Wednesday, 12 November 2014

षडयंत्र तो भुनते हैं..

उसके पैर बंधे थे, उसके हाथ बांध दिये गये थे,
सिर से पांव तक गहनों से ,
जैसे ठोक दिया गया हो कीला किसी पत्‍थर में
उसके तन को...नहीं, नहीं,
मन पर भी चिपका दिया गया था कीला
इसीलिए वह मौन थी हजारों वर्षों से,

आज जब समय को...उसकी आवाज सुनानी थी
कुछ नया करना था उत्‍तेजक सा...
दिखाना था उसके जीते-जागते होने का सबूत
इसीलिए अनेक राम आये, बन के उद्धारक उसके
दावा करते महान उद्धारक होने का...सो इसीलिए !

वह चुप थी किसी भी तरह बोलती ना थी,
उसके बिना बोले फिर....
उद्धारक होने का कौन देता लाइसेंस उनको,
सो उसके मौन का इलाज खोज लिया गया
बड़ा विध्‍वंसक था जो, उन्‍हीं की बुद्धि की तरह,

आग के बीच उस मौनमूर्ति को बिठाया,
बंधे हाथ, बंधे पैर और लंबे मौन के संग
वह...गुर्राई, आग के पास आते जाने पर ...
वो लेने लगी लंबी लंबी सांसें जोर से...
आंखें निकाल आग को डराने लगी
फूंक मार कर बुझाने लगी कभी...

पास पहुंचती आग, इससे पहले ही
वह जोर से चीखी...तेज आवाज के साथ
एक विस्‍फोट हुआ ,
अपनी ही आवाज को सुनने का विस्‍फोट...
मौन तो टूटा, मगर मौन ने ही उगल दिए
उद्धारकों के सभी षडयंत्र ,
उसे बंधनमुक्‍त कराने के स्‍वार्थ,
वो आग जो लगाई थी आजादी के नाम पर,
उद्धारकों के अपने चेहरे उसमें भुन रहे थे...
सच्‍चाई तप कर सोना बनती है मगर
षडयंत्र ....षडयंत्र तो भुनते हैं...स्‍याह होते हैं
इसीलिए दबे रहने दो स्‍त्री-स्‍वतंत्रता के शब्द
ये उखड़ेंगे तो स्‍याह होती तुम्‍हारी सूरतें
बहुत कुछ उगल देंगीं तुम्‍हारी सब हकीकतें।

 - अलकनंदा सिंह


Wednesday, 1 October 2014

पाइपलाइन में रिसाव ...

सुबह सुबह खबर मिली है कि...
कभी शहर की तरक्‍की के लिए अंग्रेजों ने
बिछाई थी जो पाइपलाइन पानी की-
आज वो फटकर रिस रही है...
खबर ये भी मिली है कि-
पानी के रिसाव से फट रहे हैं ,
मकान-दुकान-पुराने किले और दरी-दरवाजे।

मगर इस खबर के संग संग ही...
मेरी यादों में रिस रहा है वो समय भी,
कि जब शहर के बीचोंबीच बिछी इन्‍हीं पाइपलाइनों में,
बहते हुए तैरती थीं खुश्‍बुऐं मोहल्‍ले की- गलियों की,
प्‍यार की-  मनुहार की , बनते - बिगड़ते रिश्‍तों की
भरते हुए पानी के संग होती थी बहसें, चुहलबाजियां...
विस्‍मृत न होने वाली तैरती थीं कितनी  स्‍मृतियां भी।

आज फटते हुए मकानों में
जो बन  गई हैं खाइयां गहरी सी ,
रिसती आ रही हैं उनमें से वो सभी यादें,
वो बातें कि कैसे अधेड़ बाबा से ब्‍याही गई
दस साल की दादी, और दादी के
मुंह से ही सुनना उन्‍हीं की गौने की बातें,
गोदभराई, बच्‍चों की पैदाइश तक...सबकुछ।

रिसते पानी के संग वो सब भी रिस रहा है...
इन फटते पुराने मकानों से- बनती खाइयों से,
जर्जर होती यादों में आज फिर से 
वो ध्‍वनियां गूंज रही हैं कि कैसे-
गली-नुक्‍कड़ की दुकान के फड़ों पर बैठकर
उगाये जाते थे ठट्ठे कतई बेलौस होकर,
कभी गालों को दुखा देते थे जो... अपने इन्‍हीं ठट्ठों से,
आज वो सब यकायक मौन क्‍यों हैं,
चकाचौंध की धुंध चीर वो क्‍यों नहीं आगे आते...।

मन करता है धकेल दूं
फटी पाइपलाइन से परे, उन-
राज-मिस्‍त्रियों को... जो मरम्‍मत में जुटे हैं,
कह दूं कि रिसने दो इन्‍हें,
ये जर्जर हैं... बूढ़ी हैं...
मगर जीवित हैं... अब भी हमारी सांसों में,
सालों से बह रही हैं हमारा जीवन बनकर,
अरे, मिस्‍त्रियों !  ये पाइपलाइन सिर्फ पानी की नहीं है..
रिश्‍तों की, खुश्‍बू की, गलियों की, ठट्ठों की
न जाने कितनी पाइपलाइन हैं...वे भी सब फट रही हैं।

आज वो सब रिस रहा है ...इनके सहारे,
कि हम भूल गये हैं मन में झांकना, और
झांककर देखना कि आखिरी बार कब...
कब दबाये थे मां के सूखे ठूंठ होते पैर,
जिनकी बिवांइयों से झांक रही हैं,
पानी के रिसाव से फट चुके मकानों की पुरानी तस्‍वीर,
तस्‍वीरों में बहते रिश्‍तों का नमक-चीनी सब ।

- अलकनंदा सिंह

Tuesday, 2 September 2014

अशब्‍दिता

नि:शब्‍द होना किसी का,
अशब्‍द होना तो नहीं होता
और अशब्‍द होते जाना,
प्रेमविहीन होते जाने से
बहुत अलग होता है।

मन की तरंगों पर डोलते
अनेक शब्‍द,
ढूढ़ते हैं किनारे...पर...!
कोई शब्‍द इन किनारों पर
अपना लंगर नहीं डालता

और प्रेम...स्‍वयं प्रेमविहीन सा
हर बार  अकड़कर खड़ा होता जाता है,
उस किनारे तक पहुंचने के लिए
जहां मैं और तुम...
प्रेमविहीन, रंगहीन, स्‍वादहीन
होकर, विलीन हो जायें,
उस आग में... जहां सभी शब्‍द
जल जायें, भाप हो जायें, उड़ जायें
हमेशा हमेशा तक अशब्‍दिता पर
प्रेम बनकर जम जाने के लिए।
- अलकनंदा सिंह

Saturday, 30 August 2014

छूट गये दर्ज़ होने से

हर्फ़ ब हर्फ़ जिंदगी
उतरती गई पन्‍नों पर
और पन्‍नों के कोनों में दर्ज
होती गईं हमारी खुश्‍बुएं
हमारे झगड़े, हमारी मोहब्‍बतें,
हमारा सूनापन, हमारे जज्‍़बात,
हमारा गुस्‍सा, वो सबकुछ
जो हमारे पास था
पन्‍नों में दर्ज़ होता गया, होता रहा लगातार,
और इस दर्ज़ होते सफ़र में
हम ही छूट गये दर्ज़ होने से
- अलकनंदा सिंह

Saturday, 26 July 2014

किसके हस्‍ताक्षर हैं ये

वो आवाजें जो गूंजती हैं रातों को
बिछा देती हैं कुछ करवटें अपने अहं की
वो आंखें जो देती हैं सूरतों पर निशान
वो  प्रेम के ही अस्‍तित्‍व की चिता बुनती हैं

हिम्‍मतें भी जोर से उछलती हैं अंतर्मन में
ढूढ़ती अपने ही अस्‍तित्‍व को
देखती रहती हैं राह बुढ़ापे की
कि शायद तब तक तो ठंडा हो जायेगा
तुम्‍हारे उस अप्रेम प्रेम का दावा
जो अकाल में ही चबा गया है प्रेम को,
अस्‍तित्‍व को, धर्म को , विश्‍वास को
तुम्‍हारे विश्‍वास को अपनी श्रद्धा का
 आचमन कहां दे पाई मैं देखो तो...

गर्व से जब तुम्‍हारा सीना फूलता है
तब मेरी सांसें अंतिम यात्रा का,
करती हैं इंतजार ...क्‍योंकि,
प्रेम से अहं पर
विजय पाने की कला
अब तक नहीं सीखी जा सकी

 भ्रम था तुम्‍हारी हथेलियों में आने का
तुम्‍हारे ह्रदय में समाते चले जाने का
या थी वो प्रेम की मृगतृष्‍णा मेरी
कि मैं नहीं दे पाई तुम्‍हें
अपने प्रेम का प्रमाणपत्र
जिसपर तुम करते अपने हस्‍ताक्षर

मगर देखो कोरे कागज में ही दर्ज़ होती हैं
प्रेम की  अनेक गाथायें-निर्बलतायें
हस्‍ताक्षरविहीन कागज तुम्‍हारे घर की ओर
उड़ा दिया है मैंने कबका....
-अलकनंदा सिंह

Wednesday, 23 July 2014

उन्‍मुक्‍त वसन




उन्‍मुक्‍त वसन में प्रेम गहन,
कुछ कम मिलता है
देह धवल में काला मन
अक्‍सर दिखता है

जो दिखे नहीं वही बीज
अंकुर दे पाता है
तन जल जाता पर मन को
कौन जला पाता है

अभी और कितनी यात्रायें हमको
करनी हैं यूं ही शब्‍दों पर चलकर
अंकुर से पहले जो जड़ था
चैतन्‍य उसे अब करना है
उर में बैठे श्‍वासों को
निज मान के रस से रचकर
बस कैसे भी अविरल
सिंचित करते रहना है

 -    अलकनंदा सिंह

Sunday, 13 July 2014

तुम यहीं हो...

ये आहटें,ये खुश्‍बुएं,ये हवाओं का थम जाना,
बता रहा  है कि तुम यहीं हो सखा,
मेरे आसपास...नहीं नहीं...
मेरे नहीं मेरी आत्‍मा के पास
मन के बंधन से मुक्‍त
तन के बंधन भी कब के हुए विलुप्‍त
....छंद दर छंद पर तुम्‍हारी सीख कि
धैर्य से जीता जा सकता है सबकुछ
रखती हूं धैर्य भी पर....
जीवन की निष्‍प्राणता से तनिक
चिंतायें उभर आती हैं कि
हे सखा तुमसे  मिलने के लिए
क्‍या....शरीर त्‍यागना जरूरी है

- अलकनंदा सिंह
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