही सेठ का एक नौकर आया और कहा कि आज सेठ ने सारा दूध मंगाया है। सेठ के घर इतने दूध की क्या जरूरत, पता चला कि आज सेठ के पिताजी का श्राद्ध है, जिसके लिए गाय के शुद्ध दूध से हवेली के चारों तरफ लकीर निकाली जाएगी। तुलसी ने सोचा, चार किलो दूध रेत में बहा दिया जाएगा, इसका मतलब रोगियों का आधार, निरोगियों का बल और देश की संपत्ति आखिर वह क्यों बेचे, उसने नौकर से कह दिया कि जाकर सेठ से कह दो कि आज कहीं ओर से दूध का इंतजाम कर लें, मैं नहीं दे सकूंगी।
नौकर के बाद खुद सेठ चला आया। सेठ ने कहा कि दूध तो कहीं भी मिल जाएगा लेकिन ज्यादा तो मिलावट वाला मिलता है और तुमने नौकर से ना कह दी। उसने सेठ से कहाकि सच्ची बात तो यह है कि मैं रेत में बिखराने के लिए दूध नहीं बेचती। सेठ ने कहाकि वो चाहे धूल में मिलाए या कुछ भी करे उसे तो पैसों से मतलब होना चाहिए, वह ज्यादा पैसे दे सकता है। लेकिन तुलसी नहीं मानी तो नहीं ही मानी। इस पर सेठ को गुस्सा आ गया और उसने कह दिया कि आज की आज बाड़ा खाली हो जाना चाहिए। तुलसी ने कह दिया कि वह इस सुविधा की खातिर अपनी समझ पर पर्दा नहीं गिरने देगी। उदासी की हल्की रेखा चेहरे पर तैर गई। सेठ भांप गया और आज ही बाड़ा खाली करने की कहकर चला गया।
सेठ घर गया तो सेठानी को सारी बात बताई तो सेठानी ने कहा कोई बात नहीं, दूध तो कहीं से भी ले आएंगे। सेठ ने बताया कि उसने तुलसी को आज ही बाड़ा खाली करने के लिए कह दिया है। सेठानी ने कहाकि वह तो बाड़े की देखभाल ठीक कर रही है और कभी-कभार बिना किसी लोभ के वह आकर मेरा कुछ काम भी कर देती है। अलग किस्म की औरत है वह। हमें उससे क्यों बराबरी करनी चाहिए। सेठ ने कहा, अगर तुम ऐसा सोचती हो तो ठीक है, अगर शाम तक तुलसी आती है तो तुम ही उसे रहने के लिए कह देना, मैं तो अपने मुंह से नहीं कहूंगा।
दो दिन से तुलसी की सास का दमा का रोग जोर मार रहा था और लड़के को भी मलेरिया बुखार हो रखा था। लेकिन तुलसी को तो इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि इतनी जल्दी जगह का इंतजाम कैसे होगा, उसने कोशिश करने की सोची और कुछ खा-पीकर जगह ढूंढने निकल पड़ी। उसने ठान लिया था कि सेठ के आगे जाकर हाथ नहीं फैलाएगी, किसी साधारण गुवाड़ी में उसके स्वभाव को देखते हुए जगह मिल ही जाएगी। और आखिर ढूंढ़ने पर उसे एक अकेली मालिन के पास कामचलाउ जगह मिल ही गई। उसे अपना सामान ढोने और लगाने में बहुत असुविधा तो हुई, लेकिन मां-बेटी लगी रही और दो बजे तक भूखे पेट बिना पानी पिये काम करती रही। ढाई बजे वह सेठ के यहां जा पहुंची।
सेठ अपनी गद्दी पर बैठा पान खा रहा था, देखते ही बोला, तेरे दूध नहीं देने से मेरा काम थोड़े ही रुका, पैसों के बदले दूध की कोई कमी थोड़े ही है।
तुलसी ने कहा, आप पर लक्ष्मी की कृपा है आप चार किलो क्या चार मण दूध से लकीर खींचो। लेकिन मेरी मान्यता है कि यही दूध अगर धूल में ना गिराकर भूखी-प्यासी जनता को पिलाते तो उसमें प्राणों का संचार होता, आपको आशीष मिलती और आपके पिता की आत्मा को कहीं ज्यादा खुशी मिलती।
सेठ ने कहा कि इन बातों को छोड़ और एक बार घर जाकर सेठानी से मिल ले। तुलसी ने कहा कि उनसे तो मिलती रहूंगी, लेकिन पहले आप यह चाबी सम्हालो। सेठ ने कहा, चाबी, बाड़ा खाली कर दिया क्या। हां, कहकर तुलसी चुपचाप चल दी। सेठ जाती हुई तुलसी की पीठ ऐसे देखता रहा, जैसे किसी अफीमची का नशा उतर गया हो।
कहानी अंश
समझदार तो कार्तिक लगते ही अपना-अपना पशुधन लेकर शहर के पास जा पहुंचे और नासमझ में से ज्यादातर के जानवर दो बरस में ही भूख की मार से रेत खा-खाकर सिधार गए। तुलसी ने देख लिया, अब यहां किसी हालत में गुजारा नहीं होगा, जल्दी से जल्दी किसी कस्बे की तरफ कूच करने में ही भलाई है। वहां पशुओं का भी पेट पाल लूंगी और परिवार का भी। परिवार में पांच बरस का एक लड़का, एक आठ साल की लड़की और दमे की रोगी एक बूढ़ी सास। देहरी को सीस नवा कर वह एक कस्बे की तरफ चल दी।
....................
वो आधा मिनट सोचने लगी, लकीर खींची जाएगी, थोड़ी दूर में नहीं, हवेली के चारों तरफ, वो भी पानी से नहीं दूध से। मतलब चार किलो दूध रेत में बिखेरा दिया जाएगा, किसके काम आएगा वो दूध, वो तो रोगियों का आधार है और निरोगियों का बल। देश की संपत्ति को इस तरह धूल में डालने के लिए बेचूं तो मेरी समझ ही खराब है।
सहसा उसकी आंखों के आगे उसके पास रहने वाले बीमार बच्चे, बुझते हुए और चाय के लिए तरसते बुजुर्ग औरत-आदमी, हारे थके मजूर नाच उठे। उसने कहा, ‘भाई, सेठजी को मेरी तरफ से हाथ जोड़कर कह देना कि दूध का इंतजाम कहीं ओर से कर लें, मैं नहीं दे सकूंगी।

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह

Sunday, 15 May 2022

‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’: ‘ठुमरी’ के पर्याय थे वाज‍िद अली

 


 संगीत की विधा ‘ठुमरी’ के जन्मदाता के रूप में जाने जाने वाले अवध के नवाब वाज‍िद अली शाह ने ठुमरी के साथ एक और प्रयोग क‍िया, इस प्रयोग में ठुमरी को कत्थक नृत्य के साथ गाया जाता था। इन्होंने कई बेहतरीन ठुमरियां रचीं। कहा जाता है कि जब अंग्रेजों ने अवध पर कब्जा कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को देश निकाला दे दिया, तब उन्होंने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय’ यह प्रसिद्ध ठुमरी गाते हुए अपनी रियासत से अलविदा कहा।

अवध में संगीत, विशेषकर ठुमरी की समृद्धि के लिए बड़े पैमाने पर काम हुआ। वाजिद अली शाह ने स्वयं कई ठुमरियां कम्पोज़ कीं, जिनमें से बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए… मील का पत्थर साबित हुई।

ठुमरी की उत्पत्ति लखनऊ के नवाब वाज़िद अली शाह के दरबार से मानी जाती है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने इसे मात्र प्रश्रय दिया और उनके दरबार में ठुमरी गायन नई ऊँचाइयों तक पहुँचा क्योंकि वे खुद 'अख्तर पिया' के नाम से ठुमरियों की रचना करते और गाते थे। हालाँकि इसे मूलतः ब्रज शैली की रचना माना जाता है और इसकी अदाकारी के आधार पर पुनः पूरबी अंग की ठुमरी और पंजाबी अंग की ठुमरी में बाँटा जाता है पूरबी अंग की ठुमरी के भी दो रूप लखनऊ और बनारस की ठुमरी के रूप में प्रचलित हैं। ठुमरी की बंदिश छोटी होती है और श्रृंगार रस प्रधान होती है। भक्ति भाव से अनुस्यूत ठुमरियों में भी बहुधा राधा-कृष्ण के प्रेमाख्यान से विषय उठाये जाते हैं। ठुमरी में प्रयुक्त होने वाले राग भी चपल प्रवृत्ति के होते हैं जैसे: खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, तिलंग, पीलू, काफी, झिंझोटी, जोगिया इत्यादि।

शास्त्रीय नृत्‍य कथक का वाजिद अली शाह के दरबार में विशेष विकास हुआ। गुलाबों सिताबों नामक विशिष्ट कठपुतली शैली जो कि वाजिद अली शाह के जीवनी पर आधारित है, का विकास प्रमुख आंगिक दृश्य कला रूप में हुआ।

परफॉर्मिंग आर्ट्स की तरह, वाजिद अली शाह ने भी अपनी अदालत में साहित्य और कई कवियों और लेखकों को संरक्षित किया। उनमें से उल्लेखनीय ‘बराक’, ‘अहमद मिर्जा सबीर’, ‘मुफ्ती मुंशी’ और ‘आमिर अहमद अमीर’ थे, जिन्होंने वाजिद अली शाह, इरशाद-हम-सुल्तान और हिदायत-हम-सुल्तान के आदेशों पर किताबें लिखीं।

ठुमरी के साथ-साथ उन्होंने कथक को लोकप्रियता के शिखर तक ले जाने में अहम भूमिका अदा की। नवाब वाजिद अली शाह की लिखी पुस्तक बानी में 36 प्रकार के रहस वर्णित हैं। ये सभी कथक शैली में व्यवस्थित हैं और इन सभी प्रकारों का अपना एक नाम है, जैसे घूंघट, सलामी, मुजरा, मोरछत्र, मोरपंखी आदि। इनके साथ-साथ इस पुस्तक में रहस विशेष में पहनी जाने वाली पोषाकों, आभूषणों और मंचसज्जा का विस्तृत वर्णन है।

अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कुशल शासक के बजाय उन्हें कला, संगीत प्रेम, विलासिता और रंगीन मिजाज़ के लिए इतिहास में जाना जाता है लेकिन आज हम उनके योगदान का विस्तृत रूप में जानने की कोशिश करते हैं। दरअसल 9 साल तक अवध के शासक रहे वाजिद अली शाह को विरासत में एक कमज़ोर राज्य मिला। उनके पहले के नवाब अंग्रेज़ों से प्लासी और बक्सर में भिड़ चुके थे और उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। अवध को इसके चलते अंग्रेज़ों को भारी जुर्माना देते रहना पड़ता था।

ललित कलाओं के क्षेत्र में वाजिद अली शाह ने अपना विशेष योगदान दिया, जो आज तक उन्हें प्रसिद्ध बनाता है। उन्हें एक दयालु, उदार, करुणामय और एक अच्छे शासक के रूप में जाना जाता है, जो राज्य के कार्यों में ज्यादा रुचि रखते थे।

वाजिद अली शाह के शासन के अन्तर्गत अवध एक समृद्ध और धनी राज्य था। प्रशासन में सुधार लाने और न्याय एवं सैन्य मामलों की देख रेख के अलावा, वाजिद अली शाह एक कवि, नाटककार, संगीतकार और नर्तक भी थे, जिनके भव्य संरक्षण के तहत ललित कलाएं विकसित हुई थीं।

वाजिद अली शाह ने केसरबाग बारादरी महल परिसर का निर्माण करवाया। इसमें नृत्य-नाटक, रास, जोगियाजश्न और कथक नृत्य की सजीवता झलकती थी, जिसने लखनऊ को एक आकर्षक सांस्कृतिक केंद्र बनाया।

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह

Tuesday, 3 May 2022

परशुराम जयंती: वे पीयें शीत तुम आतम घाम पियो रे....


 आज भगवान परशुराम की जयंती जोर शोर से मनाई जा रही है। जातिवादी व्‍यवस्‍था में घिरे समाज में आज भगवान परशुराम को ब्राह्मणों ने अपना आराध्‍य माना हुआ है। एक पक्ष के तौर पर देखा जाये तो यह ठीक लग सकता है परंतु समग्रता में भगवान परशुराम न तो ब्राह्मणों के हितैषी थे और ना ही क्षत्रियों के विरोधी। वो तो आतताइयों के विरोधी थे और निर्बलों के रक्षक। 

मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मात्र मूर्ति की आराधना करके भगवान परशुराम के वास्‍तविक धर्म को नहीं जाना जा सकता। परशुराम धर्म भारत की जनता का धर्म है परशुराम भारत की जागरूक जनता के प्रतीक थे। 

अब देखिए न कि राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने तो  इसी ''परशुराम धर्म'' पर ही ''परशुराम की प्रतीक्षा'' लिख दी, उनकी इस काव्‍यकृति से मैं ही क्‍या कोई भी आतताइयों को ललकार सकता है। आज जबकि सभी अपने-अपने स्वार्थ भाव के पोषण में लगे हैं तब आवश्यकता है एक ऐसे धर्म की जो सर्वजन हितकारी हो और लोगों के लिए हो। परशुराम धर्म वह धर्म है जो पौरुषमयी चेतना का वाहक है, अर्थात्  अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आज के युग का एकमात्र धर्म यही है।

परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, और समय की मांग भी यही है। यह समय की आवाज को न सुनना वालों के लिए यह उनके बहरेपनन की गवाही भी है और कायरता एवं नपुंसकता का स्वीकार्य भी।

राष्‍ट्रकवि  दिनकर के अनुसार इतने गूढ़ संदेशों को धारण करने वाला भगवान परशुराम का धर्म ही परशुराम धर्म कहलाया तथा इस धर्म के निर्वाहक के लिए 8 आवश्यक तत्व हैं पहला- स्वतंत्रता की कामना, दूसरा -वीर भाव , तीसरा- जागृति,चौथा- निवृत्ति मूल्क मार्ग का परित्याग,पांचवां- वर्ग वैमनस्य का विरोध,छठवां- भविष्य के प्रति सतर्क तथा आस्था मूल्क दृष्टि,सातवां - परशुराम धर्म की महत्ता और औचित्य जीवन और आठवां तत्‍व है- जीवन मानकर सिर ऊंचा कर जीवित करना।

 आज अधिक न लिखते हुए मेरे साथ आप भी पढ़िये परशुराम की प्रतीक्षा के ये अंश जो कालजयी है...आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि अपने रचनाकाल में थे।  

तीन खंडों में लिखी गई इस कविता -''परशुराम की प्रतीक्षा'' का (शक्ति और कर्तव्य) कुछ भाग मुझे यहां उद्धृत करना अधिक प्रिय लगा- आप भी पढ़ें। 


वीरता जहां पर नहीं‚ पुण्य का क्षय है‚

वीरता जहां पर नहीं‚ स्वार्थ की जय है।


तलवार पुण्य की सखी‚ धर्मपालक है‚

लालच पर अंकुश कठिन‚ लोभ–सालक है।

असि छोड़‚ भीरु बन जहां धर्म सोता है‚

पातक प्रचंडतम वहीं प्रगट होता है।


तलवारें सोतीं जहां बंद म्यानों में‚

किस्मतें वहां सड़ती हैं तहखानों में।

बलिवेदी पर बालियें–नथें चढ़ती हैं‚

सोने की ईंटें‚ मगर‚ नहीं कढ़ती हैं।


पूछो कुबेर से कब सुवर्ण वे देंगे?

यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे?

तूफान उठेगा‚ प्रलय बाण छूटेगा‚

है जहां स्वर्ण‚ बम वहीं‚ स्यात्‚ फूटेगा।


जो करें‚ किंतु‚ कंचन यह नहीं बचेगा‚

शायद‚ सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।

हम पर अपने पापों का बोझ न डालें‚

कह दो सब से‚ अपना दायित्व संभालें।


कह दो प्रपंचकारी‚ कपटी‚ जाली से‚

आलसी‚ अकर्मठ‚ काहिल‚ हड़ताली से‚

सी लें जबान‚ चुपचाप काम पर जायें‚

हम यहां रक्त‚ वे घर पर स्वेद बहायें।


हम दे दें उस को विजय‚ हमें तुम बल दो‚

दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।

हों खड़े लोग कटिबद्ध वहां यदि घर में‚

है कौन हमें जीते जो यहां समर में?

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गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?

शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?


उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,

तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;

सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,

निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;


गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,

तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;

शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,

शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;


सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,

प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को

जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,

(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)


हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,

शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।

- रामधारी सिंह ‘दिनकर’

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह


Friday, 25 March 2022

जन्मद‍िन: पढ़िए कवि तेज राम शर्मा की कविताऐं

आज ही के द‍िन यान‍ि 25 मार्च 1943 को हिन्दी भाषा के कवि तेज राम शर्मा का जन्म शिमला (हिमाचल प्रदेश) के गाँव बम्न्होल (सुन्नी) में हुआ था । वे भारत सरकार में विशेष सचिव के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद स्वतंत्र लेखन में लगातार सक्र‍िय रहे।

उनके दो कव‍िता संग्रह 1984 में प्रकाश‍ित ”धूप की छाया” और 2000 में प्रकाश‍ित ”बंदनवार ”, ज‍िसमें बंदनवार का अनुवाद बांग्ला में हुआ। इसके अलावा एक कविता संग्रह “नहाए रोशनी में” भी प्रकाश‍ित हुआ।

कविताओं में- अकेलापन, उसने चुना, ऐनक, फ़ोटो, बहुत दूर, वरना वह भी, सागर का रंग बहुत प्रस‍िद्ध रहीं। उनकी कविताएं पहाड़ की प्रकृति से आत्मीय संवाद की कविताएं हैं। प्रकृति के उपादानों का ही प्रतीकों और बिंबों के रूप में होन इन कविताओं की विशिष्टता है।  

कवि तेजराम शर्मा के सातवें कविता संग्रह ‘कंप्यूटर पर बैठी लड़की’ में कुल 79 कविताएं संगृहीत हैं जो ज्यादातर भीतर से बाहर की तरफ खुलती है। मिट्टी की गंध से सुवासित इन कविताओं की मुख्य टेक प्रकृति है। यहां तक कि कवि पुरखों की स्मृति में डूबता है तो प्रकृति के उपनाम और बिंब स्वत: आते चले गए हैं।

उनकी शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला से एम.ए. हिंदी, पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा इन ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट, मॅन्चेस्टर विश्वविद्यालय, यू.के.से क‍िया था । इसके अलावा डिप्लोमा इन ट्रेनिंग मॅनेजमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट, यू.के व डिप्लोमा इन फ्रेंच, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला भी उन्होंने क‍िया ।

कव‍ि तेजराम शर्मा को अखिल भारतीय कलाकार संघ साहित्य पुरस्कार, ठाकुर वेद राम राष्ट्रीय पुरस्कार, पंजाब कला साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिमाचल साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजा जा चुका है।

आज पढ़‍िए उनकी कुछ प्रस‍ि‍द्ध कव‍ितायें- 

गाँव के मन्दिर के प्राँगण में-
गाँव के मंदिर प्राँगण में
यहां जीर्ण-शीर्ण होते देवालय के सामने
धूप और छाँव का
नृत्य होता रहता है

यहाँ स्लेट छत की झालर से लटके
लकड़ी के झुमके
इतिहास पृष्ठों की तरह
गुम हो गए है

दुपहर बाद की मीठी धूप को छेड़ता
ठण्डी हवा का कोई झोंका
कुछ बचे झुमकों को हिला कर
विस्मृत युग को जगा जाता है

धूप में चमकती है ऊँची कोठी
पहाड़ का विस्मृत युग
देवदार की कड़ियों की तरह
कटे पत्थर की तहों के नीचे
काला पड़ रहा है
बूढे बरगद की पंक्तियों सा
सड़ रहा है
बावड़ी के तल में

इस गुनगुनी धूप में
पुरानी कोठी की छाया कुछ हिलती है
और लम्बी तन कर सो जाती है।

सपने अपने-अपने-

बालक ने सपना देखा
उड़ गया वह आकाश में
पीठ से फिसला उसका बस्ता
एक-एक कर आसमान से गिरी
पुस्तकें और काँपियाँ
देख कर मुस्कराया और उड़ता रहा
फिर गिरा आँखों से उसका चश्मा
धरती इतनी सुंदर है
उसने कभी सपने में भी न सोचा था

युवा ने सपना देखा
हवाई जहाज़ से
उसने लगाई छलांग
करतब दिखाता हुआ
निर्भय गिरता रहा धरती की ओर
जंगल जब तेजी से उसके पास आया
तो उसने पैराशूट खोल दिया
हवा का एक तेज़ झोंका
उसे राह से विचलित कर गया
पैराशूट को नियंत्रित करता हुआ
साहस के साथ वह
पेड़ों से घिरी चारागाह में उतरा
वहाँ एक युवती दौड़कर उसके पास आई
और प्यार भरी आँखों से उसे देखने लगी
सपने में ही अपना सिर उसकी गोद में रखकर
वह जीने के सपने देखने लगा

बूढ़े ने सपना देखा
सुबह-सुबह नदी स्नान करते हुए
फिसला जाता है उसका पाँव
वह नदी में डूबने लगता है
शिथिल इन्द्रियोँ से
छटपताता है बाहर निकलने के लिए
अपने-पराये कोई नहीं सुनते उसकी चीख
सब कुछ छूटता नज़र आता है
जैसे ही अंतिम साँस निकलने को होती है
बिस्तर पर जाग पड़ता है वह भयानक सपने से
काँपते हाथों से पानी पीता है और
सपने देखने से डरने लगता है।

कोई दिन-

हमारे सारे के सारे दिन
नष्ट नहीं हो जाते
कहीं एक दिन बच निकलता है
और जीवित रहता है
हवा,पानी, धूप, तूफान,काल
सब से लड़ता रहता है
लड़ते-लड़ते दूर तक निकल जाता है

सभी दिन तितली नहीं होते
कोई दिन तितली की तरह
पन्नों के बीच बच निकलता है
और क्षण-भंगुरता को चकमा दे जाता है
दिन
जिसमें मैं जीता हूँ
मेरा अपना नहीं हो पाता
मुट्ठी की रेत हो जाता है

पर वह दिन
जो बादलों की पीठ पर चढ़ कर
घूम आता है पर्वत–पर्वत
जीवित रहेगा बहुत दिनों
चीड़ और देवदार की गंध
आती रहेगी बरसों तक
उसके कोट से

मुझे अच्छा लगता है
जब बर्फ़ में ठिठुर रहे दिनों से
मैं उठा लाता हूँ एक दिन
गर्म पानी में हाथ-पाँव धुला कर
आग के पास बैठता हूँ
और शब्दों का एक गर्म-सा कंबल ओढ़ाता हूँ।

राग देस-

फासला
कि पार ही नहीं होता
हाथ से भाग्य-रेखा
रहती है सदा गायब
किसके पक्ष में
घटित हो रहा है सब कुछ
खतरनाक भीड़
कहाँ से उमड़ रही है?

इधर दीवारों से पलस्तर
उखड़ रहा है
उभर रहा है उसमें एक ही चेहरा
इस मौसम में
मिट्टी-गारे को ही
ताकती रह जाती है
दीवार पर उभरी इबारत

चोटियों पर गिरती है संकल्पों–सी लुभावनी बर्फ़
पर घाटी में ग्लेशियर
पिछली रात
नींव तक हिला गया है
गाँव-गाँव
घरों की दीवारें

उधर वैज्ञानिक
शुक्राणुओं में कम होती हलचल से
चिंतित हैं

इधर ऊसर में छिड़के बीज
चिड़ियाँ चुग जाती हैं
हाथ मलते रह जाते हैं शब्द

चरागाह में
भेड़ें पंक्तिबद्ध हैं
उतर रही है ऊन
सूरज छिपा है काले बादलों के बीच
पगडंडियाँ
कि दबती ही जा रही हैं
और उड़ती जाती है धूल
रंगमंच
कि नायक सभी हुए जाते हैं पतझड़ के चिनार
अगस्त्य हुए अरमानों के आगे
उमड़ रही है
आचमन के लिए भीड़
अबाअ सातों सुतों सहित हाथ जोड़े खड़ी है

विरासत
कि रेगिस्तान
फैला है ओर–छोर
शून्य में ताकते लोग़
पूछ रहे हैं
कौन-सी ऋचाओं के
अधिष्ठाता हैं
इन्द्र?
संस्कार
कि फिसल न जाए जनेऊ कान से
शंका करते हुए
नदियों से उठती
आग की लपटें
अग्निपुत्र पी रहें हैं लावा
सपनों की सूरत
निखरी हुई रेतीली आँखों में
साफ झलकते
परियों की चेहरे

मौसम कि बदलते ही
बीहड़ वन में फूलते हैं बरूस
पहाड़ में औरते छानती हैं सफेद मिट्टी
चमकती हैं घरो की दीवारें
स्लेट छत के चारों और
खिंचती हैं बरूस की बंदनवार रस्सियाँ
नज़र
कि अटकी रह जाती है
समुद्र किनारे के
नारियल के झुरमुटों बीच।

.....

सपने में नदी 

वर्षों तक

बार-बार

आता रहा एक ही सपना

नदी के तटबंधों पर

हाथों से सहलाता हूँ

उभरी तंरगें

नदी देती है खुला निमन्त्रण

पर बल खाती तरंगों पर

तैरने से घबराता हूं

डरते-डरते

गहरे में उतरता हूं

और जल के आवेग की तालों बीच

नदी पर तैरते हुए दूर निकल जाता हूं

तटों के बंधन से मुक्त नदी

मंझधार में

समूचा समेट लेती है मुझे

डूबते-डूबते

शिथिल होता है भुजाओं का पौरुष

नदी पता नहीं

कहां लेती होगी करवट

टूटे सपने की डोर पकड़े

बदलता हूं करवट बिस्तर पर।

-अलकनंदा सिंंह


Saturday, 12 March 2022

ब्रज की होरी: श्री कुँज बिहारी बिहारिनजू का फाग महोत्‍सव

 बसंत ऋतु  के आगमन के साथ ही राधा-कृष्ण के अनूठे प्रेम की धरती ब्रज में वसंत पंचमी के दिन से ही ४० दिवसीय फाग महोत्सव जो शुरूहुआ, वह अब अपने रंग में सभी को भिगो रहा है। रंग गुलाल के संग वृंदावन में स्‍वामी हरिदास की साधनास्‍थली टटिया स्‍थान भी संगीतमय होली खेल रहा है। प्रतिदिन अनेक पदों का गायन राधा-कृष्‍ण को समर्पित किया जाता है।

फाग महोत्‍सव का प्रथम दिवस

(1)

सुरंग सेज प्यारे खेलैं होरी ।
दूलहू श्याम रंगीले खिलाड़ी,दुलहिन राधा रसीली गोरी ।।
मान लाज मुस्कन रंग गहरे , फबे मनुहार जुहार निहोरी ।
चोबा चुंबन मलय आलिंगन ,परिरंभन मलैं कुमकुम रोरी ।।
परसत भाये गुलाल अंबीर तन ,अंकौ भरैं नखसिख रसबोरी ।
कृष्णचंद्र राधा चरणदासि बलि,सुरति फाग दिन रंग रस जोरी ।।

(2)

श्याम श्यामा की छवि न्यारी ,होरी रंग खेलैं पिय प्यारी।
सौंज सजि सखी दुहूँ ओरी,भरहिं पिच रंग रूख जोरी ।१।
बीन ढफ तार बहु बाजैं , निरखि नृत अप्सरा लाजैं ।
चैती चाँचरि मधुर संगीत ,फगुवा सुनि मत्त झूमे मीत ।२।
सौहें नव कुँज फूले फूल,भँवर जस गूँजैं यमुना कूल ।
प्रिया भरी रंग पिचकारी,ओट करि ललिता अगारी।३।
ताक रंग लाल पै मारै , घात लै अरगजा डारै ।
लाल गुलाल भरि झोरी ,गुलचा संग छोड़े तकि गोरी ।४।
उमंगि दोऊ फाग रंग खेलैं , प्रेम सुख रंग रस झेलैं ।
रँगे रंग रँगी पहिचानें , कोऊ काहू कौं नहिं जानें ।५।
कुंज दुरे कृष्णचन्द्र प्यारी , सुरति सुख केलि नित न्यारी ।
भरीं भुज राधा बिहारी , नेह होरी की बलिहारी ।६।

फाग महोत्‍सव का द्वितीय दिवस

(1)

होरी कुँज महल खेलत हुलसि छबीली री ।
नैंन सैंन अंग चलत चटक रंग ,चितै चित रंगत रंगीली री ।१।
घेरा करत सौंज लियैं सखी चहुँ,बीच फबी गरबीली री ।
कोमल कर अरगजा पुहुप भरि,मारत रसिक रसीली री ।२।
पीत वसन मोहन घन दामिनि,सारी चोली नीली री ।
खेलत होरी पिय संग सोहत ,कछु सूखी कछु गीली री ।३।
तन मन रंग अनंग के छूटत , कंचुकी नीबी ढीली री ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि,निरखत सुख सुरति लजीली री ।४।

(2)

खेले प्यारी श्याम पिया संग होरी ।
सुघर वदन पिचकारी रूप रंग, रस माधुर्य कमोरी ।१।
नेेंन सैंन के अंबीर अरगजा, चलैं कटाक्षन झोरी ।
हंसत रंगीले गुलाल परैं दृग ,उमड़े मदन मन जोरी ।२।
परस परस्पर झागे रस सर , सुखद सुरति बरजोरी ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि दिन ,उर आनंद न ओरी ।३।

फाग महोत्‍सव का तृतीय दिवस

(1)

बना बनी रस रंग की खेलें होरी हो ।
नैंन सैंन की मार परत मन ,रंग अनंग की रेलें होरी हो ।१।
रूप माधुरी सिंधु भँवर परे ,रस तरंग की ठेलें होरी हो ।
विवस रंग रस सुधि न वसन तन ,अंग अंग की पेलें होरी हो ।२।
मिलि न मिलें मदमाते फाग के ,रसिया उमंग की हेलें होरी हो ।
कृष्ण चन्द्र राधा चरण दासि रचि,सेज सुरंग की केलें होरी हो ।३।

(2)

होरी हो कुँज महल मतवारी ।
गोरे श्याम साँवरी श्यामा ,ललिता जोरी विचित्र सिंगारी ।१।
गोरी सखीं बजावें गावे ,रंग गुलाल चलावें कारी ।
गोरी जस गावें दुलहिन के ,साँवरी दैं दूलहु बहु गारी ।२।
चोबा चंदन अबीर अरगजा ,केसर कुसुम रंग सुखकारी ।
जुरत कटाक्ष मूठि दृग मारत , खेलैं दंपति चतुर खिलारी ।३।
घात दाब बचें पकरें परस्पर, सबहिं रंगे रंग इकसारी ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि बलि,मधुर प्रेम रंग होरी न्यारी ।४।

(3)

होरी खेलौ करौ मनमानी ।
मोहन रसिक रूप रस लोभी ,मानिनी राधा सयानी ।१।
उन रंग प्रेम दोऊ कर लीनें ,तुव रंग मनहिं छिपानी ।
तुव उन रंगौ रंगैं वे तुमको ,दोउन प्रीती हौं जानी ।२।
नृत्य संगीत सुगंध राग रंग , रस सर सुरति समानी ।
तन मन जिय मिलि रंगे परस्पर, सकुचि गुमान गँवानी ।३।
सेवत होरी बसंत मदन नित ,वृंदावन रजधानी ।
कृष्णचन्द्र राधा चरण दासि होरी ,रसिक अनन्य रंगानी ।४।

स्‍वामी हरिदास की साधनास्‍थली टटिया स्‍थान स्वामी हरिदास सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ है। हरिदास सम्प्रदाय के आठ आचार्य हैं। सातवें आचार्य, स्वामी ललित किशोरी देव जी ने 1758 और 1823 के बीच इस धरती पर एक निर्जन वृक्ष के नीचे निवास किया, ताकि एकांत में ध्यान किया जा सके। उन्होंने बांस के डंडे का इस्तेमाल कर पूरे इलाके को घेर लिया। स्थानीय बोली में बाँस की छड़ियों को “टटिया” कहा जाता है। इस तरह इस स्थान का नाम टटिया स्थान पड़ा। उन्होंने उन्हें यह सुझाव भी दिया कि राधा अष्टमी के दिन श्री हरिदास जी का प्रकट दिवस मनाया जाना चाहिए और तब से यह त्योहार बहुत प्रेम से मनाया जाता है। टटिया स्थान पर उनकी समाधि भी है।

टटिया स्थान विभिन्न प्रकार के वृक्षों से भरा है, विशेष रूप से वे जो भगवान कृष्ण के दिल के करीब थे, जैसे, नीम, पीपल और कदंब। यह जगह साधना भक्ति करने की है, और किसी को भी यहाँ अनावश्यक बात करने की अनुमति नहीं है।

– अलकनंदा सिंंह

Thursday, 6 January 2022

आज कुछ हटके पढ़ेंगे... भ्रमरगीत परम्परा में कृष्‍ण और ब्रज


 

हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत का मूलस्रोत है श्रीमद्भागवत पुराण,  जिसके दशम स्कंध के ४६वें एवं ४७वें अध्याय में भ्रमरगीत प्रसंग है। श्रीकृष्ण गोपियों को छोङकर मथुरा चले गए और गोपियाँ विरह विकल हो गई। कृष्ण मथुरा में लोकहितकारी कार्यों में व्यस्त थे किन्तु उन्हें ब्रज की गोपियों की याद सताती रहती थी। उन्होंने अपने अभिन्न मित्र उद्धव को संदेशवाहक बनाकर गोकुल भेजा। वहां गोपियों के साथ उनका वार्तालाप हुआ तभी एक भ्रमर वहां उड़ता हुआ आ गया। गोपियों ने उस भ्रमर को प्रतीक बनाकर अन्योक्ति के माध्यम से उद्धव और कृष्ण पर जो व्यंग्य किए एवं उपालम्भ दिए उसी को ’भ्रमरगीत’ के नाम से जाना गया। भ्रमरगीत प्रसंग में निर्गुण का खण्डन, सगुण का मण्डन तथा ज्ञान एवं योग की तुलना में प्रेम और भक्ति को श्रेष्ठ ठहराया गया है।

भ्रमरगीत भारतीय काव्य की एक पृथक काव्य परम्परा है। हिन्दी में सूरदास, नंददास, परमानंददास, मैथिलीशरण गुप्त (द्वापर) और जगन्नाथदास रत्नाकर ने भ्रमरगीत की रचना की है। भारतीय साहित्य में 'भ्रमर' (भौंरा) रसलोलुप नायक का प्रतीक माना जाता है। वह व्यभिचारी है जो किसी एक फूल का रसपान करने तक सीमित नहीं रहता अपितु, विविध पुष्पों का रसास्वादन करता है।

ब्रजभाषा काव्य में भ्रमरगीत परम्परा के कई ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। विद्वान इस परम्परा का प्रारम्भ मैथिल कोकिल विद्यापति के पदों से मानते हैं किन्तु विधिवत रूप में भ्रमरगीत परम्परा सूरदास से ही प्रारम्भ हुई।

सूरदास का भ्रमरगीत

सूरसागर सूरदासजी का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें प्रथम नौ अध्याय संक्षिप्त है, पर दशम स्कन्ध का बहुत विस्तार हो गया है। इसमें भक्ति की प्रधानता है। इसके दो प्रसंग 'कृष्ण की बाल-लीला’ और 'भ्रमरगीत-प्रसंग' अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसके विषय में आचार्य शुक्ल ने कहा है, सूरसागर का सबसे मर्मस्पर्शी और वाग्वैदग्ध्यपूर्ण अंश भ्रमरगीत है। आचार्य शुक्ल ने लगभग 400 पदों को सूरसागर के भ्रमरगीत से छांटकर उनको 'भ्रमरगीत सार' के रूप में संग्रह किया था।

भ्रमरगीत में सूरदास ने उन पदों को समाहित किया है जिनमें मथुरा से कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजते हैं। उद्धव योग और ब्रह्म के ज्ञाता हैं। उनका प्रेम से दूर-दूर का कोई सम्बन्ध नहीं है। जब गोपियाँ व्याकुल होकर उद्धव से कृष्ण के बारे में बात करती हैं और उनके बारे में जानने को उत्सुक होती हैं तो वे निराकार ब्रह्म और योग की बातें करने लगते हैं तो खीजी हुई गोपियाँ उन्हें 'काले भँवरे' की उपमा देती हैं। 

इन्हीं लगभग 100 पदों का समूह भ्रमरगीत या 'उद्धव-संदेश' कहलाता है।


भ्रमरगीत में गोपियों की वचनवक्रता अत्यंत मनोहारिणी है। ऐसा सुंदर उपालंभ काव्य और कहीं नहीं मिलता।


उधो ! तुम अपनी जतन करौ

हित की कहत कुहित की लागै,

किन बेकाज ररौ ?

जाय करौ उपचार आपनो,

हम जो कहति हैं जी की।

कछू कहत कछुवै कहि डारत,

धुन देखियत नहिं नीकी।


जगन्नाथदास रत्नाकर का भ्रमरगीत 

जगन्नाथदास रत्नाकर के 'उद्धव-शतक' की गणना भी भ्रमरगीत परम्परा में की जा सकती हैं। यहाँ उद्धव ही 'भ्रमर' हैं जिन्हें लक्ष्य कर गोपियाँ अपने मन की कटुता व्यक्त करतीं हैं।


करि के सुधि प्यारी तिहारी सदा

हिय घाव हरे के हरे ही रहे

छिनहू न सुहाय न भाय कछु

अंग अंग गरे के गरे ही रहे

कवि मजुल भाव वहै हित के 

उर आई अरै के अरै ही रहे 

झर बांधि झरै अँसुवा नित ही 

तउ नैन भरे के भरै ही रहै.


प्रस्तुत‍ि- अलकनंदा सिंह

Saturday, 18 December 2021

एक कहानी मार्म‍िक सी - इतिहास के पन्नों में सरस्वती (मदीहा खान) का नाम नहीं

 आज एक मार्म‍िक सी कहानी पढ़ने को म‍िली अंतर्धार्म‍िक व‍िवाह की। आशा है आप सबको भी पसंद आएगी। 

 पढें-------

 


वह मुस्लिम कन्या बोली, "तो फिर हमेशा के लिए अपने 52 गज के घाघरे में मुझे छिपा लो दादी।’’

यूपी में बुलंदशहर के सिकंदराबाद के  गाँव पिलखन की सच्ची घटना है ये।

1904 का सन् था, बरसात का मौसम और मदरसे की छुट्टी हो चुकी थी। लड़कियाँ मदरसे से निकल चुकी थी। अचानक ही आँधी आई और एक लड़की की आंखों में धूल भर गई, आँखें बंद और उसका पैर एक कुत्ते पर जा टिका। वह कुत्ता उसके पीछे भागने लगा। लड़की डर गई और दौड़ते हुए एक ब्राह्मण मुरारीलाल शर्मा के घर में घुस गई। जहाँ 52 गज का घाघरा पहने पंडिताइन बैठी थी।

लड़की उसके घाघरे में जाकर लिपट गई, "दादी मुझे बचा लो।"

दादी की लाठी देख कुत्ता तो वहीं से भाग गया, लेकिन बाद में जहाँ भी दादी मिलती, तो यह बालिका उसको राम-राम बोलकर अभिवादन करने लगी। दादी से उसकी मित्रता हो गई और दादी उसे समय मिलते ही अपने पास बुलाने लगी, क्योंकि दादी को पंडित कृपाराम ने उर्दू में नूरे हकीकत लाकर दी थी, दादी उर्दू जानती थी, परंतु अब आँखें कमजोर हो गई थी, इसलिए उस लड़की से रोज-रोज वह उस ग्रंथ को पढ़वाने लगी और यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा।

लड़की देखते ही देखते पंडितों के घर में रखे सारे आर्ष साहित्य को पढ़-पढ़कर सुनाते हुए कब विद्वान बन गई पता ही नहीं, पता तो तब चला, जब एक दिन उसका निकाह तय हो गया और दादी कन्यादान करने गई। निकाह के समय जैसे ही उसने अपने दूल्हे को देखा तो वह न केवल पहले से शादीशुदा था वरन एक आँख का काना भी था। इसलिए लड़की को ऐसा वर पसंद नहीं आया, परंतु घरवालों और रिश्तेदारों ने दबाव डाला लड़की पर, हाथ तक उठाया, तो विवशता के आँसुओं की गंगा जमुना की धारा उसकी आँखों से बह चली।

परंतु अबला ने जैसे ही देखा कि 52 गज के घाघरे वाली पंडिताइन कन्यादान करने आई है, अपने पोते के साथ तो एक बार फिर इतने वर्षो बाद दादी से चिपट गई थी, "दादी मुझे बचा लो, मैं काने से निकाह नहीं करूँगी।"

"काने से नहीं करेगी तो तेरे लिए क्या कोई शहजादा आएगा?" वह वधू दादी को छोड़ने का नाम न ले रही थी, दादी भी रोने लगी, उसे समझाने का प्रयास किया, कि "जैसा भी है, उसी से नियति समझकर शादी कर ले।"

"अगर आपकी बेटी होती तो क्या आप उसकी शादी काने से कर देतीं?" लड़की ने दादी से पूछा था।

"तू भी तो मेरी ही बेटी है" दादी ने कहा।

"सिर पर हाथ रखकर कहो कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ" लड़की ने कहा।

"हाँ तुम मेरी बेटी हो।" कहते हुए पंडिताइन ने उस मुस्लिम कन्या के सिर पर हाथ रख दिया था।

"तो फिर हमेशा के लिए अपने 52 गज के घाघरे में मुझे छिपा लो दादी।"

"मतलब" दादी ने अचंभित हो कर कहा।

"अपने इस पोते से मेरा विवाह करके मुझे अपने घर ले चलो" लड़की ने कहा।

"क्या?" कोहराम मच गया, एक मुस्लिम लड़की की इतनी हिम्मत की निकाह के दिन जात-बिरादरी की बदनामी करे और पंडित के लड़के से शादी करने की बात कह दे। आखिर इतनी हिम्मत आई उसके अंदर कहाँ से। जब किसी ने पूछा तो, उसने बताया, "दादी को नूरे हकीकत यानी कि दयानंद सरस्वती का सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर सुनाते हुए। कर्म से मुझे पंडिताइन बनने का हक वेदों ने दिया है और मैं इसे लेकर रहूँगी।"

पंचायत बैठी, लड़की अब अपनी बात पर अड़ गई कि शादी करेगी तो पंडित के लड़के से वरना नहीं, पढ़ेगी तो वेद पढ़ेगी वरना कुरान नहीं।

चतुरसेन और पंडित के लड़के की यारी थी, चतुरसेन आर्य समाजी किशोर था और उसने पंडित के लड़के को मना लिया था कि मुस्लिम लड़की से शादी करेगा तो सात पीढ़ियों के पूर्वजों के पाप धुल जाएँगे। उधर पंडित कृपाराम ने दादी को समझाया और दादी भी मान गई। मुरारीलाल शर्मा ने भी हाँ भर दी। लेकिन मुस्लिम जमात में कोहराम मच गया और उस मुस्लिम परिवार का हुक्का-पानी गिरा दिया, उसे मुस्लिम धर्म से बाहर निकाल दिया, कुएँ से पानी भरना बंद हो गया। 

परंतु वह परिवार भी अब इस्लाम की दकियानूसी बातों से तंग आ चुका था और उसने अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ चार दिन में ही घर में कुआँ खोदकर पानी की समस्या से छुटकारा पाया और अपनी बेटी की शादी हिन्दू युवक से करने के साथ-साथ सपरिवार वैदिक धर्म अंगीकार करने की घोषणा कर दी। यज्ञ हवन के साथ उस युवती का पिता आर्य बन गया और नाम रखा चौधरी हीरा सिंह।

आज हीरा सिंह की बेटी की शादी थी, किसी ने कहा, "हिन्दू इसकी बेटी ले जाएँगे, लेकिन इसके घर का हुक्का-पानी तक न पिएँगे।" ठाकुर बडगुजर ने जब यह सुना तो हीरासिंह का हुक्का भर लाया और पहली घूँट भरी और फिर हीरा के मुँह में नेह ठोक दी और हीरा जाटों, पंडितों, और ठाकुरों के साथ बैठकर हुक्का पीने लगा।

पंडित कृपाराम ने उसके नए कुएँ से पानी भरा और सबको पिलाया और खुद भी पिया। मुरारीलाल शर्मा ने एक लंबा भाषण दिया और आर्य समाज के प्रख्यात भजनीक तेजसिंह ने कई भजन सुनाए और बिन दान-दहेज के उस मुस्लिम बालिका मदीहा खान का विवाह संस्कार ब्राह्मण के लड़के से हो गया। उस जमाने में अपनी तरह का यह पहला अंतरधर्मीय विवाह था।

पंडित कृपाराम आगे चलकर स्वामी दर्शनानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए और उन्होंने हरिद्वार के निकट एक गुरुकुल महाविद्यालय स्थापित किया। बालक चतुरसेन प्रख्यात उपन्यासकार हुए और आर्य समाज अनाज मंडी की स्थापना की और हीरा सिंह विधायक तक बना।

स्वामी दर्शनानंद, चतुरसेन शास्त्री, ठाकुर हीरासिंह आदि को आज सब जानते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में सरस्वती (मदीहा खान) का कहीं नाम नहीं है, जिनकी प्रेरणामात्र से आधा दर्जन लोग विद्वान और समाजसेवी बने और सिकंदराबाद आर्य समाज वैदिक धर्म प्रचार का सबसे बड़ा गढ बन गया था।

संदर्भ

1. यादें, 

आचार्य चतुरसेन, संज्ञान प्रकाशन, संस्करण 1968, पृष्ठ 45

2. मेरी आत्मकथा, चतुरसेन शास्त्री, 

हिन्द पाकेट बुक्स, 1970

3. सिकंदराबाद आर्य समाज का गौरवशाली इतिहास, 

ठाकुर हीरा सिंह, पृष्ठ 76

4. मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय, 

स्वामी दर्शनानंद सरस्वती,

पृष्ठ 34

पुस्तक-- "मुस्लिम विदुषियों की घर वापसी" का एक अंश

आर्यखंड टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड का उत्कृष्ट प्रकाशन।

प्रस्तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह

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