Sunday, 24 May 2020

अगर तुम राधा होते श्याम मेरी तरह बस आठों पहर तुम...काजी नज़रुल इस्लाम


अविभाजित भारत में पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिला अंतर्गत चुरुलिया गांव में 24 मई 1899 को जन्‍मे और फिर बंग्लादेश के राष्ट्रीय कवि की उपाधि से विभूषित काजी नज़रुल इस्लाम न सिर्फ अग्रणी बांग्ला कवि बल्‍कि संगीतज्ञ, संगीतस्रष्टा और दार्शनिक भी थे.
वे बांग्ला भाषा के अन्यतम साहित्यकार और देशप्रेमी कवि थे. पश्चिम बंगाल और बंग्‍लादेश दोनों ही जगह उनकी कविता और गान को समान आदर प्राप्त है. उनकी कविता में विद्रोह के स्वर होने के कारण उनको ‘विद्रोही कवि’ के नाम से जाना जाता है. उनकी कविता का वर्ण्यविषय ‘मनुष्य के ऊपर मनुष्य का अत्याचार’ तथा ‘सामाजिक अनाचार तथा शोषण के विरुद्ध सोच्चार प्रतिवाद’.
उनकी प्राथमिक शिक्षा धार्मिक (मजहबी) शिक्षा के रूप में हुई. किशोरावस्था में विभिन्न थिएटर दलों के साथ काम करते-करते उन्होने कविता, नाटक एवं साहित्य के सम्बन्ध में सम्यक ज्ञान प्राप्त किया.
नजरुल ने लगभग तीन हजार गानों की रचना की तथा साथ ही अधिकांश को स्वर भी दिया. इनको आजकल ‘नजरुल संगीत’ या “नजरुल गीति” नाम से जाना जाता है. अधेड़ उम्र में वे ‘पिक्स रोग’ से ग्रसित हो गए जिसके कारण शेष जीवन वे साहित्यकर्म से अलग हो गए. बांग्‍लादेश सरकार के आमन्त्रण पर वे १९७२ में सपरिवार ढाका आये. उस समय उनको बंग्‍लादेश की राष्ट्रीयता प्रदान की गई। यहीं उनकी मृत्यु हुई.
दुक्खू मियां नाम क्यों पड़ा छुटपन में
काज़ी नज़रुल इस्लाम के पिता काज़ी फकीर अहमद इमाम थे. एक मस्जिद की देखभाल करते थे. नज़रुल बचपन में काफी खोए-खोए रहते थे. इसके चलते रिश्तेदार इन्हें ‘दुक्खू मियां’ पुकारने लगे.
नज़रुल ने शुरुआती तालीम में कुरआन, हदीस और इस्लामी फलसफे को पढ़ा. जब वो सिर्फ 10 साल के थे, उनके पिता की मौत हो गई. परिवार को सपोर्ट करने के लिए नजरूल पिता की जगह मस्जिद में बतौर केयरटेकर काम करने लगे. अज़ान देने का काम भी उनके जिम्मे था. इस काम को करने वाले को मुअज़्ज़िन कहते हैं. इसके अलावा वो मदरसे के मास्टरों के काम भी करते. अपनी तालीम भी इस दौरान उन्होंने जारी रखी.
पुराणों का चस्का लगा तो शुरू हुए नाटक
ईमान की तालीम के बाद बारी आई म्यूजिक और लिटरेचर की. नजरूल ने चाचा फ़ज़ले करीम की संगीत मंडली जॉइन कर ली. ये मंडली पूरे बंगाल में घूमती और शो करती. नजरूल ने मंडली के लिए गाने लिखे. इस दौरान बांग्ला भाषा को लिखना सीखा. संस्कृत भी सीखी. और उसके बाद कभी बांग्ला, तो कभी संस्कृत में पुराण पढ़ने लगे.
इसका असर उनके लिखे पर नजर आने लगा. उन्होंने कई प्ले लिखे जो हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित थे. मसलन, ‘शकुनी का वध’, ‘युधिष्ठिर का गीत’, ‘दाता कर्ण’.
मुअज्जिन फौजी बन कराची पहुंचा
1917 में नजरूल ने ब्रिटिश आर्मी जॉइन कर ली. 49वीं बंगाल रेजिमेंट में भर्ती हुई. कराची में तैनाती मिली. नाटक छोड़ वह फौज में क्यों गए?
इस सवाल का जवाब उन्होंने ही लिखा. एक रोमांच की तलाश और दूसरी उस वक्त की पॉलिटिक्स में दिलचस्पी.
कराची कैंट में नज़रूल के पास ज्यादा काम नहीं था. अपनी बैरक में बैठ वह खूब पढ़ते. लेख और कविताएं लिखते. शुरुआत मादरी जबान बंगाली से हुई. रबिन्द्रनाथ टैगोर से लेकर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय तक को पढ़ गए. फिर कराची की हवा लगी. जहां उर्दू का जलवा था. जो फारसी और अरबी से पैदा हुई तो नजरूल ने रेजिमेंट के मौलवी से फारसी सीखी. फिर इस जबान के महान साहित्यकारों, रूमी और उमर खय्याम को पढ़ा. दो साल पढ़ने के बाद नजरूल ने अपना लिखा छपाने की सोची. साल 1919 में उनकी पहली किताब आई. गद्य की. टाइटल था, ‘एक आवारा की ज़िंदगी’. कुछ ही महीनों के बाद उनकी पहली कविता ‘मुक्ति’ भी छपी.
नर्गिस से शादी क्यों नहीं की
1920 में जब बंगाल रेजिमेंट भंग कर दी गई, वह कलकत्ता आ बसे. जल्द ही उनकी नर्गिस नाम की एक लड़की से सगाई हो गई. वह उस जमाने के मशहूर प्रकाशक अली अकबर ख़ान की भतीजी थीं. 18 जून 1921 को शादी होना तय हुआ. शादी वाले दिन नज़रुल पर ख़ान ने दबाव डाला कि वह एक कॉन्ट्रैक्ट साइन करें. इसमें लिखा था, शादी करने के बाद नजरूल हमेशा दौलतपुर में ही रहेंगे. नज़रुल को कोई शर्त मंज़ूर नहीं थी, लिहाजा उन्होंने निकाह से इंकार कर दिया.
विद्रोही कवि नाम कैसे पड़ा
1922 में काजी की एक कविता ने उन्हें पॉपुलर कर दिया. इतना कि उनका नाम भी बदल गया. कविता का शीर्षक था, ‘विद्रोही’. ‘बिजली’ नाम की मैगज़ीन में ये छपी. इसमें बागी तेवर थे. जल्द ही कविता अंग्रेजी राज का विरोध कर रहे क्रांतिकारियों का प्रेरक गीत बन गई. इसका कई भाषाओं में अनुवाद भी हो गया. नतीजतन वो अंग्रेजों को खटकने लगे और जनता के बीच ‘विद्रोही कवि’ के नाम से मशहूर हो गए. 29 अगस्‍त 1976 को बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में निधन हो गया.
कृष्ण भजन भी लिखा
नज़रुल ने न सिर्फ इस्लामिक मान्यताओं को मूल में रखकर रचनाएं की, बल्कि भजन, कीर्तन और श्यामा संगीत भी रचा. दुर्गा मां की भक्ति में गाया जाने वाला श्यामा संगीत समृद्ध करने में क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम का बड़ा हाथ है. कृष्ण पर लिखे उनके भजन भी बहुत मशहूर हुए. पढ़िए उनके लिखे ऐसे ही एक भजन का हिंदी अनुवाद.
अगर तुम राधा होते श्याम
मेरी तरह बस आठों पहर तुम
रटते श्याम का नाम…
वन-फूल की माला निराली
वन जाति नागन काली
कृष्ण प्रेम की भीख मांगने
आते लाख जनम
तुम, आते इस बृजधाम…
चुपके चुपके तुमरे ह्रदय में
बसता बंसीवाला
और, धीरे धारे उसकी धुन से
बढ़ती मन की ज्वाला
पनघट में नैन बिछाए तुम,
रहते आस लगाए
और, काले के संग प्रीत लगाकर
हो जाते बदनाम…

Saturday, 23 May 2020

अन्नाराम सुदामा: ‘मेवे का रूंख’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने वाले राजस्थानी साह‍ित्यकार


राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार अन्नाराम सुदामा का जन्म 23 मई 1923 में हुआ था। सुदामा ने राजस्थानी भाषा में साहित्य की कई विधाओं में रचनांए की हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध, नाटक, यात्रा स्मरण एवं बाल साहित्य लिखा है। उन्होंने अन्य कई विधाओं में 25 से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं।


सुदामा जी का साहित्य अन्नाराम सुदामा समग्र के नाम से सात खण्डों में प्रकाशित किया गया था। सुदामा जी की साहित्यिक रचनांए विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। इनकी सबसे प्रमुख रचना का नाम है ‘मेवे का रूंख’ (मेवै रा रूंख) जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

रूणिया बड़ा बांस में इस बालक के जन्म के समय अच्छा जमाना हुआ तो अकाल से पीड़ित अन्न की किल्लत भुगत रहे परिजनों ने नाम अन्नाराम रख दिया। स्कूल में गुरूजन की सुदामा के नाम की उपमा से बाद नाम के पीछे सुदामा जुड़ गया। राजस्थानी में लोक विधा के विजयदान देथा के दौर के सुदामा ने मौलिक लेखन के साथ राजस्थानी को ऊंचाई दी। साहित्यकार डॉ. मदन सैनी ने सुदामा के साहित्य पर डाक्टरेट भी करवाई है।


सुदामा जी ने कई रचनाएं की हैं जिसमें मैकती कायाः मुलकती धरती, आंधी अर आस्था, डंकीजता मानवी, घर-संसार, अचूक इलाज, आंधे नै आंख्यां, अचूक इलाज, गॉंव रो गौरव, बंधती अंवलाई, दूर-दिसावर, पिरोल में कुत्ती ब्याई, व्यथा-कथा अर दूजी कवितावां इत्यादि। सुदामा जी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था जिसमें- केन्द्रीय साहित्य अकादमी दिल्ली में पुरस्कृत, मीरा पुरस्कार, सूर्यमल्ल मीसण, राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, टैसीटोरी गद्य पुरस्कार इत्यादि। अन्नाराम सुदामा का निधन 2 जनवरी 2004 में हुआ था।


राजस्थानी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में जिन महान रचनाकारों का योगदान है, उनमें अन्नाराम सुदामा का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। राजस्थान के ग्रामीण जनजीवन में नित्य होने वाली घटनाओं को वे अत्यंत पारखी नजर से देखते हुए गहरी सामाजिक चेतना से सराबोर रचनाएं लिखते थे और यही उनके लेखन की विशेषता थी।


राजस्थान के ग्राम्य जीवन की संवेदना, मानवीय सरोकार और विविध छवियां आप अन्नाराम सुदामा के साहित्य से गुजरे बिना देख ही नहीं सकते। वे राजस्थानी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिनके यहां अभावों में जीते मनुष्य की चेतना और विपरीत हालात से संघर्ष इतनी शिद्दत के साथ मौजूद होते हैं कि स्वयं पाठक भी एकबारगी लेखक और उसके 
अद्भुत जीवट वाले पात्रों के साथ खड़ा हो जाता है। 

अन्नाराम सुदामा के विपुल साहित्य में ‘सूझती दीठ, एक ऐसी कहानी है, जो अकाल से ग्रस्त एक सामान्य निर्धन ग्रामीण स्त्री के संघर्ष के बीच उसकी वैज्ञानिक दृष्टि को ही नहीं उसके नैतिक बल और साहस को बहुत गहराई के साथ रेखांकित करती है। पढ़े-लिखे पात्रों के माध्यम से चेतना जगाना आसान होता है, लेकिन सुदामा तो अपने निरक्षर पात्रों से ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समता-बंधुत्व की बात अत्यंत सहज रूप से पैदा कर देते हैं। इस एक कहानी से आप उनकी रचनात्मकता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।

अन्नाराम सुदामा
जन्मः 23 मई, 1923
शिक्षाः एम.ए.
कृतियां
उपन्यास- मैकती कायाः मुळकती धरती, आंधी अर आस्था, मैवै रा रूंख, डंकीजता मानवी, घर-संसार और अचूक इलाज
कहानी संग्रह- आंधै नै आंख्यां और गळत इलाज
कविता- पिरोळ में कुत्ती ब्याई, व्यथा-कथा अर दूजी कवितावां
यात्रा संस्मरण- दूर-दिसावर
नाटक- बंधती अंवळाई
बाल उपन्यास- गांव रो गौरव
सम्मान पुरस्कार
केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, सूर्यमल्ल मीसण पुरस्कार, मीरा सम्मान, सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान आदि कई पुरस्कार और सम्मान।

Wednesday, 20 May 2020

आज सुमित्रानंदन पंत के जन्‍मदिन पर पढ़िए उनकी दो कवितायें

आज तो सुमित्रानंदन पंत का जन्‍मदिन है, तो चलिए इसी बात पर हो जाए उनकी दो कविताऐं जो हमें अपनी जड़ों तक ले जायेंगी। वरना कौन ऐसा कर सकता है कि सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था….।
सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म उत्‍तराखंड के कौसानी, बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति,माथे पर पड़े हुए लंबे घुंघराले बाल,सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।
पहली कविता: तितली जिसका रचनाकाल: मई’१९३५ है…
नीली, पीली औ’ चटकीली
पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,
प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली
तुम किस सुख में हो रही डोल?
चाँदी-सा फैला है प्रकाश,
चंचल अंचल-सा मलयानिल,
है दमक रही दोपहरी में
गिरि-घाटी सौ रंगों में खिल!
तुम मधु की कुसुमित अप्सरि-सी
उड़-उड़ फूलों को बरसाती,
शत इन्द्र चाप रच-रच प्रतिपल
किस मधुर गीति-लय में जाती?
तुमने यह कुसुम-विहग लिवास
क्या अपने सुख से स्वयं बुना?
छाया-प्रकाश से या जग के
रेशमी परों का रंग चुना?
क्या बाहर से आया, रंगिणि!
उर का यह आतप, यह हुलास?
या फूलों से ली अनिल-कुसुम!
तुमने मन के मधु की मिठास?
चाँदी का चमकीला आतप,
हिम-परिमल चंचल मलयानिल,
है दमक रही गिरि की घाटी
शत रत्न-छाय रंगों में खिल!
–चित्रिणि! इस सुख का स्रोत कहाँ
जो करता निज सौन्दर्य-सृजन?
’वह स्वर्ग छिपा उर के भीतर’–
क्या कहती यही, सुमन-चेतन?
दूसरी कविता चींटी
चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।
गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।
चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।
वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।
सुमित्रानंदन पंत की इन दो ही कविताओं में अपना बचपन ढूढ़ने वाले हम उन्‍हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं।

Friday, 15 May 2020

प्रसिद्ध कहानीकार ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग की कहानी “पुर्जा”

ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग को स्वीडिश उपन्यास का जनक माना जाता है। 

ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग के प्रस‍िद्ध नाटक : मास्टर ओलोफ, द फादर (पिता), मिस जूलिया, क्रेडिटर्स (जिनका पैसा बकाया है) द डांस ऑफ डेथ (मृत्यु का नाच) आदि 60 नाटक

ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग के उपन्यास : अलोन (एकाकी), द रेड रूम (लाल कमरा),  बाइ द ओपेन सी (खुले सागर के किनारे) आदि 30 से ज्यादा उपन्यास

ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग के कहानी संग्रह : गेटिंग मैरिड (शादी करना), यूटोपियाज इन रियलिटी (वास्तविकताओं में स्वप्नलोक)

ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग की आत्मकथा : द सन ऑफ अ सर्वेंट (नौकर का बेटा)
ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग द्वारा ल‍िखा निबंध : ऑन साइकिक मर्डर (मानसिक मृत्यु के बारे में) साह‍ित्य जगत की थाती है। 

ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग का निधन 14 मई 1912 को हो गया । 


पढ़‍िए उनकी कहानी पुर्जा 

सामान की आखिरी खेप जा चुकी थी। किराएदार, क्रेपबैंड हैटवाला जवान आदमी, खाली कमरों में अंतिम बार पक्का करने के लिए घूमता है कि कहीं पीछे कुछ छूट तो नहीं गया। कुछ नहीं भूला, कुछ भी नहीं। वह बाहर सामने हॉल में गया। पक्का निश्चय करते हुए कि इन कमरों में जो कुछ भी उसके साथ हुआ वह उसे कभी याद नहीं करेगा। और अचानक उसकी नजर कागज के अधपन्ने पर पड़ी, जो पता नहीं कैसे दीवाल और टेलीफोन के बीच फ़ँसा रह गया था। कागज पर लिखावट थी। जाहिर है एक से ज्यादा लोगों की। कुछ प्रविष्टियाँ पेन और स्याही से बड़ी स्पष्ट थीं, जबकि बाकी दूसरी लेड पेंसिल से घसीटी हुई। यहाँ-वहाँ लाल पेंसिल का भी प्रयोग हुआ था। दो साल में उसके साथ इस घर में जो कुछ भी हुआ था, यह उन सबका रिकॉर्ड था। सारी चीजें, जिन्हें भूल जाने का उसने मन बनाया था, लिखी हुई थीं।



कागज के एक पुर्जे पर यह एक मनुष्य के जीवन का एक कतरा था।
उसने उस पेपर को निकाला; यह स्क्रिबलिंग पेपर का एक टुकड़ा था। पीला और सूरज की तरह चमकता हुआ। उसने उसे ड्राइंग रूम के कार्निश पर रख दिया और उस पर आँखें गड़ा दीं। लिस्ट के शीर्ष पर एक औरत का नाम था : ‘एलिस’। संसार में सबसे सुंदर नाम, जैसा उसे तब लगा था। क्योंकि यह उसकी मँगेतर का नाम था। नाम के बाद एक नंबर था : ‘1511’। लगता है यह बाइबिल के एक स्त्रोत का नंबर था, स्त्रोत बोर्ड पर। उसके नीचे लिखा था, ‘बैंक’। जहाँ उसका काम था, उसका पवित्र काम – जिसके द्वारा ही उसका मकान, उसकी रोटी और पत्नी, सब – उसके जीवन का आधार। परंतु शब्द पेन से कटा था। क्योंकि बैंक फेल हो गया था। हालाँकि उसने बाद में दूसरा काम पा लिया था। परंतु दुश्चिंता और बेचैनी के एक छोटे-से अंतराल के बाद।
अगली प्रविष्टि थी: ‘फूलों की दुकान और घोड़ों आदि का खर्च’। ये उसकी सगाई से संबंधित थे। जब उसकी जेबों में भरपूर पैसे थे।
तब आया, ‘फर्नीचर डीलर और पेपर हैंगर’। उसका घर सजाया जा रहा था। ‘फॉरवर्डिंग एजेंट’ – वे प्रवेश कर रहे थे। ‘ऑपेरा-हाउस का बॉक्स-ऑफ़िस, नंबर 50-50’ – उनकी नई-नई शादी हुई थी। इतवार की शामों को वे ऑपेरा जाते। उनके जीवन के खूब खुशी के दिन। जब वे शांत चुपचाप बैठते। उनकी आत्मा परी देश के सौंदर्य और लय में परदे के पीछे मिलती।
उसके पश्चात एक आदमी का नाम था, काटा हुआ। वह एक दोस्त हुआ करता था। उसकी जवानी का। एक आदमी जो सामाजिक तराजू पर बहुत ऊँचा चढ़ा, लेकिन गिरा। सफलता के मद में, सफलता से बिगड़ कर, गहन गर्त में। और फिर उसे देश छोड़ना पड़ा।
सौभाग्य इतना अस्थिर था!
अब, पति-पत्नी के जीवन में कुछ नया आया। अगली प्रविष्टि एक स्त्री की लिखावट में थी : नर्स। कौन-सी नर्स? हाँ, वही बड़े लबादे और सहानुभूतिपूर्ण चेहरेवाली। जो कभी ड्राइंग रूम से हो कर नहीं जाती बल्कि दालान से सीधे बेड रूम में जाती।
उसके नीचे लिखा था, डॉ. एल।
और अब, लिस्ट पर पहली बार कोई रिश्तेदार आया : ‘ममा’। यह उसकी सास थी। जो उनकी नई-नवेली खुशी को भंग न करने के लिए अब तक जानबूझ कर दूर थी। लेकिन अब उसकी जरूरत थी। वह आ कर खुश थी।
बहुत सारी प्रविष्टियाँ लाल और नीली पेंसिल से थीं: ‘नौकर रजिस्ट्री ऑफिस’ – नौकरानी छोड़ गई थी और एक नई को लगाना है। ‘केमिस्ट’ – हा! जीवन में कालिमा आ गई थी। डेयरी मिल्क का ऑर्डर दिया गया – ‘स्टेरेलाइज्ड दूध’!
‘कस्साई, किराना आदि।’ घर के काम टेलीफोन से हो रहे थे; मतलब मालकिन अपनी पोस्ट पर नहीं थी। नहीं, वह नहीं थी। वह लेटी हुई थी।
आगे क्या लिखा था वह पढ़ नहीं पाया। क्योंकि उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया; वह नमकीन पानी में से देखता हुआ एक डूबता हुआ आदमी था। फिर भी, वहाँ लिखा था, बहुत साफ़ : ‘अंडरटेकर – एक बड़ा ताबूत और एक छोटा ताबूत।’ और ‘धूल’ शब्द पद कोष्ठक में जुड़ा हुआ था।
पूरे रेकॉर्ड का यह अंतिम शब्द था ‘धूल’। धूल के साथ वह समाप्त हुआ! और ठीक-ठीक यही होता है जिंदगी में।
उसने पीला कागज लिया, उसे चूमा। कायदे से तहाया और अपनी पॉकेट में रख लिया।
दो मिनट में वह अपनी जिंदगी के दो वर्ष फिर से जी गया।
परंतु जब उसने घर छोड़ा वह हारा हुआ नहीं था। इसके विपरीत, एक प्रसन्न और गर्वित आदमी की तरह वह अपना सिर ऊँचा किए हुए था। क्योंकि वह जानता था कि जीवन की सर्वोत्तम चीजें उसे मिली थीं और उसे उन सब पर दया आई जिन्हें वे नहीं मिली थीं।

Friday, 24 April 2020

नील कुसुम से चांद का कुर्ता तक... द‍िनकर ही द‍िनकर

रामधारी सिंह 'दिनकर' : कवि जो सत्ता के करीब रहकर भी कभी जनता से दूर नहीं हुआ, आज उनकी पुण्यत‍िथ‍ि है ।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी के उन गिने-चुने कवियों में से हैं जिनकी पंक्तियों को किसानों और मजदूरों ने भी कहावतों की तरह इस्तेमाल किया। अहिंदी भाषा-भाषियों के बीच भी वे उतने ही लोकप्रिय थे। पुरस्कारों की झड़ी भी उनपर खूब होती रही, उनकी झोली में गिरनेवाले पुरस्कारों में बड़े पुरस्कार भी बहुत रहे - साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मविभूषण, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार इस बात की तस्दीक खुद करते हैं। बावजूद इसके वे धरती से जुड़े लोगों के मन को भी उसी तरह छूते रहे।

हिंदी साहित्य के इतिहास में कि ऐसे लेखक बहुत कम हुए हैं जो सत्ता के भी करीब हों और जनता में भी उसी तरह लोकप्रिय हों। जो जनकवि भी हों और साथ ही राष्ट्रकवि भी। दिनकर का व्यक्तित्व इन विरोधों को अपने भीतर बहुत सहजता से साधता हुआ चला था। वहां अगर भूषण जैसा कोई वीर रस का कवि बैठा था, तो मैथिलीशरण गुप्त की तरह लोगों की दुर्दशा पर लिखने और रोनेवाला एक राष्ट्रकवि भी। हालंकि दिनकर छायावाद के तुरंत बाद के कवि थे पर आत्मा से वे हमेशा द्विवेदीयुगीन कवि रहे।

दिनकर और हरिवंशराय बच्चन दोनों समकालीन थे. समकालीनों के बीच की जलन और प्रतिस्पर्धा किसी के लिए भी छिपी हुई बात नहीं। पर दिनकर ऐसे कवि थे जो अपने समकालीनों के बीच भी उतने ही लोकप्रिय थे। दिनकर को जब उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ मिला तो इसपर बच्चन जी का जवाब था, ‘दिनकर जी को एक नहीं बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी के सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ मिलने चाहिए थे।’

ओजस्वी दिनकर जिन्दगी में रूमानी और साफ दिल थे, जिसका उदहारण सिर्फ ‘रसवंती’, ‘उर्वशी’ ही नहीं, वे सारी स्त्रियां भी हैं, जो क, ख, ग के नाम से उनकी डायरी में वर्णित हैं। यह उनकी साफदिली ही थी कि डायरी के प्रकाशन के समय उन्होंने इसे हटाया नहीं, बल्कि वे तो चाहते थे स्त्रियों का असल नाम यहां दिया जाए पर उनके कुछ लेखक मित्रों के सुझाव से इन नामों को क, ख, ग की शक्ल अख्तियार करनी पड़ी। वे मानते थे, ‘जब हम और आप एक ही नाव के सवार हैं तो शर्म कैसी और झिझक कैसी?’

आज पढ़‍िए उनकी यही देानों कव‍िताऐं -

1. नील कुसुम

‘‘है यहाँ तिमिर, आगे भी ऐसा ही तम है,
तुम नील कुसुम के लिए कहाँ तक जाओगे ?
जो गया, आज तक नहीं कभी वह लौट सका,
नादान मर्द ! क्यों अपनी जान गँवाओगे ?

प्रेमिका ! अरे, उन शोख़ बुतों का क्या कहना !
वे तो यों ही उन्माद जगाया करती हैं;
पुतली से लेतीं बाँध प्राण की डोर प्रथम,
पीछे चुम्बन पर क़ैद लगया करती हैं।

इनमें से किसने कहा, चाँद से कम लूँगी ?
पर, चाँद तोड़ कर कौन मही पर लाया है ?
किसके मन की कल्पना गोद में बैठ सकी ?
किसकी जहाज़ फिर देश लौट कर आया है ?’’

ओ नीतिकार ! तुम झूठ नहीं कहते होगे,
बेकार मगर, पागलों को ज्ञान सिखाना है;
मरने का होगा ख़ौफ़, मौत की छाती में
जिसको अपनी ज़िन्दगी ढूँढ़ने जाना है ?

औ’ सुना कहाँ तुमने कि ज़िन्दगी कहते हैं,
सपनों ने देखा जिसे, उसे पा जाने को ?
इच्छाओं की मूर्तियाँ घूमतीं जो मन में,
उनको उतार मिट्टी पर गले लगाने को ?

ज़िन्दगी, आह ! वह एक झलक रंगीनी की,
नंगी उँगली जिसको न कभी छू पाती है,
हम जभी हाँफते हुए चोटियों पर चढ़ते,
वह खोल पंख चोटियाँ छोड़ उड़ जाती है।

रंगीनी की वह एक झलक, जिसके पीछे
है मच हुई आपा-आपी मस्तानों में,
वह एक दीप जिसके पीछे है डूब रहीं
दीवानों की किश्तियाँ कठिन तूफ़ानों में।

डूबती हुई किश्तियाँ ! और यह किलकारी !
ओ नीतिकार ! क्या मौत इसी को कहते हैं ?
है यही ख़ौफ़, जिससे डरकर जीनेवाले
पानी से अपना पाँव समेटे रहते हैं ?

ज़िन्दगी गोद में उठा-उठा हलराती है
आशाओं की भीषिका झेलनेवालों को;
औ; बड़े शौक़ से मौत पिलाती है जीवन
अपनी छाती से लिपट खेलनेवालों को।

तुम लाशें गिनते रहे खोजनेवालों की,
लेकिन, उनकी असलियत नहीं पहचान सके;
मुरदों में केवल यही ज़िन्दगीवाले थे
जो फूल उतारे बिना लौट कर आ न सके।

हो जहाँ कहीं भी नील कुसुम की फुलवारी,
मैं एक फूल तो किसी तरह ले जाऊँगा,
जूडे में जब तक भेंट नहीं यह बाँध सकूँ,
किस तरह प्राण की मणि को गले लगाऊँगा ?

2. हर क‍िसी को बचपन की याद द‍िलातीं , दादी नानी के मुंह से चांद की इबारतें , आप भी बचपन को महसूस कीज‍िए - चांद का कुर्ता

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,
‘‘सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।’’

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएँ,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?’’

-अलकनंदा स‍िंंह

Thursday, 23 April 2020

Shakespeare Day को फेस्टिवल की तरह मनाते हैं साहित्‍य के शौकीन

किताबों, साहित्‍य के शौकीनों के लिए आज का दिन किसी फेस्टिवल से कम नहीं। दुनिया के सबसे बेहतरीन नाटककार विलियम शेक्सपियर की याद में हर साल इस दिन को Shakespeare Day के रूप में मनाते हैं।
उनकी डेट ऑफ बर्थ को लेकर कन्‍फ्यूजन है मगर परंपरागत रूप से उसे 23 अप्रैल को मनाया जाता है। इस महान लेखक ने दुनिया को अलविदा भी ने 23 अप्रैल 1616 को कहा था। UNESCO ने 1995 में इस दिन को World Book and Copyright Day के रूप में मनाने का फैसला किया। 38 नाटक और 154 सॉनेट लिखने वाले शेक्‍सपियर खुद भी परफॉर्म किया करते थे। Hamlet, King Lear, Othello, Macbeth और Romeo and Juliet कुछ वो कालजयी नाटक हैं, जिनकी वजह से शेक्‍सपियर को इतना ऊंचा दर्जा मिला है।
आइए जानते हैं साहित्‍य के इस सितारे के बारे में कुछ खास बातें-
बेहद कम शब्‍दों में रची अपनी दुनिया
विलियम शेक्‍सपियर जिस दौर में लिख रहे थे, उस दौर में अंग्रेजी का कोई मानक नहीं था। एक शब्‍द की अलग-अलग स्‍पेलिंग प्रचलित थीं। उन पर रिसर्च करने वाले डेविड क्रिस्‍टल के मुताबिक उस वक्‍त अंग्रेजी में कोई डेढ़ लाख शब्‍द हुआ करते थे। शेक्‍सपियर ने अपनी किताबों में करीब 30 हजार अलग-अलग शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया है। हालांकि इनमें एक ही शब्‍द के कई रूप शामिल हैं। क्रिस्‍टल मानते हैं कि शेक्‍सपियर की वकॅबुलरी करीब 20 हजार शब्‍दों की रही होगी। हाई स्‍कूल में बढ़ने वाले एक आम इंसान की वकॅबुलरी में भी 30 से 40 हजार शब्‍द होते हैं। ऐसे में इतने कम शब्‍दों में ऐसे नाटक लिख पाना, शेक्‍सपियर इसीलिए साहित्‍य जगत में सबसे महान नाटककार माने जाते हैं।
शादी से पहले ही गर्भवती थी पत्‍नी
शेक्‍सपियर जब सिर्फ 18 साल के थे, तब उन्‍होंने एन्‍ने से शादी की। एन्‍ने उस वक्‍त 26 साल की थीं और तीन महीने की गर्भवती थीं। शादी के छह हफ्तों बाद, उनके पहले बच्‍चे सुजैना का जन्‍म हुआ। इसके बाद जुड़वां बच्‍चे भी हुए। खुद शेक्‍सपियर सात भाई-बहन थे।
एक्‍टर भी थे शेक्‍सपियर
शेक्‍सपियर ने बतौर परफॉर्मर भी काम किया। वह ‘लॉर्ड चेम्‍बरलेंस मेन’ नाम की एक कंपनी के को-ओनर भी थे। अपने कई नाटकों में शेक्‍सपियर ने खुद एक्टिंग की।
असल इवेंट्स पर बेस्‍ड हैं कई नाटक
शेक्‍सपियर के कई नाटक ऐतिहासिक घटनाओं, तथ्‍यों पर आधारित हैं। वह कई साथी सच्‍ची घटनाओं को ड्रामेटाइज करके पेश करते थे। मिसाल के तौर पर हैमलेट, स्‍कैंडिनीविया की किवदंती- एमलेथ पर आधारित है।
तीन तरह के नाटक लिखे
शेक्‍सपियर के नाटकों को तीन हिस्‍सों में बांटा जा सकता है। उन्‍होंने कॉमेडी, ट्रेजडी के अलावा हिस्‍ट्री जॉनर में भी हाथ आजमाया।
इंगलिश को दिए नए शब्‍द
शेक्‍सपियर ने नए शब्‍दों को लेकर खूब प्रयोग किया था। एक अनुमान के मुताबिक उन्‍होंने अंग्रेजी भाषा को 1,700 से 3,000 शब्‍द दिए। उन्‍होंने कई सारे वाक्‍यांश और मुहावरे भी चलन में ला दिए।
अपना नाम ठीक से नहीं लिखते थे शेक्‍सपियर
शेक्‍सपियर ने कभी अपने नाम की स्‍पेलिंग ठीक से नहीं लिखे। अक्‍सर वह “Willm Shakp” के नाम से दस्‍तखत किया करते थे। अपनी वसीयत में उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को केवल एक बिस्‍तर दिया।

Wednesday, 22 April 2020

पृथ्‍वी दिवस पर सुमित्रानंदन पंत की मशहूर कविता

छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत का जन्‍म बागेश्‍वर (उत्तराखंड) के कौसानी में हुआ था। वहां का उनका घर आज ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय बन चुका है। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या तक सब उनके सहज काव्य का उपादान बने।
आज पृथ्‍वी दिवस पर सुमित्रानंदन पंत की वो मशहूर कविता पढ़िए जो बहुत प्रासांगिक है-
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल-फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडे बिछाकर
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था।
अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तबसे
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन
और जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हो
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में
टहल रहा था, तब सहसा, मैंने देखा
उसे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से
देखा-आँगन के कोने में कई नवागत
छोटे-छोटे छाता ताने खड़े हुए हैं
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं प्यारी
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चों से
निर्निमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता
सहसा मुझे स्मरण हो आया,कुछ दिन पहले
बीज सेम के मैंने रोपे थे आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधो की यह पलटन
मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से,
नन्हें नाटे पैर पटक, बढ़ती जाती है।
तब से उनको रहा देखता धीरे-धीरे
अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियाँ,
हरे-भरे टंग गये कई मखमली चँदोवे
बेलें फैल गयी बल खा, आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाड़े की पट्टी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को
मैं अवाक रह गया-वंश कैसे बढ़ता है
छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छीटे
झागों-से लिपटे लहरों श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से,
चोटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से।
ओह, समय पर उनमें कितनी फ़लियाँ फूटी
कितनी सारी फ़लियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ
पतली चौड़ी फलियाँ! उफ उनकी क्या गिनती
लम्बी-लम्बी अँगुलियों – सी नन्हीं-नन्हीं
तलवारों-सी पन्ने के प्यारे हारों-सी,
झूठ न समझे चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़तीं,
सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल
झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी
आह इतनी फलियाँ टूटीं, जाड़ों भर खाई,
सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटबाई
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने
जी भर-भर दिन-रात महुल्ले भर ने खाई
कितनी सारी फ़लियाँ, कितनी प्यारी फ़लियाँ
यह धरती कितना देती है! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्व को
बचपन में स्वार्थ, लोभ-वश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं
इसमें मानव-ममता के दाने बोने हैं
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की- जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ-
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
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