Tuesday, 1 June 2021

बलदेव वंशी: मुलतान में जन्‍मे कव‍ि की आज जयंती, पढ़‍िए उनकी कुछ कव‍िताऐं

भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका निभाने वाले बलदेव वंशी इतने अच्छे कवि और लेखक थे कि उनके शब्दों की गूंज से हिंदी साहित्य जगत आज भी जाज्वल्यमान है. उनका जन्म 1 जून 1938 को मुलतान में हुआ था. उनकी कविताओं में स्वातंत्र्योत्तर भारत के मनुष्य की तकलीफ, संघर्ष और संवेदना को हृदयग्राही अभिव्यक्ति मिली है. उनकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के बीच एक अनोखा तादात्म्य लिए है. उनकी कविताएं एक तरफ दूर-निकट इतिहास के पत्र और परिवेश उठाकर समकालीन जीवन की संभावनाएँ तलाशती हैं तो दूसरी तरफ मिथकों को उठाकर उनके जरिये अपनी बात अपने तरीके से कहने की कोशिश करती हैं.

उनके लगभग पंद्रह कविता संकलन ‘दर्शकदीर्घा से’, ‘उपनगर में वापसी’, ‘अंधेरे के बावजूद’, ‘बगो की दुनिया’, ‘आत्मदान’, ‘कहीं कोई आवाज़ नहीं’, ‘टूटता हुआ तार’, ‘एक दुनिया यह भी’, ‘हवा में खिलखिलाती लौ’, ‘पानी के नीचे दहकती आग’, ‘खुशबू की दस्तक’, ‘सागर दर्शन’, ‘अंधेरे में रह दिखाती लौ, ‘नदी पर खुलता द्वार’, ‘मन्यु’, ‘वाक् गंगा’, ‘इतिहास में आग’, ‘पत्थर तक जाग रहे हैं’, ‘धरती हांफ रही है’, ‘महाआकाश कथा’, ‘पूरा पाठ गलत’, तथा ‘चाक पर चढ़ी’ नाम से प्रकाशित हो चुके हैं. इनके अलावा दस आलोचक पुस्तकों सहित पैंतालीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित रहीं. उन्होंने ‘दादू ग्रंथावली’, ‘सन्त मलूकदास ग्रंथावली’, ‘सन्त मीराबाई’ और ‘सन्त सहजो कवितावलियाँ’ नाम से भक्ति साहित्य पर भी बड़ा काम किया और ‘कबीर शिखर सम्मान’, ‘मलूक रत्‍न पुरस्कार’ और ‘दादू शिखर सम्मान’ आदि से सम्मनित हुए. 07 जनवरी 2018 को उनका निधन हुआ.
यशस्वी कवि की बलदेव वंशी की जयंती पर पढ़िए उनकी कुछ रचनाएं:
1.
सूर्योदय

सुरमई अंधकार था–
मछुआरी खपरैलों पर बिछा-बिछा
टूटी नावों पर रोया-सोया
भीतर-बाहर लिखा-दिखा
समूचे सागर पर अछोर
इसे बेचने आते हैं त्रिनेत्र !

लो !
देखते-देखते
आरक्त हो उठी
प्रति दिशा-दिशा
रंग गई प्रति लहर-लहर
खिल-खिला उठा राग-
अब जीवन जल
पुन: छलल छलल छलल…

2.
जन-समुद्र

समुद्र की लहरों के साथ
लोग खेलते हैं
जबकि समुद्र भी खेलता है लोगों के साथ…

लहरों को अपनी ओर आता देख
पाँव उचका
उछल जाते हैं कौतुकी लोग
पर ये लहरें
उन्हें अपने सर्पमुखी फन पर उठा
किनारे पर छोड़ आती हैं–
लो, यह तुम्हारा किनारा है
इसे थामो !

लहरें
लोगों के किनारे जानती हैं
जबकि इन लोगों को पता नहीं
समुद्र का किनारा कहाँ है

जब-जब किनारा लांघते हैं लोग
तो ये लहरें उन्हें भिगोती-उछालती ही नहीं
अपने में समो लती हैं
जिन हाथों से थपकी देती हैं मस्ती-भरी
उन्हीं से पकड़ कर
बरबस,
भीतर डुबो देती हैं !
क्योंकि इन बेचारे लोगों को
पता नहीं,
समुद्र का किनारा कहाँ है !

3.
अधूरा है: सुन्दर है

अधूरा है!
इसीलिए सुन्दर है!
दुधिया दाँतों तोतला बोल
बुनाई हाथों के स्पर्श का अहसास!
ऊनी धागों में लगी अनजानी गाँठें, उचटने
सिलाई के टूटे-छूटे धागे
चित्र में उभरी, बे-तरतीब रंगतें-रेखाएं

शायद इसीलिए
अभावों में भाव अधिक खिलते हैं,
चुभते सालते और खलते हैं

एक टीस की अबूझ स्मृति
जीवन भर सालने वाली
आकाश को दो फाँक करती तड़ित रेखा
और ऐसा ही और भी बहुत कुछ
जिसे लोग अधूरा या अबूझ मानते आए हैं
उसे ही सयाने लोग
पूरा और सुन्दर बखानते गए हैं

चाहे हुए रास्ते, जीवन और पूरे व्यक्ति
कहाँ मिलते हैं!
नियति के हाथों
औचक मिले
मानसिक घाव
पूरे कहाँ सिलते हैं!…

4.
कैनवास पर काली लकीरें

बड़े करीने से
आकाँक्षा को काटकर
सजा दिया था कैनवस पर
मौन क्रन्दन !

तुम्हारा आत्मविश्वास
सम्वेदन
दुर्लभ स्पन्द
और सन्तुलन !
बड़ी महीन और तीखी और नफ़ीस
लकीरें कुछ
उकेर दी थीं तुमने
बचपन की
कैनवास पर खिंची
काली लकीरें
कला की क्या-क्या ख़ूबियाँ
बयाँ करतीं…

अचानक एक दिन घर आए
एक माहिर चित्रकार ने देखा वह
कोरा कैनवास
तो चकित रह गया । देखता
कि कैसे एक भोला बचपन
खिंची उन लकीरों में
उधर का
क्या कुछ नहीं कह गया !…

5.
लड़की का इतिहास

हर बाग़ का एक इतिहास होता है जैसे-
इस बाग़ का भी अपना एक इतिहास है
हर व्यक्ति का एक इतिहास होता है जैसे
इस लड़की का भी अपना एक इतिहास है
हर लड़की एक बाग़ होती है जैसे
इस लड़की का भी अपना एक बाग़ है

सबसे पहले यह एक लड़की है
जो बाग़ लगाती हुई इतिहास बनाती है
साथ-साथ कई-कई क्यारियाँ
जुदा-जुदा कई-कई फुलवारियाँ सजाती है

ख़ुशबू और रंग का
पहचान और पहनावे का अलग-अलग सिलसिला…

क्योंकि वह लड़की बाग़ है
इसलिए फूलों को तोड़ने
और भँवरों के मंडराने पर रोक है…

लड़की की पदचापों के संकेतों पर
खिलते हैं फूल; महकती हैं फूलवारियाँ
लड़की की साँसों के सुरों में
गाते हैं पक्षी, सजती हैं क्यारियाँ
ख़ुशबू की दस्तकें
झक्क खिली हरियाली के कहकहे…

यों इन फूल-बेलों से भारी / क्यारियों से घिरे-
मक़बरों / और उनकी पथराई ख़ामोशियों का भी
अपना इतिहास है…

लड़की कहीं कुछ बेल-बीज बो कर
गाती-गुनगुनाती करती है इन्तज़ार-
बेलों के दीवारों पर चढ़ने
दीवारों को फांदने का…

फिर एक दिन
इन बेलों के नाज़ुक इरादों के साथ
लड़की दीवार फांद
इतिहास में बदल जाती है

यों बाग़ों का इतिहास-
लड़की का इतिहास है-
जहाँ मुर्दे-गड़े मक़बरें हैं जीवित
डबडबाए पानी के तालाब; फूलों के सघन झाड़
गाते पक्षियों के समूह, मंडराते भँवरों के झुंड
ख़ामोश दीवारों के लम्बे साए…
यहाँ और-और लड़कियाँ आईं
आती रहीं…
यहाँ और-और फूल खिले
खिलते रहे…
यहाँ और-और मक़बरे बने
बनते रहे…
यहाँ और-और बेलें खिलीं
खिलती रहीं…
अपनी ख़ुशबुओं महकी मिट्टी को
अंजुरी में उठाए,
टप-टप आँसुओं भिगोती रही लड़की
बाग़ में चोरी छिपे
आती रही लड़की
जाती रही लड़की

फूल और पत्थर के साथ-साथ होने के
नए-नए रिश्तों के साथ
फूल खिलते रहे
बेलें दीवारें फांदती रहीं
मक़बरों की दीवारें उन्हें देखती ख़ामोश…

यों बड़े-बड़े ऎतिहासिक बाग़ों को
बाग़ों के इतिहासों को
लड़की ने बनाया है
अपनी ख़ुशबूदार साँसों से
दीवार फांदनी बेलदार इच्छाओं
डबडबाए तालाबों
और मक़बरा बनती देहों से
सजाया है!

-Legend News

Friday, 28 May 2021

#पुण्‍यतिथि: मथुरा में जन्‍मे ब्रजभाषा और पिंगल के मर्मज्ञ साहित्‍यकार एवं कवि #पद्मश्री गोपाल प्रसाद व्‍यास


ब्रजभाषा और पिंगल के मर्मज्ञ साहित्‍यकार एवं कवि पद्मश्री गोपाल प्रसाद व्‍यास की आज पुण्‍यतिथि है। 13 फरवरी 1915 को मथुरा जिले के कस्‍बा गोवर्धन अंतर्गत पारसौली गांव में पैदा हुए पंडित गोपालप्रसाद व्यास हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। उनका निधन 28 मई 2005 को दिल्‍ली में हुआ।

व्यास को भारत सरकार ने पद्मश्री, दिल्ली सरकार ने शलाका सम्मान और उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से विभूषित किया था।
दिल्ली के हिंदी भवन का निर्माण कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। लाल किले पर हर वर्ष होने वाले राष्ट्रीय कवि सम्मेलन की शुरुआत में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है।
गोपाल प्रसाद व्‍यास की प्रारंभिक शिक्षा पहले पारसौली के निकट भवनपुरा में हुई और उसके बाद अथ से इति तक मथुरा में केवल कक्षा सात तक। स्वतंत्रता-संग्राम के कारण उसकी भी परीक्षा नहीं दे सके और स्कूली शिक्षा समाप्त हो गई। गोपाल प्रसाद व्‍यास ने पिंगल की पढ़ाई स्व. नवनीत चतुर्वेदी से की। अंलकार, रस-सिद्धांत आदि सेठ कन्हैयालाल पोद्दार से पढ़े। नायिका भेद का ज्ञान सैंया चाचा से और पुरातत्व, मूर्तिकला, चित्रकला आदि का डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल से। विशारद और साहित्यरत्न का अध्ययन तथा हिन्दी के नवोन्मेष का पाठ पढ़ा डॉ. सत्येन्द्र से।
गोपाल प्रसाद व्‍यास पत्रकारिता के क्षेत्र में भी खूब सक्रिय रहे। वे ‘साहित्य संदेश’ आगरा, ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ दिल्ली, ‘राजस्थान पत्रिका’ जयपुर, ‘सन्मार्ग’, कलकत्ता में संपादन तथा दैनिक ‘विकासशील भारत’ आगरा के प्रधान संपादक रहे। स्तंभ लेखन में भी सन्‌ 1937 से अंतिम समय तक निरंतर संलग्न रहे।
इसके अलावा व्‍यास जी ने ब्रज साहित्य मंडल मथुरा के संस्थापक और मंत्री से लेकर अध्यक्ष तक का दायित्‍व निभाया। दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक और 35 वर्षों तक महामंत्री और अंत तक संरक्षक। श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास समिति के संस्थापक महामंत्री के पद पर अंत तक रहे। लाल किले के ‘राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन’ और देशभर में होली के अवसर पर ‘मूर्ख महासम्मेलनों’ के जन्मदाता और संचालक भी व्‍यास जी ही थे।
पढ़िए गोपाल प्रसाद व्‍यास की कुछ चुनिंदा रचनाएं:

बुद्धिप्रकाश, विद्यासागर?
पर अब कुछ दिन को कहा मान,
तुम लाला मूसलचंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!

यदि मूर्ख बनोगे तो प्यारे,
दुनिया में आदर पाओगे।
जी, छोड़ो बात मनुष्यों की,
देवों के प्रिय कहलाओगे!

लक्ष्मीजी भी होंगी प्रसन्न,
गृहलक्ष्मी दिल से चाहेंगी।
हर सभा और सम्मेलन के
अध्यक्ष बनाए जाओगे!

पढ़ने-लिखने में क्या रक्खा,
आंखें खराब हो जाती हैं।
चिंतन का चक्कर ऐसा है,
चेतना दगा दे जाती है।

इसलिए पढ़ो मत, सोचो मत,
बोलो मत, आंखें खोलो मत,
तुम अब पूरे स्थितप्रज्ञ बनो,
सच्चे संपूर्णानन्द बनो ।

अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
मत पड़ो कला के चक्कर में,
नाहक ही समय गंवाओगे।
नाहक सिगरेटें फूंकोगे,
नाहक ही बाल बढ़ाओगे ।
पर मूर्ख रहे तो आस-पास,
छत्तीस कलाएं नाचेंगी,
तुम एक कला के बिना कहे ही,
छह-छह अर्थ बताओगे।
सुलझी बातों को नाहक ही,
तुम क्यों उलझाया करते हो?
उलझी बातों को अमां व्यर्थ में,
कला बताया करते हो!

ये कला, बला, तबला, सारंगी,
भरे पेट के सौदे हैं,
इसलिए प्रथमतः चरो,
पुनः विचरो, पूरे निर्द्वन्द्व बनो,
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!

हे नेताओ, यह याद रखो,
दुनिया मूर्खों पर कायम है
मूर्खों की वोटें ज्यादा हैं,
मूर्खों के चंदे में दम है।
हे प्रजातंत्र के परिपोषक,
बहुमत का मान करे जाओ!
जब तक हम मूरख जिन्दा हैं,
तब तक तुमको किसका ग़म है?
इसलिए भाइयो, एक बार
फिर बुद्धूपन की जय बोलो !
अक्कल के किवाड़ बंद करो,
अब मूरखता के पट खोलो।
यह विश्वशांति का मूलमंत्र,
यह राम-राज्य की प्रथम शर्त,
अपना दिमाग गिरवीं रखकर,
खाओ, खेलो, स्वच्छंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!

प्रस्‍तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह

Friday, 30 April 2021

सूफिज्म से आगे रूहानी इबादत की बात करते हैं शायर सुरेंद्र चतुर्वेदी

 ‘जिसके पास एहसासों की दौलत हो, वो अल्फाजों की गुलामी नहीं करता।’ तो ऐसे ही अल्फाजों के दौलतमंद हैं सूफिज्म को शायरी के मुकाम में ढालने वाले सूफी शायर सुरेंद्र चतुर्वेदी। अजमेर (राजस्थान) के रहने वाले हरदिल अज़ीज सुरेंद्र चतुर्वेदी के गीत, ‘शब को रोज जगा देता है, कैसे ख्वाब सजा देता है। जब मैं रूह में ढलना चाहूं, क्यों तू जिस्म बना देता है’, उनको चाहने वालों के कानो में अक्सर गूंजते रहते हैं।

सूफिज्म का अहसास तब और गहरा हो जाएगा जब सुरेन्द्र चतुर्वेदी का ये शेर पढ़ेंगे आप –

‘रूह मे तबदील हो जाता है मेरा ये बदन,
जब किसी की याद में हद से गुज़र जाता हूँ मैं।

2017 में एक फिल्‍म आई थी ‘अनवर’, फिल्म का उनका गीत ‘मौला मेरे मौला मेरे, आंखें तेरी कितनी हसीं’ आज भी करोड़ों दिलों को खुद में डुबो लेता है।
फिल्म ‘लाहौर’, ‘घात’, ‘कहीं नहीं’, ‘नूरजहां’ आदि में फिल्माए गए उनके गीतों ने भी उन्हें खूब शोहरत से नवाजा है। टी सीरिज से हिन्दी-उर्दू मिश्रित गीतों पर उनका एक एलबम ‘तन्हा’ जारी कर चुका है।

चतुर्वेदी के अब तक सात गजल संग्रह, एक उपन्यास, ‘अंधा अभिमन्यु’, करीब पंद्रह कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘मानव व्यवहार और पुलिस’ नामक एक मनोविज्ञान पुस्तक भी छप चुकी है, जो आईपीएस को प्रशिक्षण के दौरान पढ़ाई जाती है।

छात्र जीवन से ही लेखन में जुट गए सुरेंद्र चतुर्वेदी दैनिक न्याय, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स, आकाशवाणी, दूरदर्शन और स्थानीय न्यूज चैनल से जुड़े रहे हैं। वह मुशायरों, कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करते रहे हैं।

सतपाल ख़याल लिखते हैं – सुरेन्द्र चतुर्वेदी आजकल मुंबई में फिल्मों में पटकथा लेखन से जुड़े हैं। किसी शायर की तबीयत जब फ़क़ीरों जैसी हो जाती है तो वो किसी दैवी शक्ति के प्रभाव में ऐसे अशआर कह जाता है जिस पर ख़ुद शायर को भी ताज्ज़ुब होता है कि ये उसने कहे हैं।

फ़कीराना तबीयत के मालिक सुरेन्द्र चतुर्वेदी के शेर भी ऐसे ही हैं- ‘रूह मे तबदील हो जाता है मेरा ये बदन, जब किसी की याद में हद से गुज़र जाता हूँ मैं। एक सूफ़ी की ग़ज़ल का शेर हूँ मैं दोस्तों, बेखुदी के रास्ते दिल में उतर जाता हूँ मैं।’

सुरेन्द्र चतुर्वेदी के बारे में गुलज़ार साहब ने कहा है – ‘मुझे हमेशा यही लगा कि मेरी शक़्ल का कोई शख़्स सुरेन्द्र में भी रहता है, जो हर लम्हा उसे उंगली पकड़कर लिखने पे मज़बूर करता है।’

नीरज गोस्वामी के शब्दों के साथ सुरेंद्र चतुर्वेदी की शख्सियत के बारे में थोड़ा और गहरे उतरते हैं। वह लिखते हैं- एक बार जयपुर प्रवास के दौरान वहां के दैनिक भास्कर अखबार में एक छोटी सी खबर छपी कि शायर सुरेन्द्र चतुर्वेदी से जयपुर के शायर लोकेश साहिल ‘आर्ट कैफे’ में बैठ कर बातचीत करेंगे। जयपुर में कोई आर्ट कैफे भी है, ये भी तब तक पता नहीं था।

आइये, उनकी छपी हुई किताब ‘ये समंदर सूफियाना है’ की नज्‍़म है-

खुदाया इस से पहले कि रवानी ख़त्म हो जाए,
रहम ये कर मेरे दरिया का पानी ख़त्म हो जाए।
हिफाज़त से रखे रिश्ते भी टूटे इस तरह जैसे,
किसी गफलत में पुरखों की निशानी ख़त्म हो जाए।
लिखावट की जरूरत आ पड़े इस से तो बेहतर है,
हमारे बीच का रिश्ता जुबानी ख़त्म हो जाए।
हज़ारों ख्वाहिशों ने ख़ुदकुशी कुछ इस तरह से की,
बिना किरदार के जैसे कहानी ख़त्म हो जाए।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी ने अपने लेखन की शुरुआत कविताओं से की और फिर वो कवि सम्मेलनों में बुलाये जाने लगे। मंचीय कवियों की तरह उन्होंने ऐसी रचनाएँ रचीं, जो श्रोताओं को गुदगुदाएँ और तालियाँ बजाने पर मजबूर करें। ज़ाहिर है ऐसी कवि सम्मेलनी रचनाओं ने उन्हें नाम और दाम तो भरपूर दिया लेकिन आत्मतुष्टि नहीं। साहित्य के विविध क्षेत्रों में हाथ आजमाने के बाद अंत में ग़ज़ल विधा में वो सुकून मिला, जिसकी उन्हें तलाश थी।

फैसलों में अपनी खुद्दारी को क्यूँ जिंदा किया।
उम्र भर कुछ हसरतों ने इसलिए झगड़ा किया।
मुझसे हो कर तो उजाले भी गुज़रते थे मगर,
इस ज़माने ने अंधेरों का फ़क़त चर्चा किया।
मैंने जब खामोश रहने की हिदायत मान ली,
तोहमतें मुझ पर लगा कर आपने अच्छा किया।
कुछ नहीं हमने किया रिश्ता निभाने के लिए,
अब जरा बतलाइये कि आपने क्या क्या किया।

सुरेन्द्र जब फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए मुंबई लिए रवाना हुए तो परिवार और इष्ट मित्रों ने उन्हें वहां के तौर तरीकों से अवगत कराते हुए सावधान रहने को कहा। मुंबई के सिने संसार में अच्छे साहित्यकारों की जो दुर्गति होती है, वो किसी से छिपी नहीं। सुरेन्द्र ने मुंबई जाने से पहले किसी भी कीमत पर साहित्य की सौदेबाजी न करने का दृढ़ निश्चय किया। मुंबई प्रवास के शुरुआती दौर में उन्हें अपने इस निश्चय पर टिके रहने में ढेरों समस्याएं आयीं लेकिन वह अपने निश्चय पर अटल रहे।

मुंबई की फिल्म नगरी में दक्ष साहित्यकारों की रचनाओं को खरीद कर या उनसे लिखवा कर अपने नाम से प्रसारित करने वाले मूर्धन्य साहित्यकारों की भीड़ में सुरेन्द्र को एक ऐसा शख्स मिला जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उस अजीम शख्स को हम सब गुलज़ार के नाम से जानते हैं। अपनी एक किताब में सुरेन्द्र कहते हैं “ज़िन्दगी में पहली बार महसूस हुआ कि फ़िल्मी कैनवास पर कोई रंग ऐसा भी है, जो दिखता ही नहीं, महसूस भी होता है।’

वह कहते हैं कि गुलज़ार साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व ने मुझे बेइन्तहा प्रभावित किया। सुरेन्द्र और उनकी शायरी के बारे में गुलज़ार साहब फरमाते हैं, ‘सुरेन्द्र की ग़ज़लों में बदन से रूह तक पहुँचने का ऐसा हुनर मौजूद है, जिसे वो खुद Sufism रंग कहते हैं मगर मेरा मानना है कि वे कभी कभी Sufism से भी आगे बढ़ कर रूहानी इबादत के हकदार हो जाते हैं। कभी वे कबायली ग़ज़लें कहते नज़र आते हैं तो कभी मौजूदा हालातों पर तबसरा करते!’

Literature Desk: Legend News

Thursday, 22 April 2021

पृथ्‍वी दिवस पर पढ़‍िए ''सुमित्रानंदन पंत'' की ये मशहूर कविता

छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत का जन्‍म बागेश्‍वर (उत्तराखंड) के कौसानी में हुआ था। वहां का उनका घर आज ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय बन चुका है। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या तक सब उनके सहज काव्य का उपादान बने।

आज पृथ्‍वी दिवस पर सुमित्रानंदन पंत की वो मशहूर कविता पढ़िए जो बहुत प्रासांगिक है-
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल-फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडे बिछाकर
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था।

अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तबसे
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन
और जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हो
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में
टहल रहा था, तब सहसा, मैंने देखा
उसे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से

देखा-आँगन के कोने में कई नवागत
छोटे-छोटे छाता ताने खड़े हुए हैं
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं प्यारी
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चों से
निर्निमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता
सहसा मुझे स्मरण हो आया,कुछ दिन पहले
बीज सेम के मैंने रोपे थे आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधो की यह पलटन
मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से,
नन्हें नाटे पैर पटक, बढ़ती जाती है।

तब से उनको रहा देखता धीरे-धीरे
अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियाँ,
हरे-भरे टंग गये कई मखमली चँदोवे
बेलें फैल गयी बल खा, आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाड़े की पट्टी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को
मैं अवाक रह गया-वंश कैसे बढ़ता है
छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छीटे
झागों-से लिपटे लहरों श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से,
चोटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से।

ओह, समय पर उनमें कितनी फ़लियाँ फूटी
कितनी सारी फ़लियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ
पतली चौड़ी फलियाँ! उफ उनकी क्या गिनती
लम्बी-लम्बी अँगुलियों – सी नन्हीं-नन्हीं
तलवारों-सी पन्ने के प्यारे हारों-सी,
झूठ न समझे चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़तीं,
सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल
झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी
आह इतनी फलियाँ टूटीं, जाड़ों भर खाई,
सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटबाई
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने
जी भर-भर दिन-रात महुल्ले भर ने खाई
कितनी सारी फ़लियाँ, कितनी प्यारी फ़लियाँ

यह धरती कितना देती है! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्व को
बचपन में स्वार्थ, लोभ-वश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं
इसमें मानव-ममता के दाने बोने हैं
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की- जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ-
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।

प्रस्तुत‍ि: अलकनंदा स‍िंंह 

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...