Sunday, 26 February 2017

यूं आसमां न ताक...

यूं आसमां न ताक, ना नाप किसी परवाज को
कुछ परिंदे जमीं पर भी हैं,
जो अपनी आंखों में,
तेरी नज़र का आसमां सजाए बैठे हैं,

महसूस किया है कभी तुमने,
उस एक अनहद आसमां का ताप...
जो सतरंगी सा सुलग रहा है-
इनके परों से ढंके ठंडे पड़े सीनों में,

पर हैं सिले- भीगे हुए,...जकड़े हुए हैं अभी,
मगर यकीं है, एक दिन हठात्
अपनी सींवन उधेड़ लेंगे,
टांकों को भी ढीला कर लेंगे,

तब ये पर फैला कर परवज का दामन थामेंगे,
तब उन्‍हें चाहिए होगी तुम्‍हारी यही नज़र,
एक प्रेम और भरोसे की नज़र,
परवाज भरने को...,
अपने पर फैलाने को...,
तुम्‍हारी यही एक नज़र
उन्‍हें वजूद से मिला देगी,

हौसलों का आगाज़ अंजाम तक पहुंचेगा
तभी जब बचा कर रखो अपनी
ये गहरी नज़र...
उनके लिए...तबके लिए...।

-अलकनंदा सिंह

Friday, 24 February 2017

कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा

सृष्‍टि की खातिर शिव ने तब एक हलाहल पीया था,
अब एक हलाहल तुमको भी इसी तरह पीना होगा,

समरस सब होता जाए, निज और द्विज में फर्क मिटे,

आग्रह से अनाग्रह सब इसी तरह एक शून्‍य बनें ,

जीवन के अविरल तट तक पहुंचा दो सब तृष्‍णाओं को,

आस्‍तीनों के विषधरों को तुम्‍हें निजतन पै धारण करना होगा,

निश्‍चित कर लो इस रण के नियम- कि अब,
शीश उठाकर जीना है तो उन असुरों से लड़ना होगा,

जो छिपे हैं मन के कोनों में उन असुरों को बाहर करने को,
निज मन को विलोम में दौड़ाओ,
मन भीतर जिनका डेरा है, उन्‍हें त्‍याज्‍य अभी करना होगा,

धारण कर अब ‘त्रिशूल’ तुमको सृष्‍टि का शिव बनना होगा,
कालातीत को कालजयी कर काल-भाल पर मलना होगा।

कालजयी को अवसानों का भय कैसा, ये तो क्षणभर का तम है,
अंतहीन होता है वही जो स्‍वयं शिव सा सुंदरतम है,
ठीक समझ लो- फूल और कांटे दोनों ही शिव के अनन्‍य हैं

तो गरल उठा लो हर विरोध का, तुम सोना हो तो लपटों से भय क्‍या,
इसी आग से बाहर आकर तो तुमको शिव सा कुंदन बनना होगा।

- अलकनंदा सिंह

Saturday, 18 February 2017

कृष्णा सोबती के जन्‍मदिन पर उनकी लिखी कहानी- दादी अम्मा

हिन्दी की फिक्शन एवं निबन्ध लेखिका कृष्णा सोबती का आज १८ फ़रवरी को जन्‍मदिन है, वे इसी दिन १९२५ को गुजरात (अब पाकिस्तान में) जन्‍मी थीं। वे अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं हैं।

विभिन्न सम्मानों जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि सम्मान, शलाका सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, साहित्य कला परिषद पुरस्कार, कथा चूड़ामणि पुरस्कार, महत्तर सदस्य, साहित्य अकादमी से सम्मानित कि जा चुकीं हैं।

कृष्णा जी ने डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, तिन पहाड़, बादलों के घेरे, सूरजमुखी अंधेरे के, ज़िन्दगी़नामा, ऐ लड़की, दिलोदानिश, हम हशमत भाग एक तथा दो और समय सरगम तक उनकी कलम ने उत्तेजना, आलोचना विमर्श, सामाजिक और नैतिक बहसों की जो फिज़ा साहित्य में पैदा की है उसका स्पर्श पाठक लगातार महसूस करता रहा है।


लीजिए पढ़िए कृष्णा सोबती की कहानी- दादी अम्मा



बहार फिर आ गई। वसन्त की हल्की हवाएँ पतझर के फीके ओठों को चुपके से चूम गईं। जाड़े ने सिकुड़े-सिकुड़े पंख फड़फड़ाए और सर्दी दूर हो गई। आँगन में पीपल के पेड़ पर नए पात खिल-खिल आए। परिवार के हँसी-खुशी में तैरते दिन-रात मुस्कुरा उठे।

भरा-भराया घर। सँभली-सँवरी-सी सुन्दर सलोनी बहुएँ। चंचलता से खिलखिलाती बेटियाँ। मजबूत बाँहोंवाले युवा बेटे। घर की मालकिन मेहराँ अपने हरे-भरे परिवार को देखती है और सुख में भीग जाती हैं यह पाँचों बच्चे उसकी उमर-भर की कमाई हैं।

उसे वे दिन नहीं भूलते जब ब्याह के बाद छह वर्षों तक उसकी गोद नहीं भरी थी। उठते-बैठते सास की गंभीर कठोर दृष्टि उसकी समूची देह को टटोल जाती। रात को तकिए पर सिर डाले-डाले वह सोचती कि पति के प्यार की छाया में लिपटे-लिपटे भी उसमें कुछ व्यर्थ हो गया है, असमर्थ हो गया है। कभी सकुचाती-सी ससुर के पास से निकलती तो लगता कि इस घर की देहरी पर पहली बार पाँव रखने पर जो आशीष उसे मिली थी, वह उसे सार्थक नहीं कर पाई। वह ससुर के चरणों में झुकी थी और उन्होंने सिर पर हाथ रखकर कहा था, ”बहूरानी, फूलो-फलो।“ कभी दर्पण के सामने खड़ी-खड़ी वह बाँहें फैलाकर देखती-क्या इन बाँहों में अपने उपजे किसी नन्हे-मुन्ने को भर लेने की क्षमता नहीं!

छह वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद सर्दियों की एक लम्बी रात में करवट बदलते-बदलते मेहराँ को पहली बार लगा था कि जैसे नर्म-नर्म लिहाफ से वह सिकुड़ी पड़ी है, वैसे ही उसमें, उसके तन-मन-प्राण के नीचे गहरे कोई धड़कन उससे लिपटी आ रही है। उसने अँधियारे में एक बार सोए हुए पति की ओर देखा था और अपने से लजाकर अपने हाथों से आँखें ढाँप ली थीं। बन्द पलकों के अन्दर से दो चमकती आँखें थीं, दो नन्हें-नन्हे हाथ थे, दो पाँव थे। सुबह उठकर किसी मीठी शिथिलता में घिरे-घिरे अँगड़ाई ली थी। आज उसका मन भरा है। सास ने भाँपकर प्यार बरसाया थाः ”बहू, अपने को थकाओ मत, जो सहज-सहज कर सको, करो। बाकी मैं सँभाल लूँगी।“

वह कृतज्ञता से मुस्कुरा दी थी। काम पर जाते पति को देखकर मन में आया था कि कहे- ‘अब तुम मुझसे अलग बाहर ही नहीं, मेरे अंदर भी हो।’
दिन में सास आ बैठी, माथा सहलाते-सहलाते बोली, ”बहूरानी, भगवान मेरे बच्चे को तुम-सा रूप दे और मेरे बेटे-सा जिगरा।“
बहू की पलकें झुक आईं।
”बेटी, उस मालिक का नाम लो, जिसने बीज डाला है। वह फल भी देगा।“
मेहराँ को माँ का घर याद हो आया। पास-पड़ोस की स्त्रियों के बीच माँ भाभी का हाथ आगे कर कह रही है, ”बाबा, यह बताओ, मेरी बहू के भाग्य में कितने फल हैं?“
पास खड़ी मेहराँ समझ नहीं पाई। हाथ में फल?
”माँ, हाथ में फल कब होते हैं? फल किसे कहती हो माँ?“
माँ लड़की की बात सुनकर पहले हँसी, फिर गुस्सा होकर बोली, ”दूर हो मेहराँ, जा, बच्चों के संग खेल!“
उस दिन मेहराँ का छोटा सा मन यह समझ नहीं पाया था, पर आज तो सास की बात वह समझ ही नहीं, बूझ भी रही थी। बहू के हाथ में फल होते हैं, बहू के भाग्य में फल होते हैं और परिवार की बेल बढ़ती है।

मेहराँ की गोद से इस परिवार की बेल बढ़ी है। आज घर में तीन बेटे हैं, उनकी बहुएँ हैं। ब्याह देने योग्य दो बेटियाँ हैं। हल्के-हल्के कपड़ों में लिपटी उसकी बहुएँ जब उसके सामने झुकती हैं तो क्षण-भर के लिए मेहराँ के मस्तक पर घर की स्वामिनी होने का अभिमान उभर आता है। वह बैठे-बैठे उन्हें आशीष देती है और मुस्कुराती है। ऐसे ही, बिल्कुल ऐसे ही वह भी कभी सास के सामने झुकती थी। आज तो वह तीखी निगाहवाली मालकिन, बच्चों की दादी-अम्मा बनकर रह गई है। पिछवाड़े के कमरे में से जब दादा के साथ बोलती हुई अम्मा की आवाज़ आती है तो पोते क्षण-भर ठिठककर अनसुनी कर देते हैं। बहुएँ एक-दूसरे को देखकर मन-ही-मन हँसती हैं। लाड़ली बेटियाँ सिर हिला-हिलाकर खिलखिलाती हुई कहती हैं, ”दादी-अम्मा बूढ़ी हो आई, पर दादा से झगड़ना नहीं छोड़ा।“

मेहराँ भी कभी-कभी पति के निकट खड़ी हो कह देती है, ”अम्मा नाहक बापू के पीछे पड़ी रहती हैं। बहू-बेटियोंवाला घर है, क्या यह अच्छा लगता है?“

पति एक बार पढ़ते-पढ़ते आँखें ऊपर उठाते हैं। पल-भर पत्नी की ओर देख दोबारा पन्ने पर दृष्टि गड़ा देते हैं। माँ की बात पर पति की मौन-गंभीर मुद्रा मेहराँ को नहीं भाती। लेकिन प्रयत्न करने पर भी वह कभी पति को कुछ कह देने तक खींच नहीं पाई। पत्नी पर एक उड़ती निगाह, और बस। किसी को आज्ञा देती मेहराँ की अवाज़ सुनकर कभी उन्हें भ्रम हो आता है। वह मेहराँ का नहीं अम्मा का ही रोबीला स्वर है। उनके होश में अम्मा ने कभी ढीलापन जाना ही नहीं। याद नहीं आता कि कभी माँ के कहने को वह जाने-अनजाने टाल सके हों। और अब जब माँ की बात पर बेटियों को हँसते सुनते हैं तो विश्वास नहीं आता। क्या सचमुच माँ आज ऐसी बातें किया करती हैं कि जिन पर बच्चे हँस सकें।

और अम्मा तो सचमुच उठते-बैठते बोलती है, झगड़ती है, झुकी कमर पर हाथ रखकर वह चारपाई से उठकर बाहर आती है तो जो सामने हो उस पर बरसने लगती है। बड़ा पोता काम पर जा रहा है। दादी-अम्मा पास आ खड़ी हुई। एक बार ऊपर-तले देखा और बोली, ”काम पर जा रहे हो बेटे, कभी दादा की ओर भी देख लिया करो, कब से उनका जी अच्छा नहीं। जिसके घर में भगवान के दिए बेटे-पोते हों, वह इस तरह बिना दवा-दारू पड़े रहते हैं।“
बेटा दादी-अम्मा की नज़र बचाता है। दादा की खबर क्या घर-भर में उसे ही रखनी है! छोड़ो, कुछ-न-कुछ कहती ही जाएँगी अम्मा, मुझे देर हो रही है। लेकिन दादी-अम्मा जैसे राह रोक लेती है, ”अरे बेटा, कुछ तो लिहाज करो, बहू-बेटे वाले हुए, मेरी बात तुम्हें अच्छी नहीं लगती!“
मेहराँ मँझली बहू से कुछ कहने जा रही थी, लौटती हुई बोली, ”अम्मा कुछ तो सोचो, लड़का बहू-बेटोंवाला है। तो क्या उस पर तुम इस तरह बरसती रहोगी?“
दादी-अम्मा ने अपनी पुरानी निगाह से मेहराँ को देखा और जलकर कहा, ”क्यों नहीं बहू, अब तो बेटों को कुछ कहने के लिए तुमसे पूछना होगा! यह बेटे तुम्हारे हैं, घर-बार तुम्हारा है, हुक्म हासिल तुम्हारा है।“

मेहराँ पर इस सबका कोई असर नहीं हुआ। सास को वहीं खड़ा छोड़ वह बहू के पास चली गई। दादी-अम्मा ने अपनी पुरानी आँखों से बहू की वह रोबीली चाल देखी और ऊँचे स्वर में बोली, ”बहूरानी, इस घर में अब मेरा इतना-सा मान रह गया है!
तुम्हें इतना घमंड...!“
मेहराँ को सास के पास लौटने की इच्छा नहीं थी, पर घमंड की बात सुनकर लौट आई।
”मान की बात करती हो अम्मा? तो आए दिन छोटी-छोटी बात लेकर जलने-कलपने से किसी का मान नहीं रहता।“

इस उलटी आवाज़ ने दादी-अम्मा को और जला दिया। हाथ हिला-हिलाकर क्रोध में रुक-रुककर बोली, ”बहू, यह सब तुम्हारे अपने सामने आएगा! तुमने जो मेरा जीना दूभर कर दिया है, तुम्हारी तीनों बहुएँ भी तुम्हें इसी तरह समझेंगी क्यों नहीं, जरूर समझेंगी।“

कहती-कहती दादी-अम्मा झुकी कमर से पग उठाती अपने कमरे की ओर चल दी। राह में बेटे के कमरे का द्वार खुला देखा तो बोली, ”जिस बेटे को मैंने अपना दूध पिलाकर पाला, आज उसे देखे मुझे महीनों बीत जाते हैं, उससे इतना नहीं हो पाता कि बूढ़ी अम्मा की सुधि ले।“

मेहराँ मँझली बहू को घर के काम-धन्धे के लिए आदेश दे रही थी। पर कान इधर ही थे। ‘बहुएँ उसे भी समझेंगी’ इस अभिशाप को वह कड़वा घूँट समझकर पी गई थी, पर पति के लिए सास का यह उलाहना सुनकर न रहा गया। दूर से ही बोली, ”अम्मा, मेरी बात छोड़ो, पराए घर की हूँ, पर जिस बेटे को घर-भर में सबसे अधिक तुम्हारा ध्यान है, उसके लिए यह कहते तुम्हें झिझक नहीं आती? फिर कौन माँ है, जो बच्चों को पालती-पोसती नहीं!“

अम्मा ने अपनी झुर्रियों-पड़ी गर्दन पीछे की। माथे पर पड़े तेवरों में इस बार क्रोध नहीं भर्त्सना थी। चेहरे पर वही पुरानी उपेक्षा लौट आई, ”बहू, किससे क्या कहा जाता है, यह तुम बड़े समधियों से माथा लगा सबकुछ भूल गई हो। माँ अपने बेटे से क्या कहे, यह भी क्या अब मुझे बेटे की बहू से ही सीखना पड़ेगा?
सच कहती हो बहू, सभी माएँ बच्चों को पालती हैं। मैंने कोई अनोखा बेटा नहीं पाला था, बहू! फिर तुम्हें तो मैं पराई बेटी ही करके मानती रही हूँ। तुमने बच्चे आप जने, आप ही वे दिन काटे, आप ही बीमारियाँ झेलीं!“
मेहराँ ने खड़े-खड़े चाहा कि सास यह कुछ कहकर और कहतीं। वह इतनी दूर नहीं उतरी कि इन बातों का जवाब दे। चुपचाप पति के कमरे में जाकर इधर-उधर बिखरे कपड़े सहेजने लगी।

दादी-अम्मा कड़वे मन से अपनी चारपाई पर जा पड़ी। बुढ़ापे की उम्र भी कैसी होती है! जीते-जी मन से संग टूट जाता है। कोई पूछता नहीं, जानता नहीं। घर के पिछवाड़े जिसे वह अपनी चलती उम्र में कोठरी कहा करती थी, उसी में आज वह अपने पति के साथ रहती है। एक कोने में उसकी चारपाई और दूसरे कोने में पति की, जिसके साथ उसने अनगणित बहार और पतझर गुज़ार दिए हैं। कभी घंटों वे चुपचाप अपनी-अपनी जगह पर पड़े रहते हैं। दादी-अम्मा बीच-बीच में करवट बदलते हुए लम्बी साँस लेती है। कभी पतली नींद में पड़ी-पड़ी वर्षों पहले की कोई भूली-बिसरी बात करती है, पर बच्चों के दादा उसे सुनते नहीं। दूर कमरों में बहुओं की मीठी दबी-दबी हँसी वैसे ही चलती रहती है। बेटियाँ खुले-खुले खिलखिलाती हैं। बेटों के कदमों की भारी आवाज़ कमरे तक आकर रह जाती है और दादी-अम्मा और पास पड़े दादा में जैसे बीत गए वर्षों की दूरी झूलती रहती है।

आज दादा जब घंटों धूप में बैठकर अंदर आए तो अम्मा लेटी नहीं, चारपाई की बाँह पर बैठी थी। गाढ़े की धोती से पूरा तन नहीं ढका था। पल्ला कंधे से गिरकर एक ओर पड़ा था। वक्ष खुला था। आज वक्ष में ढकने को रह भी क्या गया था? गले और गर्दन की झुर्रियाँ एक जगह आकर इकट्ठी हो गई थीं। पुरानी छाती पर कई तिल चमक रहे थे। सिर के बाल उदासीनता से माथे के ऊपर सटे थे।

दादा ने देखकर भी नहीं देखा। अपने-सा पुराना कोट उतारकर खूँटी पर लटकाया और चारपाई पर लेट गए। दादी-अम्मा देर तक बिना हिले-डुले वैसी-की-वैसी बैठी रही। सीढ़ियों पर छोटे बेटे के पाँवों की उतावली-सी आहट हुई। उमंग की छोटी सी गुनगुनाहट द्वार तक आकर लौट गई। ब्याह के बाद के वे दिन, मीठे मधुर दिन। पाँव बार-बार घर की ओर लौटते हैं। प्यारी-सी बहू आँखों में प्यार भर-भरकर देखती है, लजाती है, सकुचाती है और पति की बाँहों में लिपट जाती है। अभी कुछ महीने हुए, यही छोटा बेटा माथे पर फूलों का सेहरा लगाकर ब्याहने गया था। बाजे-गाजे के साथ जब लौटा तो संग में दुलहिन थी।

सबके साथ दादी-अम्मा ने भी पतोहू का माथा चूमकर उसे हाथ का कंगन दिया था। पतोहू ने झुककर दादी-अम्मा के पाँव छुए थे और अम्मा लेन-देन पर मेहराँ से लड़ाई-झगड़े की बात भूलकर कई क्षण दुलहिन के मुखड़े की ओर देखती रही थीं। छोटी बेटी ने चंचलता से परिहास कर कहा था, ”दादी-अम्मा, सच कहो भैया की दुलहिन तुम्हें पसंद आई? क्या तुम्हारे दिनों में भी शादी-ब्याह में ऐसे ही कपड़े पहने जाते थे?“

कहकर छोटी बेटी ने दादी के उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की। हँसी-हँसी में किसी और से उलट पड़ी। मेहराँ बहू-बेटे घेरकर अंदर ले चली। दादी-अम्मा भटकी-भटकी दृष्टि से अगणित चेहरे देखती रही। कोई पास-पड़ोसिन उसे बधाई दे रही थी, ”बधाई हो अम्मा, सोने-सी बहू आई है शुक्र है उस मालिक का, तुमने अपने हाथों छोटे पोते का भी काज सँवारा।“

अम्मा ने सिर हिलाया। सचमुच आज उस-जैसा कौन है! पोतों की उसे हौंस थी, आज पूरी हुई। पर काज सँवारने में उसने क्या किया, किसी ने कुछ पूछा नहीं तो करती क्या? समधियों से बातचीत, लेन-देन, दुलहिन के कपड़े-गहने, यह सब मेहराँ के अभ्यस्त हाथों से होता रहा है। घर में पहले दो ब्याह हो जाने पर अम्मा से सलाह-सम्मति करना भी आवश्यक नहीं रह गया। केवल कभी-कभी कोई नया गहना गढ़वाने पर या नया जोड़ा बनवाने पर मेहराँ उसे सास को दिखा देती रही है।

बड़ी बेटी देखकर कहती है, ”माँ! अम्मा को दिखाने जाती हो, वह तो कहेंगी, ‘यह गले का गहना हाथ लगाते उड़ता है। कोई भारी ठोस कंठा बनवाओ, सिर की सिंगार-पट्टी बनवाओ। मेरे अपने ब्याह में मायके से पचास तोले का रानीहार चढ़ा था। तुम्हें याद नहीं, तुम्हारे ससुर को कहकर उसी के भारी जड़ाऊँ कंगन बनवाए थे तुम्हारे ब्याह में!’“

मेहराँ बेटी की ओर लाड़ से देखती है। लड़की झूठ नहीं कहती। बड़े बेटों की सगाई में, ब्याह में, अम्मा बीसियों बार यह दोहरा चुकी हैं। अम्मा को कौन समझाए कि ये पुरानी बातें पुराने दिनों के साथ गईं! अम्मा नाते-रिश्तों की भीड़ में बैठी-बैठी ऊँघती रही। एकाएक आँख खुली तो नीचे लटकते पल्ले से सिर ढक लिया। एक बेखबरी कि उघाड़े सिर बैठी रही। पर दादी-अम्मा को इस तरह अपने को सँभालते किसी ने देखा तक नहीं। अम्मा की ओर देखने की सुधि भी किसे है?

बहू को नया जोड़ा पहनाया जा रहा है। रोशनी में दुलहिन शरमा रही है। ननदें हास-परिहास कर रही हैं। मेहराँ घर में तीसरी बहू को देखकर मन-ही-मन सोच रही है कि बस, अब दोनों बेटियों को ठिकाने लगा दे तो सुर्खरू हो।

बहू का शृंगार देख दादी-अम्मा बीच-बीच में कुछ कहती हैं, ”लड़कियों में यह कैसा चलन है आजकल? बहू के हाथों और पैरों में मेहँदी नहीं रचाई। यही तो पहला सगुन है।“ दादी-अम्मा की इस बात को जैसे किसी ने सुना नहीं।

साज-शृंगार में चमकती बहू को घेरकर मेहराँ दूल्हे के कमरे की ओर ले चली। नाते-रिश्ते की युवतियाँ मुस्कुरा-मुस्कुराकर शरमाने लगीं, दुल्हे के मित्र-भाई आँखों में नहीं, बाँहों में नए-नए चित्र भरने लगे और मेहराँ बहु पर आशीर्वाद बरसाकर लौटी तो देहरी के संग लगी दादी-अम्मा को देखकर स्नेह जताकर बोली, ”आओ अम्मा, शुक्र है भगवान का, आज ऐसी मीठी घड़ी आई।“

अम्मा सिर हिलाती-हिलाती मेहराँ के साथ हो ली, पर आँखें जैसे वर्षों पीछे घूम गईं। ऐसे ही एक दिन वह मेहराँ को अपने बेटे के पास छोड़ आई थी। वह अंदर जाती थी, बाहर आती थी। वह इस घर की मालकिन थी।
पीछे, और पीछे - बाजे-गाजे के साथ उसका अपना डोला इस घर के सामने आ खड़ा हुआ। गहनों की छनकार करती वह नीचे उतरी। घूँघट की ओट से मुस्कुराती, नीचे झुकती और पति की बूढ़ी फूफी से आशीर्वाद पाती।

दादी-अम्मा को ऊँघते देख बड़ी बेटी हिलाकर कहने लगी, ”उठो अम्मा, जाकर सो रहो, यहाँ तो अभी देर तक हँसी-ठट्ठा होता रहेगा।“ दादी-अम्मा झँपी-झँपी आँखों से पोती की ओर देखती है और झुकी कमर पर हाथ रखकर अपने कमरे की ओर लौट जाती है।

उस दिन अपनी चारपाई पर लेटकर दादी-अम्मा सोई नहीं। आँखों में न ऊँघ थी, न नींद। एक दिन वह भी दुलहिन बनी थी। बूढ़ी फूफी ने सजाकर उसे भी पति के पास भेजा था। तब क्या उसने यह कोठरी देखी थी? ब्याह के बाद वर्षों तक उसने जैसे यह जाना ही नहीं कि फूफी दिन-भर काम करने के बाद रात को यहाँ सोती है। आँखें मुँद जाने से पहले जब फूफी बीमार हुई तो दादी-अम्मा ने कुलीन बहू की तरह उसकी सेवा करते-करते पहली बार यह जाना था कि घर में इतने कमरे होते हुए भी फूफी इस पिछवाड़े में अपने अन्तिम दिन-बरस काट गई है। पर यह देखकर, जानकर उसे आश्चर्य नहीं हुआ था।

घर के पिछवाड़े में पड़ी फूफी की देह छाँहदार पेड़ के पुराने तने की तरह लगती थी, जिसके पत्तों की छाँह उससे अलग, उससे परे, घर-भर पर फैली हुई थी। आज तो दादी-अम्मा स्वयं फूफी बनकर इस कोठरी में पड़ी है। ब्याह के कोलाहल से निकलकर जब दादा थककर अपनी चारपाई पर लेटे तो एक लम्बी चैन की-सी साँस लेकर बोले, ”क्या सो गई हो? इस बार की रौनक, लेन-देन तो मँझले और बड़े बेटे के ब्याह को भी पार कर गई। समधियों का बड़ा घर ठहरा!“

दादी-अम्मा लेन-देन की बात पर कुछ कहना चाहते हुए भी नहीं बोली। चुपचाप पड़ी रही। दादा सो गए, आवाजे़ धीमी हो गईं। बरामदे में मेहराँ का रोबीला स्वर नौकर-चाकरों को सुबह के लिए आज्ञाएँ देकर मौन हो गया। दादी-अम्मा पड़ी रही और पतली नींद से घिरी आँखों से नए-पुराने चित्र देखती रही। एकाएक करवट लेते-लेते दो-चार कदम उठाए और दादा की चारपाई के पास आ खड़ी हुई। झुककर कई क्षण तक दादा की ओर देखती रही। दादा नींद में बेखबर थे और दादी जैसे कोई पुरानी पहचान कर रही हो। खड़े-खड़े कितने पल बीत गए! क्या दादी ने दादा को पहचाना नहीं? चेहरा उसके पति का है पर दादी तो इस चेहरे को नहीं, चेहरे के नीचे पति को देखना चाहती है। उसे बिछुड़े गए वर्षों में से वापस लौटा लेना चाहती है।

सिरहाने पर पड़ा दादा का सिर बिल्कुल सफे़द था। बन्द आँखों से लगी झुर्रियाँ-ही-झुर्रियाँ थीं। एक सूखी बाँह कम्बल पर सिकुड़ी-सी पड़ी थी। यह नहीं....यह तो नहीं.... दादी-अम्मा जैसे सोते-सोते जाग पड़ी थी, वैसे ही इस भूले-भटके भँवर में ऊपर-नीचे होती चारपाई पर जा पड़ी।

उस दिन सुबह उठकर जब दादी-अम्मा ने दादा को बाहर जाते देखा तो लगा कि रात-भर की भटकी-भटकी तस्वीरों में से कोई भी तस्वीर उसकी नहीं थी। वह इस सूखी देह और झुके कन्धे में से किसे ढूँढ़ रही थी? दादी-अम्मा चारपाई की बाँहों से उठी और लेट गई। अब तो इतनी-सी दिनचर्या शेष रह गई है। बीच-बीच में कभी उठकर बहुओं के कमरों की ओर जाती है तो लड़-झगड़कर लौट आती हैं कैसे हैं उसके पोते जो उम्र के रंग में किसी की बात नहीं सोचते? किसी की ओर नहीं देखते? बहू और बेटा, उन्हें भी कहाँ फुरसत है? मेहराँ तो कुछ-न-कुछ कहकर चोट करने से भी नहीं चूकती। लड़ने को तो दादी भी कम नहीं, पर अब तीखा-तेज़ बोल लेने पर जैसे वह थककर चूर-चूर हो जाती है। बोलती है, बोलने के बिना रह नहीं पाती, पर बाद में घंटों बैठी सोचती रहती है कि वह क्यों उनसे माथा लगाती है, जिन्हें उसकी परवा नहीं। मेहराँ की तो अब चाल-ढाल ही बदल गई है। अब वह उसकी बहू नहीं, तीन बहुओं की सास है। ठहरी हुई गंभीरता से घर का शासन चलाती है। दादी-अम्मा का बेटा अब अधिक दौड़-धूप नहीं करता। देखरेख से अधिक अब बहुओं द्वारा ससुर का आदर-मान ही अधिक होता है। कभी अंदर-बाहर जाते अम्मा मिल जाती है तो झुककर बेटा माँ को प्रणाम अवश्य करता है। दादी-अम्मा गर्दन हिलाती-हिलाती आशीर्वाद देती है, ”जीयो बेटा, जीयो।“

कभी मेहराँ की जली-कटी बातें सोच बेटे पर क्रोध और अभिमान करने को मन होता है, पर बेटे को पास देखकर दादी-अम्मा सब भूल जाती है। ममता-भरी पुरानी आँखों से निहारकर बार-बार आशीर्वाद बरसाती चली जाती है, ”सुख पाओ, भगवान बड़ी उम्र दे....“ कितना गंभीर और शीलवान है उसका बेटा! है तो उसका न? पोतों को ही देखो, कभी झुककर दादा के पाँव तक नहीं छूते। आखिर माँ का असर कैसे जाएगा? इन दिनों बहू की बात सोचते ही दादी-अम्मा को लगता है कि अब मेहराँ उसके बेटे में नहीं अपने बेटों में लगी रहती है। दादी-अम्मा को वे दिन भूल जाते हैं जब बेटे के ब्याह के बाद बहू-बेटे के लाड़-चाव में उसे पति के खाने-पीने की सुधि तक न रहती थी और जब लाख-लाख शुक्र करने पर पहली बार मेहराँ की गोद भरनेवाली थी तो दादी-अम्मा ने आकर दादा से कहा था, ”बहू के लिए अब यह कमरा खाली करना होगा। हम लोग फूफी के कमरे में जा रहेंगे।“

दादा ने एक भरपूर नज़रों से दादी-अम्मा की ओर देखा था, जैसे वह बीत गए वर्षों को अपनी दृष्टि से टटोलना चाहते हों। फिर सिर पर हाथ फेरते-फेरते कहा था, ”क्या बेटे वाला कमरा बहू के लिए ठीक नहीं? नाहक क्यों यह सबकुछ उलटा-सीधा करवाती हो?“
दादी-अम्मा ने हाथ हिलाकर कहा, ”ओह हो, तुम समझोगे भी! बेटे के कमरे में बहू को रखूँगी तो बेटा कहाँ जाएगा? उलटे-सीधे की फिक्र तुम क्यों करते हो, मैं सब ठीक कर लूँगी।“
और पत्नी के चले जाने पर दादा बहुत देर बैठे-बैठे भारी मन से सोचते रहे कि जिन वर्षों का बीतना उन्होंने आज तक नहीं जाना, उन्हीं पर पत्नी की आशा विराम बनकर आज खड़ी हो गई है। आज सचमुच ही उसे इस उलटफेर की परवा नहीं।

इस कमरे में बड़ी फूफी उनकी दुलहिन को छोड़ गई थी। उस कमरे को छोड़कर आज वह फूफी के कमरे में जा रहे हैं। क्षण-भर के लिए, केवल क्षण-भर के लिए उन्हें बेटे से ईर्ष्या हुई और उदासीनता में बदल गई और पहली रात जब वह फूफी के कमरे में सोए तो देर गए तक भी पत्नी बहू के पास से नहीं लौटी थी। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद उनकी पलकें झँपी तो उन्हें लगा कि उनके पास पत्नी का नहीं...फूफी का हाथ है। दूसरे दिन मेहराँ की गोद भरी थी, बेटा हुआ था। घर की मालकिन पति की बात जानने के लिए बहुत अधिक व्यस्त थी।

कुछ दिन से दादी-अम्मा का जी अच्छा नहीं। दादा देखते हैं, पर बुढ़ापे की बीमारी से कोई दूसरी बीमारी बड़ी नहीं होती। दादी-अम्मा बार-बार करवट बदलती है और फिर कुछ-कुछ देर के लिए हाँफकर पड़ी रह जाती है। दो-एक दिन से वह रसोईघर की ओर भी नहीं आई, जहाँ मेहराँ का आधिपत्य रहते हुए भी वह कुछ-न-कुछ नौकरों को सुनाने में चूकती नहीं है। आज दादी को न देखकर छोटी बेटी हँसकर मँझली भाभी से बोली, ”भाभी, दादी-अम्मा के पास अब शायद कोई लड़ने-झगड़ने की बात नहीं रह गई, नहीं तो अब तक कई बार चक्कर लगातीं।“

दोपहर को नौकर जब अम्मा के यहाँ से अनछुई थाली उठा लाया तो मेहराँ का माथा ठनका। अम्मा के पास जाकर बोली, ”अम्मा, कुछ खा लिया होता, क्या जी अच्छा नहीं?“
एकाएक अम्मा कुछ बोली नहीं। क्षण-भर रुककर आँखें खोली और मेहराँ को देखती रह गई।
”खाने को मन न हो तो अम्मा दूध ही पी लो।“
अम्मा ने ‘हाँ’ - ‘ना’ कुछ नहीं की। न पलकें ही झपकीं। इस दृष्टि से मेहराँ बहुत वर्षों के बाद आज फिर डरी। इनमें न क्रोध था, न सास की तरेर थी, न मनमुटाव था। एक लम्बा गहरा उलाहना-पहचानते मेहराँ को देर नहीं लगी।
डरते-डरते सास के माथे को छुआ। ठंडे पसीने से भीगा था। पास बैठकर धीरे से स्नेह-भरे स्वर में बोली, ”अम्मा, जो कहो, बना लाती हूँ।“
अम्मा ने सिरहाने पर पड़े-पड़े सिर हिलाया - नहीं, कुछ नहीं- और बहू के हाथ से अपना हाथ खींच लिया।

मेहराँ पल-भर कुछ सोचती रही और बिना आहट किए बाहर हो गई। बड़ी बहू के पास जाकर चिंतित स्वर में बोली, ”बहू, अम्मा कुछ अधिक बीमार लगती हैं, तुम जाकर पास बैठो तो मैं कुछ बना लाऊँ।“
बहू ने सास की आवाज़ में आज पहली बार दादी-अम्मा के लिए घबराहट देखी। दबे पाँव जाकर अम्मा के पास बैठ हाथ-पाँव दबाने लगी। अम्मा ने इस बार हाथ नहीं खींचे। ढीली सी लेटी रही।
मेहराँ ने रसोईघर में जाकर दूध गर्म किया। औटाने लगी तो एकाएक हाथ अटक गया-क्या अम्मा के लिए यह अन्तिम बार दूध लिये जा रही है?

दादी-अम्मा ने बेखबरी में दो-चार घूँट दूध पीकर छोड़ दिया। चारपाई पर पड़ी अम्मा चारपाई के साथ लगी दीखती थीं। कमरे में कुछ अधिक सामान नहीं था। सामने के कोने में दादा का बिछौना बिछा था।
शाम को दादा आए तो अम्मा के पास बहू और पतोहू को बैठे देख पूछा, ”अम्मा तुम्हारी रूठकर लेटी है या....?“
मेहराँ ने अम्मा की बाँह आगे कर दी। दादा ने छूकर हौले से कहा, ”जाओ बहू, बेटा आता ही होगा। उसे डॉक्टर को लिवाने भेज देना।“ मेहराँ सुसर के शब्दों को गंभीरता जानते हुए चुपचाप बाहर हो गई। बेटे के साथ जब डॉक्टर आया तो दादी-अम्मा के तीनों पोते भी वापस आ खड़े हुए। डॉक्टर ने सधे-सधाए हाथों से दादी की परीक्षा की। जाते-जाते दादी के बेटे से कहा, ”कुछ ही घंटे और...।“ मेहराँ ने बहुओं को धीमे स्वर में आज्ञाएँ दीं और बेटों से बोली, ”बारी-बारी से खा-पी लो, फिर पिता और दादा को भेज देना।“ अम्मा के पास से हटने की पिता और दादा की बारी नहीं आई उस रात। दादी ने बहुत जल्दी की। डूबते-डूबते हाथ-पाँवों से छटपटाकर एक बार आँखें खोलीं और बेटे और पति के आगे बाँहे फैला दीं। जैसे कहती हो- ‘मुझे तुम पकड़ रखो।’

दादी का श्वास उखड़ा, दादा का कंठ जकड़ा और बेटे ने माँ पर झुककर पुकारा, ”अम्मा,...अम्मा।“
”सुन रही हूँ बेटा, तुम्हारी आवाज़ पहचानती हूँ।“
मेहराँ सास की ओर बढ़ी और ठंडे हो रहे पैरों को छूकर याचना-भरी दृष्टि से दादी-अम्मा को बिछुड़ती आँखों से देखने लगी। बहू को रोते देख अम्मा की आँखों में क्षण-भर को संतोष झलका, फिर वर्षों की लड़ाई-झगड़े का आभास उभरा। द्वार से लगी तीनों पोतों की बहुएँ खड़ी थीं। मेहराँ ने हाथ से संकेत किया। बारी-बारी दादी-अम्मा के निकट तीनों झुकीं। अम्मा की पुतलियों में जीवन-भर का मोह उतर गया। मेहराँ से उलझा कड़वापन ढीला हो गया। चाहा कि कुछ कहे....कुछ.... पर छूटते तन से दादी-अम्मा ओंठों पर कोई शब्द नहीं खींच पाई।

”अम्मा, बहुओं को आशीष देती जाओ....,“ मेहराँ के गीले कंठ में आग्रह था, विनय थी।
अम्मा ने आँखों के झिलमिलाते पर्दे में से अपने पूरे परिवार की ओर देखा-बेटा....बहू....पति....पोते-पतोहू...पोतियाँ। छोटी पतोहू की गुलाबी ओढ़नी जैसे दादी के तन-मन पर बिखर गई। उस ओढ़नी से लगे गोर-गोरे लाल-लाल बच्चे, हँसते-खेलते, भोली किलकारियाँ...।

दादी-अम्मा की धुँधली आँखों में से और सब मिट गया, सब पुँछ गया, केवल ढेर-से अगणित बच्चे खेलते रह गए...!
उसके पोते, उसके बच्चे....।
पिता और पुत्र ने एक साथ देखा, अम्मा जैसे हल्के से हँसी, हल्के से....।
मेहराँ को लगा, अम्मा बिल्कुल वैसे हँस रही है जैसे पहली बार बड़े बेटे के जन्म पर वह उसे देखकर हँसी थी। समझ गई-बहुओं को आशीर्वाद मिल गया। दादा ने अपने सिकुड़े हाथ में दादी का हाथ लेकर आँखों से लगाया और बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रो पड़े। रात बीत जाने से पहले दादी-अम्मा बीत गई। अपने भरेपूरे परिवार के बीच वह अपने पति, बेटे और पोतों के हाथों में अंतिम बार घर से उठ गई। दाह-संस्कार हुआ और दादी-अम्मा की पुरानी देह फूल हो गई।
देखने-सुननेवाले बोले, ”भाग्य हो तो ऐसा, फलता-फूलता परिवार।“

मेहराँ ने उदास-उदास मन से सबके लिए नहाने का सामान जुटाया। घर-बाहर धुलाया। नाते-रिश्तेदार पास-पड़ोसी अब तक लौट गए थे। मौत के बाद रूखी सहमी-सी दुपहर। अनचाहे मन से कुछ खा-पीकर घरवाले चुपचाप खाली हो बैठे। अम्मा चली गई, पर परिवार भरापूरा है। पोते थककर अपने-अपने कमरों मे जा लेटे। बहुएँ उठने से पहले सास की आज्ञा पाने को बैठी रहीं। दादी-अम्मा का बेटा निढाल होकर कमरे में जा लेटा। अम्मा की खाली कोठरी का ध्यान आते ही मन बह आया। कल तक अम्मा थी तो सही उस कोठी में। रुआँसी आँखें बरसकर झुक आईं तो सपने में देखा, नदी-किनारे घाट पर अम्मा खड़ी हैं अपनी चिता को जलते देख कहती है, ‘जाओ बेटा, दिन ढलने को आया, अब घर लौट चलो, बहू राह देख रही होगी। जरा सँभलकर जाना। बहू से कहना, बेटियों को अच्छे ठिकाने लगाए।’

दृश्य बदला। अम्मा द्वार पर खड़ी है। झाँककर उसकी ओर देखती है, ‘बेटा, अच्छी तरह कपड़ा ओढ़कर सोओ। हाँ बेटा, उठो तो! कोठरी में बापू को मिल आओ, यह विछोह उनसे न झेला जाएगा। बेटा, बापू को देखते रहना। तुम्हारे बापू ने मेरा हाथ पकड़ा था, उसे अंत तक निभाया, पर मैं ही छोड़ चली।’ बेटे ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। कई क्षण द्वार की ओर देखते रह गए। अब कहाँ आएगी अम्मा इस देहरी पर...।

बिना आहट किए मेहराँ आई। रोशनी की। चेहरे पर अम्मा की याद नहीं, अम्मा का दुख था। पति को देखकर ज़रा सी रोई और बोली, ”जाकर ससुरजी को तो देखो। पानी तक मुँह नहीं लगाया।“
पति खिड़की में से कहीं दूर देखते रहे। जैसे देखने के साथ कुछ सुन रहे हों- ‘बेटा, बापू को देखते रहना, तुम्हारे बापू ने तो अंत तक संग निभाया, पर मैं ही छोड़ चली।’
”उठो।“ मेहराँ कपड़ा खींचकर पति के पीछे हो ली। अम्मा की कोठरी में अँधेरा था। बापू उसी कोठरी के कोने में अपनी चारपाई पर बैठे थे। नज़र दादी-अम्मा की चारपाईवाली खाली जगह पर गड़ी थी। बेटे को आया जान हिले नहीं।
”बापू, उठो, चलकर बच्चों में बैठो, जी सँभलेगा।“
बापू ने सिर हिला दिया।
मेहराँ और बेटे की बात बापू को मानो सुनाई नहीं दी। पत्थर की तरह बिना हिले-डुले बैठे रहे। बहू-बेटा, बेटे की माँ.....खाली दीवारों पर अम्मा की तस्वीरें ऊपर-नीचे होती रहीं। द्वार पर अम्मा घूँघट निकाले खड़ी है। बापू को अंदर आते देख शरमाती है और बुआ की ओट हो जाती है। बुआ स्नेह से हँसती है। पीठ पर हाथ फेरकर कहती है, ‘बहू, मेरे बेटे से कब तक शरमाओगी।?’

अम्मा बेटे को गोद में लिये दूध पिला रही हैं बापू घूम-फिरकर पास आ खड़े होते हैं। तेवर चढ़े। तीखे बालों को फीका बनाकर कहते हैं, ‘मेरी देखरेख अब सब भूल गई हो। मेरे कपड़े कहाँ डाल दिए?’ अम्मा बेटे के सिर को सहलाते-सहलाते मुस्कुराती है। फिर बापू की आँखों में भरपूर देखकर कहती है, ‘अपने ही बेटे से प्यार का बँटवारा कर झुँझलाने लगे!’

बापू इस बार झुँझलाते नहीं, झिझकते हैं, फिर एकाएक दूध पीते बेटे को अम्मा से लेकर चूम लेते हैं। मुन्ने के पतले नर्म ओठों पर दूध की बूँद अब भी चमक रही है। बापू अँधेरे में अपनी आँखों पर हाथ फेरते हैं। हाथ गीले हो जाते हैं। उनके बेटे की माँ आज नहीं रही।

तीनों बेटे दबे-पाँवों जाकर दादा को झाँक आए। बहुएँ सास की आज्ञा पा अपने-अपने कमरों में जा लेटीं। बेटियों को सोता जान मेहराँ पति के पास आई तो सिर दबाते-दबाते प्यार से बोली, ”अब हौसला करो“... लेकिन एकाएक किसी की गहरी सिसकी सुन चौंक पड़ी। पति पर झुककर बोली, ”बापू की आवाज़ लगती है, देखो तो।“
बेटे ने जाकर बाहरवाला द्वार खोला, पीपल से लगी झुकी-सी छाया। बेटे ने कहना चाहा, ‘बापू’! पर बैठे गले से आवाज़ निकली नहीं। हवा में पत्ते खड़खड़ाए, टहनियाँ हिलीं और बापू खड़े-खड़े सिसकते रहे।
”बापू!“
इस बार बापू के कानों में बड़े पोते की आवाज़ आई। सिर ऊँचा किया, तो तीनों बेटों के साथ देहरी पर झुकी मेहराँ दीख पड़ी। आँसुओं के गीले पूर में से धुंध बह गई। मेहराँ अब घर की बहू नहीं, घर की अम्मा लगती है। बड़े बेटे का हाथ पकड़कर बापू के निकट आई। झुककर गहरे स्नेह से बोली, ”बापू, अपने इन बेटों की ओर देखो, यह सब अम्मा का ही तो प्रताप है। महीने-भर के बाद बड़ी बहू की झोली भरेगी, अम्मा का परिवार और फूले-फलेगा।“

बापू ने इस बार सिसकी नहीं भरी। आँसुओं को खुले बह जाने दिया। पेड़ के कड़े तने से हाथ उठाते-उठाते सोचा-दूर तक धरती में बैठी अगणित जड़ें अंदर-ही-अंदर इस बड़े पुराने पीपल को थामे हुए हैं। दादी-अम्मा इसे नित्य पानी दिया करती थी। आज वह भी धरती में समा गई है। उसके तन से ही तो बेटेपोते का यह परिवार फैला है। पीपल की घनी छाँह की तरह यह और फैलेगा। बहू सच कहती है। यह सब अम्मा का ही प्रताप है। वह मरी नहीं। वह तो अपनी देह पर के कपड़े बदल गई है, अब वह बहू में जीएगी, फिर बहू की बहू में...।

प्रस्‍तुति - अलकनंदा सिंह

Sunday, 5 February 2017

वैक्‍यूम...



मैं कहती हूं कि-
आकाश से धरती तक फैला वैक्‍यूम...
खींचता है मुझे...उस तत्‍व की ओर,
जो विलीन कर देता है
सारा अस्‍तित्‍व सारी सोच
सारा अपने-पराये का स्‍पंदन
सुख-दुख, राग-द्वेष, प्रेम-विरह,
और मैं स्‍वयं होती जाती हूं
कभी आकाश सी अनंत तो कभी
समुद्र की काई को फाड़ कर,
होती जाती हूं धरती सी गहरी...।

मैं जानती हूं कि-
आकाश से धरती तक फैला है वैक्‍यूम...
कचरा मन का हो या ब्रह्मांड का,
उसका बह जाना, समा जाना इसी वैक्‍यूम में...जरूरी है,
जो धरती और आकाश दोनों में,
बहता है संग संग,
अपने अपने अपने लिए अनंत ,
ये दोनों ही वैक्‍यूम की गंगायें समा लेती हैं-
हर लेती हैं ताप पाप सब मन के...,
ब्रह्मांड के भी...सब चुंबक बनकर ,
शुद्ध कर देती हैं प्राणवायु को...अंतरिक्ष को भी,

मैं मांगती हूं कि-
हे गंगा! वैक्‍यूम की हो, आकाश की हो... ,
धरती की... या मन की...,
मेरे कुत्‍सित को निगल कर तू मुझे आकाश बना दे...,
मुझमें अपनी गंध कर प्रवाहित, हो जाऊं शून्‍य...
और अदृष्‍ट, अपरिमित -अनंत,
मैं आकाश बन वैक्‍यूम को भीतर समेट लूं,
अपरिमित प्रेम में पगी भी रहूं...और खाली भी...
वैक्‍यूम हो जाए 'स्‍व' , और मैं बन जाऊं
आकाश-धरती-समुद्र-प्रेम-उत्‍सर्ग-और मनुष्‍यता।

- अलकनंदा सिंह

Sunday, 22 January 2017

व्यवहारिक संशोधनों का----- समय है ये

व्यवहारिक संशोधनों का----- समय है ये


बदलते इस समय में
रिश्तों की बुनियादें और उनमें प्रेम ,
ढूढ़ रहे हैं - गढ़ रहे हैं नित
नई परिभाषाएं अपनी ....

प्रेम में भी व्यवहार बदल रहे हैं
ये व्यवहारिक संशोधनों का-
समय है, समय है निज की ओर आते
स्वार्थों के प्रवाह को रोकने का ,
परंतु  ...... ? ?  ?  ?  ?

यह वह समय है जहां मन( दिल) से नहीं,
शरीर और दिमाग से जिया जाता है ....
जहां खुद को ही खुद से काट कर हंसा जाता है, 
और हंसते हुए रोया जाता है ....

ऐसे में .....
बूंद हो जाना होगा , सूक्ष्म हो जाना होगा ,
क्योंकि ....
जब एक प्यालाभर अहसास ही
पूरी की पूरी जिंदगी को
प्रेम में डुबोने के लिए- 
काफी है... 
फिर क्यों तमन्ना हो
कि मिले समंदर ... ही ....खरे सोने सा ... हमें ।

- अलकनंदा सिंह



Thursday, 15 December 2016

राष्ट्रीय ख्याति के अंबिका प्रसाद दिव्‍य पुरस्कारों हेतु पुस्तकें आमंत्रित

भोपाल। साहित्य सदन भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के उन्नीसवे अंबिका प्रसाद दिव्‍य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं ।
उपन्यास, कहानी, कविता, व्यंग, निबन्ध एवं बाल साहित्य विधाओं पर , प्रत्येक के लिये इक्कीस सौ रुपये राशि के पुरस्कार प्रदान किये जायेंगे । दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकों की दो प्रतियाँ , लेखक के दो छाया चित्र एवं प्रत्येक विधा की प्रविष्टि के साथ दो सौ रुपये प्रवेश शुल्क भेजना होगा ।

हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रण अवधि 1 जनवरी 2014 से लेकर 31 दिसम्बर 2015 के मध्य होना चाहिये । राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठा पूर्ण चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति -पत्रों से सम्मानित किया जायेगा ।

श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को भी दिव्य प्रशस्ति - पत्र प्रदान किये जायेंगे ।

अन्य जानकारी हेतु मोबाइल नं. 09977782777, दूरभाष - 0755-2494777एवं ईमेल - jagdishlinjalk@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है ।

पुस्तकें भेजने का पता है - श्रीमती राजो किंजल्क , साहित्य सदन , 145-ए, सांईनाथ नगर , सी - सेक्टर , कोलार रोड, भोपाल- 462042 । पुस्तकें प्राप्त होने की अंतिम तिथि है 30 दिसम्बर 2016 । कृपया प्रेषित पुस्तकों पर पेन से कोई भी शब्द न लिखें ।

Friday, 2 December 2016

जैनेंद्र कुमार की प्रसिद्ध कहानी- एक रात

जैनेन्द्र कुमार की प्रसिद्ध कहानी- एक रात
प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में जैनेंद्रकुमार (२ जनवरी, १९०५- २४ दिसंबर, १९८८) का विशिष्ट स्थान है। हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में मान्य हैं। जैनेंद्र अपने पात्रों की सामान्यगति में सूक्ष्म संकेतों की निहिति की खोज करके उन्हें बड़े कौशल से प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ इसी कारण से संयुक्त होकर उभरती हैं। जैनेंद्र के उपन्यासों में घटनाओं की संघटनात्मकता पर बहुत कम बल दिया गया मिलता है। चरित्रों की प्रतिक्रियात्मक संभावनाओं के निर्देशक सूत्र ही मनोविज्ञान और दर्शन का आश्रय लेकर विकास को प्राप्त होते हैं। प्रस्‍तुत है जैनेन्‍द्र  द्वारा  लिखी  गई  कहानी: एक  रात

जयराज की तीस वर्ष की अवस्था होगी। धुन में बँधा, सदा कामकाज में रहता है। अपने प्रांत की कांग्रेस का वही प्राण है। लोग उसे बहुत मानते हैं। उन्हें छोड़ और वह रहता किसके लिए है? अविवाहित है और उससे विवाह का प्रस्ताव करने की हिम्मत किसी को नहीं होती।
सबेरे का वक्त था। नौ का समय होगा। आधी बाँहों का कुर्ता और जाँघिया पहने वह एक परिषद के लिए अपना भाषण लिख रहा था।
उसी समय उससे पूछा गया कि एक डेपुटेशन मिलने के लिए आया है, क्या जयराज मिल सकेंगे? क्या डेपुटेशन अंदर आए?
‘अवश्य।’
जयराज ने कागज वहीं छोड़ दिए और वह डेपुटेशन की प्रतीक्षा में खड़ा हो गया।
डेपुटेशन के सज्जन आए और उसने जानना चाहा कि उसके लिए क्या आज्ञा है?
प्रतिनिधिगण जयराज को अपने कस्बे में ले जाना चाहते हैं। कस्बे का नाम हरीपुर है।
जयराज ने कहा, ‘हरीपुर!’
‘आप कभी वहाँ नहीं पधारे हैं। हमारे यहाँ सन 30 में कई बार लाठी चार्ज हुआ। तहसील से दो सौ से ऊपर वालंटियर जेल गए। बीस तो महिलाएँ थीं। हमने कई बार अनुरोध किया कि आप आएँ। हम बिना नेता के कब तक काम कर सकते हैं?’
जयराज सुन रहा था। सुनते-सुनते वह चटाई से उठा और टहलने लगा। टहलते-टहलते उसने कहा, ‘हरीपुर – किनती दूर है?’
‘कुल तीन स्टेशन हैं। इस बार तो आपको आना ही होगा। जनता में बहुत उत्साह है। तहसील कांफ्रेंस की कल की तारीख है, आपको मालूम ही होगा। जनता आपके दर्शन के लिए बहुत उत्सुक है। प्रांत में आप सब जगह जाते हैं।, एक बार हमारे देहातों में भी चलने की कृपा कीजिए। देखिए, आप हताश न करें।’
जयराज टहल रहा था। उसने कहा, ‘हरीपुर! क्या, कल? कितने स्टेशन आपने बताया? हाँ, तीन स्टेशन। क्या टिकट है?’ कई कंठों ने कहा, ‘सात आने।’
‘सात आने। कांफ्रेंस का क्या वक्त है?’
‘चार बजे शाम!’
‘चार बजे शाम! शाम को गाड़ी कब वापस आती है? मैं रात को नहीं ठहर सकता ….अं …अं, हाँ रात में बिलकुल नहीं टिक सकता। हरीपुर।’ मानों वह कुछ स्मृति में लाना चाह रहा है, या वहाँ से हटाना चाह रहा है। चलते-चलते शेल्फ में से रेलवे का टाइम टेबुल निकाल कर वह देखने लगा –
डेपुटेशन के कई व्यक्तियों ने कहा, ‘एक, छह-पैंतीस पर आती है और दूसरी, रात के साढ़े ग्यारह बजे। आप रात को आ जाइएगा। आपको किसी तरह की तकलीफ नहीं होने दी जाएगी।’
‘हाँ, पौने सात पर भी गाड़ी आती है। मैं आठ तक यहाँ आ सकता हूँ। ठीक! …लेकिन ठहरिए, मैं जरा देख लूँ।’ उसने चलते-चलते मेज पर से उठा कर डायरी देखी। देख कर रख दी। ‘नहीं, मैं नहीं आ सकूँगा। मुझे क्षमा करें। देखिए, नेतृत्व के मामले में गाँवों को आत्मनिर्भर बनना होगा। नेताओं का भरोसा आप क्यों रखें? इस तरह सरकार हमें हरा सकती है। चुन-चुन कर कुछ आदमियों को जेल में डाल दिया और राष्ट्र की रीढ़ टूट गई। नहीं, प्रत्येक व्यक्ति कृत निश्चय हो तब तो स्वराज्य मिलेगा। नहीं तो अगर स्वराज्य मिला भी तो जनता का स्वराज्य वह कब हुआ? हम लोगों आसरा अब छोड़ दीजिए। मैं आप-सा ही आदमी हूँ। दो टाँगें दो हाथ। आप दिल में का इरादा पैदा कीजिए और मुल्क के लिए रहिए, तो आप में मुझमें क्या फर्क है? तो यह ठीक है न? आप मुझे छोड़ें। बाहरी लीडरों की आस छोड़ो। खुद लीडर बनो। आपकी तहसील का आप की तरह मैं प्रतिनिधि हो सकता हूँ? …देखि‍ए, मैं जरूर चलता लेकिन मजबूरी आ गई है।’
प्रतिनिधि लोगों को बहुत दुख हुआ। जयराज की वहाँ बहुत ही माँग थी। उन्हें भरोसा था कि जयराज उनके हृदय को तोड़ नहीं सकेगा। उन्होंने कहा, ‘तो हम लोग जाएँ?’
जयराज ने टहलते-टहलते कहा, ‘हाँ, आप मुझे माफ कर दें। …आपने कहा, तीन स्टेशन हैं पौन सात बजे गाड़ी वापस आती है। देखिए, मैं कोशिश करूँगा। मोटर का रास्ता तो नहीं है? नहीं? अच्छा, आपको तकलीफ करने की जरूरत नहीं है। आ सकूँगा तो मैं अकेला ही आ जाऊँगा। स्टेशन बस्ती से कितनी दूर है? तीन मील है? तो अच्छी बात है। आप विश्वास रखें, मैं भरसक प्रयत्न करूँगा।’
प्रतिनिधियों ने कहा, ‘गाड़ी पर सवारी तैयार मिलेगी।’
‘अच्छा, अच्छा। आप लोगों को कष्ट हुआ। देखिए, मैं आऊँगा। लेकिन वायदा नहीं कर सकता। यहाँ दो बजे गाड़ी जाती है न? नहीं, नहीं, आदमी भेजने की कोई जरूरत नहीं है और फिर कहीं आदमी भेजना बेकार न हो। जी हाँ, जी हाँ। लेकिन गाँवों को स्वावलंबी होना होगा अच्छी बात… बंदे।’
डेपुटेशन के लोग चले गए और वह लंबे डग से टहलता ही रहा। आरंभ किया हुआ भाषण पूरा करने मेज पर जल्दी नहीं आ गया। अंत में टहलते-टहलते वह मेज पर आ बैठा और होल्डर से ब्लाटिंग पैड पर लिखा, लिखा कहें कि खींचा –
Swaraj is our birthright – as indisputable elsewhere as in politic
Swaraj Love Independence Marriage?
But there is marriage too. Marriage gives man a foot-hold, society a unit, It gives us home.
Alright. Perfectly alright. But -?
And there is love in the human breast. Love gives us glow, gives us bliss. Love makes us transcend the physical and touch the spiritual. That makes us reach out beyond the here and the now, reach out in to the enternal varities of life.
God made live. Did God make marriage also. No, man did the making of it. And I say Love is not chaos. It is never that never. Never?
Ah how slavish of me thus unwittingly to use English. Must write Hindi !s
हिंद हमारा देश है, हिंदुस्तानी है हम, हिंदी हमारी भाषा, हिंद हमारा बाना – भाइयो!
हरीपुर 23 मील, सबेरे की गाड़ी। मैं नहीं जा सकता Oh Damn it all Why make a misery of it – Dear Jairaj mind, lest –
इतना बना कर वह सिर को हाथों में थामें मेज से उठ खड़ा हुआ और भूल गया कि एक हफ्ते में उसे अपना सभापति का भाषण जिला कान्फ्रेंस के स्वागत मंत्री को छापने के लिए भेज देना है।
बिना ताले और बिना प्राइवेसी जयराज सबका बन कर अकेला रहता है। आज तक जीवन के पाँच वर्ष जेल में बिता‍ चुका है। खाली रहता ही नहीं। कालेज के चौथे वर्ष से पढ़ना छोड़ दिया, तभी सगाई भी तोड़ दी। हाँ, यही कहना होगा कि तोड़ दी, क्योंकि दूसरी ओर से तो उसके टूटने की बात ऊपर आई सुनी गई नहीं। बात यह भी हुई कि जो दुनिया में सीधी, शाही सड़क है, जयराज ने अपने को कुछ उससे भटका हुआ चलता पाया। उसे इसमें शंका होने लगी कि ठीक-ठीक कमाने और खिलानेवाला पत्निव्रत-पति उसके स्वभाव में होना लिखा है। क्या जाने कोई संकट, कोई चुनौती अँधेरे में से उसे कभी-कभी पुकार नहीं उठेगी। उसे लगता था कि उस समय उससे घर पर बाल-बच्चों से घिरा किस भाँति बैठा रहा जाएगा? तब उसने अपने साथ तर्क करके सोचा – तब मैं कौन हूँ कि एक कन्या को अपने साथ गूँथने दूँ? मैं संकट की ओर मुँह करके भागूँगा, उसका वहीं मुँह पकड़ने के लिए जो डराता है ताकि जग निर्भय बने। लेकिन इसी उद्देश्य के साथ परिणय में किसी किशोरिका को बाँधनेवाला मैं कौन? चलते-चलते राह में एक बेचारी लड़की के साथ खिंच कर बँध कर अपनी अलग झोंपड़ी बसा कर रुक जानेवाला मैं कौन हूँ?
– इस दुनिया में मुझे रुक पड़ने की छुट्टी कैसे है? किसी भी लालच में पड़ कर राह के किनारे मुझे रम जाना क्यों है? अकेले ही अकेले चलते ही चलना है। क्योंकि जिधर मुझे चलना है उधर अँधेरा है, उधर अकिंचना है। अँधेरे के भीतर तह पर तह भेद कर मुझे वह पा लेना है और ढाह देना है, जो ज्योति को छेकता है।
उसने सोच लिया – जो उसकी ही बनती-बनती रह गई, वह अब किसी और दूसरे की हो। सहर्ष उसकी हो, जो उसे विलास और विपुलता में ले जाय। अभाव में और विषद में ले चलने के लिए उसे साथ में लेनेवाला मैं नहीं हूँ, नही हूँ।
तो उसने सगाई तोड़ दी। या कहो, खुश हुआ कि सगाई टूट गई। उसने सुना था कि कन्या के पिता कहीं अन्यत्र वैभव और विपुलता देख कर उस ओर झुकने की छुट्टी चाहते हैं? कौन जाने? जयराज के मन का हाल बाहर नहीं होता है। लेकिन यह पूर्णतया विदित है कि वह अवि‍वाहित रहा है। विपदा के आतिथ्य से कभी उसने मुँह नहीं मोड़ा है और कभी वह हरीपुर नहीं गया है।
सबेरे नौ बजे एक जवाबी तार आ गया। हरीपुरवालों का तार था। लिखा था, ‘आपकी उपस्थिति अत्यंत अनिवार्य है। क्या सहस्रों को निराश करेंगे?’
तार हाथ में ले कर वह थोड़ी दूर घूमता रहा। कुछ देर के बाद मेज पर आ कर उत्तर में लिख दिया, ‘असमर्थता पर अत्यंत खिन्न हूँ। स्वावलंबन स्वराज है। सफलता की हार्दिक कामनाएँ।’
यह लिख देख कर उसके चित्त ने चैन की साँस ली और मानो अंदर ही अंदर मुस्करा कर जयराज ने अपने अधलिखे कागजों को खींच कर सामने ले लिया। उन्हें पढ़ा। पढ़ कर खुश हुआ। आगे लिखने कि लिए उत्साह से कलम उठाया। वह कलम कागज पर टिका, टिका ही रहा, बढ़ा नहीं और जब वह कलम वहाँ से उठा तब स्याही की एक मोटी काली बूँद को देखता रहा। फिर उठ कर बालों को खुजलाता हुआ टहलने लगा।
ठहरो मुझे साफ-साफ देखने दो। मैं क्या हूँ? मैं एक उद्देश्य पर समर्पित व्यक्ति हूँ। मेरा निजत्व क्या है? कुछ नहीं है। मेरा स्वार्थ क्या है? कुछ नहीं है। क्या मेरे लिए परमार्थ भी कुछ है? कुछ नहीं है। मेरे लिए एक ही वस्तु है। वही मेरा स्वार्थ, वही मेरा मेरा परमार्थ, वही मेरा निजत्व, वही मेरा लक्ष्य है। जब मैं समर्पित हूँ, तब मैं किसी भी और अन्य विचार के लि‍ए खाली नहीं हूँ, जीवित नहीं हूँ, मेरी देह मेरे मन, मेरी बुद्धि में कहीं भी कुछ और के लिए अवकाश कैसे हो, सिवाय उसके जिसके लिए मैं न्यौछावर हूँ… जिसके लिए मैं न्यौछावर हूँ? राष्ट्र के लिए। राष्ट्र के स्वराज्य के लिए। राष्ट्र क्या है? वह राष्ट्र कहाँ है? मेरे हृदय में वह राष्ट्र कहाँ है? क्या अमुक और अमुक भौगोलिक परिधियों में परिमित भारतवर्ष नामक भूखंड का चित्र मेरे भीतर गहरा उतर कर सदा जागृत रहता है? क्या वही यों जी की धड़कन में सदा स्पंदन करता रहता है? नहीं, स्पंदन करता हृदय है, राष्ट्र की भावना के बिना भी वह स्पंदन करता है। जान शेष, विश्वात्मा का निर्देश है तब तक वह स्पंदन रुकेगा नहीं, होता ही रहेगा। तब राष्ट्र क्या है? …लेकिन ठहरो, मैं शंकित चित्त नहीं बनूँगा। ‘…संशयात्मा विनश्यति।’ यह प्रश्नातीत रहे कि राष्ट्र है। मैं राष्ट्र सेवक हूँ। और कुछ भी नहीं हूँ। जयराज मात्र नाम है। राज जय का कोई पार्थक्य नहीं, कोई व्यक्तित्व नहीं है। जयराज राष्ट्र सेवक है, एक, निरा, बस…।
‘…हरीपुर के आदमी आए। हरीपुर मुझे माँगता है। मैं राष्ट्र का हूँ, प्रांत का हूँ, जिले का हूँ, गाँव का हूँ। मैं किसी माँग से विमुख कैसे हो सकता हूँ, जब तक कि मेरे उद्देश्य की दिशा की कोई दूसरी अधिक हार्दिक, अधिक वृहत पुकार सामने न हो। जयराज, हरीपुर है कि रामपुर कि जनक‍पुर है, तेरा उनमें अपना-पराया क्या है? कैसे एक से बच सकता, दूसरे से खिंच सकता है? तैने यह क्या अपने साथ जुल्म किया है कि हरीपुर के प्रतिनिधियों के हृदय को चोट दी है? तू तार के जवाब में भी भीरु बना है। तेरे पास क्या है और कुछ है, कौन-सा व‍ह राष्ट्र का काम है जो हरीपुरवालों की माँग को अस्वीकार कर देने को औचित्य दे सकता है?
‘देखो जयराज, तुम जरा भी अपने नहीं हो। तुमको अपने सेवा कार्य के साथ अशेष रूप से एकाकार रहना होगा। वही रहे, तुम न रहो। राष्ट्र रहे और राष्ट्र के सेवक के अतिरिक्त तुम और कुछ न रहो।’
जब जयराज अचानक ही भरी सभा में जा पहुँचा और उसे अध्यक्ष के आसन के पास आसन पर ला बिठाया गया, तब सभा उसके ऊँचे जयघोष से गूँज उठी। जयराज ने निःस्पृह भाव से उपस्थित नर-नारियों को देखा। देख कर उसका हृदय भर आया। उसका हृदय भारत के गौरव पर फूल आना चाहता था।
सभा आरंभ हुई और थोड़ी देर बाद सभापति ने कहा, ‘श्रीमती सुदर्शना देवी अपना स्वागत गान पढ़ेंगी।’
महिलाओं के बीच में से ही एक ओर से सुदर्शना देवी ने उठ आ कर पहले जयराज के गले में खद्दर के फूलों की माला डाली, प्रणाम किया और मंच के पास जा कर स्वागत-गान आरंभ किया।
जयराज स्वागत गान गाती हुई उस नारी-मूर्ति के उस पार श्रोताओं के समूह को बिना देखे निर्निमेष देखता रहा।
…वह मात्र राष्ट्र सेवक और यदि यहाँ उपस्थित राष्ट्र की जनता उसका सम्मान करने आई है, तो वह राष्ट्र की टेक का सम्मान है। उस नाम को निमित्त बना कर स्वागत गान का अर्ध्य देती हुई जो महिला मंच पर खड़ी गा रही है, उसकी ओर बिना देखे जयराज अपने मन में कहने लगा, ‘यह भारत की नारी शक्ति मुझमें केवल राष्ट्र संकल्प का ही स्वागत कर रही है। मैं स्वागत को ले कर राष्ट्र के चरणों में ही तो दे सकता हूँ। मेरा स्वागत यह नहीं है, मेरा नहीं है। यह स्वागत गान प्रदान करनेवाली, मात्र नारी शक्ति की ही प्रतिनिधि हो कर, मेरे गले में यह माला डाली गई है। यह माला न मेरे लिए है, न उसकी है। वह कौन है? उसका नाम सुदर्शना है। पर सुदर्शना नाम ही है। वह इस समय भारतीय नारी की गरिमा को अपने कल-कंठ के गुंजार से मुझको उपलक्ष्य बना कर भारत माता के पद पद्मों को भेंट देने प्रस्तुत हुई एक सेविका है…।’
और जयराज ने गले में से माला उतार कर सामने रख दी।
‘…सेविका है। हाँ, नाम उसका सुदर्शना है। सुदर्शना ना हो कर सुनयना भी हो सकती थी। जयराज, भारतीय नारीत्व की यह भेंट, भारतीय वीरत्व के संकल्प के प्रति है। तेरा अपना इसमें निजत्व कुछ नहीं है। कुछ नहीं हैं। सुदर्शना को तू सुनयना या सुलोचना समझना बस एक इकाई, भारत राष्ट्र की एक आदरणीय नारी… ‘
और उसने सुनयना अथवा सुलोचना, नाम की इकाई बन गई सुदर्शना की ओर पहली बार देखा। वह सामने ही भीड़ को देखती हुई स्वागत गान गा रही थी। क्या उसके स्वर में राष्ट्रप्रेम का ही दर्द था? उसके गान में क्या राष्ट्र स्नेह ही की मिठास थी? क्या वाणी के कंपन में स्वराज्य युद्ध का ही आह्नाद था? क्या उसमें राष्ट्र के एक वीर को निःस्पृह पूजा देने का ही उल्लास था? क्या उसमें अत्यंत निजी भी कुछ न था? कुछ बिल्कुल व्यक्तिगत, हृदयगत, मर्मगत, देश के भाव से भी कुछ गहरे तल तक गया हुआ? कुछ वह जो राष्ट्र-देव से किसी अधिक मूर्तिमंत, अधिक जीवंत, अधिेक निजीय देवता के प्रति समर्पणीय हो…
गर्दन को झटका दे कर, उसे सीधी करके और फिर सामने निगाह स्थापित कर जैसे जयराज ने एकाएक लगाम खींची।
‘जयराज, राष्ट्र पर चढ़ते हुए अर्ध्य में कुछ भी अपना निजत्व मान कर अर्ध्य को अपवित्र न करो। चोर न बनो। यज्ञ अशुचि न बनाओ। तुम्हारा कुछ नहीं, कुछ नहीं है। कुछ तुम्हारे लिए नहीं है, कुछ तुम्हारी स्वीकृति के लिए नहीं है। सुदर्शना सुनयना भी हो सकती है, सुलोचना भी हो सकती है। माला भारतीय नारी के हाथों में भारतीय पौरुष के गले में पड़ी है। नारी-शक्ति ने युद्ध पौरुष का स्वागत गान किया है, जयराज…!’
स्वागत गान गाती हुई सुदर्शना की ओर जाती-जाती अपनी निगाह को मोड़ कर सीधी रखते हुए जयराज ने सोचा –
‘जयराज सीधे देखो। राष्ट्र की आरती को पवित्र रहने दो। तुम्हारी अमानत में दे कर यह स्वागत राष्ट्र के भविष्य कि अभिनंदन में किया जा रहा है। खबरदार! जो इस अमानत को स्निग्ध निगाह से भी तुम देखो, जो जरा भी तुम छुओ। राष्ट्र के उदीयमान भविष्य के चरणों की ओर उस अभिनंदन को बढ़ने दो, वहीं चढ़ने दो। तुम उपादन रहो, अपनी वृद्धि उसमें कुछ मत रखो…’
एकाएक घड़ी देखी चाढ़े चार! उनसे झुक कर सभापति से कहा, ‘गाड़ी कब जाती है?’
‘क्या आज ही जाइएगा?’
‘शायद पौने सात बजे जाती है। मैं रह नहीं सकता…’
इसी समय वह जैसे एकाएक अतिशय उद्धिग्न और अत्यंत व्यस्त हो उठा, ‘मैं नहीं रुक सकता। जी नहीं, मैं किसी तरह रुक नहीं सकता। देखिए – ‘
और सुदर्शना देवी ने धीरे-धीरे उसकी ओर आ कर, समक्ष ठहर कर फ्रेम में जड़े हुए और अपने हाथ के सुंदर-सुंदर अक्षरों में लिखे हुए स्वागत-गान को उसके चरणों में रख दिया और मस्तक को उन चरणों के पास झुका कर प्रणाम किया।
जयराज ने बिना सुदर्शना की ओर निगाह उठाए झपट कर उस फ्रेम को लिया और सामने रक्खी माला पर औंधा कर दिया।
‘देखि‍ए, अब हरगिज नहीं रुक सकता। बहुत जरूरी मुझे काम है।’
अध्यक्ष ने कहा, ‘सवेरे आराम से चले जाइएगा। तहसील के कांग्रेस कार्यकर्ता सब जमा हैं। कांग्रेस कार्यक्रम के संबंध में आपसे परामर्श चाहते हैं। नौ बजे मैंने उनकी सभा बुला ली है।’
जयराज ने झींक कर कहा, ‘ओह, यह आप क्या करते हैं! मुझे चले जाना चाहिए। सभा आप अपनी करते रहिएगा। मैं कह चुका हूँ, स्वावलंबी बने बिना न चलेगा। मैं रात को नहीं ठहर सकता।’
अध्यक्ष ने विनीत भाव से कहा, ‘सवेरे छह बजे एक गाड़ी जाती है। आराम से आपको उसमें बिठा दिया जाएगा। सात बजते-बजते आप मकान पर होंगे। अगर…
जयराज ने कुछ अधीर हो कर कहा, ‘नहीं-नहीं साहब।’ और फिर एकाएक स्वयं सावधान हो कर तथा अध्यक्ष को सावधान करते हुए कहा, ‘लेकिन, आप मंच की तरफ तो देखिए, वह खाली है।’ सभापति ने उठ कर कहा, ‘भाइयों!’
जयराज फिर गर्दन सीधी कर सामने अनिमेष देखने लगा। सभापति उसका स्तुति गान कर रहे थे। वह एक ओर भारत के भाग्य पर गर्वित होता, दूसरी ओर रोना चाहता था। वह रह-रह कर घड़ी की ओर देखता था। घड़ी की सुई मिनट-मिनट पर आगे आती थी। वह मंडप में एकत्रित जनता को देख रह था। इस दृष्टि प्रसार में सभा का रंग-बिरंग विभाग भी बिछा दिखता था। वह यदि आँख उठा कर उस महिला ब्लाक की ओर देखता था, तो उसमें स्त्रियों को अलग-अलग नहीं देखता था। मानो भारतीय स्त्रीत्व की गरिमा को समग्र अविभक्त रुप में ही देखता था। सब नारियों के चित्र-विचित्र परिधानों ने एक साथ इकट्ठे हो कर मानो उस गरिमा के रुप में अद्भुत छटा ला दी है। इस चित्र में कहाँ सुदर्शना है? कहाँ सुलोचना है? कहाँ सुनयना है? इसका कुछ भी पता नहीं है। सब मिल कर चित्र को जीवन दे रही हैं, ऐश्वर्य दे रही हैं। वह जीवन और वह आभा ही ध्यान देने के लिए है। भारत के प्राणों का लालित्य ही वहाँ फूट पड़ा है। वह सब समष्टिरूप में भारतीय नारी-गौरव के उपमान की अपेक्षा ही जयराज के आकर्षण के लिए है। यों सुदर्शना सुनयना भी हो सकती है। सुलोचना भी हो सकती है।
सभापति आ बैठे। घड़ी पाँच से आगे पहुँच गई है और जयराज को अब सहस्रों दृष्टियों के मध्यप्राण बन कर बोलना होगा। वह उठा और करतल ध्वनि की घोर रव ने उसे पूरी तरह डुबो लिया। वह जाने कहाँ पहुँच गया था। मंच पर पहुँच कर उसने बोलना शुरू किया –
लौट कर देखा, घड़ी में साढ़े छह से ऊपर हो गया है। उसने झल्ला कर सभापति से कहा, ‘सवारी का इंतजाम है? मुझे अभी जाना चाहिए।’
सभापति ने उत्तर में घड़ी की ओर देखा। मानो घड़ी के मुँह के सामने उन्हें बोलने का सामर्थ्य नहीं है।
जयराज ने कहा, ‘देखिए नहीं, सवारी मँगा भेजिए। आपने मुझे बीच में वक्त की याद क्यों नहीं दिलाई?’
सभापति ने निवेदन किया, ‘गाड़ी मिलनी मुश्किल है।’
जयराज ने कहा, ‘ठीक है आप कान्फ्रेंस चलाइए। मुमकिन है, गाड़ी ही लेट हो। मुझे इजाजत दीजिए, मैं चलूँ।’
सभापति ने साश्चर्य कहा, ‘अब आप कहाँ जाइएगा? पैदल?’
जयराज ने माला और स्वागत गान को उठाया, वह रुका, फिर सभापति को उन्हें सौंपते हुए उसने कहा, ‘जी हाँ, पैदल जा रहा हूँ। स्टेशन ढाई मील ही तो है। देखिए, इन चीजों को कांग्रेस दफ्तर में रख लीजिएगा।’
सभापति उठ खड़े हुए। जयराज ने विदा ली और कुछ लोग उसके साथ-साथ चले।
जयराज ने कहा, ‘आप बैठें-बैठें।’
किंतु लोग उसके साथ ही रहे। वह निःशब्द तेजी से बढ़ने लगा और धीरे-धीरे लोगों का साथ छूट गया। वह एक साँस बढ़ता हुआ स्टेशन पर आया।
पर गाड़ी निकल चुकी थी। वह प्लेटफार्म की बेंच पर बैठ गया। बैठा रहा, बैठा रहा।
…थोड़ी देर में रात हो जाएगी, उसने सोचा, मुझे रात में बेकाम क्यों अपने स्थान से दूर रहना होगा? अब गाड़ी साढ़े ग्यारह बजे जाएगी। मैं क्यों अपने भाषण में वक्त का ख्याल नहीं रख सका। भाषण मेंरे लिए नशा क्यों है? यह मैंने ठीक किया कि माला और स्वागत गान कांग्रेस दफ्तर में रखने के लिए छोड़ आया और कह आया हूँ। क्या उस गीत के नीचे उसके हस्ताक्षर हैं? उनकी कोई वहाँ आवश्यकता नहीं है। राष्ट्र को दी हुई भेंट पर अपने नाम की मुहर की कोई आवश्यकता नहीं है। मैंने उसे देख ही क्यों न लिया? किंतु मैं समझता हूँ, सुदर्शना – हाँ, वह सुनयना भी हो सकती है, सुलोचना भी हो सकती है… इतनी बच्ची नहीं होगी कि अपना नाम वहाँ अवश्य रक्खे। यदि उसका नाम अपने हस्ताक्षरों में वहाँ है, तो इसमें संदेह है कि वह फिर कांग्रेस दफ्तर के लायक चीज है। तब वह मेरे यहाँ रह सकती थी, या किसी के यहाँ रह सकती है।
…ठहरो, नौ बजे इन लोगों ने कांग्रेस-कार्यकर्ताओं की सभा बुला ली है। मैं यहाँ स्टेशन पर पाँच घंटों का क्या बनाऊँगा? लेकिन वह लोग गलती करते हैं कि मुझे बिना पूछे मेरे आसरे सभा बुला लेते हैं। और वक्त क्या बुरा है, नौ बजे…।’
वह उठ कर प्लेटफार्म पर टहलने लगा। टहलता रहा, टहलता रहा, और वापस फिर बस्ती की ओर चल पड़ा।
चलते-चलते वह कातर हो-हो आया।
‘बस्ती में हजारों घर हैं। हजारों प्राणी उनके नीचे बसते हैं। ओ मेरे घट-घट रमते हुए राम मुझे शक्ति दे! मैं तेरे घट-घट में खो जाऊँ, जन-जन में बसूँ। मैं किसी एक का हो कर नहीं रहना चाहता। कोई भी एक विशिष्ट रूप में मेरा नहीं है। जब इस हरीपुर नगर में जा रहा हूँ, तब समस्त हरीपुर के प्राणों के लिए मेरा प्राण हो। दरिद्रातिदरिद्र, निम्नातिनिम्न हीनातिहीन जन के प्रति मैं अधिक-से-अधिक प्रदत्त बनूँ। इस नगर में मेरे लिए विशिष्ट कोई नहीं है। मेरे राम, कोई नहीं है। वह मानो प्रण करता हुआ चला -विशिष्ट कोई नहीं है, कोई भी नहीं है।
शाम से ही कुछ बादलों के आसार थे। नेऋृत्य से ठंडी वायु उमड़ रही थी। और दूर क्षितिज के पास काले नागे के सप्त फण सा बादल शनैः-शनैः ऊपर उठ रहा था।
कांग्रेस कार्यकर्ता लोग दफ्तर में जमा थे। जयराज ने वहाँ पहुँच कर सभा के अध्यक्ष से कहा, ‘लीजिए गाड़ी नहीं मिली और मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ।’
अध्यक्ष अति धन्य हुए। उन्होंने कहा, ‘आइए, आइए !’
जयराज ने कहा, ‘आप अपनी सभा जरा जल्दी कर लें, ओर जो लोग आनेवाले हों, उन्हें बुला लें। मेरी गाड़ी साढ़े ग्यारह बजे आती है न? दस बजे तक मैं सभा में सहयोग दे सकता हूँ। तब तक आपकी सभा क्यों न हो जाय?’
सभापति महोदय ने कहा, ‘जी हाँ, मैं अभी बुलाता हूँ। लेकिन आप रात को ठहर सकें तो अच्छा है।’
‘जी नहीं, रात को किसी तरह नहीं ठहर सकता।’ जयराज ने कहा, ‘लेकिन आप सभा शुरू कीजिए। मुझे मुझ पर छोड़िए।’
नौ बजे के लगभग सभा शुरू हुई। उस समय हवा आँधी हो चली थी और बादल सारे आसमान पर छा भरा था। और बिजली भी बीच-बीच में तड़कती थी। सभा हो रही थी और कुछ लोगों का ध्यान जयराज के गंभीर प्रवचन से हट कर हठात् उस प्रकृति की हुंकार के अर्थ की ओर जा रहा था। परंतु जयराज अशेष रुप से प्रस्तुत विषय में दत्तचित्त था।
हॉल की खिड़कियां काँपने लगीं, गड़गड़ाहट बढ़ गईद्य उस समय जयराज कह रहा था-
कांस्ट्रक्टिव वर्क ही है। हमें राजनीतिज्ञ नहीं चाहिए, सेवक चाहिए। सेवक अपने को सेवा में खो दे। अपने को खोने का अर्थ अपने प्राणरस को जनता के मूल में सींच देने का है। भूखे के साथ, बेरोजगार के साथ अपने को मिला देने की कोशि‍श हमें करनी है। भूखे को खाना, बेकार को काम और आंशकित को ढाँढ़स हमें देना है। चरखा यह सब देता है।’
और, बादल धुमड़ रहे थे, बिजली कड़क रही थी, और वक्त बढ़ रहा था। बीच-बीच में कुछ भारी-भारी बूँदें भी टप्प, आ चुकी थीं। इसी समय अनायास घड़ी की ओर देख कर उसने अध्यक्ष से कहा, ‘देखिए, किसी सवारी का इंतजाम हो सके तो।’
अध्यक्ष धीमे से बोले, ‘बादल बहुत हो रहे हैं। मैं आदमी भेजता हूँ।’
सभा चलती रही और आदमी ने सूचना ला कर दी कि घटा घनघोर है, सवारी हो तो जायगी, गाड़ीवाला दो रुपया माँगता है। सभापति ने उसे चुप करते हुए कहा, ‘अच्छा, रुपए की क्या बात है। (जयराज से) सवारी हो जायगी। माँगवा दी जाय?’
‘जी हाँ, मँगवाइये, बस दस होते हैं।’
उस आदमी को गाड़ी ले जाने के लिए फिर भेज दिया गया और सभा चलती रही।
किवाड़ खड़-खड़ खड़कते थे। हवा साँय-साँय करती थी। वह किवाड़ों को थपेड़े से उधेड़ कर भीतर घिर आना चाहती थी। अँधेरा काले पर काला था, जिसको बिजली और घोर कर जाती थी। और दुनिया घरों में बंद थी।
जयराज ने घड़ी की ओर देखा। दस पर पाँच मिनट हो गए, दस हो गए, अब पंद्रह भी हो जावेंगे। उसने सभापति से पूछा, ‘सवारी आ गई?’
उन्होंने कहा, ‘अभी आदमी लौटा नहीं।’
जयराज ने व्यस्त भाव से कहा, ‘तो ठहरिए मुझे चलना चाहिए।’ और वह उठ खड़ा हुआ।
लोगों ने कहा, ‘देखिए तो साहब, बाहर क्या हाल है? आज यहाँ रहिए, सवेरे चले जाइएगा !’
जयराज मुस्कराया। मानो कहा, ‘वर्षा और हवा हमें मोड़े तो हम कैसे कृत संकल्प? कैसे राष्ट्रकर्मी?’
इतने में उस आदमी ने आ कर जवाब दिया कि गाड़ीवाला बादलों की ओर देख कर जाने को तैयार नहीं है। वह पाँच रुपए माँगता है।
‘क्या?’ जयराज ने साश्चर्य कहा, ‘गाड़ी के रुपए कांग्रेस को देने होंगे? नहीं-नहीं तो मैं पैदल ही जाऊँगा।’
बात उनकी पूरी तरह खतम नहीं हुई थी कि तड़-तड़ चोट दे कर बाहर के टीन पर ओले गिर पड़े।
लोगों ने जयराज की ओर देखा। जयराज प्रसन्न मालूम होता था। उसने कहा, ‘ओहो, ओले गिर रहे हैं ! (सभापति की और मुड़ कर) दो कंबल मुझे दीजिए और एक छतरी। दे सकेंगें?’
सीभापति परिपक्व अवस्था के पुरुष थे। जयराज अभी युवा था। उन्हें विचार भी आया कि क्या वह पिता की भाँति आगे बढ़ कर उस लड़के को मूर्खता से नहीं रोक सकते? लेकिन जयराज की ओर देख कर उनका आत्मविश्वास उड़ जाता था और वह प्रार्थी ही हो रहे थे। उन्होंने कहा, ‘आप सवेरे जायँ तो?’
जयराज ने कहा, ‘दो कंबल दे सकते हो तो आप दे दें। आपकी कृपा होगी।’
कंबल लिए। एक को बदन से लपेटा, दूसरे को ओढ़ा, छतरी सम्हाली और जयराज ने कहा, ‘अच्छा आप लोग मुझे इजाजत दें।’
उसके कहने के साथ ही एक पैने तीरों की नोंक-सी बूंदों की बौछार हवा की बाढ़ के साथ आ कर टीन को उधेड़ गई।
जयराज अनायास कुछ ठिठक गया।
…हरीपुर में आखि‍र यह रात क्यों नहीं बिता सकता? सवेरा होते ही यहाँ से चला जा सकता है। किंतु तभी उसने सभी लोगों की ओर मुँह करके दोबारा कहा, ‘अच्छा बंदे।’ और स्थिर डग बढ़ा कर दरवाजे के बाहर हो गया।
उसी हरीपुर में एक छत के नीचे कुछ और भी घट रहा था।
सुदर्शना देवी ने माला जयराज के गले में डाली, स्वागत गान पढ़ा, उसको चरणों में चढ़ा दिया और उन चरणों को प्रणाम कर जगह पर आ बैठी, इसके बाद जयराज का उसने भाषण सुना। खद्दर का मोटा कुर्ता, मोटी धोती, उन्नत ललाट, निर्भीक और संकल्पयुक्त वाणी के साथ जयराज भाषण करता रहा, तब सुदर्शना उसे सुनती रही। देखती रही और नहीं भी देखती रही।
जयराज बीच में ही मैं मंडप से उठ कर बाहर चला गया। सुदर्शना अपनी जगह ही बैठी रही। जब आसपास की और सब स्त्रियाँ उठ कर चलने लगीं, तब वह भी उठ कर चल दी।
वह जयराज को क्या जानती है? मालूम नहीं, क्या जानती है। कांग्रेस नेता हैसियत से जो वह है, उतने को तो परिचय सार्वजनिक संपत्ति है। सो उसको भी प्राप्त है। उसके आगे भी यदि कुछ जानती है तो पता नहीं। आज पहली बार उसने जयराज को देखा है।
सभा में से जब सब उठीं, तब वह भी उठ कर चली आई। चलती चली ही आई। घर आ कर एक चटाई पर बिना कपड़े बदले बैठ गई। फिर एकाएक माथे पर दोहत्था मार कर वह वहाँ औंधी लेट गई। उसने मन को वहाँ मसौस-मसौस लिया। पर समझ न पड़ता था, वहाँ क्या उठ रहा है।
कुछ भी उसके निकट स्पष्ट होता ही नहीं था। दो-एक बार उसने अपना सिर भी चटाई पर दे-दे मारा, पर तो भी उस आग हो रहे सिर की समझ में कुछ नहीं आता था।
बहुत देर तक ऐसे पड़े रह कर वह उठी। हाथ-मुँह धो लिया, कपड़े, बदल कर निरी धौली एक साड़ी पहन ली। पहन कर अपने पति की तस्वीर के सामने घुटनों जा बैठी। उस चित्र के आगे उसने भक्तिपूर्वक अपना मस्तक नवाया और उसके बाद भरे से आते हुए कलेजे को ले कर घर के काम-धंधे में लग गई।
सध्या के भोजन के अनंतर वह अपने पति के कमरे में गई। पति आराम से कुर्सी पर लेटे हुए सिगार पी रहे थे और धुआँ देख रहे थे। उन्होंने मूँछों में ही मुस्करा कर कहा, ‘आओ कैसे आई?’
वह आती ही आई और अलमारी की ओर बढ़ गई। खोल कर उसे देखने-भालने लगी, मानो इसी के लिए वह आई थी।
‘क्या चाहिए?’
पत्नी कुछ धर-उठा करती ही रही और चुप रही।
पति फिर टाँग सामने फेंक कर सिगार पीने लगे और धुआँ देखने लगे। थोड़ी देर बाद सुदर्शना उसके सामने आ कर कुर्सी की पीठ को पकड़ कर खड़ी हो गई। कुछ देर खड़ी रही और पति को पता न चला। सुदर्शना ने कहा, ‘मुझे तुमसे एक बात कहनी है।’
आँख खोल कर सामने खड़ी सुदर्शना की मूर्ति को देख कर पति ने कहा, ‘कहो।’
सुदर्शना ने कहा, ‘तुम मुझे क्या समझते हो?’
पति की समझ में एकाएक यह बात नहीं आई। सामने कुर्सी की पुश्त को पकड़ कर खड़ी हो कर भारी चेहरे से जब पत्नी पूछती है – ‘तुम मुझे क्या समझते हो?’ बिना भूमिका, बिना प्रस्तावना के जब वह एकटक यही पूछती है कि, ‘तुम मुझे क्या समझते हो?’ तब उसे क्या समझना होगा? पति ने कहा, मैं तुम्हें अपने प्रेम की प्रतिमा, प्राण का प्राण, घर की रानी, आँख की पुतली समझता हूँ, मेरी रानी, और क्या समझता हूँ?’
और उन्होंने सिगार में से एक दम खींच लिया और मुँह को गोला कर बना कर धुएँ को कुंडलाकार रूप में छत की ओर धीमे-धीमे उड़ा दिया।
पत्नी ने कहा, ‘मैं पतिव्रता नहीं हूँ।’
कहकहे के साथ पति ने हँस कर कहा, ‘मेरी रानी हो, मेरी मलका, मेरी जारीना ।’
‘आज से पहले मैं यह नहीं जानती थी। आज जानती हूँ। तो तुमसे कहने आ गई हूँ…।’
पति का सिगार हाथों में रहा और वह सामने मानो उड़ गए हुए धुएँ में खोए, गुम हो रहे!
‘…तुमसे मैंने बहुत प्रेम पाया है, बहुत आदर लिया है। वह सब मैंने चोरी की है। ठगी की है। मैं उसकी बननेवाली कोई न थी। मैं अपात्र थी। आज मुझे पता चला है कि अपना सब कुछ मैं तुम पर नहीं वार चुकी। भीतर ही भीतर कुछ बच गया था, जो आज देखती हूँ, तुम्हारे चरणों में मैं अर्पण नहीं कर सकती थी। …यों न देखो…, मुझे देखो। मैं तुम्हें धोखा देती रही। तुमसे पाती सब कुछ रही, देने में चोरी करती रही…।’
पति ने किं-विमूढ़ भाव से कहा, ‘क्या है, क्या बात है?’
‘बात कुछ नहीं है। मैं अब तुम्हारे प्रति चोर नहीं रहूँगी। विश्वासघातिनी नहीं रहूँगी। तुमने मुझे इतना दिया, सबके लिए मैं ऋणी भी तो नहीं हो सकती, कृतज्ञ भी तो नहीं हो सकती। क्योंकि यह सब मैंने ठगाई की है। लेकिन जानने के बाद मैं कुछ भी लूँगी तो जलूँगी। मैं पतिव्रता नहीं है। आज मैं तुम्हें यही बताती हूँ कि मैं पतिव्रता नहीं हूँ।’
अविश्वस्त, किंतु संतप्त, पति ने कहा –
‘तो क्या है? पतिव्रता नहीं, तो तू क्या है? ‘
‘मैं तुम्हारे घर से निकाल देने लायक हूँ। मैं सच कहती हूँ, जान बूझ कर मैं तुम्हें धोखा देनेवाली न थी। लेकि‍न यह मुझे आज ही मालूम हुआ कि मैं पूरी तरह समर्पित नहीं हूँ। सो आज ही तुम्हारे सामने खड़ी हूँ कि मुझे कि मुझे काला मुँह कर जाने दो। अपनी कृपा के नीचे मुझे एक क्षण भी मत टिकने दो। तुम कृपा की छाया तो उठाओगे नहीं, तब मुझे ही इजाजत दो कि मैं उसे कलंकित न करूँ।’
‘सुदर्शना ! सुदर्शना !’
‘जान कर मुझसे तुम्हारा अमंगल न होगा। तुम्हारे प्रेम को मैं विफल नहीं कर सकती। तुम्हारे से पति को पा कर मैं घर को आनंद से भरा क्यों न रख सकी? घर पर क्यों सदा उदासी रहती थी, जबकि वहाँ पूर्णता उमगी रहनी चाहिए थी? कारण मैंने आज जाना है। मेरे समर्पण में त्रृटि थी, मेरे पतिव्रत में शल्य था। मेरे मन में चोरी थी, चलन में खोट थी। अब मैं तुम्हारे दान को लांछित नहीं करूँगी।’
‘सुदर्शना ! सुदर्शना !’
‘देखो, बादल गरजता है। आसमान काला है। बिजली तड़कती है। मैं आज इसी काली दुनिया में चली जाऊँगी, आसमान ऊपर होगा, धरती नीचे। और मेरा हृदय और उसके भीतर का पाप-पुण्य मेरे साथ। मेरे कलंक की छाया मुझ तक ही सिमटी रहेगी, मुझे ही डसे रहेगी। वह तुम्हें छूने को न बढ़ेगी।’
पति कुर्सी से उठ आया, कुर्सी की पुश्त पर रखे हुए पत्नी के हाथों पर अपने हाथ रख कर और उसकी आँखों में देखते हुए उसने कहा –
‘सुदर्शना, मुझे बताओ क्या है? इस तुम्हारे धड़कते हुए दिल को मैं समझना चाहता हूँ, समझ नहीं सकता। मैं नहीं समझता आत्मा। मैं नहीं समझता धर्म। मैं नहीं समझता सदाचार। लेकिन मैं समझता हूँ प्रेम। सुदर्शना, मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। जानता हूँ, तुम मेरी समझ से बाहर रही हो। मुट्ठी की पकड़ में समाई नहीं। तुम मुझे सदा बचा ही गई हो। लेकिन सुदर्शना मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। सुदर्शना, तुम यह जानती हो। मैंने कभी पतिव्रत के बारे में पूछा है? मैंने क्या अपने में उसकी लियाकत पैदा की? कुछ चाहूँ, इससे पहले मैं अपनी तरफ बिना देखे कैसे रहूँ? मुझे नहीं चाहिए कुछ सुदर्शना, बस तुम मुझे प्रेम की स्वीकृति भर दो। तुम देखोगी, मेरी शराब भाग जाती है, ऐब छूट जाते है झूठ उड़ जाता है। सुदर्शना, मैं तुमसे कम बोला। तुमसे अलग-अलग रहा। क्योंकि मेरा मुँह न खुलता था। मुझे हिम्मत न होती थी। क्योंकि मैं जानता था मैं खोटा हूँ लेकिन तुम छूटने या छोड़ने की बात करोगी, तो खोटा दिल भी थोड़ा-बहुत तुम पर अपना दावा बताना चाहेगा, सुदर्शना। आज इस गरजते आसमान के नीचे खड़े हो कर कहता हूँ, तुम पर पतिव्रत का कोई दावा नहीं है। मेरे प्रेम का ही जो समझो दावा है। और यह प्रेम किसी तरह की कैफियत तुमसे नहीं माँगता। मैं असभ्य हूँ, व्यसनी हूँ, दुराचारी हूँ, मैं मान लेता हूँ, मैं हूँ। लेकिन तुम्हें मैं छोड़ सकता हूँ। तुम छोड़ना भी चाहो तो एक बार तुम्हारे हाथ जोर से पकड़ कर मैं कहूँगा, मैं नहीं, मैं नहीं छोड़ सकता।’
सुदर्शना के आँसू एक-एक कर टपकने लगे। पति की भी वाणी भर्रा कर रह गई थी। और चश्मे के नीचे उसकी आँखें सजल हो आई थीं।
सुदर्शना ने कहा, ‘मेरे स्वामी, मुझे भरोसा है सब कुछ अच्छा ही होगा। आपके प्रेम को मैं स्पर्श नहीं कर सकती, यह मेरा ही दुर्भाग्य है। मैं कैसे उसे छूने का साहस करूँ जबकि मैं उसके प्रतिदान में चूकती हूँ। नहीं, ऐसा मैं नहीं कर सकूँगी। (ओले तड़-तड़ पड़े दरवाजे के शीशों पर वे छर्रों से आ कर लगे) स्वामी, तुमने मुझे कब टोका है? (घुटनों बैठ कर) मैं जानती हूँ, तुम्हारा प्रेम वह है, जो तुमसे अलग होती हूँ, तब भी, मुझे नहीं रोकेगा। मैं – ‘
सुदर्शना ने पकड़ने के लिए पति के पैरों की ओर हाथ बढ़ाया, पति की आँखें सूनी थीं। पत्नी के हाथ की उँगली का स्पर्श उसके पैर को हुआ कि अतिशय विपन्न भाव पति ने जोर से अपने पैर खींच लिए। वह तेज चाल से कमरे में चलने लगा। चलने लगा और चलने लगा। चलते-चलते अंत में एक आलमारी में से बोतल खींची, गिलास लिया और मेज के सामने बैठ गिलास पर गिलास पीने लगा।
सुदर्शना आँसू भरे नैनों से धीरे-धीरे उठी और कमरे से बाहर निकल गई।
अँधेरी रात है। बूँदें पड़ रही हैं। बादल घुमड़ रहे हैं। सब सुनसान। बिजली अपनी चमक से अँधेरे को और घना करके छिप जाती है। और जयराज सिर पर छतरी ठहराए, कंबल ओढ़े लंबे डग बढ़ाता हुआ चला जा रहा है। छतरी बेकाम हो चुकी है फिर भी सिर पर है। कंबल पानी से भीग कर भारी हो रहा है। और जयराज चला जा रहा है। बस्ती के भीतर ही एक चौराहे पर बिजली की कौंध से उसे दिख आया कोई स्त्री भीगती हुई सड़क के किनारे खड़ी है। पास पहुँच कर जयराज ने कहा, ‘कौन हो, बाई?’
तब तक गुप अँधेरा हो गया था। उस अँधेरे में से ही सुदर्शना ने कहा, ‘स्टेशन जाना चाहती हूँ। कौन सड़क जाती है?’
जयराज नहीं पूछ सका, वह कौन, क्यों स्टेशन जाना चाह रही हो। उसने कहा, ‘मैं स्टेशन जा रहा हूँ।’
इतना सुनते ही वह आगे बढ़ आई और जयराज के साथ हो ली।
उस समय एकाएक जयराज के मन में उदय हो आया कि ओले-पानी में, अँधेरे एकांत में, दुनिया को आराम में बंद और सोती छोड़ कर उसका साथ पकड़ स्टेशन चलने वाली यह नारी सुलोचना अथवा सुनयना अथवा सुवदना नहीं है। वह तो कोई विशेष विशिष्ट ही है जो किसी का प्रतिनिधि नहीं है, मात्र स्वयं है। और वह भी भारत राष्ट्र की सेवा में समर्पित अगण्य सेवकों में से एक नगण्य सेवक नहीं है, जो जयराज न हो कर प्रियराज अथवा बलराज हो सकता है। नहीं, इन सहस्रों नर-नारियों की बस्ती के बीचों-बीच निर्जन चौराहे पर, जिसकी ओर से जगत् बेखबर है और बंद है। इस झरते आसमान के नीचे और आप्लावित पृथ्वी के वक्ष पर, वह देश और राष्ट्र सेवा और साधना, इन सबसे ऊँचा हो कर विश्वात्मा के समक्ष इस अकेली नारी के बराबर, अत्यंत एक और अकेल, ठेठ और वास्तव जयराज चल रहा है। वह सब ओर से मुक्त है, स्वयं है। इस अँधेरे के गर्भ में सब शंकाओं के बीच में सारवान्, सब व्यर्थताओं के बीच में अव्यर्थ।
और, सुदर्शना? जयराज को जान लेने में उसने कब पल भर भी खोया है?
जयराज ने कहा, ‘इधर छतरी के नीचे जा जाओ। बहुत पानी है।’
सुदर्शना पास आ कर सटी-सटी चलने लगी। कौन हो? क्या हो? क्यों ऐसी हालत में हो? ये प्रश्न भी कहने के लिए ऐसे समय एक-दूसरे के बीच हो सकते हैं। यह बात उन दोनों के मन किसी ओर से उठ कर आई ही नहीं। मंडलाकार विश्व के बीच में, अँधेरे में ढके, अस्पष्ट राह पर एक छतरी के नीचे वे ही दोनों बराबर-बराबर जा रहे हैं। वे ही दोनों आपस में एक के लिए दूसरे हैं। चारों ओर का और सब साथ उनसे छूटा है।
तीसरा कहीं भी कोई और नहीं है। इतना वे जानते हैं। यही उनके लिए बहुत है। यही उनके लिए बस है। यहाँ उनके और क्या इष्ट शेष है…?
चलते-चलते जयराज ने कहा, ‘लो! तुम तो सारी भीग रही हो। लो यह कंबल ले लो।’
भीतर कमर से लिपटा कंबल खोल कर जयराज ने उसे ओढ़ा दिया। उस कंबल को ओढ़ कर वह चुपचाप फिर साथ चलने लगी।
पानी थोड़ी ही देर में खूब पड़ गया था। जगह-जगह उसकी सतहें बिछी थीं। सड़क पर छोटी-छोटी तलैया बन रही थी। वे बिजली के प्रकाश में थोड़ा हँस लेती और फिर अँधेरा उन्हें ग्रस लेता।
सुदर्शना का पैर छप से तलैया में पड़ा। पानी उछल कर जयराज की टाँगों पर लगा। और सुदर्शना ने एक धीमी ‘आय’ की।
‘क्या हुआ।’ जयराज ने पूछा और वह चुप हो गया।
सुदर्शना, चुप, पैर निकाल कर जरा लँगड़ाती हुई फिर आगे बढ़ चली।
‘मोच आ गई?’
सुदर्शना, चुप, आगे बढ़ती ही चलती रही। जयराज भी दोनों के सिरों पर छतरी सम्हाले रखे चल रहा था। रुक कर एकाएक उसने कहा, ‘पैरों में जूते भी नहीं हैं?’ उसने अकस्मात बिजली के प्रकाश में देखा था कि पैरों नन्हें गोरे-गोरे हैं और चले नहीं हैं, यह भी अनायास उसे दीख गया।
सुदर्शना चुपचुपाती चलती ही गई और देखा गया कि एकाएक जयराज की चाल में भी तेजी आ गई। उसने मानो परुष पड़ जा कर कहा, ‘जल्दी चलो, मुझे गाड़ी से जाना है।’
सुदर्शना तेज-तेज चलने लगी। उसका वह पैर लँगड़ा ही रहा था। किंतु उस ओर से हठात् मुँह मोड़ कर जयराज तेज ही चलता रहा। कुछ देर में चाल में एकाएक मद्धम हो कर उसने कहा, ‘ओह तुम्हें मोच आई। मुझे माफ करना?’
उसके बाद काफी दूर तक वे लोग नि:शब्द बंद, एक छतरी के नीचे सटे ही सटे चलते रहे। वर्षा धीमी होती दीखती थी। बादल फट रहे थे। जहाँ-तहाँ वायु के स्पर्श से राह के पेड़ों के पत्तों पर से कुछ टप-टप बूँदें टपकती थीं। जुगनू मुँह चमकाने लगे थे। रात सन्नाटा भी रही थी। अँधेरे में कम स्याही रह गई थी। और वे दोनों एक-दूसरे की साँस सुनते, और मानो परस्पर अनपेक्ष्य चले जा रहे थे। स्टेशन के पास के सिगनल की लाल-लाल आँखें दीख आईं। कहीं हरा-हरा भी कुछ दीखता था। मानों नींद के अँधेरे के पट पर टँके रंगीन सपने हों।
‘कहाँ जाओगी?’
चुप।
‘मेरी गाड़ी साढ़े ग्यारह बजे चली जाती है।’
‘ओह, जाड़ा लग रहा है? वह स्टेशन आ गया। आज बहुत जाड़ा है। कंबल ठीक से लपेट लो (सुदर्शना के कंबल को हाथ लगा कर) ओह! यह भी खूब तर हो गया। खैर। स्टेशन पर देखें आग-वाग कुछ मिलती है क्या? कंबल भारी है? देखो, यों नहीं, इस तरह ओढ़ो।’ और उसे कंबल ठीक ओढ़ा दिया।
सुदर्शना सब ओर से छुटी, इस समूचे अँधेरे सन्नाटे भरे शून्य के बीच में से निरुद्देश्य अनजानी रा‍ह पर जि‍सके साथ चली जा रही है, उसी के प्रति वह अपने में शंका कहाँ से लाए? वह चली ही जा रही है, शब्दहीन, संदेहहीन, निर्व्याज और सम्यगभाव से, जिसे करने को न प्रश्न की आवश्यकता है, न उत्तर की अपेक्षा है। जिसमें जिज्ञासा का अवकाश नहीं है। भवितव्यता के संबंध में किसी प्रकार की आंशका के लिए गुंजाइश नहीं है। संपूर्ण असंदिग्ध नि:कांक्ष्य और निश्शंक, वह चली जा रही है। कहाँ… नहीं जानती। क्यों? …नहीं जानती …और जानने की इच्छा भी हो, इतना भर भी अभाव, इतना भी रिक्त उसमें नहीं है।
स्टेशन के पास पहुँचते-पहुँचते उसने कहा, ‘आपकी गाड़ी साढ़े ग्यारह बजे चली जाती है?’
बारिश रुक गई थी और हवा भी थमी थी। तीसरे दरजे के मुसाफिरखाने में एक दो व्यक्ति गठरी हुए पड़े थे। दफ्तर में बाबू काउंटर पर माथा टेके ऊँघ रहा था। दफ्तर के बाहर एक बेंच पड़ी थी। भीतर तार की डमी गट्ट गर गर कर ही रही थी। बाबू का सिर हथेली पर टिका था और मुँह से लार-सी निकल रही थी। वह कंबल में लिपटा था।
जयराज सुदर्शना को बेंच पर बैठा छोड़ कर दफ्तर में आया। उसने कहा, ‘बाबूजी!’
बाबूजी सपना ले रहा था। उसने चौंका कर आँखें खोलीं। मुँह की लार पोंछी। तभी उसने स्टेशन से गाड़ी छूटने की घंटी सुनी। और तभी सुना, एक आदमी कह रहा है, ‘बाबूजी।’
उसने कहा… ‘क्या है?’
जयराज ने कहा, ‘एक कंबल की जरूरत है। आप दे सकेंगे?’
बाबू ने अँगड़ाई ली, घड़ी की ओर देखा, कंबल को उतार कर अलग रखा। कहा, नहीं है, ‘बाहर निकलो।’
जयराज ने कहा, ‘सर्दी ज्यादा है। अभी बारिश हो कर चुकी है। कंबल आपको लौटा दिया जाएगा।’
नींद-जड़ी मुद्रा से बाबू ने कहा, ‘नहीं है, दफ्तर से बाहर जाओ।’
जयराज ने आगे बढ़ कर कंबल उठा लिया। कहा, ‘कंबल तो यहाँ है। तो आपका नहीं है? यह यहीं पहुँच जायगा’ कह कर कंबल ले कर जयराज चुपचाप बाहर निकल गया।
सुदर्शना बेंच पर बैठी सामने देख रही थी। रेलें बिछी थीं और आपस में कटती-फटती जहाँ-तहाँ चली जा रही थीं। उन पर पानी की चमक ठहरी भी, और स्टेशन के धुँधले प्रकाश में वहाँ कभी-कभी चाँदी की किरणें बिछी-सी लगती थीं। सुदर्शना कंबल ओढ़े थी। भीतर के वस्त्र उसके भीगे थे। उसे सर्दी लग रही थी और रह-रह कर वह काँपती थी। ओढ़े हुए कंबल में से भी पानी पार हो गया और वह‍ बदन को ठंडा-ठंडा लगता था।
जयराज ने कहा, ‘कंबल भीगा है, उतार डालो। लाओ, मैं फैला दूँ।’
उसे कंबल को हाथ लगाया और सुदर्शना ने उसे झट उतार कर अलग कर दिया।
जयराज ने बेंच के पीछे उसे सुखा दिया और नया कंबल सुदर्शना के हाथ में देते हुए कहा, ‘लो इसे ओढ़ लो। कुर्ता गीला है, लाओ मुझे दो निचोड़ कर सुखा दूँ।’
सुदर्शना ने सुना, कंबल हाथ में लिया और बराबर बेंच पर रख दिया, ओढ़ा नहीं।
जयराज ने एक-एक कर अपने सब कपड़े उतार दिए। वह‍ सिर्फ धोती के ऊपर बनियान पहने हुए था।
सुदर्शना ने कंबल बराबर में रख दिया और यह नहीं कहा कि‍ कंबल यह रखा है तुम ओढ़ लो। और लटके हुए पैर बेंच पर ले कर गीली धोती के पल्ले को तान, दोनों हाथों के बीच अपना सिर लिए वह ऐसी बैठ गई मानो अब कुछ देखना नहीं है, करना नहीं है। जयराज व्यस्त हो कर उसके पास बेंच पर आ बैठा और कंबल खोल कर उसे ओढ़ाने लगा।
सुदर्शना मानो नींद में थी, उसे कुछ जैसे पता नहीं चल रहा था।
जयराज ने कहा, ‘कुर्ता उतार दो और जरा लेट जाओ, आराम कर लो।’
सुदर्शना मानो सुषुप्ति में सब कुछ करने लगी। वह कुर्ता भी उतार देगी, लेट भी जायगी। उसने कुर्ता उतार कर अलग कर दिया और जैसे नींद की झोंक में वह झुकी पड़ने लगी। बीच में सँभाल कर जयराज ने कहा…
‘सुदर्शना, सुदर्शना ! देखो गिर मत जाओ, ठीक से लेटो।’
और सुदर्शना उसकी गोद में ढुलक पड़ी।
जयराज न समझ सका कि क्या करे और वह अपनी गोद को यथावस्थित रख कर बेंच इस प्रकार बैठ गया कि‍ अब तो मानो उसे उठना नहीं है। उसकी गोद में यों पड़ी हुई असहाया को किस प्रकार हटा दे कर वह यहाँ से उठेगा। वह इस भाँति बैठ गया कि गोदवाली को कोई असुविधा न हो। सुदर्शना गोद में गिर पड़ कर, कुलबुला मानो वहाँ अपना स्थान ठीक करने लगी। पैर और हाथ चला कर उसने कंबल को ठीक-ठीक ऊपर ले लिया। कंबल इस भाँति कुछ जयराज के ऊपर भी आ गया। घोंसला-सा बना कर वहाँ फिर अपनी जगह को ठीक-ठीक करके उसकी गोद में जो चिड़िया चिपक सोई है, जयराज मानो थप-थपा कर उसे सुलाना चाहने लगा। उसने कहा, ‘सर्दी लगती है?’
सुदर्शना उत्तर में गोद में कुछ कुलबुला कर और सिमट गई।
जयराज अत्यंत उतिष्ठ हो कर सामने देखता हुआ बैठा रहा।
उसके निर्वस्त्र गात पर कभी अत्यंत शीतल कोमल-स्पर्श देह का स्पर्श होता था। वह देह मानो उसके गात पर अपने को छोड़ दे रही थी। ऐसे समय उसके शरीर में बिजली दौड़ जाती थी तब वह जपता – राम, राम, राम, राम।
राम क्या है उसने नहीं जाना। वह कभी नहीं जानेगा। पर राम के नाम के जप को वह ऐसा कातर बन कर, ऐसा प्रार्थी बन कर थामे रहता मानो यही उसका अंतिम सहारा है। वह जल्दी-जल्दी कहता – राम, राम, राम।
चिड़िया घोंसले में अब आराम से सोई पड़ी है। आराम से? हाँ आराम जब कम होता है, वह कुलबुला कर करवट ठीक कर लेती है, उसकी धोती भीगी है सही, पर कंबल के नीचे उसे गर्मी भी मिल रही है।
जयराज को लगता है, इस भटक गई हुई चि‍ड़िया की छाती की धड़कन उसे सुन पड़ रही है। उसे मालूम होता है कि उसे चैन मिल रहा है। उसे मालूम होता है कि उसकी अपनी देह में भी गर्मी आ रही है। मालूम होता है कि‍ उसकी देह में उद्यतता भी चढ़ती आ रही है। कि… और जल्दी-जल्दी मन में वह कह रहा है – राम,राम,राम।
सुदर्शना ने ‘अह’ किया, ‘ऊह’ किया और इस बार तो उसने अपनी करवट ठीक की तो दोनों बाँहें जयराज के इधर-उधर पड़ गईं और शरीर का उत्तर भाग जंघाओं पर आराम से टिक गया।
उस समय जयराज की साँस तेजी से आने-जाने लगी। वह सीधा उठ कर भाग जाता। पर वह बाल भर भी हिला-डुला नहीं। उस शरीर के कोमल दबाव को और उस जीवित नारी मांस स्पंदन को, जो साँस-प्रश्वास के साथ नीचे-ऊपर होता था, अपने ही शरीर पर सटा पा कर वह उस शरीर को निस्पंद, जड़ अचेतन बना देना चाहता था। पर वह जप रहा है – राम,राम,राम, राम।
इस जगती पर हे राम यह क्या है? …हे राम, राम, राम, राम।
इतने में प्लेटफॉर्म को हिलाती हुई गाड़ी स्टेशन पर आई और जयराज की आँखों के सामने ठहर गई। जयराज की गोद में पड़ी हुई एक चिड़िया सुख की नींद सो रही है। वह अब क्या कर करे? इस गाड़ी से तो उसे जाना है। रेलगाड़ियों की खिड़कियों से रोशनी आ रही है। रेलगाड़ी के उन कमरों में लोग सोए होंगे और सवेरा होगा कि वे अपने-अपने घर होंगे। उसमें बारिश भी नहीं जाती है और हवा से बचने को खिड़कियाँ भी लगाई जा सकती हैं।
उसने मानो अपनी टाँग कुछ हिलाई। उसके मन में आया कि वह कुछ कदम आगे बढ़ कर एक दूसरे दर्जे में पहुँच सकता है। वहाँ गद्दा बिछा होगा जो सूखा होगा। हाँ, यह बेचारी भी क्या दूसरे दर्जे की बेंच के गद्दे पर अधिक आराम नहीं पाएगी? कुछ मिनटों में फिर कहाँ रहेगा हरीपुर और कहाँ रहेगा स्टेशन। उसने मानो चाहा कि उसे जगा दे और कहे कि देखो, गाड़ी आ गई है। चलो, चलें। लेकिन मानो उसने सहसा ही अपने को सावधान कर लिया। वह स्थिर दृष्टि से गाड़ी को देखता रहा, जो उन दोनों को आराम भी दे सकती है और छुटकारा भी दे सकती है। वह रेल अभी चल देगी और बात की बात में हरीपुर से दूर हो जायगी। उसने अपनी गोद में सोई हुई नारी को देखा। मानो पूछना चाहा, ‘क्या तुमको सोना ही है? क्या मेरी गोद सदा इसी तरह बनी रहने को है? क्या तुम्हें कहीं आना-जाना नहीं है? गाड़ी आई है, उठो, खड़ी हो।’
लेकिन यह चिड़िया आराम से साँस लेती हुई वहीं पड़ी रही।
जयराज ने अपने को कुछ समेटा-सा। उसने जोर से आवाज दे कर एक आदमी को पास बुलाया और उससे कहा, ‘भाई बिलासपुर का एक टिकिट ला सकते हो?’ यह उसने इस तरह कहा कि सुदर्शना को बिना सुनाई दिए न रहा। सुदर्शना इस पर गोद में कुलबुलाई और उठ बैठी। बैठ कर झट ऊपर से कंबल उतार कर अलग करते हुए उसने कहा, ‘लो !’
जयराज ने कहा, ‘क्यों-क्यों?’
सुदर्शना ने उसी भाँति कंबल उसकी ओर को अलग थामे रह कर कहा, ‘लो, तुम लेट जाओ।’
उस समय जयराज को कुछ भी नहीं सूझा। वह सुदर्शना को देखता रह गया। सुदर्शना उसकी आँखों में न अभियोग था, न निराशा। वे आँखें कहती थीं कि वह कुछ नहीं है। और तुम चाहो चले जाओ। वह दुनिया में चाहे जैसे रह लेगी। तुम उसके लिए अपना पल भी क्यों खोओगे? निरुपाय? तो रह लूँगी निरुपाय। लेकिन तुम अवश्य ही चले जा सकते हो। वह अपनी फैली बाँहों में कंबल थामे अपनी इकहरी गीली धोती में बैठी है, कि लो और जाओ, और भगवान्‍ तुम्हें सुखी रखे। मैं सब ठीक हूँ।
जयराज ने कहा, ‘क्यों, क्या बात है?’
सुदर्शना ने कहा, ‘इस गाड़ी से तुम्हें जाना है, तो लो।’ जयराज ने कहा, ‘कोई बात नहीं। दूसरी से चला जाऊँगा।’
सुदर्शना कुछ क्षण तो उसे देखती रही। फिर कंबल खोला और उसे अपने ऊपर ले कर चुपचाप उस गोदी ही में लेट गई।
इतने में गाड़ी ने सीटी दी। वह सरकती जाने लगी। जयराज पराजित दृष्टि से जाती हुई गाड़ी को सामने देखने लगा। वह‍ सामने से निकलती हुई चली गई। निकल जाने पर उसकी जगह में समा कर अँधेरा फिर वैसा ही सुन्न खड़ा हो गया।
उस शून्य को भेद कर टिकने योग्य आधार पाने के यत्न में जयराज आँख गड़ा कर उस अँधेरे को देखने लगा। पर, वहाँ कुछ न था। शून्य सूना था, गाड़ी निकल गई थी और सुदर्शना गोद में सोई थी। वह कहने लगा, ‘राम, राम, राम।’
गाड़ी के निकल जाते ही उसे बेहद सर्दी मालूम होने लगी। उसने हाथ मले, सीटी बजाई, सिर खुजलाया, फिर वह कंबल के नीचे लेटी हुई सुदर्शना के सिर को धीरे-धीरे थपकाने लगा।
सोई-सोई सुदर्शना ने भीतर ही से कूज कर कहा, ‘कंबल ओड़ लो। सर्दी बहुत हो रही है।’ और एक हाथ से उसने कंबल को ऊपर उठा दिया। जयराज ने भी कंबल को अपने कंधों तक ले लिया और उसके हाथ की उँगलियाँ कमर तक गईं और फैले हुए सुदर्शना के बालों में फिरने लगीं। उनकी उँगलियाँ अव्यवस्थित पड़े और ठंडे हो रहे बालों को सुरझाती और उरझाती सुदर्शना के सिर से कटि त‍क और कटि से सिर तक अलस गति रही थीं और वह वेगपूर्वक राम-राम जप रहा था।
सुदर्शना का शरीर उसके गात पर दबाव दे कर चिपटता ही आया। तब उसने सुदर्शना के बालों में घूमते हुए हाथों को एकदम उठा लिया और सीधी निगाह से अँधेरे को देखने लगा। दुनिया से हटा और उसके विधि-निषेध से मुक्त, दो घड़ी रुक कर वहाँ से चले जाने के लिए जब सब आँखों के अभाव में यहाँ वह स्टेशन की बेंच पर बैठा है, तब क्या है जिसकी उसे आशंका हो? क्या है जिसे उसे रोकने की जरूरत हो। क्यों नहीं निर्भय हो कर सब कुछ के प्रति वह अपने को खोल देता है? द्वंद्व काहे का? ‘न’कार कि‍सके प्रति?
पर उसकी देह गरमा रही है और वह कह रहा है, ‘राम, राम, राम।’
सुदर्शना क्या चाहती है? लेकिन वह तो कुछ भी नहीं चा‍हती है। वह सो रही है, क्योंकि यह सोने का समय है और उसकी आँखों में नींद है। वह गोद में सो रही है, क्योंकि वह गोद उसके और बेंच के बीच में आ गई है। एक-वस्त्रा हो कर सो रही है, क्योंकि और कपड़ा भीगने पर सुखाने डालने के लिए उससे माँग लिया गया है। वह तो इस अँधेरे पहर में सोना ही चाहती है, क्योंकि यह सोने का समय है और उसकी आँखों में नींद है।
आज की रात में सब कुछ से छूट कर, आकाश और धरती के बीच में अपने लिए वह अकेली बन गई है। वहीं उसे खोखले अज्ञात में यह आदमी आ मिला है, जिसको इतना जानती है कि वह जयराज है। उसके ऊपर और नहीं उसे जानना मिला कि वह क्या है? जयराज में उसको क्या निषिद्ध है? विधि-निषेध, इस सबसे तो वह परे हट आई है। किसके लिए अब उसमें अपमान हो कि किसी से बँधने और किसी ओर से हटने का विधान उसके लिए भी हो। जब कुछ उसने अपने लिए अनिवार्य नहीं रखा है, तब निषिद्ध भी क्या उसके लिए हो सकता है?
इसलिए चिपट-चिपट कर कुलबुला कर और करवटें ले-ले कर ठीक आराम की व्यवस्था बना कर यह इस गोद में लेती है। हम पूछें क्यों बालक माँ की गोद के साथ अधिक-से-अधिक घनिष्ट न हो? बालक के आराम पर कौन उँगली उठा सकता है? उसमें लज्जा कहाँ है, उल्लंघन कहाँ है, उस रस में मैल भी कहाँ है?
और सुदर्शना जयराज की गोद में लेटी है, क्योंकि दुनिया दखल देने को उपस्थित नहीं है और यह समय सोने का है। उसमें बाधा कहाँ है? अविश्वास कहाँ हैं? उसने चिंतापूर्वक कुलबुला कर उस गोद में अपने अतिशय आराम की व्यवस्था कर ली है। उसने वहाँ तकिया भी बना लिया है, गद्दा भी पा लिया है और रजाई की गर्मी भी उसने बना ली है। जग से टूटी, अतीत से परोक्ष्‍ा, सब तरह के नातों के अभाव में वह निरी शावक, निरी चिड़िया बनी यहाँ आराम से सो रही है। कल क्या था, राम जाने। कल क्या होगा नहीं हिसाब। अगले ही मिनट क्या हो जायगा नहीं प्रतीक्षा। कैफियत उसे कहीं भी पहुँचानी नहीं है। वह अतीत से दबी नहीं है, वर्तमान से शांकित नहीं है, भविष्य से प्रार्थी नहीं है।
जो है, है। वह उसी में संपूर्ण है, उसी में उपलब्ध है। वह आराम से सो रही है, और यह समय सोने का है।
उसने कूज कर पूछा, ‘तुम्हें नींद नहीं आ रही है?’
जयराज ने अँधेरे में आँख फाड़ कर देखने की कोशिश से हैरान हो कर इस मानो अपने भी भीतर से आते हुए प्रश्न को सुना। जैसे दूर से फिर भी बिल्कुल पास से कहीं कोई पूछ रहा है, ‘तुम्हें नींद नहीं आ रही है?’ उस समय मानो अपने से झगड़ कर उसने उत्तर फेंका, ‘नहीं, बिल्कुल नहीं।’
किसी ने फिर पूछा, ‘रात बहुत हो गई है।’
जयराज ने जैसे आगे बढ़ती आती हुई चुनौती को ललकार के साथ स्वीकार किया हो, ‘हाँ’ रात बहुत हो गई है।’
इन शब्दों की ध्वनि के भीतर भरे अप्रेम और परुषता ने मानो सुदर्शना के भीतर पहुँच कर चैन से कूज उठे उसके जी को ठोकर दी। वह उठ कर बैठ गई।
‘क्यों, क्यों?’
बोली, ‘मैं जाती हूँ। तुम लेट लो।’ जयराज ने सुदर्शना को देखा। उन आँखों में न अभियोग था, न निराशा। उसमें कुछ माँग न थी, स्निग्ध स्वीकृति ही थी। किंतु जयराज फिर भी अपने आप एक व्यर्थता के बोध से घबरा-सा गया। यह नारी उससे कहे, ‘मैं बैठती हूँ, तुम लेट जाओ?’ उसने रूखे पड़ कर कहा, ‘नहीं मुझे नींद नहीं है।’
सुदर्शना ने थोड़ी देर के बाद धीमे से पूछा, ‘क्या बजा होगा?’
‘साढ़े बारह तो हो गया होगा।’
‘बहुत सर्दी है।’
कुछ देर हो गई दोनों चुप रहे। तदंतर सुदर्शना धीमे स्वर से बोली ‘तुम लेट जाओ मैं कहती हूँ।’
मानो सुदर्शना के भीतर की माता ने यह कहा।
इस निर्व्याज भाव से प्रकट हुई सुदर्शना की सत्-चिंता ने जयराज के व्यर्थ भाव से कठोर हो रहे चित्त को हल्के से छू दिया। जयराज के भीतर का तनाव मानो एक साथ ही ढीला हो गया। उसने बिल्कुल ही बदल गई वाणी से कहा, ‘नहीं, नहीं।’
सुदर्शना कहना विचारती थी कि खाली बेंच पर मैं आराम से सो जाऊँगी, तुम मेरी फिकर न करो। लेकिन नहीं-नहीं कहते हुए उस स्निग्ध स्वर के प्रति वह ऐसी कृतज्ञ हो उठी कि उसको मुँह से यह बात निकल ही न सकी।
उस समय दोनों के भीतर यह एक ही साथ उदय हो आया कि इन दोनों के बीच किसी प्रश्न और उत्तर की अपेक्षा नहीं है। इन दोनों में से किसी परिचायापेक्षा का भी व्यवधान नहीं है। दोनों जैसे काल के आदि से चिर-परिचित हैं, चिर अभिन्न। कि दोनों के बीच की वाणी मौन है और शब्द झमेला हैं। शब्द मात्र अपने आवरण के लिए है। जब अपना सामना करते कठिनता होती है, जब यत्नपूर्वक अपने प्रति विमुखता अपनानी होती है। तब बीच में मानो डालने के लिए वह भाषा और ये शब्द हैं और ये दोनों तो मानो वहाँ पहुँच कर परस्पर प्राप्त है, जहाँ शब्द मौन में ऐसा खोया है जैसे बूँद सागर में।
सुदर्शना कृतज्ञता में विभोर हो गई और एक क्षण भी बैठी न रह कर फिर जयराज की गोद में उसी भाँति गिर गई और उसी मिनट सो गई।
उस समय जयराज के आग्रहग्रस्त पौरुष में हटात् स्निग्धता आ गई और उसने प्रतीति पाई कि सुदर्शना ऐसी अछूत नहीं है, ऐसी भूत नहीं है कि राम नाम के जप से उसकी छूत भगानी ही हो। उसके भीतर के तने हुए आवर्जन शिथि‍ल हो आए और स्नेह-स्निग्ध उसने सुदर्शना के सिर को थपकते हुए कहा, ‘सुदर्शना, तुम क्या न सोचती थी कि मैं तुम्हें याद करता हूँगा?’
सुदर्शना ने कहा, ‘हमें नींद आ रही है।’
यह सुन कर जयराज के मानस तथा शरीर के स्नायुओं का उत्तेजन एकदम अनावश्यक होने लगा। तब उत्तरोतर स्वस्थ और अनुद्विग्न और अकुंठित भाव से सुदर्शना को गोद में लिए रह कर उसके बालों में वह अपने हाथ फेरता रहा।
सुदर्शना ने थोड़ी देर में कहा, ‘सोते नहीं हो?’
जयराज ने उसका सिर थपका कर कहा, ‘नहीं मुझे नींद नहीं आ रही है।’
कुछ देर बाद उसने भी पूछा, ‘सुदर्शना, तुम सोती हो?’
सुदर्शना ने मानो आधी नींद में कहा, ‘हमें जी नींद आ रही है।’
सुदर्शना के सिर और गाल पर धीरे-धीरे थपक कर जयराज ने कहा, ‘अच्छा तुम सोओ कंबल ठीक से ओढ़ लो सुदर्शना, मैं अभी सोचता था, मैं तुमसे कहूँ कि आओ, यह रात हम जागे-जागे काट दें। आओ, हम बातें करें कि रात सबेरे से मिल जाय। लेकिन तुम सोओ। मैं स्वार्थी नहीं बनूँगा।’
सुदर्शना ने कुनकुना कर कहा, ‘हमें जी नींद आ रही है।’
‘हाँ-हाँ, तुम सोओ।’
जयराज कहने लगा, ‘मैं नहीं जानता था सुदर्शना, कि मुझमें तुम अभी हो और तुमसे इस तरह मिल कर अपने भीतरवाली तुमको तुझे पा लेना है। और इस तरह तुम्हारे द्वारा ही मैं अपने से ज्यादा पाऊँगा, मैं नहीं जानता था। अकेला चलता रहा। आशा हार-हार रहती थी और जीवन रेगिस्तान लगता था। लेकिन फिर-फिर कर मैं राष्ट्र के नाम को पकड़ लेता रहा और चलता रहा। मैं चलता ही चला आ रहा हूँ। मैंने पीछे की तरफ नहीं देखा, आगे राष्ट्र को रख कर वहीं आँख गाड़ मैं भागता रहा। जी हारता और मैं आँख मींच लेता। मैं कहता, ‘राष्ट्रदेवो भव।’ कोई हिम्मत देनेवाला न था, न कोई ढाँढ़स बँधाता था। कोई न था जिसमें अपने को बाँट लेता, कोई न था जो कहता, चले चलो, मैं भी हूँ। सब थे जो कहते थे, आइए, व्याख्यान दे जाइए। कोई न था जो कहे, आओ पानी पी लो। चला चलूँ यह सबको अभीष्ट था। चलने का सामर्थ्य और हौसला देनेवाला कोई न था। लेकिन मैं यही करता रहा। अपने से मुँह मोड़ कर पाखंड करता रहा। अपने को इनकार करने से क्या चलेगा, सुदर्शना!’
करवट बदलते हुए सुदर्शना ने कहा, ‘हमें जी नींद आ रही है।’
‘हाँ! सोओ सुदर्शना। मुझे माफ करो।’ और वह आग्रहपूर्वक चुप हो गया।
उसने देखा, आधी रात बीत गई है। बादल उड़ गए हैं, तारे आँख खोल-मींच कर दुनिया को देख रहे हैं।
उसने कहा, ‘सुदर्शना सोती हो !’
नींद मैं कुनमुनाई – ‘उं-उं-उं!’
‘सुदर्शना, मैं राष्ट्र के लिया जीया। लेकिन जीवन-रस तो मुझमें से चुकता ही गया। कहाँ से विसर्जित करने के लिए प्राण पाता रहा मैं नहीं जानता था। लेकिन अब तो जानता हूँ। सुदर्शना, तुम युग-युग जियो। जहाँ रहो सुख रहो। हम क्या उस स्रोत को जानते हैं, जहाँ से हमें जीवन-रस मिलता है? लेकिन वहाँ स्नेह हैं, यज्ञ है। अब मैं देखता हूँ मैं कभी अकेला न था और सदा ही अमृत से रक्षित चलता चल रहा था। सुदर्शना… तुम सोती हो?’
सुदर्शना जैसे गाढ़ी नींद में कुनकुनाई… ‘उं-उं-उं !’
‘सोओ, सुदर्शना सोओ।’ जयराज ने उसके गालों पर थपकते हुए कहा, ‘जहाँ रहो, सुख की नींद सोओ। एक रोज काल की गोद भी होगी। लेकिन मैं कहता हूँ वहाँ भी तुम सुखी रहोगी। मैं अनंत जीवन नहीं मानता हूँ। मैं अनंत प्राण मानता हूँ। लेकिन मेरे लिए तो प्रणय का क्षण भी अनंत है। चित् जीवन का क्षण भी शाश्वत है। …क्या पति को छोड़ कर यहाँ आ गई हो? किंतु स्नेहमयी के लिए भगवान् कहाँ नहीं है? और उसके लिए वर्ज्य क्या है? नियम सब नीचे हैं। मैं आज जानता हूँ, यज्ञाहुत स्नेह सदा विजयी होता है। वह बंधन तोड़ता है क्योंकि मुक्तिदाता है। वह कभी असंयत नहीं है। क्योंकि सदैव वह निर्बंध है…
‘सुदर्शना, सोओ, सोओ। मैंने अपने स्नेह को स्वीकार करना न चाहा। मैंने उसे इनकार कर शून्य कर देना चाहा। आज तुमने मुझे सीख दी कि यह सब वृथा था, मेरा अहंकार था। उस अंहकार में मुझसे यज्ञ क्या बनता? राष्ट्र-सेवा क्या बनती है? आज मैंने जाना, स्नेह अंगीकरण के लिए है, अस्वीकरण के लिए नहीं। सुदर्शना सोओ, सोओ।’
फिर उसने तारों की ओर देखा। ये तारे सैकड़ों बार उसने देखे हैं। आज जैसे वे तारे उसके बिल्कुल अपने ही हो गए हैं। उनमें से एक-एक को मानो तुम संबोधन से पुकार कर पूछना चाहता है, ‘जय रामजी की भाई, कहो, तुम हँस रहे हो, अच्छे तो हो !’
उसने कहा, ‘सुदर्शना, सोती हो!’
सुदर्शना कुलबुलाई और अपने दोनों ओर से कंबल समेट कर सटा लेने के लिए वह उठना-सा चाहने लगी।
‘क्या है, क्या है?’
‘अंह, इधर जाने कहाँ से हवा ठंडी-ठंडी लगती है?’
जहाँ बताया गया उधर से जयराज ने टटोल कर देखा। टाँगों के पास की धोती बहुत गीली थी, और वहाँ बेंच की दराजों से हवा आ कर बेहद सर्द लगती थी। बोला, ‘ओहो, धोती तो बेहद भीगी है !’
ऊपर अवगुंठित तारे खिले थे। काला व्योम तना था। और नीचे धरती, स्थिर और नग्न, तारों की आँखों के नीचे खुली और मग्न बिछी थी। इस महाव्योम के तले स्त्री क्या है, पुरुष क्या है? आवरण क्या है? और निरावरण्यता भी क्या है? वे सब एकदम कुछ नहीं है। मात्र सुदर्शना-सुदर्शना हैं और जयराज जयराज है। इस बोध के अतिरिक्त किसी भी और तुच्छता के लिए वहाँ अवकाश न था।
उसने कहा, ‘सुदर्शना, धोती उतार डालो। सूखे हिस्से की तह करके मैं नीचे बिछा देता हूँ, तब सो जाना।’ यह कह कर वह अपेक्षा करने लगा कि धोती उसे मिले और वह तह करके उसे बिछा दे।
सुदर्शना ने उठ कर उसकी ओर देखा –
निकट था कि जयराज को अपने शब्दों में कुछ अनौचित्य का भान हो आया कि तभी सुदर्शना ने मानों झींक कर धोती अलग करते हुए कहा, ‘हमें नींद आ रही है, हाँ तो।’
जयराज ने तुरंत उठ कर धोती की तह कर दी और सूखे हिस्से को ऊपर रख कर बिछाते हुए कहा, ‘लो, अब लेट जाओ।’
कह कर वह चलने लगा। सुदर्शना ने अपने को सर्दी से अच्छी तरह ढकते हुए पूछा ‘तुम कहाँ जाते हो?’
‘मैं जरा वक्त देख आऊँ। अभी आया।’
‘नहीं’
‘अभी आया। मैं अभी आया।’
‘नहीं, नहीं।’
जयराज आ कर बेंच पर सुदर्शना के पास बैठ गया। तब सुदर्शना अनायास उसकी गोद में ढुलक गई। जयराज ने अत्यंत निराविष्ट भाव और हल्के चित से हँस कर कहा, ‘क्यों जी, तुम्हें यह ख्याल नहीं होता कि बैठे-बैठे थ‍क भी सकता हूँ?’
सुदर्शना ने करवट बदलते हुए किया, ‘उं-एं-उं।’
इस कुनमुन-कुनमुन कूजती हुई जयराज की गोद में पड़ी चिड़िया को क्या मालूम है कि यह स्टेशन है, स्टेशन का प्लेटफार्म है, प्लेटफार्म की बेंच है और यह कि न वह चार साल की बच्ची है और न ही चोंच परवाली चिड़िया ही है? क्या उसे मालूम है कि यह स्टेशन, यह प्लेटफार्म, यह बेंच और जयराज उसी दुनिया के अंतर्गम हैं, जहाँ विधि-निषेध का असद्भाव नहीं है और जहाँ उचित-अनुसूचित भी है, हया शर्म भी है, पर हमें नहीं मालूम! इतना हम जानते हैं कि धोती के बिछ जाने से सर्दी सचमुच रुक गई है और वह कूजती और कुनकुनाती बड़े सुख से गोदी में सोई है।
…अरे ओ ढके-ढके मानव, जो दूसरे की आँख से अपने को ढकता है, सूरज की धूप से अपने को ढकता है, हवा के स्पर्श से अपने को ढकता है, सच की जोत से अपने को ढकता है, अरे क्यों, कपड़ो से लदा-लदा ही क्या तू सभ्य है? कपड़ों को उतारने के साथ-साथ क्या तेरी सभ्यता, तेरी संभावना, तिरोहित हो जाएगी? क्या रे लदे-ढके मानव?
लेकिन सुदर्शना गीली धोती को अलग करके कुनमुन-कुलबुल करती हुई जयराज की गोद में पड़ी है। और जयराज अपने हाथ के स्पर्श से उसे गर्मी दे रहा है।
जयराज ने कहा, ‘सुदर्शना सोती हो?’
सुदर्शना ने किया, ‘उं-उं-उं।’
‘मेरी गाड़ी चार बजे और जाती है।’
‘उं-उं-उं।’
‘दो बज गया होगा।’
‘सुदर्शना, अब तुम क्या करोगी?’
‘उं-उं-उं।’
सुदर्शना के गाल पर, कुछ रीझ में और कुछ खींच में, थपकते हुए जयराज ने कहा, अच्छा सोओ सुदर्शना। मत ही सुनो और सोती ही रहो।’
और तारे, उज्ज्वल, अगणित, बुंदियों से तारे, काले व्याम पर खिले टँके थे। और धरती अनावृत वक्षा प्रमदा की नाई प्रतीक्षा में थकी उनके नीचे चुप सोई थी।
सवेरा होने लगा। पक्षी चहचहा आए। तारे खो गए। उस समय सुदर्शना जाग कर उठी। जयराज बेंच की पीठ पर सिरे टेके ऊँघ रहा था। प्लेटफॉर्म सुनसान था। उसने धोती उठा कर पहन ली, कुर्ती पहन ली, फैले हुए कंबलों को तहा कर बेंच पर रख दिया। उसके मन में न अभाव था, न अभियोग, जैसे अब उसे कुछ पाना शेष न था। सवेरा उसे प्यारा लग रहा था और उसके मन में पूर्णता उमगी आ रही थी। किसी के प्रति उसमें धिक्कार का लेश न था। उसने सोते हुए जयराज को देखा जिसकी गोद में अभी वह शावक की भाँति पड़ी थी। उस निरीह के लिए उसके हृदय में एक मातृत्व का-सा भाव हिलोर ले आया। वह सोचने लगी कि क्या मैं अपनी गोद का तकिया दे कर कंबल ओढ़ा कर इस बेचारे को नहीं सुला ले सकती? किंतु इसमें इसकी नींद भंग हो जायगी।
वह इस रात के गर्भ में से फटते-उठते प्रभात को देखने लगी। उसके मन में का सब संशय भाग गया, अभाव वि‍लय हो गया। अशेष प्रश्न, उसका जी मानो चारों दिशाओं का एक साथ अभिवादन देना चाहता है। अब ओर उसे प्रीति, सब ओर मंगल है। इस प्रभातकालीन उषा के प्रकाश में उसने जयराज को देखा। कौन उसके लिए आज वर्जित है, कौन उसके लिए निषिद्ध है। किसके साथ पार्थक्य उसके लिए अनिवार्य है। अरे कोई नहीं, कोई नहीं। उसका हृदय मानो चारों दिशाओं में आलिंगन प्रसार करता हुआ आवाहन् का गान उठा। मानों बाँहें फैला कर उषा से, वनस्पति से, आकाश से, सबसे वह चाहने लगी, ‘मुझे लेओ, मुझे लेओ। मैं अ‍स्वीकृति नहीं दूँगी, सब मुझ में आ जाओ। और सब मुझे लेओ, मुझे लेओ।’
उसका मन स्वच्छता से भरता ही गया। उसे सामने मानो सब कुछ सद्य:स्नात, प्रस्तुत प्रतीत होने लगा। प्लेटफॉर्म के किनारे जा कर समानांतर बनी, प्रतिकूल दिशाओं में मानो अनंत दूर जाती हुई उन लोहों की रेलों को वह देखने लगी। मानो इनमें भी वह चिर-रहस्य और उसका वह चिर-रहस्याधिप अनुपस्थित नहीं है। इसमें भी वह रम-रम रहा है।
जयराज की आँखें खुली। उसने देखा, गोद खाली है, और उसके पास दो कंबल तह हुए रखे हैं। एक उसके कंधों पर ओढ़ाया हुआ है। उसने देखा तड़का काफी फूट चुका है। उसे ख्याल हुआ… उसकी चार बजे की गाड़ी… वह झपट कर उठा, कुर्ते को बाँह में डाला और देखा एक ओर, दूर, सुदर्शना प्लेटफॉर्म के पास खड़ी है। उसने निकट जा कर कहा, ‘सुदर्शना!’
सुदर्शना ईष्त्स्मित से मुसकराई, ‘तुम उठ गए। देखो कैसा सुहावना है। और उसने प्राची की लालिमा की ओर संकेत किया।
जयराज ने कहा, ‘सुदर्शना।’
सुदर्शना ने कहा, ‘कंबल मैं रख आई थी।’
जयराज ने कहा, ‘सुदर्शना।’
वह पूछना चाहता है कि, सुदर्शना अब?
किंतु सुदर्शना के भीतर अब प्रश्न शांत हो गए हैं। उसने कहा, ‘कंबल वहाँ रखे हैं न?’
जयराज चुप।
सुदर्शना जयराज की बाग्वद्धता को अन्यथा नहीं समझ सकी। किंतु स्नेह तो यज्ञ है। इसमें मेरा-तेरा कहाँ है? इससे स्नेह को ले कर समाज में ग्रंथि कैसे पैदा की जा सकती है? उसने कहा, ‘जयराज, मुझे कुछ आज्ञा देना चाहते हो?’
जयराज इतना ही कह सका, ‘सुदर्शना!’ और चुप रह गया।
सुदर्शना ने कहा, ‘मैं जानती हूँ, तुममें मेरे लिए अपेक्षा नहीं है। जयराज यही अपेक्षा सब कुछ है… मैं अब जाती हूँ।’
‘कहाँ?’
‘जाती हूँ।’
अब जयराज क्या पूछे कि, ‘कहाँ?’
‘मेरा प्रणाम लो जयराज, और मेरे आशीर्वाद लो। क्योंकि एक बात मैं तुम्हें बताती हूँ। मैं इसी वर्ष माता हो जाऊँगी। प्रभु तुम्हें सदा सुखी रखें?’
जयराज ने पुकारा, ‘सुदर्शना !’
सुदर्शना नहीं ठिठकी, सो नहीं, पर जयराज के चरण छू कर प्रस्थानोद्यत उसने कहा, ‘मैं जाती हूँ।’
जयराज ने पाया वह कह रहा है, जाओ।’ क्योंकि वह और कुछ भी नहीं कह सकता है।
‘प्रणाम’
और, वह जयराज के सामने-सामने पीठ मोड़ कर प्लेटफॉर्म के किनारे-किनारे फूटती उषा की ओर बढ़ती चली गई।
जयराज देखता रहा, देखता रहा। फिर लौट आया।
प्रस्‍तुति: – Alaknanda singh @LegendNews.in
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