Sunday, 5 September 2021

शिक्षक दिवस पर पढ़िए उन कवियों की रचनाएं, जिन्‍होंने शिक्षक धर्म भी निभाया


 कवि और शिक्षक दोनों का ही धर्म है कि वह समाज को रास्ता दिखाकर उसका मार्गदर्शन करें इसलिए किसी कवि का शिक्षक हो जाना बहुत ही सहज है। उसी तरह किसी शिक्षक का कवि हो जाना भी उतना ही सरल है। आज शिक्षक दिवस के मौके पर पढ़ें उन कवियों की रचनाएं जिन्होंने शिक्षक का धर्म भी निभाया था।


कुमार विश्वास

कुछ छोटे सपनों के बदले,
बड़ी नींद का सौदा करने,
निकल पडे हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे !
वही प्यास के अनगढ़ मोती,
वही धूप की सुर्ख कहानी,
वही आंख में घुटकर मरती,
आंसू की खुद्दार जवानी,
हर मोहरे की मूक विवशता, चौसर के खाने क्या जाने
हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे
निकल पडे़ हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे !

कुछ पलकों में बंद चांदनी,
कुछ होंठों में कैद तराने,
मंजिल के गुमनाम भरोसे,
सपनों के लाचार बहाने,
जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे,
उनके भी दुर्दम्य इरादे, वीणा के स्वर पर ठहरेंगे
निकल पडे़ हैं पांव अभागे, जाने कौन डगर ठहरेंगे

कुछ छोटे सपनों की ख़ातिर
बड़ी नींद का सौदा करने
निकल पड़े हैं पाँव अभागे
जाने कौन नगर ठहरेंगे

वही प्यास के अनगढ़ मोती
वही धूप की सुर्ख़ कहानी
वही ऑंख में घुट कर मरती
ऑंसू की ख़ुद्दार जवानी
हर मोहरे की मूक विवशता
चौसर के खाने क्या जानें
हार-जीत ये तय करती है
आज कौन-से घर ठहरेंगे

कुछ पलकों में बंद चांदनी
कुछ होठों में क़ैद तराने
मंज़िल के गुमनाम भरोसे
सपनों के लाचार बहाने
जिनकी ज़िद के आगे सूरज
मोरपंख से छाया मांगे
उनके ही दुर्गम्य इरादे
वीणा के स्वर पर ठहरेंगे

हरिवंश राय बच्चन

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भ्ाव-सागर तरने को नाव बनाए
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ
उन्मादों में अवसाद लए फिरता हूँ
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ
हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था।

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

मैथिलीशरण गुप्त

तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
सब द्वारों पर भीड़ मची है,
कैसे भीतर जाऊं मैं?

द्बारपाल भय दिखलाते हैं,
कुछ ही जन जाने पाते हैं,
शेष सभी धक्के खाते हैं,
क्यों कर घुसने पाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

तेरी विभव कल्पना कर के,
उसके वर्णन से मन भर के,
भूल रहे हैं जन बाहर के
कैसे तुझे भुलाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

बीत चुकी है बेला सारी,
किंतु न आयी मेरी बारी,
करूँ कुटी की अब तैयारी,
वहीं बैठ गुन गाऊं मैं।
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

कुटी खोल भीतर जाता हूँ
तो वैसा ही रह जाता हूँ
तुझको यह कहते पाता हूँ-
‘अतिथि, कहो क्या लाउं मैं?’
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।

प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को।

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।

प्रस्‍तुत‍ि- अलकनंदा स‍िंंह

Sunday, 29 August 2021

कृष्ण की कविताएं लिखने वाले बांग्ला के प्रसिद्ध कवि काजी नजरूल इस्लाम


 बांग्ला के प्रसिद्ध कवि काजी नजरूल इस्लाम का जन्म 24 मई 1899 को हुआ था। निधन 29 अगस्त 1976 को हुआ। भगवान कृष्ण पर उनकी 5 प्रसिद्ध रचनाएं उनकी पुण्यतिथि पर आपके लिए…

अगर तुम राधा होते श्याम।
मेरी तरह बस आठों पहर तुम,
रटते श्याम का नाम।।
वन-फूल की माला निराली
वन जाति नागन काली
कृष्ण प्रेम की भीख मांगने
आते लाख जनम।
तुम, आते इस बृजधाम।।
चुपके चुपके तुमरे हिरदय में
बसता बंसीवाला;
और, धीरे धारे उसकी धुन से
बढ़ती मन की ज्वाला।
पनघट में नैन बिछाए तुम,
रहते आस लगाए
और, काले के संग प्रीत लगाकर
हो जाते बदनाम।।

सुनो मोहन नुपूर गूँजत है…
आज बन-उपवन में चंचल मेरे मन में
मोहन मुरलीधारी कुंज कुंज फिरे श्याम
सुनो मोहन नुपूर गूँजत है
बाजे मुरली बोले राधा नाम
कुंज कुंज फिरे श्याम
बोले बाँसुरी आओ श्याम-पियारी,
ढुँढ़त है श्याम-बिहारी,
बनमाला सब चंचल उड़ावे अंचल,
कोयल सखी गावे साथ गुणधाम कुंज कुंज श्याम
फूल कली भोले घुँघट खोले
पिया के मिलन कि प्रेम की बोली बोले,
पवन पिया लेके सुन्दर सौरभ,
हँसत यमुना सखी दिवस-याम कुंज कुंज फिरे श्याम

सुनाओ सुमधूर नुपूर गुंजन….
कृष्ण कन्हईया आयो मन में मोहन मुरली बजाओ।
कान्ति अनुपम नील पद्मसम सुन्दर रूप दिखाओ।
सुनाओ सुमधूर नुपूर गुंजन
“राधा, राधा” करि फिर फिर वन वन
प्रेम-कुंज में फूलसेज पर मोहन रास रचाओ;
मोहन मुरली बजाओ।
राधा नाम लिखे अंग अंग में,
वृन्दावन में फिरो गोपी-संग में,
पहरो गले वनफूल की माला प्रेम का गीत सुनाओ,
मोहन मुरली बजाओ।

श्रवण-आनन्द बिछुआ की छंद रुनझुन बोले…
चंचल सुन्दर नन्दकुमार गोपी चितचोर प्रेम मनोहर नवल किशोर।
बाजतही मन में बाणरि की झंकार, नन्दकुमार नन्दकुमार नन्दकुमार।।
श्रवण-आनन्द बिछुआ की छंद रुनझुन बोले
नन्द के अंगना में नन्दन चन्द्रमा गोपाल बन झूमत डोले
डगमग डोले, रंगा पाव बोले लघू होके बिराट धरती का भार।
नन्दकुमार नन्दकुमार नन्दकुमार।।
रूप नेहारने आए लख छिप देवता
कोइ गोप गोपी बना कोइ वृक्ष लता।
नदी हो बहे लागे आनन्द के आँसू यमुना जल सुँ
प्रणता प्रकृति निराला सजाए, पूजा करनेको फूल ले आए बनडार।
नन्दकुमार नन्दकुमार नन्दकुमार।।

तुम्हारी मुरली बाजे धीर…
तुम प्रेम के घनश्याम मै प्रेम की श्याम-प्यारी।
प्रेम का गान तुम्हारे दान मै हूँ प्रेम भीखारी।।
हृदय बीच में यमुना तीर-
तुम्हारी मुरली बाजे धीर
नयन नीर की बहत यमुना प्रेम से मतवारी।।
युग युग होये तुम्हारी लीला मेरे हृदय बन में,
तुम्हारे मोहन-मन्दिर पिया मेहत मेरे मन में।
प्रेम-नदी नीर नित बहती जाय,
तुम्हारे चरण को काँहू ना पाय,
रोये श्याम-प्यारी साथ बृजनारी आओ मुरलीधारी।।

प्रस्‍तुत‍ि- अलकनंदा स‍िंह

Saturday, 28 August 2021

तेरा 'फिराक' तो उस दम तेरा फिराक हुआ, जब उनको प्यार किया मैंने, जिनसे प्यार नहीं


28 अगस्त 1896 को गोरखपुर जिले को गोला तहसील के बनवारपार में एक कायस्थ परिवार में जन्मे फिराक गोरखपुरी का पूरा नाम रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी था। उनकी मृत्‍यु 3 मार्च 1982 को हुई। फिराक गोरखपुरी की शिक्षा अरबी, फारसी व अंग्रेजी में हुई। 29 जून 14 को उनका विवाह जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। कला स्नातक में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान पाने के बाद प्रतिष्ठित परीक्षा आईसीएस में चुने गए। उन्होंने गुल- ए -नगमा,अंदाजे इश्किया शायरी,रूह -ए- कायनात, गजलिस्तान, शेरिस्तान,शबनमिस्तान आदि रचनाएं लिखीं। महात्मागांधी के विचारों से प्रभावित होकर 1920 में फिराक ने नौकरी छोड़ दी। आजादी के जंग में शामिल हो गए। डेढ़ साल की सजा कांटी। 3 मार्च 1982 को उनकी मृत्यु हो गई।

गुल ए नगमा के लिए मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार
फिराक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1930 से लेकर1959 तक अंग्रेजी के अध्यापक रहे। 1970 में उन्हें ‘गुल- ए -नगमा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से भी नवाजा गया। 1970 में साहित्य अकादमी का सदस्य भी बनाया गया। भारत सरकार ने फिराक को पद्मभूषण से सम्मानित किया।
पैतृक गांव में भी नही मिली है पहचान
शासन की उदासीनता के चलते फिराक का गांव में उनके पैतृक भवन का अधिकांश हिस्सा गिर चुका है। गिरे भाग पर फिराक संस्थान के अध्यक्ष डॉक्टर छोटेलाल द्वारा फिराक साहब के नाम से एक जूनियर हाईस्कूल चलाया जाता है। 18 अक्टूबर 2012 को फिराक सेवा संस्थान के अध्यक्ष श्री यादव की मांग पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने कम्युनिटी सेंटर बनाने का आदेश दिया था। बनवारपार में एक बड़े हाल, भव्य मंच, आर्ट गैलरी, वाचनालय, पुस्तकालय, गेस्टरूम व शौचालय आदि के निर्माण के लिए 61 लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया लेकिन हुआ कुछ नही। गांव में एक पुस्तकालय है। जिसका संचालन फिराक सेवा स्थान के अध्यक्ष डॉक्टर छोटे लाल यादव करते हैं।
मशहूर शायर ‘फिराक’ रहने वाले गोरखपुर के थे लेकिन उनकी कर्मस्थली इलाहाबाद रही। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा लेकिन गजलों के कारवां को सलाखें रोक न सकीं।
इविवि के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. अली अहमद फातमी उनको अपना गुरु मानते थे। प्रो. फातमी कहते हैं कि ‘फिराक’ साहब जब गोरखपुर से इलाहाबाद आए तो पं. जवाहर लाल नेहरू से मिले। पं. नेहरू ने उनकी बहुत मदद की। उनकी परेशानी और बेरोजगारी को देखते हुए उन्हें कांग्रेस के कार्यालय में संयुक्त सचिव बना दिया। इंदिरा गांधी फिराक को चाचा कहती थीं।
उस समय कांग्रेस एक दल नहीं बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक था। फिराक साहब के जिम्मे कार्यालय की पूरी जिम्मेदारी थी। एक दिन कार्यालय में छापा पड़ा और वे गिरफ्तार होकर नैनी जेल भेज दिए गए। फिर नैनी से आगरा और फिर लखनऊ भेज दिए गए। आगरा जेल में 18 महीने तक रहे। उस समय आगरा जेल में बंद मौलाना शाहिद फाकरी और अहमद फफूलकी जैसे नामचीन शायरों से मुलाकात हुई और शायरी, गजलें कहने का सिलसिला शुरू हो गया। उनकी शायरी का अंदाज बिल्क़ुल अलग रहता था। 1935 में प्रलेस कार्यकारिणी की बैठक इलाहाबाद में हुई तब फिराक साहब शामिल हुए। प्रलेस की बुनियाद भी ‘फिराक’ साहब के सानिध्य में रखी गई।
उर्दू गजल को ईरान से लाए हिन्दुस्तान
फिराक गोरखपुरी ने उर्दू गजल को ईरान से निकालकर हिन्दुस्तान तक लाने का काम किया। फिराक अक्सर कहते थे कि ‘प्रेमिका से प्रेम करना छोटी बात है, आम लोगों से प्यार करना ज्यादा कठिन।’ इस बारे में उनकी एक शायरी है ‘तेरा फिराक तो उस दम तेरा फिराक हुआ, जब उनको प्यार किया मैंने, जिनसे प्यार नहीं।
फ़िराक़ मूलत: प्रेम और सौन्दर्य के कवि थे। जिसकी झलक उनक काव्य में साफ में दिखती है यहां पढ़‍िए उनकी कुछ ग़ज़लें-

1. 

फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तंहाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी किसू के हो लें हैं

आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ

कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम

कुछ भी अयाँ निहाँ न था कोई ज़माँ मकाँ न था
देर थी इक निगाह की फिर ये जहाँ जहाँ न था

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी

फिर वही रंग-ए-तकल्लुम निगह-ए-नाज़ में है
वही अंदाज़ वही हुस्न-ए-बयाँ है कि जो था

बात निकले बात से जैसे वो था तेरा बयाँ
नाम तेरा दास्ताँ-दर-दास्ताँ बनता गया

जिन की ज़िंदगी दामन तक है बेचारे फ़रज़ाने हैं
ख़ाक उड़ाते फिरते हैं जो दीवाने दीवाने हैं

बस इतने पर हमें सब लोग दीवाना समझते हैं
कि इस दुनिया को हम इक दूसरी दुनिया समझते हैं

दीदार में इक-तरफ़ा दीदार नज़र आया
हर बार छुपा कोई हर बार नज़र आया

खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है

बस्तियाँ ढूँढ रही हैं उन्हें वीरानों में
वहशतें बढ़ गईं हद से तिरे दीवानों में

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की
सौ बात बन गई है ‘फ़िराक़’ एक बात की

मुझ को मारा है हर इक दर्द ओ दवा से पहले
दी सज़ा इश्क़ ने हर जुर्म-ओ-ख़ता से पहले

ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़
तेरे ख़याल की ख़ुशबू से बस रहे हैं दिमाग़

रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग ख़त्म पर आई
वो पौ फटी वो नई ज़िंदगी नज़र आई

रस में डूबा हुआ लहराता बदन क्या कहना
करवटें लेती हुई सुब्ह-ए-चमन क्या कहना

रात भी नींद भी कहानी भी
हाए क्या चीज़ है जवानी भी

वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें
वो इक शख़्स के याद आने की रातें.

2.

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं 

तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं 


मिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैं 

निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं 


जिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाए नादानी 

उसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं 


निगाह-ए-बादा-गूँ यूँ तो तिरी बातों का क्या कहना 

तिरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं 


तबीअ'त अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में 

हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं 


ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता 

उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं 


हयात-ए-इश्क़ का इक इक नफ़स जाम-ए-शहादत है 

वो जान-ए-नाज़-बरदाराँ कोई आसान लेते हैं 


हम-आहंगी में भी इक चाशनी है इख़्तिलाफ़ों की 

मिरी बातें ब-उनवान-ए-दिगर वो मान लेते हैं 


तिरी मक़बूलियत की वज्ह वाहिद तेरी रमज़िय्यत 

कि उस को मानते ही कब हैं जिस को जान लेते हैं 


अब इस को कुफ़्र मानें या बुलंदी-ए-नज़र जानें 

ख़ुदा-ए-दो-जहाँ को दे के हम इंसान लेते हैं 


जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का 

इबारत देख कर जिस तरह मा'नी जान लेते हैं 


तुझे घाटा न होने देंगे कारोबार-ए-उल्फ़त में 

हम अपने सर तिरा ऐ दोस्त हर एहसान लेते हैं 


हमारी हर नज़र तुझ से नई सौगंध खाती है 

तो तेरी हर नज़र से हम नया पैमान लेते हैं 


रफ़ीक़-ए-ज़िंदगी थी अब अनीस-ए-वक़्त-ए-आख़िर है 

तिरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं 


ज़माना वारदात-ए-क़ल्ब सुनने को तरसता है 

इसी से तो सर आँखों पर मिरा दीवान लेते हैं 


'फ़िराक़' अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर 

कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं.


3.  


सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं 

लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं 


दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में 

लेकिन उस जल्वा-गह-ए-नाज़ से उठता भी नहीं 


मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त 

आह अब मुझ से तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं 


एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें 

और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं 


आज ग़फ़लत भी उन आँखों में है पहले से सिवा 

आज ही ख़ातिर-ए-बीमार शकेबा भी नहीं 


बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मक़ाम 

कुंज-ए-ज़िंदाँ भी नहीं वुसअ'त-ए-सहरा भी नहीं 


अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं 

तू ने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं 


आह ये मजमा-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश 

आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं 


ये भी सच है कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर 

ये भी सच है कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं 


यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़ 

मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं 


फ़ितरत-ए-हुस्न तो मा'लूम है तुझ को हमदम 

चारा ही क्या है ब-जुज़ सब्र सो होता भी नहीं 


मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि 'फ़िराक़' 

है तिरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं .

4. 

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी 

ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी 


हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है 

नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी 


कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख उधर 

कि दर्द दर्द है फिर भी नज़र नज़र फिर भी 


ख़ुशा इशारा-ए-पैहम ज़हे सुकूत-ए-नज़र 

दराज़ हो के फ़साना है मुख़्तसर फिर भी 


झपक रही हैं ज़मान ओ मकाँ की भी आँखें 

मगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी 


शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र 

कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बे-सहर फिर भी 


कहीं यही तो नहीं काशिफ़-ए-हयात-ओ-ममात 

ये हुस्न ओ इश्क़ ब-ज़ाहिर हैं बे-ख़बर फिर भी 


पलट रहे हैं ग़रीब-उल-वतन पलटना था 

वो कूचा रू-कश-ए-जन्नत हो घर है घर फिर भी 


लुटा हुआ चमन-ए-इश्क़ है निगाहों को 

दिखा गया वही क्या क्या गुल ओ समर फिर भी 


ख़राब हो के भी सोचा किए तिरे महजूर 

यही कि तेरी नज़र है तिरी नज़र फिर भी 


हो बे-नियाज़-ए-असर भी कभी तिरी मिट्टी 

वो कीमिया ही सही रह गई कसर फिर भी 


लिपट गया तिरा दीवाना गरचे मंज़िल से 

उड़ी उड़ी सी है ये ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी 


तिरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है 

उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेश्तर फिर भी 


ग़म-ए-फ़िराक़ के कुश्तों का हश्र क्या होगा 

ये शाम-ए-हिज्र तो हो जाएगी सहर फिर भी 


फ़ना भी हो के गिराँ-बारी-ए-हयात न पूछ 

उठाए उठ नहीं सकता ये दर्द-ए-सर फिर भी 


सितम के रंग हैं हर इल्तिफ़ात-ए-पिन्हाँ में 

करम-नुमा हैं तिरे जौर सर-ब-सर फिर भी 


ख़ता-मुआफ़ तिरा अफ़्व भी है मिस्ल-ए-सज़ा 

तिरी सज़ा में है इक शान-ए-दर-गुज़र फिर भी 


अगरचे बे-ख़ुदी-ए-इश्क़ को ज़माना हुआ 

'फ़िराक़' करती रही काम वो नज़र फिर भी .


स्रोत : पुस्तक : Gul-e-Naghma प्रकाशन : Maktaba Farogh-e-urdu Matia Mahal Jama Masjid Delhi (2006) संस्करण : 2006

प्रस्‍तुत‍ि : अलकनंदा स‍िंंह


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...