Tuesday, 3 May 2022

परशुराम जयंती: वे पीयें शीत तुम आतम घाम पियो रे....


 आज भगवान परशुराम की जयंती जोर शोर से मनाई जा रही है। जातिवादी व्‍यवस्‍था में घिरे समाज में आज भगवान परशुराम को ब्राह्मणों ने अपना आराध्‍य माना हुआ है। एक पक्ष के तौर पर देखा जाये तो यह ठीक लग सकता है परंतु समग्रता में भगवान परशुराम न तो ब्राह्मणों के हितैषी थे और ना ही क्षत्रियों के विरोधी। वो तो आतताइयों के विरोधी थे और निर्बलों के रक्षक। 

मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मात्र मूर्ति की आराधना करके भगवान परशुराम के वास्‍तविक धर्म को नहीं जाना जा सकता। परशुराम धर्म भारत की जनता का धर्म है परशुराम भारत की जागरूक जनता के प्रतीक थे। 

अब देखिए न कि राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने तो  इसी ''परशुराम धर्म'' पर ही ''परशुराम की प्रतीक्षा'' लिख दी, उनकी इस काव्‍यकृति से मैं ही क्‍या कोई भी आतताइयों को ललकार सकता है। आज जबकि सभी अपने-अपने स्वार्थ भाव के पोषण में लगे हैं तब आवश्यकता है एक ऐसे धर्म की जो सर्वजन हितकारी हो और लोगों के लिए हो। परशुराम धर्म वह धर्म है जो पौरुषमयी चेतना का वाहक है, अर्थात्  अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आज के युग का एकमात्र धर्म यही है।

परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, और समय की मांग भी यही है। यह समय की आवाज को न सुनना वालों के लिए यह उनके बहरेपनन की गवाही भी है और कायरता एवं नपुंसकता का स्वीकार्य भी।

राष्‍ट्रकवि  दिनकर के अनुसार इतने गूढ़ संदेशों को धारण करने वाला भगवान परशुराम का धर्म ही परशुराम धर्म कहलाया तथा इस धर्म के निर्वाहक के लिए 8 आवश्यक तत्व हैं पहला- स्वतंत्रता की कामना, दूसरा -वीर भाव , तीसरा- जागृति,चौथा- निवृत्ति मूल्क मार्ग का परित्याग,पांचवां- वर्ग वैमनस्य का विरोध,छठवां- भविष्य के प्रति सतर्क तथा आस्था मूल्क दृष्टि,सातवां - परशुराम धर्म की महत्ता और औचित्य जीवन और आठवां तत्‍व है- जीवन मानकर सिर ऊंचा कर जीवित करना।

 आज अधिक न लिखते हुए मेरे साथ आप भी पढ़िये परशुराम की प्रतीक्षा के ये अंश जो कालजयी है...आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि अपने रचनाकाल में थे।  

तीन खंडों में लिखी गई इस कविता -''परशुराम की प्रतीक्षा'' का (शक्ति और कर्तव्य) कुछ भाग मुझे यहां उद्धृत करना अधिक प्रिय लगा- आप भी पढ़ें। 


वीरता जहां पर नहीं‚ पुण्य का क्षय है‚

वीरता जहां पर नहीं‚ स्वार्थ की जय है।


तलवार पुण्य की सखी‚ धर्मपालक है‚

लालच पर अंकुश कठिन‚ लोभ–सालक है।

असि छोड़‚ भीरु बन जहां धर्म सोता है‚

पातक प्रचंडतम वहीं प्रगट होता है।


तलवारें सोतीं जहां बंद म्यानों में‚

किस्मतें वहां सड़ती हैं तहखानों में।

बलिवेदी पर बालियें–नथें चढ़ती हैं‚

सोने की ईंटें‚ मगर‚ नहीं कढ़ती हैं।


पूछो कुबेर से कब सुवर्ण वे देंगे?

यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे?

तूफान उठेगा‚ प्रलय बाण छूटेगा‚

है जहां स्वर्ण‚ बम वहीं‚ स्यात्‚ फूटेगा।


जो करें‚ किंतु‚ कंचन यह नहीं बचेगा‚

शायद‚ सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।

हम पर अपने पापों का बोझ न डालें‚

कह दो सब से‚ अपना दायित्व संभालें।


कह दो प्रपंचकारी‚ कपटी‚ जाली से‚

आलसी‚ अकर्मठ‚ काहिल‚ हड़ताली से‚

सी लें जबान‚ चुपचाप काम पर जायें‚

हम यहां रक्त‚ वे घर पर स्वेद बहायें।


हम दे दें उस को विजय‚ हमें तुम बल दो‚

दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।

हों खड़े लोग कटिबद्ध वहां यदि घर में‚

है कौन हमें जीते जो यहां समर में?

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गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?

शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?


उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,

तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;

सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,

निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;


गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,

तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;

शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,

शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;


सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,

प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को

जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,

(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)


हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,

शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।

- रामधारी सिंह ‘दिनकर’

प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंंह


Friday, 25 March 2022

जन्मद‍िन: पढ़िए कवि तेज राम शर्मा की कविताऐं

आज ही के द‍िन यान‍ि 25 मार्च 1943 को हिन्दी भाषा के कवि तेज राम शर्मा का जन्म शिमला (हिमाचल प्रदेश) के गाँव बम्न्होल (सुन्नी) में हुआ था । वे भारत सरकार में विशेष सचिव के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद स्वतंत्र लेखन में लगातार सक्र‍िय रहे।

उनके दो कव‍िता संग्रह 1984 में प्रकाश‍ित ”धूप की छाया” और 2000 में प्रकाश‍ित ”बंदनवार ”, ज‍िसमें बंदनवार का अनुवाद बांग्ला में हुआ। इसके अलावा एक कविता संग्रह “नहाए रोशनी में” भी प्रकाश‍ित हुआ।

कविताओं में- अकेलापन, उसने चुना, ऐनक, फ़ोटो, बहुत दूर, वरना वह भी, सागर का रंग बहुत प्रस‍िद्ध रहीं। उनकी कविताएं पहाड़ की प्रकृति से आत्मीय संवाद की कविताएं हैं। प्रकृति के उपादानों का ही प्रतीकों और बिंबों के रूप में होन इन कविताओं की विशिष्टता है।  

कवि तेजराम शर्मा के सातवें कविता संग्रह ‘कंप्यूटर पर बैठी लड़की’ में कुल 79 कविताएं संगृहीत हैं जो ज्यादातर भीतर से बाहर की तरफ खुलती है। मिट्टी की गंध से सुवासित इन कविताओं की मुख्य टेक प्रकृति है। यहां तक कि कवि पुरखों की स्मृति में डूबता है तो प्रकृति के उपनाम और बिंब स्वत: आते चले गए हैं।

उनकी शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला से एम.ए. हिंदी, पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा इन ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट, मॅन्चेस्टर विश्वविद्यालय, यू.के.से क‍िया था । इसके अलावा डिप्लोमा इन ट्रेनिंग मॅनेजमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट, यू.के व डिप्लोमा इन फ्रेंच, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला भी उन्होंने क‍िया ।

कव‍ि तेजराम शर्मा को अखिल भारतीय कलाकार संघ साहित्य पुरस्कार, ठाकुर वेद राम राष्ट्रीय पुरस्कार, पंजाब कला साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिमाचल साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजा जा चुका है।

आज पढ़‍िए उनकी कुछ प्रस‍ि‍द्ध कव‍ितायें- 

गाँव के मन्दिर के प्राँगण में-
गाँव के मंदिर प्राँगण में
यहां जीर्ण-शीर्ण होते देवालय के सामने
धूप और छाँव का
नृत्य होता रहता है

यहाँ स्लेट छत की झालर से लटके
लकड़ी के झुमके
इतिहास पृष्ठों की तरह
गुम हो गए है

दुपहर बाद की मीठी धूप को छेड़ता
ठण्डी हवा का कोई झोंका
कुछ बचे झुमकों को हिला कर
विस्मृत युग को जगा जाता है

धूप में चमकती है ऊँची कोठी
पहाड़ का विस्मृत युग
देवदार की कड़ियों की तरह
कटे पत्थर की तहों के नीचे
काला पड़ रहा है
बूढे बरगद की पंक्तियों सा
सड़ रहा है
बावड़ी के तल में

इस गुनगुनी धूप में
पुरानी कोठी की छाया कुछ हिलती है
और लम्बी तन कर सो जाती है।

सपने अपने-अपने-

बालक ने सपना देखा
उड़ गया वह आकाश में
पीठ से फिसला उसका बस्ता
एक-एक कर आसमान से गिरी
पुस्तकें और काँपियाँ
देख कर मुस्कराया और उड़ता रहा
फिर गिरा आँखों से उसका चश्मा
धरती इतनी सुंदर है
उसने कभी सपने में भी न सोचा था

युवा ने सपना देखा
हवाई जहाज़ से
उसने लगाई छलांग
करतब दिखाता हुआ
निर्भय गिरता रहा धरती की ओर
जंगल जब तेजी से उसके पास आया
तो उसने पैराशूट खोल दिया
हवा का एक तेज़ झोंका
उसे राह से विचलित कर गया
पैराशूट को नियंत्रित करता हुआ
साहस के साथ वह
पेड़ों से घिरी चारागाह में उतरा
वहाँ एक युवती दौड़कर उसके पास आई
और प्यार भरी आँखों से उसे देखने लगी
सपने में ही अपना सिर उसकी गोद में रखकर
वह जीने के सपने देखने लगा

बूढ़े ने सपना देखा
सुबह-सुबह नदी स्नान करते हुए
फिसला जाता है उसका पाँव
वह नदी में डूबने लगता है
शिथिल इन्द्रियोँ से
छटपताता है बाहर निकलने के लिए
अपने-पराये कोई नहीं सुनते उसकी चीख
सब कुछ छूटता नज़र आता है
जैसे ही अंतिम साँस निकलने को होती है
बिस्तर पर जाग पड़ता है वह भयानक सपने से
काँपते हाथों से पानी पीता है और
सपने देखने से डरने लगता है।

कोई दिन-

हमारे सारे के सारे दिन
नष्ट नहीं हो जाते
कहीं एक दिन बच निकलता है
और जीवित रहता है
हवा,पानी, धूप, तूफान,काल
सब से लड़ता रहता है
लड़ते-लड़ते दूर तक निकल जाता है

सभी दिन तितली नहीं होते
कोई दिन तितली की तरह
पन्नों के बीच बच निकलता है
और क्षण-भंगुरता को चकमा दे जाता है
दिन
जिसमें मैं जीता हूँ
मेरा अपना नहीं हो पाता
मुट्ठी की रेत हो जाता है

पर वह दिन
जो बादलों की पीठ पर चढ़ कर
घूम आता है पर्वत–पर्वत
जीवित रहेगा बहुत दिनों
चीड़ और देवदार की गंध
आती रहेगी बरसों तक
उसके कोट से

मुझे अच्छा लगता है
जब बर्फ़ में ठिठुर रहे दिनों से
मैं उठा लाता हूँ एक दिन
गर्म पानी में हाथ-पाँव धुला कर
आग के पास बैठता हूँ
और शब्दों का एक गर्म-सा कंबल ओढ़ाता हूँ।

राग देस-

फासला
कि पार ही नहीं होता
हाथ से भाग्य-रेखा
रहती है सदा गायब
किसके पक्ष में
घटित हो रहा है सब कुछ
खतरनाक भीड़
कहाँ से उमड़ रही है?

इधर दीवारों से पलस्तर
उखड़ रहा है
उभर रहा है उसमें एक ही चेहरा
इस मौसम में
मिट्टी-गारे को ही
ताकती रह जाती है
दीवार पर उभरी इबारत

चोटियों पर गिरती है संकल्पों–सी लुभावनी बर्फ़
पर घाटी में ग्लेशियर
पिछली रात
नींव तक हिला गया है
गाँव-गाँव
घरों की दीवारें

उधर वैज्ञानिक
शुक्राणुओं में कम होती हलचल से
चिंतित हैं

इधर ऊसर में छिड़के बीज
चिड़ियाँ चुग जाती हैं
हाथ मलते रह जाते हैं शब्द

चरागाह में
भेड़ें पंक्तिबद्ध हैं
उतर रही है ऊन
सूरज छिपा है काले बादलों के बीच
पगडंडियाँ
कि दबती ही जा रही हैं
और उड़ती जाती है धूल
रंगमंच
कि नायक सभी हुए जाते हैं पतझड़ के चिनार
अगस्त्य हुए अरमानों के आगे
उमड़ रही है
आचमन के लिए भीड़
अबाअ सातों सुतों सहित हाथ जोड़े खड़ी है

विरासत
कि रेगिस्तान
फैला है ओर–छोर
शून्य में ताकते लोग़
पूछ रहे हैं
कौन-सी ऋचाओं के
अधिष्ठाता हैं
इन्द्र?
संस्कार
कि फिसल न जाए जनेऊ कान से
शंका करते हुए
नदियों से उठती
आग की लपटें
अग्निपुत्र पी रहें हैं लावा
सपनों की सूरत
निखरी हुई रेतीली आँखों में
साफ झलकते
परियों की चेहरे

मौसम कि बदलते ही
बीहड़ वन में फूलते हैं बरूस
पहाड़ में औरते छानती हैं सफेद मिट्टी
चमकती हैं घरो की दीवारें
स्लेट छत के चारों और
खिंचती हैं बरूस की बंदनवार रस्सियाँ
नज़र
कि अटकी रह जाती है
समुद्र किनारे के
नारियल के झुरमुटों बीच।

.....

सपने में नदी 

वर्षों तक

बार-बार

आता रहा एक ही सपना

नदी के तटबंधों पर

हाथों से सहलाता हूँ

उभरी तंरगें

नदी देती है खुला निमन्त्रण

पर बल खाती तरंगों पर

तैरने से घबराता हूं

डरते-डरते

गहरे में उतरता हूं

और जल के आवेग की तालों बीच

नदी पर तैरते हुए दूर निकल जाता हूं

तटों के बंधन से मुक्त नदी

मंझधार में

समूचा समेट लेती है मुझे

डूबते-डूबते

शिथिल होता है भुजाओं का पौरुष

नदी पता नहीं

कहां लेती होगी करवट

टूटे सपने की डोर पकड़े

बदलता हूं करवट बिस्तर पर।

-अलकनंदा सिंंह


Saturday, 12 March 2022

ब्रज की होरी: श्री कुँज बिहारी बिहारिनजू का फाग महोत्‍सव

 बसंत ऋतु  के आगमन के साथ ही राधा-कृष्ण के अनूठे प्रेम की धरती ब्रज में वसंत पंचमी के दिन से ही ४० दिवसीय फाग महोत्सव जो शुरूहुआ, वह अब अपने रंग में सभी को भिगो रहा है। रंग गुलाल के संग वृंदावन में स्‍वामी हरिदास की साधनास्‍थली टटिया स्‍थान भी संगीतमय होली खेल रहा है। प्रतिदिन अनेक पदों का गायन राधा-कृष्‍ण को समर्पित किया जाता है।

फाग महोत्‍सव का प्रथम दिवस

(1)

सुरंग सेज प्यारे खेलैं होरी ।
दूलहू श्याम रंगीले खिलाड़ी,दुलहिन राधा रसीली गोरी ।।
मान लाज मुस्कन रंग गहरे , फबे मनुहार जुहार निहोरी ।
चोबा चुंबन मलय आलिंगन ,परिरंभन मलैं कुमकुम रोरी ।।
परसत भाये गुलाल अंबीर तन ,अंकौ भरैं नखसिख रसबोरी ।
कृष्णचंद्र राधा चरणदासि बलि,सुरति फाग दिन रंग रस जोरी ।।

(2)

श्याम श्यामा की छवि न्यारी ,होरी रंग खेलैं पिय प्यारी।
सौंज सजि सखी दुहूँ ओरी,भरहिं पिच रंग रूख जोरी ।१।
बीन ढफ तार बहु बाजैं , निरखि नृत अप्सरा लाजैं ।
चैती चाँचरि मधुर संगीत ,फगुवा सुनि मत्त झूमे मीत ।२।
सौहें नव कुँज फूले फूल,भँवर जस गूँजैं यमुना कूल ।
प्रिया भरी रंग पिचकारी,ओट करि ललिता अगारी।३।
ताक रंग लाल पै मारै , घात लै अरगजा डारै ।
लाल गुलाल भरि झोरी ,गुलचा संग छोड़े तकि गोरी ।४।
उमंगि दोऊ फाग रंग खेलैं , प्रेम सुख रंग रस झेलैं ।
रँगे रंग रँगी पहिचानें , कोऊ काहू कौं नहिं जानें ।५।
कुंज दुरे कृष्णचन्द्र प्यारी , सुरति सुख केलि नित न्यारी ।
भरीं भुज राधा बिहारी , नेह होरी की बलिहारी ।६।

फाग महोत्‍सव का द्वितीय दिवस

(1)

होरी कुँज महल खेलत हुलसि छबीली री ।
नैंन सैंन अंग चलत चटक रंग ,चितै चित रंगत रंगीली री ।१।
घेरा करत सौंज लियैं सखी चहुँ,बीच फबी गरबीली री ।
कोमल कर अरगजा पुहुप भरि,मारत रसिक रसीली री ।२।
पीत वसन मोहन घन दामिनि,सारी चोली नीली री ।
खेलत होरी पिय संग सोहत ,कछु सूखी कछु गीली री ।३।
तन मन रंग अनंग के छूटत , कंचुकी नीबी ढीली री ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि,निरखत सुख सुरति लजीली री ।४।

(2)

खेले प्यारी श्याम पिया संग होरी ।
सुघर वदन पिचकारी रूप रंग, रस माधुर्य कमोरी ।१।
नेेंन सैंन के अंबीर अरगजा, चलैं कटाक्षन झोरी ।
हंसत रंगीले गुलाल परैं दृग ,उमड़े मदन मन जोरी ।२।
परस परस्पर झागे रस सर , सुखद सुरति बरजोरी ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि दिन ,उर आनंद न ओरी ।३।

फाग महोत्‍सव का तृतीय दिवस

(1)

बना बनी रस रंग की खेलें होरी हो ।
नैंन सैंन की मार परत मन ,रंग अनंग की रेलें होरी हो ।१।
रूप माधुरी सिंधु भँवर परे ,रस तरंग की ठेलें होरी हो ।
विवस रंग रस सुधि न वसन तन ,अंग अंग की पेलें होरी हो ।२।
मिलि न मिलें मदमाते फाग के ,रसिया उमंग की हेलें होरी हो ।
कृष्ण चन्द्र राधा चरण दासि रचि,सेज सुरंग की केलें होरी हो ।३।

(2)

होरी हो कुँज महल मतवारी ।
गोरे श्याम साँवरी श्यामा ,ललिता जोरी विचित्र सिंगारी ।१।
गोरी सखीं बजावें गावे ,रंग गुलाल चलावें कारी ।
गोरी जस गावें दुलहिन के ,साँवरी दैं दूलहु बहु गारी ।२।
चोबा चंदन अबीर अरगजा ,केसर कुसुम रंग सुखकारी ।
जुरत कटाक्ष मूठि दृग मारत , खेलैं दंपति चतुर खिलारी ।३।
घात दाब बचें पकरें परस्पर, सबहिं रंगे रंग इकसारी ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि बलि,मधुर प्रेम रंग होरी न्यारी ।४।

(3)

होरी खेलौ करौ मनमानी ।
मोहन रसिक रूप रस लोभी ,मानिनी राधा सयानी ।१।
उन रंग प्रेम दोऊ कर लीनें ,तुव रंग मनहिं छिपानी ।
तुव उन रंगौ रंगैं वे तुमको ,दोउन प्रीती हौं जानी ।२।
नृत्य संगीत सुगंध राग रंग , रस सर सुरति समानी ।
तन मन जिय मिलि रंगे परस्पर, सकुचि गुमान गँवानी ।३।
सेवत होरी बसंत मदन नित ,वृंदावन रजधानी ।
कृष्णचन्द्र राधा चरण दासि होरी ,रसिक अनन्य रंगानी ।४।

स्‍वामी हरिदास की साधनास्‍थली टटिया स्‍थान स्वामी हरिदास सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ है। हरिदास सम्प्रदाय के आठ आचार्य हैं। सातवें आचार्य, स्वामी ललित किशोरी देव जी ने 1758 और 1823 के बीच इस धरती पर एक निर्जन वृक्ष के नीचे निवास किया, ताकि एकांत में ध्यान किया जा सके। उन्होंने बांस के डंडे का इस्तेमाल कर पूरे इलाके को घेर लिया। स्थानीय बोली में बाँस की छड़ियों को “टटिया” कहा जाता है। इस तरह इस स्थान का नाम टटिया स्थान पड़ा। उन्होंने उन्हें यह सुझाव भी दिया कि राधा अष्टमी के दिन श्री हरिदास जी का प्रकट दिवस मनाया जाना चाहिए और तब से यह त्योहार बहुत प्रेम से मनाया जाता है। टटिया स्थान पर उनकी समाधि भी है।

टटिया स्थान विभिन्न प्रकार के वृक्षों से भरा है, विशेष रूप से वे जो भगवान कृष्ण के दिल के करीब थे, जैसे, नीम, पीपल और कदंब। यह जगह साधना भक्ति करने की है, और किसी को भी यहाँ अनावश्यक बात करने की अनुमति नहीं है।

– अलकनंदा सिंंह

Thursday, 6 January 2022

आज कुछ हटके पढ़ेंगे... भ्रमरगीत परम्परा में कृष्‍ण और ब्रज


 

हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत का मूलस्रोत है श्रीमद्भागवत पुराण,  जिसके दशम स्कंध के ४६वें एवं ४७वें अध्याय में भ्रमरगीत प्रसंग है। श्रीकृष्ण गोपियों को छोङकर मथुरा चले गए और गोपियाँ विरह विकल हो गई। कृष्ण मथुरा में लोकहितकारी कार्यों में व्यस्त थे किन्तु उन्हें ब्रज की गोपियों की याद सताती रहती थी। उन्होंने अपने अभिन्न मित्र उद्धव को संदेशवाहक बनाकर गोकुल भेजा। वहां गोपियों के साथ उनका वार्तालाप हुआ तभी एक भ्रमर वहां उड़ता हुआ आ गया। गोपियों ने उस भ्रमर को प्रतीक बनाकर अन्योक्ति के माध्यम से उद्धव और कृष्ण पर जो व्यंग्य किए एवं उपालम्भ दिए उसी को ’भ्रमरगीत’ के नाम से जाना गया। भ्रमरगीत प्रसंग में निर्गुण का खण्डन, सगुण का मण्डन तथा ज्ञान एवं योग की तुलना में प्रेम और भक्ति को श्रेष्ठ ठहराया गया है।

भ्रमरगीत भारतीय काव्य की एक पृथक काव्य परम्परा है। हिन्दी में सूरदास, नंददास, परमानंददास, मैथिलीशरण गुप्त (द्वापर) और जगन्नाथदास रत्नाकर ने भ्रमरगीत की रचना की है। भारतीय साहित्य में 'भ्रमर' (भौंरा) रसलोलुप नायक का प्रतीक माना जाता है। वह व्यभिचारी है जो किसी एक फूल का रसपान करने तक सीमित नहीं रहता अपितु, विविध पुष्पों का रसास्वादन करता है।

ब्रजभाषा काव्य में भ्रमरगीत परम्परा के कई ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। विद्वान इस परम्परा का प्रारम्भ मैथिल कोकिल विद्यापति के पदों से मानते हैं किन्तु विधिवत रूप में भ्रमरगीत परम्परा सूरदास से ही प्रारम्भ हुई।

सूरदास का भ्रमरगीत

सूरसागर सूरदासजी का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें प्रथम नौ अध्याय संक्षिप्त है, पर दशम स्कन्ध का बहुत विस्तार हो गया है। इसमें भक्ति की प्रधानता है। इसके दो प्रसंग 'कृष्ण की बाल-लीला’ और 'भ्रमरगीत-प्रसंग' अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसके विषय में आचार्य शुक्ल ने कहा है, सूरसागर का सबसे मर्मस्पर्शी और वाग्वैदग्ध्यपूर्ण अंश भ्रमरगीत है। आचार्य शुक्ल ने लगभग 400 पदों को सूरसागर के भ्रमरगीत से छांटकर उनको 'भ्रमरगीत सार' के रूप में संग्रह किया था।

भ्रमरगीत में सूरदास ने उन पदों को समाहित किया है जिनमें मथुरा से कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजते हैं। उद्धव योग और ब्रह्म के ज्ञाता हैं। उनका प्रेम से दूर-दूर का कोई सम्बन्ध नहीं है। जब गोपियाँ व्याकुल होकर उद्धव से कृष्ण के बारे में बात करती हैं और उनके बारे में जानने को उत्सुक होती हैं तो वे निराकार ब्रह्म और योग की बातें करने लगते हैं तो खीजी हुई गोपियाँ उन्हें 'काले भँवरे' की उपमा देती हैं। 

इन्हीं लगभग 100 पदों का समूह भ्रमरगीत या 'उद्धव-संदेश' कहलाता है।


भ्रमरगीत में गोपियों की वचनवक्रता अत्यंत मनोहारिणी है। ऐसा सुंदर उपालंभ काव्य और कहीं नहीं मिलता।


उधो ! तुम अपनी जतन करौ

हित की कहत कुहित की लागै,

किन बेकाज ररौ ?

जाय करौ उपचार आपनो,

हम जो कहति हैं जी की।

कछू कहत कछुवै कहि डारत,

धुन देखियत नहिं नीकी।


जगन्नाथदास रत्नाकर का भ्रमरगीत 

जगन्नाथदास रत्नाकर के 'उद्धव-शतक' की गणना भी भ्रमरगीत परम्परा में की जा सकती हैं। यहाँ उद्धव ही 'भ्रमर' हैं जिन्हें लक्ष्य कर गोपियाँ अपने मन की कटुता व्यक्त करतीं हैं।


करि के सुधि प्यारी तिहारी सदा

हिय घाव हरे के हरे ही रहे

छिनहू न सुहाय न भाय कछु

अंग अंग गरे के गरे ही रहे

कवि मजुल भाव वहै हित के 

उर आई अरै के अरै ही रहे 

झर बांधि झरै अँसुवा नित ही 

तउ नैन भरे के भरै ही रहै.


प्रस्तुत‍ि- अलकनंदा सिंह

Saturday, 18 December 2021

एक कहानी मार्म‍िक सी - इतिहास के पन्नों में सरस्वती (मदीहा खान) का नाम नहीं

 आज एक मार्म‍िक सी कहानी पढ़ने को म‍िली अंतर्धार्म‍िक व‍िवाह की। आशा है आप सबको भी पसंद आएगी। 

 पढें-------

 


वह मुस्लिम कन्या बोली, "तो फिर हमेशा के लिए अपने 52 गज के घाघरे में मुझे छिपा लो दादी।’’

यूपी में बुलंदशहर के सिकंदराबाद के  गाँव पिलखन की सच्ची घटना है ये।

1904 का सन् था, बरसात का मौसम और मदरसे की छुट्टी हो चुकी थी। लड़कियाँ मदरसे से निकल चुकी थी। अचानक ही आँधी आई और एक लड़की की आंखों में धूल भर गई, आँखें बंद और उसका पैर एक कुत्ते पर जा टिका। वह कुत्ता उसके पीछे भागने लगा। लड़की डर गई और दौड़ते हुए एक ब्राह्मण मुरारीलाल शर्मा के घर में घुस गई। जहाँ 52 गज का घाघरा पहने पंडिताइन बैठी थी।

लड़की उसके घाघरे में जाकर लिपट गई, "दादी मुझे बचा लो।"

दादी की लाठी देख कुत्ता तो वहीं से भाग गया, लेकिन बाद में जहाँ भी दादी मिलती, तो यह बालिका उसको राम-राम बोलकर अभिवादन करने लगी। दादी से उसकी मित्रता हो गई और दादी उसे समय मिलते ही अपने पास बुलाने लगी, क्योंकि दादी को पंडित कृपाराम ने उर्दू में नूरे हकीकत लाकर दी थी, दादी उर्दू जानती थी, परंतु अब आँखें कमजोर हो गई थी, इसलिए उस लड़की से रोज-रोज वह उस ग्रंथ को पढ़वाने लगी और यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा।

लड़की देखते ही देखते पंडितों के घर में रखे सारे आर्ष साहित्य को पढ़-पढ़कर सुनाते हुए कब विद्वान बन गई पता ही नहीं, पता तो तब चला, जब एक दिन उसका निकाह तय हो गया और दादी कन्यादान करने गई। निकाह के समय जैसे ही उसने अपने दूल्हे को देखा तो वह न केवल पहले से शादीशुदा था वरन एक आँख का काना भी था। इसलिए लड़की को ऐसा वर पसंद नहीं आया, परंतु घरवालों और रिश्तेदारों ने दबाव डाला लड़की पर, हाथ तक उठाया, तो विवशता के आँसुओं की गंगा जमुना की धारा उसकी आँखों से बह चली।

परंतु अबला ने जैसे ही देखा कि 52 गज के घाघरे वाली पंडिताइन कन्यादान करने आई है, अपने पोते के साथ तो एक बार फिर इतने वर्षो बाद दादी से चिपट गई थी, "दादी मुझे बचा लो, मैं काने से निकाह नहीं करूँगी।"

"काने से नहीं करेगी तो तेरे लिए क्या कोई शहजादा आएगा?" वह वधू दादी को छोड़ने का नाम न ले रही थी, दादी भी रोने लगी, उसे समझाने का प्रयास किया, कि "जैसा भी है, उसी से नियति समझकर शादी कर ले।"

"अगर आपकी बेटी होती तो क्या आप उसकी शादी काने से कर देतीं?" लड़की ने दादी से पूछा था।

"तू भी तो मेरी ही बेटी है" दादी ने कहा।

"सिर पर हाथ रखकर कहो कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ" लड़की ने कहा।

"हाँ तुम मेरी बेटी हो।" कहते हुए पंडिताइन ने उस मुस्लिम कन्या के सिर पर हाथ रख दिया था।

"तो फिर हमेशा के लिए अपने 52 गज के घाघरे में मुझे छिपा लो दादी।"

"मतलब" दादी ने अचंभित हो कर कहा।

"अपने इस पोते से मेरा विवाह करके मुझे अपने घर ले चलो" लड़की ने कहा।

"क्या?" कोहराम मच गया, एक मुस्लिम लड़की की इतनी हिम्मत की निकाह के दिन जात-बिरादरी की बदनामी करे और पंडित के लड़के से शादी करने की बात कह दे। आखिर इतनी हिम्मत आई उसके अंदर कहाँ से। जब किसी ने पूछा तो, उसने बताया, "दादी को नूरे हकीकत यानी कि दयानंद सरस्वती का सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर सुनाते हुए। कर्म से मुझे पंडिताइन बनने का हक वेदों ने दिया है और मैं इसे लेकर रहूँगी।"

पंचायत बैठी, लड़की अब अपनी बात पर अड़ गई कि शादी करेगी तो पंडित के लड़के से वरना नहीं, पढ़ेगी तो वेद पढ़ेगी वरना कुरान नहीं।

चतुरसेन और पंडित के लड़के की यारी थी, चतुरसेन आर्य समाजी किशोर था और उसने पंडित के लड़के को मना लिया था कि मुस्लिम लड़की से शादी करेगा तो सात पीढ़ियों के पूर्वजों के पाप धुल जाएँगे। उधर पंडित कृपाराम ने दादी को समझाया और दादी भी मान गई। मुरारीलाल शर्मा ने भी हाँ भर दी। लेकिन मुस्लिम जमात में कोहराम मच गया और उस मुस्लिम परिवार का हुक्का-पानी गिरा दिया, उसे मुस्लिम धर्म से बाहर निकाल दिया, कुएँ से पानी भरना बंद हो गया। 

परंतु वह परिवार भी अब इस्लाम की दकियानूसी बातों से तंग आ चुका था और उसने अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ चार दिन में ही घर में कुआँ खोदकर पानी की समस्या से छुटकारा पाया और अपनी बेटी की शादी हिन्दू युवक से करने के साथ-साथ सपरिवार वैदिक धर्म अंगीकार करने की घोषणा कर दी। यज्ञ हवन के साथ उस युवती का पिता आर्य बन गया और नाम रखा चौधरी हीरा सिंह।

आज हीरा सिंह की बेटी की शादी थी, किसी ने कहा, "हिन्दू इसकी बेटी ले जाएँगे, लेकिन इसके घर का हुक्का-पानी तक न पिएँगे।" ठाकुर बडगुजर ने जब यह सुना तो हीरासिंह का हुक्का भर लाया और पहली घूँट भरी और फिर हीरा के मुँह में नेह ठोक दी और हीरा जाटों, पंडितों, और ठाकुरों के साथ बैठकर हुक्का पीने लगा।

पंडित कृपाराम ने उसके नए कुएँ से पानी भरा और सबको पिलाया और खुद भी पिया। मुरारीलाल शर्मा ने एक लंबा भाषण दिया और आर्य समाज के प्रख्यात भजनीक तेजसिंह ने कई भजन सुनाए और बिन दान-दहेज के उस मुस्लिम बालिका मदीहा खान का विवाह संस्कार ब्राह्मण के लड़के से हो गया। उस जमाने में अपनी तरह का यह पहला अंतरधर्मीय विवाह था।

पंडित कृपाराम आगे चलकर स्वामी दर्शनानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए और उन्होंने हरिद्वार के निकट एक गुरुकुल महाविद्यालय स्थापित किया। बालक चतुरसेन प्रख्यात उपन्यासकार हुए और आर्य समाज अनाज मंडी की स्थापना की और हीरा सिंह विधायक तक बना।

स्वामी दर्शनानंद, चतुरसेन शास्त्री, ठाकुर हीरासिंह आदि को आज सब जानते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में सरस्वती (मदीहा खान) का कहीं नाम नहीं है, जिनकी प्रेरणामात्र से आधा दर्जन लोग विद्वान और समाजसेवी बने और सिकंदराबाद आर्य समाज वैदिक धर्म प्रचार का सबसे बड़ा गढ बन गया था।

संदर्भ

1. यादें, 

आचार्य चतुरसेन, संज्ञान प्रकाशन, संस्करण 1968, पृष्ठ 45

2. मेरी आत्मकथा, चतुरसेन शास्त्री, 

हिन्द पाकेट बुक्स, 1970

3. सिकंदराबाद आर्य समाज का गौरवशाली इतिहास, 

ठाकुर हीरा सिंह, पृष्ठ 76

4. मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय, 

स्वामी दर्शनानंद सरस्वती,

पृष्ठ 34

पुस्तक-- "मुस्लिम विदुषियों की घर वापसी" का एक अंश

आर्यखंड टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड का उत्कृष्ट प्रकाशन।

प्रस्तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह

Monday, 13 December 2021

मनोवैज्ञानिक उपन्यासों के जनक इलाचन्‍द्र जोशी- पढ़‍िए उनकी कहानी 'रेल की रात '


 हिन्दी में मनोवैज्ञानिक उपन्यासों के जनक माने जाने वाले इलाचंन्‍द्र जोशी का आज जन्‍मदिन है। 13 दिसंबर 1903 को तत्‍कालीन उत्तर प्रदेश और आज के उत्तराखंड में जन्‍मे इलाचंन्‍द्र जोशी की मृत्‍यु 1982 में हुई थी। इलाचंन्‍द्र जोशी ने अधिकांश साहित्यकारों की तरह अपनी साहित्यिक यात्रा काव्य-रचना से ही आरम्भ की थी। पर्वतीय-जीवन विशेषकर वनस्पतियों से आच्छादित अल्मोड़ा तथा उसके आस-पास के पर्वत-शिखरों एवं हिमालय के जलप्रपातों एवं घाटियों ने, झीलों और नदियों ने इनकी काव्यात्मक संवेदना को सदा जागृत रखा।

जोशी जी बाल्यकाल से ही प्रतिभा के धनी थे। उत्तरांचल में जन्मे होने के कारण वहाँ के प्राकृतिक वातावरण का इनके चिन्तन पर बहुत प्रभाव पड़ा। अध्ययन में रुचि रखन वाले इलाचन्द्र जोशी ने छोटी उम्र में ही भारतीय महाकाव्यों के साथ-साथ विदेश के प्रमुख कवियों और उपन्यासकारों की रचनाओं का अध्ययन कर लिया था। औपचारिक शिक्षा में रुचि न होने के कारण इनकी स्कूली शिक्षा मैट्रिक के आगे नहीं हो सकी परन्तु स्वाध्याय से ही इन्होंने अनेक भाषाएँ सीखीं। घर का वातावरण छोड़कर इलाचन्द्र जोशी कोलकाता पहुँचे। वहाँ उनका सम्पर्क शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय से हुआ।
मुख्य रचनाएँ
कहानी- ‘धूपरेखा’, ‘आहुति’, उपन्यास- ‘संन्यासी’, ‘परदे की रानी’, ‘मुक्तिपथ’ आदि।
प्रसिद्धि
मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार, काहानीकार, आलोचक
विशेष योगदान
हिन्दी में मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का प्रारम्भ श्री जोशी से ही हुआ, लेकिन श्री जोशी ने मात्र मनोवैज्ञानिक यथार्थ का निरूपण न कर अपनी रचनाओं को आदर्शपरक भी बनाया।


ये पढ़‍िए उनकी कहानी- रेल की रात 



गाड़ी आने के समय से बहुत पहले ही महेंद्र स्टेशन पर जा पहुँचा था। गाड़ी के पहुँचने का ठीक समय मालूम न हो, यह बात नहीं कही जा सकती। जिस छोटे शहर में वह आया हुआ था, वहाँ से जल्दी भागने के लिए वह ऐसा उत्सुक हो उठा था कि जान-बूझ कर भी अज्ञात मन से शायद किसी अबोध बालक की तरह वह समझा था कि उसके जल्दी स्टेशन पर पहुँचने से संभवत: गाड़ी भी नियत समय से पहले ही आ जाएगी। 

होल्डाल में बँधे हुए बिस्तरे और चमड़े के एक पुराने सूटकेस को प्लेटफ़ार्म के एक कोने पर रखवा कर वह चिंतित तथा अस्थिर-सा अन्यमनस्क भाव से टहलते हुए टिकट-घर की खिड़की के खुलने का इंतिज़ार करने लगा। 

महेंद्र की आयु बत्तीस-तैंतीस वर्ष के लगभग होगी। उसके क़द की ऊँचाई साढ़े पाँच फ़ीट से कम नहीं मालूम होती थी। उसके शरीर का गठन देखने से उसे दुबला तो नहीं कहा जा सकता, तथापि मोटा वह नाम का भी न था। रंग उसका गेहुँआ था, कपोल कुछ चौड़ा, भौंहें कुछ मोटी किंतु तनी हुई, आँखें छोटी पर लंबी, काली मूँछें घनी पर पतली और दोनों सिरों पर कुछ ऊपर को उठी थीं। वह खद्दर का एक लंबा कुरता और खद्दर की धोती पहने था। सर पर टोपी नहीं थी। पाँवों में घड़ियाल के चमड़े के बने हुए चप्पल थे। उसके व्यक्तित्व में आकर्षण अवश्य था, पर वह आकर्षण सब समय सब व्यक्तियों की दृष्टि को अपनी ओर नहीं खींचता था। 

सूरज बहुत पहले डूब चुका था और शुक्ल पक्ष का अपूर्ण गोलाकार चंद्रमा अपने किरण-जाल से दिग्-दिगंत को स्निग्ध आलोक-छटा से विभासित करने लगा था। स्टेशन पर अधिक भीड़ न थी। प्लेटफ़ार्म पर टहलते-टहलते पूर्व की ओर क़दम निकल जाने पर ऐसा मालूम होने लगता था कि चाँदनी दीर्घ-विस्तृत समतल भूमि पर अलस क्लांति की तरह पड़ी हुई है। झिल्ली-झनकार का एकांतिक मर्मर स्वर इस अलसता की वेदना को निर्मम भाव से जगा रहा था, जिससे महेंद्र के हृदय की सुप्त व्याकुलता तिलमिला उठती थी। 

सिगनल डाउन हो गया था। टिकट-घर खुल गया था। थर्ड क्लास का टिकट ख़रीद कर महेंद्र गाड़ी का इंतिज़ार करने लगा। थोड़ी देर में दूर ही से सर्चलाइट के प्रखर प्रकाश से तिमिर-विदारण करती हुई गाड़ी दिखाई दी और झक-झक करती हुई स्टेशन पर आ खड़ी हुई। 

सामने के कंपार्टमेंट में केवल दो व्यक्ति बैठे थे और वे भी उतरने की तैयारी कर रहे थे। महेंद्र एक हाथ में बिस्तर की गठरी और दूसरे हाथ से सूटकेस पकड़ कर उसी में जा घुसा। जो दो व्यक्ति कंपार्टमेंट में थे, उनके उतरते ही एक चश्माधारी सज्जन ने दो महिलाओं के साथ भीतर प्रवेश किया। कुली ने आ कर नवागंतुक महाशय का सामान भीतर रख दिया और मजूरी के संबंध में काफ़ी हुज्जत करने के बाद पैसे ले कर चला गया। चश्माधारी सज्जन महिलाओं के साथ महेंद्र के सामने वाले बेंच पर बड़े आराम से बैठ गए। मालूम होता था कि वह बड़ी हड़बड़ी के साथ गाड़ी के आने के कुछ ही समय पहले स्टेशन पहुँचे थे और घबराहट में थे, कि महिलाओं को साथ ले कर यदि किसी कंपार्टमेंट में जगह न मिली, तो क्या हाल होगा। वह अभी तक हाँफ रहे थे, जिससे उनकी अब तक की परेशानी स्पष्ट व्यक्त होती थी। अब जब आराम से बैठने को ख़ाली जगह मिल गई, तो एक लंबी साँस ले कर चश्मा उतार कर रूमाल से मुँह का पसीना पोंछने लगे। पसीना पोंछते-पोंछते महेंद्र की ओर देख कर उन्होंने प्रश्न किया, 'शिकोहाबाद कै बजे गाड़ी पहुँचेगी, आप बता सकते हैं?' 

महेंद्र ने उत्तर दिया, 'जहाँ तक मेरा ख़याल है, बारह बजे के क़रीब पहुँचेगी।' 

महेंद्र कनखियों से महिलाओं की ओर देख रहा था। महिलाएँ उसके एकदम सामने बैठी थीं और यदि दृष्टि सीधी करके स्वाभाविक रूप से उन्हें देखता रहता, तो भी शायद न तो चश्माधारी सज्जन को और न महिलाओं को कोई आपत्ति होती, पर उसे अपनी स्वाभाविक संकोचशीलता के कारण उनकी ओर स्थिर दृष्टि से देखने का साहस नहीं होता था। दोनों महिलाएँ बेपर्दा बैठी थीं। उनमें एक की अवस्था प्राय: पैंतीस वर्ष की होगी, वह एक सफ़ेद चादर ओढ़े खड़ी थी, दूसरी बाईस-तेईस वर्ष की जान पड़ती थी, वह एक गुलाबी रंग की सुंदर, सुरुचिपूर्ण साड़ी पहने थी। दोनों यथेष्ट सभ्य और सुशील जान पड़ती थीं। ज्येष्ठा के देखने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता था कि किसी समय वह सुंदर रही होगी, पर अब अस्वस्थता के कारण उसका मुखमंडल बिलकुल निस्तेज जान पड़ता था। कनिष्ठा यद्यपि सौंदर्य-कला की दृष्टि से सुंदरी नहीं थी, तथापि उसके मुख की व्यंजना में एक ऐसी सरल मधुरिमा वर्तमान थी, जो बरबस आँखों को आकर्षित कर लेती थी। 

आज कई कारणों से महेंद्र का जी दिन भर अच्छा नहीं रहा। गाड़ी में बैठने तक वह चिंतित, अन्यमनस्क तथा उदास था। पर गाड़ी में बैठते ही शिष्ट, सुशील तथा सुंदरी महिलाओं के साहचर्य से उसके खिन्न मन में एक सुखद सरलता छा गई। यद्यपि वह संकोच के कारण कुछ कम घबराया हुआ न था, तथापि चश्माधारी सज्जन की भोली आकृति तथा सरल भाव-भंगिमाओं से और महिलाओं की शालीनता से उसे इस बात पर धीरे-धीरे विश्वास होने लगा था कि उनके बीच किसी प्रकार का संकोच अनावश्यक ही नहीं बल्कि अशोभन भी है। 

चश्माधारी सज्जन ने चश्मा उतार कर एक रूमाल से उसे पोंछते हुए पूछा, 'आप क्या शिकोहाबाद जा रहे हैं?' 

'जी नहीं, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। क्या आप शिकोहाबाद में ही रहते हैं?' 

'जी नहीं, मुझे टुँडला जाना है। मैं वहाँ कोर्ट में प्रैक्टिस करता हूँ। इधर कुछ दिनों के लिए घर आया हुआ था। अब अपनी 'वाइफ़' को और 'सिस्टर' को ले कर वापस जा रहा हूँ। 'सिस्टर' की तबीअत ठीक नहीं रहती, इसलिए उसे हवा-बदली के लिए ले जा रहा हूँ।' 

एक साधारण-से प्रश्न के उत्तर में इतनी बातों से परिचित होने पर महेंद्र को नवपरिचित सज्जन की बेतकल्लुफ़ी पर आश्चर्य हुआ और वह मन ही मन मुस्कराने लगा। उसने अनुमान लगाया कि ज्येष्ठा महिला 'सिस्टर' होगी और कनिष्ठा 'वाइफ़'। 

थोड़ी देर में गाड़ी चलने लगी। कोई दूसरा यात्री उस डिब्बे में न आया। 

चश्माधारी महाशय गाड़ी चलने के कुछ देर बाद ऊँघने लगे। वे रह न सके और बँधे हुए बिस्तर को तकिया बना कर एक दूसरे बेंच पर लेट गए और लेटते ही ख़र्राटे लेने लगे। न जाने क्यों, महेंद्र के मन में यह विश्वास जम गया कि इन नवपरिचित महाशय का जीवन बड़ा सुखी है। उनकी बे-तकल्लुफ़ी तथा उनके मुख का आत्म-संतोषपूर्ण भाव देख कर उनके मन में यह विश्वास जमने लगा था और जब उसने उन्हें निश्चिंत सोते हुए तथा ख़र्राटे भरते देखा, तो उसकी यह धारणा दृढ़ हो गई। 

ज्येष्ठा महिला ने भी थोड़ी देर में ऊँघना शुरू कर दिया। वह ऊँघती जाती थी और बीच-बीच में जब ज़बर्दस्त हिचकोला खाती थी तो जाग पड़ती थी। केवल कनिष्ठा महिला पूर्णत: सजग थी। वह कभी खिड़की के बाहर झाँक कर चाँदनी के उज्ज्वल आलोक में शायद 'पल-पल परिवर्तित' प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेती थी, कभी ऊँघनेवाली महिला की ओर देखती थी, कभी ख़र्राटे भरनेवाले महाशय, शायद अपने पति को एक बार सरसरी निगाह से देख लेती थी और कभी महेंद्र को स्निग्ध किंतु विस्मय की उत्सुकता से पूर्ण आँखों से देखने लगती थी। उन आँखों की स्थिर दृष्टि जब महेंद्र पर आ कर पड़ती थी तो, उसे ऐसा मालूम होने लगता कि मोहाविष्ट हुआ जा रहा है और उसकी सारी आत्मा, यहाँ तक कि सारा शरीर भी अपना रूप बदल रहा है और यह किसी अव्यक्त तथा अतींद्रिय मायावी स्पर्श से कुछ का कुछ हुआ जा रहा है। वह उस स्थिर दृष्टि का तेज़ सहन न कर सकने के कारण आँखें फिरा लेता था। 

गाड़ी टटर-टट्ट-टटर-टट्ट शब्द से चली जा रही थी। जाग्रत महिला की गुलाबी साड़ी का आँचल हवा के झोंके से नीचे खिसक कर उसके लहराते हुए घनकुंचित काले केशों की बहार दिखा रहा था। गुलाबी साड़ी भी हवा के ज़ोर से फ़र-फ़र फ़हरा रही थी। महेंद्र पूर्ण जाग्रत अवस्था में स्वप्न देखने लगा। उसे यह भी भ्रम होने लगा कि यह महिला, जो इसके पहले उसके लिए एकदम अज्ञात थी और निश्चय ही सदा अज्ञात रहेगी, न जाने किस चिदानंदमय लोक से अकस्मात आविर्भूत हो कर उसके पास आ बैठी है और गुलाबी रंग की पताका फ़हरा कर विश्व-विजय को निकली है और वह उसका सारथी बन कर उस अनंतगामी रेल रूपी रथ पर चला जा रहा है। सारा विश्व, समस्त मानवी तथा मानसी सृष्टि उसके लिए उस कंपार्टमेंट के भीतर समा गई थी, जिसमें ऊँघनेवाली महिला तथा सोए हुए सज्जन का कोई अस्तित्व नहीं था, और उसके बाहर क्षण-क्षण में परिवर्तित होनेवाले अस्थिर माया जगत का चिर चंचल रूप एकदम असत्य सत्ताहीन-सा लगता था। 

महेंद्र सोचने लगा कि उसने जीवन में कितनी ही स्त्रियों को विभिन्न रूपों तथा विचित्र परिस्थितियों में देखा है, पर आज का यह बिलकुल साधारण-सा अनुभव उसे क्यों ऐसा अपूर्व तथा अनुपम लग रहा है। वह सोच ही रहा था कि फिर उस विश्व-विजयिनी ने अपनी सुंदर विस्मित आँखों की रहस्यमयी उत्सुकता से भरी स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा। वह मन ही मन संबोधित करते हुए कहने लगा, चिर अज्ञाता, चिर अपरिचिता देवी! तुम मुझसे क्या चाहती हो। तुम्हारी इस मर्मभेदिनी दृष्टि का क्या अर्थ है? दैवयोग से महाकाल के इस नगण्यतम क्षण में, जिसकी सत्ता महासागर में एक क्षुद्रतम बुदबुदे के बराबर भी नहीं है, हम दोनों का आकस्मिक मिलन घटित हुआ है, और महासागर में बुदबुदे की तरह यह क्षण सदा के लिए विलीन हो जाएगा। तथापि इतने ही अर्से में क्या तुम हम दोनों के जन्मांतर के संबंध से परिचित हो गई अथवा यह सब कुछ नहीं है? तुम्हारी आँखों की उत्सुकता का कोई मूल्य नहीं है, मेरी विह्वल भावुकता का कोई महत्व नहीं है! महत्वपूर्ण जो कुछ है, वह है तुम्हारे पास लेटे हुए व्यक्ति का ख़र्राटे भरना। 

शिकोहाबाद पहुँचने पर चश्माधारी सज्जन की नींद न टूटी और ज्येष्ठा महिला ऊँघती रही। पर महेंद्र की विश्व-विजयिनी की आँखों में एक क्षण के लिए भी निद्रा-रसावेश का लेश नहीं दिखाई दिया। वह बीच-बीच में अपनी मर्म-भेदिनी दृष्टि की प्रखर उत्सुकता से उसके हृदय को अकारण निर्मम रूप से बिद्ध करती चली जाती थी। फलस्वरूप महेंद्र की गुलाबी मोहकता भी शिकोहाबाद पहुँचने तक अखंड बनी रही। 

शिकोहाबाद पहुँचने पर विश्व-विजयिनी ने चश्माधारी सज्जन के किंचित स्थूल शरीर को हाथ से हिलाते हुए जगाया। ऊँघती हुई महिला भी सँभल कर बैठ गई। कुलियों से सामान उतरवा कर चारों व्यक्ति उतर पड़े। दिल्लीवाली गाड़ी जिस प्लेटफ़ार्म पर लगनेवाली थी, वहाँ को जाने के लिए पुल पार करना पड़ा। पुल पार करके वे लोग जिस प्लेटफ़ार्म पर आए, वहाँ कहीं एक भी बत्ती जली हुई नहीं थी। पर चूँकि सर्वत्र निर्मल चाँदनी छिटक रही थी, इसलिए बत्ती की कोई आवश्यकता न जान पड़ी। गाड़ी के आने में अभी डेढ़ घंटे की देर थी। चश्माधारी महाशय एक बेंच पर बिस्तर फैला कर लेट गए। दोनों महिलाएँ भी नीचे रखे हुए सामान के ऊपर बैठ गईं। 

चश्माधारी सज्जन ने महेंद्र से कहा, 'आप भी किसी बेंच पर बिस्तर बिछा कर लेट जाइए।' 

पर कोई बेंच ख़ाली नहीं थी और न महेंद्र सोने के लिए ही उत्सुक था। आज की रेलवे यात्रा की चंद्रोज्ज्वल रात्रि उसे चिरजाग्रत तथा चिरजीवित स्वप्न-लोक में विचरण का अवसर दे रही थी। वह प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुए अपने अंतर्मन में नवोद्घाटित जीवन-वैचित्र्य की चहल-पहल देख कर विस्मित हो रहा था। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था कि वह जीवन की मधुरिमा से आज प्रथम बार परिचित हो रहा था। रेलवे लाइन के उस पार दिगंत विस्तृत ज्योत्स्ना-राशि अपने आवेश में स्वयं पुलकित हो रही थी और सामने काफ़ी दूर पर दो रक्तरंजित गोलाकार प्रकाश-चिह्न आकाश-दीप की तरह मानो आनंदोज्ज्वल रंगीन जीवन का मार्ग उसके लिए इंगित कर रहे थे। रेलगाड़ी में हो कर वह अनेक बार आया था और गया था और कितनी ही बार उसे रात के समय स्टेशनों पर गाड़ी के इंतिज़ार में ठहरना पड़ा था, पर आज की ऐंद्रजालिक उल्लासपूर्ण अनुभूति उसके लिए एकदम नई थी। इस बार इंद्रजाल के उद्घाटन का श्रेय जिसको था, वह मायाविनी इस समय टीन की छत के नीचे की छाया में बैठी हुई थी और अंधकार में उसकी आँखों के जादू का चलना बंद हो गया था। पर वहाँ पर मात्र उसका अस्तित्व ही महेंद्र की आत्मा में मायालोक की मोहकता का सृजन करने के लिए पर्याप्त था। 

वह टहलते-टहलते न मालूम किन निरुद्देश्य स्वप्नों की माया के फेर में पड़ा हुआ था कि अचानक चश्माधारी महाशय ने बेंच पर से पुकारते हुए कहा, 'अरे जनाब, कब तक टहलिएगा। अगर लेटना नहीं चाहते, तो यहाँ पर बैठ तो जाइए। नींद तो अब आवेगी नहीं। इसलिए गाड़ी के आने तक गप-शप ही रहे।' महाशयजी पहले ही काफ़ी सो चुके थे इसलिए अब नींद नहीं आ रही थी। महेंद्र मुस्कराता हुआ उनके पास अपने सूटकेस के ऊपर बैठ गया। 

महाशयजी ने कहा, 'आप दिल्ली में कहीं मुलाज़िम हैं?' 

'जी नहीं।' 

'तब आप क्या करते हैं, आप खद्दर पहने हैं, क्या आप राजनीतिज्ञ हैं?' 

'पहले था, अब नहीं के बराबर हूँ।' 

'वह कैसे?' 

इस प्रश्न के उत्तर में महेंद्र ने परम क्लांति का भाव दिखाते हुए कहा, 'अरे साहब, सुन के क्या कीजिएगा। व्यर्थ में आपके संस्कारों को आघात पहुँचेगा। इस चर्चा को हटाइए और किसी अच्छे विषय की चर्चा चलाइए।' 

स्वभावत: चश्माधारी का कौतूहल बढ़ा। उन्होंने आग्रह के साथ कहा, 'फिर भी ज़रा सुनें तो सही। आख़िर कौन-सी ऐसी बात हो गई।' 

महेंद्र की सुप्त स्मृतियाँ तिलमिला उठीं थीं। कनखियों से उसने देखा, प्राय: अंधकार में बैठी हुई मायाविनी महिला का ध्यान उसी की ओर था। पल में उसके मानसिक चक्षुओं के आगे उसके सारे विगत जीवन के व्यर्थता के दु:खद संस्मरणों की झाँकी चित्रपट पर क्रम से परिवर्तित होनेवाले चित्रों की तरह भासमान होने लगी। भाव के आवेश में आ कर उसने कहा, 'अच्छा तो सुनिए। ग्यारह वर्ष से ले कर तीस वर्ष तक की अवस्था तक गाँधी के सिद्धांतों के पीछे पागल हो कर, भूखों रह कर, पग-पग ठोकरें खा कर, समाज तथा परिवार की फटकारें सह कर, जीवन के सब सुखों को अपने ध्येय के लिए तिलांजलि दे कर, राष्ट्रीय आदर्श को ब्रह्मतत्व से भी अधिक महत्व दे कर सच्ची लगन से अपनी सारी आत्मा को निमज्जित करके देश का काम किया। तीन बार काफ़ी अवधि के लिए जेल में सड़ता रहा, बार-बार पुलिस के डंडे सर पर पड़ते रहे। ज़मीन-जायदाद कुर्क हो गई, माता-पिता अपनी कपूत संतान के कारण तबाह हो कर मानसिक और शारीरिक पीड़ा की पराकाष्ठा भोग कर चल बसे, पत्नी तड़प-तड़प कर अपने भाग्य को कोसती हुई मर गई। फिर भी मैं राष्ट्र से कल्याण के परम ध्येय को स्त्री, परिवार, आत्मा और परमात्मा से बहुत ऊँचा मानता हुआ सच्ची लगन से काम करता रहा। जब अंतिम बार जेलख़ाने में बंदी मियाद पूरी करने के बाद थका-माँदा मन तथा शरीर से क्लिष्ट और क्लांत हो कर मैं बाहर आया, तब एक-एक करके उन स्नेही जनों की स्मृतियाँ मेरे मन में उदित हो-हो कर व्यक्त होने लगीं, जिनकी मैं सदा अवज्ञा करता आया था। अपनी पत्नी से मैंने जीवन में शायद दो दिन भी घनिष्ठता से बातें न की होंगी। जब मैं बाहर रहता था, तो उसके पत्र बराबर मेरे पास आते रहते थे और मैं सरसरी दृष्टि से पढ़ कर अवज्ञा से फाड़ कर फेंक देता था। एक या दो बार से अधिक मैंने उसके पत्रों का उत्तर नहीं दिया और दो बार जो उत्तर दिया था, वह भी चार पंक्तियों में बिल्कुल रूखे-सूखे ढंग से। अब जब मैं अपने को सारे संसार में अकेला, स्नेह तथा संवेदना से वंचित, असहाय तथा निरुपाय अनुभव करने लगा तो उसकी भोली-भाली, सकरुण, स्नेह की वेदना से भरी सहज सलोनी मूर्ति प्रतिपल मेरी आँखों के आगे भासित होने लगी। उसके पत्रों में सरल शब्दों में वर्णित कातर व्याकुलता के हाहाकार की पुकार मानो मेरी स्मृति के अतुल गह्वर में दीर्घ सुप्ति की घोर जड़ता के बाद अकस्मात जागरित हो कर मेरे हृदय पर जलते हुए अंगारों के गोलों से आघात करने लगी। अपने जीवन में कभी किसी बात पर नहीं रोया था। माता-पिता तथा पत्नी, किसी की मृत्यु पर आँसू की एक बूँद मेरी आँखों से न निकली थी। अब रह-रह कर उन लोगों की याद में बिलख-बिलख कर मैं बार-बार रो पड़ता। मेरी स्नेहशील पतिपरायण पत्नी की करुण पुण्यछवि उज्ज्वल नक्षत्र की तरह मेरी आँखों के आगे स्पष्ट भासमान होने लगी। रह-रह कर मेरा जी विकल हो उठता था और मुझे ऐसा प्रतीत होने लगता, जैसे मेरे हृदय में किसी के निष्कलंक सुकुमार प्राणों की पैशाचिक हत्या का अपराध पाषाण-भार की तरह पड़ा हो। बहुत दिनों तक इस नृशंस अपराध की भयंकर अनुभूति का भूत मेरी आत्मा को अत्यंत निष्ठुरता से दबाता रहा। अब भी यह भौतिक आतंक कभी-कभी मेरे मन में जागरित हो उठता है। फिर भी अब मैंने अपने मन को बहुत समझा लिया है और जीवन को एक नई दृष्टि से नए रूप में देखने लगा हूँ और साधारण से साधारण घटना भी कभी-कभी मेरे मन में एक अलौकिक आनंद का आश्चर्य उत्पन्न करने लगती है। किसी स्त्री को देखते ही अब मेरे हृदय में एक श्रद्धा-पूर्ण उत्सुकता का भाव जाग पड़ता है। ऐसा मालूम होने लगता है, जैसे अपने जीवन में पहले स्त्री को देखा भी न हो, अब पहली बार इस आनंददायिनी रहस्यमयी जाति के अस्तित्व का अनुभव मुझे हुआ हो।' 

महेंद्र का लंबा लेक्चर समाप्त होते ही चश्माधारी सज्जन 'हा हा' करके ठठा कर हँसते हुए बोले, 'आप भी बड़े मज़े के आदमी हैं। ख़ूब!' यह कह कर वह बेंच पर आराम से लेट गए और उन्होंने आँखें बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद वह ज़ोरों से ख़र्राटे लेने लगे। 

एक लंबी साँस लेते हुए महेंद्र ने प्राय: अंधकार में अस्पष्ट झलकती हुई गुलाबी साड़ी की ओर देखा। दो आँखों की मार्मिक दृष्टि से तीव्र मोहकता उस अर्द्ध अंधकार में भी विस्मित वेदना की उत्सुक उज्ज्वल रेखाओं को विकीरित कर रही थी। महेंद्र पुलक-विह्वल हो कर मंत्र-मुग्ध-सा बैठा रहा। 

घंटी बजी, दिल्ली को जानेवाली गाड़ी के आने की सूचना देते हुए सिगनल डाउन हुआ। सामने रक्त आकाश-द्वीप के बदले हरे रंग का प्रकाश जल उठा। यह हरित आलोक महेंद्र के मानस-पट में साड़ी के गुलाबी रंग के साथ मिल कर एक स्निग्ध-शुचि सौंदर्य-लोक का सृजन करने लगा। 

थोड़ी देर में दूर ही से गाड़ी का सर्चलाइट दिखाई दिया। चश्माधारी महाशय महेंद्र के जगाने पर फड़फड़ाते हुए उठे। कुलियों ने सामान सँभाल लिया। भक-भक करती हुई गाड़ी प्लेटफ़ार्म पर आ लगी। बड़ी भीड़ थी। चश्माधारी सज्जन को महिलाओं के साथ कुली लोग इंजन के उल्टी ओर बहुत दूर तक ले गए। कहीं स्थान न पा कर अंत में एक डिब्बे में ज़बर्दस्ती घुस गए। महेंद्र भी उन लोगों के साथ-साथ जा रहा था पर जिस डिब्बे में वे लोग घुसे, उस डिब्बे में स्थान का निपट अभाव देख कर वह विवश हो कर एक दूसरे डिब्बे में चला गया। वहाँ भी काफ़ी भीड़ थी। किसी प्रकार उसने अपने बैठने के लिए थोड़ा-सा स्थान बनाया। 

गार्ड ने सीटी दी। गाड़ी चल पड़ी। महेंद्र के मस्तिष्क में नाना अस्पष्ट भावनाएँ चक्कर काटने लगीं। दो दिन से उसे नींद नहीं आई थी। आज भी वह अभी तक सो नहीं पाया। इसलिए सोचते-सोचते वह ऊँघने लगा। ऊँघते हुए उसने देखा कि गुलाबी रंग की साड़ी द्रौपदी के चीर की तरह फैलती हुई अकारण सारे आकाश में छा गई है। सहसा दो स्थानों पर वह गगनव्यापी साड़ी फटी और उन दो छिद्रों से हो कर दो वेदनाशील, तीक्ष्ण, उज्ज्वल आँखें तीर की तरह प्रखर वेग से उसकी ओर धावित हो कर एक रूप में मिल कर एक बड़ी आँख के आकार में परिणत हो गईं। वह बड़ी आँखें उसके शरीर को छेद कर उसके हृत्पिंड को छू कर फिर ऊपर आकाश की ओर तीर की तरह छूटीं और आकाश में फैली हुई गुलाबी साड़ी में जा लगीं और फट कर फिर से दो सुंदर, किंतु करुणा-विकल आँखों के आकार में विभक्त हो गईं। 

टुँडला स्टेशन पर गाड़ी ठहरने पर महेंद्र पूर्णत: सचेत हो कर बैठ गया। चश्माधारी महाशय दोनों महिलाओं को साथ ले कर कंपार्टमेंट से बाहर उतरे और सामान को कुलियों के हवाले करके उनके साथ बाहर फाटक की ओर चले। महेंद्र ने अपने कंपार्टमेंट से अपनी विश्वविजयिनी को देखा। वह इस उत्सुकता में था कि एक बार अंतिम समय के लिए दोनों की आँखें चार हो जावें, पर न हुईं और गुलाबी साड़ी से आवृत सजीव प्रतिमा व्यस्त विह्वल-सी आगे को निकल गई। 

टुँडला से गाड़ी छूटने पर महेंद्र के कानों में चश्माधारी सज्जन के ठठा कर हँसने का शब्द गूँजने लगा। उसके अदृष्ट का चिर व्यंग्य पुकार मानो बार-बार कहता था - हा हा! आप भी बड़े मज़े के आदमी हैं : ख़ूब! 

प्रस्‍तुत‍ि- अलकनंदा स‍िंंह

Friday, 3 December 2021

जन्‍मदिन विशेष: आसमान में धान बोने वाले कवि थे ‘विद्रोही’


‘विद्रोही’ के नाम से पहचाने जाने वाले कवि रमाशंकर यादव का जन्‍म 3 दिसंबर 1957 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिला अंतर्गत आहिरी फिरोजपुर गांव में हुआ।

उनकी आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। सुल्तानपुर में उन्होंने स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने कमला नेहरू इंस्टीट्यूट में वकालत करने के लिए दाखिला लिया लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर सके। उन्होंने १९८० में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर में प्रवेश लिया। १९८३ में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल दिया गया। इसके बावजूद वे आजीवन जेएनयू में ही रहे।

वे कहते थे, "जेएनयू मेरी कर्मस्थली है। मैंने यहाँ के हॉस्टलों में, पहाड़ियों और जंगलों में अपने दिन गुज़ारे हैं।" वे बिना किसी आय के स्रोत के छात्रों के सहयोग से किसी तरह कैंपस के अंदर जीवन बसर करते रहे

प्रगतिशील परंपरा के इस कवि की रचनाओं का एकमात्र प्रकाशित संग्रह ‘नई खेती’ है। इसका प्रकाशन इनके जीवन के अंतिम दौर २०११ ई में हुआ। वे स्नातकोत्तर छात्र के रूप में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से जुड़े। यह जुड़ाव आजीवन बना रहा। इनका निधन ८ दिसंबर २०१५ को ५८ वर्ष की अवस्था में हो गया।
विद्रोही मुख्यतः प्रगतिशील चेतना के कवि हैं। उनकी कविताएं लंबे समय तक अप्रकाशित और उनकी स्मृति में सुरक्षित रही। वे अपनी कविता सुनाने के अंदाज के कारण बहुत लोकप्रि‍य रहे।

जुलूस, नारे, भीड़ और समारोह ही उनकी किताबें थीं। बदलाव की लड़ाइयों के हमवार रहे वे। सबकी बातों के बाद आख़िर में अपनी बात कहते, जोर से कहते और यही उनकी कविता होती। जिसमे इतिहास से वर्तमान तक सिमटा होता। वह इतिहास जो लिखा नहीं गया। जिसे लिखने के बजाय हर बार मिटाया जाता रहा। उसी मिटे हुए को वे सुनाते रहे। कविता में इतिहास को बताते रहे। वे अपने को बचाने की बात कहते हुए एक इतिहासबोध, एक सभ्यता को बचाने की बात करते हैं। 

नई खेती (कविता) में रमाशंकर यादव 'विद्रोही' जी  लिखते हैं कि-

मैं किसान हूँ, आसमान में धान बो रहा हूँ
मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले आसमान में धान नहीं जमता
मैं कहता हूँ कि
गेगले-गोगले
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है

तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ
जिसके खून के गारे से
पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं
क्योंकि मुझको बचाना उस औरत को बचाना है
जिसकी लाश मोहनजोदड़ो के तालाब की आख़िरी सीढ़ी पर पड़ी है
मुझको बचाना उस इंसान को बचाना है
जिसकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी हैं
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है
तुम मुझे बचाओ !
मैं तुम्हारा कवि हूँ।

इसी तरह अवधी भषा की कव‍िता "इहवइ धरतिया हमार महतरिया" में ल‍ि‍खा है क‍ि-  

अमवा इमिलिया महुवआ की छइयाँ

जेठ बैसखवा बिरमइ दुपहरिया

धान कइ कटोरा मोरी अवध कइ जमिनिया

धरती अगोरइ मोरी बरख बदरिया

लगतइ असढ़वा घुमड़ि आये बदरा

पड़ि गईं बुनिया जुड़ाइ गयीं धरती

गुरबउ गरीब लइ के फरुहा कुदरिया

तोरइ चले बबुआ जुगदिया कै परती

पहिलइ वरवा पथरवा पै परिगा

छटकी कुदार मोर खुलि गा कपरवा

मितवा न जनव्या जमिनिया क पिरिया

टनकइ खोपड़ी मोरा दुखवा अपरवा

खुनवा बहा हइ मोरा जइसे पसिनवा

तोर तोर परती बनाइ दिहे जमता

इहवइ धरतिया हमार महतरिया

मरेउ पै न जइहैं जमिनिया क ममता

उहवइ धरती मोरी होइ गइ हरनवा

इहवइ हयेन मोरे दुख के करनवा

सथवा निभाइ देत्या मितवा दुलरुआ

छिड़ी बा लड़ायी मोरे खेते खरिहनवा

हमरी समरिया गहे जे तरुअरिया

ओनही के गीत गाना ओनही के रगिया

हम खुनवा रँगि-रँगि रेसम कै पगड़िया

बबुआ बाँधब तोरे मथवा पै पगिया

हमरा करेजवा जनमवइ क बिरही

अब न बुतायी मोरी छतिया कै अगिया

हम छनही मा बारि के बुताइ देबइ दुनिया

बहुतइ बिरही मोरे बिरहा कै अगिया...।


कव‍िता "औरतें" को कुछ इस तरह ल‍िखा है कि‍- 

कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी

ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है

और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं

ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है


मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ

क्या जल्दी है


मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ

औरतों की अदालत में तलब करूँगा

और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा


मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा

जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किए हैं

मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा

जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं

मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा

जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होंगी.


मैं उन औरतों को

जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर और चिता में जलकर मरी हैं

फिर से ज़िंदा करूँगा और उनके बयानात

दोबारा कलमबंद करूँगा

कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?

कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया?

कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?


क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ

जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में

ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झाँका तक नहीं

और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली

जो खुले में पसर गयी है माँ मेदिनी की तरह


औरत की लाश धरती माता की तरह होती है

जो खुले में फैल जाती है थानों से लेकर अदालतों तक


मैं देख रहा हूँ कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है

चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित और तमगों से लैस

सीना फुलाए हुए सिपाही महाराज की जय बोल रहे हैं.


वे महाराज जो मर चुके हैं

महारानियाँ जो अपने सती होने का इंतजाम कर रही हैं

और जब महारानियाँ नहीं रहेंगी तो नौकरियाँ क्या करेंगी?

इसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं.


मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है

जिनके पति ज़िंदा हैं और रो रहे हैं


कितना ख़राब लगता है एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना

जबकि मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता


औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं

औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं

औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं

मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं


इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?

मैं नहीं जानता

लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,

मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी

जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?

मैं नहीं जानता

लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी

और यह मैं नहीं होने दूँगा.

वे अपनी परंपरा को क‍ितना मान देते हैं, इसे "दुनिया मेरी भैंस" में कहा है- 

मैं अहीर हूँ
और ये दुनिया मेरी भैंस है
मैं उसे दुह रहा हूँ
और कुछ लोग कुदा रहे हैं
ये कउन (कौन) लोग हैं जो कुदा रहे हैं ?
आपको पता है.
क्यों कुदा रहे हैं?
ये भी पता है.
लेकिन एक बात का पता
न हमको है न आपको न उनको
कि इस कुदाने का क्या परिणाम होगा
हाँ ...इतना तो मालूम है
कि नुकसान तो हर हाल में खैर
हमारा ही होगा
क्योंकि भैंस हमारी है
दुनिया हमारी है!

"राजा रानी किसी का पानी" पर ल‍िखे उनके आत्‍मसम्‍मान से भरे ये शब्‍द भी पढ़‍िए - 

राजा रानी किसी का पानी नहीं भरते हैं हम
सींच कर बागों को अपने अब हरा करते हैं हम।

शर्म से सिकुड़ी हुई इस देह को हैं तानते
दोस्तो, अपने झुके कन्धे खड़ा करते हैं हम।

ऐसा करने में है जलता ख़ून, तुम मत खेल जानो
मोम जैसे दिल को पत्थर-सा कड़ा करते हैं हम।

मान जाएँ हार अपने ऐसी तो आदत नहीं
बाद मरने के भी काफ़िर मौत से लड़ते हैं हम।

आग भड़काने के पीछे अपना ही घर फूँक डालें
सोचिएगा मत कि ख़ाली शायरी करते हैं हम। 

और अंत में 'तुम्हारा भगवान' पर ल‍िखी ये कव‍िता झकझोरती हैं हमें-

तुम्हारे मान लेने से
पत्थर भगवान हो जाता है,
लेकिन तुम्हारे मान लेने से
पत्थर पैसा नहीं हो जाता।
तुम्हारा भगवान पत्ते की गाय है,
जिससे तुम खेल तो सकते हो,
लेकिन दूध नहीं पा सकते। 

प्रस्‍तुत‍ि- अलकनंदा स‍िंंह


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