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Saturday, 28 February 2026

कालिदास! सच-सच बतलाना.....इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे?


 बाबा नागार्जुन की इस कविता में कालिदास के प्रति एक प्रकार की जिज्ञासा और उनके साहित्य के प्रति एक गहरी संवेदना छिपी है।

यह कविता रति के विलाप (कुमारसंभव) और यक्ष की वेदना (मेघदूत) में कालिदास की व्यक्तिगत भावनाओं को उजागर करती है। नागार्जुन पूछते हैं कि क्या वेदना की चरम सीमा पर यक्ष रोया था या तुम (कालिदास) रोए थे।

कविता में प्रकृति का चित्रण विशेषकर वर्षा ऋतु में यक्ष का अपनी प्रियतमा को याद करना मार्मिक रूप से प्रस्तुत है। यह कविता कवि की मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रश्न पूछती है और कालिदास की रचनाओं में निहित दर्द को उजागर करती है। 




ये ही है वो कालजई कव‍िता...आप भी पढ़‍िए ...  

कालिदास! सच-सच बतलाना

इन्दुमती के मृत्युशोक से

अज रोया या तुम रोये थे?

कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से

निकली हुई महाज्वाला में

घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम

कामदेव जब भस्म हो गया

रति का क्रंदन सुन आँसू से

तुमने ही तो दृग धोये थे

कालिदास! सच-सच बतलाना

रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका

प्रथम दिवस आषाढ़ मास का

देख गगन में श्याम घन-घटा

विधुर यक्ष का मन जब उचटा

खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर

चित्रकूट से सुभग शिखर पर

उस बेचारे ने भेजा था

जिनके ही द्वारा संदेशा

उन पुष्करावर्त मेघों का

साथी बनकर उड़ने वाले

कालिदास! सच-सच बतलाना

पर पीड़ा से पूर-पूर हो

थक-थककर औ' चूर-चूर हो

अमल-धवल गिरि के शिखरों पर

प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?

रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

#नागार्जुन