“भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने बचपन में स्कूल की प्रार्थना के दौरान ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ न गाया हो। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि इस अमर प्रार्थना को लिखने वाला कवि किन संघर्षों, टूटे सपनों और गहरे दर्द से गुज़रा था? क्या यह महज़ एक फिल्मी गीत था, या एक ऐसे इंसान की आत्मा की पुकार जिसने जीवन के हर मोड़ पर संघर्ष को गले लगाया? यह कहानी सिर्फ एक गीतकार की नहीं, बल्कि उस कलम की है जिसने दर्द को शब्दों में बदलकर उसे अमर कर दिया।”
एक ऐसा गीत, जो फिल्म से निकलकर करोड़ों बच्चों की प्रार्थना बन गया
साल 1957। भारतीय सिनेमा में कई शानदार फिल्में बन रही थीं, लेकिन किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वी. शांताराम की फिल्म “दो आंखें बारह हाथ” का एक गीत आने वाले सात दशकों तक देश के हजारों स्कूलों की सुबह का हिस्सा बन जाएगा। यह गीत था “ऐ मालिक तेरे बंदे हम”। यह केवल एक फिल्मी गीत नहीं था, बल्कि इंसानियत, आत्मचिंतन और सुधार की ऐसी प्रार्थना थी जिसने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं को पार कर लिया। फिल्म में यह गीत उन अपराधियों की आत्मा की आवाज़ बनकर सामने आया जो अपने भीतर के अंधकार से लड़ना चाहते थे। लता मंगेशकर की निर्मल आवाज़, वसंत देसाई का मधुर संगीत और भरत व्यास की आध्यात्मिक लेखनी ने मिलकर ऐसा इतिहास रचा, जो आज भी जीवित है। लेकिन इस अमर रचना के पीछे खड़े कवि का नाम धीरे-धीरे लोगों की यादों से धुंधला पड़ गया। करोड़ों लोग गीत गाते रहे, पर बहुत कम लोगों ने उसके रचनाकार को याद रखा।
कौन थे भरत व्यास? वह कवि, जिसने शब्दों को पूजा बना दिया
6 जनवरी 1918 को राजस्थान के बीकानेर में जन्मे भरत व्यास का बचपन किसी राजसी वैभव में नहीं, बल्कि संघर्षों के बीच बीता। बहुत छोटी उम्र में माता-पिता का साया सिर से उठ गया। उनका पालन-पोषण उनके विद्वान दादा पंडित घनश्याम दास व्यास ने किया। दादा ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने बालक भरत की कुंडली देखकर भविष्यवाणी की थी कि यह बच्चा एक दिन पूरे देश में अपना नाम करेगा। शायद तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह भविष्यवाणी एक दिन हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में सच साबित होगी।
भरत व्यास बचपन से ही शब्दों के प्रेमी थे। स्कूल की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते, कविताएँ लिखते और धार्मिक नाटकों में अभिनय करते। कृष्ण लीला में कभी स्वयं कृष्ण बनते तो कभी उनके छोटे भाई गोपी की भूमिका निभाते। शब्दों और मंच से उनका रिश्ता यहीं से शुरू हुआ। लेकिन जीवन ने उनके लिए आसान रास्ता नहीं चुना था।
रात का चौकीदार… जो अंधेरे में कविताएँ लिखा करता था
उच्च शिक्षा के लिए भरत व्यास को कोलकाता भेजा गया। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि आराम से पढ़ाई हो सके। दिन में कॉलेज, दोपहर में ट्यूशन और रात में एक सुनसान कंपनी में चौकीदारी—यही उनकी दिनचर्या थी। रात के गहरे सन्नाटे, चारों ओर फैला अंधेरा और अकेलापन अक्सर उनके मन में भय पैदा करता। लेकिन वही अंधेरा धीरे-धीरे उनकी कविताओं का साथी बन गया।
इन्हीं रातों में उनके मन से एक पंक्ति निकली—“निर्बल से लड़ाई बलवान की, ये कहानी है दिए की और तूफान की।” वर्षों बाद यही कविता वी. शांताराम की फिल्म “तूफान और दिया” का आधार बनी। यह केवल गीत नहीं था, बल्कि उस युवक की आत्मकथा थी जो जीवन के तूफानों से लड़ते हुए भी उम्मीद का दीपक बुझने नहीं देना चाहता था।
मुंबई… जहां सपने बिकते भी हैं और टूटते भी हैं
फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर भरत व्यास मुंबई पहुंचे। लेकिन यह सफर किसी फिल्मी कहानी जैसा आसान नहीं था। उन्होंने और उनकी पत्नी ने घर के बर्तन तक बेच दिए ताकि मुंबई आने का किराया जुट सके। मलाड की एक छोटी-सी खोली में पंद्रह रुपये महीने के किराए पर रहने लगे। उनके पास कविताओं का खजाना था, लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं।
उन्होंने अपनी कविताओं की पुस्तकें छपवाईं। उन्हें उम्मीद थी कि लोग पढ़ेंगे, सराहेंगे और उनका संघर्ष खत्म होगा। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। किताबें बिकने से पहले ही दीमकों ने चाट डालीं। जिस इंसान ने शब्दों में अपना भविष्य देखा था, उसकी मेहनत को दीमकों ने खा लिया। यह किसी लेखक के लिए सबसे बड़ा मानसिक आघात था।
जब एक कवि सम्मेलन ने उन्हें सिखाया कि सम्मान और भुगतान अलग-अलग चीज़ें हैं
संघर्ष जारी था। एक दिन एक बड़े उद्योगपति के घर आयोजित कवि सम्मेलन में उन्हें विशेष अतिथि के रूप में बुलाया गया। शानदार स्वागत हुआ। फूल-मालाएँ पहनाई गईं। लोगों ने खूब तालियाँ बजाईं। स्वादिष्ट भोजन कराया गया। भरत व्यास को लगा कि शायद अब उनकी किस्मत बदलने वाली है।
लेकिन जब कार्यक्रम समाप्त हुआ और वे बाहर निकले, तो न आयोजक थे, न उन्हें घर छोड़ने वाली गाड़ी और न ही मेहनताना। जेब में केवल एक अठन्नी थी। उसी से दादर तक तांगा किया और फिर दादर से मलाड तक पूरी रात पैदल चलते रहे।
उस रात रास्ते भर उनके भीतर एक कविता जन्म ले रही थी। बाद में यही कविता फिल्म “नवरंग” में अमर हुई—
“कविराजा कविता के मत अब कान मरोड़ो,
धंधे की कुछ बात करो, कुछ पैसे जोड़ो…”
यह व्यंग्य नहीं था, बल्कि उस कवि का दर्द था जिसे समाज सम्मान तो देता था, लेकिन उसके श्रम की कीमत नहीं।
जिस प्रार्थना ने भारत की आत्मा को छू लिया
1957 में वी. शांताराम अपनी फिल्म “दो आंखें बारह हाथ” बना रहे थे। कहानी एक ऐसे जेलर की थी जो अपराधियों को सज़ा नहीं, सुधार का अवसर देना चाहता था। इस दृश्य के लिए एक ऐसे गीत की आवश्यकता थी जो केवल भगवान से प्रार्थना न हो, बल्कि इंसान को अपने भीतर झाँकने के लिए मजबूर कर दे।
यह जिम्मेदारी भरत व्यास को मिली।
उन्होंने लिखा—
“ऐ मालिक तेरे बंदे हम…”
ये शब्द किसी धर्म विशेष की प्रार्थना नहीं थे। इनमें इंसानियत थी, करुणा थी, आत्मसंयम था और जीवन का दर्शन था। संगीतकार वसंत देसाई ने इसे स्वर दिए और लता मंगेशकर की आवाज़ ने इसे अमर बना दिया।
फिल्म रिलीज़ हुई, दर्शकों ने गीत को अपनाया, और धीरे-धीरे यह स्कूलों की प्रार्थना बन गया। शायद स्वयं भरत व्यास ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके लिखे शब्द आने वाली कई पीढ़ियों के बचपन का हिस्सा बन जाएंगे।
लेकिन दुनिया जिस गीत को भगवान की प्रार्थना समझती रही… उसके पीछे खड़ा कवि खुद जीवन से लड़ रहा था
जब लोग “ऐ मालिक तेरे बंदे हम” गा रहे थे, उसी समय भरत व्यास अपने निजी जीवन में ऐसे संघर्षों से गुजर रहे थे जिनकी कल्पना भी आसान नहीं। आर्थिक संकट, असफलताएँ, टूटते सपने और आगे चलकर बेटे के बिछड़ने का दर्द—इन सबने उनकी कलम को और गहरा बना दिया।
जब एक पिता का संसार अचानक बिखर गया
साल 1956-57 का दौर भरत व्यास के जीवन का सबसे कठिन समय था। उनके इकलौते बेटे श्यामसुंदर व्यास किसी बात से नाराज़ होकर घर छोड़कर चले गए। परिवार ने हर संभव कोशिश की। रिश्तेदारों से पूछताछ हुई, मित्रों से संपर्क किया गया, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। हर गुजरते दिन के साथ एक पिता की चिंता बढ़ती गई।
रातें जागते हुए कटतीं, दिन बेचैनी में बीतते। हर दरवाजे की दस्तक पर उन्हें लगता कि शायद बेटा लौट आया होगा। लेकिन हर बार उम्मीद टूट जाती। जिस व्यक्ति ने दूसरों की भावनाओं को शब्द दिए थे, वह खुद अपने दर्द को किसी से कह नहीं पा रहा था। अंततः उन्होंने वही किया जो एक कवि कर सकता है—अपने आँसुओं को कागज़ पर उतार दिया।
उन्होंने लिखा—
“ज़रा सामने तो आओ छलिए, छुप-छुप छलने में क्या राज़ है…”
दुनिया ने इसे प्रेमी-प्रेमिका का गीत समझा, लेकिन वास्तव में यह एक पिता की अपने बिछड़े बेटे को पुकार थी। हर शब्द में बेटे की तलाश थी, हर पंक्ति में एक पिता की तड़प छिपी थी।
जिस कागज़ को भरत व्यास ने गुस्से में फाड़ दिया था… वही सुपरहिट गीत कैसे बन गया?
इसी दौरान निर्माता सुभाष देसाई अपनी फिल्म “जनम जनम के फेरे” के लिए गीत लिखवाने भरत व्यास के घर पहुंचे। लेकिन भरत व्यास मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे। उन्होंने साफ़ कहा कि वे कुछ नया लिखने की स्थिति में नहीं हैं।
बहुत आग्रह करने पर उन्होंने अपनी जेब से वही पर्चा निकाला जिस पर बेटे के वियोग में लिखी कविता थी। सुभाष देसाई ने पढ़ा और कहा, “पंडित जी, यह तो पिता-पुत्र के रिश्ते की पीड़ा है। हमें तो फिल्म के नायक-नायिका के लिए प्रेम गीत चाहिए।”
यह सुनकर भरत व्यास ने बिना कुछ कहे वह पर्चा फाड़ दिया और कूड़ेदान में फेंक दिया।
यहीं से कहानी अप्रत्याशित मोड़ लेती है।
सुभाष देसाई ने उन फटे हुए टुकड़ों को उठाया। उन्हें जोड़कर पूरी कविता पढ़ी और महसूस किया कि यह दर्द इतना सच्चा है कि इसे बदला नहीं जाना चाहिए। उन्होंने लगभग बिना किसी बदलाव के उसी गीत को फिल्म में इस्तेमाल कर लिया।
फिल्म रिलीज़ हुई।
गीत सुपरहिट हो गया।
लाखों लोगों ने इसे प्रेम गीत माना, लेकिन शायद ही किसी को पता था कि यह एक पिता की पुकार थी।
क्या “आ लौट के आजा मेरे मीत” भी बेटे के लिए लिखा गया था? सच जानकर आप चौंक जाएंगे
सालों से यह धारणा बनी रही कि फिल्म “रानी रूपमती” का अमर गीत—
“आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं…”
भी भरत व्यास ने अपने बेटे के वियोग में लिखा था।
लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है।
यह गीत किसी बेटे के लिए नहीं, बल्कि एक दोस्त के लिए लिखा गया था।
दो दोस्तों का अहंकार… जिसने हिंदी सिनेमा को अमर गीत दे दिया
भरत व्यास और संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी केवल सहकर्मी नहीं, बल्कि बेहद करीबी मित्र थे। दोनों ने साथ मिलकर कई यादगार गीत रचे। लेकिन एक दिन किसी छोटी-सी बात ने दोनों के बीच ऐसी दूरी पैदा कर दी कि बातचीत पूरी तरह बंद हो गई।
दिन बीतते गए।
महीने गुजर गए।
दोनों एक-दूसरे को याद करते थे, लेकिन अहंकार उन्हें पहला कदम उठाने नहीं दे रहा था।
फिर एक रात…
लगभग आधी रात को एस. एन. त्रिपाठी के घर फोन की घंटी बजी।
दूसरी ओर भरत व्यास थे।
उन्होंने केवल एक वाक्य कहा—
“तू रूठकर क्यों बैठा है… मैंने तेरे लिए एक गीत लिखा है।”
फोन पर ही उन्होंने पूरा गीत सुनाया—
“आ लौट के आजा मेरे मीत…”
सुबह होते ही एस. एन. त्रिपाठी भरत व्यास के घर पहुंच गए। दोनों गले मिले। सारे गिले-शिकवे खत्म हो गए। उसी दिन गीत रिकॉर्ड हुआ और बाद में फिल्म “रानी रूपमती” का सबसे लोकप्रिय गीत बन गया।
आज भी करोड़ों लोग इसे प्रेम गीत मानते हैं, जबकि इसकी आत्मा दो दोस्तों की टूटी हुई दोस्ती और फिर उसके पुनर्मिलन की कहानी है।
हर गीत के पीछे एक सच्ची घटना… यही थी भरत व्यास की सबसे बड़ी ताकत
भरत व्यास कभी कल्पना के लिए कल्पना नहीं लिखते थे। उनके परिवार के लोगों ने कई बार बताया कि उनकी लगभग हर कविता के पीछे कोई वास्तविक घटना होती थी।
रात की चौकीदारी ने “निर्बल से लड़ाई बलवान की…” को जन्म दिया।
आर्थिक संघर्ष ने “कविराजा कविता के…” जैसी व्यंग्य रचना लिखवाई।
कैदियों के सुधार की कहानी ने “ऐ मालिक तेरे बंदे हम…” जैसा अमर प्रार्थना गीत दिया।
बेटे की जुदाई ने “ज़रा सामने तो आओ छलिए…” लिखा।
दोस्त की नाराज़गी ने “आ लौट के आजा मेरे मीत…” को जन्म दिया।
यही वजह है कि उनके शब्द केवल तुकबंदी नहीं लगते, बल्कि सीधे दिल तक पहुंचते हैं।
एक कवि चला गया… लेकिन उसके शब्द आज भी हर पीढ़ी के साथ चलते हैं
5 जुलाई 1982 को भरत व्यास इस दुनिया से विदा हो गए। उनके जाने के बाद हिंदी सिनेमा ने केवल एक गीतकार नहीं खोया, बल्कि एक ऐसा कवि खो दिया जिसने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में ढालने की अद्भुत कला विकसित की थी।
आज भी जब किसी स्कूल में सुबह की प्रार्थना होती है…
जब कोई पुरानी फिल्मों का प्रेमी “आधा है चंद्रमा रात आधी…” गुनगुनाता है…
जब रेडियो पर “आ लौट के आजा मेरे मीत…” बजता है…
या जब कोई अकेले में “ज़रा सामने तो आओ छलिए…” सुनता है…
तब शायद उसे यह एहसास नहीं होता कि इन गीतों में एक कवि का जीवन धड़क रहा है।
क्या हम सचमुच अपने गीतकारों को याद रखते हैं?
आज की पीढ़ी लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार को तो पहचानती है, लेकिन जिन लोगों ने उनके लिए अमर गीत लिखे, वे धीरे-धीरे स्मृतियों से ओझल होते जा रहे हैं। भरत व्यास उन्हीं अनमोल रचनाकारों में से एक हैं।
उनकी सबसे बड़ी विरासत केवल गीत नहीं हैं। उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने अपने जीवन के हर सुख-दुख को कला में बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि शब्द तब सबसे अधिक अमर होते हैं, जब वे किसी किताब से नहीं, बल्कि जीवन से निकलते हैं।
यही कारण है कि “ऐ मालिक तेरे बंदे हम” आज भी केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक प्रार्थना है। और जब तक यह गीत गाया जाता रहेगा, भरत व्यास भी हमारे बीच जीवित रहेंगे।
संकलित: भूले बिसरे गीत

मालिक बदल गया :) समय के हिसाब से उस समय का लाजवाब सृजन |
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