Blog of Poem, Poem collection of Journalist Alaknanda singh, Nai Kavita, Hindi Kavita,Contemporary Poem
Monday, 26 August 2013
Tuesday, 20 August 2013
अपने भीतर की सड़क
''सखी, मैं तुम्हारे शहर से होकर गुजरूंगा...'' जब भी ये शब्द उसके कानों में पड़ते तभी उसे अहसास हो जाता कि कितनी छोटी है ये दुनिया। गोल गोल घूम कर उसके ही गिर्द अपना घेरा कस लेती है हर बार।
अरे, ये भी कोई बात हुई...भला कोई कहीं से भी गुजरे...शहर की सड़क तो साझा होती है सबकी...जिस सड़क से उसे गुज़रना है वो कहने को तो शहर के बदन को छूती होगी मगर जिस सड़क को उसके सखा के पांव छुयेंगे वो कोई और नहीं उसके शरीर में रेंगती एक एक धमनी और धमनी में जुड़ती तमाम कोशिकाओं से मिलकर बनी सड़क ही है या फिर ऐसी कई सड़कों का जंजाल जो उसके दिल को जकड़े हुये हैं। मगर अच्छी तरह जानती थी वो कि सखा महज उसके शहर की सड़क से गुजरने वाला नहीं वह तो पूरे वज़ूद से रिसता हुआ मन में बह रहा है, और उसे यूं नचाये ही जा रहा है...पता ही नहीं चला कब से ...हर बार की तरह इस बार भी ऐसा ही होने वाला है...जब वो गुजर रहा होगा इसी बाहरी या फिर भीतरी सड़क से।
आंख मिचौनी के खेल में वो माहिर है, आज तक जिसने भी उसे चाहा, इसी भ्रम में रहा कि वो उसी को सबसे ज्यादा मान देता है ,उसे भी यही भ्रम था;.. भ्रम ही रहा और भ्रम ही रहेगा ... पलक झपकते ही हवा हो जाने की आदत जो थी उसकी .... कोई हवा को पकड़ पाया है भला, फिर वो किसतरह उसकी पकड़ में आता ।
वो अच्छी तरह से जानता था कि दुनिया के गोल गोल चक्करों में घिरी उसकी सखी न तो उसे ढूढ़ने सड़कों पर घूमेगी और न ही किसी मंदिर - मठ में उसका पता पूछेगी फिर वो बार बार क्यों ये जताना चाहता था कि वो मेरे शहर से होकर गुजरेगा तो सखी खुशी से उछल पड़ेगी, वो जानता था कि उसके अंतरमन पर उसका काबू अच्छा था, इसीलिए कहीं वो उसे चिढ़ाता तो नहीं ....।
''मैं तुम्हारे शहर से होकर गुजरूंगा'' की पगडंडी पर गुजरते हुये एक तलाश सी आंखों में लिए समय पल पल अपनी उम्र घटाता जा रहा था.. जब भी ये वाक्य उसके वज़ूद से टकराते तो लगता अभी और ना जाने कितने साल ऐसे ही गुजरने वाले हैं...उसकी बाट जोहते हुये... कि कभी तो मिलेगा...बहुतेरे लोगों के दिन ऐसे ही उसे तलाशते हुये गुज़र गये, सखी के भी गुज़र ही जायेंगे। फिर वो कोई अनोखी तो ना थी ...मगर वह खुद को अनोखी समझती जरूर थी। वह अपने पर गुस्सा भी करती और गुमान भी...करे भी क्यों ना .. वो होगा किसी के लिए अप्राप्य ...उसका तो सखा था..है..रहेगा। ओह! तो सताने के लिए ही वह कहता था कि आज या कल या फ़लां दिन मैं तुम्हारे शहर से होकर गुजरूंगा। पता नहीं क्यों वो यह बताते हुये थकता न था...आज तक ना उसने बताना बंद किया और न सखी के ज़हन से ये ख्याल जाता कि आज नहीं तो कल वह यहीं कहीं से गुज़र रहा होगा तो ? क्या पता कहीं किसी ठौर वह मिल भी सकता है।
आज वो सोच रही थी...और मन ही मन सखा को सराह भी रही थी कि अप्राप्य को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। किसी ने यूं ही नहीं कह दिया कि मोकूं कहां ढूढ़े रे बंदे मैं तो तेरे पास में...
आज तक तो वह नहीं मिला- सखी अब भी खोज रही है, हर सड़क- हर तिराहे- हर चौराहे पर उसके मिलने की आस में... जब भी शहर में निकलती है.. आंखें उसे ही खोजती रहतीं..वो ऐसा होगा वो वैसा होगा..वो मुझे देखेगा तो क्या सोचेगा..कि मेरी सखी ऐसी मलिन...? वो झट से बिना एक भी पल गंवाये कह देगी- ''ना ना सखा मैं इतनी मलिन नहीं, वो तो तुम्हें खोजते हुये ये हाल हुआ है मेरा या तुम्हारे सांवले रूप की छाया ने घेर लिया था मुझे..या फिर कह देगी कि तुम्हारी आंखों में जो देख ले वह तुम जैसा ही होने लगता है..एकदम सांवला सा.. या फिर कह देगी कि तुम्हारी आंखें उनींदी हो रही हैं मेरे शहर की सड़कों पर घूमते हुये शायद थक गये हो इसीलिए मैं भी तुम्हें थकी और मलिन दिख रही हूं या फिर कह देगी कि तुम्हारी इन आंखों में जो थकान के लालिमा उतरी है उसीसे मेरा चेहरा भी तप कर सांवला हुआ है..इसी लिए मैं तुम्हें मलिन नजर आती हूं...या...।''
उफ ! ऐसे कितने ही सवाल उसके मन में जवाब देने को तैयार हो रहे थे...लेकिन नहीं, वो ऐसा क्यों सोचेगा, वह तो मन में झांक लेता है, फिर मन तो उजला है ना। हर बार की तरह इस बार भी यही सब सोचते हुये वक्त उड़ता जा रहा है मगर उसकी तलाश अब भी जारी है ...कि कभी तो भेंट होगी सखा से ...तब वो उसे पकड़ कर पूछ ही लेगी कि हर बार उसके ही शहर से गुजरने की... और गुजरते हुये उसे बताने की...क्या जरूरत थी...क्या वह यह बताते समय उसके सखा से रूपांतरित हो फिर से वही निष्ठुर मंदिर वाला काला पत्थर बन जाता है। जरूर ऐसा ही होता होगा तभी तो वह सिर्फ बताता है मिलता नहीं...तभी तो वह सिर्फ पागल बनाता है... इलाज नहीं करता...तभी तो उसने सांसों को मुट्ठी में भींच रखा है...इस बार मिलते ही वह कह ही देगी कि वो भी तो उसी की सखी है, कोई पुतुल नहीं ....वो आज़ादी नहीं चाहती...बस हर वक्त हर जगह हर एक में उसी सखा को ही तो खोजती रहती है कि क्या पता उसका वो शहर जिसकी सड़कों से उसे गुज़रना है कहीं सखी के मन से होते हुये उसकी रगों में तो नहीं समा गया....कई सवाल हैं जिनके उत्तर अनंतकाल से ढूढ़े जा रहे हैं । कोई तो है जो इनके जवाब जानता है। सखी हमेशा से पूछती आई है और सखा के चेहरे पर हमेशा की तरह विस्मयकारी मुस्कान के रहस्य...मौज़ूद हैं। वो तो चेतना के हर उस शहर से गुज़र कर आया है जो सखी तक पहुंचती है फिर क्यों शहर से गुजरने की इत्तिला पर वह बेचैन है...आज तक। आगे भी उसकी सड़क तो अंतहीन ही है।
- अलकनंदा सिंह
अरे, ये भी कोई बात हुई...भला कोई कहीं से भी गुजरे...शहर की सड़क तो साझा होती है सबकी...जिस सड़क से उसे गुज़रना है वो कहने को तो शहर के बदन को छूती होगी मगर जिस सड़क को उसके सखा के पांव छुयेंगे वो कोई और नहीं उसके शरीर में रेंगती एक एक धमनी और धमनी में जुड़ती तमाम कोशिकाओं से मिलकर बनी सड़क ही है या फिर ऐसी कई सड़कों का जंजाल जो उसके दिल को जकड़े हुये हैं। मगर अच्छी तरह जानती थी वो कि सखा महज उसके शहर की सड़क से गुजरने वाला नहीं वह तो पूरे वज़ूद से रिसता हुआ मन में बह रहा है, और उसे यूं नचाये ही जा रहा है...पता ही नहीं चला कब से ...हर बार की तरह इस बार भी ऐसा ही होने वाला है...जब वो गुजर रहा होगा इसी बाहरी या फिर भीतरी सड़क से।
आंख मिचौनी के खेल में वो माहिर है, आज तक जिसने भी उसे चाहा, इसी भ्रम में रहा कि वो उसी को सबसे ज्यादा मान देता है ,उसे भी यही भ्रम था;.. भ्रम ही रहा और भ्रम ही रहेगा ... पलक झपकते ही हवा हो जाने की आदत जो थी उसकी .... कोई हवा को पकड़ पाया है भला, फिर वो किसतरह उसकी पकड़ में आता ।
वो अच्छी तरह से जानता था कि दुनिया के गोल गोल चक्करों में घिरी उसकी सखी न तो उसे ढूढ़ने सड़कों पर घूमेगी और न ही किसी मंदिर - मठ में उसका पता पूछेगी फिर वो बार बार क्यों ये जताना चाहता था कि वो मेरे शहर से होकर गुजरेगा तो सखी खुशी से उछल पड़ेगी, वो जानता था कि उसके अंतरमन पर उसका काबू अच्छा था, इसीलिए कहीं वो उसे चिढ़ाता तो नहीं ....।
''मैं तुम्हारे शहर से होकर गुजरूंगा'' की पगडंडी पर गुजरते हुये एक तलाश सी आंखों में लिए समय पल पल अपनी उम्र घटाता जा रहा था.. जब भी ये वाक्य उसके वज़ूद से टकराते तो लगता अभी और ना जाने कितने साल ऐसे ही गुजरने वाले हैं...उसकी बाट जोहते हुये... कि कभी तो मिलेगा...बहुतेरे लोगों के दिन ऐसे ही उसे तलाशते हुये गुज़र गये, सखी के भी गुज़र ही जायेंगे। फिर वो कोई अनोखी तो ना थी ...मगर वह खुद को अनोखी समझती जरूर थी। वह अपने पर गुस्सा भी करती और गुमान भी...करे भी क्यों ना .. वो होगा किसी के लिए अप्राप्य ...उसका तो सखा था..है..रहेगा। ओह! तो सताने के लिए ही वह कहता था कि आज या कल या फ़लां दिन मैं तुम्हारे शहर से होकर गुजरूंगा। पता नहीं क्यों वो यह बताते हुये थकता न था...आज तक ना उसने बताना बंद किया और न सखी के ज़हन से ये ख्याल जाता कि आज नहीं तो कल वह यहीं कहीं से गुज़र रहा होगा तो ? क्या पता कहीं किसी ठौर वह मिल भी सकता है।
आज वो सोच रही थी...और मन ही मन सखा को सराह भी रही थी कि अप्राप्य को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। किसी ने यूं ही नहीं कह दिया कि मोकूं कहां ढूढ़े रे बंदे मैं तो तेरे पास में...
आज तक तो वह नहीं मिला- सखी अब भी खोज रही है, हर सड़क- हर तिराहे- हर चौराहे पर उसके मिलने की आस में... जब भी शहर में निकलती है.. आंखें उसे ही खोजती रहतीं..वो ऐसा होगा वो वैसा होगा..वो मुझे देखेगा तो क्या सोचेगा..कि मेरी सखी ऐसी मलिन...? वो झट से बिना एक भी पल गंवाये कह देगी- ''ना ना सखा मैं इतनी मलिन नहीं, वो तो तुम्हें खोजते हुये ये हाल हुआ है मेरा या तुम्हारे सांवले रूप की छाया ने घेर लिया था मुझे..या फिर कह देगी कि तुम्हारी आंखों में जो देख ले वह तुम जैसा ही होने लगता है..एकदम सांवला सा.. या फिर कह देगी कि तुम्हारी आंखें उनींदी हो रही हैं मेरे शहर की सड़कों पर घूमते हुये शायद थक गये हो इसीलिए मैं भी तुम्हें थकी और मलिन दिख रही हूं या फिर कह देगी कि तुम्हारी इन आंखों में जो थकान के लालिमा उतरी है उसीसे मेरा चेहरा भी तप कर सांवला हुआ है..इसी लिए मैं तुम्हें मलिन नजर आती हूं...या...।''
उफ ! ऐसे कितने ही सवाल उसके मन में जवाब देने को तैयार हो रहे थे...लेकिन नहीं, वो ऐसा क्यों सोचेगा, वह तो मन में झांक लेता है, फिर मन तो उजला है ना। हर बार की तरह इस बार भी यही सब सोचते हुये वक्त उड़ता जा रहा है मगर उसकी तलाश अब भी जारी है ...कि कभी तो भेंट होगी सखा से ...तब वो उसे पकड़ कर पूछ ही लेगी कि हर बार उसके ही शहर से गुजरने की... और गुजरते हुये उसे बताने की...क्या जरूरत थी...क्या वह यह बताते समय उसके सखा से रूपांतरित हो फिर से वही निष्ठुर मंदिर वाला काला पत्थर बन जाता है। जरूर ऐसा ही होता होगा तभी तो वह सिर्फ बताता है मिलता नहीं...तभी तो वह सिर्फ पागल बनाता है... इलाज नहीं करता...तभी तो उसने सांसों को मुट्ठी में भींच रखा है...इस बार मिलते ही वह कह ही देगी कि वो भी तो उसी की सखी है, कोई पुतुल नहीं ....वो आज़ादी नहीं चाहती...बस हर वक्त हर जगह हर एक में उसी सखा को ही तो खोजती रहती है कि क्या पता उसका वो शहर जिसकी सड़कों से उसे गुज़रना है कहीं सखी के मन से होते हुये उसकी रगों में तो नहीं समा गया....कई सवाल हैं जिनके उत्तर अनंतकाल से ढूढ़े जा रहे हैं । कोई तो है जो इनके जवाब जानता है। सखी हमेशा से पूछती आई है और सखा के चेहरे पर हमेशा की तरह विस्मयकारी मुस्कान के रहस्य...मौज़ूद हैं। वो तो चेतना के हर उस शहर से गुज़र कर आया है जो सखी तक पहुंचती है फिर क्यों शहर से गुजरने की इत्तिला पर वह बेचैन है...आज तक। आगे भी उसकी सड़क तो अंतहीन ही है।
- अलकनंदा सिंह
Friday, 16 August 2013
कि...कोई नहीं समझ पाया है
कि...कोई नहीं समझ पाया है
बाईं ओर उसी छाती में
दर्द का इक सैलाब आया है
रिश्तों की जकड़न कैसी थी कि...
कोई नहीं समझ पाया है
तितली के पंखों से झड़कर
टपक रही थी जो तेरी आहें
उनका सदका यूं मैंने पाया कि...
कोई नहीं समझ पाया है
आइने से मुझ तक पहुंची
उसकी आवाज़ सुनी जैसे ही
खुश्बू तैर गई ज़ख्मों पर कि...
कोई नहीं समझ पाया है
नापजोख के व्यवहारों में
मित्र कहां मिल पाते ऐसे
नाव तुमने साधी ये कैसे कि....
कोई नहीं समझ पाया है।
- अलकनंदा सिंह
बाईं ओर उसी छाती में
दर्द का इक सैलाब आया है
रिश्तों की जकड़न कैसी थी कि...
कोई नहीं समझ पाया है
तितली के पंखों से झड़कर
टपक रही थी जो तेरी आहें
उनका सदका यूं मैंने पाया कि...
कोई नहीं समझ पाया है
आइने से मुझ तक पहुंची
उसकी आवाज़ सुनी जैसे ही
खुश्बू तैर गई ज़ख्मों पर कि...
कोई नहीं समझ पाया है
नापजोख के व्यवहारों में
मित्र कहां मिल पाते ऐसे
नाव तुमने साधी ये कैसे कि....
कोई नहीं समझ पाया है।
- अलकनंदा सिंह
Wednesday, 31 July 2013
मन-स्पंदन में तुम.
नहीं जानते क्या सखा तुम.. जिस धड़कन में तुम बसते हो
नित नये बहानों से डसते हो
दिल के टुकड़े टुकड़े करते हो..
छाती की वो उड़ती किरचें
नभ को छूने जाती हैं
सखाभाव से जिनको तुमने
थाम लिया था सांसों में,
पायल और तुम्हारी साजिश
खूब समझ आती है सखा
वो चुप हैं.. तुम हंसते हो
क्या घोला है मन-स्पंदन में,
आज तुम्हारी साजिश्ा का मैं
हिस्सा नहीं बनने वाली
पीठ दिखाकर कहते हो ये
आदत तो मेरी बचपन वाली,
कुंती- कुब्जा- रुकमणी नहीं मैं
याचक बनकर नहीं जिऊंगी
तेरे हर स्पंदन में घुलकर
उन किरचों के संग बहूंगी...
सखाभाव से जिनको तुमने
थाम लिया था सांसों में,
धारा संग तो सब बहते हैं
उल्टी जो बहती - वही सखी मैं
पग से बहकर मन तक पहुंचूं
मुझे कामना नहीं रास की
मैं तो उन किरचों में ही खुश हूं...
सखाभाव से जिनको तुमने
थाम लिया था सांसों में।
-अलकनंदा सिंह
Tuesday, 16 July 2013
हे जनता के ईश्वर ...संभलो..!
हे जनता के ईश्वर !
क्या तुम अब भी यहीं हो ...इसी धरती पर
क्या तुम भी लेते हो श्वास...इसी धरती पर
तो, क्या तुम देख नहीं पा रहे
ये चीत्कार ये कोलाहल..इच्छाओं का
ये घंटे-- ये घड़ियाल--ये व्रत--ये उपवास,
छापा टीका वालों का नाद निनाद
काश ! तुम पढ़ पाते वे कालेकाले अक्षर
जो पुराणों से निकाल तुम्हें
कण कण में बैठा गये
और ऐसा करने का प्रतिदान भी-
मिल गया इन अक्षरों को,
कहा गया इन्हें ब्रह्म का स्वरूप,
इन्हीं से मिला इतना मान कि -
तुम्हें अभिमान हो गया ईश्वरत्व का ।
यदि तुम ईश्वर होते - कण कण में बैठे
तो क्या बन पाते तुम
भेड़ियों से उधेड़ी जा रही
उस औरत की चीख,
तो क्या तुम सुन नहीं पा रहे थे
वीभत्स क्षणों का वो आर्तनाद,
नहीं सुना होगा उस औरत का -
करुण क्रंदन तुमने
कैसे सुनते...तुम तो ईश्वर भी उसके जो
पहले तुम्हें अर्पण सब कर दे
बदले में तुम तिनका बन कर
कर डालो अहसान और पा लो ईश्वरत्व का
एक और मान
फिर कैसे ईश्वर तुम...
ईश्वर व्यापार नहीं करता
तुम तो ठेठ व्यापारी हो, भावनाओं का करते हो धंधा
देवालय में नहीं बैठ...
पीठ से चिपके पेटों को
भोजन दिलवाते...
पर नहीं कर सके ऐसा तुम
उस उधड़ती औरत से ..इन भूखे पेटों से..हुई भूल
जो तुमको नहीं सके पूज
बचाते रहे अपना स्वाभिमान
चूर करते रहे तुम्हारा अभिमान
अब भी समझो...ऐसा बहुत दिनों न चलने वाला
हे जनता के ईश्वर
संभलो...अभी भी वक्त है बाकी
देवालयों से निकलकर तो देखो
पीड़ाओं को देख जो हो रहे आनंदित
किसी हृदय तक पहुंचकर तो देखो
किसी की चीत्कार बन कर तो देखो
किसी आंसू बन ढलक कर तो देखो
किसी का स्पंदन बनकर तो देखो
..देखो तुम सच के ईश्वर बनकर
कि आज समय है कितना दुष्कर
आओ और सिद्ध कर दो कि
अब भी ईश्वर आता है ...
लाज बचाने, मान तोड़ने, दो जून की रोटी देने
आओ...और देखो कैसे बना जाता है ईश्वर..
देवालयों में नहीं,
हे जनता के ईश्वर ...दिलों में बैठ सको...
कुछ ऐसे आओ...वरना तुम समझ सकते हो ...
जब तक पूजा जाता है वह तब तक ही ईश्वर रहता है।
- अलकनंदा सिंह
क्या तुम अब भी यहीं हो ...इसी धरती पर
क्या तुम भी लेते हो श्वास...इसी धरती पर
तो, क्या तुम देख नहीं पा रहे
ये चीत्कार ये कोलाहल..इच्छाओं का
ये घंटे-- ये घड़ियाल--ये व्रत--ये उपवास,
छापा टीका वालों का नाद निनाद
काश ! तुम पढ़ पाते वे कालेकाले अक्षर
जो पुराणों से निकाल तुम्हें
कण कण में बैठा गये
और ऐसा करने का प्रतिदान भी-
मिल गया इन अक्षरों को,
कहा गया इन्हें ब्रह्म का स्वरूप,
इन्हीं से मिला इतना मान कि -
तुम्हें अभिमान हो गया ईश्वरत्व का ।
यदि तुम ईश्वर होते - कण कण में बैठे
तो क्या बन पाते तुम
भेड़ियों से उधेड़ी जा रही
उस औरत की चीख,
तो क्या तुम सुन नहीं पा रहे थे
वीभत्स क्षणों का वो आर्तनाद,
नहीं सुना होगा उस औरत का -
करुण क्रंदन तुमने
कैसे सुनते...तुम तो ईश्वर भी उसके जो
पहले तुम्हें अर्पण सब कर दे
बदले में तुम तिनका बन कर
कर डालो अहसान और पा लो ईश्वरत्व का
एक और मान
फिर कैसे ईश्वर तुम...
ईश्वर व्यापार नहीं करता
तुम तो ठेठ व्यापारी हो, भावनाओं का करते हो धंधा
देवालय में नहीं बैठ...
पीठ से चिपके पेटों को
भोजन दिलवाते...
पर नहीं कर सके ऐसा तुम
उस उधड़ती औरत से ..इन भूखे पेटों से..हुई भूल
जो तुमको नहीं सके पूज
बचाते रहे अपना स्वाभिमान
चूर करते रहे तुम्हारा अभिमान
अब भी समझो...ऐसा बहुत दिनों न चलने वाला
हे जनता के ईश्वर
संभलो...अभी भी वक्त है बाकी
देवालयों से निकलकर तो देखो
पीड़ाओं को देख जो हो रहे आनंदित
किसी हृदय तक पहुंचकर तो देखो
किसी की चीत्कार बन कर तो देखो
किसी आंसू बन ढलक कर तो देखो
किसी का स्पंदन बनकर तो देखो
..देखो तुम सच के ईश्वर बनकर
कि आज समय है कितना दुष्कर
आओ और सिद्ध कर दो कि
अब भी ईश्वर आता है ...
लाज बचाने, मान तोड़ने, दो जून की रोटी देने
आओ...और देखो कैसे बना जाता है ईश्वर..
देवालयों में नहीं,
हे जनता के ईश्वर ...दिलों में बैठ सको...
कुछ ऐसे आओ...वरना तुम समझ सकते हो ...
जब तक पूजा जाता है वह तब तक ही ईश्वर रहता है।
- अलकनंदा सिंह
Friday, 7 June 2013
....यूं ही ठगनी
निश्छल है वो छलिया,
क्या बोलूं मैं अब..
शब्द कहां बचते हैं ....
इस तरह रोम रोम जब
बतियाता है कान्हां से...
मेरे हैं वो मेरे हैं ....
ये कहकर भ्रम हम पाले रहते हैं ....
उसकी एक झलक को हम
सबकुछ बिसराये रहते हैं ....
यही तो हैं कृष्ण प्यारे
फिर राधा का क्या दोष
उसको तो हम यूं ही ठगनी
माने बैठे हैं ।
- अलकनंदा सिंह
क्या बोलूं मैं अब..
शब्द कहां बचते हैं ....
इस तरह रोम रोम जब
बतियाता है कान्हां से...
मेरे हैं वो मेरे हैं ....
ये कहकर भ्रम हम पाले रहते हैं ....
उसकी एक झलक को हम
सबकुछ बिसराये रहते हैं ....
यही तो हैं कृष्ण प्यारे
फिर राधा का क्या दोष
उसको तो हम यूं ही ठगनी
माने बैठे हैं ।
- अलकनंदा सिंह
Sunday, 12 May 2013
दिनों में बंटते रिश्ते और मां
वसुधैव कुटुम्बकम की मूल अवधारणा के साथ चलने वाले इस देश में जीवन को
मात्र 'ये दिन' 'वो दिन' में बांटकर उसकी समग्रता का अहसास कैसे किया जा
सकता है । ये हमारा जीवन है कोई गुड़ की डली नहीं जिसे तोड़कर बांटा जा
सके मगर ऐसा हो नहीं पा रहा संभवत: इसीलिए कुछ आयातित शब्दों के सहारे हम
अपने संबंधों को नये रूप में परिभाषित करने में लगे हैं और इसी मुगालते को
थामे चल रहे हैं कि लो जी हम भी आधुनिक हो गये।
सभी कुछ इंस्टेंट चाहने की आदत ने रिश्तों को भी इंस्टेंट बना दिया है तभी तो जिस एक शब्द की धुरी पर पूरा जीवन-उसका अस्तित्व, व्यवहार व विकास टिका है उसी एक शब्द 'मां' के लिए भी इसी कथित आधुनिकता ने एक दिन बांट कर दे दिया कि...लो ये रहा बस एक दिन....तुम्हारे नाम मां....अब इसी से पा लो वह खुशी जो तुम मुझे सूंघकर पाया करतीं थीं....अब वो तो डियो ने हड़प ली है मां... डिब्बों में बंद हो गई तुम्हारे बनाये खाने की खुश्बू....ने तुम्हें भी तो बख्श दिया है ये एक दिन....इसी की पूंछ पकड़कर तुम भी चलो और मैं भी...। गोया कि रिश्तों को भी ग्लैमराइज़ करने का नया फंडा तो हमारी मुठ्ठी में है लेकिन हम तो सिमटते गये सारी दुनिया की मुठ्ठी में...
हमने इसी कथित आधुनिकता की खातिर अपने जीवन की धुरी उस औरत को, जिसे गनीमत है कि अभी भी हम ''मां'' के नाम से ही जानते हैं, इन्हीं डे'ज की भीड़ में खड़ा कर दिया है।
आज मदर्स डे पर सोशल साइट्स से लेकर मीडिया की हर रौ में मां बह रही है। अचानक से इतनी मातृभक्ति उड़ेली जा रही है कि बस...जी ऊबने लगा है ये सोचकर कि प्रोपेगंडा से बढ़कर अगर ऐसा सचमुच हो जाये तो देश की संसद को महिला सुरक्षा के लिए यूं माथापच्ची ना करनी पड़े।
मैंने ऐसी कई औरतों को ''मां'' पर कसीदे गढ़ते और उस पर वाहवाही भी पाते देखा है जिन्होंने खुद अपने बच्चे क्रैचे'ज में डाल रखे हैं या फिर मेड की गोद में थमा रखे हैं । ये कोई मजबूरी नहीं बल्कि ये चलन है नये तरह के मातृत्व का जो अपने बच्चे को भी कमोडिटी के तौर भुनाने का हुनर ईज़ाद कर चुका है।
रिश्ता कोई भी हो खुद को बांटकर उसे जिया नहीं जा सकता, हर रिश्ता अपने हिस्से का पूरा वजूद चाहता है फिर मां को हम सिर्फ एक दिन कैसे याद कर सकते हैं वो हमारी रगों में बहती रहती है खून बनकर..दिल बन कर धड़कती है। फिर वसुधा को उसकी महत्ता बताने के लिए एक ही दिन क्यों मुकर्रर किया जाये , क्यों हम रिश्तों को बांटकर जीने को अपनी शैली मान बैठे हैं । आज तो बस महसूस करें कि जो हमारे भीतर धड़क रहा है उसका कोई कर्ज़ न आज तक उतार पाया है और न उतार पायेगा।
मशहूर शायर मुनव्वर राणा साहब के शब्दों में .....नई मांओं को सबक देती ये लाइनें..
सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना .....
- अलकनंदा सिंह
सभी कुछ इंस्टेंट चाहने की आदत ने रिश्तों को भी इंस्टेंट बना दिया है तभी तो जिस एक शब्द की धुरी पर पूरा जीवन-उसका अस्तित्व, व्यवहार व विकास टिका है उसी एक शब्द 'मां' के लिए भी इसी कथित आधुनिकता ने एक दिन बांट कर दे दिया कि...लो ये रहा बस एक दिन....तुम्हारे नाम मां....अब इसी से पा लो वह खुशी जो तुम मुझे सूंघकर पाया करतीं थीं....अब वो तो डियो ने हड़प ली है मां... डिब्बों में बंद हो गई तुम्हारे बनाये खाने की खुश्बू....ने तुम्हें भी तो बख्श दिया है ये एक दिन....इसी की पूंछ पकड़कर तुम भी चलो और मैं भी...। गोया कि रिश्तों को भी ग्लैमराइज़ करने का नया फंडा तो हमारी मुठ्ठी में है लेकिन हम तो सिमटते गये सारी दुनिया की मुठ्ठी में...
हमने इसी कथित आधुनिकता की खातिर अपने जीवन की धुरी उस औरत को, जिसे गनीमत है कि अभी भी हम ''मां'' के नाम से ही जानते हैं, इन्हीं डे'ज की भीड़ में खड़ा कर दिया है।
आज मदर्स डे पर सोशल साइट्स से लेकर मीडिया की हर रौ में मां बह रही है। अचानक से इतनी मातृभक्ति उड़ेली जा रही है कि बस...जी ऊबने लगा है ये सोचकर कि प्रोपेगंडा से बढ़कर अगर ऐसा सचमुच हो जाये तो देश की संसद को महिला सुरक्षा के लिए यूं माथापच्ची ना करनी पड़े।
मैंने ऐसी कई औरतों को ''मां'' पर कसीदे गढ़ते और उस पर वाहवाही भी पाते देखा है जिन्होंने खुद अपने बच्चे क्रैचे'ज में डाल रखे हैं या फिर मेड की गोद में थमा रखे हैं । ये कोई मजबूरी नहीं बल्कि ये चलन है नये तरह के मातृत्व का जो अपने बच्चे को भी कमोडिटी के तौर भुनाने का हुनर ईज़ाद कर चुका है।
रिश्ता कोई भी हो खुद को बांटकर उसे जिया नहीं जा सकता, हर रिश्ता अपने हिस्से का पूरा वजूद चाहता है फिर मां को हम सिर्फ एक दिन कैसे याद कर सकते हैं वो हमारी रगों में बहती रहती है खून बनकर..दिल बन कर धड़कती है। फिर वसुधा को उसकी महत्ता बताने के लिए एक ही दिन क्यों मुकर्रर किया जाये , क्यों हम रिश्तों को बांटकर जीने को अपनी शैली मान बैठे हैं । आज तो बस महसूस करें कि जो हमारे भीतर धड़क रहा है उसका कोई कर्ज़ न आज तक उतार पाया है और न उतार पायेगा।
मशहूर शायर मुनव्वर राणा साहब के शब्दों में .....नई मांओं को सबक देती ये लाइनें..
सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना .....
- अलकनंदा सिंह
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