Tuesday, 15 September 2020

तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में से एक हैं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


 

15 सितम्बर को पैदा हुए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार हैं। वह बाल साहित्य पर ध्यान देना चाहते थे और बाल पत्रिका पराग के संपादक भी थे। वह तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में से एक हैं।

ईश्वर

बहुत बड़ी जेबों वाला कोट पहने
ईश्वर मेरे पास आया था,
मेरी मां, मेरे पिता,
मेरे बच्चे और मेरी पत्नी को
खिलौनों की तरह,
जेब में डालकर चला गया
और कहा गया,
बहुत बडी दुनिया है
तुम्हारे मन बहलाने के लिए।
मैंने सुना है,
उसने कहीं खोल रक्खी है
खिलौनों की दुकान,
अभागे के पास
कितनी जरा-सी पूंजी है
रोजगार चलाने के लिए।

जब-जब सिर उठाया
जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।
मस्तक पर लगी चोट,
मन में उठी कचोट,

अपनी ही भूल पर मैं,
बार-बार पछताया।
जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।

दरवाजे घट गए या
मैं ही बडा हो गया,
दर्द के क्षणों मेंकुछ
समझ नहीं पाया।
जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।

‘शीश झुका आओ बोला
बाहर का आसमान,
‘शीश झुका आओ बोली
भीतर की दीवारें,
दोनों ने ही मुझे
छोटा करना चाहा,
बुरा किया मैंने जो
यह घर बनाया।

जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।

सब कुछ कह लेने के बाद

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना।

सुर्ख़ हथेलियाँ

पहली बार
मैंने देखा
भौंरे को कमल में
बदलते हुए,
फिर कमल को बदलते
नीले जल में,
फिर नीले जल को
असंख्य श्वेत पक्षियों में,
फिर श्वेत पक्षियों को बदलते
सुर्ख़ आकाश में,
फिर आकाश को बदलते
तुम्हारी हथेलियों में,
और मेरी आँखें बन्द करते
इस तरह आँसुओं को
स्वप्न बनते
पहली बार मैंने देखा ।

अजनबी देश है यह

अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।

प्यार : एक छाता

विपदाएँ आते ही,
खुलकर तन जाता है
हटते ही
चुपचाप सिमट ढीला होता है;
वर्षा से बचकर
कोने में कहीं टिका दो,
प्यार एक छाता है
आश्रय देता है गीला होता है।

व्यंग्य मत बोलो

व्यंग्य मत बोलो।
काटता है जूता तो क्या हुआ
पैर में न सही
सिर पर रख डोलो।
व्यंग्य मत बोलो।

अंधों का साथ हो जाये तो
खुद भी आँखें बंद कर लो
जैसे सब टटोलते हैं
राह तुम भी टटोलो।
व्यंग्य मत बोलो।

क्या रखा है कुरेदने में
हर एक का चक्रव्यूह कुरेदने में
सत्य के लिए
निरस्त्र टूटा पहिया ले
लड़ने से बेहतर है
जैसी है दुनिया
उसके साथ होलो
व्यंग्य मत बोलो।

भीतर कौन देखता है
बाहर रहो चिकने
यह मत भूलो
यह बाज़ार है
सभी आए हैं बिकने
राम राम कहो
और माखन मिश्री घोलो।
व्यंग्य मत बोलो।

हँसा ज़ोर से जब

हँसा ज़ोर से जब, तब दुनिया
बोली इसका पेट भरा है

और फूट कर रोया जब
तब बोली नाटक है नखरा है

जब गुमसुम रह गया, लगाई
तब उसने तोहमत घमंड की
कभी नहीं वह समझी इसके
भीतर कितना दर्द भरा है

दोस्त कठिन है यहाँ किसी को भी
अपनी पीड़ा समझाना
दर्द उठे तो, सूने पथ पर
पाँव बढ़ाना, चलते जाना

Saturday, 5 September 2020

शिक्षक दिवस: पढ़ें उन कवियों की रचनाएं, जिन्‍होंने शिक्षक धर्म भी निभाया

 


कवि और शिक्षक दोनों का ही धर्म है कि वह समाज को रास्ता दिखाकर उसका मार्गदर्शन करें इसलिए किसी कवि का शिक्षक हो जाना बहुत ही सहज है। उसी तरह किसी शिक्षक का कवि हो जाना भी उतना ही सरल है। आज शिक्षक दिवस के मौके पर पढ़ें उन कवियों की रचनाएं जिन्होंने शिक्षक का धर्म भी निभाया था।

कुमार विश्वास
कुछ छोटे सपनों के बदले,
बड़ी नींद का सौदा करने,
निकल पडे हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे !
वही प्यास के अनगढ़ मोती,
वही धूप की सुर्ख कहानी,
वही आंख में घुटकर मरती,
आंसू की खुद्दार जवानी,
हर मोहरे की मूक विवशता, चौसर के खाने क्या जाने
हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे
निकल पडे़ हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे !

कुछ पलकों में बंद चांदनी,
कुछ होंठों में कैद तराने,
मंजिल के गुमनाम भरोसे,
सपनों के लाचार बहाने,
जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे,
उनके भी दुर्दम्य इरादे, वीणा के स्वर पर ठहरेंगे
निकल पडे़ हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे

कुछ छोटे सपनों की ख़ातिर
बड़ी नींद का सौदा करने
निकल पड़े हैं पाँव अभागे
जाने कौन नगर ठहरेंगे

वही प्यास के अनगढ़ मोती
वही धूप की सुर्ख़ कहानी
वही ऑंख में घुट कर मरती
ऑंसू की ख़ुद्दार जवानी
हर मोहरे की मूक विवशता
चौसर के खाने क्या जानें
हार-जीत ये तय करती है
आज कौन-से घर ठहरेंगे

कुछ पलकों में बंद चांदनी
कुछ होठों में क़ैद तराने
मंज़िल के गुमनाम भरोसे
सपनों के लाचार बहाने
जिनकी ज़िद के आगे सूरज
मोरपंख से छाया मांगे
उनके ही दुर्गम्य इरादे
वीणा के स्वर पर ठहरेंगे

हरिवंश राय बच्चन

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भ्ाव-सागर तरने को नाव बनाए
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ
उन्मादों में अवसाद लए फिरता हूँ
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ
हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था।

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

मैथिलीशरण गुप्त

तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
सब द्वारों पर भीड़ मची है,
कैसे भीतर जाऊं मैं?

द्बारपाल भय दिखलाते हैं,
कुछ ही जन जाने पाते हैं,
शेष सभी धक्के खाते हैं,
क्यों कर घुसने पाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

तेरी विभव कल्पना कर के,
उसके वर्णन से मन भर के,
भूल रहे हैं जन बाहर के
कैसे तुझे भुलाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

बीत चुकी है बेला सारी,
किंतु न आयी मेरी बारी,
करूँ कुटी की अब तैयारी,
वहीं बैठ गुन गाऊं मैं।
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

कुटी खोल भीतर जाता हूँ
तो वैसा ही रह जाता हूँ
तुझको यह कहते पाता हूँ-
‘अतिथि, कहो क्या लाउं मैं?’
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।

प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को।

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।

Monday, 31 August 2020

आज़ाद रूह की नुमाइंदगी कर साह‍ित्य की रूह को जगा गईं अमृता प्रीतम


कल्पना का इतना ऊंचा दरख़्त खड़ा कर दो क‍ि कोई उसके पार जा ही ना पाये और थकहार कर कहे क‍ि अब बस भी करो अमृता… साह‍ित्य में रुह से इतने गहरे तक कौन ताअल्लुक बनाता है … मगर नहीं, अमृता आज भी हमारी रूहों को टटोल कर कहती हैं क‍ि कल्पना को कोई नहीं बांध सका..इसल‍िए उड़ो और उड़ो …और उड़ते चलो …
ढलते सूरज की रोशनी से ऐसा चराग जल रहा हो जिसकी लपटें काल्पनिक शब्दों के सहारे कागज़ को यथार्थ की आग से सुलगा रही हो। कहानियों का ये स्वभाव सिर्फ और सिर्फ हिंदी-पंजाबी की उम्दा लेखिका रहीं अमृता प्रीतम की कहानियों में मिलता है। जहां वो अपने पात्रों के साथ एक ऐसे सफर पर ले चलती हैं जो अक्सर पाठकों को अपना खुद का सफर लगने लगता है।अमृता प्रीतम अपनी कहानियों के पात्रों और उसके पाठकों के बीच एक अलग तरह के संबंध को देखती थीं। ठीक उसी तरह जैसे ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हों। इस बात की तस्दीक वो खुद करती हैं। इसके पीछे उन्होंने संजीदा और विचारणीय तर्क भी दिए हैं।
उनकी चुनिंदा कहानियों के संग्रह ‘मेरी प्रिय कहानियां’ की भूमिका में वो लिखती हैं, ‘हर कहानी का एक मुख्य पात्र होता है और जो कोई उसको मुख्य पात्र बनाने का कारण बनता है, चाहे वह उसका महबूब हो और चाहे उसका माहौल, वह उस कहानी का दूसरा पात्र होता है पर मैं सोचती हूं, हर कहानी का एक तीसरा पात्र भी होता है।कहानी का तीसरा पात्र उसका पाठक होता है जो उस कहानी को पहली बार लफ्ज़ों में से उभरते हुए देखता है और उसके वजूद की गवाही देता है।’
वास्तव में उनकी कहानियां पढ़ते हुए हम उस दुनिया में प्रवेश करने लगते हैं जहां उसके पात्रों को रचा गया है। न चाहते हुए भी हम अमृता प्रीतम के ही शब्दों में उनकी कहानियों का तीसरा पात्र बन जाते हैं। और पात्रों का सुख, दुख हमारे अपने होते चले जाते हैं। जब उनकी कहानियों से गुज़रना होता है तो उनमें भी मानवीय करूणा, महिलाओं की पीड़ा, नारी की स्थिति बड़ी संजीदगी और गंभीरता से उकेरी हुई जान पड़ती है।
2020 का साल यानि जब कोरोनावायरस महामारी को हम सब भुगत रहे हैं , तब उसी समाज की परतों को खंगालती अमृता प्रीतम की कहानियों न केवल महत्वपूर्ण हो जाती है बल्कि उस दायरे को भी बढ़ाती है जिसका शिखर प्रेम रूपी समाज होना चाहिए। जैसे कि ” जंगली बूटी” में अमृता प्रीतम ने महिलाओं की उस स्थिति को बताया है जिसमें नारी खुद को विश्वासों और संस्कारों के बंधन में बांधे रखती है और उसे तोड़ना मानों उसे ऐसा लगता है कि किसी ने उसे कोई बूटी खिला दी हो तभी वो उन दायरों से बाहर निकल रही है।
इसी तरह ”गुलियाना का एक खत” कहानी में गुलियाना के जरिए औरतों की आज़ादी की पैरवी की गई है। वो पात्रों के जरिए औरत की इच्छाओं की दुनिया को दिखाती है लेकिन समाज रूपी दुनिया मानो एक बाधा बनकर उसे पीछे धकेल रही हो और उसकी स्वतंत्रता को कैद कर लेना चाहती हो।
अमृता प्रीतम की लेखनी के दायरे को सिर्फ महिलाओं तक ही बांध कर देखना नाइंसाफी ही कही जाएगी। उनकी कहानियों में पुरुषों की भावनाओं का भी जिक्र मिलता है जिसे उन्होंने बड़ी ही नाटकीय और मानवीय संवेदना के जरिए अपने काल्पनिक शब्दों की जादूगरी से पिरोया है। धुंआ और लाट, लाल मिर्च, बू, मैं सब जानता हूं, एक गीत का सृजन, एक लड़की: एक जाम – मर्दों के मन के भीतर की दुनिया को सामने लाकर रख देती है। उनकी कथित ठोस व्यक्तित्व के पीछे के ममत्व स्वाभाव और बैचेनी को भी उभारती है जो पुरुष और महिला के व्यक्तित्व का साझा स्वभाव है।
ये भी अजब इत्त‍िफाक ही रहा क‍ि अमृता प्रीतम ने दो ”31” तारीखों के बीच पूरा जीवन जी लिया , जी हां, 31 अगस्‍त 1919 को जन्‍मी Amrita Pritam का निधन भी 31 अक्‍तूबर 2005 को हुआ।
कव‍िताओं में उनका कोई सानी नहीं, उनकी अध‍िकांश कव‍िताऐं पंजाबी में ल‍िखी गईं, हालांक‍ि ह‍िंदी में भी ल‍िखी हैं, परंतु जो बात उनकी पंजाबी कव‍िता में आती है, वो क‍िसी को भी झकझोरने के ल‍िए काफी है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि पंजाबी कविता की अपनी एक अलग पहचान है, उसकी अपनी शक्ति है अपना सौंदर्य है, अपना तेवर है और वे उसका प्रतिनिधित्व करती हैं।
अमृता प्रीतम का जन्म १९१९ में गुजरांवाला पंजाब में हुआ। बचपन बीता लाहौर में, शिक्षा भी वहीं हुई। किशोरावस्था से लिखना शुरू किया — कविता, कहानी और निबंध। पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुयीं और देशी विदेशी अनेक भाषाओं में अनूदित भी हुईं। वे १९५७ में साहित्य अकादमी पुरस्कार, १९५८ में पंजाब सरकार के भाषा द्वारा, १९८८ में बल्गारिया वैप्त्त्सरोव पुरस्कार (अन्तर्राष्ट्रीय) और १९८१ में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से सम्मानित हुईं।
आज उन्‍हें श्रद्धांजलिस्‍वरूप मैं उन्‍हीं की तीन पंजाबी कविताऐं देना चाहती हूं, जिनका हिन्‍दी अनुवाद भी साथ ही दिया गया है।
1. मेरा पता
अज मैं आपणें घर दा नंबर मिटाइआ है
ते गली दे मत्थे ते लग्गा गली दा नांउं हटाइया है
ते हर सड़क दी दिशा दा नाउं पूंझ दित्ता है
पर जे तुसां मैंनूं ज़रूर लभणा है
तां हर देस दे, हर शहर दी, हर गली दा बूहा ठकोरो
इह इक सराप है, इक वर है
ते जित्थे वी सुतंतर रूह दी झलक पवे
– समझणा उह मेरा घर है।
मेरा पता का हिन्‍दी अनुवाद
मेरा पता
आज मैंने अपने घर का नंबर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, एक वर है
और जहाँ भी आज़ाद रूह की झलक पड़े
– समझना वह मेरा घर है।
2. इक ख़त
मैं – इक परबत्ती ‘ते पई पुस्तक।
शाइद साध–बचन हाँ, जां भजन माला हाँ,
जां कामसूत्र दा इक कांड,
जो कुझ आसण ‘ते गुप्त रोगां दे टोटके,
पर जापदा – मैं इन्हां विचों कुझ वी नहीं।
(कुझ हुंदी तां ज़रूर कोई पढ़दा)
ते जापदा इक क्रांतिकारीआं दी सभा होई सी
ते सभा विच जो मत्ता पास होईआ सी
मैं उसे दी इक हथ–लिखत कापी हाँ।
ते फेर उत्तों पुलिस दा छापा
ते कुझ पास होईआ सी, कदे लागू न होईआ
सिर्फ़ ‘कारवाई’ खातर सांभ के रखिआ गिआ।
ते हुण सिर्फ़ कुझ चिड़िआं अउदीआं
चुझ विच तीले लिअउंदीआं
ते मेरे बदन उत्ते बैठ के
उह दूसरी पीढ़ी दा फिकर करदीआं।
(दूसरी पीढ़ी दा फिकर किन्ना हसीन फिकर है!)
पर किसे उपराले लई चिड़िआं दे खम्ब हुंदे हन
ते किसे मते दा कोई खम्ब नहीं हुंदा।
(जां किसे मते दी कोई दूसरो पीढ़ी नहीं हुंदी?)
हिन्‍दी अनुवाद
एक ख़त
मैं – एक आले में पड़ी पुस्तक।
शायद संत–वचन हूँ, या भजन–माला हूँ,
या काम–सूत्र का एक कांड,
या कुछ आसन, और गुप्त रोगों के टोटके
पर लगता है मैं इन में से कुछ भी नहीं।
(कुछ होती तो ज़रूर कोई पढ़ता)
और लगता – कि क्रांतिकारियों की सभा हुई थीं
और सभा में जो प्रस्ताव रखा गया
मैं उसी की एक प्रतिलिपि हूँ
और फिर पुलिस का छापा
और जो पास हुआ कभी लागू न हुआ
सिर्फ़ कार्रवाई की ख़ातिर संभाल कर रखा गया।
और अब सिर्फ़ कुछ चिड़ियाँ आती हैं
चोंच में कुछ तिनके लाती हैं
और मेरे बदन पर बैठ कर
वे दूसरी पीढ़ी की फ़िक्र करती हैं
(दूसरी पीढ़ी की फ़िक्र कितनी हसीन फ़िक्र है!)
पर किसी भी यत्न के लिए चिड़ियों के पंख होते हैं,
पर किसी प्रस्ताव का कोई पंख नहीं होता।
(या किसी प्रस्ताव की कोई दूसरी पीढ़ी नहीं होती?)
3. तू नहीं आया
चेतर ने पासा मोड़िया, रंगां दे मेले वास्ते
फुल्लां ने रेशम जोड़िया – तू नहीं आया
होईआं दुपहिरां लम्बीआं, दाखां नू लाली छोह गई
दाती ने कणकां चुम्मीआं – तू नहीं आया
बद्दलां दी दुनीआं छा गई, धरती ने बुक्कां जोड़ के
अंबर दी रहिमत पी लई – तू नहीं आया
रुकखां ने जादू कर लिआ, जंग्गल नू छोहंदी पौण दे
होंठों ‘च शहद भर गिआ – तू नहीं आया
रूत्तां ने जादू छोहणीआं, चन्नां ने पाईआं आण के
रातां दे मत्थे दौणीआं – तू नहीं आया
अज फेर तारे कह गए, उमरां दे महिलीं अजे वी
हुसनां दे दीवे बल रहे – तू नहीं आया
किरणां दा झुरमुट आखदा, रातां दी गूढ़ी नींद चों
हाले वी चानण जागदा – तू नहीं आया
हिन्‍दी अनुवाद
तू नहीं आया
चैत ने करवट ली, रंगों के मेले के लिए
फूलों ने रेशम बटोरा – तू नहीं आया
दोपहरें लंबी हो गईं, दाख़ों को लाली छू गई
दरांती ने गेहूँ की वालियाँ चूम लीं – तू नहीं आया
बादलों की दुनिया छा गई, धरती ने दोनों हाथ बढ़ा कर
आसमान की रहमत पी ली – तू नहीं आया
पेड़ों ने जादू कर दिया, जंगल से आई हवा के
होंठों में शहद भर गया – तू नहीं आया
ऋतु ने एक टोना कर दिया, चाँद ने आकर
रात के माथे झूमर लटका दिया – तू नहीं आया
आज तारों ने फिर कहा, उम्र के महल में अब भी
हुस्न के दिये जल रहे हैं – तू नहीं आया
किरणों का झुरमुट कहता है, रातों की गहरी नींद से
रोशनी अब भी जागती है – तू नहीं आया।
- अलकनंदा स‍िंंह 

Tuesday, 25 August 2020

पुण्‍यतिथि विशेष: उर्दू के मशहूर शायर अहमद फ़राज़

उर्दू अदब की मक़बूल हस्तियों में शुमार मशहूर शायर अहमद फ़राज़ की आज बारहवीं पुण्‍यतिथि है। 12 जनवरी 1931 को पाकिस्‍तान में जन्‍मे अहमद फ़राज़ का इंतकाल 25 अगस्‍त 2008 को इस्‍लाबाद में हुआ। अहमद फ़राज़ का पूरा नाम सैयद अहमद शाह अली था लेकिन शायरी की दुनिया में वह अहमद फ़राज़ के नाम से मशहूर हुए।
उनकी लिखी ग़ज़लों में से प्रसिद्ध कुछ ग़ज़लें इस प्रकार हैं-
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों प
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है ‘फ़राज़’
जैसे दो साए तमन्ना के सराबों में मिलें
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते
अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं
मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते
कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं
कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते
शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरा
नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते
कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में
कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते
उश्शाक़ के मानिंद कई अहल-ए-हवस भी
पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते
सब ख़्वाहिशें पूरी हों ‘फ़राज़’ ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
चल निकलती हैं ग़म-ए-यार से बातें क्या क्या
चल निकलती हैं ग़म-ए-यार से बातें क्या क्या
हम ने भी कीं दर-ओ-दीवार से बातें क्या क्या
बात बन आई है फिर से कि मेरे बारे में
उस ने पूछीं मेरे ग़म-ख़्वार से बातें क्या क्या
लोग लब-बस्ता अगर हों तो निकल आती हैं
चुप के पैराया-ए-इज़हार से बातें क्या क्या
किसी सौदाई का क़िस्सा किसी हरजाई की बात
लोग ले आते हैं बाज़ार से बातें क्या क्या
हम ने भी दस्त-शनासी के बहाने की हैं
हाथ में हाथ लिए प्यार से बातें क्या क्या
किस को बिकना था मगर ख़ुश हैं कि इस हीले से
हो गईं अपने ख़रीदार से बातें क्या क्या
हम हैं ख़ामोश कि मजबूर-ए-मोहब्बत थे ‘फ़राज़’
वर्ना मंसूब हैं सरकार से बातें क्या क्या
इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ
तू कि यकता था बे-शुमार हुआ
हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ
हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ
हम अगर मंज़िलें न बन पाए
मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ
देर से सोच में हैं परवाने
राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ
इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ
अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ
बंदगी हम ने छोड़ दी है ‘फ़राज़’
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ
करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे
वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे
ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के
मैं कैसे बात करूँ अब कहाँ से लाऊँ उसे
मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है
कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे
वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ
तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे
जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’
अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे
न दिल से आह न लब से सदा निकलती है
न दिल से आह न लब से सदा निकलती है
मगर ये बात बड़ी दूर जा निकलती है
सितम तो ये है कि अहद-ए-सितम के जाते ही
तमाम ख़ल्क़ मेरी हम-नवा निकलती है
विसाल-ओ-हिज्र की हसरत में जू-ए-कम-माया
कभी कभी किसी सहरा में जा निकलती है
मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी
तेरे लिए मेरे दिल से दुआ निकलती है
वो ज़िंदगी हो कि दुनिया ‘फ़राज़’ क्या कीजे
कि जिस से इश्क़ करो बेवफ़ा निकलती है
न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं
न पूछ जब वो गुज़रता है बे-नियाज़ी से
तो किस मलाल से हम नामा-बर को देखते हैं
तेरे जमाल से हट कर भी एक दुनिया है
ये सेर-चश्म मगर कब उधर को देखते हैं
अजब फ़ुसून-ए-ख़रीदार का असर है कि हम
उसी की आँख से अपने हुनर को देखते हैं
‘फ़राज़’ दर-ख़ुर-ए-सज्दा हर आस्ताना नहीं
हम अपने दिल के हवाले से दर को देखते हैं
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़
सो हम भी मो’जिज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं
सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं
सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं
सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं
सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं
वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं
रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं
किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
‘फ़राज़’ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
तरस रहा हूँ मगर तू नज़र न आ मुझ को
तरस रहा हूँ मगर तू नज़र न आ मुझ को
कि ख़ुद जुदा है तू मुझ से न कर जुदा मुझ को
वो कपकपाते हुए होंट मेरे शाने पर
वो ख़्वाब साँप की मानिंद डस गया मुझ को
चटख़ उठा हो सुलगती चटान की सूरत
पुकार अब तू मिरे देर-आश्ना मुझ को
तुझे तराश के मैं सख़्त मुन्फ़इल हूँ कि लोग
तुझे सनम तो समझने लगे ख़ुदा मुझ को
ये और बात कि अक्सर दमक उठा चेहरा
कभी कभी यही शो’ला बुझा गया मुझ को
ये क़ुर्बतें ही तो वजह-ए-फ़िराक़ ठहरी हैं
बहुत अज़ीज़ हैं यारान-ए-बे-वफ़ा मुझ को
सितम तो ये है कि ज़ालिम सुख़न-शनास नहीं
वो एक शख़्स कि शाएर बना गया मुझ को
उसे ‘फ़राज़’ अगर दुख न था बिछड़ने का
तो क्यूँ वो दूर तलक देखता रहा मुझ को
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चराग़
अपनी महरूमी के एहसास से शर्मिंदा हैं
ख़ुद नहीं रखते तो औरों के बुझाते हैं चराग़
बस्तियाँ दूर हुई जाती हैं रफ़्ता रफ़्ता
दम-ब-दम आँखों से छुपते चले जाते हैं चराग़
क्या ख़बर उन को कि दामन भी भड़क उठते हैं
जो ज़माने की हवाओं से बचाते हैं चराग़
गो सियह-बख़्त हैं हम लोग पे रौशन है ज़मीर
ख़ुद अँधेरे में हैं दुनिया को दिखाते हैं चराग़
बस्तियाँ चाँद सितारों की बसाने वालो
कुर्रा-ए-अर्ज़ पे बुझते चले जाते हैं चराग़
ऐसे बेदर्द हुए हम भी कि अब गुलशन पर
बर्क़ गिरती है तो ज़िंदाँ में जलाते हैं चराग़
ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि ‘फ़राज़’
रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़
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